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(19-03-2026, 08:25 PM)The_Writer Wrote: पता नहीं क्यूँ, अपने से पच्चीस - तीस साल बड़े --- एक बुज़ुर्ग आदमी के लंड को हिलाने तो क्या; छूने तक घृणा कर रही थी --- वही अब उसी आदमी के द्वारा उसके बूब्स मसले जाने पर उसे एक अलग ही ख़ुशी, आनंद मिलने लगी --- एक एडवेंचर सा फ़ील होने लगा उसे. Abhi toh aur bhi khushi aur anand ki anubhuti hogi asha ko randhir ke hantho se... Kitne hi salon se banchit rahi kisi purush ke parsh se...
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निर्देश पालन
और हुआ भी वही...
“तो आशा, मुझे ‘फ़्री’ टाइप रहने वाली लेडीज बहुत पसंद है और फ़िलहाल तुम्हें देख कर ऐसा लग रहा है मानो तुम बहुत ‘ओवर- बर्डन’ हो अभी... बोझ बहुत ज़्यादा है. डू वन थिंग; रिमूव योर पल्लू...!!” वासनायुक्त अपना पहला ही आदेश खतरनाक ढंग से दिया रणधीर बाबू ने.
आशा चौंक उठी,
अविश्वास से आँखें बड़ी-बड़ी हो उठी,
मानो उसने भी पहला आदेश या यूँ समझें की ‘इंटरव्यू’ का पहला ही निर्देश कुछ ऐसा होने की 'आशा' नहीं की थी
प्रतिरोध स्वरुप कुछ कहने हेतु होंठ खोला उसने, पर कुछ याद आते ही तुरंत होंठों को बंद भी कर लिया.
रणधीर बाबू मुस्कराए. सुनहरे चश्मे से झाँकती उनकी आँखें किसी वहशी दरिंदे के माफिक चमकने लगीं.
गंभीर स्वर में बोले,
“आई एम सीरियसली सीरियस, आशा. अपना पल्लू हटाओ.”
अत्यंत स्पष्ट स्वर में स्पष्ट निर्देश आया रणधीर बाबू की तरफ़ से...
आशा हिचकी, आँसू रोकी, थूक का एक बड़ा गोला गटकी और धीरे से हाथ उठा कर बाएँ कँधे पर पिन के पास ले गई --- पिन खोलती कि तभी दूसरा आदेश आया,
“मेरी तरफ देखते हुए आशा. आँखों में आँखें डालकर.”
बड़ा ही सख्त कमीना जान पड़ा ये आदमी आशा को. घोर अपमानित-सा बोध करती हुई वह धीरे से आँखें उठा कर रणधीर बाबू की ओर देखी --- सीधे उसकी आँखों में --- बिना पलकें झपकाए --- फ़िर आहिस्ते से पिन खोल कर सामने टेबल पर रखी. कँधे पर ही पल्लू को ज़रा सा सरकाई और दोनों हाथ चेयर के आर्मरेस्ट पर रख दी. दो ही सेकंड में पल्लू सरसराता हुआ पूरा सरक कर आशा की गोद में आ गिरा. रणधीर बाबू के आँखों में लगातार देखे जा रही आशा उनके आँखों की चुभन अपने जिस्म की ऊपरी हिस्से पर साफ़ महसूस करने लगी और परिणामस्वरुप एक तेज़ सिहरन दौड़ गई उसके पूरे शरीर में.
आशा भले ही रणधीर बाबू के आँखों में बिन पलकें झपकाए देख रही थी पर ठरकी बुड्ढे की नज़र आशा के पिन खोलते ही उसके सुडौल उभरी छाती पर जा चिपके थे.
नीले ब्लाउज में गहरे गले से झाँकती बड़ी चूचियों की ऊपरी गोलाईयाँ और दोनों के आपस में अच्छे से सटे होने से बनने वाली बीच की दरार; अर्थात क्लीवेज, बरबस ही रणधीर बाबू की आँखों की दिशा को अपनी ओर बदलने पर मजबूर कर रही थीं. आशा की चूचियाँ और विशेषतः सामने नज़र आती उसकी चार इंच की क्लीवेज उसके लिए ऐसा नारीत्व वाला वरदान था जोकि उसे सम्पूर्ण नारी जाति की देवी बना रहे थे और इस वक़्त एक हवसी ठरकी बुड्ढे रणधीर बाबू का शिकार.
रणधीर बाबू अधीर होते हुए अपने होंठों पर जीभ फिराया और ख़ुद को चेयर पर एडजस्ट करते हुए अपनी दृष्टि को और अधिक केन्द्रित किया आशा के वक्षों पर.
और जो दिखा उसे उससे और भी अधिक मनचला और उत्तेजित हो उठे वो.
आशा के ब्लाउज के ऊपर से ब्रा की पतली रेखा दोनों कन्धों पर से होते हुए नीचे उसके छाती और छाती से दोनों चूचियों को दृढ़ता से ऊपर की ओर उठाकर पकड़े; ब्रा कप में बदलते हुए साफ-साफ नज़र आ रहे हैं ऐसा दृश्य तो शायद किसी अस्सी बरस के बूढ़े के बंद होती दिल और मुरझाये लंड में जान फूँक दे --- फिर रणधीर जैसे पैंसठ वर्षीय हवसी ठरकी की बिसात ही क्या है ??
रणधीर बाबू ने गौर किया --- नीले ब्लाउज में गोरी चूचियों की गोलाईयाँ जितनी फ़ब रही हैं --- उन दोनों गोलाईयों के बीच की दरार --- ऊपर में थोड़ी कत्थे रंग की और फिर जैसे - जैसे नीचे, ब्लाउज के पहले हुक के पीछे छिपने से पहले, वह शानदार क्लीवेज की लाइन – वह दरार; काली होती चली गई --- ज़रा ख़ुद ही कल्पना कर सकते हैं पाठकगण – एक चालीस वर्षीया सुंदर गोरी महिला --- उनके सामने अपनी नीली साड़ी की पल्लू को गोद में गिराए; गहरे गले का ब्लाउज पहने बैठी है --- ब्लाउज के ऊपर से ब्रा स्ट्रेप की दो पतली धारियाँ कंधे पर से होते हुए --- सीने के पास चूचियों को सख्ती से पकड़ कर इस तरह से उठाए हुए हैं कि क्लीवेज नार्मल से भी दो इंच और बन जाए तो??!! रणधीर बाबू की भी हालत कुछ - कुछ ऐसी ही बनी हुई थी. लाख चाहते हुए भी अपनी नज़रें आशा की दो गोल गोरी चूचियों और उनके मध्य के लंबी काली दरार पर से हटा ही नहीं पा रहे हैं. स्तनों का आकर्षण ही कुछ ऐसा होता है --- करे तो क्या करे --- बेचारा बुढ़ऊ!
उत्तेजना की अधिकता में रणधीर बाबू के मुख से बरबस ही निकल गया,
“पहला हुक खोलो आशा.”
“ऊंह!”
