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Adultery Compromise...
#1
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#2
अपने वक्षों पर लगातार पड़ते उसके हाथों के दबाव और चुम्बनों से वह कामोत्तेजित होकर कसमसाने लगी… बिना ब्रा का हल्की गुलाबी ब्लाउज, भूरे निप्पल और उसके आसपास के हिस्से लार से बुरी तरह भीग गए... साथ ही हाथों के दबाव और यौन-क्रीड़ा ने ब्लाउज की सिलाई को बेतरतीब ढंग से ख़राब कर दिया है. तंग ब्लाउज में कैद चूचियों के नीचे पड़ते दबाव, गोल - सुडौल चूचियों को ब्लाउज के ऊपर के खुले क्षेत्र से बाहर निकल आने को कह रहे थे. खुले, काले बाल कमर तक नागिन की भांति लहराने लगे. खुले गले का ब्लाउज का कंधे वाला बॉर्डर अब मानो धीरे-धीरे कंधे से ही नीचे उतर जाने को उतावले होने लगे. एक धक्के से उसे सुला दी… उस बंद कमरे में उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था और ना ही किसी के होने का सवाल था. उसे लिटा कर वह भी उसके बगल में लेट गई. थोड़ी देर चुप्पी छाई रही. फ़िर वह उठ बैठी; अपने लम्बे बालों को संभाली; पर अब वे उसके चेहरे पर से होकर लटकने. उसे गुदगुदी होने लगी --- उसके हटाने से पहले ही वो हँसते हुए अपने बालों को उसके चेहरे से हटा ली. दोनों एक-दूसरे की आँखों में एकटक देखते रहे – दोनों ही के आँखों में एक-दूसरे के प्रति भूख साफ़ दिख रही थी – पर एक अंतर के साथ ... आशा की आँखों में यौन क्षुधा के साथ-साथ अपनत्व का भाव था— पर, पर उसकी आँखों में सिर्फ़ और सिर्फ़ स्वयं के यौन क्षुधा को तृप्त करने की शीघ्रता थी.......
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#3
१) आरंभ..

स्क्रीच्चचचssss….की आवाज़ के साथ टैक्सी एक घर के सामने आ कर रुकी. दो मंजिला घर. कुछ कमियों के कारण एक आलिशान बंगला बनते-बनते रह गया. आगे एक लॉन जिसके बीचोंबीच एक पतली-सी जगह है जो खूबसूरत मार्बल्स से पटी पड़ी है जिससे चल कर घर के मुख्य दरवाज़े तक पहुँचा जा सकता है. ‘जस्ट पड़ोसी’ की बात की जाए तो जवाब हाँ में भी हो सकता है और ना में भी… क्योंकि आसपास के घर कम से 15 से 20 कदमों की दूरी पर हैं. यानी कि हर घर का शोर-शराबा दूसरे (पड़ोस के) घर के लोगों को डिस्टर्ब नहीं कर सकता. मतलब दूरी इतनी कि एक घर का शोर दूसरे घर तक पहुँचने से पहले ही हवा में घुल जाए. सिर्फ़ यही नहीं, हर दो घरों के बीच 3-4 पेड़ भी हैं जो हर एक घर को दूसरे से आंशिक रूप से छुपाते थे.

ये घर बहुत दिनों से खाली पड़ा था. पाँच दिन पहले ही डील पक्की हुई और तीन दिन पहले ही घर फाइनली बुक हो गया. टैक्सी के पीछे सामानों से लदी दो गाड़ियाँ आ कर खड़ी हो गईं. टैक्सी का पिछला गेट खुला और उससे बाहर निकली नीली साड़ी और मैचिंग शॉर्ट स्लीव ब्लाउज में... ‘आशा’ --- ‘आशा मुखर्जी’. गोरा रंग, कमर तक लंबे काले बाल, आँखों पर बड़े आकार के गोल फ्रेम वाला काला चश्मा, नाक पर फूल की आकार की छोटी-सी नोज़पिन, गले पर पतली सोने की चेन जिसका थोड़ा हिस्सा साड़ी के पल्ले के नीचे है, सिर के बीचोंबीच बालों को करीने से सेट कर लगाया हुआ काला हेयरबैंड, कंधे पर एक बड़ा -सा हैंडबैग, हाथों में चूड़ियाँ और सामान्य ऊँचाई की हील वाले सैंडेल्स. सब कुछ आपस में मिलकर उसे एक परफेक्ट 'औरत' बना रहे थे.

