रात का सन्नाटा और अंधेरे की जुर्रत--2
मीरा की आँखें बंद थीं, हाथ पीछे बंधे थे और वह पूरी तरह शेर के रहमोकरम पर थी। शेर अब उसके पीछे घुटनों के बल बैठ गया था, जहाँ से मीरा के सुडौल नितम्ब और उसकी वह छोटी सी नीली थोंग उसकी भूखी नज़रों के बिल्कुल सामने थी।
शेर ने अपनी उंगली उस भीगे हुए नीले कपड़े के किनारे पर फँसाई और एक घिनौनी हँसी हँसा। दवा के असर और शेर की हरकतों ने मीरा को इतना गीला कर दिया था कि वह थोंग अब पूरी तरह से उसके जिस्म से चिपक चुकी थी।
शेर: (तिरस्कार और हवस भरी आवाज़ में, मीरा की पीठ पर अपनी गर्म साँसें छोड़ते हुए) "अरे! ये क्या? ये साली चोरनी भी बिल्कुल हमारी मीरा मेमसाब की तरह ये छोटी-छोटी कच्ची पहनती है? मैंने देखा है मेमसाब के कपड़ों को धोते वक्त... उनकी अलमारी सजाते वक्त मेरी नज़रें अक्सर उनकी इन्हीं चीज़ों पर टिक जाती थीं। आजकल की औरतों का तो जैसे यही रिवाज हो गया है, ऊपर से शरीफ़ और अंदर से इतनी बेबाक।"
मीरा का चेहरा शर्म से सिंदूरी लाल हो गया। आँखों पर बंधी काली पट्टी के पीछे से उसके आँसू बहने लगे, लेकिन वे आँसू भी दवा की उस सुलगती उत्तेजना को शांत नहीं कर पा रहे थे।
शेर: "पर लगता है तू तो पूरी गीली हो गई है। इतनी प्यास... एक अजनबी मर्द के हाथों में? साफ़ दिख रहा है कि तू भागना नहीं चाहती, बल्कि अपनी इस गांड़ को इस वफादार के लंड पर रगड़ने का मज़ा ले रही है।"
कहते ही शेर ने बिना कोई मौका दिए, मीरा की उस नीली थोंग को एक झटके में नीचे की ओर खींच दिया।
मीरा: (मुँह में कपड़ा ठुंसा होने के कारण ज़ोर से छटपटाई) "म्म्म्म! म्म्म्म्म!"
मीरा ने अपने हाथों को आज़ाद करने के लिए पूरी ताक़त लगा दी, उसका बदन धनुष की तरह तन गया। अपनी नग्नता का यह अहसास उसे मौत से भी बदतर लग रहा था। शेर के सामने अब उसके दोनों भरे हुए नितम्ब पूरी तरह से नंगे थे, जो अंधेरे में चाँदनी की तरह चमक रहे थे।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'उफ़ मेमसाब! क्या कयामत गांड़ पाई है आपने। थोंग क्या उतरी, आपकी सारी सती-सावित्री वाली शान मिट्टी में मिल गई। अब आपकी ये चाँद के बीच में दरार... उफ़ क्या नज़ारा है! अब आप सिर्फ एक तड़पता हुआ जिस्म हैं, और मैं आपका शिकारी। मैंने बरसों से इस दिन का इंतज़ार किया है कि कब मैं आपकी इस बनावटी पाकीज़गी की धज्जियाँ उड़ाऊँ।
मीरा का बदन अब शर्म और उत्तेजना के उस भयानक संगम पर था जहाँ से वापसी नामुमकिन थी। उसे अपने ही जिस्म की प्रतिक्रिया से नफरत हो रही थी, पर शेर का हर स्पर्श उसे उस नफरत में डूबने नहीं दे रहा था।
शेर ने अपनी भूखी नज़रें मीरा की उस नग्नता पर गड़ाईं और एक गहरी, लम्बी साँस ली।
शेर: (एक हिंसक और कामुक फुसफुसाहट में) "उफ़... तेरी ये गांड़ भी बिल्कुल हमारी मीरा मेमसाब जैसी ही कयामत है। मैंने उन्हें कभी इतना नंगा तो नहीं देखा... (झूठ बोलते हुए, क्योंकि वह उसे नहाते वक्त देख चुका था) मैंने तो बस उन्हें साड़ी में लचकते हुए देखा है। उन्हें तो मैं हाथ भी नहीं लगा सकता... आखिर सती-सावित्री जो हैं वो!”