आशा चिहुंकी. निर्देश का आशय समझने के लिए रणधीर बाबू की ओर देखी. पर रणधीर बाबू की आँखें तो अभी भी उस गहरी घाटी में विचरण कर रही थीं. उनकी नज़रों को फॉलो करते हुए आशा अपने पल्लू विहीन ब्लाउज की ओर नज़र डाली और ऐसा करते ही वह अपने नए नवेले बॉस के निर्देश का आशय समझ गई. थोड़ी ठिठकी, पल भर को सही-गलत, पाप-पुण्य का विचार उसके दिल – ओ – दिमाग में आया भी और आ कर क्षण भर में चला भी गया. आखिर निर्देश का पालन तो करना ही है --- रणधीर बाबू इज़ हर बॉस एंड बॉस इज़ ऑलवेज़ राईट !
नज़रें नीची किए आहिस्ते से ब्लाउज के ऊपरी दोनों सिरों को पकड़ते हुए पहला हुक खोल दी...
अभी खोली ही थी कि दूसरा निर्देश तुरंत आया,
‘थोड़ा फैलाओ.’
रणधीर बाबू की ओर देखे बिना ही आशा अब थोड़ा मुक्त हुए ब्लाउज के ऊपरी दोनों दोनों सिरों को प्रथम हुक समेत ज़रा सा मोड़ते हुए अंदर कर दी --- मतलब अपने बूब्स की ओर अंदर कर दी दोनों ऊपरी उन्मुक्त सिरों को --- इससे ब्लाउज की नेकलाइन और गहरी हो गई और क्लीवेज का दर्शनीय हिस्सा थोड़ा और बढ़ गया बिना कोई अतिरिक्त या विशेष जतन किए.
“थोड़ा आगे की ओर करो” अगला निर्देश !
आशा समझी नहीं --- सवालिया दृष्टि से रणधीर की ओर देखी.
रणधीर बाबू ने हथेलियों के इशारे से थोड़ा आगे होने को कहा.
इस बार चूक नहीं हुई आशा से.
बहुत हल्का सा झुककर अपने सुपुष्ट को उभारों को तानकर सामने की ओर बढ़ा दी !! आहह...!! स्वर्ग !! यही एक शब्द कौंधा रणधीर बाबू के दिमाग में. सचमुच, अप्रतिम सुडौलता लिए हुए परम आकर्षणमय लग रहे हैं दोनों — आशा और उसके दो उभार!
कुछ मिनटों तक घूरते रहने के बाद रणधीर बाबू ने अपना आईफ़ोन निकाला और आशा को सिर एक तरफ़ झुका कर आँखें ज़रा सा बंद करने को कहा ---- जैसे कि वो नशे में हो --- नशीली आँखें --- जैसा रणधीर बाबू चाहते थे बिल्कुल वैसा करते ही रणधीर बाबू ने फटाफट तीन-चार पिक्स खिंच लिए.
फ़िर आँखों को नार्मल रखने को बोल कर फ़िर से तीन - चार पिक्स लिए --- यह सोच कर कि अगर किसी दिन थोड़ी ऊँच-नीच हो जाए तो वह प्रमाण के तौर पर यह दिखा सके कि उन्होंने वो पिक्स आशा के पूरे होशो हवास और उसकी सहमति से ही लिए थे.
उन पिक्स में कमाल की कामुक औरत लग रही थी आशा. मानो हरेक अंग-प्रत्यंग से, रोम रोम से कामुकता टपक रही हो. बिल्कुल किसी काम देवी की भाँति और स्वर्गीय आनंद क्या होता है और उसका अर्थ क्या होता है यह तो उसके ठीक सामने की ओर तने हुए बूब्स और डीप क्लीवेज बता ही रहे हैं रणधीर बाबू को.
रणधीर बाबू के शैतानी खोपड़ी में अब एक और बात खेल गई कि स्वर्ग तो सामने देख लिया पर यदि स्वर्गलाभ नहीं लिया तो फ़िर क्या किया. अभी तक इतना खेल खेलने का परिश्रम तो व्यर्थ ही चला जाएगा.
एक दीर्घ श्वास लेकर रणधीर बाबू ने एक निर्णय और लिया --- कुछ और बोल्ड करने का --- सुस्त गति से वो बाद में भी खेल सकता है --- फिलहाल वक़्त है इस खेल का लेवल बढ़ाने का.
खड़े लंड को वैसे ही पैंट की ज़िप से बाहर निकला रख, रणधीर बाबू अपने उस आरामदायक विशेष रेवोल्विंग चेयर से उठे और चार ही कदमों में आशा के निकट पहुँच गए.
आशा धौंकनी की तरह बढ़ी हुई दिल की धड़कन पर नियंत्रण का बेहद असफ़ल प्रयास करते हुए तिरछी निगाहों से अपने दाईं ओर बिल्कुल पास आ कर उसकी कुर्सी से सट कर खड़े हुए रणधीर बाबू की ओर देखी. उनकी बढ़ी हुई पेट से ऊपर का हिस्सा तो नहीं देख सकी पर नज़र एकदम से उनके पैंट की ज़िप से बाहर बिल्कुल काले रंग के लंड की ओर गई; जो किसी स्टार्ट की हुई खटारे इंजन वाले किसी खटारे टेम्पो की छत पर रखे बांस की तरह हिल रहा था.
अग्र भाग के चमड़ी के मध्य से हल्का सा दिख रहा हल्की गुलाबी रंग का लंडमुंड धीरे धीरे बिल से बाहर आता किसी खतरनाक सांप की भाँति सामने आ रहा था --- आशा ने देखा, लंड के अग्र भाग की थोड़ी सी चमड़ी धीरे-धीरे पीछे की ओर जा रही है और हल्की गुलाबी रंग का प्रतीत होता मशरूम-नुमा लंडमुंड अत्यधिक रक्त प्रवाह के कारण लाल रंग अख्तियार करता जा रहा है. मशरूम नुमा भाग के टॉप पर बना हुआ चीरा बिल्कुल आशा के चेहरे के बहुत पास है एवं पसीने और मूत्र की एक अजीब मिली-जुली गंध उसकी नाक में समा रही है.
एक पुरुष के यौननांग को अपने इतने समीप पाकर आशा तो एकदम से सकपका गई --- बेचारी बिल्कुल किंकर्तव्यविमूढ़ सी हो कर रह गई और जब यह बात ध्यान आई कि जिसका यौननांग उसके इतने पास खड़ा है; वह उससे कहीं, कहीं अधिक उम्र के व्यक्ति का है तो शर्म से दुहरा कर लाल हो गई. तुरंत ही अपने चेहरे को दूसरी तरफ़ घूमा कर बोली,
“स... सर... यह क्या....?”
“ओह कम ऑन आशा, डोंट बिहेव लाइक अ सिली गर्ल... यू आर अ मैरिड वुमन. तुम्हें तो अच्छे से पता है न, कि यह क्या है ??”
चेहरे पर ऐसे भाव लिए और ऐसे टोन में बोले रणधीर बाबू मानो, परीक्षा केंद्र में किसी छात्रा ने एक जाना हुआ क्वेश्चन का मतलब पूछ ली हो और इससे इन्विजिलेटर को बहुत अफ़सोस हुआ है...