टैक्सी से उतर कर बाहर से ही कुछ देर तक घर को देखती रही आशा. फिर एक लंबा साँस छोड़ते हुए मुस्कुराई. फिर अपने ** साल के बेटे को लेकर, गाड़ी वालों को गाड़ी से सामान उतारने को कहकर घर की ओर बढ़ गई. साथ में उसे घर दिलाने वाला एजेंट भी था. एजेंट काफी देर तक घर की हर एक खासियत के बारे में अनर्गल बोलता रहा. आशा केवल उतनी ही बातों पर ध्यान दी जितना उसे ज़रूरी लगा. अपने बेटे नीरज, जिसे प्यार से नीर कहकर बुलाती है, नए घर में आने पर उसकी ख़ुशी को देख कर वह भी ख़ुश हो रही थी.

ताला एजेंट ने ही खोला था. सब कुछ पहले ही साफ-सुथरा करवा रखा था उसने. एक बार पूरा घर अच्छे से घूम-घूम कर दिखा देने और बाकी के ज़रूरी कागज़ी कामों को पूरा करने के पश्चात् वह चला गया. जाने से पहले उसने मेड के बारे में भी बता दिया जो कि एक घंटे बाद पहुँचने वाली थी. दरअसल आशा ने ही एजेंट से एक मेड दिलाने के बारे में बात की थी. चूँकि वह खुद एक प्राइवेट कॉलेज में टीचर है, इसलिए उसे करीब आठ से नौ घंटे तक कॉलेज में रहना पड़ता है. हालाँकि नीर भी उसी कॉलेज में पढ़ता है जिसमें आशा पढ़ाती है फिर भी कभी-कभी नीर जल्दी छुट्टी होने के बाद भी आशा के छुट्टी होने तक स्टाफ रूम में रहकर खेला करता है तो कभी जल्दी घर आ जाता है. उसके जल्दी आ जाने पर घर में उसका ध्यान रखने वाला कोई तो चाहिए… इसलिए आशा ने एक मेड रखवाई. बच्चे का ध्यान रखने के साथ-साथ वह घर के कामों में भी हाथ बँटा देगी.


सभी सामान अंदर सही जगह रखवाने में करीब पौने दो घंटे बीत गए. फ़िर सबका बिल चुका कर, सबको विदा करने के बाद, अच्छे से दरवाज़ा बंद कर के वह दूसरी मंजिल के एक बालकनी में जा कर खड़ी हो गई. उसे उस बालकनी से दूर-दूर तक अच्छा नज़ारा देखने को मिल रहा था. पेड़, पौधे, उनके बीच मौजूद कुछेक घर और उन घरों की खिड़कियों और छतों पर रखे छोटे-बड़े गमलों में लगे तरह-तरह के फूलों वाले नन्हें पौधे .... हर जगह हरियाली ही हरियाली... आशा को हमेशा से ऐसे वातावरण ने आकर्षित किया है. स्वच्छ हवा, आँखों को तृप्त करती हरियाली युक्त हरे-भरे पेड़-पौधे, सुबह और शाम मन को छू लेने वाली मंद-मंद चलने वाली हवा... आह:! आत्मा को तो जैसे शांति ही मिल जाती है. यह नज़ारा देखते-सोचते आशा की आँखें बंद हो गईं. वह वहीं आँखें बंद किए खड़ी रही… मानो अपने सामने की सम्पूर्ण प्रकृति, हरियाली और ताज़ा कर देने वाली हवा का सुखद अनुभूति लेते हुए ये सबकुछ अपने अंदर समा लेना चाहती है. कुछ पलों तक चुपचाप, आँखें बंद किए बिल्कुल स्थिर खड़ी रही. फिर एकदम से आँखें खुलीं.

