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Misc. Erotica एक रंडी की दास्तान
#1
गुड़गांव के चिपचिपी गर्मी में, दोपहर के तीन बज रहे थे। वाटिका रियल एस्टेट के वातानुकूलित दफ्तर में भी चैताली घोष के माथे पर पसीने की बारीक बूंदें चमक रही थीं। चालीस पार की इस महिला का शरीर उम्र के साथ ढीला पड़ गया था, खास तौर पर उसकी मम्मे , जो ब्लाउज के नीचे भी अपनी बड़ी, ढीली गांठों को छिपा नहीं पा रही थी। एक संदूक जैसी मेज़ के पीछे बैठी, वह अपने मोटे-मोटे नाखूनों से कीबोर्ड पर थपथपा रही थी, आंखों में एक खालीपन था, जो अक्सर उन चेहरों पर दिखता है जो रोज़मर्रा की नीरसता में खो जाते हैं।
 
आज का दिन भी बाकी दिनों जैसा ही था। फोन की घंटी बजती,वह बेमन से उठाती, 'वाटिका रियल एस्टेट में आपका स्वागत है, मैं चैताली घोष बोल रही हूं,' उसकी आवाज़ में एक बनावटी मिठास होती। फिर ग्राहक को सेल्स टीम से जोड़ देती। यह उसकी दिनचर्या थी। लेकिन शाम ढलते ही, यह दिनचर्या एक अलग ही रंग ले लेती।
 
घड़ी की सुई पांच पर पहुंची। चैताली ने अपने कंप्यूटर को शटडाउन किया, एक लंबी सांस ली। यह सांस सिर्फ थकान की नहीं थी, बल्कि एक उम्मीद की भी थी। उसने अपने पर्स से एक छोटा सा कॉम्पैक्ट निकाला, अपनी मोटी उंगलियों से चेहरे पर लगे पाउडर को ठीक किया। उसकी बड़ी आंखें शीशे में खुद को देखती रहीं। वह जानती थी कि वह सुंदर नहीं थी, कभी नहीं थी। लेकिन आज रात, उसे सुंदरता की नहीं, कुछ और चीज़ की ज़रूरत थी।
 
दफ्तर से बाहर निकलते ही, गर्म हवा के झोंके ने उसे घेर लिया। उसने अपनी सूती साड़ी को कसकर पकड़ा। आज उसे साड़ी में नहीं रहना था। घर जाकर उसे बदलना था।
 
एक घंटे बाद, चैताली एमजी रोड के एक कोने पर खड़ी थी। अब वह साड़ी में नहीं थी। एक छोटी, तंग स्कर्ट, जो उसके घुटनों से ठीक ऊपर खत्म होती थी, और एक ढीला-ढाला टॉप, जो उसकी भारी मम्मे को बमुश्किल ढके हुए था। उसके बाल खुले हुए थे, बिखरे हुए, जैसे अभी-अभी हवा से जूझकर आए हों। उसने अपने होठों पर गहरा लाल लिपस्टिक लगाया था, जो उसकी उम्रदराज़ त्वचा पर थोड़ा अटपटा लग रहा था।
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#2
एक ऑटो रिक्शा उसके पास आकर रुका। ड्राइवर ने अपनी गर्दन बाहर निकालकर उसे देखा। उसकी आंखें, चैताली के शरीर पर टिकीं, एक पल के लिए ठहर गईं। चैताली ने एक हल्की, बनावटी मुस्कान दी।

"कहां चलोगी, मैडम?" ड्राइवर की आवाज़ में एक अजीब सी ललक थी।

"जहां ले जाना चाहो," चैताली ने धीमे से कहा, उसकी आवाज़ में एक थकी हुई सी मिठास थी।

ड्राइवर ने अपनी मूछों पर हाथ फेरा। "आजकल धंधा मंदा है, मैडम।"

"मंदा है तो क्या हुआ? आज तो होगा ही," चैताली ने थोड़ा आगे झुककर कहा, उसकी मम्मे  टॉप के नीचे और भी स्पष्ट दिख रही थी।

ड्राइवर ने एक गहरी सांस ली। "कितने लोग हो?"

"मैं अकेली ही काफी हूं," चैताली ने अपनी उंगलियों से उसके हाथ पर हल्का सा स्पर्श किया।

ड्राइवर ने एक पल सोचा, फिर दरवाजा खोला। "बैठो। आज का धंधा तुम्हारे साथ ही कर लेंगे।"

चैताली ऑटो में बैठ गई। ऑटो ने एक सुनसान गली में प्रवेश किया, जहां रात के अंधेरे में सिर्फ इक्का-दुक्का स्ट्रीट लाइटें जल रही थीं। ऑटो एक खाली प्लॉट के पास रुका। ड्राइवर ने इंजन बंद किया।

"यहां क्यों रुके?" चैताली ने पूछा, उसकी आवाज़ में थोड़ी घबराहट थी।

"अकेली जगह है। कोई देखेगा नहीं," ड्राइवर ने कहा, उसकी आंखें चमक रही थीं।

चैताली ने एक गहरी सांस ली। यह सब उसे पता था। उसने अपनी स्कर्ट को थोड़ा ऊपर खींचा। "तो बताओ, क्या चाहिए?"

