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सुनीता: एक साधारण गृहिणी की कहानी
Part - 1
नन्हा सा कस्बा था वह, जहाँ गलियों में सुबह की धूप के साथ गायों की घंटियों की आवाज़ गूंजती थी। उत्तर प्रदेश के किसी छोटे से शहर में बसा यह कस्बा अपनी सादगी और परंपराओं के लिए जाना जाता था। यहीं, एक पुराने से दो मंज़िला मकान में रहता था एक संयुक्त परिवार। इस परिवार की धुरी थी सुनीता, जिसे सब प्यार से "चाची" कहकर बुलाते थे। सुनीता, 35 साल की एक साधारण सी औरत, दो बच्चों की माँ और आरव की चाची। आरव, 18 साल का कॉलेज जाने वाला नौजवान, उसी घर का हिस्सा था। सुनीता का जीवन परिवार, परंपराओं और धर्म के इर्द-गिर्द घूमता था। उसकी सादगी और मेहनत ही इस परिवार को जोड़े रखती थी।
सुनीता का रूप और पहनावा
सुनीता का रंग गेहुँआ था, न ज़्यादा गोरा, न साँवला, बल्कि वैसा जो गाँव की मिट्टी की तरह सच्चा और देसी लगे। उसका चेहरा सादा था, बिना किसी नखरे के। आँखें बड़ी-बड़ी, जिनमें हमेशा एक गहरा सा अपनापन झलकता था, लेकिन साथ ही थोड़ी थकान भी। होंठों पर हल्की सी मुस्कान रहती, जो बच्चों को डाँटते वक़्त भी गायब नहीं होती। उसकी काया मझोली थी, न ज़्यादा पतली, न भारी। गृहिणी के काम-काज ने उसके शरीर को मज़बूत बनाया था, पर उसकी कमर पर हल्की सी चर्बी भी थी, जो दो बच्चों की माँ होने की निशानी थी।
सुनीता हमेशा साड़ी पहनती थी। उसकी साड़ियाँ ज़्यादातर सूती या सस्ती सिल्क की होतीं, जिन्हें वह बाज़ार की छोटी सी दुकान से ख़रीदती। लाल, हरी, नीली, पीली—हर रंग की साड़ी उसके पास थी, पर वह ज़्यादातर गहरे रंग ही चुनती, क्योंकि उनमें दाग-धब्बे कम दिखते। साड़ी के नीचे वह पेटीकोट और ब्लाउज़ पहनती, जो हमेशा साड़ी से मेल खाता। उसकी ब्लाउज़ की सिलाई पुराने ज़माने की थी—टाइट, छोटी बाँहों वाली, जो उसकी बाँहों को और सुंदर बनाती। ब्रा वह रोज़ पहनती, पर पैंटी का इस्तेमाल सिर्फ़ मासिक धर्म के दिनों में करती, जब सैनिटरी पैड की ज़रूरत पड़ती। यह उसकी गाँव की आदत थी, जहाँ औरतें बिना पैंटी के ही साड़ी पहनती थीं।
सुनीता की देह पर बाल थे, जैसा कि गाँव की औरतों में आम है। उसकी बगलें और निचले हिस्से में घने काले बाल थे, जिन्हें वह कभी नहीं हटाती थी। यह उसकी सादगी और प्राकृतिक जीवन का हिस्सा था। गाँव में ऐसी चीज़ों को कोई अहमियत नहीं दी जाती थी, और सुनीता ने भी इसे कभी ज़रूरी नहीं समझा। उसके बाल काले, घने और लंबे थे, जिन्हें वह हमेशा जूड़े में बाँधती। जूड़े में एक साधारण सी कंघी और कभी-कभार गजरा लगाती, ख़ासकर जब मंदिर जाना हो। उसकी माँग में हमेशा सिंदूर की लाल रेखा और माथे पर छोटा सा बिंदिया सजा रहता, जो उसकी शादीशुदा ज़िंदगी का प्रतीक था।
सुनीता का स्वभाव और आस्था
सुनीता का मन धर्म और परंपराओं में रमा रहता था। वह सुबह उठते ही सबसे पहले तुलसी के पौधे को जल चढ़ाती और शिवजी की पूजा करती। उसका छोटा सा पूजा-घर घर के कोने में था, जहाँ मूर्तियों के सामने अगरबत्ती की ख़ुशबू और घंटियों की आवाज़ हमेशा गूंजती। वह हर सोमवार को व्रत रखती और मंदिर जाकर भोलेनाथ को बेलपत्र चढ़ाती। उसकी आस्था इतनी गहरी थी कि वह हर छोटी-बड़ी बात को भगवान की मर्ज़ी मानती। अगर बच्चे बीमार पड़ते, तो वह तुरंत नीम का पत्ता जलाकर घर में धुआँ करती और मंत्र पढ़ती।
