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दक्षिण भारत की सुरम्य भूमि में, कुर्ग की वादियों में बसा वह घर मानो समय की धीमी धड़कनों पर टिका हुआ एक शांत स्वप्न था। पश्चिमी घाट की हरित गोद में फैली पहाड़ियों के बीच स्थित वह पुराना, सलीके से सँवारा गया निवास केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं था—वह स्मृतियों, संस्कारों और प्रकृति के साथ गुँथे जीवन का सजीव रूप था।
सुबह की पहली आहट के साथ ही घर के चारों ओर फैली धुंध हल्की-हल्की सरकती, जैसे कोई श्वेत चादर धीरे-धीरे हटाई जा रही हो। दूर तक फैले कॉफी के बागान ओस की बूंदों से चमक उठते। नारियल के लंबे वृक्ष हवा के संग झूमते, उनकी पत्तियाँ आपस में टकराकर मधुर सरगम रचतीं। आम के पेड़ों की डालियाँ फलों के भार से झुकी रहतीं और पके फलों की सुगंध वातावरण में घुलकर एक अलसाई मिठास बिखेर देती।
घर की बनावट पारंपरिक दक्षिण भारतीय स्थापत्य की झलक लिए थी। मोटी लाल मिट्टी और पत्थर की दीवारें वर्षों की धूप-बरसात झेलकर भी दृढ़ खड़ी थीं। ऊपर ढलानदार मंगलोर टाइलों की छत बरसात की बूंदों को सहजता से नीचे बहा देती। मुख्य द्वार सागौन की ठोस लकड़ी का बना था, जिस पर बेल-बूटों, मोर और दीपों की बारीक नक्काशी थी। जैसे ही वह द्वार खुलता, भीतर से चंदन और धूप की मिली-जुली सुगंध स्वागत करती—मानो घर स्वयं अतिथि का अभिनंदन कर रहा हो।
भीतर प्रवेश करते ही चौकोर आँगन दिखाई देता—नाडुमुट्टम शैली का खुला प्रांगण। ऊपर नील गगन का अंश, चारों ओर कमरों की शृंखला, और मध्य में ऊँचा चबूतरा। उसी पर तुलसी का हरा-भरा पौधा लहलहाता, जिसके समीप पीतल की छोटी घंटी टँगी रहती। प्रातःकाल घर की बुजुर्ग महिला स्नान के पश्चात तुलसी को जल अर्पित करतीं, रंगोली सजातीं और दीपक प्रज्वलित करतीं। जब सूर्य की किरणें सीधे उस खुले स्थान से उतरतीं, तो तुलसी की पत्तियाँ सुनहरी आभा से चमक उठतीं। वर्षा ऋतु में गिरती बूंदें उन पर मोतियों-सी ठहर जातीं।
मुख्य बैठक में सागौन का भारी फर्नीचर सजा था। लंबी पीठ वाली कुर्सियाँ, सूती कढ़ाईदार गद्दियों से सुसज्जित, अतिथियों के स्वागत के लिए सदैव तत्पर रहतीं। बीच में रखा चौड़ा सेंटर टेबल चमकता रहता, जिस पर तांबे का फूलदान और ताजे चमेली के फूल सजे रहते। दीवारों पर टंगे काले-सफेद चित्र बीती पीढ़ियों की कहानियाँ कहते। एक कोने में रखा पीतल का दीपस्तंभ विशेष अवसरों पर प्रज्वलित होता, और उसकी लौ पूरे कक्ष को आलोकित कर देती।
रसोई घर की आत्मा थी। लाल ऑक्साइड का चमकता फर्श, लकड़ी की अलमारियों में करीने से सजे पीतल और कांसे के बर्तन, और एक ओर पारंपरिक चूल्हा—जहाँ लकड़ी की आँच पर भोजन पकता। नारियल की चटनी, सांभर और ताजे चावल की भाप की महक पूरे घर को स्नेह से भर देती। पत्थर की सिल-बट्टे पर पिसते मसालों की सुगंध जैसे स्मृतियों में बस जाती। छत से लटकती सूखी मिर्च और पापड़ की लड़ियाँ रसोई को जीवंत चित्र में बदल देतीं।
शयनकक्षों में सादगी और गरिमा का सुंदर संतुलन था। मोटे लकड़ी के पलंग, सूती चादरें और हाथ से बुने कंबल—सबमें आत्मीयता झलकती। बड़ी खिड़कियों से बाहर नारियल के वृक्ष दिखाई देते, और सुबह की धूप कमरे को सुनहरी आभा से भर देती। एक कोने में पुरानी अलमारी में पीढ़ियों पुराने दस्तावेज़ सुरक्षित रखे थे, जैसे समय स्वयं उनमें ठहरा हो।
घर का सबसे पावन स्थान था देवघर। छोटा पर अत्यंत सुसज्जित कक्ष, जिसकी दहलीज पार करते ही मन विनम्र हो उठता। पूर्व दिशा की ओर लकड़ी का सुंदर मंदिर बना था, जिसमें बीच में भगवान विष्णु की प्रतिमा, एक ओर देवी लक्ष्मी और दूसरी ओर भगवान गणेश विराजमान थे। प्रतिदिन प्रातः और संध्या आरती होती। घी के दीपक की लौ टिमटिमाती, तो दीवारों पर झिलमिलाती छायाएँ नृत्य करतीं। अगरबत्ती और चंदन की सुगंध वहाँ स्थायी रूप से बसी रहती।
संध्या के समय जब पास के मंदिर से आती घंटियों की ध्वनि वातावरण में गूँजती, तो घर के भीतर एक अनकही शांति उतर आती। रात गहराते ही आकाश असंख्य तारों से भर जाता। पहाड़ियों की काली आकृतियाँ चाँदनी में और रहस्यमय लगतीं। झींगुरों की धीमी आवाज़ और दीपक की टिमटिमाती लौ के बीच वह घर मानो प्रकृति और परंपरा के मध्य एक सेतु बनकर खड़ा रहता।
भोर की हल्की रौशनी जब पूर्व दिशा से फैलती, तो सबसे पहले आँगन के खुले आकाश से भीतर उतरती। नाडुमुट्टम के उस चौकोर खुले हिस्से से आती धूप की पतली, सुनहरी धाराएँ लाल ऑक्साइड के फर्श पर लंबी रेखाएँ खींच देतीं। तुलसी के पत्तों पर जमी ओस की बूँदें मोतियों-सी चमक उठतीं। ऐसा प्रतीत होता मानो स्वयं प्रकृति ने घर के मध्य दीप जला दिया हो।
हवा में एक ताजगी घुली रहती—भीगी मिट्टी, चंदन और हल्की कॉफी की महक का सम्मिश्रण। बाहर नारियल के पत्तों की सरसराहट भीतर तक सुनाई देती, पर घर के भीतर एक गहन, आत्मीय शांति पसरी रहती।
सुबह की शुरुआत प्रायः रसोई से होती। लकड़ी के चूल्हे में सुलगती आग की हल्की खड़क, पीतल के बर्तनों की कोमल टन-टन और उबलते पानी की धीमी आवाज़—ये सब मिलकर एक मधुर लय रचते। ताज़ी पिसी कॉफी की सुगंध पूरे घर में फैल जाती। नारियल की चटनी के लिए सिल-बट्टे पर मसाले पीसे जाते, तो उनकी खुशबू वातावरण को और सजीव कर देती।
भाप उठते चावल और सांभर की महक जैसे हर कमरे में प्रेम का संदेश पहुँचा देती। खिड़की से छनकर आती धूप बर्तनों पर पड़ती, तो वे सुनहरे आभा से दमक उठते।
इसी समय देवघर के द्वार खुलते। भीतर सजी प्रतिमाओं के समक्ष दीपक प्रज्वलित होता। घी की लौ जब स्थिर होकर जलती, तो दीवारों पर प्रकाश की कोमल परछाइयाँ नृत्य करने लगतीं। छोटी-सी घंटी की मधुर ध्वनि पूरे घर में गूँजती और वातावरण को आध्यात्मिक स्पर्श दे जाती।
अगरबत्ती की रेखा-सी उठती धूप की पतली लकीरें खुले आकाश की ओर बढ़तीं—मानो प्रार्थनाएँ सीधे ईश्वर तक पहुँच रही हों। आरती के स्वर धीमे, शांत और आत्मीय होते—न अधिक ऊँचे, न अधिक धीमे—बस उतने कि घर का हर कोना उन्हें सुन सके।
