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निर्णय
खिड़की के पास बैठी आशा कॉफ़ी पीते हुए दूर क्षितिज की ओर देख रही थी; उसकी माँ नीर को ले कर बगल में कहीं गई हुई थी. आशा के पिताजी भी रोज़ की तरह ही अपने रिटायर्ड दोस्तों से मिलने शाम को निकल जाया करते थे --- खुद भी रिटायर्ड और दोस्त भी ----- मस्त महफ़िल जमती थी सबकी.
घर में रह गई अकेली आशा ‘सिरररप सिरररप’ से कॉफ़ी की चुस्कियाँ ले रही और किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी....
‘क्या करूँ... ऐसी बेहूदगी भरा ऑफर... पिता के उम्र के होकर भी शर्म नहीं आई उन्हें. ये मर्दजात ऐसे क्यों होते हैं? क्यों हमेशा हम महिलाओं को, लड़कियों को बिस्तर पर लाने का सोचते हैं? इतनी ठरक क्यों होती है इनमें? क्या इनकी ठरक के लिए भी हम ज़िम्मेदार हैं? क्या हमारी कुछ आदतें, कुछ तरीके ही इनमें ठरक जगाने का, इनके ठरक में आग लगाने का काम करती हैं?’
तभी आशा को कुछ याद आया...
याद आया कि रणधीर बाबू के साथ बात करते समय कैसे उसका पल्लू उसके सीने से हट गया था… और, और उस समय कैसे रणधीर बाबू आँखें झपकना क्या, अपनी लार गटकना तक भूल गए थे. ये सीन याद आते ही आशा 'ही ही' करके हँस पड़ी. पर तुरंत ही खुद को सँभाल ली; कोई देखेगा तो क्या सोचेगा…?
मन घृणा से भरा हुआ था उसका.
सोच रही थी,
‘कैसी विचित्र दुनिया है--- थोड़ी हमदर्दी के बदले क्या-क्या नहीं माँगा जाता. अब तो सवाल ही नहीं उठता की मैं उनके पास जाऊँ…. कितना नीच है…. साला.’
‘साला’ शब्द मन में आते ही सिर को दो-तीन झटके देकर हिलाई….
‘हे भगवान ! ये क्या अनाप शनाप बोल रही हूँ मन ही मन --- उफ्फ्फ़ --- इस आदमी ने तो मूड और दिमाग के साथ साथ मन को भी मैला कर दिया है — धत्त…’
कप प्लेट धो कर रख देने के बाद आशा घर के दूसरे कामों में लग गई; रणधीर बाबू की बातों को लगभग भूल ही चुकी थी वह.
अचानक से उसका ध्यान टेबल पर रखे तीन-चार एप्लिकेशन फॉर्म पर गया. 3 - 4 कॉलेज के एडमिशन फॉर्म थे वह सब. नीर के लिए --- पर उन कॉलेजों की फ़ीस इतनी ज़्यादा थी कि आशा की हिम्मत ही जवाब दे गई थी. हालाँकि उसके पापा के पास पैसे तो बहुत हैं और देने के लिए भी राज़ी थे पर आशा को यह पसंद नहीं था कि उसके रिटायर्ड पापा उसके बेटे के कॉलेज के खर्चों का निर्वहन करें.
उन सभी फॉर्म को हाथों में लिए सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई. नीर को किसी बढ़िया कॉलेज में एडमिशन कराने की इच्छा एकबार फिर से हिलोरें मार कर मन की सीमाओं से पार जाने लगीं. अच्छे-अच्छे यूनिफार्म पहना कर कॉलेज भेजने की, रोज़ स्वादिष्ट टिफ़िन बना कर नीर का लंच बॉक्स तैयार करने की, उसे बस स्टॉप तक छोड़ने जाना या फ़िर हो सके तो ख़ुद ही कॉलेज ले जाना और ले आना ; ये सभी पहले दम तोड़ चुकीं हसरतें एकबार फ़िर से जिंदा होने लगीं.
उन्हीं फॉर्म्स में से एक फॉर्म पर नज़र ठिठकी उसकी;
फॉर्म के टॉप पर एक नाम प्रिंट था;
************************** कॉलेज
थोड़े बहुत बदलाव के साथ इस नाम के 4 कॉलेज हैं पूरे शहर में और चारों ही सिर्फ़ एक ही आदमी के थे….
‘रणधीर सिन्हा… उर्फ़…. रणधीर बाबू!!’
एकेडमिक के हिसाब से चारों ही कॉलेज बहुत ही अच्छे हैं और नीर के लिए भी बहुत ही अच्छे रहेंगे ये कॉलेज….
पर,
एडमिशन और एकेडमिक फीस में तो बहुत खर्चा है.
अतिरेक चिंता में आशा सिर पे हाथ रख कुर्सी के बैकरेस्ट पे पीठ सटा कर बैठ गई.
कुछ देर कई तरह के विचार उसके दिमाग में आते - जाते रहे. इन्हीं विचारों में एक विचार बचपन में पढ़े एक संस्कृत सुभाषितानि से याद किया हुआ था... 'जो माँ - बाप अपने बच्चों को साक्षर नहीं बनाते व उचित शिक्षा नहीं दिलाते वो अपने ही संतान के सबसे बड़े शत्रु होते हैं!'
इस एक विचार ने थोड़ी देर आशा को विचलित किए रखा... लेकिन फिर उसके बाद वो अचानक से सीधी हो कर बैठ गई.