“न..न.. नो सर... म.. मेरा मतलब... आप ये क्या...क्या क...कर रहे ....हैं...?”
अति घबराहट के कारण सूखते अपने होंठों पर जीभ फ़िरा कर भिगाने की कोशिश करती आशा ने किसी तरह अपना सवाल पूरा की.
“ओह... यू मीन दिस?!!” अपने तने लंड को देखते हुए आशा की ओर देख कर रणधीर बाबू अपने हल्के पीले-सफ़ेद दांतों की चमक बिखेरते हुए बोले,
“म्मम्म.... आशा.... अब ऐसे सवाल करने और इस तरह से दूसरी ओर मुँह घुमा लेने तो काम नहीं चलेगा?? अब इस बेचारे का ध्यान तो तुम्हें ही रखना है --- कम ऑन --- टर्न दिस साइड --- लुक एट इट ---- इट्स डाईंग फॉर योर लव एंड डिवाइन अटेंशन.”
आशा फिर भी नहीं मुड़ी. रणधीर बाबू ने दो - तीन बार अच्छे से, नर्म लहजे में आशा को मानाने की कोशिश की --- पर फिर भी जब आशा अपेक्षाकृत उत्तर नहीं दी तो रणधीर बाबू का स्वर एकाएक ही बहुत हार्श हो गया.
“आशा !! आई एम नॉट आस्किंग यू टू डू दिस… एम टेलिंग यू, एम ऑर्डरिंग यू टू डू दिस !!”
रणधीर बाबू की आवाज़ में इस बार एक अलग ही धमक थी.
आशा सहम कर तुरंत ही अपना चेहरा दाईं ओर की --- और ऐसा करते ही उसकी नजर सीधे रणधीर बाबू के फनफनाते लंड पर पड़ी.
रणधीर बाबू बोले,
“गिव सम लव, आशा.”
आशा आँखें उठा कर रणधीर बाबू की ओर देखी --- सुनहरे फ्रेम के ब्राउन ग्लास के अंदर से झाँकते रणधीर बाबू की आँखें एक खास तरह से सिकुड़ कर एक अलग मतलब बयाँ कर रही है.
आशा के अंदर की बची - खुची प्रतिरोधक क्षमता भी हवा में फुर्रर हो गई. किस्मत का खेल समझ कर अब मन ही मन खुद को तन-मन से पूरी तरह रणधीर बाबू को समर्पित कर उनका मिस्ट्रेस बनने का दृढ़ निश्चय कर अपना दाहिना हाथ उठाई और काले, सख्त तने हुए लंड को अपने नर्म हाथों की नर्म उँगलियों की गिरफ़्त में ली और बहुत ही हिचकिचाहट से; बहुत धीरे - धीरे अपना हाथ आगे पीछे करने लगी...
और ऐसा करते ही, रणधीर बाबू सुख और आनंद की चरम सीमा पर पहुँच गए. आखिर उनकी ड्रीमगर्ल (यहाँ शायद ड्रीमलेडी कहना उचित होगा) ने उनके हथियार को अपने नर्म हाथों के गिरफ़्त में जो ले ली है. लंड के चमड़े पर हथेली के नर्म स्पर्श का अहसास ही उन्हें वो सुख दे रहा है जो शायद किसी कॉल गर्ल की अनुभवी चूत ने भी नहीं दी होगी.
जारी है.....
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पहला काम.... 'अलग काम'
इधर आशा भी धीरे - धीरे आश्चर्य के सागर में गोते लगाने लगी --- क्योंकि आशा के हाथ के नर्म छूअन के बाद से ही रणधीर बाबू का लंड पल-प्रतिपल फूलता ही जा रहा है और मोटाई और चौड़ाई भी ऐसी बना रखी है जैसा की आज तक आशा ने केवल पोर्न मूवी क्लिप्स में ही देखी है. रोज़ रातों को मम्मी, पापा और नीर के सो जाने के बाद आशा अकेली तन्हा हो कर बिस्तर पर पड़े - पड़े ही मोबाइल पर पोर्न मूवी देखते हुए साड़ी को जाँघों तक उठा कर अपनी बीच वाली लंबी ऊँगली से चूत खुजाती और कलाकार ऊँगली की कलाकारी की मदद से ही पानी छोड़ते हुए सो जाती --- कुछेक बार ऐसा भी हुआ है की पानी छोड़ने के बाद मन में भारी पश्चाताप का बोध की है आशा ने पर एक मशहूर अभिनेता का डायलॉग --- ‘अपने को क्या है; अपने को तो बस पानी निकालना है!’ याद आते ही शर्म से लाल हो जाती और दोगुनी उत्तेजना से भर वो फिर से पानी निकालने के काम में लग जाती…
पर यहाँ बात यह है कि आजतक आशा ने जिस तरह के आकार वाले लंड देखी थी ; सब के सब मोबाइल के पोर्न मूवीज़ में --- उसने कभी यह कल्पना नहीं की होगी की वास्तविक जीवन में भी ऐसा औज़ार का होना सम्भव है !!
निःसंदेह नीर के पापा का भी हथियार का दर्शन की है वह पर इतने सालों में तो वह उसका चेहरा भी लगभग भूल चुकी है --- हथियार को याद रखना बाद की बात है और अगर हथियार याद नहीं है, तो इसका मतलब हथियार कुछ खास रहा भी नहीं होगा! (ऐसा वो कभी - कभी सोचती थी!!)
इधर लंड फुंफकार रहा था और उधर रणधीर बाबू दिल ही में ज़ोरों से आहें भर रहे थे. खड़े रणधीर बाबू ने जब नज़रें नीची कर कुर्सी पर बैठी आशा को उनका लंड हिलाते हुए देखने की कोशिश की तो पहली ही कोशिश में उनकी आँखें चौड़ी होती चली गई…. ऊपर से देखने पर आशा की पल्लू विहीन दूधिया चूचियों के बीच की घाटी अधिक लंबी और गहरी लग रही है और इतना आकर्षक लग रहा है कि एक बार के लिए तो रणधीर बाबू का दिल ही धड़कना बंद हो गया !! और तो और, उसकी ब्लाउज भी पीछे से, जोकि पीठ पर डीप ‘U’ कट लिए है, आधे से अधिक गोरी, चिकनी, बेदाग़ पीठ सामने दृश्यमान हो रही है. ब्लाउज भी कुछ ऐसी टाइट पहनी है जिससे उसकी पीठ की भी करीब तीन इंच की क्लीवेज बन गई है!
बुढ़ऊ हाथ बढ़ा कर आशा की दाईं चूची को थाम लिया और प्रेम से दबा कर उसकी नरमी का आंकलन करने लगा,
‘आह!’
सचमुच जितना सोचा था उससे भी कहीं अधिक नर्म हैं इसकी चूचियाँ….
‘उफ्फ्फ, साली पूरा ध्यान रखती है अपना!’ मन ही मन तारीफ किया ठरकी ने.
