बेगम
Writer/Author- Herotic
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बेगम
Writer/Author- Herotic
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Yesterday, 11:50 AM
नया शहर नई उम्मीदें और एक अनजाना डर। जब हम इस मोहल्ले में शिफ्ट हुए, तो अब्बू ने कहा था कि इंसानियत का कोई मजहब नहीं होता। लेकिन जब हम शांति नगर की तंग गलियों में अपना सामान ट्रक से उतार रहे थे, तो मुझे महसूस हुआ कि नाम और हकीकत में बहुत फासला है।
मेरा नाम रेहान है, और मेरी अम्मी, जुबैरा बेगम, इस दुनिया की सबसे पाक और खूबसूरत रूह हैं। वह 40 की उम्र पार कर चुकी हैं, लेकिन उनकी आंखों में आज भी वही मासूमियत और तहजीब है जो किसी को भी मुतासिर कर दे। वह हमेशा अपने उसूलों की पक्की रही हैं - बाहर निकलते वक्त हमेशा काले हिजाब और बुर्के में रहती हैं। उनके लिए पर्दा सिर्फ एक कपड़ा नहीं, उनकी इज्जत और उनकी पहचान का हिस्सा है। हमारा नया घर एक पुराने ढंग का दो मंजिला मकान था। ठीक हमारे घर के सामने एक बड़ी सी बालकनी वाला घर था, जहाँ मोहल्ले के कुछ हिं** लड़के अक्सर जमा रहते थे। जब अम्मी पहली बार गाड़ी से उतरी, तो मैंने देखा कि उन लड़कों की बातचीत अचानक थम गई। उनकी निगाहों में वो दोस्ताना चमक नहीं थी जो एक नए पड़ोसी के स्वागत में होनी चाहिए। बल्कि उनकी आंखों में एक अजीब सी 'जिज्ञासा' और 'शरारत' थी। अम्मी ने अपनी नजरें नीची कर रखी थीं और हाथ में कुरान शरीफ का बक्सा थामे हुए संभलकर अंदर चली गईं। लेकिन मुझे पीछे से उनकी फुसफुसाहट सुनाई दी। "देख भाई, नए पड़ोसी आए हैं। मिया जी की बेगम तो बड़ी सलीके वाली लगती हैं," उनमें से एक ने सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए कहा। अगले कुछ दिनों में माहौल और भी भारी होने लगा। अम्मी सुबह - सुबह घर के बाहर रखे गमलों में पानी देने निकलतीं, तो सामने वाली बालकनी पर उन लड़कों का मजमा पहले से तैयार रहता। वे सीधे तौर पर कुछ नहीं कहते, लेकिन उनकी खामोशी और उनका लगातार घूरना किसी गाली से कम नहीं था। एक दिन अम्मी बाजार से राशन लेने जा रही थीं। मैं कॉलेज से लौट रहा था कि मैंने देखा वही तीन-चार लड़के अम्मी से कुछ दूरी बनाकर उनके पीछे चल रहे थे। वे आपस में कुछ मजाक कर रहे थे और बार-बार अम्मी के बुर्के और उनके चलने के अंदाज पर टिप्पणी कर रहे थे। अम्मी की चाल तेज हो गई थी। उनकी घबराहट उनके कांपते हाथों से साफ झलक रही थी। जब वह घर के अंदर दाखिल हुईं, तो उन्होंने जल्दी से दरवाजा बंद कर लिया और काफी देर तक सोफे पर बैठकर लंबी-लंबी सांसें लेती रहीं। "बेटा रेहान," उन्होंने धीमी आवाज में मुझसे कहा, "शायद इन लोगों ने पहले कभी हमें करीब से नहीं देखा। घबराना मत, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। बस दुआ करो कि इनकी नीयत में खोट न आए।" लेकिन हालात ठीक होने के बजाय बिगड़ने लगे। अब वो लड़के सिर्फ घूरते नहीं थे, बल्कि अम्मी के घर से बाहर निकलने के वक्त का इंतजार करने लगे थे। जब भी अम्मी छत पर कपड़े सुखाने जातीं, वे लड़के अपनी छत पर चढ़ जाते। वे अक्सर ज़ोर-ज़ोर से हंसते और ऐसी बातें करते जो अम्मी को असहज कर दें। एक बार तो हद हो गई जब उनमें से एक अम्मी के रास्ते में जानबूझकर अपनी बाइक खड़ी कर दी और तब तक नहीं हटाई जब अम्मी ने अपना रास्ता नहीं बदल लिया। अब्बू काम के सिलसिले में अक्सर शहर से बाहर रहते थे। मैं सिर्फ 19 साल का था, , गुस्सा तो बहुत आता था लेकिन डर भी था कि कहीं ये मामला सांप्रदायिक न बन जाए। अम्मी हमेशा मुझे रोक देती थीं। वह अपनी खूबसूरती और गरिमा को उस काले पर्दे में