'ओह नीर को खाना देना है!'

वह तुरंत मुड़कर जाने को हुई ही कि एकदम से ठहर गई. पलटकर देखी, दूर बगीचे में एक लड़का एक हाफ पैंट और सेंडो गंजी में खड़ा उसी की तरफ एकटक देख रहा है. उसके हाथों में मिट्टी जैसा कुछ है… और पैरों के आस-पास दो-चार पौधे रखे हुए हैं.


उस लड़के को अपनी तरफ उस निगाह से देखते देखकर आशा थोड़ी सकपका गई. स्त्री-सुलभ प्रवृत्ति के कारण जल्दी से उसने अपने शरीर पर एक हल्की नज़र दौड़ाई… और ऐसा करते ही वह भौंचक्क सी रह गई. दरअसल हुआ यह कि जब वह आँखें बंद कर हवा का आनंद ले रही थी तब हवा के ही झोंकों से उसकी साड़ी का एक पल्ला पूरी तरह से एक ओर को हट गया था... और इससे ब्लाउज में कैद दायाँ वक्ष सामने दृश्यमान हो गया था. ब्लाउज थोड़ा तंग होने के वजह से दोनों वक्षों के बीच बन रही करीब 5 इंच की घाटी सामने थी और स्तनों का आकार भी उस ब्लाउज में खुद को संभाल पाने में पूरी तरह से अक्षम था और इस कारण ऐसी स्थिति में उसके वक्ष किसी को भी दूर से अनावृत (नंगा) सा लग सकते हैं. गले में पड़ी सोने की चेन का काफी हिस्सा उस 5 इंच घाटी में समाया हुआ था जोकि आशा की सेक्सीनेस को कई गुना अधिक बढ़ाने का काम कर रहा था. बड़ी शर्म आई आशा को --- खुद को जल्दी से ठीक की, साड़ी के पल्ले को यथास्थान अच्छे से रख कर वो एक बार फ़िर सामने की ओर देखी... लड़का अब भी उसी की तरफ़ देख रहा है. उम्र कुछ ख़ास नहीं होगी उस लड़के की. शायद दसवीं में पढ़ने वाला होगा. सिर पर एक कपड़ा बंधा था, चेहरे पर भोलापन .. पर जैसे वो देख रहा था, आशा को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा. वो ऐसी नज़रों को बहुत अच्छे से जानती है.


अंततः वह पलटी और अन्दर चली गई.



जारी है....

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#4
Promising beginning
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#5
(14-02-2026, 06:51 AM)Blackdick11 Wrote: Promising beginning

धन्यवाद.
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#6
नीर को नाश्ता लगाकर आशा बेडरूम में निढाल-सी बिस्तर पर पीठ के बल लेट गई… बहुत थक गई थी वह. लेटे-लेटे ही पास रखे अपने हैंडबैग से एक छोटा-सा एन्वेलोप निकाली और उसमें से एक फ़ोटो निकाल कर देखने लगी. फ़ोटो में वह है, नीर है.... और हैं ‘अभय’… नीर के पापा.. उसके पति. कुछ देर तक एकटक देखती रही उस फोटो को और न जाने ऐसा क्या हुआ जो उसके आँखों के किनारों में आँसू आ गए. पर आंसूओं को अधिक देर तक टिकने नहीं दी --- तुरंत ही पल्लू के आखिरी हिस्से से उन्हें पोंछ ली. दरअसल बात क्या थी यह कोई नहीं जानता था. आशा के पति का आख़िर हुआ क्या है? जीवित है या वे दोनों अलग हो गए हैं? उसने इस बारे में कभी किसी से कोई बात नहीं की. कोई कितना भी पूछ ले, वह हमेशा बात को टाल जाती है. कुछ समय तक तो माता-पिता के साथ ही रही पर जब आस-पड़ोस में तरह-तरह की बातें होने लगीं और बेवजह कुछ बातें बनने भी लगीं, तब आशा ने शहर से दूर एक जगह पर इस घर को खरीदने का निर्णय लिया. पैसों की कमी न उसे है और न उसके माँ-बाप को. इसलिए घर लेने में किसी तरह की कोई समस्या नहीं हुई. दोनों घरों की बीच की दूरी कम से कम 5-6 घंटे की है. उसने अच्छे से सोच-विचार कर ही इतनी दूरी का चयन किया ताकि उसके किसी भी परिचित का उसके इस नए घर में जल्दी आना-जाना शुरू न हो जाए. साथ ही इससे वह वहाँ (माता-पिता के घर के) के पड़ोसियों से भी दूर रहेगी, फालतू के बात बनाने वाले और ऐसे लोगों के समुदाय से भी दूर और शांति से रहेगी.