इधर अचानक हुई इस क्रिया (रणधीर बाबू द्वारा उसकी चूची दबाया जाना) से आशा हड़बड़ा गई. पर जल्दी संभल भी गई --- पहले दिन के पहले ही प्रोजेक्ट में रणधीर बाबू को निराश या नाराज़ नहीं करना चाहती.
अतः चुपचाप मुठ मारने के कार्य में फोकस बनाए रखी.
इधर चूचियों की नरमी ने मन के लालच को बहुत बढ़ा दिया. ब्लाउज के ऊपर से करीब 5 मिनट तक दबाने के बाद रणधीर बाबू उन दोनों चूचियों को ब्लाउज और ब्रा के नापाक कैद से आज़ाद कर, उन्हें नंगा कर अपने हाथों में ले कर उनके स्पर्श का आनंद ले पूर्ण रूप से तृप्त होना चाहते थे पर पहले ही दिन एक साथ इतने सारे काण्ड करने का कोई इरादा नहीं है उनका....
आखिर इस खेल के पुराने खिलाड़ी जो ठहरे....!
जानते हैं नारी - हृदय की आकुलता को,
उनकी व्यग्रता और बदलते मनोभावों को,
उनके छटपटाहट के सही समय को....
इसलिए बिना किसी तरह की कोई जल्दबाज़ी किए वह उन गदराई चूचियों को अपनी सख्त मुट्ठी में भींचने में ही लगे रहे....
उनकी पारखी उँगलियाँ, जल्द ही आशा को बिना कोई खास तकलीफ़ दिए, यहाँ तक की उसे पता लगने दिए बिना ही --- उसके ब्लाउज के अगले दो हुक को खोल दिए! अभी भी दो और हुक शेष थे, पर उन्हें रहने दिया --- ब्लाउज के खुले दोनों सिरों/ पल्लों को थोड़ा और फैलाया. अब करीब सत्तर प्रतिशत चूची नंगी हो गई --- बाकी अभी अंदर मौजूद एक क्रीम कलर के ब्रा में कैद हैं.
कसे हुए ब्रा कप के कारण ऊपर उठकर पहले से फूली हुई चूचियाँ अभी और अधिक फूली हुई लग रही हैं.... ये देख कर रणधीर बाबू का होश मैराथन के लिए भाग गया. दूधिया चूचियों को क्रीम कलर के ब्रा में देख मन ही मन हद से अधिक खुश होते रणधीर बाबू ये सपने देखने लगे कि गोरी आशा की गोरी चूचियाँ काले, लाल और गुलाबी ब्रा में कैसे लगेंगे??!
ब्लाउज के ऊपर से ही एक - एक कर दोनों चूचियों के नीचे हाथ रख कर बारी - बारी से तीन - चार बार इस तरह उठा कर देखा मानो दोनों चूचियों का वज़न माप माप रहे हों.
पहले तो आशा बहुत बुरी तरह से शरमाई; पर जब रणधीर बाबू को उसके चूचियों के वज़न देखते हुए एक कामाग्नि भरी ‘ऊफ्फ्फ़...ओह्ह्ह..... लवली ...’ कहते सुनी तो गर्व से वह दुगुनी हो गई.
और वाकई रणधीर बाबू उसके दोनों चूची के भार को देख जितना आश्चर्यचकित हुए, उससे कहीं ज़्यादा ख़ुशी से बल्लियों उछलने लगे अंदर ही अंदर --- ये सोच - सोच कर कि आने वाले दिनों में इन्हीं नर्म अंगों पर आरामदायक; सुकून भरे पल बीतने वाले हैं!
इधर आशा,
पता नहीं क्यूँ, अपने से पच्चीस - तीस साल बड़े --- एक बुज़ुर्ग आदमी के लंड को हिलाने तो क्या; छूने तक घृणा कर रही थी --- वही अब उसी आदमी के द्वारा उसके बूब्स मसले जाने पर उसे एक अलग ही ख़ुशी, आनंद मिलने लगी --- एक एडवेंचर सा फ़ील होने लगा उसे.
जारी है....
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क्षमा करें, पाठकगण. अत्यधिक अस्वस्थता के कारण एक भूल हो गई थी कल. 'साक्षात्कार' वाले अपडेट के बाद का अगला अपडेट आज पोस्ट किया, 'निर्देश पालन' नाम से. 'पहला काम, अलग काम' इसके बाद का अपडेट है जिसे आज दोबारा पोस्ट किया.
I'm very sorry.
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तभी में सोचूं के बुढ़ाऊ पेंट का जिप खोले लंड निकले अपने सीट पे बैठा था अचानक वो आशा के पास कैसे खड़ा हो गया।
खैर कोई बात जल्दबाजी में अक्सर नहीं ऐसा हो जाता है,,,, वैसे धन्यवाद मिसिंग चैप्टर(निर्देश पालन) को पोस्ट करने के लिए
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Lovely update
Asha karta hun, Mrs. asha aur Mr. Randhir ki bich jabardast hot chemistry dekhne ko milega.
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story is super hot dear,update next with some pics to make it more interesting
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25-03-2026, 11:12 PM
(This post was last modified: 25-03-2026, 11:14 PM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
‘पास’ हो गई!
हिलाते - हिलाते बहुत देर हो गई --- लंड अब और भी ज़्यादा अकड़ गया --- हिलाते समय आशा की हाथों की चूड़ियों से आती ‘छन छन’ की आवाज़ माहौल को और भी गरम करने लगी. वीर्य की धार कभी भी फूट सकती है और रणधीर बाबू अपना कीमती वीर्य बूंदों को यूँ ही वेस्ट नहीं जाने देना चाहते इसलिए उन्होंने एक हल्के थप्पड़ से अपने लंड पर से आशा का हाथ हटाया और आगे हो कर उसके होंठों से अपने लंड का छूअन कर दिया. आशा भीषण रूप से बिदकी, कसमसाई, कातर दृष्टि से रणधीर बाबू की ओर देखी पर बुढ़ऊ अपना सारा होश बहुत पहले ही अपने लंड के सुपाड़े में डाल चुका था. इसलिए सोचने - समझने का काम फिलहाल उन्होंने अपने लंड पर छोड़ रखा था और लंड आशा के मुँह में घुसने के लिए बुरी तरह से तत्पर था.
आशा नर्वस हो कर ज़रा मुस्कुराई और ऐसा दिखाने की कोशिश की कि;
उसे भी अब थोड़ा - थोड़ा इस खेल में मज़ा आ रहा है....
..... और पूरे मन से रणधीर बाबू का मुठ मारने में खुद को व्यस्त दिखाने का भी भरपूर प्रयास की.
पर रणधीर बाबू इतने में खुश होने वालों में से नहीं....
आशा के हाथ में एक और थप्पड़ मारते हुए थोड़ी कड़क आवाज़ में कहा,
“एनफ विथ द हैंड्स, स्लट..!”
और इतना कहते हुए एक झटके में जोर का प्रेशर देते हुए आशा के मुँह में लंड का प्रवेश कर दिया!
“आह..अह्हह्म्मप्प्फ्ह....”
इतनी ही आवाज़ निकली आशा की...