“ उनकी मर्यादा और उनकी ऊंची दीवारें मुझे उनसे दूर रखती हैं, पर तू तो आज मेरे सामने पूरी तरह खुली किताब की तरह पड़ी है। कभी-कभी लगता है जैसे भगवान ने तुझे बनाया ही इसलिए है ताकि मैं मेमसाब पर किए जाने वाले अपने सारे अरमान तुझ पर पूरे कर सकूँ।""
मीरा का बदन शर्म और बेबसी के मारे बुरी तरह थरथरा रहा था। शेर का एक-एक शब्द उसके चरित्र पर घाव की तरह लग रहा था, पर दवा का ज़हर उसके जिस्म को इस अपमान में भी आनंद ढूँढने पर मजबूर कर रहा था।
शेर: "पर तू... तू तो एक मामूली चोरनी है। और लगता है तुझे इस वफादार के हाथों में बड़ा अच्छा लग रहा है। जब मेमसाब को नहीं छू सकता, तो तेरी ही इस मलाई जैसी गांड़ को आज जी भर के चाटूँगा। तेरी ये कोमलता और ये थरथराहट मुझे पागल कर रही है। आज मैं तुझे वो सब दिखाऊंगा जो एक नौकर अपनी मालकिन के साथ करने के सपने देखता है।"
कहते ही शेर ने अपनी जीभ निकाली और मीरा के एक नितम्ब के निचले हिस्से से लेकर ऊपर की दरार तक एक लम्बी और गीली लकीर खींच दी। मीरा का पूरा वजूद उस खुरदरे स्पर्श से काँप उठा।
मीरा: (मुँह में कपड़ा होने के कारण सिसकते हुए) "म्म्म! म्म्म्म्म!"
शेर यहीं नहीं रुका। उसकी हवस अब वहशीपन में बदल चुकी थी। उसने मीरा के नरम मांस को अपने दाँतों के बीच भरा और एक गहरा 'लव-बाइट' छोड़ दिया।
शेर: "आह... कितना रसीला मांस है तेरा! जितना काट रहा हूँ, तू उतनी ही तड़प रही है। देख... कैसे तेरी ये गुलाबी दरार और भी गीली होती जा रही है। बोल... और मज़ा चाहिए इस ज़बान का?"
शेर ने अब अपनी जीभ और भी गहराई से मीरा के उन नंगे और भीगे हुए नितम्बों के बीच फिराना शुरू किया। वह बारी-बारी से उन्हें चाट रहा था।
मीरा [आंतरिक संवाद]: 'ये क्या कर रहा है? ये... ये मुझे ज़लील कर रहा है और मेरा जिस्म... छि:! मुझे अपने आप से नफरत हो रही है। क्यों मेरी गांड़ इस गंदी ज़बान के नीचे पिघल रही है? क्यों मेरी योनि से वो रसीला सैलाब बह रहा है? मैं सती हूँ… मैं सरताज की हूँ… पर ये शेर... ये मुझे आज पूरी तरह कुचल देगा!'