उसका स्वभाव रूढ़िवादी था। वह औरतों के लिए बनाए गए पुराने नियमों को मानती थी। उसे लगता था कि औरत का धर्म है अपने पति और परिवार की सेवा करना। उसने कभी कॉलेज की दहलीज़ नहीं देखी थी, सिवाय कुछ सालों की प्राइमरी पढ़ाई के। गाँव में लड़कियों को ज़्यादा पढ़ाने का रिवाज़ नहीं था, और सुनीता भी उसी परंपरा की देन थी। वह पढ़ना-लिखना मुश्किल से जानती थी, पर घर चलाने की समझ में उसका कोई जवाब नहीं था। वह बाज़ार से सस्ता सामान चुनने, बच्चों को अनुशासन सिखाने और रिश्तेदारों से रिश्ते निभाने में माहिर थी।
सुनीता का दिनचर्या
सुनीता का दिन सुबह चार बजे शुरू होता था। वह उठकर पहले नहाती, फिर पूजा करती और रसोई में चूल्हा जलाती। परिवार बड़ा था, तो खाना भी ढेर सारा बनाना पड़ता। दाल, चावल, सब्ज़ी, रोटी—सब कुछ उसके हाथों से बनता। वह खाना बनाते वक़्त पुराने भजन गुनगुनाती, जिससे रसोई में एक अलग ही रौनक छा जाती। दोपहर में वह बच्चों को खाना खिलाती, कपड़े धोती और घर की साफ़-सफ़ाई करती। आरव को वह हमेशा पढ़ाई के लिए टोकती, "बेटा, किताब खोलो, कॉलेज में नाम कमाओ।" आरव उसकी बातें सुनकर हँसता और कहता, "चाची, आप भी तो पढ़ लो मेरे साथ।" सुनीता हँसकर टाल देती।
शाम को वह मंदिर जाती, जहाँ कस्बे की दूसरी औरतों से गपशप करती। वहाँ वह बच्चों की शादी, रिश्तेदारों की ख़बरें और आने वाले त्योहारों की बातें करती। रात में, जब सब सो जाते, सुनीता चुपके से अपनी साड़ी के पल्लू से आँसू पोंछती। शायद वह अपनी जवानी के दिनों को याद करती, या परिवार की ज़िम्मेदारियों का बोझ महसूस करती। पर अगली सुबह, वह फिर वही मुस्कान लिए उठती और अपने काम में जुट जाती।
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Nice start, it is incest story
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Part - 2
सुनीता का रूप: एक देह की मादकता
सुनीता का रंग गेहुँआ था, पर धूप में वो ऐसा चमकता, जैसे उसकी चमड़ी से देसी घी की ख़ुशबू उठ रही हो। उसकी त्वचा पर मेहनत के निशान थे—हल्की-सी खुरदरापन, जो उसकी चूचियों, गाँड, और चूत पर भी दिखता। पर यही खुरदरापन उसकी देह को मस्त बनाता था, जिसे देखकर किसी का भी लंड खड़ा हो जाए। उसकी आँखें, काली और गहरी, जैसे किसी मोटे लंड की प्यासी हों, पर बाहर से मासूमियत का नकाब पहने रहतीं। उसके होंठ, हल्के गुलाबी, हमेशा सूखे से, पर जब वो चुपके से अपनी ज़ुबान उन पर फेरती, तो लगता जैसे उसे चुदाई की ख़्वाहिश हो रही हो। उसकी नाक, साधारण, पर जब वो पसीने में भीगती, तो उसकी साँसों की गर्मी उसकी बदन की खुशबू को और मादक बनाती।
सुनीता की देह एक मस्त चुदाई का सामान था। उसकी चूचियाँ, भारी, गोल, और रस भरी, ब्लाउज़ में कसी हुई, हर कदम पर उछलतीं, मानो किसी लंड को ललकार रही हों। उसके निप्पल्स, काले, सख़्त, और मोटे, ब्लाउज़ के कपड़े से उभरते, ख़ासकर जब वो रसोई में चूल्हे की आग में पसीना बहाती। उसकी कमर, हल्की-सी चर्बी लिए, साड़ी में लिपटी, पर उसका उभार ऐसा कि किसी की भी आँखें उसकी चूत पर टिक जाएँ। उसकी गाँड, मोटी, नरम, और गदराई, साड़ी के नीचे हर कदम पर लहराती, जैसे चुदाई का खुला न्योता दे रही हो। उसकी चूत, घनी काली झाँटों से ढकी, हमेशा गीली और गर्म रहती, ख़ासकर गर्मी के दिनों में, जब पसीना उसकी झाँटों में रिसता और उसकी चूत की ख़ुशबू हवा में फैलती।