‘कुछ भी हो, मैं नीर का एडमिशन एक अच्छे कॉलेज में करा कर ही रहूँगी.…(एक फॉर्म को उठाकर देखते हुए).... जॉब भी और एडमिशन भी.’
इतना बड़बड़ाने के तुरंत बाद ही,
आशा के दोनों आँखों से चार बूँद आँसू गिरे,
चेहरा थोड़ा कठोर हुआ उसका….
कुछ ठान लिया उसने….
अपने हैंडबैग से एक पेन निकाल लाई और फटाफट फॉर्म भरने लगी.
स्पष्टतः उसने एक ऐसा निर्णय ले लिया था जो आगे उसकी ज़िंदगी को बहुत हद तक बदल देने वाला था.
जारी है.....
……………………………..
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एक नए आरंभ का आरंभ!
अगले ही दिन,
नहा धो कर, अच्छे से तैयार होकर; माँ - बाबूजी का आशीर्वाद ले ऑटो से सीधे ****************** कॉलेज जा पहुँची ---- अर्थात रणधीर बाबू का कॉलेज!
रजिस्टर में नाम, पता और आने का उद्देश्य लिखने के बाद पेरेंट्स कम गेस्ट्स वेटिंग रूम में करीब आधा घंटा इंतज़ार करना पड़ा उसे.
पियून आया और,
“साहब बुला रहे हैं”
कहकर चला गया...
सोफ़ा चेयर के दोनों आर्मरेस्ट पर अपने दोनों हाथ टिकाए सीधी बैठ,
एक लंबी साँस छोड़ी और फिर उतनी ही लंबी साँस ली उसने...
फ़िर सीधी उठ खड़ी हुई और सधी चाल से उस कमरे से बाहर निकली --- उसको इस बात की ज़रा सी भी भनक नहीं लगी कि उस कमरे में ही दीवारों पर लगे दो छोटे सीसीटीवी कैमरों से उस पर नज़र रखी जा रही थी.
भनक लगती भी तो कैसे, पूरे समय किन्हीं और ख्यालों में खोई रही वह बेचारी.
पियून उसे लेकर सीढ़ियों से होता हुआ, एक लम्बी गैलरी पार कर एक कमरे के बंद दरवाज़े के ठीक सामने पहुँचा... बगल दीवार में लगी एक छोटी सी कॉल बेल नुमा एक बेल को बजाया --- २ सेकंड में ही अन्दर से एक मीठी सी बेल बजने की आवाज़ आई. अब पियून ने दरवाज़े को हल्का धक्का दिया और फिर उसे पूरा खोल कर ख़ुद साइड में खड़ा हो गया और अपने बाएँ हाथ से अन्दर की तरफ़ इशारा कर आशा से मौन अनुरोध किया; अंदर आने को --- आशा कँपकँपाए होंठ और काँपते पैरों से अन्दर प्रविष्ट हुई. उसका मन किसी अंजान हरकत को लेकर ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था.
अंदर एक बड़ी सी मेज़ की दूसरी तरफ़, रणधीर बाबू एक फ़ाइल को पढ़ने में डूबा हुआ था;
पियून ने एकबार बड़े अदब से ‘सर’ कहा...
फ़ाइल में घुसा रणधीर ने बिना सिर उठाए ही ‘म्मम्मम; हम्म्म्म..’ कहा.
आशा चेहरे पर शंकित भाव लिए सिर घुमा कर पीछे पियून की ओर देखी. पियून भी आशा को देखा और कँधे उचकाकर इशारे में ये बताने की कोशिश किया कि वह इससे ज़्यादा कुछ नहीं कर सकता है.
तब आशा ने ही अपने नर्वसनेस पर थोड़ा काबू पाते हुए अपनी आवाज़ को थोड़ा सख्त और ऊँचा करते हुए कहा,
“ग... गुड मोर्निंग सर…”
इस बार रणधीर ने फ़ाइल हाथों में लिए ही आँखें ज़रा ऊपर किया --- करीब 5-6 सेकंड्स आशा की ओर अपने गोल सुनहरे फ्रेम से देखता रहा. आँखों पर जैसे उसे भरोसा ही नहीं हो रहा हो. उसकी ड्रीमलेडी उसके सामने खड़ी है आज! --- अभी --- वही ड्रीमलेडी जो कुछ दिन पहले ही उसके घर से गुस्से से निकल आई थी उसका ऑफर सुनकर --- जिसके बारे में इतने दिनों से सोच-सोच कर, तन जाने वाले अपने बूढ़े लंड को मुठ मार कर शांत करता आ रहा था. आशा को सिर्फ़ सोचने भर से ही उसका बूढा लंड न जाने कैसे खुद ही, अभी-अभी जवानी के दहलीज पर पाँव रखने वाले किसी टीनएजर के लंड के माफ़िक टनटना कर, रणधीर बाबू के पैंट हो या लुंगी, उसके अंदर आगे की ओर तन जाया करता है --- सख्त - फूला – फनफनाता हुआ --- साँस लेने के लिए रणधीर बाबू के पैंट के अंदर से निकल आने को बेताब सा हो छटपटाने सा लगता लंड ऐसे पेश आता जैसे की उस समय अगर कोई भी महिला सामने आ जाए तो फ़िर चोद के ही उसका काम तमाम कर दे.
'ससुरी ये लंड चीज़ ही ऐसी है!'