अंधेरे गलियारे की वह मद्धिम रोशनी अब मीरा की मुकम्मल बेबसी और शेर की बेलगाम हवस की गवाह बन चुकी थी।
शेर ने मीरा को पीछे से अपनी पकड़ में बनाए रखा, लेकिन अब उसके इरादे और भी घिनौने हो गए थे।
शेर: (एक क्रूर मुस्कान के साथ, मीरा के कान में फुसफुसाते हुए) "चलो... अब जरा सामने का नजारा भी देख लिया जाए। चोरी का माल आखिर सामने से कैसा दिखता है, ये तो देखना ही होगा।"
कहते ही शेर ने एक झटके में मीरा के नाइटगाउन का निचला हिस्सा ऊपर की ओर खींच दिया। उसने उसे इतना ऊपर खींचा कि वह मीरा के चेहरे को पूरी तरह ढक गया। यह शेर की एक सोची-समझी चाल थी—चेहरा ढकने से उसे यह बहाना मिल गया कि उसने कभी अपनी मेमसाब का चेहरा नहीं देखा, वह तो बस एक 'चोरनी' के साथ खेल रहा था।
अब मीरा का पूरा बदन शेर की भूखी नज़रों के सामने बिल्कुल नग्न था।
शेर की आँखें सबसे पहले मीरा के उन सुडौल स्तनों पर टिकीं, जो उत्तेजना और दवा के असर से पत्थर की तरह सख्त हो चुके थे। मीरा की छटपटाहट की वजह से वे गोरे पहाड़ ऊपर-नीचे उछल रहे थे, जिससे उनकी मादकता और भी बढ़ गई थी।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'उफ़... मेमसाब! क्या कयामत नज़ारा है। ये दूधिया उभार... और ये निप्पल्स, जो किसी कड़क कली की तरह मुझे ललकार रहे हैं। आपका ये गोरा पेट... और उसके नीचे...'
शेर की नज़रें नीचे फिसलीं। मीरा का वह सपाट और मखमली पेट पसीने की बूंदों से चमक रहा था। और फिर... उसकी नज़रें उस गुलाबी दरार पर जा टिकीं, जो अब पूरी तरह से गीली होकर अपनी चमक बिखेर रही थी। वह हिस्सा इतना रसीला और गर्म दिख रहा था कि शेर की राल टपकने लगी।
मीरा: (चेहरा ढका होने और मुँह में कपड़ा होने के कारण पागलों की तरह छटपटाई) "म्म्म्म! म्म्म्म्म!"
वह अपने हाथ पीछे आज़ाद करने के लिए पूरी ताक़त लगा रही थी, जिससे उसके स्तन और भी ज़्यादा तनकर शेर की नज़रों के सामने आ रहे थे। उसकी पीठ धनुष की तरह मुड़ रही थी और वह अपने जिस्म को शेर के स्पर्श से बचाने के लिए किसी मछली की तरह फड़फड़ा रही थी, लेकिन उसकी यह तड़प शेर की हवस को और हवा दे रही थी।
शेर: (मीरा की उस भीगी हुई गहराई की ओर इशारा करते हुए, एक ज़हरीले तंज के साथ) "क्यों इतना तड़प रही हो? ऊपर से तो बड़ी सती बन रही हो, पर नीचे तो पूरी गीली होकर सैलाब बहा रही हो। साफ़ दिख रहा है कि तुम्हारी ये प्यास तुम्हें चैन नहीं लेने दे रही है। चुपचाप इस वफादार की सेवा का आनंद लो... क्योंकि तुम्हारी ये हालत झूठ नहीं बोल रही है।"
शेर ने अपनी उंगली उठाई और मीरा के उस भीगे हुए मखमली हिस्से के बिल्कुल करीब ले गया, जहाँ से वह गरम भाप उठती महसूस कर रहा था। दवा ने मीरा के अंगों को इतना संवेदनशील बना दिया था कि बिना छुए ही वह उस उंगली की आहट से सिहर उठी।
शेर ने अपने दोनों बड़े हाथ मीरा के उन दूधिया पहाड़ों पर जमा दिए।