लेटे-लेटे ही वह खिड़की से बाहर देखी... दूर पेड़ों की ऊपरी डालियाँ मंद-मंद हिल रही हैं. शीतल हवा के झोंके खुली खिड़की से अंदर घुस कर थकान से टूटते देह को कुछ यूँ आराम पहुँचा रहे हैं कि आँखों को खुला रखना मुश्किल हो रहा है.

खिड़की से नज़रें हटा कर सीलिंग को देखने लगी...

'बहुत शांति है यहाँ. शहर से इतनी दूर --- न प्रदूषण और न किसी तरह का कोई कोलाहल --- ऊपर से चारों तरफ हरियाली ही हरियाली.'


ये सब सोचते-सोचते आशा की आँखें बोझिल होने लगीं. पर अभी सोने का कोई इरादा नहीं है उसका. वैसे भी, ये कोई टाइम भी तो नहीं है सोने का. इसलिए उठ बैठी.

सोची,

'पहले नहा ले फ़िर कुछ खा लेने के बाद ही अच्छे से आराम करेगी.'

बिस्तर से  उतर, कुछ कदम चलकर बगल में मौजूद ड्रेसिंग टेबल के आदमकद अंडाकार दर्पण के सामने जाकर खड़ी हो गई और खुद के ही अप्रतिम सौन्दर्य को निहारने लगी. शादी और बच्चे होने के बाद भी इतने सालों में कुछ बदलाव आने के बावजूद उसका रूप जैसे पहले और भी निखर गया है. जिस्म का हर उतार-चढ़ाव और हरेक कटाव उसकी जिस्मानी खूबसूरती में जैसे चार चाँद लगाते हैं. ऊपर से गदराया बदन.. 'उफ्फ्फ़…!' कभी-कभी तो उसे खुद से ही प्यार और खुद से ही रश्क होने लगता है.


खुद को मंत्रमुग्ध-सी देखती हुई उसने कंधे पर से साड़ी को ब्लाउज से पिन अप किए पिन को आहिस्ते से निकाली और पिन को एक ओर रखते हुए पल्लू गिरा दी. पल्लू के गिरते ही सामने दृश्यमान हुई उसकी भरी छाती से उभरा ब्लाउज ... 5 इंच लंबे क्लीवेज के साथ चूचियों के ऊपरी गोलाईयों को सख्ती से लिए उसके डीप कट ब्लाउज ने उन्हें बखूबी ऊपर उठा रखा है. ब्लाउज सिर्फ डीप कट ही नहीं बल्कि तंग और छोटा भी है.


आशा अपने गोल, बड़े-बड़े उभारों को देख, उसी मंत्रमुग्ध अवस्था में अपने दोनों हाथों से ब्लाउज के ऊपर से ही उभारों को दोनों साइड से हल्के से बीच की ओर ठेलने लगी और उसके ऐसा करते ही सीने की ऊपरी हिस्से पर चूचियों की गोलाईयाँ और भी अधिक उभर आईं और साथ ही एक गहरी घाटी बन आई दोनों चूचियों के मध्य.