इसी सनक में रणधीर बाबू ने न जाने इतने ही दिनों में कितनी ही हाई क्लास कॉल गर्ल्स - कॉल वाइव्स – एस्कॉर्ट्स और कितने ही वेश्याओं को रगड़-रगड़ कर चोद चुका था पर उसे वो सुख नहीं मिला जो उसे आशा के नंगे जिस्म को कल्पना मात्र करते हुए मुठ मारने में मिल रहा था.
और आज वही स्वप्नपरी उसके सामने उसी के ऑफिस में खड़ी है !
रणधीर बाबू के चश्मे का ग्लास हल्के भूरे रंग का था और कुछ दूरी पर खड़ा कोई भी शख्स इस बात को कन्फर्म कभी नहीं कर सकता कि रणधीर बाबू अगर उसे देख रहा है तो एक्सेक्ट्ली उसकी नज़रें हैं कहाँ ......
और यही हुआ आशा के साथ भी,
वो बेचारी ये सोच रही है की रणधीर बाबू उसे देख रहे हैं पर वास्तव में उनकी नज़रें सिर्फ़ और सिर्फ़ आशा के सामने की ओर उभर कर तने विशाल, पुष्ट चूचियों पर अटकी हुई हैं!
फ़ाइल के एक कागज़ को उसने इस तरह से भींच लिया मानो वो कागज़ न होकर आशा की वही पुष्ट, नर्म, गदराई चूचियों में से एक हो.
खैर,
खुद को तुरंत सँभालते हुए रणधीर बाबू ने अपना गला खँखारा और कहा,
"अरे! इतने दिन बाद… प्लीज हैव ए सीट…"
बड़ी होशियारी से रणधीर बाबू ने आशा का नाम नहीं लिया क्योंकि अगर उसने नाम लिया होता तो ‘आशा जी’ कह कर संबोधित करना पड़ता जोकि उसे पसंद नहीं था क्योंकि आशा ने पहले अपने तेवर दिखाते हुए उसे ‘ना’ कर चुकी थी और अगर उसने सिर्फ ‘आशा’ कहा होता तो इससे वहाँ उपस्थित पियून को ये शक हो जाता कि रणधीर बाबू इस औरत को पहले से जानते हैं और ये बात वो पियून दूसरों में फ़ैला देता जो बाद में एक बड़ी प्रॉब्लम हो सकती है.
आशा सामने की कुर्सी को सरका के बैठ गई.
पियून जाने - जाने को हो रहा था पर जा नहीं रहा देख कर, रणधीर बाबू ने आँखों के इशारों से पियून को वहाँ से जाने का आदेश दिया.
पियून सलाम ठोककर चला गया.
रणधीर बाबू ने कुछ देर यूँही मुस्करा कर, चेहरे पर रौनक वाली हँसी लिए आशा के साथ इधर - उधर की फोर्मालिटी वाली बातें करते रहे; पहुँचे हुए खिलाड़ी हैं वो ऐसे खेलों में --- अच्छे से जानते हैं की आशा अभी घबराई हुई है और अगर अचानक से ऐसी - वैसी कोई बात छेड़ी जाए तो बात शायद हद से अधिक बिगड़ जाए --- हालाँकि इस शहर में कोई माई का लाल है नहीं जो रणधीर बाबू से पंगा ले ले --- रही बात कॉलेज के लेडी टीचर्स की तो; जितनी भी लेडी टीचर्स हैं --- सब की सब रणधीर बाबू के बिस्तर तक का सफ़र पहले ही पूरी कर चुकी हैं.
आशा ने तिरछी नज़रों से पूरे रूम का जल्दी से मुआयना किया,
आलिशान रूम है रणधीर बाबू का....
चारों ओर सुंदर नक्काशी वाले मार्बल्स, ग्लास के प्लेट्स, खिड़की पर सुंदर गमलों में मनी प्लांट्स और ऐसे ही दूसरे प्लांट्स की मौजूदगी, कमरे में फैली एक मीठी, भीनी सी सुगंध... सब मिलकर माहौल को एक अलग ही ढंग दे रहे हैं.
टेबल पर रखे एक स्टैंड लैंप को ठीक करते हुए आशा की तरफ़ पैनी निगाह डालते हुए रणधीर बाबू ने पूछा,
"सो.... आर यू रेडी??"
"ऊंह...!"
आशा चिंहुकी... रणधीर बाबू की ओर सवालिया नज़रों से देखी और मतलब समझते ही लाज से आँखें झुका ली.....
आदतन, अपने पल्लू को थोड़ा ठीक की...
और उसके ऐसा करते ही,
रणधीर बाबू की नज़रें फ़िर से आशा के पुष्ट वक्षस्थल पर जा टिकीं जो पिछले कुछ दिनों से उसके आशा के प्रति आकर्षण का मुख्य केंद्र बिंदु रहा है
रणधीर बाबू के नज़रों का लक्ष्य समझने में देरी नहीं हुई आशा से...
और समझते ही तुरंत और भी ज़्यादा शर्मा गई…
रणधीर की अत्यंत वासना युक्त निगाहें….
और उन निगाहों से अंदर तक नहाती चली जाती आशा का सारा जिस्म का रक्त तो मानो स्वयं ही उत्तेजना का उफ़ान मारने लगा; उत्तेजना किस चीज़ का... नर्वस होने का, किसी अनहोनी का या फिर कामोत्तेजना का! चेहरे का सारा रक्त जैसे उसके गालों में इकट्ठा होकर उसके मुखरे को और भी गुलाबी बनाने लगा.