कुछ सेकंड लंड को वैसे ही रहने दिया मुँह में;
थोड़ा सा निकाला,
फ़िर एक और तगड़ा झटका देते हुए लंड को आधे से ज़्यादा उतार दिया उस बेचारी एक बच्चे की माँ के गले में...
मारे दर्द के आशा तड़प उठी --- साँस लेना तो दूर; उतने मोटे तगड़े लंड को मुँह में रखने के लिए होंठों को ज़्यादा फ़ैला भी नहीं पा रही बेचारी --- और इधर रणधीर बाबू हवस में अँधा होकर तेज़ और ताकतवर झटके देने लगे किस्मत की मारी आशा के मुँह में. बुढ़ऊ की शक्ल ओ सूरत बता रही थी कि आज इस रांड के हल्की, गुलाबी-गोरे मुखरे को बेरहमी से चोद डालना चाहते हैं.
“आःह्हह्ह्ह्ह.... ऊम्म्म्हह आप्फ्ह्हह्हह्म्म्म.....”
जबकि रणधीर बाबू मस्ती में डूबे ज़ोरों से आहें भर रहे थे,
“ओह्ह्ह्हsssss --- आह्ह्हssssssssss.... यssसsss आsssशाsssss --- ओह्ह्हssss यसsssssss --- टेssक ssइटssss --- टेक इट ssss डीपssss --- मोर --- मोर --- इनसाइडsss यूsssss --- ओह्ह्ह फ़कssssss….!!”
इधर आशा,
“आह्ह्हह्म्म्मप्फ्हssssss आह्ह्हह्म्म्मप्प्फ्हह्ह्हsssssssss... गूंss गूंsss गूंsss गूंsss गूंsssss गूंssss ह्ह्ह्हह्हsss ह्ह्ह्हह गोंss गोंss गोंss गोंsss गोंsss म्म्फ्हह्हss म्म्म्मप्प्फ्हह्हssss” …..
…….. के मुँह के किनारों से लार टपकने लगा --- टपकने क्या, समझिए बहने लगा.
रणधीर बाबू चूचियों को मसलना छोड़ कर आशा के सिर के पीछे हाथ रख अपनी तरफ़ धकेलते और ठीक उसी समय, अपने कमर को जोर से आगे की ओर झटकते --- इस तरह बेचारी आशा बचने के लिए अपना मुँह हटाती भी तो कैसे??
“आह्ह्हह्म्म्मप्फ्हssss आह्ह्हह्म्म्मssssप्प्फ्हह्ह्हsss ... गूंsss गूंsss गूंssss गूंssss गूंssss गूंsss ह्ह्ह्हह्हsssss”
“आह्ह्हह्म्म्मप्फ्हssss आह्ह्हह्म्म्मप्प्फ्हह्ह्ह.ssss.. गोंss गोंss गोंsss गोंsss गोंsssss ........ म्म्फ्हह्हssss म्म्म्मप्प्फ्हह्हssssssssss”
“आह्ह्हह्म्म्मप्फ्ह गूं गूं गूंssssssss गूं गूं गूं ह्ह्ह्हह्हssssss ह्ह्ह्हहsssss ...... आह्ह्हssssssह्म्म्मप्प्फ्हह्ह्हssssssssssss ....... गोंsss गों ss गोंssss गोंsss गों sssss …. म्म्फ्हह्ह म्म्म्मप्प्फ्हह्हssssss”
इसी तरह घपाघप आशा के मुँह को करीब पंद्रह मिनट तक चोदते-चोदते आख़िरकार ठरकी बुड्ढा अपने क्लाइमेक्स पर पहुँच ही गया!
‘फ़फ़’ से ढेर सारा वीर्य उगला उनके औज़ार ने. आशा का मुँह पूरा भर गया --- रत्ती भर की भी जगह न बची. बुढ़ऊ ने इतना वीर्य निकाला कि थोड़ा सा निगल लेने के सिवा और कोई चारा न था और बाकी तो आशा के कुछ भी सोचने-समझने से पहले ही गले के नीचे उतर गया. नमकीन स्वाद ने आशा के मुँह का जायका पूरी तरह से बिगाड़ दिया. उससे अधिक उम्र के एक खूंसट ठरकी बुड्ढे का काला गन्दा लंड को मुँह में लेना और फ़िर उसका वीर्यपान करना --- इस अनुभव ने कड़वाहट से भर दिया उसे – बचे वीर्य को उगलने का प्रयास करते हुए खाँसने लगी --- हरेक कतरे को निकाल बाहर करना चाहती थी.
इधर बुड्ढे ने दो-तीन सफ़ेद कागज़ उसकी ओर बढ़ा कर साफ़ कर लेने को बोला --- साथ ही अपना वाशरूम भी दिखाया --- आशा दौड़ कर अंदर घुस गई और रणधीर बाबू बड़े प्रेम से एक अखबार के पन्ने से अपने लंड को पोंछते हुए अपनी कुर्सी पर बैठ गए... अंदर ही अंदर अपनी पहली सफलता पर बेहद प्रसन्न मन से मुस्कुराने लगे.
करीब दस मिनट बाद आशा निकली --- कपड़े सही कर ली थी उसने. बाल जो कि रणधीर बाबू के उसके सिर को पकड़ने के वजह से अस्त-व्यस्त हो गए थे; उन्हें भी ठीक कर ली थी. वाशरूम से सीधे निकलकर मेज के सामने कुर्सी पर बैठ गई.
“आशा, दैट वाज़ औसम !! .... आई लव्ड एव्री सेकंड ऑफ़ इट --- थैंक्स!” बुढ़ऊ पूरे बेशर्मी के साथ आशा के चेहरे पर नज़रें टिकाए रखा.
आशा कुछ नहीं बोली, चुपचाप बैठी रही.... नज़रें नीचे किए.
रणधीर बाबू भी उसके जवाब का इंतज़ार किए बिना बोले,
“एक और बात, अच्छे से सुनो, समझो, और दिमाग में बैठा लो --- आज के बाद , हर दिन, कॉलेज बिना ब्रा पहन के आया करोगी --- ओके? और हाँ, कल ही अपने बेटे का फॉर्म और ज़रूरी डाक्यूमेंट्स लेती आना और अगर ले आई हो तो यहीं रख दो, मैं बाद में देख लूँगा. कल से तुम्हारी जॉइनिंग पक्का.”
“और बेटे का एडमिशन?”
“परसों से… कॉलेज ले आना.”
यह सुनते ही आशा को अपने कानों पर यकीं नहीं हुआ --- आश्चर्य से रणधीर बाबू की ओर देखी --- उनके चेहरे पर एक सहमति वाली मुस्कान देख कर उसकी आँखें छलक आईं...
रुंधे स्वर में बोली,
“थैंक्यू सो मच सर.”
रणधीर बाबू होंठों पर एक कमीनी मुस्कान लिए बोले,
“ओके, ओके... एनफ ऑफ़ थैंक्स --- यू मे गो नाओ. पर जाने से पहले एक छोटा सा काम और करो.”
आशा सवालिया नज़रों से उनकी ओर देखी....
“अभी जो ब्रा पहनी हुई हो उसे खोलकर यहाँ रख जाओ!”