अपने स्तनों की पुष्टता और क्लीवेज की लंबाई और गहराई को देख कर आशा के पूरे जिस्म में कामोत्त्जेना वाली एक गुदगुदी दौड़ गई और अपने शरीर के ऊपरी हिस्से के रूप व निखार को देख कर वह बुरी तरह शर्म से लाल होते हुए एक ‘आह’ भर उठी.


वह मादक यौवन से भरे अपने स्तनयुगल को किनारों से और ब्लाउज के ऊपर से सामने दिख रहे उनकी गोलाईयों को यूँ ही हौले से दबाने लगी. अपने ही नर्म, गदराए स्तनों का स्पर्श उसे एक अद्भुत रोमांच से भरने लगा. वह उस आदमकद दर्पण के सामने अपने ही हाथों का कोमल स्पर्श अपने गोल, सुडौल, पुष्टता से परिपूर्ण नर्म, गदराए चूचियों पर लेते हुए आँखें बंद कर ली और इस छुअन का सुखद अनुभव करने लगी. ऐसा करते हुए उसके मन में यह विचार आने लगा कि,

ईश्वर ने ऐसी गौरवमयी अमूल्य संपत्ति उसके अतिरिक्त शायद किसी और को नहीं दिया है.’


आँखें बंद किए आत्ममुग्धता में खोई आशा अपनी चूचियों को दबाते, सहलाते धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ी और अपनी मखमली, नर्म पेट पर ठहर गई. इतनी नर्म चिकनी पेट पर उसे खुद विश्वास नहीं हुआ. शादी के कुछ साल, और फिर बच्चा होने के बाद, साथ ही एक कामकाजी महिला होने के बाद भी उसके जिस्म का रोम-रोम अब भी चिकनाहट से भरा हुआ और एक परफेक्ट फ़िगर लिए है. यथोचित चर्बीयुक्त पेट पर हाथ फेरते-फेरते एक ऊँगली नाभि में ले गई… गहरी गोल नाभि में ऊँगली का ऊपरी कुछ हिस्सा घुसा और फिर वैसे रखे ही ऊँगली को गोल-गोल घूमाने लगी.


अभी वह अपनी नाभि की सुंदर गोलाई और गहराई में डूब ही रही थी कि तभी खुली खिड़की से कमरे में हवा का झोंका थोड़ा तेज़ आया और इससे खिड़की पर ही पर्दों से लगा झालरनुमा पतले चेन से लगे धातु के छोटे-छोटे परिंदे आपस में टकरा कर एक तेज, पर मीठे ‘छन्नन्न’ से आवाज़ कर उठे और इससे आशा की यौन-तंद्रा भंग हुई.

एकदम से होश में लौटी!

अपनी स्थिति को देखकर बौखलाई भी और शरमाई भी — गाल सुर्ख लाल हो उठे.

जल्दी से दर्पण के सामने से हटी और पलंग पर रखे बैग से कपड़े, तौलिया वगैरह निकालने लगी. पल्लू अभी भी फ़र्श पर पड़ी है… पर आशा के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं. कभी-कभी बिना पल्लू के रहना उसे अच्छा लगता है. इससे वह खुद को बहुत उम्दा किस्म की फ़ील करती है. जैसे की, अभी बैग से कपड़े निकालते समय बिना पल्लू के तंग ब्लाउज में कैद उसकी बड़ी-बड़ी चूचियाँ; गहरी क्लीवेज के साथ दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे हो कर नाच रही हैं. रह-रह कर आशा की नज़रें अपनी नाचती अर्धनग्न चूचियों और डीप क्लीवेज पे जाती... जहां उसकी सोने की पतली चेन क्लीवेज में कहीं खो कर रास्ता ढूँढ रही है... चर्बीयुक्त पेट और कमर की अलग ही थिरकन होती. ये सब देखकर उसे खुद के एक जबरदस्त कमसीन, सेक्सी औरत होने का अहसास होता और इस अहसास को वो खुल कर जीना चाहती... जी भर कर एंजॉय करती.

जीवन में जब भी पुरुष की कमी महसूस होती तो खुद को ही अपने स्पर्शों से जवां और हसीं - तरीन होने का सुख लेती. इसी से खुद को संपूर्ण समझती.