पता नहीं कैसे;
पर एक बाप के उम्र के आदमी के द्वारा खुद के यूँ मुआयना किए जाने से अब आशा के तन-मन में कुछ गुदगुदी होने लगी --- ख़ुद को ऐसे विचारों से घिरने से रोक तो रही थी अंदर ही अंदर; पर रह - रह कर मन में उठने वाले काम-तरंगों पर उसका कोई नियंत्रण रह ही नहीं पा रहा था.
"आई सेड, आर यू रेडी... आशा??" मेज़ पर अपने दोनों कोहनियों को टिका कर आशा की तरफ़ आगे की ओर झुकते हुए रणधीर बाबू ने पूछा.
यूँ तो दोनों के बीच दो हाथ से भी ज़्यादा की दूरी है, फ़िर भी आशा को ऐसा एहसास हुआ की जैसे रणधीर बाबू वाकई उसपर झुक गए हैं!
"ज..ज.. जी सर... आई एम रेडी."
"पूरी बात साफ़ साफ़ बोलो आशा..."
रणधीर बाबू ने अबकी बार थोड़ा कड़क और रौबीले अंदाज़-ओ-आवाज़ में कहा.
शर्म और डर का मिश्रित भाव चेहरे पर लिए, नज़रें नीचे कर के आशा दोबारा बोली,
"मैं तैयार हूँ आपके हर एक आदेश को बिना शर्त और बिना किसी रोक-टोक के, अक्षरशः पालन करने के लिए…"
"मैं यहाँ हूँ आशा --- यहाँ --- मेरी तरफ़ देखकर अभी-अभी कही गई बातों को दोहराओ." उसकी ऐसी स्थिति का और अधिक आनंद लेने के लिए रणधीर बाबू ने कहा.
'मादर...' मन ही मन आशा रणधीर बाबू को बहुत सुंदर - सुंदर कुछेक शब्दों से पुरस्कृत करने वाली थी लेकिन फ़िलहाल के लिए खुद पे कंट्रोल कर ली.
एक साँस छोड़ते हुए वो रणधीर बाबू की ओर देखी --- और दोहराई,
"सर, मैं, आशा मुखर्जी, तैयार हूँ आपके हरेक आदेश को बिना शर्त और बिना के रोक टोक के, अक्षरशः पालन करने के लिए."
रणधीर मुस्कराया...
आशा के शर्म और संकोच की दीवार में थोड़ी ही सही, पर आख़िरकार एक दरार डाल पाया... पर अभी भी उसे एक संदेह है की कुछ ही दिनों पहले गुस्सैल तेवर दिखाने वाली महिला अचानक से आज समर्पण क्यों कर रही है??
"ह्म्म्म, कुछ तो गड़बड़ है, दया." वह सोचा.
"आज यहाँ कैसे?" रणधीर बाबू ने पूछा.
काँपते लहजे में, गर्दन के पीछे जमते पसीने को बड़ी निपुणता से पल्लू से हटाते हुए आशा ने उत्तर दिया,
"सर, दो काम से आई हूँ... एक तो मुझे जॉब के लिए अप्लाई करना है और दूसरा, अपने बेटे का एडमिशन इसी कॉलेज में करवाना है."
"ओह! पर उस दिन तो सिर्फ़ जॉब के लिए आई थी?" चकित रणधीर ने तुरंत सवाल दागा.
"जी सर, नीर के लिए कोई बढ़िया कॉलेज नहीं मिल रहा और इस कॉलेज का काफी नाम है. इसलिए सोची कि अगर मेरा जॉब और उसका एडमिशन दोनों एक ही कॉलेज में हो जाएँ तो बहुत ही अच्छा होगा. वो नज़रों के सामने तो रहेगा, तो उसकी पढ़ाई और ओवरऑल एक्टिविटीज़ पर ध्यान दे सकूँगी."
"उसपे ध्यान देने के चक्कर में कहीं तुम्हारा काम प्रभावित हुआ तो?" ये सवाल रणधीर बाबू द्वारा पूछना बनता था.
"नहीं सर, आई प्रॉमिस. ऐसा कभी नहीं होगा… आई शैल मैनेज इट वैरी वेल." उतावलेपन पर थोड़ी दृढ़ता से जवाब दिया उसने.
"तुम्हें यहाँ जॉब चाहिए और तुम्हारे बेटे को एडमिशन और मेरा क्या…?" इस प्रश्न को अधूरा छोड़ते हुए रणधीर ने आशा की ओर मतलबी निगाहों से देखा.
"आप जो बोलें सर." आशा ने भी अस्पष्ट प्रत्युत्तर दिया.
"मेरा हर कहना मानोगी?" रणधीर बाबू ने एक सीधा, कंफर्म सवाल किया.
"जी सर… हर कहना मानूँगी."
रणधीर बाबू ने टेबल के दराज से एक सादा कागज़ निकाला और आशा की ओर बढ़ाते हुए कहा,
"इसमें अपना पूरा नाम, पता, मोबाइल नंबर लिख कर दो और साथ ही यह भी लिख कर दो कि तुम अपने पूरे होशोहवास में मेरा हर कंडीशन स्वीकार कर रही हो और जॉइनिंग के बाद से मेरा हर कहना मानोगी --- जब कहूँ --- जो कहूँ --- जैसा कहूँ."