जैसे ही शेर की हथेलियों का दबाव मीरा के कोमल और तमतमाए हुए स्तनों पर पड़ा, मीरा के पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई। दवा के असर ने उसके अंगों को इतना संवेदनशील बना दिया था कि शेर का हर स्पर्श उसे जलाने लगा था।
शेर: (एक गहरी और वहशी आवाज़ में, मीरा के स्तनों को अपनी मुट्ठियों में भरते हुए) "उफ़... कितने सुडौल और भारी हैं ये! बिल्कुल हमारी मीरा मेमसाब जैसे। मैंने तो बस उन्हें साड़ी और ब्लाउज़ में ही कसते हुए देखा है... कभी हाथ लगाने की हिम्मत नहीं की।"
शेर ने मीरा के एक स्तन को बड़ी बेरहमी से भींचा, जैसे वह उसे मसल देना चाहता हो। मीरा के मुँह से कपड़े के भीतर एक तीखी सिसकी निकलकर रह गई।
मीरा: "उम्म्म्म! म्म्म्म-हूँ! उह-हुँह!" (उसकी छाती ऊपर-नीचे तेज़ी से धड़क रही थी, और उसके बंधे हुए हाथ शेर की पकड़ से छूटने के लिए बुरी तरह छटपटा रहे थे।)
शेर: (मज़ा लेते हुए) "हाँ... एक बार उन्हें गिरने से बचाने के लिए पकड़ा था, तब उनके ये चूचे मेरी छाती में बुरी तरह दब गए थे। और आज सुबह भी... वो डर के मारे मुझसे ऐसे चिपक गई थीं कि उनके ये मखमली गोले मेरे सीने में समा गए थे। शर्म के मारे उनका चेहरा सिंदूरी लाल हो गया था... आखिर सती-सावित्री जो हैं वो!"
मीरा का बदन उस अपमान और अपनी ही शारीरिक प्रतिक्रिया के दोहरे वार से कांप रहा था। शेर का हर शब्द उसके आत्म-सम्मान पर कोड़े की तरह लग रहा था।
उसे अहसास हो रहा था कि शेर ने उसे किस बारीकी से देखा है, उसकी हर हरकत और उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को वह अपनी गंदी नज़रों में कैद कर चुका था।
शेर: "पर तुझे देख... तू तो एक नीच चोरनी है। तेरे ये चूचे तो पत्थर की तरह कड़े होकर मुझे पुकार रहे हैं कि मैं इन्हें भींच लूँ, इन्हें कुचल दूँ। मेमसाब तो शर्म से मर रही थीं, पर तू... तू तो यहाँ अपनी जवानी इस वफादार के हाथों में लुटाने के लिए बेताब है।"
शेर ने अपनी उंगलियों का दबाव मीरा के उन सख्त निप्पल्स पर और बढ़ा दिया। दवा के नशे में डूबी मीरा को ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई तपता हुआ लोहा उसके स्तनों को खरोंच रहा हो। वह चाहकर भी खुद को छुड़ा नहीं पा रही थी, क्योंकि उसके हाथ पीछे बंधे थे और उसका संतुलन शेर की पकड़ पर टिका था।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'तड़पिए मेमसाब! आपकी ये सती वाली साख तो आज इस अँधेरे में धूल चाट रही है। आपके ये भारी पहाड़ अब इस 'कुत्ते' की जागीर हैं। आज ये चोरनी वाला खेल आपको उस मुकाम पर ले जाएगा जहाँ से आप कभी वापस नहीं लौट पाएंगी।'
शेर ने अब अपना मुँह मीरा के उन नंगे और फड़कते हुए स्तनों की तरफ झुकाया। उसे उन गुलाबी कलियों से उठती हुई वह गरम भाप और पसीने की खुशबू पागल कर रही थी।
शेर ने अपना मुँह आगे बढ़ाया और मीरा के उस दूधिया और पत्थर की तरह सख्त हो चुके स्तन को अपनी गिरफ्त में ले लिया। उसने उसे इतनी ज़ोर से चूसना शुरू किया कि मीरा के पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई।
मीरा: "म्म्म्म-आह! उम्म्म्म! म्म्म-हूँ!"