सुनीता ने कभी अपनी झाँटें साफ़ नहीं कीं। उसकी चूत और बगलें काले, घने बालों से भरी थीं, जो उसकी देसी सादगी की निशानी थीं। उसकी बगलें, पसीने में चमकती, जब वो साड़ी का पल्लू उठाती, तो एक तो एक ऐसी महक आती, जो किसी के भी लंड को तड़पा दे। उसकी चूत की झाँटें इतनी घनी थीं कि उसकी चूत का गुलाबी मुँह मुश्किल से दिखता, पर जब वो नहाती, और पानी उसकी चूत पर गिरता, तो उसकी झाँटें चमकतीं, और उसकी चूत का गीला छेद साफ़ नज़र आता। उसकी देह का हर हिस्सा चुदाई की कहानी कहता था—उसकी चूचियाँ, उसकी गाँड, उसकी चूत, और यहाँ तक कि उसकी बगलें भी।
सुनीता की साड़ियाँ उसकी हवस का आलम थीं। वो सस्ती सूती और सिल्क की साड़ियाँ पहनती, जो बाज़ार की छोटी दुकानों से आतीं। गहरे लाल, नीले, मरून, या हरे रंग की साड़ियाँ उसकी गेहुँआ देह पर आग सी लगातीं। साड़ी का पल्लू वो कंधे पर लटकाती, पर रसोई में काम करते वक़्त कमर में खोंस लेती, जिससे उसकी गाँड का मोटा उभार और चूत का हल्का सा निशान साफ़ दिखता। साड़ी के नीचे वो पेटीकोट पहनती, जिसका नाड़ा वो इतना कसकर बाँधती कि उसकी कमर पर लाल निशान पड़ जाता। उसकी ब्लाउज़, टाइट और छोटी, उसकी चूचियों को कसकर पकड़ती, और पीछे से उसकी पीठ का पसीना चमकता। ब्रा वो रोज़ पहनती, सस्ती और सादी, जो उसकी चूचियों को ऊपर उठाती, पर उसके मोटे निप्पल्स को छिपा नहीं पाती। पैंटी वो सिर्फ़ मासिक धर्म में पहनती, जब सैनिटरी पैड उसकी चूत को सहारा देता। बाकी दिन उसकी चूत नंगी रहती, साड़ी और पेटीकोट के नीचे आज़ाद, पसीने और हवा से खेलती। ये आज़ादी उसकी चूत को एक अलग ही मज़ा देती, और जब वो चलती, तो उसकी चूत की गर्मी उसकी जाँघों को गीला कर देती।
उसके बाल, काले, घने, और रेशमी, उसकी गाँड तक लहराते। वो उन्हें जूड़े में बाँधती, पर रात में जब खोलती, तो वो उसकी पीठ पर लहराते, जैसे कोई काला सागर उसकी गाँड को चूम रहा हो। उसकी माँग में सिंदूर की लाल रेखा और माथे पर बिंदिया उसकी शादी की निशानी थी, पर यही बिंदिया उसकी चूचियों और चूत की हवस को और उभारती। कानों में छोटी बाली और गले में मंगलसूत्र, जो उसकी चूचियों के बीच लटकता, उसकी देह को और नंगा करता। उसकी चाल में एक देसी ठुमका था, जब वो साड़ी लपेटे आँगन में चलती, तो उसकी गाँड का हिलना और चूचियों का उछलना किसी चुदाई के गाने का बीट लगता।
सुनीता की देह का हर अंग हवस की आग था। जब वो नहाती, आँगन के कोने में, ठंडा पानी उसकी चूचियों पर गिरता, तो उसके निप्पल्स सख़्त हो जाते, और उसकी चूत में एक सिहरन दौड़ती। वो पेशाब करती, तो उसकी चूत से गर्म धार निकलती, और वो चुपके से अपनी उँगलियों से उसकी गीली झाँटों को छूती, अपनी चूत की गर्मी को महसूस करती।
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प्लीज़ इसमें एक बदसूरत बूढ़े को कहानी का मुख्य किरदार बनाओ।
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Sunita
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Part - 3
सुनीता के विचार, सपने, और नंगी चाहतें