इस पूरे "इंटरव्यू" की दशा और दिशा क्या होने वाली है और भविष्य में उसके लिए संभवतः क्या - क्या रखा हो सकता है ये सब एक क्षण में समझते देर नहीं लगी आशा को. इस कॉलेज में रणधीर बाबू के साथ उसका भविष्य किसी सिनेमा की भाँति उसी एक क्षण में उसकी आँखों में तैर -सा गया. सिहर उठी वह; लेकिन वो तो Every Possible Worst case Scenario के लिए तैयार हो कर ही आई थी... इसलिए अब आगे बिना कुछ सोचे कागज़ लपक कर ले ली और पेन निकाल कर वह सब लिख दी जो रणधीर बाबू ने अभी - अभी लिखने के लिए कहा.
सब लिखने के बाद कागज़ वापस दी.
रणधीर बाबू ने कागज़ पर लिखे एक-एक शब्द को बड़े ध्यान से पढ़ा और पढ़ने के बाद मुस्कराया.
आशा की ओर देखा और बोला,
"ह्म्म्म; ओके, पर यहाँ का इंटरव्यू तो देना पड़ेगा तुम्हें --- तैयार हो?"
"जी सर."
"पक्का??" रणधीर ने फ़िर सवाल किया
"जी सर." आशा ने वही जवाब दोहराया पर इस बार जवाब कुछ इस लहजे में दी जैसे की उसे थोड़ा - बहुत अंदाज़ा हो गया की क्या और कैसा "इंटरव्यू" अब शुरू होने वाला है.
रणधीर बाबू मुस्कराए --- अपने सीट पर ठीक से बैठे और एक हाथ पैंट के ऊपर से ही धीरे-धीरे सख्त हो रहे लंड को सहलाए.
"प्रॉमिस याद है न? और कागज़ पर खुद के लिखे एक-एक शब्द?"
"जी सर....’’ आशा झेंपते हुए आँखें नीची करके बोली.
आशा का यह जवाब सुनते ही रणधीर बाबू के चेहरे पर पहले से ही मौजूद मुस्कान अब और अधिक खिल गई और साथ ही साथ आँखों में टीनएजर्स जैसी उतावली एक अलग चमक आ गई.
उत्तेजना में लंड को दोबार ज़ोर से रगड़ दिया.
टेलीकॉम पे एक बटन प्रेस कर रिसेप्शन में ऑर्डर दिया,
"कैंसिल ऑल माय अपॉइंटमेंट्स --- नो गेस्ट्स --- नो पैरेंट्स --- नो पिओंस.नोबडी! ओके? इज़ दैट क्लियर??"
"यस सर—क्रिस्टल क्लियर!" दूसरी तरफ़ से किसी लड़की की मीठी सी आवाज़ आई.
कॉल डिसकनेक्ट कर आशा की ओर देखा अब रणधीर बाबू ने --- होंठों पर वही कुटिल मुस्कान वापस आ गई.
ज़िप खोला,
लंड निकाला,
और मसलने लगा --- टेबल के नीचे --- और आशा को इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं --- वैसे भी अंदाज़ा का करेगी क्या --- मन से तो वह रणधीर बाबू के आगे 'सरेंडर' कर ही चुकी है --- अब तो बस तन .................
"तो मिस आशा, इंटरव्यू शुरू करते हैं!!" चहकते हुए बोले, रणधीर बाबू.
जारी रहेगा.....
....................................................
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06-03-2026, 09:34 PM
(This post was last modified: 06-03-2026, 09:36 PM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
(06-03-2026, 12:47 AM)giffsmaster_pro Wrote: Hi guys have not read this story. Is the story has old man Tharki uncle type of story?
Don't read it, brother. What's there to read?
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07-03-2026, 06:09 AM
(This post was last modified: 07-03-2026, 06:25 AM by Lovecraft. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
Itna sundar aur bada update dene ke liye dhanyawaad.
(06-03-2026, 09:34 PM)The_Writer Wrote: ‘कैसी विचित्र दुनिया है--- थोड़ी हमदर्दी के बदले क्या-क्या नहीं माँगा जाता. अब तो सवाल ही नहीं उठता की मैं उनके पास जाऊँ…. कितना नीच है…. साला.’
halat aur majboori,, insaan se kya-kya nahi karwa deti hain!
kal jo Randhir ki sharton ki wajah se us par gussa ho rahi thi, aaj usi ke saamne surrender karne ko taiyaar ho gayi.
yah dekhna sach mein mazedaar hoga ki kis tarah se randhir babu Asha ka interview karte hain. mein to chahunga ke asha apna best de taki do chiz pura confirm karale 1. Job 2. Nir ka admission.
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उम्दा! बेहतरीन! शानदार!
रणधीर बाबू का ख़ुशी का ठिकाना नहीं के उनकी ड्रीमलेडी आखिरकार उनकी कंडीशंस को मान ही गई।।
जिस तरह से वह टेबल के नीचे अपना लंड मसल रहा है लगता नहीं यह कोई सामान्य इंटरव्यू जैसे होने वाली है;)
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Wow,,, wonderful updates. Ufff, I'm crazy excited for age jo bhi hone wala hai
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(02-03-2026, 02:17 PM)Lovecraft Wrote: Niceeee update but ho sake to thoda bada update diya karo,,, story aur iska narration itna mast h k...Yeh Dil Mange Moreeee
बड़ा अपडेट इसलिए नहीं देता क्योंकि अपडेट जितना बड़ा होगा; उसको पोस्ट करने में उतना दिन लग जायेगा.