आशा जल्दी से वाशरूम में घुस गई. रणधीर बाबू का फ़िर कोई नया आदेश न आ जाए यह सोच कर जल्दी से ब्रा उतर कर; कपड़ों को ठीक कर के बाहर निकली. उसे बाहर निकलते देखते ही रणधीर बाबू ने अपना बाँया हाथ आगे बढ़ा दिया --- आशा ने इशारा समझ कर ब्रा उनकी हथेली पर रख दी और फिर बिना बुढ़ऊ की ओर देखे अपना बैग उठाई और जाने लगी --- दरवाज़े तक पहुँची ही थी कि रणधीर बाबू की आवाज़ आई,
“एक और बात.... आज तुम्हारा फर्स्ट टाइम था क्या --- आई मीन टेकिंग माय थिंग इनटू योर माउथ?!” बड़ी बेशर्मी से सवाल दागा बुड्डे ने.
आशा पीछे देखे बिना बोली,
“यस सर!”
इतना बोलकर तेज़ी से दरवाज़ा खोलकर चली गई.
इधर रणधीर बाबू हैरान --- साफ़ सुनकर भी यकीन नहीं हो रहा --- मानो उनका दिमाग यकीन करना ही नहीं चाह रहा.
आखिर एक शादीशुदा, उच्च घर की, संस्कारी, सुशिक्षित महिला का वर्जिन मुँह चोदा है उन्होंने आज --- न जानते हुए ही सही --- पर चोदा तो ---- और एक तरह से देखा जाए तो उन्होंने आज एक ऐसी ही महिला को अपना लंड चूसा कर उसके शर्म – ओ – ह्या, हिचक, झिझक, बेबसी और ऐसे ही बहुत सी बाधाओं का बाँध तोड़ दिया! जो आगे जाकर बहुत काम आने वाला है.
“आह्ह्ह!!”
एक आह निकली रणधीर बाबू के मुँह से और हाथ में पकड़े आशा की मुलायम क्रीम कलर की ब्रा को पागलों की तरह नाक और मुँह से लगा कर उसका गंध सूँघने और चूमने लगे.
जारी रहेगा.....
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Asha abhi inexperience hai, par with time experience ho jayegi nahi to randhir to sikha hi dega...
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रणधीर बाबू से ऐसी हरक़त की उम्मीद नहीं थी,,,इतना भी क्या डेस्परेट,,,आशा तो खुद ही सरेंडर करली है यहां तक कि हैंड रिटन भी दिया की वह सारी शर्त मान रही है...फिर आशा पे ऐसे झपट पड़े, जैसे उसकी माउथ फ़क करने लगे,,,जैसे दुबारा मौका नहीं मिलेगा।
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01-04-2026, 10:33 PM
(This post was last modified: 02-04-2026, 08:10 PM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
रणधीर बाबू की करतूतें और एक प्रतिद्वंदी का उदय!
करीब १०-१२ दिन बीत गए हैं.
पिछली घटना को हुए.....
आशा की नौकरी लग गई है कॉलेज में --- नॉन टीचिंग स्टाफ कम रिजर्व्ड टीचर के रूप में --- कभी कोई टीचर नहीं आ पाए तो उसके जगह आशा क्लास ले लेती. हालाँकि रणधीर बाबू के पास आप्शन तो था, आशा को नर्सरी या जूनियर क्लासेज में टीचर नियुक्त करने का पर इससे होता यह कि वह आशा को हर वक़्त अपने पास नहीं पाता. नॉन टीचिंग स्टाफ बनाने से वह जब चाहे आशा को अपने कमरे में बुला सकता है और जो जी में आए कर सकता है. आशा तो वैसे भी पहले ही सरेंडर कर चुकी है --- मौखिक और लिखित --- दोनों रूपों में; --- इसलिए उसकी ओर से रणधीर बाबू को रत्ती भर की चिंता नहीं थी और आशा के अलावा जितनी भी लेडी टीचर्स हैं कॉलेज में; उन सबको रणधीर बाबू बहुत अच्छे से महीनों और सालों तक भोग चुके हैं! रणधीर बाबू के कॉलेज में काम करना अपने आप में एक गर्व की बात है जो हर किसी के भाग्य में नहीं होता. इसके अलावा भी, रणधीर बाबू उन सबको समय - समय पर इन्क्रीमेंट, हॉलीडेज, और दूसरे सुविधाएँ देते रहते हैं.
इसलिए, कोई भी बात चाहे कितनी भी गंभीर क्यों न हो, इतनी सुविधाओं वाले कॉलेज को छोड़कर जाना किसी से बनता नहीं था. साथ ही, रणधीर बाबू जैसे व्यक्ति का हाथ सिर पर होने से, दैनिक जीवन में भी किसी को अधिकांश समय कभी किसी चीज़ / बात पर झँझट नहीं होती थी.
शहर के पुरुष शिक्षकों के बीच रणधीर बाबू का अच्छा-खासा रसूख है, जिसका मुख्य कारण उनका मज़बूत नेटवर्क है. स्थानीय गुंडों से लेकर ऊँचे रसूख वाले मंत्रियों, सिक्युरिटी अधिकारियों और नामी वकीलों के साथ उनका उठना-बैठना जगज़ाहिर है. समाज में उनकी छवि एक बेहद प्रभावशाली और संपन्न व्यवसायी की है, लेकिन पर्दे के पीछे उन्हें एक ऐसे ज़िद्दी और रईस इंसान के रूप में जाना जाता है जो अपने हित साधने के लिए किसी भी हद तक जाने का माद्दा रखते हैं.
खुद को हरेक दिशा, हरेक कोण से पूरी तरह सुरक्षित कर रखे हैं ये रणधीर बाबू….
आम इंसान जिस कानून से डरता है,
रणधीर बाबू का उसी के साथ उठना बैठना है!
जो उसका (रणधीर बाबू) साथ दिया --- उसका वारा न्यारा!
और विरोधियों का हाल ऐसा था कि उनके मन में विरोध का विचार आने से पहले ही रणधीर बाबू की पहुँच और ताकत का एहसास उन्हें चुप करा देता था. अगर किसी ने भूल से कदम उठा लिया, तो उसकी आवाज़ और वजूद दोनों को इस तरह ख़त्म कर दिया जाता था कि वह हमेशा के लिए एक मिसाल बन जाए.
लेकिन उनका व्यक्तित्व सिर्फ़ खौफ़ तक सीमित नहीं था। रणधीर बाबू अपने वफादारों के लिए एक अभेद्य ढाल थे. उनके खास लोगों को कभी निराशा नहीं मिलती थी— चाहे मामला किसी बड़े अस्पताल का ख़र्चा उठाने का हो, नौकरी दिलवाने का, कहीं एडमिशन करवाने का, या फिर तत्काल नगद (कैश) सहायता का.