शयनकक्षों में भी धीरे-धीरे जीवन लौट आता। बड़ी-बड़ी खिड़कियों से आती सुबह की धूप सफेद सूती चादरों पर सुनहरी छटा बिखेर देती। दीवार पर टँगी घड़ी की टिक-टिक अब स्पष्ट सुनाई देने लगती। बाहर से पक्षियों का मधुर कलरव भीतर तक पहुँचता और नींद की अंतिम परत को भी धीरे से हटा देता।
लकड़ी की अलमारी पर रखे पीतल के दीपक की सतह पर सूरज की किरणें चमकतीं, जैसे कोई स्वर्णिम स्मृति झिलमिला उठी हो।
मुख्य बैठक में सागौन की कुर्सियाँ सुबह की रोशनी में और अधिक गंभीर और गरिमामयी प्रतीत होतीं। सेंटर टेबल पर रखा तांबे का फूलदान ताज़े चमेली के फूलों से सुगंधित रहता। हल्की हवा खिड़कियों से भीतर आती और सफेद परदों को धीरे-धीरे हिलाती—मानो घर स्वयं श्वास ले रहा हो।
बरामदे में बैठकर जब दूर तक फैली हरियाली को देखा जाता, तो मन अनायास ही शांत हो जाता। कॉफी के बागानों पर बिछी ओस की परत सूरज की रोशनी में चमकती और पहाड़ियों पर छाई धुंध धीरे-धीरे हटने लगती।
“अनंत शांति निवास” की सुबह केवल समय का एक भाग नहीं थी; वह एक अनुभूति थी। यहाँ हर ध्वनि संतुलित थी, हर सुगंध कोमल थी और हर किरण जीवन से परिपूर्ण। ऐसा लगता था मानो यह घर प्रकृति, परंपरा और आत्मा के बीच एक सेतु हो—जहाँ हर दिन की शुरुआत प्रार्थना, सादगी और गहन शांति के साथ होती हो।
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(This post was last modified: 09-03-2026, 10:21 PM by rajeshpawar2749. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
तुम्हारे सजेशन का इंतजार रहेगा।
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My dear writer
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कुर्ग की हरियाली के बीच स्थित “अनंत शांति निवास” केवल एक घर नहीं, भावनाओं का आश्रय था। इस घर का नाम राजेश ने अपने माता-पिता के नाम पर रखा था—पिता अनंत, जो अब इस दुनिया में नहीं थे, और माँ शांति देवी, जो अपने नाम के अनुरूप सौम्य और शांत स्वभाव की थीं।
शांति देवी वैसी सास थीं, जो बहू को परखने या परखाने में विश्वास नहीं रखती थीं। उनके लिए बहू घर की लक्ष्मी थी। इसलिए उनके और कल्याणी के बीच रिश्ता केवल सास-बहू का नहीं, बल्कि माँ-बेटी जैसा अपनापन लिए था।
राजेश पेशे से एक सफल वकील थे। अदालत की तेज़-तर्रार बहसों के बीच भी उनका स्वभाव संतुलित रहता। साथ ही, नारियल और कॉफी के बागानों का साइड बिज़नेस भी वे संभालते थे। हिसाब-किताब और प्रबंधन में उनकी पत्नी कल्याणी हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर साथ देती थीं।
कल्याणी अपने नाम की तरह मंगलमयी स्वभाव वाली थीं—संस्कारी, स्नेहमयी, एक आदर्श पत्नी और दो बच्चों की सच्ची मार्गदर्शक माँ।
उनकी बेटी किमाया, सुंदर, विनम्र और समझदार। पिछले वर्ष उसने अपना ग्रेजुएशन पूरा किया था और एक साल पहले ही नौकरी शुरू की थी। नौकरी पर जाने से पहले माँ की मदद करना उसकी दिनचर्या का हिस्सा था। इसलिए कल्याणी और किमाया केवल माँ-बेटी ही नहीं, बल्कि सच्ची सहेलियाँ भी थीं।
रोहन घर का चंचल बेटा था। शरारती ज़रूर, पर व्यवहार में विनम्र और माता-पिता के अनुशासन में रहने वाला। क्रिकेट उसका पहला प्यार था। कॉलेज के दूसरे अंतिम वर्ष में पढ़ रहा रोहन अपने कॉलेज टीम का उभरता खिलाड़ी था।
सुबह की हल्की सुनहरी किरणें नाडुमुट्टम से भीतर उतर रही थीं। तुलसी के पत्तों पर ओस चमक रही थी।
कल्याणी स्नान कर, गीले बालों को हल्के से पीछे करते हुए सबसे पहले देवघर में पहुँचीं। उन्होंने दीपक जलाया, अगरबत्ती लगाई और धीरे से बोलीं—
“हे भगवान, आज का दिन सबके लिए मंगलमय हो।”
फिर आरती की थाली सजाकर, फूल चढ़ाकर वे रसोई की ओर बढ़ीं।
रसोई में पहुँचते ही उन्होंने देखा—किमाया पहले से तैयार खड़ी है। किमाया ने ऑफिस जाने के लिए एक शालीन सा कुर्ता पहना था
“अरे, बेटा! आज फिर मुझसे पहले?” कल्याणी ने मुस्कराकर कहा।
किमाया हँस पड़ी—
“माँ, आप रोज़ कहती हैं कि मुझे आराम करना चाहिए, पर मैं जानती हूँ कि आपके साथ काम करना ही मेरा असली मॉर्निंग मेडिटेशन है।”
कल्याणी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा—
“बस, ऐसे ही मुस्कुराती रहो। ऑफिस में भी खुद को ज़्यादा थकाना मत।”
किमाया ने चाय चढ़ाते हुए कहा—
“माँ, आज शाम को जल्दी आ जाऊँगी। आपके साथ बागान का हिसाब भी देखना है।”
“हाँ, और तेरे पापा को भी समझाना है कि हर काम खुद मत किया करें,” कल्याणी ने हल्के से आँखें तरेरते हुए कहा।
दोनों हँस पड़ीं। रसोई में बर्तनों की हल्की आवाज़ और उनकी हँसी मिलकर घर को जीवंत बना रही थी।
उधर बैठक में राजेश किसी कानूनी दस्तावेज़ को लेकर फोन पर बात कर रहे थे।
“जी, शर्मा जी, मैंने फाइल पूरी देख ली है। लेकिन क्लॉज़ नंबर सात में एक बदलाव ज़रूरी है।”
फोन के दूसरी ओर से आवाज़ आई—
“राजेश जी, अगर आप कह रहे हैं तो हम संशोधन करवा देते हैं, पर समय कम है।”
राजेश ने गंभीर स्वर में कहा—
“कानून में जल्दबाज़ी नहीं चलती, शर्मा जी। एक छोटी-सी गलती आगे चलकर बड़ी परेशानी बन सकती है। आप ड्राफ्ट मुझे दोपहर तक भेज दीजिए, मैं कोर्ट जाने से पहले देख लूँगा।”
“ठीक है, राजेश जी। आपका अनुभव ही हमारा भरोसा है।”
राजेश हल्का-सा मुस्कुराए—
“धन्यवाद। हम दोनों का लक्ष्य एक ही है—सही और सुरक्षित निर्णय।”
फोन रखते हुए उनकी नज़र खिड़की से बाहर फैले नारियल के बागान पर गई।
शांति देवी स्नान कर देवघर में बैठी थीं। हाथ में माला, आँखें बंद, चेहरा शांत।
“हे विष्णु भगवान, मेरे परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखना। बच्चों के जीवन में प्रेम और समझ बनी रहे।”
उनकी आवाज़ धीमी थी, पर भाव गहरे। आरती के बाद उन्होंने घंटी बजाई—उसकी मधुर ध्वनि पूरे घर में गूँज उठी।
उधर अपने कमरे के बाथरूम में रोहन नहाते हुए ज़ोर से गा रहा था—
“दिल चाहता है… क्रिकेट खेलना…”
फिर खुद ही हँस पड़ा—
“आज तो प्रैक्टिस में शतक मारूँगा!”