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(01-03-2026, 02:27 AM)Bakchod Londa Wrote: आशा अब क्या करेगी? उसे जॉब किसी भी क़ीमत पे चाहिए। फ्लो–फ्लो में बोल गई रणधीर बाबू जो बोलेंगे वह सब करेगी। वैसे रणधीर बाबू ने ऐसा क्या शर्त रखा है कि आशा के सुनते ही होश उड़ गए,,,(थोड़ा उसका विवरण मिल जाता तो मज़ा आ जाता)
हालात इंसान से क्या कुछ नहीं करवा लेता है? देखते हैं, आगे क्या होता है…
(01-03-2026, 06:03 PM)Blackdick11 Wrote: randhir babu ke condition se agree hone matlab—Job to pakki, sath hi sexual harrasment bhi pakki. current situation aise h k use job ki bahut jarurat hai.
aise mein asha ke pass do hi raste h
—1. Swabhiman ke sath jeena aur is job ko manna karna( chances kam h)
2. compromise kar lena.
![[Image: IMG-20260301-165938.jpg]](https://i.postimg.cc/CL24j8kS/IMG-20260301-165938.jpg)
कहानी की नायिका स्वाभिमानी होती हुई भी एक ऐसी परिस्थिति में फँसी है जहाँ से वो निकल तो सकती है लेकिन आगे की राह कठिन हो जाएगी...
Btw, amazing pic... Loved it. Thanks.
(02-03-2026, 02:37 PM)Lovecraft Wrote: Kisi ki halat aur majburi ka fayda kese uthaya jaye koi randhir babu se sikhe...
बिल्कुल!
इस खेल का वो बहुत पुराना खिलाड़ी है.
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(06-03-2026, 10:31 PM)Loveakb18 Wrote: Nice update
(07-03-2026, 06:09 AM)Lovecraft Wrote: Itna sundar aur bada update dene ke liye dhanyawaad.
halat aur majboori,, insaan se kya-kya nahi karwa deti hain!
kal jo Randhir ki sharton ki wajah se us par gussa ho rahi thi, aaj usi ke saamne surrender karne ko taiyaar ho gayi.
yah dekhna sach mein mazedaar hoga ki kis tarah se randhir babu Asha ka interview karte hain. mein to chahunga ke asha apna best de taki do chiz pura confirm karale 1. Job 2. Nir ka admission.
देखते हैं, आगे क्या होता है? आशा पूर्ण समर्पण करती है या फिर से उसके अंदर कोई नया सिद्धांत जन्म लेता है?!
(07-03-2026, 02:23 PM)Bakchod Londa Wrote: उम्दा! बेहतरीन! शानदार!
रणधीर बाबू का ख़ुशी का ठिकाना नहीं के उनकी ड्रीमलेडी आखिरकार उनकी कंडीशंस को मान ही गई।।
जिस तरह से वह टेबल के नीचे अपना लंड मसल रहा है लगता नहीं यह कोई सामान्य इंटरव्यू जैसे होने वाली है;)
इंटरव्यू नहीं भी हो सकता है!
(08-03-2026, 12:07 PM)Blackdick11 Wrote: Wow,,, wonderful updates. Ufff, I'm crazy excited for age jo bhi hone wala hai
![[Image: 20260308115503.jpg]](https://i.postimg.cc/YS7GBJ5N/20260308115503.jpg)
Thanks a ton.
And also, thanks again for this amazing pic. Repo Added.
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इस अगले अपडेट को लिखने में थोड़ा टाइम लग सकता है. उम्मीद है की इस गुरूवार या शुक्रवार को अपडेट पोस्ट कर पाउँगा.
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(09-03-2026, 02:43 PM)The_Writer Wrote: इस अगले अपडेट को लिखने में थोड़ा टाइम लग सकता है. उम्मीद है की इस गुरूवार या शुक्रवार को अपडेट पोस्ट कर पाउँगा.
Koi baat nahi.
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(09-03-2026, 02:43 PM)The_Writer Wrote: इस अगले अपडेट को लिखने में थोड़ा टाइम लग सकता है. उम्मीद है की इस गुरूवार या शुक्रवार को अपडेट पोस्ट कर पाउँगा.
Update ki baat Thursday or Friday ki hui thi, dono hi aaje chale bhi gaye...
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Update 4:
स्त्री जीवन की यही विडंबना होती है... कभी कुछ चीज़ें इच्छा के अनुसार तो कभी कई चीज़ें इच्छा के विपरीत मिलती हैं. जो नहीं चाहिए होती है उसके मिलने पर एक शिकायत भाव तो रहता ही है, लेकिन हास्यास्पद बात तो तब होती है जब इच्छा के अनुसार चीज़ें मिल तो जाती हैं लेकिन उनमें भी शर्तें जुड़ जाती हैं. इसमें भी, कभी कोई चीज़ मिलने के बाद कोई शर्त लागू होती है तो कभी मिलने से पहले ही शर्तों को पूरा करना पड़ता है. ऊपर से, शर्त जितने अच्छे तरीके से पूरे होंगे, चीज़ें उतनी ही बढ़िया ढंग से मिलेंगे!
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19-03-2026, 11:41 AM
(This post was last modified: 19-03-2026, 02:33 PM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
भाग ४:-
बाँध का टूटना
साक्षात्कार....
कमरे में कुछ पलों तक सन्नाटा छाया रहा.
आशा नज़रें झुकाए चुपचाप बैठी रही…
और,
रणधीर बाबू पैंट की ज़िप खोल कर,
अंडरवियर से लंड निकाले उसे मसले जा रहे हैं...
आशा के लिए प्यार है ---- पर उससे भी कहीं.... कहीं ज़्यादा वासना भी है--- रणधीर बाबू के ठरकी बूढ़े दिल में.