शेर: (एक हिंसक आवाज़ के साथ, मीरा के निप्पल को अपने दाँतों के बीच हल्का सा दबाते हुए) "उफ़... ये मलाई जैसा वदन! जितना चूस रहा हूँ, उतना ही कड़ा होता जा रहा है। तेरे इस गोरे जिस्म पर मेरे दाँतों के ये निशान हमेशा तुझे याद दिलाएंगे कि तू आज रात किसी के हाथों में पूरी तरह टूट चुकी है। बोल... क्या मालकिन का बदन भी इतना ही मीठा होगा?"
शेर ने मीरा के गुलाबी निप्पल्स पर अपनी पकड़ और मज़बूत कर ली। वह उन्हें काट रहा था, उन्हें अपनी जीभ से रगड़ रहा था और बड़ी बेरहमी से अपने मुँह में भर रहा था। मीरा का शरीर पूरी तरह अकड़ गया। दवा के ज़हरीले असर ने उसके अंगों की संवेदनशीलता को हज़ार गुना बढ़ा दिया था, जिससे शेर का हर 'काटना' उसे दर्द के साथ-साथ एक असहनीय सुख दे रहा था।
मीरा [आंतरिक संवाद - नफरत की आवाज़]: 'कमीने! कुत्ते! मैं तेरी मेमसाब मीरा हूँ... मुझे खोल! तेरी इतनी हिम्मत कि तू अपनी मालकिन के जिस्म को इस तरह रौंद रहा है? मैं तुझे और तेरे इस वजूद को खत्म कर दूँगी! छोड़ मुझे... आह! रुक जा!मत कर... यह अपवित्रता मैं सहन नहीं कर पाऊंगी!'
लेकिन उसी वक्त, उसके अंतर्मन से एक दूसरी, ज़्यादा गहरी और सुलगती हुई आवाज़ उठी।
मीरा [आंतरिक संवाद - दवा का असर]: 'उफ़... ये क्या हो रहा है? ये स्पर्श... इतना खुरदरा, इतना वहशी... पर इतना अच्छा क्यों लग रहा है? क्यों मेरी नसों में खून की जगह लावा दौड़ रहा है? शेर की ये ज़बान... ये मेरे निप्पल्स को जिस तरह मरोड़ रही है, मेरा दिल कर रहा है कि ये कभी न रुके। सरताज ने कभी मुझे इस तरह नहीं छुआ... ये पागलपन... ये मुझे जन्नत की सैर करा रहा है ... म्म्म्म-आह!'
मीरा की योनि से अब रसीला द्रव सैलाब की तरह बहने लगा था, जिससे उसकी जांघों के बीच की चिपचिपाहट और भी बढ़ गई थी। शेर ने महसूस किया कि मीरा का बदन अब विरोध करने के बजाय उसके स्पर्श के सांचे में ढलता जा रहा है।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'तड़पिए मेमसाब! आपकी ये गालियाँ आपके मन में ही घुटकर रह जाएँगी, पर आपकी ये सिसकियाँ और ये कड़क चूचे गवाही दे रहे हैं कि आपकी रूह इस 'वफादार' की गुलाम हो चुकी है। आज इस 'चोरनी' वाले खेल में मैं आपकी इज़्ज़त की हर परत को अपनी ज़बान से चाट जाऊँगा।'
शेर ने मीरा के एक स्तन को अपने दाँतों से आज़ाद किया, जो अब उसकी लार से भीगकर अंधेरे में चमक रहा था। उसने अपनी भूखी नज़रें दूसरे 'गोरे पहाड़' पर गड़ाईं और उसे अपनी मुट्ठी में बुरी तरह भींच दिया।
शेर: (एक गहरी और वहशी आवाज़ में, मीरा के चेहरे के बिल्कुल करीब अपनी गरम साँसें छोड़ते हुए) "उफ़... काश! काश मैं कभी अपनी मीरा मेमसाब के ये चूचे भी इसी तरह चूस सकूँ। आज जब वो डर के मारे मेरे सीने से चिपकी हुई थीं, तो कसम खुदा की... मेरे मन में यही विचार आया था कि काश ये मलाई जैसी कोमलता हमेशा के लिए मेरी छाती से लगी रहे।"
मीरा: "उम्म्म्म! म्म्म्म्म-हूँ! उह-आह!" (मीरा का बदन उस अपमान और अपनी ही शारीरिक उत्तेजना के दोहरे वार से कांप उठा। उसकी सिसकियाँ अब और भी बेबस और कामुक होती जा रही थीं।)
शेर: "पर वो... वो तो सती-सावित्री हैं! साक्षात् देवी! उन्हें तो मैं सिर्फ दूर से देख सकता हूँ, उनकी साड़ी की लचक को निहार सकता हूँ। पर तू... तू तो एक मामूली चोरनी है! तेरे इन चूचों को तो मैं जी भर के चूस सकता हूँ, इन्हें काट सकता हूँ, इन्हें अपनी मर्ज़ी से मसल सकता हूँ!"