कल्याणी ने बाहर से आवाज़ लगाई—
“रोहन! गाना अच्छा है, पर पानी बचाकर इस्तेमाल करो।”
“जी माँ!” भीतर से जवाब आया।
धीरे-धीरे पूरा घर जाग चुका था।
रसोई से आती खुशबू, देवघर की घंटी, फोन पर होती जिम्मेदार बातें, और रोहन की शरारती आवाज़—सब मिलकर “अनंत शांति निवास” की सुबह को पूर्ण बना रहे थे।
रसोई में कल्याणी और किमाया ने मिलकर नाश्ते की तैयारी पूरी कर ली थी—गरमागरम डोसा, खुशबूदार सांभर और नरम, फूले हुए अप्पम। तवे पर फैलते डोसे की सिसकारी और सांभर में पड़ते तड़के की छन-छन मानो सुबह की मधुर धुन बन गई थी। नारियल की ताज़ी चटनी पीसकर कटोरी में सजाई गई थी।
रसोई से उठती घी और करीपत्ते की महक पूरे घर में फैल रही थी। उसी समय देवघर से आती धूप और अगरबत्ती की सुगंध वातावरण को और भी पवित्र बना रही थी। दोनों खुशबुएँ मिलकर ऐसा आभास दे रही थीं, जैसे घर में केवल भोजन ही नहीं, प्रेम भी परोसा जा रहा हो।
किमाया ने सुंदर स्टील की थालियाँ सजा दीं। बीच में सांभर का बड़ा कटोरा, बगल में नारियल चटनी, और एक टोकरी में ताजे डोसे। अप्पम को सफेद कपड़े से ढककर गरम रखा गया।
सबसे पहले शांति देवी आकर कुर्सी पर बैठीं।
“वाह, आज तो रसोई से ही मन तृप्त हो गया,” उन्होंने मुस्कराकर कहा।
रोहन दौड़ता हुआ आया—
“माँ, आज तो होटल जैसा नाश्ता है!”
पीछे से राजेश भी फाइल बंद करते हुए आ बैठे।
“लगता है आज कोर्ट जाने से पहले ही मेरा दिन बन गया,” उन्होंने हँसते हुए कहा।
कल्याणी ने सबको परोसते हुए स्नेह से कहा—
“पहले गरम-गरम खा लीजिए, फिर बातें कीजिए।”
नाश्ते के बाद कल्याणी ने सबके लिए ताज़ी फिल्टर कॉफी बनाई। उसकी गाढ़ी सुगंध जैसे पूरे वातावरण को सजीव कर रही थी।
राजेश ने पहला घूंट लेते हुए आँखें बंद कर लीं—
“कल्याणी, सच कहूँ तो हमारी बागान की कॉफी का स्वाद कहीं और नहीं मिलता।”
कल्याणी हल्के से मुस्कुराईं—
“इस बार की फसल अच्छी है। मैंने कल ही हिसाब देखा, अगर ऐसे ही रहा तो हम नया प्रोसेसिंग यूनिट भी सोच सकते हैं।”
राजेश ने आश्चर्य से देखा—
“तुमने तो पूरा प्लान बना लिया!”
“आप कोर्ट के केस संभालिए, बागान का हिसाब मैं देख लूँगी,” उसने आत्मविश्वास से कहा।
राजेश ने स्नेह भरी दृष्टि से कहा—
“तुम्हारे बिना ये सब संभव नहीं था, कल्याणी। तुम सच में मेरी सबसे बड़ी ताकत हो।”
कल्याणी ने धीमे से उत्तर दिया—
“और आप मेरा विश्वास।”
दोनों की मुस्कान में वर्षों की साझेदारी और सम्मान झलक रहा था।
उधर किमाया ने उत्साह से कहा—
“दादी, इस वीकेंड कहीं घूमने चलें? बहुत दिनों से सब साथ में बाहर नहीं गए।”
शांति देवी ने अप्पम का टुकड़ा तोड़ते हुए पूछा—
“कहाँ जाने का विचार है, बेटा?”
रोहन तुरंत बोल पड़ा—
“दादी, पास वाली पहाड़ी पर जो झरना है, वहाँ चलते हैं! मैं कैमरा भी ले जाऊँगा। और शाम को क्रिकेट भी खेलेंगे।”
किमाया ने हँसते हुए कहा—
“तुम्हें तो हर जगह क्रिकेट ही खेलना है!”
“अरे दीदी, प्रकृति के बीच खेलना अलग ही मज़ा देता है,” रोहन ने उत्साह से कहा।
शांति देवी ने सोचते हुए कहा—
“झरने पर जाना अच्छा रहेगा। पर सब सुबह-सुबह चलेंगे, ताकि धूप तेज़ न हो। मैं प्रसाद भी बना लूँगी।”
किमाया ने प्यार से उनका हाथ थाम लिया—
“दादी, आप भी हमारे साथ बैठकर फोटो खिंचवाएँगी।”
शांति देवी मुस्कुराईं—
“अगर तुम सब साथ हो, तो हर जगह तीर्थ बन जाती है।”
उसी समय राजेश ने बातचीत सुनते हुए कहा—
“तो तय रहा, इस वीकेंड पूरा परिवार पिकनिक पर जाएगा। मैं भी कोर्ट का काम पहले ही निपटा लूँगा।”
रोहन उछल पड़ा—
“येस! इस बार फैमिली मैच भी होगा!”
कल्याणी ने सबको देखते हुए कहा—
“ठीक है, पर एक शर्त—सब लोग तैयारी में मदद करेंगे।”
“जी मैडम!” सबने एक साथ कहा, और हँसी से पूरा कमरा गूँज उठा।
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नाश्ता समाप्त कर किमाया ने जल्दी से अपना बैग उठाया, माँ के पास आई—
“माँ, मैं निकलती हूँ। आज थोड़ा व्यस्त दिन है।”
कल्याणी ने उसके माथे पर हाथ रखकर कहा—
“ध्यान से जाना, और समय पर खाना खा लेना।”
“जी माँ,” मुस्कुराकर उसने स्कूटर स्टार्ट किया और ऑफिस की ओर निकल गई।
कुछ देर बाद राजेश ने अपनी फाइलें व्यवस्थित कीं, कोट पहना और कार की चाबी उठाई।
“माँ, मैं कोर्ट जा रहा हूँ,” उन्होंने शांति देवी से कहा।
“सफलता मिले बेटा,” शांति देवी ने आशीर्वाद दिया।
राजेश ने कल्याणी की ओर देखते हुए कहा—
“शाम को बागान के हिसाब पर बात करेंगे।”
कल्याणी ने सिर हिलाया—
“मैं फाइल तैयार रखूँगी।”
रोहन अपने कमरे में गया, बैग तैयार किया। एक घंटे बाद वह बाहर आया, हाथ में अपना क्रिकेट बैट लिए।
“माँ, आज आने में थोड़ा लेट होगा। मैच है, खेल के आऊँगा।”
कल्याणी ने हल्की सख्ती और प्यार के साथ कहा—
“ठीक है बेटा, पर ज़्यादा देर मत करना।”
“ओके माँ!” कहकर वह निकल गया।
रसोई में दोनों बर्तन साफ कर रही थीं। पानी की हल्की धारा और स्टील के बर्तनों की खनक के बीच बातचीत शुरू हुई।
शांति देवी बोलीं—
“कल्याणी, वीकेंड के लिए क्या तैयारी करनी है?”