सुनीता का मन एक बंद चूत था, जो बाहर से तो धर्म और परंपराओं में लिपटा था, पर अंदर से लंड की भूख में जलता था। दिन में वो रसोई में रोटियाँ बेलती, बच्चों को डाँटती, और मंदिर में शिवलिंग पर जल चढ़ाती, पर रात के सन्नाटे में उसकी चूत और चूचियाँ उसे चुदाई की आग में जलाती थीं। जब घर सो जाता, और वो आँगन में चाँदनी के नीचे अपनी साड़ी खोलती, तो उसकी नंगी देह चमकती। वो अपनी चूचियों को मसलती, उनके भारीपन को महसूस करती, और अपनी उँगलियों को अपनी चूत की झाँटों में डालती, जहाँ गीली गर्मी उसे पागल कर देती। उसकी चूत का पानी उसकी जाँघों पर रिसता, और वो अपनी गाँड को हवा में उठाकर अपनी चूत में दो उँगलियाँ डालती, चुदाई की ख़्वाहिश में तड़पती।
उसके सपनों में एक मर्द आता था—काला, मज़बूत, और मोटा लंड लिए। वो सपने में उस मर्द के लण्ड को अपनी चूत में लेती, अपनी गाँड को उसकी जाँघों से रगड़ती और अपनी चूचियों को उसके मुँह में देती। वो चुदाई इतनी ज़ोरदार होती कि उसकी चूत का पानी बिस्तर पर फैल जाता, और वो सुबह अपनी गीली चूत को छूकर देखती, कि कहीं वो सपना सच तो नहीं था। पर उसकी चूत सिर्फ़ नम होती, और उसका मन और प्यासा। वो इन सपनों से डरती थी, क्योंकि उसका धर्म उसे सिखाता था कि औरत की चूत सिर्फ़ पति के लंड के लिए होती है। पर उसका पति अब उसकी चूत को वही मज़ा नहीं देता था। उसका लंड अब ढीला था, और सुनीता की चूत हर रात चुदाई की भूख में चीख़ती थी।
आरव, उसका भतीजा, उसकी चूत की आग का एक और बहाना था। उसकी मज़बूत बाँहें, उसकी चौड़ी छाती, और उसकी जवानी की गर्मी सुनीता की चूत को गीला कर देती। जब वो रसोई में उसकी मदद करता, और उसका हाथ ग़लती से सुनीता की गाँड या चूचियों को छू जाता, तो उसकी चूत में बिजली सी दौड़ती। एक बार, जब वो पानी का मटका उठा रहा था, और उसकी जाँघ सुनीता की गाँड से टकराई, तो उसकी चूत इतनी गीली हो गई कि उसकी साड़ी पर निशान पड़ गया। वो ख़ुद को डाँटती, "छिः, ये क्या सोच रही हूँ? वो मेरा भतीजा है।" पर उसकी चूत को ये बात समझ नहीं आती थी। वो रात में अपनी चूत में उँगली डालती, और आरव के मोटे लंड को अपनी चूत में घुसता हुआ सोचती, अपनी चूचियों को मसलती, जब तक उसकी चूत का पानी न निकल जाए।
सुनीता की सबसे बड़ी चाहत थी कि कोई उसकी चूत को चोदे, उसकी गाँड को थपथपाए, और उसकी चूचियों को चूसे, जैसे वो अपनी जवानी में सपने देखती थी। वो चाहती थी कि उसकी चूत, जो अब रसोई और बच्चों में खप रही थी, एक बार फिर किसी मोटे लंड की प्यास बने। वो अपनी गाँड को हवा में उठाकर चुदाई की कल्पना करती, और अपनी चूत को उँगलियों से चोदती, पर उसकी चूत को असली लंड की ज़रूरत थी। वो जानती थी कि ये चाहत सिर्फ़ सपनों में पूरी होगी। फिर भी, जब वो अपनी साड़ी उतारती, और अपनी नंगी देह को देखती, तो उसकी चूत और चूचियाँ उसे चीख़कर कहतीं, "सुनीता, अपनी चूत को आज़ाद कर, और किसी लंड को अपनी गाँड में ले।"
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(22-03-2026, 03:42 PM)Vissle Wrote: प्लीज़ इसमें एक बदसूरत बूढ़े को कहानी का मुख्य किरदार बनाओ।
क्यों? लेखक को अपने अनुसार लिखने दीजिये.
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सुनीता का मन एक बंद चूत था - वाह, क्या उपमा है!
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