वह जानते थे कि वफ़ादारी कीमत माँगती है, और वह उस कीमत को खुले हाथ से चुकाते थे. अगर किसी शागिर्द ने किसी ज़रूरी काम के लिए एक लाख रुपए की माँग की, तो रणधीर बाबू बिना किसी सवाल के उसे दो लाख थमा देते थे— ऐसी दरियादिली जिसमें हिसाब-किताब की गुंजाइश नहीं होती थी. उनके किसी भी ख़ास आदमी के परिवार पर अगर कोई संकट आता, जैसे कि अस्पताल का बिल, तो रणधीर बाबू को पता चलते ही वह डॉक्टर के बिल से लेकर दवाईयों के बिल तक चुपचाप चुका देते थे, ताकि उनके 'अपने' लोग हमेशा उन पर पूरी तरह निर्भर रहें.
रणधीर बाबू को आलीशान पार्टियों का बड़ा शौक है.
अक्सर उनके यहाँ महफ़िलें सजती रहती हैं—और ये कोई आम पार्टियाँ नहीं होतीं, बल्कि शहर के रसूखदारों का जमावड़ा होती हैं.
इन महफ़िलों में कानून के रक्षक हों या सत्ता के गलियारों में बैठने वाले मंत्री और नेता, हर कोई अपनी हाजिरी लगाना अपना सौभाग्य समझता है.
वहाँ शराब, शबाब, संगीत और लजीज पकवानों का दौर बेखौफ चलता है.
इन सब आयोजनों का खर्च जब रणधीर बाबू की जेब से निकलता है, तो वह आँकड़ा हजारों में नहीं होता.
खर्च लाखों में पहुँच जाता है, जिसे रणधीर बाबू बड़े इत्मीनान और शान से चुकाते हैं.
अब जिस शख्स के हाथ शासन और प्रशासन की नब्ज पर हों, उसे भला किसका और किस बात का डर होगा?
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इन्हीं दस - बारह दिनों में कई बार छू चुके हैं आशा को रणधीर बाबू --- और जाहिर ही है की केवल छूने तक खुद को सीमित नहीं रखा है उन्होंने --- अपने रूम में बुला कर बेरहमी से चूचियों को मसलना, देर तक निप्पल को चूसना, नर्म, फ्लेवर वाले लिपस्टिक लगे होंठों को चूसते रहना --- टेबल के नीचे घुटनों के बल बैठा कर लंड चुसवाना.... ये सब करवाए – किए बिना तो जैसे रणधीर बाबू को न दिन में चैन मिलता और न ही रातों को नींद आती.
हद तो तब होती जब रणधीर बाबू घंटों आशा को अपनी गोद में बैठाए, मेज़ पर रखे ज़रूरी फाइल्स के काम निपटाते और बीच – बीच में दूसरे हाथ से ब्लाउज़ के सारे हुक खोल कर उसके नर्म, गदराये, बड़ी - बड़ी चूचियों को पल्लू के नीचे से दम भर दबाते रहते.
'उनका मानना था कि इससे उनको अपना स्ट्रेस कम करने में मदद मिलती है.'
और अगर इतने में कोई लेडी स्टाफ़ / लेडी टीचर किसी काम से कमरे में आने के लिए बाहर से नॉक करती तो आशा को बिना गोद से उतारे ही स्टाफ़/टीचर को अंदर आने की परमिशन देते और उनके सामने भी आशा की चूचियों के साथ - साथ जिस्म के दूसरे हिस्सों से खेलते रहते.
बेचारी लेडी स्टाफ़ मारे शर्म के कुछ कह नहीं पाती और…..
यही हालत आशा की भी होती.
शर्म – ओ – ह्या से उसका चेहरा लाल होना और हल्के दर्द में एक तेज़; लेकिन धीमी सिसकारी लेना हवसी बुढ़ऊ को बहुत अच्छा लगता है और यही कारण है कि जब आशा को गोद में, बाएँ जांघ पर बैठा कर बाएँ हाथ से --- पल्लू के नीचे से --- बाईं चूची के साथ खेलते हुए मेज़ पर रखी फ़ाइलों पर दस्तख़त या कुछ और कर रहे होते और अगर तभी कोई लेडी स्टाफ़ आ जाए रूम में तो उसके सामने आ कर खड़े या बैठते ही बुढ़ऊ अपनी
बाएँ हाथ की तर्जनी अंगुली और अँगूठे को अपनी थूक से थोड़ा भिगोते और दोबारा पल्लू के नीचे ले जाकर उसकी बायीं चूची के निप्पल को ट्रेस करते और निप्पल हाथ में आते ही अंगुली और अंगूठे से उसे पकड़ कर ज़ोर से मसलते हुए आगे की ओर खींचते ---
और हर बार ऐसा करते ही,
आशा भी दर्द के मारे ज़ोर से कराह उठती….
शुरू - शुरू में तो लेडी स्टाफ़ चौंक जाती कि ‘अरे, क्या हुआ?!’
पर मामला समझ में आते ही शर्म वाली हँसी रोकने के असफ़ल प्रयास में बगलें झाँकने लगती….
पर धीरे - धीरे ये आम बात हो गई….
रोज़ ही कोई न कोई लेडी स्टाफ़ रूम में आती,
रोज़ ही आशा, रणधीर बाबू की गोद में बैठी हुई पाई जाती,
और रोज़ ही लेडी स्टाफ़ के सामने ही,
रणधीर बाबू, तर्जनी ऊँगली और अंगूठे पर थूक लगाते ---
और,
फिर, उसी ऊँगली और अंगूठे के बीच दबा कर निप्पल को मसलते हुए आगे की ओर खींचने लगते,
और;
हमेशा की ही तरह, हर बार आशा दर्द से एक मीठी आर्तनाद कर उठती !
और फ़िर,
दोनों ही --- लेडी स्टाफ़ --- जो कोई भी हो --- वो और आशा मारे शर्म के एक दूसरे से आँखें मिलाने से तब तक बचने की कोशिश करती जब तक वो लेडी स्टाफ़ वहीं पास किसी कुर्सी पे बैठ कर अपने काम खत्म कर रही होती.
उसके जाते ही आशा थोड़ा गुस्सा और थोड़ी शिकायत के मिले - जुले भाव चेहरे पे लिए रणधीर बाबू की ओर देखती और रणधीर बाबू एक गन्दी हँसी हँसते हुए उसकी चूचियों से खेलते हुए उसके चेहरे और होंठों को चूमने – चूसने लगते और कभी बहुत मूड में आ गए तो डीप बैक से झाँकती उसकी पीठ पर काट देते!
धीरे - धीरे कुछ लेडी टीचर को यह बात खटकने लगी की हालाँकि रणधीर बाबू ने उन लोगों के साथ भी काफ़ी मौज किये हैं; पर आख़िर ये आशा नाम की बला में ऐसी क्या ख़ास बात है जो रणधीर बाबू हमेशा --- सुबह – शाम उसके साथ चिपके रहते हैं.
उसकी खूबसूरती में तो खैर कोई शक था ही नहीं,
ऊपर से सलीके से ढला हुआ उसका व्यक्तित्व किसी को भी सम्मोहित कर ले…
यही वो आकर्षण था जो रणधीर बाबू जैसे रसूखदार आदमी को भी कमजोर कर सकता था—वही रणधीर, जो अब तक लोगों पर हुकूमत करना जानते थे, आज खुद किसी के वशीभूत होने की कगार पर थे.