जारी है….
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#7
उफ़, आशा की निराशा और बेरंग से भरी जिन्दगी।

जहां तक में गैस कर प रहा हूं,,,पति पत्नी में बहुत बुरा वाला डिवोर्स हुआ होगा,,, खैर वक्त ही बताएगा।
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#8
Beautiful Update
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#9
(15-02-2026, 04:46 AM)Bakchod Londa Wrote: उफ़, आशा की निराशा और बेरंग से भरी जिन्दगी।

जहां तक में गैस कर प रहा हूं,,,पति पत्नी में बहुत बुरा वाला डिवोर्स हुआ होगा,,, खैर वक्त ही बताएगा।

वक्त ही बताएगा...!
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#10
(15-02-2026, 11:17 AM)Blackdick11 Wrote: Beautiful Update
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Wow! Awesome! Loved it!!

thanks
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#11
खैर, कपड़े लेकर जल्दी से बाथरूम की ओर रवाना हुई और उससे पहले करीब 5 सेकंड के लिए रुक कर बाहर की ओर उभरे अपने पिछवाड़े और कमर पे थोड़ी चर्बी के कारण हो रहे एक कटावदार फोल्ड को हसरत भरी निगाहों से अच्छे से देखी --- फ़िर झट से बाथरूम में घुस गई.

करीब 20-25 मिनट बाद बाथरूम से निकली...

भीगे बाल, भीगा बदन, बदन पर सिर्फ़ एक टॉवल लिपटा हुआ… जो उसकी चूचियों से शुरू हो कर नीचे जाँघों के मध्य भाग तक पहुँच रही है. गोरी, गदराई भीगे बदन पर वो नीली धारियों वाला सफ़ेद टॉवल वाकई इतना फ़ब रहा है कि जो भी देखे उसके दिल में आग लग जाए.

बाथरूम से निकल कर आईने के सामने फ़िर खड़ी हो गई...

नहाने के बाद एक अलग ही ताज़गी फ़ील कर रही है वह अब. दर्पण में चेहरा खिला-खिला लग रहा है. तीन-चार भीगे लट उसके चेहरे के किनारों पर बिख़र आए हैं; ये देख कर एक बार फ़िर उसे अपने आप पर बहुत प्यार आया. खुद को किशोरावस्था को जस्ट पार करने वाली नवयौवना-सी समझने लगी... और ऐसा ख्याल मन में आते ही एक बेशर्म मुस्कान छा गई होंठों पर… और ऐसा होते ही मानो चार चाँद लग गए गोल गोरे मुखरे पर... गज़ब की कातिल हसीना लगने लगी.

अभी अपनी खूबसूरती में और भी डूबे रहने की तमन्ना थी उसे… पर तभी एक ‘बीप’ की आवाज़ के साथ उसका फ़ोन घर्रा उठा. हमेशा अपने फ़ोन को साउंड के साथ वाईब्रेट मोड पर रखती है आशा… कारण शायद उसे भी नहीं पता. कोई मैसेज आया है —  हमेशा मैसेज आते ही उसका फोन का लाइट जल उठता है. और अभी ठीक ऐसा ही हुआ… एक ही आवाज़ से लाइट जल उठी और इसी के साथ आशा की नज़र फ़ोन पर पड़ी. सेकंड भर में सिर्फ एक नहीं, लगातार शायद 2-3 मैसेज आ गए.

लेकिन उसने कोई जल्दी नहीं की. चेहरे और बाँहों में लोशन लगाने के बाद इत्मीनान से ड्रेसिंग टेबल के सामने से उठी और बिस्तर पर पड़े फ़ोन को उठा कर मैसेज चेक करने लगी.

मैसेज चेक करते ही उसका चेहरा छोटा हो गया… दिल बैठने लगा. भूलकर भी भूल से जिसके बारे में नहीं सोचना चाहती थी उसी का मैसेज आया था.

‘हाई स्वीटी, कैसी हो?’   ये पहला मैसेज.