छुपाए रखती थीं, लेकिन उन लड़कों की गंदी नीयत उस पर्दे को भी चीर देना चाहती थी। एक शाम, जब सूरज ढल रहा था, मैंने अम्मी को खिड़की के पास रोते हुए देखा। वह डर गई थीं। वह औरत चंद लड़कों की ओछी हरकतों की वजह से अपने ही घर में कैदी बन गई थी। एक दिन की बात है, दोपहर की कड़ी धूप में छत तप रही थी। जुबैरा बेगम ने अपने सर पर दुपट्टे को और मजबूती से लपेटा और गीले कपड़ों की बाल्टी लेकर ऊपर आईं। उन्हें लगा था कि इस वक्त सब सो रहे होंगे और वह सुकून से कपड़े सुखा पाएंगी। लेकिन सामने वाली छत पर वही विक्रम (जो एक 24 साल का हट्टा-कट्ठा लड़का था और उसकी लंबाई करीब 6 फीट थी, दिखने में काफी मस्कुलर था लेकिन सांवला और बदसूरत था, उसके हाथ में एक मोटा कड़ा और कलावा बंधा था जिससे उसका हाथ और ताकतवर दिखता था, पता नहीं पर मुझे उससे थोड़ा डर लगता था) और उसके दो दोस्त पहले से मौजूद थे, जैसे वे सिर्फ उनके बाहर निकलने का इंतज़ार कर रहे थे। ज़ुबैरा ने अपनी नज़रें नीची रखीं और जल्दी-जल्दी तार पर कपड़े फैलाना शुरू किया। तभी अचानक हवा का एक तेज़ झोंका चला। ज़ुबैरा के हाथ से उसकी गीली पैंटी फिसल गई। वह उसे पकड़ पाती, उससे पहले ही हवा ने उसे उड़ाकर सीधे सामने वाली बालकनी में फेंक दिया, ठीक विक्रम के पैरों के पास। ज़ुबैरा का चेहरा ज़र्द पड़ गया। शर्म और घबराहट के मारे उनके हाथ कांपने लगे। उन्होंने एक पल के लिए अपने दुपट्टे से खुद को और ढका और मुड़कर नीचे जाने ही वाली थीं कि विक्रम की आवाज़ आई। "अरे जुबैरा जी! आपकी चीज़ हमारे पास आ गिरी है... इतनी जल्दी क्या है?" ज़ुबैरा की हिम्मत नहीं हुई कि वह पलटकर देखें। लेकिन जो नज़ारा वहां चल रहा था, वह किसी भी शरीफ औरत की रूह कंपा देने वाला था। विक्रम ने झुककर उस गीली पैंटी को उठाया। उसके चेहरे पर एक गंदी, शैतानी मुस्कान थी। उसने ज़ुबैरा की तरफ सीधे देखते हुए, उस कपड़े को अपनी नाक के पास ले गया और लंबी सांस भरकर उसे सूंघने लगा। उसके दोस्त ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। "क्या खुशबू है भाई! मिया जी की पसंद तो बड़ी लाजवाब है," उनमें से एक ने सीटी बजाते हुए कहा। ज़ुबैरा की आँखों में आँसू आ गए। वह उस अपमान को सह न सकीं और तेज़ी से सीढ़ियों की तरफ भाग गईं। नीचे आकर उन्होंने ज़ोर से दरवाज़ा बंद किया और दीवार के सहारे बैठ गईं। उनका दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि जैसे सीने से बाहर आ जाएगा। वह एक रूढ़िवादी और नेक औरत थीं, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी पर्दे और इज्जत के साथ गुज़ारी थी। आज एक मामूली से कपड़े ने उन्हें उन आवारा लड़कों के सामने बेपर्दा और लाचार महसूस करा दिया था। रेहान ने जब अपनी अम्मी को इस हाल में देखा, तो उसे समझ नहीं आया कि क्या हुआ है। "अम्मी, आप रो क्यों रही हैं? क्या हुआ छत पर?" अम्मी ने सिसकते हुए बस इतना कहा, "बेटा, इस शहर में रहना हमारे लिए मुमकिन नहीं लग रहा। यहाँ की हवाओं में ज़हर है।" दिन बिता और रात का सन्नाटा गहरा चुका था, लेकिन रेहान की आँखों से नींद कोसों दूर थी। अम्मी के चेहरे पर जो डर और बेबसी उसने शाम को देखी थी, उसने उसके सीने में एक आग भर दी थी। वह अपने कमरे की बत्ती बुझाकर खिड़की के पास खड़ा हो गया, जहाँ से सामने वाली बालकनी साफ दिखाई देती थी। To be continued…
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9 hours ago
Very nice update
8 hours ago
Wonderful start
8 hours ago
Ashadaran shuruwat
8 hours ago
Chamatkar writing ✍️ ♥️
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