कहते ही शेर फिर से आगे बढ़ा और मीरा के दूसरे स्तन को अपने मुँह में पूरी ताक़त से भर लिया। वह उसे चूसने लगा, उसे अपने दाँतों से काटने लगा। मीरा का शरीर पूरी तरह अकड़ गया। दवा की वजह से उस 'काटने' का दर्द एक तेज़ और मीठी लहर बनकर उसके पेट के निचले हिस्से में उतर गया।
मीरा: "म्म्म्म-आह! म्म्म्म! म्म्म्म्म!" (मीरा का शरीर अब शेर की लय पर झूल रहा था। वह चाहकर भी अपनी जाँघों को आपस में रगड़ने से नहीं रोक पा रही थी।)
मीरा [आंतरिक संवाद - दवा का असर]: 'नहीं... आह! ये क्या कह रहा है? ये... ये मुझे देवी बोल रहा है और फिर मुझे इस तरह ज़लील कर रहा है? पर मेरा ये बदन... छि:! मुझे अपने आप से नफरत हो रही है। क्यों मेरे निप्पल्स इस गंदी ज़बान के नीचे इतने कड़क हो रहे हैं? क्यों मेरी योनि से वो रसीला सैलाब बह रहा है? शेर की बातें ज़हर हैं... पर उसका स्पर्श शहद जैसा क्यों लग रहा है?'
शेर अब घुटनों के बल नीचे बैठ गया, उसकी नज़रों के सामने मीरा की वे गोरी और सुडौल नंगी जाँघें थीं, जो मद्धिम रोशनी में संगमरमर की तरह चमक रही थीं। दवा की गर्मी और शर्म की वजह से वे जाँघें रह-रहकर फड़क रही थीं।
शेर ने अपनी जीभ निकाली और मीरा की एक जाँघ के निचले हिस्से से लेकर ऊपर तक एक लंबी और गीली लकीर खींच दी। मीरा का पूरा बदन उस खुरदरे और गर्म स्पर्श से किसी बिजली के झटके की तरह काँप उठा।
शेर: (ऊँची और वहशी आवाज़ में, मीरा की जाँघों के बीच अपना चेहरा टिकाते हुए) "वाह! तेरी ये जाँघें भी बिल्कुल हमारी मीरा मेमसाब जैसी ही मखमली और सफेद हैं। एक बार देखा था मैंने उन्हें, जब वो छोटी स्कर्ट पहनकर बैठी थीं... उफ़! तब तो मैं उन्हें छूने की हिम्मत भी नहीं कर सकता था। वो तो सती-सावित्री हैं, साक्षात् देवी!"