कल्याणी ने सोचते हुए कहा—
“माँ, मैं सोच रही हूँ कि झरने पर जाने के लिए नींबू पानी और इडली बना लेते हैं। बच्चों को पसंद है।”
“अच्छा रहेगा। और मैं प्रसाद के लिए हलवा बना लूँगी,” शांति देवी ने मुस्कराकर कहा।
“माँ, आप ज़्यादा मेहनत मत कीजिए,” कल्याणी ने स्नेह से कहा।
शांति देवी हँस पड़ीं—
“अरे, अब तो यही सब मेरा काम है। तुम सब साथ हो, बस वही मेरी खुशी है।”
कल्याणी ने भावुक होकर कहा—
“आप हैं तभी तो घर में इतनी शांति है।”
दोनों की आँखों में अपनापन झलक रहा था।
“किमाया, अगले महीने हमें नया क्लाइंट मिल रहा है,” बॉस ने कहा।
“जी मैम, मैंने उसकी प्रोफाइल देख ली है,” किमाया ने आत्मविश्वास से उत्तर दिया।
“हमें रिपोर्टिंग सिस्टम अपडेट करना होगा। क्या तुम यह जिम्मेदारी संभाल सकती हो?”
“ज़रूर मैम। मैं एक ड्राफ्ट प्लान तैयार कर लूँगी और टीम के साथ साझा करूँगी।”
बॉस मुस्कुराईं—
“That’s why I trust you.”
किमाया ने विनम्रता से कहा—
“Thank you, ma’am. I’ll give my best.”
लंच टाइम में उसकी दोस्त ने पूछा—
“आज बहुत सीरियस लग रही हो।”
किमाया हँसी—
“बस, अगले महीने का प्रेशर है। पर घर की मॉर्निंग इतनी पॉजिटिव थी कि सब आसान लग रहा है।”
दोस्त ने छेड़ा—
“तुम्हारी माँ के हाथ का डोसा याद आ रहा है।”
“इस वीकेंड घर आ जाओ,” किमाया ने हँसते हुए कहा।
कोर्ट में एक नया ग्राहक उनसे मिलने आया।
“राजेश जी, मेरे प्रॉपर्टी विवाद का केस है,” उसने घबराए स्वर में कहा।
राजेश शांत स्वर में बोले—
“पहले आप आराम से बैठिए और पूरी बात बताइए।”
“मेरे भाई ने बिना बताए जमीन अपने नाम कर ली है।”
राजेश ने दस्तावेज़ देखते हुए कहा—
“हमें पहले रजिस्ट्रेशन पेपर और पुराना एग्रीमेंट देखना होगा। कानून में हर कदम प्रमाण के आधार पर चलता है।”
“क्या केस जीतने की संभावना है?”
“अगर दस्तावेज़ सही हैं, तो न्याय अवश्य मिलेगा। पर सच्चाई और धैर्य दोनों जरूरी हैं,” राजेश ने समझाया।
ग्राहक ने राहत की साँस ली—
“आप पर भरोसा है।”
लंच के समय कल्याणी का फोन आया।
“खाना खा लिया?” उसने प्यार से पूछा।
राजेश मुस्कुराए—
“अभी खाने बैठा हूँ। तुमने खाया?”
“हाँ, और याद है शाम को बागान का हिसाब देखना है।”
“कैसे भूल सकता हूँ? तुम्हारे साथ बैठकर काम करना ही तो सुकून देता है।”
कल्याणी ने हल्के से कहा—
“ज़्यादा काम मत कीजिए, समय पर घर आ जाइए।”
“तुम्हारी आवाज़ सुन ली, अब दिन और अच्छा लगेगा,” राजेश ने स्नेह से कहा।
लेक्चर चल रहा था, पर रोहन का ध्यान कहीं और था।
उसने धीरे से अपने दोस्त से कहा—
“आज ओपनिंग मैं करूँगा। तू नंबर तीन पर आना।”
दोस्त बोला—
“बॉलिंग स्ट्रॉन्ग है सामने वाली टीम की।”
“कोई बात नहीं, पहले दस ओवर संभलकर खेलेंगे, फिर अटैक करेंगे,” रोहन ने रणनीति बनाई।
प्रोफेसर की आवाज़ पृष्ठभूमि में थी, पर रोहन के दिमाग में केवल मैच का मैदान था।
शाम को कल्याणी और शांति देवी कॉफी के बागान में पहुँचीं।
मजदूरों से कल्याणी ने पूछा—
“इस बार की फसल कैसी लग रही है?”
एक मजदूर बोला—
“मैडम, बारिश समय पर हुई है, पैदावार अच्छी होगी।”
शांति देवी ने स्नेह से कहा—
“आप सबकी मेहनत से ही घर चलता है।”
कल्याणी ने नोट्स बनाते हुए कहा—
“कल से सूखे दानों को अलग करना शुरू कीजिए। और हिसाब की फाइल मैं ले जा रही हूँ।”
वापसी में वे अकाउंट की फाइल साथ ले आईं।
सूरज ढल रहा था, पहाड़ियों पर सुनहरी आभा फैल रही थी।
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ऑफिस से निकलने के बाद किमाया पास की एक छोटी-सी चाय की दुकान पर रुकी। वहाँ पहले से एक युवक उसका इंतज़ार कर रहा था। दोनों ने एक-दूसरे को देखकर हल्की मुस्कान दी।
“आज फिर लेट हो गई?” उसने मज़ाक में पूछा।
किमाया हँसते हुए बोली—
“आज बॉस के साथ लंबी मीटिंग थी। अगले महीने का पूरा प्रोजेक्ट मेरे जिम्मे डाल दिया।”
“तो फिर प्रमोशन दूर नहीं,” उसने चाय का कप उठाते हुए कहा।
“इतना आसान नहीं है,” किमाया बोली, “पर मुझे काम अच्छा लगता है। जब घर से इतनी पॉजिटिव शुरुआत होती है, तो ऑफिस का तनाव भी हल्का लगता है।”
“तुम्हारे घर की सुबह कैसी होती है?” उसने उत्सुकता से पूछा।
किमाया ने मुस्कुराकर कहा—
“बहुत शांत। माँ और मैं मिलकर नाश्ता बनाते हैं। आज डोसा और अप्पम बनाए थे। पापा कोर्ट जाते हैं, दादी पूजा करती हैं… और मेरा भाई तो बस क्रिकेट में ही जीता है।”
वह हँस पड़ा—
“क्रिकेट वाला भाई हर घर में होता है।”
किमाया ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा—
“और तुम? ऑफिस के बाद रोज़ इतनी शांति से चाय पीते हो?”