आखिर जो शख्स दूसरों को अपनी उंगलियों पर नचाने का माहिर हो, वह इस एक औरत के पीछे अपना वजूद भुलाए क्यों फिर रहा था?
निश्चित ही इसके पीछे कोई गहरा राज था—पर वह था क्या?
वहाँ मौजूद महिला अध्यापिकाओं के लिए यह पहेली सुलझाना नामुमकिन था. रणधीर बाबू, जो अब तक हर सुंदर चेहरे को बस एक जीत की तरह देखते आए थे, पहली बार आशा के व्यक्तित्व के सामने हार मान चुके थे. ऐसा लगता था जैसे उस एक के लिए उन्होंने अपनी पूरी दुनिया दांव पर लगा दी हो.
आशा के कॉलेज ज्वाइन करने के बाद से ही शायद ही रणधीर बाबू ने किसी और औरत के बारे में शायद ही सोचा होगा --- ये और बात है कि रणधीर बाबू के द्वारा कॉलेज के गैलरी या लॉबी में चलते वक़्त कोई लेडी टीचर मिल जाए तो उसके होंठों पर किस करना --- या बूब्स मसल देना या फ़िर पिछवाड़े पर ‘ठास !’ से एक थप्पड़ रसीद देना; ये सब बहुत कॉमन था और चलता ही रहता था और आगे भी न जाने कितने ही दिनों तक चलता रहेगा.
उन्हीं टीचर में एक है मिसेस शालिनी --- कॉलेज में बहुत पहले से टीचर पोस्ट पर पोस्टेड है, पर उम्र में आशा से छोटी है --- चौंतीस साल की --- चूचियाँ उसकी आशा जैसी तो नहीं पर फिर भी अच्छी है.--- गोल पिछवाड़ा --- आशा के तुलना में पतली कमर --- उसके जैसी दूध सी गोरी भी नहीं पर रंग फ़िर भी साफ़ है --- दोनों गालों पर दो-तीन पिम्पल्स हैं --- अधिकांश वो सलवार कुर्ती ही पहनती है --- कुछ ख़ास मौकों पर ही साड़ी पहनना होता है उसका.
शालिनी को यह बात खटक रही थी कि रणधीर बाबू का ध्यान अब उससे हटकर कहीं और जा रहा था, जबकि अब तक वह उनकी ख़ास हुआ करती थी.
उस रंगीन मिज़ाज बुड्ढे से उसे किसी तरह के प्रेम की कोई उम्मीद नहीं थी, न ही कभी रखी थी.
पर जाने क्यों, रणधीर बाबू की यह बेरुखी उसे भीतर से बेचैन कर गई थी। यह किसी और के लिए नहीं, बल्कि अपनी अहमियत के कम होने का डर था.
आशा से उसे कोई लेना-देना नहीं था, पर अगर रणधीर बाबू का ध्यान हमेशा के लिए आशा पर टिक गया, तो शालिनी का क्या होगा?
उसने तुरंत फैसला किया: वह धीरे-धीरे आशा के करीब आएगी, उसके कमज़ोर रगों को तलाशेगी और उन्हें मोहरे की तरह इस्तेमाल करेगी.
उसका लक्ष्य साफ़ था—या तो आशा को कॉलेज से हटाकर किनारे लगा दे, या फिर किसी भी कीमत पर रणधीर बाबू के दिल-ओ-दिमाग में अपनी जगह वापस बना ले.
जारी है.....
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अपडेट के लिए धन्यवाद। आशा की क्या सही इस्तेमाल कर रहे हैं रणधीर बाबू अपना स्ट्रेस कम करने के लिए... ![[Image: 18007456.webp]](https://i.postimg.cc/x8mSxNhr/18007456.webp) स्पॉन्ज बॉल में वोह बात कहां... जो मजा आशा के बड़े स्तन में है... वैसे रणधीर बाबू ने अपने skool के किसी लेडी स्टाफ को नहीं छोड़ा है सबका भरपूर मज़ा उठाया है,,,ऐसे में अगर कोई रणधीर बाबू का सारा ध्यान अपनी और खींचेगी तो मिसेज शालिनी को तकलीफ तो होगी ही,,, जबकि अब आशा की प्रतिद्वंद्वी शालिनी होने वाली है,,,अब कहानी में रोमांच और बढ़ेगी।।।।
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(02-04-2026, 09:47 AM)Blackdick11 Wrote: Beautiful update...
(02-04-2026, 02:40 PM)Bakchod Londa Wrote: अपडेट के लिए धन्यवाद। आशा की क्या सही इस्तेमाल कर रहे हैं रणधीर बाबू अपना स्ट्रेस कम करने के लिए... स्पॉन्ज बॉल में वोह बात कहां... जो मजा आशा के बड़े स्तन में है... वैसे रणधीर बाबू ने अपने skool के किसी लेडी स्टाफ को नहीं छोड़ा है सबका भरपूर मज़ा उठाया है,,,ऐसे में अगर कोई रणधीर बाबू का सारा ध्यान अपनी और खींचेगी तो मिसेज शालिनी को तकलीफ तो होगी ही,,, जबकि अब आशा की प्रतिद्वंद्वी शालिनी होने वाली है,,,अब कहानी में रोमांच और बढ़ेगी।।।।
धैर्य बनाएँ रखने के लिए आप दोनों का धन्यवाद.
अपडेट देने में थोड़ा लेट हो गया...
अभी तबियत में तुलनात्मक सुधार है; इसलिए अगला अपडेट जल्द देने का प्रयास करूँगा.
साथ में बने रहें.
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(02-04-2026, 02:40 PM)Bakchod Londa Wrote: अपडेट के लिए धन्यवाद। आशा की क्या सही इस्तेमाल कर रहे हैं रणधीर बाबू अपना स्ट्रेस कम करने के लिए... स्पॉन्ज बॉल में वोह बात कहां... जो मजा आशा के बड़े स्तन में है... वैसे रणधीर बाबू ने अपने skool के किसी लेडी स्टाफ को नहीं छोड़ा है सबका भरपूर मज़ा उठाया है,,,ऐसे में अगर कोई रणधीर बाबू का सारा ध्यान अपनी और खींचेगी तो मिसेज शालिनी को तकलीफ तो होगी ही,,, जबकि अब आशा की प्रतिद्वंद्वी शालिनी होने वाली है,,,अब कहानी में रोमांच और बढ़ेगी।।।।
हा हा हा ...!!
बिल्कुल ऐसे ही दाबते हैं रणधीर बाबू
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(02-04-2026, 08:09 PM)Sanjay Sen Wrote: nice going 
धन्यवाद.
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bahut sahi!
ab jab kahani m asha ki rival shalini h,,,toh fir ho jaya dono ke bich m tagda compition ,,,k kaun h/banegi randhir babu ka "Favourite Mistress"
maja aayega dono ko randhir babu ka attention k liye ladte dekh...par halaki abhi randhir ka sara dhyan asha pe hai... game ek tarfa na ho jaye...
let's see shalini kya karti h randhir babu ka dhyan kheech ne k liye...
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