सामने बैठी आशा के, मेज़ तक नज़र आने वाली शरीर के ऊपरी हिस्से को काफ़ी समय से देखे जा रहे थे रणधीर बाबू --- कल्पना कर रहे थे कि आशा का जिस्म मीठे पानी का कोई दरिया हो और ख़ुद को उस पानी से तर-बतर कर हों, बार-बार, हर बार.
आशा ने फ्लोरल प्रिंट हल्की नीली साड़ी पहन रखी है आज.
मैचिंग ब्लाउज --- आधी बाँह वाली --- बड़ा व खुले गले वाला ब्लाउज, जिससे की कंधे का काफ़ी हिस्सा सामने दिख रहा है --- ऊपर से डीप नेकलाइन ---- अंग्रेजी अक्षर ‘V’ वाली डीप कट है सामने से --- गले में एक नेकलेस भी है --- पतली सी, सोने की. गोरी-चिट्टी गले में सोने की चेन काम एवं सुंदरता; दोनों में अद्भुत रूप से वृद्धि कर रही है. सोने की वह चेन थोड़ी बड़ी है और इसी बात ने रणधीर बाबू को सोच में डाला,
‘काश यह चेन आशा की क्लीवेज तक जाए... आह!! मज़ा आ जाएगा!’
इतनी सी कल्पना मात्र से ही उनका लंड और अधिक सख्त हो गया! लंड की यह हालत देख कर ख़ुद रणधीर बाबू भी हैरान रह गए. इसे इतना सख्त और फनफनाता हुआ कभी नहीं पाया था उन्होंने --- ख़ुद की बीवी तो छोड़ ही दें, शहर की टॉप एक नंबर की हाई क्लास कॉल गर्ल/वाइफ/एस्कॉर्ट भी उनके हथियार की बढ़ती उम्र में ऐसी हालत आज से पहले नहीं कर पाई थीं!
इतना काफ़ी था रणधीर बाबू को यह भरोसा देने के लिए कि ‘आशा इज़ स्पेशल !’ और स्पेशल चीज़ों से डील करने में काफी, काफी माहिर हैं रणधीर बाबू.
नज़र फ़िर केन्द्रित किया आशा पर. पल्लू को बहुत सुंदर, बहुत सलीके से प्लेट्स बनाकर बाएँ कंधे से पिन की हुई है. दोनों भौहों के मध्य एक छोटी प्यारी हल्की नीली बिंदी है. माँग में सिंदूर नहीं दिख रहा!
रणधीर बाबू चौंके,
‘आश्चर्य! सिंदूर क्यूँ नहीं है?’
‘तो, क्या हस्बैंड नहीं रहे? नहीं, नहीं... ऐसा होता तो गले में नेकलेस नहीं होता. और तो और; शायद इतने अच्छे से बन ठन कर नहीं रहती और ना आती --- हम्म, शायद ये लोग अलग हो गये हैं --- या शायद ऐसा भी हो सकता है कि आजकल की दूसरी औरतों या टीवी-फिल्मों की हीरोइनों को देख कर बिन सिंदूर पतिव्रता नारी हो --- खैर, मुझे क्या, बस मुझे सुख दे दे --- बाद बाकी जो करना है, करे.’
बालों को पीछे गर्दन के पास से एक बड़ी क्लिप से सेट कर के लगाईं है और फिर उसके नीचे से बालों को खुला छोड़ दी है --- जो की टेबल फैन से आती हवा के कारण पूरे पीठ पर उड़-उड़ कर फ़ैल रहे हैं.
“आशा…” थोड़े सख्त लहजे में नाम लिया रणधीर बाबू ने.
“ज...जी.. सर…” आशा के होंठ कँपकँपाए.
“इंटरव्यू शुरू करने से पहले तुम्हें एक ज़रूरी बात बताना चाहता हूँ.” बातों का मोर्चा सँभाला ठरकेश्वर ने.
“ज.. जी सर... कहिए.” नर्वस आशा बस इतना ही बोल पाई.
“पता नहीं ऐसा हुआ है या नहीं पर मुझे तुम एक स्मार्ट, समझदार और बेहद रेस्पोंसिबल लेडी लगती हो और अभी तक, आई होप कि तुम समझ चुकी हो शायद की, अब जो इंटरव्यू होने वाला है --- वह बाकि के इंटरव्यूज़ से बिल्कुल अलग, बिल्कुल जुदा होने वाला है --- राईट??”
बिल्कुल सपाट शब्दों में चेहरे पर बिना कोई शिकन लिए रणधीर बाबू ने अपनी बात सामने रख दी और बोलते समय बिल्कुल एक ऐसे प्रोफेशनल की तरह बिहेव किए मानो ये उनका रोज़ का काम है.
इसमें कोई दो राय नहीं की आशा को अब तक ये नहीं समझ में आया है की इंटरव्यू कैसा होने वाला है --- क्या पूछा या करने को कहा जा सकता है --- क्या आज ही के दिन से उसके कोम्प्रोमाईज़ का काम शुरू होने वाला है? --- क्या जॉब अप्लाई/जॉइनिंग के दिन ही बिन ब्याही किसी की औरत बनने वाली है?
इन सभी सवालों को दिमाग से एक झटके में निकालते हुए बोली,
“जी सर... मैं समझ रही हूँ.” इस बार आवाज़ में थोड़ी बोल्डनेस लाने का प्रयास करते हुए बोली.