“सच कहूँ तो… आजकल सिर्फ तुम्हारे साथ ही पीता हूँ,” उसने थोड़ा संकोच के साथ कहा।
किमाया ने उसकी ओर देखा और हल्की मुस्कान दबा ली।
“अच्छा, तो अब समझ में आया,” उसने छेड़ते हुए कहा।
वह बोला—
“तुम्हारे साथ बात करना आसान लगता है। ऐसा लगता है जैसे हम बहुत पहले से एक-दूसरे को जानते हों।”
कुछ पल दोनों चुप रहे, फिर उसने पूछा—
“वीकेंड का कोई प्लान?”
किमाया बोली—
“घर वाले झरने पर पिकनिक की योजना बना रहे हैं।”
“भाग्यशाली हो तुम… इतना प्यारा परिवार है।”
किमाया ने धीरे से कहा—
“हाँ… और शायद कुछ दोस्त भी।”
उधर कॉलेज के मैदान में रोहन का मैच शुरू हो चुका था। यह दस ओवर का छोटा लेकिन रोमांचक मुकाबला था।
रोहन ओपनिंग के लिए मैदान में उतरा। सामने वाली टीम की बॉलिंग काफ़ी तेज़ थी। उसने शुरुआत में संभलकर खेला।
पहली कुछ गेंदों पर उसने सिंगल और डबल लेकर स्ट्राइक घुमाई। फिर चौथे ओवर में उसे एक ढीली गेंद मिली—
धड़ाम! शानदार कवर ड्राइव… गेंद सीधे बाउंड्री के पार।
दर्शकों में बैठे दोस्त चिल्ला उठे—
“शाबाश रोहन!”
धीरे-धीरे उसने लय पकड़ ली। कुल 17 गेंदों में 24 रन बनाए। जब वह आउट हुआ तो टीम का स्कोर स्थिर हो चुका था।
लेकिन असली रोमांच बाद में आया।
फील्डिंग के दौरान विरोधी टीम को जीत के लिए आखिरी दो ओवर में 18 रन चाहिए थे।
सातवें ओवर में रोहन ने मिड-विकेट पर एक शानदार कैच पकड़ा। गेंद हवा में ऊँची गई थी, और उसने दौड़ते हुए उसे पकड़ लिया।
“वाह!” पूरी टीम चिल्ला उठी।
आखिरी ओवर में मैच और रोमांचक हो गया। विरोधी टीम को 6 रन चाहिए थे। बल्लेबाज़ ने गेंद को मिड-ऑन की तरफ खेला और रन लेने दौड़ा।
रोहन बिजली की तरह गेंद पर झपटा।
सीधे विकेटकीपर की ओर तेज़ थ्रो…
रन-आउट!
मैदान में शोर गूँज उठा।
रोहन की टीम एक रन से मैच जीत गई।
उसके दोस्त दौड़कर उसे गले लगाने लगे।
“आज तू हीरो है भाई!”
रोहन हँसते हुए बोला—
“अरे, टीमवर्क है यार।”
उधर “अनंत शांति निवास” में रसोई के पास दोनों बैठी थीं। सामने हरी भाजी की टोकरी रखी थी और दोनों पत्तियाँ साफ कर रही थीं।
शांति देवी बोलीं—
“कल्याणी, बाजार से सब्ज़ियाँ और फल भी मंगाने होंगे। वीकेंड की पिकनिक के लिए ज़रूरी है।”
कल्याणी ने कहा—
“हाँ माँ, मैं लिस्ट बना रही हूँ—नींबू, टमाटर, नारियल और थोड़ा गुड़।”
शांति देवी ने मुस्कुराकर कहा—
“और बच्चों के लिए मिठाई भी।”
फिर थोड़ी देर बाद उन्होंने पूछा—
“तेरी मामी का फोन आया था। अगले महीने उनके बेटे की शादी है।”
कल्याणी बोली—
“अच्छा! तो हमें जरूर जाना चाहिए। बच्चे भी खुश होंगे।”
“हाँ, रिश्ते निभाना जरूरी होता है,” शांति देवी ने धीरे से कहा।
कल्याणी ने सहमति में सिर हिलाया—
“मैं सोच रही हूँ, इस बार हम सबके लिए नए कपड़े भी ले लेते हैं। किमाया को भी अच्छा लगेगा।”
शांति देवी हँस पड़ीं—
“और रोहन को बस क्रिकेट बैट चाहिए होगा।”
दोनों हँसते हुए भाजी साफ करती रहीं।
रसोई में हल्की बातचीत, बाहर कॉफी बागानों की ठंडी हवा, और दूर कहीं से आती पक्षियों की आवाज़—सब मिलकर शाम को शांत और सुकूनभरी बना रहे थे।
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09-03-2026, 10:27 PM
(This post was last modified: 09-03-2026, 10:29 PM by rajeshpawar2749. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
ऑफिस से लौटते समय किमाया के चेहरे पर आज एक अलग ही चमक थी। जैसे दिन भर की थकान के बावजूद मन के भीतर कोई मीठी खुशी छुपी हो।
स्कूटर आँगन में रोककर उसने धीरे से घर का दरवाज़ा खोला।
“माँ… मैं आ गई,” उसने आवाज़ लगाई।
रसोई से कल्याणी की आवाज़ आई—
“आ गई बेटा? पहले फ्रेश हो जाओ, फिर आना।”
किमाया अपने कमरे में चली गई। ठंडे पानी से मुँह धोकर और कपड़े बदलकर जब वह कुछ देर बाद रसोई में आई, तो वहाँ एक प्यारा-सा घरेलू दृश्य था।
कल्याणी चूल्हे पर रात का खाना बना रही थीं।
शांति देवी पास में खड़ी बर्तन साफ कर रही थीं।
किमाया तुरंत सिंक के पास आई और प्लेटें निकालकर मेज़ पर लगाने लगी।
शांति देवी ने तुरंत रोक दिया—
“अरे बेटा, अभी-अभी ऑफिस से आई हो। पहले थोड़ा आराम कर लो। कुछ खा लो।”
किमाया मुस्कुराई—
“दादी, काम करने से ही तो आराम मिलता है।”
कल्याणी ने मज़ाक में कहा—
“मम्मीजी, आजकल की लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं। इन्हें बस अपने फिगर की पड़ी रहती है। ज़रा सा खा लिया तो लगेगा मोटी हो जाएँगी।”
शांति देवी ने हल्की हँसी के साथ कहा—
“अरे बेटा, पतले बदन से थोड़ा भरा हुआ शरीर ही अच्छा लगता है।”
किमाया ने तुरंत हँसते हुए जवाब दिया—
“दादी, उसे भरा हुआ नहीं… मोटा कहते हैं।”
कल्याणी ने सिर हिलाते हुए कहा—
“आजकल के बच्चों से बहस करना ही बेकार है।”
तभी दरवाज़े की आवाज़ आई। रोहन घर में घुसा—बैग कंधे पर और हाथ में मोबाइल।
वह अपने दोस्तों से फोन पर अभी भी मैच की बात कर रहा था—
“अरे यार, अगले मैच में मैं ओपनिंग ही करूँगा… हाँ हाँ, वही स्ट्रेट ड्राइव वाला शॉट…”
किमाया ने उसे देखते ही पूछा—
“तो जनाब, आज का मैच कैसा रहा?”
रोहन ने जल्दी से जवाब दिया—
“ठीक था… 17 बॉल में 24 रन बनाए। एक कैच और एक रन-आउट भी किया। टीम जीत गई।”
“वाह!” किमाया खुश होकर बोली।
रोहन ने बस मुस्कुरा कर सिर हिलाया और सीधे अपने कमरे में चला गया।
किमाया ने तुरंत माँ और दादी की ओर मुड़कर कहा—
“आपको पता है, आज रोहन की वजह से टीम जीती है!”