ड्राइवर ने अपने पैंट की ज़िप खोली। "बस यही।"
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#3
चैताली ने उसके चेहरे को देखा। वह एक युवा लड़का था, शायद बीस-बाइस साल का, उसके चेहरे पर अभी भी मुंहासे थे। उसे लगा, यह तो कोई कॉलेज का छात्र होगा, जो ऑटो चलाकर पैसे कमाता होगा। उसे थोड़ी दया आई, लेकिन जल्दी ही उसने इस भावना को दबा दिया।

"पैसे?" चैताली ने पूछा।

"जितना बोलोगी," लड़के ने जल्दी से कहा।

"पांच सौ।"

लड़के ने बिना कुछ कहे अपनी जेब से नोटों का एक बंडल निकाला और उसमें से पांच सौ का एक नोट चैताली की ओर बढ़ा दिया। चैताली ने नोट ले लिया और उसे अपने पर्स में रख लिया।

"जल्दी करो," चैताली ने कहा।
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#4
लड़के ने धीरे-धीरे अपनी जींस की जिप खोली, उसके हाथ थोड़े कांप रहे थे। वहां की गर्म हवा ने उसकी त्वचा को छूते हुए उसे एक अजीब सी झनझनाहट महसूस कराई। जैसे ही उसने अपने अंदरूनी कपड़ों को हटाया, उसका लंड अचानक बाहर आ गया, जो अभी तक उत्तेजना से भरा हुआ था। वह औसत लंबाई और मोटाई का था, लेकिन अब पूरी तरह से सख्त हो चुका था, जिससे उसकी नसें साफ दिख रही थीं।

चैताली ने उसे देखा, फिर अपनी उंगलियों से उसे छुआ। लड़का कांप गया।

"क्या हुआ?" चैताली ने पूछा।

"कुछ नहीं," लड़के ने कहा, उसकी आवाज़ कांप रही थी।

चैताली ने एक लंबी सांस ली। उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन उसके होंठों पर एक ऐसी थकान भरी मुस्कान थी जिसे वह अब छिपा नहीं पा रही थी। वह जानती थी कि आज फिर वही करना है जो वह रोज़ करती है। उसने अपने काले बालों को पीछे सरकाते हुए धीरे से अपने टॉप के निचले हिस्से को पकड़ा। कपड़े का मटेरियल उसकी उंगलियों के बीच से खिसकता हुआ महसूस हो रहा था। जैसे ही उसने टॉप को ऊपर उठाया, उसके भारी, ढीले मम्मे एक झटके के साथ बाहर आ गए। हवा का ठंडा स्पर्श उसके संवेदनशील निप्पलों पर चुभ गया, जो पहले से ही उभरे हुए थे। उसके गहरे भूरे निप्पल्स, जिन पर छोटे-छोटे दाने दिखाई दे रहे थे, अब पूरी तरह से खुले थे।

लड़का, जो अब तक बस देख रहा था, अचानक आगे बढ़ा। उसकी सांसें चैताली की त्वचा पर गर्माहट छोड़ रही थीं जब उसने अपना मुंह उसके बाएँ मम्मे पर टिका दिया। उसके होंठों ने निप्पल को चारों ओर से घेर लिया, और फिर एक तेज चूसने की आवाज़ के साथ उसने अपना मुँह कसकर बंद कर लिया। चैताली ने अपनी आँखें और ज़ोर से बंद कर लीं, उसकी भौंहें थोड़ी सिकुड़ गईं। यह वही पुरानी दिनचर्या थी - वह अनुभव जो उसके लिए अब मात्र एक यांत्रिक प्रक्रिया बन चुका था। पैसा। बस पैसा। वह यहाँ इसलिए नहीं थी क्योंकि उसे यह पसंद था, बल्कि इसलिए क्योंकि उसे इसकी ज़रूरत थी।

लेकिन आज... आज कुछ अलग सा लग रहा था। जब लड़के की जीभ उसके निप्पल के चारों ओर घूम रही थी, तो चैताली ने उसकी आँखों में झाँका। वहाँ एक अजीब सी मासूमियत थी - एक ऐसी भावना जिसे वह इस तरह के लोगों में कभी नहीं देखती थी। उसकी पलकें झपक रही थीं, और उसके होंठ थोड़े काँप रहे थे, जैसे कि वह पहली बार ऐसा कर रहा हो। चैताली के मन में एक विचार कौंधा - क्या यह वाकई उसका पहला अनुभव था? उसके मम्मे पर लड़के के हाथों का स्पर्श भी अजीब तरह से अनाड़ी सा था, जैसे वह नहीं जानता कि कितना दबाव डालना है। चैताली ने अपने होठों को दबाया। शायद आज का दिन उसके लिए बस पैसा कमाने से कुछ अधिक होगा।
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