“ह्म्म्म... आई गिव माई वर्ड दैट, की जो कुछ भी होगा इस बंद कमरे में --- एवरीथिंग विल बी अ सीक्रेट बिटवीन यू एंड मी --- एक अक्षर तक बाहर नहीं जाएगी--- यू गेटिंग द पॉइंट; व्हाट आई मीन??”
“यस सर....” अपनी नियति स्वीकार कर चुकी आशा ने सिर्फ़ इतना कहना ही उचित समझा.
“गुड... वैरी गुड. (सब कुछ योजनानुसार होता देख रणधीर बाबू मन ही मन बल्लियों उछलने लगे) मेरा तो कुछ नहीं --- आई जस्ट वांट तो सी यू गेटिंग इनटू एनी काइंड ऑफ़ ट्रबल.”
“ज... जी.. जी सर... आई स्वेअर, कोई भी बात बाहर नहीं जाएगी.”
“ऑलराईट देन.” बड़ी, रेवोल्विंग चेयर पर पीठ टिका कर आराम से बैठ गये रणधीर बाबू, आशा की ओर एकटक देखते हुए --- और इधर आशा भी मन ही मन ख़ुद को समझाती, सँभालती, तैयार होने लगी.
“रणधीर बाबू के इंटरव्यू के लिए !”
कमरे में फ़िर कुछ पलों के लिए सन्नाटा छा गया...
“आशा…” रणधीर बाबू के धीर, स्थिर आवाज़ ने उस सन्नाटे को भंग किया.
“यस सर...?” आशा ने रणधीर बाबू की ओर देखकर जवाब दिया --- और उस आवाज़ में चरम उत्सुकता का पुट है.
“नर्वस हो?”
“न --- नो सर…” उत्सुकता थोड़ी और बढ़ी.
“यू आर अ यंग लेडी --- कम्पेयर्ड टू मी --- राईट?”
“य... यस सर.”
“ह्म्म्म... फ़िर भी मुझे कुछ फ़ील क्यूँ नहीं हो रहा?” धीरे ही सही, पर अब पॉइंट में आना शुरू हुए रणधीर बाबू.
“प-- प --- पता --- न-- नहीं सर.’ घबराने लगी बेचारी. जवाब देती भी तो क्या जवाब देती इस बात का कि 'कुछ फील क्यों नहीं हो रहा है?”
“मुझे पता है क्यों और ये भी कि क्या करने से कुछ अच्छा फ़ील हो सकता है!” होंठों पे एक घिनौनी मुस्कान लिए बोला वो शैतान.
“क... कहिए सर, क्या करने से अच्छा फ़ील होगा… आई विल ट्राई टू डू दैट.”
“ट्राई नहीं आशा, तुम्हें ट्राई नहीं करना है क्योंकि सिर्फ़ तुम्हीं कर सकती हो और तुम्हें करना ही होगा.” अपने पासे एक-एक कर फेंक रहा था वह हवसी.
“ओ... ओके सर.”
“अगर देखा जाए तो मैं ऑलरेडी तुम्हारा बॉस हूँ... राईट??”
“यस सर!”
“एंड बॉस इज़ ऑलवेज़ राईट.... राईट??”
“यस सर!”
“और हर एम्प्लोईज़ को बॉस की हर बात बिना रोक-टोक और ना-नुकुर के सुनना चाहिए; राईट ?!”
“बिल्कुल सर.”
“तुम भी मेरी हर बात को बिना कोई रोक-टोक और ना-नुकुर के सुनोगी और मानोगी. इसलिए नहीं की तुम मेरी एम्प्लोई हो वरन इसलिए की तुमने एक सादे कागज़ में लिख कर दिया है जोकि एक तरह का बांड है.”
“यस सर, बिल्कुल.”
“ह्म्म्म.”
एक शैतानी मुस्कान मुस्कराया वह ठरकी बुड्ढा. साफ़ था... जनाब अब कुछ ‘आउट ऑफ़ लीग’ बोलने वाले हैं.
जारी है....
…………………………………..
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(16-03-2026, 12:29 PM)Blackdick11 Wrote: Update ki baat Thursday or Friday ki hui thi, dono hi aaje chale bhi gaye...
Very Sorry.
बहुत बीमार पड़ गया था.
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(19-03-2026, 11:34 AM)The_Writer Wrote: Update 4:
स्त्री जीवन की यही विडंबना होती है... कभी कुछ चीज़ें इच्छा के अनुसार तो कभी कई चीज़ें इच्छा के विपरीत मिलती हैं. जो नहीं चाहिए होती है उसके मिलने पर एक शिकायत भाव तो रहता ही है, लेकिन हास्यास्पद बात तो तब होती है जब इच्छा के अनुसार चीज़ें मिल तो जाती हैं लेकिन उनमें भी शर्तें जुड़ जाती हैं. इसमें भी, कभी कोई चीज़ मिलने के बाद कोई शर्त लागू होती है तो कभी मिलने से पहले ही शर्तों को पूरा करना पड़ता है. ऊपर से, शर्त जितने अच्छे तरीके से पूरे होंगे, चीज़ें उतनी ही बढ़िया ढंग से मिलेंगे!
Life m kuch v bina keemat ya shart ke nahi milta bas farq itna hai ki kabhi keemat pehle chukani padti hai, kabhi baad mein....
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(19-03-2026, 03:50 PM)Blackdick11 Wrote: Life m kuch v bina keemat ya shart ke nahi milta bas farq itna hai ki kabhi keemat pehle chukani padti hai, kabhi baad mein....
100% सत्य!
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19-03-2026, 09:28 PM
(This post was last modified: 20-03-2026, 03:32 PM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
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Wonderful update...
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