कल्याणी गर्व से मुस्कुराईं।
कल्याणी ने आवाज़ लगाई—
“रोहन! इधर आओ, पहले कुछ खा लो।”
रोहन वापस आया और टेबल पर बैठ गया। कल्याणी ने उसके सामने नाश्ता रख दिया।
साथ ही उन्होंने किमाया से कहा—
“और तुम भी बैठो। कुछ खा लो।”
“माँ, मुझे भूख नहीं है,” किमाया बोली।
“थोड़ा सा तो खा लो,” कल्याणी ने प्यार से ज़ोर दिया।
किमाया आखिर मान गई।
रोहन खाते-खाते भी मोबाइल पर अपने दोस्तों से अगले मैच की योजना बना रहा था।
कल्याणी ने तुरंत टोका—
“रोहन, खाने के समय मोबाइल पर बात मत किया करो।”
“ओके माँ,” उसने मोबाइल नीचे रख दिया।
जल्दी-जल्दी नाश्ता खत्म किया और फिर कमरे में चला गया।
अब रसोई में फिर तीनों महिलाएँ मिलकर रात के खाने की तैयारी करने लगीं।
कल्याणी सब्ज़ी में तड़का लगा रही थीं।
किमाया रोटियाँ बेल रही थी।
शांति देवी दाल के लिए मसाले तैयार कर रही थीं।
बातों-बातों में समय कब निकल गया, पता ही नहीं चला।
रात 9:30 बजे सब लोग डाइनिंग टेबल पर इकट्ठा हुए।
राजेश भी कोर्ट से लौट चुके थे।
सबके सामने गरम-गरम खाना परोसा गया—दाल, सब्ज़ी, रोटी और चावल।
खाना शुरू होते ही बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया।
राजेश ने पूछा—
“आज सबका दिन कैसा रहा?”
रोहन तुरंत बोला—
“पापा, आज हमारा मैच था और हम जीत गए!”
राजेश मुस्कुराए—
“अच्छा! फिर तो आज टीम को पार्टी देनी पड़ेगी।”
किमाया ने अपने ऑफिस की मीटिंग के बारे में बताया।
कल्याणी ने फिर कहा—
“और आज हम बागान भी गए थे। मजदूरों से बात हुई और मैंने अकाउंट की फाइल भी ले आई है।”
राजेश ने सिर हिलाया—
“अच्छा किया। कल बैठकर देखते हैं।”
शांति देवी बस सबको सुनती हुई मुस्कुरा रही थीं।
खाना खत्म होते ही राजेश और रोहन टीवी के सामने बैठ गए।
रोहन तुरंत स्पोर्ट्स चैनल लगा बैठा।
“पापा, देखिए यह शॉट,” वह उत्साह से बोला।
उधर घर की महिलाएँ फिर रसोई में व्यस्त हो गईं—
बर्तन धोना, खाना समेटना, सब कुछ व्यवस्थित करना।
जब काम खत्म हुआ, तब कल्याणी, शांति देवी और किमाया आँगन में निकल आईं।
रात की हवा ठंडी और सुकूनभरी थी। ऊपर आकाश में असंख्य तारे चमक रहे थे।
तीनों धीरे-धीरे टहलने लगीं।
कभी घर की बातें, कभी रिश्तेदारों की चर्चा, कभी वीकेंड की पिकनिक का उत्साह।
कुछ देर बाद जब वे वापस घर के भीतर आईं, तो देखा—
राजेश और रोहन दोनों अपने-अपने कमरों में जा चुके थे।
घर में फिर वही गहरी शांति उतर आई।
किमाया ने माँ और दादी को “गुड नाइट” कहा और अपने कमरे में चली गई। कमरे की लाइट हल्की थी, खिड़की से आती चाँदनी कमरे के फर्श पर फैल रही थी।
तभी उसकी जेब में रखा मोबाइल वाइब्रेट करने लगा।
उसने मोबाइल निकाला और स्क्रीन देखी… वही नाम।
किमाया हल्के से मुस्कुराई और बिस्तर पर बैठकर चैट खोल ली।
वह:
“लगता है मैडम आज बहुत बिज़ी थीं।”
किमाया:
“हाँ… और कोई इंतज़ार भी कर रहा था चाय के लिए।”
वह:
“अरे! मैं तो बस चाय पीने आया था।”
किमाया:
“हाँ हाँ… मुझे पता है। चाय बहाना था।”
वह:
“तो असली वजह क्या थी?”
किमाया:
“तुम ही बताओ।”
कुछ सेकंड टाइपिंग दिखती रही।
वह:
“शायद… तुम्हारे साथ थोड़ी देर बातें करने का मन था।”
किमाया ने हल्की हँसी के साथ रिप्लाई किया—
“अच्छा? तो अब रोज़ चाय पीनी पड़ेगी।”
वह:
“अगर साथ तुम्हारा हो तो रोज़।”
किमाया ने तुरंत छेड़ा—
“इतनी जल्दी फ्लर्ट मत करो।”
वह:
“अरे नहीं, मैं तो बहुत शरीफ हूँ।”
किमाया:
“हाँ, आज देखा था कितने शरीफ हो।”
वह:
“क्या देखा?”
किमाया:
“जब चायवाले अंकल ने पूछा – ‘दो कप?’ तो तुमने बिना पूछे हाँ कह दिया।”
वह:
“अरे, मुझे पता था तुम मना नहीं करोगी।”
किमाया:
“इतना कॉन्फिडेंस?”
वह:
“तुम्हें समझना मुश्किल नहीं है।”
किमाया ने एक स्माइली भेज दी।
फिर बात धीरे-धीरे घर की ओर मुड़ गई।
वह:
“तुम्हारा परिवार बहुत प्यारा लगता है।”
किमाया:
“हाँ… दादी बहुत स्वीट हैं। और माँ… मेरी बेस्ट फ्रेंड।”
वह:
“और भाई?”
किमाया:
“क्रिकेट का पागल।”
दोनों हँसते रहे।
लगभग एक घंटा ऐसे ही हँसी-मजाक और एक-दूसरे की टाँग खींचने में निकल गया।
आखिर में उसने लिखा—
“अब सो जाओ, नहीं तो कल ऑफिस में सोती रहोगी।”
किमाया:
“तुम भी सो जाओ।”
वह:
“गुड नाइट।”
किमाया:
“गुड नाइट… और हाँ… कल चाय?”
वह:
“पक्का।”
किमाया मुस्कुराते हुए फोन बंद कर बिस्तर पर लेट गई।
उधर शांति देवी अपने कमरे में आ चुकी थीं।
उन्होंने अलमारी से भगवान की छोटी-सी किताब निकाली और बिस्तर पर बैठकर पढ़ने लगीं।
धीरे-धीरे उनकी आँखें भारी होने लगीं।
करीब दस मिनट बाद उन्होंने किताब बंद की, भगवान को प्रणाम किया और सो गईं।
रोहन तो मैच की थकान से पहले ही गहरी नींद में डूब चुका था।
उसके कमरे में अभी भी क्रिकेट बैट दीवार से टिकाकर रखा था।
राजेश अपने कमरे में कल्याणी का इंतज़ार कर रहे थे। जैसे ही कल्याणी रसोई का काम निपटाकर कमरे में आई, राजेश ने किताब एक तरफ रख दी।
"कल्याणी, आज जब मैं कोर्ट में था, तब भी सोच रहा था कि तुम घर, बच्चे, और मेरा बागान कितनी बखूबी संभालती हो। सच में, तुम इस घर की नींव हो," राजेश ने उसके करीब आते हुए कहा।
कल्याणी ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा, "और आप इस घर की छत। छत मज़बूत न हो, तो दीवारें क्या करेंगी?"