मीरा के दिमाग में धमाके हो रहे थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। एक तरफ शेर उसे 'सती-सावित्री' और 'देवी' कह रहा था, और दूसरी तरफ उसे 'चोरनी' कहकर उसके जिस्म की हर सरहद को रौंद रहा था। उसकी आँखों पर बंधी पट्टी के पीछे से आँसू बहकर उसके नाइटगाउन को भिगो रहे थे, पर मुँह में ठुंसा कपड़ा उसकी चीखों को बाहर नहीं आने दे रहा था।
मीरा: "म्म्म्म! उम्म्म्म-हूँ! म्म्म्म-आह!" (वह अपनी जाँघों को आपस में भींचने की कोशिश कर रही थी, पर शेर की मज़बूत बाँहों ने उन्हें ज़बरदस्ती खुला रखा था।)
शेर: "पर तू... तू तो बस एक नीच चोरनी है! और एक चोरनी की इन जाँघों को चाटने में मुझे कोई पाप नहीं लगेगा। वैसे भी, मुझे सब दिख रहा है... तू जिस तरह अपनी जाँघें सटा रही है, साफ़ लग रहा है कि तुझे इस कुत्ते की ज़बान का मज़ा आ रहा है। बोल... और चाटूँ? तुझे पता है, मेमसाब के साथ ये सब करने का खवाब मैं हर रात देखता हूँ। उनके बदन के हर मोड़ पर अपनी ये ज़बान फिराने की हसरत मुझे सोने नहीं देती। आज तुझे भोगते हुए मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरा वो पुराना खवाब पूरा हो रहा है।"
शेर ने अब अपनी जीभ और भी गहराई से मीरा की दोनों जाँघों पर फिराना शुरू किया। उसने धीरे-धीरे मीरा की उन नंगी और गरम जाँघों के अंदरूनी हिस्से को चाटा, जहाँ की त्वचा सबसे ज़्यादा नाज़ुक और संवेदनशील थी। वह अपनी जीभ से वहाँ छोटे-छोटे घेरे बना रहा था, जिससे मीरा की सिसकियाँ और भी तेज़ होती जा रही थीं।
मीरा [आंतरिक द्वंद्व]: 'ये क्या कह रहा है? ये... ये मुझे देवी बोल रहा है और फिर मुझे इस तरह ज़लील कर रहा है? इसकी बातें... हे भगवान! क्या इसकी नियत सच में मेरे लिए इतनी गंदी थी? यह हमेशा से मुझे इसी तरह अपनी नज़रों से नंगा करता रहा है? पर मेरा ये बदन... छि:! मुझे अपने आप से नफरत हो रही है। क्यों मेरा जिस्म इस गंदी ज़बान के नीचे पिघल रहा है? क्यों मेरी योनि से वो रसीला सैलाब बह रहा है? मैं सरताज की हूँ… पर ये शेर... ये मुझे बर्बाद कर रहा है! जो आग सरताज कभी नहीं सुलगा पाए, वो ये नौकर अपनी ज़बान से मेरे रोम-रोम में भर रहा है। आह... रुक जा कमीने... म्म्म्म!'
दवा का ज़हरीला असर मीरा के आत्म-सम्मान को कुचल रहा था। शेर की ज़बान जब उसकी जाँघों के ऊपरी हिस्से तक पहुँची, तो मीरा की जाँघें अनजाने में ही और फैल गईं, जैसे वह उस वहशी सुख को और गहराई तक महसूस करना चाहती हो।
शेर [आंतरिक संवाद]: 'तड़पिए मेमसाब! आपकी ये सती-सावित्री वाली खाल आज इस 'कुत्ते' के थूक से गीली हो रही है। आप जितनी नफरत खुद से करेंगी, आपकी ये प्यास उतनी ही बढ़ेगी। आपकी ये जाँघें जो सरताज के लिए आरक्षित थीं, आज मेरी ज़बान के नीचे मोम की तरह पिघल रही हैं। आज ये 'चोरनी' वाला खेल आपकी इज़्ज़त की हर परत को उतार देगा।'
शेर ने अब अपनी नाक मीरा की जाँघों के बीच की उस नमी में गड़ा दी और एक गहरी साँस ली। उस मदहोश कर देने वाली गंध ने शेर के भीतर के जानवर को पूरी तरह आज़ाद कर दिया।