राजेश ने बड़े प्यार से कल्याणी को अपनी बाहों में भर लिया। थकान के बावजूद दोनों के बीच एक गहरा आकर्षण उमड़ रहा था। राजेश के हाथ कल्याणी के बदन पर थिरकने लगे। उन्होंने बड़े अधिकार और प्रेम के साथ कल्याणी के स्तनों को स्पर्श किया और उन्हें जोर से दबाया। कल्याणी के मुँह से एक हल्की सी 'आह' निकली—वह दर्द तो था, पर उस दर्द में एक मीठी उत्तेजना और समर्पण की महक थी। कल्याणी का रोम-रोम जाग उठा। उसने राजेश को ज़ोर से गले लगा लिया (Hug) और दोनों एक लंबे, गहरे और भावुक चुंबन में खो गए। कमरा उनकी गर्म साँसों और आपसी प्रेम की खुशबू से भर गया।
कुछ देर बाद, जब दोनों शांत हुए, तो राजेश ने धीरे से कहा, "कल्याणी, आज मन कर रहा है कि थोड़ी व्हिस्की हो जाए।"
कल्याणी ने प्यार से उनके गाल को छुआ और कहा, "नहीं, आज आप बहुत थके हुए हैं। कल पक्का पी लेना, मैं मना नहीं करूँगी।"
राजेश: "ठीक है, पर कल तुम्हें मेरी कंपनी देनी होगी।"
कल्याणी: "आप मुझे सच में बिगाड़ देंगे! खैर, ठीक है... पर कल आते वक्त मेरे लिए एक चिल्ड बियर लेते आना। और हाँ, कल रात के डिनर में मैं आपकी पसंद का 'कुर्गी नॉन-वेज' बनाऊँगी।"
राजेश ने मुस्कुराकर सहमति दी। कल्याणी अब राजेश के चौड़े सीने पर अपना सिर रखकर लेटी हुई थी। दोनों के बीच अभी भी धीमी आवाज़ में कल की ट्रिप और बच्चों के भविष्य को लेकर बातें चल रही थीं। धीरे-धीरे कल्याणी की आँखें भारी होने लगीं और वह राजेश की छाती पर ही सो गई।
राजेश ने उसके सिर पर बड़े दुलार से हाथ फेरा और छत की ओर देखते हुए सोचा, "मैं कितना खुशकिस्मत हूँ कि मुझे इतनी ज़िम्मेदार और प्यार करने वाली पत्नी मिली।" इसी सुखद अहसास के साथ, राजेश भी गहरी नींद की आगोश में समा गए। 'अनंत शांति निवास' अब पूरी तरह से 'अनंत शांति' में डूबा हुआ था।
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भाईलोग कहानी को आगे बढ़ाने के लिए तुम्हारे सजेशन और कमेंट्स की जरूरत है। कहानी बहुत स्लो रहेगी।
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सुबह के 6:30 बजे कमरे में रखी अलार्म घड़ी की हल्की-सी ट्रिन… ट्रिन… की आवाज़ गूँज उठी।
“अनंत शांति निवास” की एक नई सुबह शुरू हो चुकी थी।
कल्याणी ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। कुछ पल तक वह वैसे ही लेटी रही, फिर हाथों से आँखें मलते हुए उठकर बैठ गई। कमरे की खिड़की से आती हल्की सुनहरी रोशनी कमरे में फैल रही थी।
उसे अचानक पिछली रात की बातें याद आ गईं—
राजेश की प्यार भरी बातें, उसका स्नेहिल स्पर्श और उसकी सच्ची प्रशंसा।
वह सब याद करते ही कल्याणी के चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आ गई। उसके मन में एक गहरी संतुष्टि थी।
उसने मन ही मन सोचा—
“सच में… मैं कितनी खुशकिस्मत हूँ।”
बिस्तर से उठने से पहले उसने आँखें बंद कीं और धीरे से भगवान का नाम लिया।
फिर उसकी नज़र बगल में सो रहे राजेश पर पड़ी।
राजेश अभी भी गहरी और निश्चिंत नींद में थे। उनके चेहरे पर वही शांत भाव था जो एक संतुष्ट इंसान के चेहरे पर होता है।
कल्याणी हल्के से झुकी और उनके गाल पर एक प्यार भरी पप्पी दे दी।
फिर धीरे-धीरे उनके बालों पर हाथ फेरते हुए मन ही मन सोचने लगी—
“मैं सच में कितनी भाग्यशाली हूँ…
इस दुनिया में कितने लोग अपनी पत्नी को बस एक जिम्मेदारी समझते हैं।
लेकिन राजेश… वह हर पल मुझे यह एहसास दिलाते हैं कि मैं उनके लिए कितनी खास हूँ।”
कुछ पल वह ऐसे ही उन्हें देखती रही।
फिर उसने अलमारी खोली, अपनी साड़ी और बाकी कपड़े निकाले और बिस्तर पर रख दिए।
इसके बाद वह नहाने के लिए वॉशरूम चली गई।
जब वह 20 मिनट बाद वॉशरूम से बाहर आई, तो नज़ारा कुछ और ही था। कल्याणी सिर्फ एक तौलिए में लिपटी हुई थी। उसके गीले बाल कंधों पर बिखरे थे और पानी की नन्हीं बूंदें उसके बदन से फिसलकर तौलिए की परतों में समा रही थीं। कमरे की ठंडी हवा में नहाने के साबुन की भीनी महक घुली हुई थी।
राजेश की आँखें खुलीं, तो सामने अपनी पत्नी के इस नैसर्गिक रूप को देखकर उनकी नींद कहीं काफूर हो गई।
राजेश: "गुड मॉर्निंग, जानू।" (उनकी आवाज़ में रात की खुमारी अभी भी बाकी थी)।
कल्याणी: (मुस्कुराते हुए) "गुड मॉर्निंग, बाबू।"
राजेश की नज़रें कल्याणी के भीगे बदन, उसके खुले गोरे कंधों और तौलिए से बाहर झलकती उसकी सुडौल जांघों पर ठहर गईं। एक मर्द के लिए उसकी पत्नी का शरीर कभी पुराना नहीं होता; वह हर रोज़ एक नई किताब की तरह लगता है।
राजेश: "ज़रा पास तो आओ..." (उन्होंने अपनी चादर हटाते हुए शरारत भरी नज़रों से उसे देखा)।
कल्याणी: "मैं जानती हूँ ये पास बुलाना किसलिए है। पर अभी नहीं, बहुत काम है बाबा!"
राजेश ने बच्चों जैसा मुँह बनाया, "शादी से पहले लगता था कि पत्नी अपनी होगी, पर यहाँ तो 'अपॉइंटमेंट' लेना पड़ता है। ज़माने भर का ख्याल है, बस इस गरीब पति के लिए वक्त नहीं।"
कल्याणी हँस पड़ी, पर जैसे ही वह अपनी साड़ी उठाने के लिए मुड़ी, उसने देखा कि राजेश ने चादर हटा दी थी और अपनी जागृत उत्तेजना को धीरे-धीरे सहला रहे थे।
कल्याणी: (थोड़ा शर्माते हुए) "शर्म करो! दो जवान बच्चों के बाप हो, सुबह-सुबह ये क्या शुरू कर दिया?"
राजेश: (मज़ाकिया अंदाज़ में) "मरीज़ की हालत खराब है डॉक्टर साहिबा! और इसका इलाज तो बस आपके पास है, पर आप हैं कि ड्यूटी जॉइन ही नहीं कर रहीं।"
कल्याणी का मन भी राजेश की इस मासूम ज़िद और उनके पौरुष के आगे पिघलने लगा। उसे अहसास हुआ कि राजेश का यह आकर्षण ही तो उनके रिश्ते की ताज़गी है। उसने साड़ी वापस बेड पर रखी और धीरे से राजेश के पास बैठ गई।
राजेश: "इलाज नहीं सही, तो कम से कम 'नर्स'ही कुछ मदद कर दे।"
कल्याणी ने एक शरारती मुस्कान के साथ उनकी आँखों में झाँका। उसे अपने पति की इच्छा का मान रखना बखूबी आता था।
कल्याणी: "ठीक है... पर ध्यान रहे, ये नर्स सिर्फ आपकी 'पट्टी' (Masturbation) करेगी। अगर पूरा 'ऑपरेशन' (Sex) करवाना है, तो रात तक का इंतज़ार करना पड़ेगा। मंज़ूर है?"
राजेश की आँखों में चमक आ गई, "पूरी तरह मंज़ूर है!"
कल्याणी ने धीरे से अपना कोमल हाथ राजेश के पुरुषत्व के ऊपर रखा और अपनी कलाइयों के हुनर से उनकी उत्तेजना को सहलाने लगी। राजेश ने अपनी आँखें मूँद लीं और एक लंबी गहरी साँस ली। कल्याणी की उंगलियों का वह जादुई स्पर्श राजेश के शरीर में बिजली की तरह दौड़ रहा था। कमरे में सिर्फ उनकी भारी होती साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। कल्याणी ने बड़े ही सलीके और प्यार से राजेश को उस चरम सुख की ओर पहुँचाया, जो एक पुरुष अपनी अर्धांगिनी से चाहता है।
कुछ ही पलों में राजेश के शरीर में एक थरथराहट हुई और उन्होंने असीम शांति का अनुभव किया। कल्याणी ने उन्हें धीरे से चूमा और उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "अब खुश? अब डॉक्टर को ड्यूटी पर जाने दें?"
राजेश ने उसे ज़ोर से अपनी बाहों में भींच लिया, "तुम वाकई में दुनिया की सबसे अच्छी डॉक्टर और नर्स दोनों हो।"
कल्याणी मुस्कुराई, अपना तौलिया सँभाला और जल्दी-जल्दी नहाने के लिए वॉशरूम चली गई । बाहर आई तैयार होने लगी। 'अनंत शांति निवास' में सुबह का यह निजी अध्याय अब समाप्त हो चुका था और अब ज़िम्मेदारियों का दिन इंतज़ार कर रहा था।
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शांति देवी पहले ही उठकर देवघर में पूजा की तैयारी कर रही थीं। पीतल के दीये में घी डालकर बाती सुलगा रही थीं। अगरबत्ती की हल्की सुगंध पूरे घर में फैल रही थी।
तभी उनकी नज़र दरवाज़े पर खड़ी कल्याणी पर पड़ी।
भीगे बाल, हल्की थकान, और चेहरे पर एक अलग-सी चमक…
शांति देवी के होंठों पर एक नटखट-सी मुस्कान आ गई।
उनकी आँखों में जैसे एक हल्की शरारत थी—
जैसे उन्हें सब समझ में आ गया हो कि बहू आज थोड़ी देर से क्यों आई है।
आ गई बहू? आज तो पूजा की थाली तैयार करने में मुझे भी थोड़ा ज़्यादा समय लग गया... और लगता है तुझे भी कुछ 'ज़रुरी कामों' ने रोक लिया था।" और एक हल्की मुस्कान दी।
कल्याणी ने तुरंत नज़रें झुका लीं।
उसके चेहरे पर हल्की-सी लाज उतर आई।
“माँजी…” बस इतना ही कह पाई और जल्दी से रसोई की ओर बढ़ गई।
पीछे से शांति देवी मन ही मन मुस्कुराईं—
“शांति देवी उसे जाते देख मन ही मन खुश हो रही थीं कि उनके बेटे और बहू के बीच आज भी वही पहले जैसा प्रेम बना हुआ है।…”
रसोई में किमाया पहले से ही काम में लगी हुई थी।
तवे पर कुछ हल्का-सा सेंक रही थी और चाय भी चढ़ा रखी थी।
कल्याणी अंदर दाखिल हुई, जैसे ही उसने कल्याणी को देखा, किमाया ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और अपनी हंसी को दबाने की नाकाम कोशिश की। उसके चेहरे पर भी एक शरारती मुस्कान आ गई।
वह अपनी हँसी रोकने की कोशिश कर रही थी, पर आँखें सब बयां कर रही थीं।
“मम्मी…” उसने धीरे से कहा,
“आप जाओ, मैं संभाल लूँगी ब्रेकफास्ट।” आप बस जाकर आराम कीजिए।"
कल्याणी ने थोड़ा सख्त, पर प्यार भरे अंदाज़ में कहा—
“(हड़बड़ाते हुए) "अरे नहीं-नहीं, तू हट! तुझे अभी ऑफिस जाना है। इतनी सुबह-सुबह रसोई में मेहनत करेगी, तो ऑफिस में जाकर नींद आएगी। ला, मुझे दे।”
किमाया ने मुस्कुराकर जवाब दिया—
फिर वह थोड़ा पास आई, कल्याणी के चेहरे को ध्यान से देखते हुए बोली—
“(मम्मी के गले में हाथ डालते हुए)उसने हल्के से छेड़ते हुए कहा— "मम्मी, एक दिन से कुछ नहीं होता। और सच कहूँ... तो आप आज कुछ ज़्यादा ही थकी हुई लग रही हैं। चेहरे पर तो थकान है, पर आँखों में बहुत चमक है। क्या बात है?”
“और वैसे भी… आप ही तो रोज़ इतना काम करती हो।”
और फिर एक नॉटी स्माइल दे दी।
कल्याणी तुरंत समझ गई कि बेटी क्या इशारा कर रही है।
“किमाया!” उसने हल्के से डाँटते हुए कहा,
“ज़्यादा स्मार्ट मत बनो।” जा जाकर तैयार हो जा।
किमाया हँस पड़ी— (चुटकी लेते हुए) "मैं तो जा रही हूँ मम्मा, पर अगली बार 'अपॉइंटमेंट' थोड़ा जल्दी फिक्स किया कीजिए, ताकि ब्रेकफास्ट लेट न हो!" मैं तो बस आपकी चिंता कर रही हूँ।”
फिर धीरे से बोली—
“मम्मी, मज़ाक अपनी जगह है, पर मैं सच कह रही हूँ। आप इस घर के लिए, पापा के लिए और हम सबके लिए इतनी मेहनत करती हैं कि कभी-कभी अपना ख्याल रखना ही भूल जाती हैं। पापा लकी हैं कि उन्हें आप मिलीं, और मैं लकी हूँ कि आप मेरी माँ के साथ-साथ मेरी बेस्ट फ्रेंड भी हैं।"”
उसकी आवाज़ में मज़ाक भी था और सच्चा प्यार भी।
कल्याणी की आँखों में ममता भर आई। उसने किमाया का माथा चूमा और बोली, "यही प्यार तो मेरी सारी थकान मिटा देता है बेटा। जब परिवार में इतना सुकून हो, तो मेहनत, मेहनत नहीं लगती।"
उसने किमाया के सिर पर हल्के से हाथ फेरा—
“पगली… माँ का ख्याल बच्चे नहीं रखते, माँ ही बच्चों का ख्याल रखती है।”
किमाया ने तुरंत जवाब दिया—
“तो आज रोल रिवर्स हो गया है।”
दोनों हँस पड़ीं।
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