दूसरा मैसेज,

‘क्या कर रही हो…? आई होप मैंने तुम्हें डिस्टर्ब नहीं किया. क्या करूँ, दिल को तुम्हें याद करने से रोक तो नहीं सकता न!!’

तीसरा मैसेज,

‘अच्छा, सुनो ना.. मैं क्या कह रहा था... आज तो तुम कॉलेज आओगी नहीं... इसलिए तुम्हारा दीदार भी होगा नहीं .. एक काम करो, अपना एक अच्छा-सा फ़ोटो भेज दो ना...’

चौथा मैसेज,

‘हैल्लो.. आर यू देयर? यू गेटिंग माय मैसेजेज?’

पाँचवां मैसेज,

‘प्लीज़ डोंट बी रूड.. सेंड अ पिक.. आई एम वेटिंग….’

कुल पाँच मैसेज थे… और ये मैसेजेज़ भेजने वाला था ‘मि० रणधीर सिन्हा’ — आशा के कॉलेज का फाउंडर कम चेयरमैन..! फ़िलहाल प्रिंसिपल की सीट के लिए उपयुक्त कैंडीडेट नहीं मिलने के कारण रणधीर ने ख़ुद ही काम-चलाऊ टाइप प्रिंसिपल की जिम्मेदारियों को सम्भाल रखा है.


रणधीर कैसा पिक माँग रहा है, यह अच्छे से समझ गई वह. रणधीर जैसा इंसान आशा को बिल्कुल भी पसंद नहीं. यहाँ तक कि उसका नाम भी सुनना आशा को पसंद नहीं… पर... पर बेचारी करे भी तो क्या करे?

खैर,

एक छोटे टॉवल से सिर पर बालों को समेट कर बाँधी. ड्रेसिंग टेबल के दर्पण के सामने तिरछा खड़ी हुई… कैमरा ऑन की... 2-3 पिक खींची और भेज दी.

अगले पाँच मिनट तक कोई मैसेज नहीं आया…

ये पिक्स रणधीर के लिए काफ़ी हैं सोच कर मोबाइल रख कर ड्रेस चेंज करने जा ही रही थी कि एक ‘बीप’ की आवाज़ फ़िर हुई. आशा कोसते हुए फ़ोन उठाई,

‘हाई, पिक्स मिला तुम्हारा.. अभी-अभी नहाई हो?? वाओ... सो सुपर्ब स्वीटी.. बट इट्स नॉट इनफ़ यू नो.. आई मेंट सेंड मी समथिंग हॉट… यू नो न; व्हाट आई मीन…??’

लंबी साँस छोड़ते हुए एक ठंडी आह भरी आशा ने — जिस बात का अंदाजा था बिल्कुल वही हुआ ... रणधीर इतने में ही ख़ुश होने वालों में नहीं था — उसे आशा के ‘न्यूड्स’ चाहिए!!  आशा को पहले ही अंदाज़ा हो गया था कि रणधीर कैसी पिक्स भेजने की बात कर रहा है. वह तो बस एक असफ़ल प्रयास कर रही थी बात को टालने के लिए. पर ये ‘भवितव्य’ था… 

थोड़ा रुक कर वह फ़िर ड्रेसिंग टेबल के सामने गई. सिर पर टॉवल को रहने दी. बदन पर लिपटे टॉवल को धीरे से अलग किया ख़ुद से... फिर तिरछी खड़ी हुई दर्पण के सामने…. अपने पिछवाड़े को थोड़ा और बाहर निकाली, स्तनों का अपने एक हाथ से ज़रा सा ढकी और होंठों को इस तरह गोल की कि जैसे वह किस कर रही हो.

फ़िर दूसरा पिक वो ज़रा सामने से ली... सीधा होकर ... अपनी हथेली और कलाई को सामने से अपने दोनों चूचियों पर कुछ ऐसे रखी जिससे की चूचियाँ, निप्पल सहित हल्का सा ढके पर आधे से ज़्यादा उभर कर ऊपर उठ जाएँ और एक लंबी, गहरी क्लीवेज बन जाए… 

फ़िर तीसरा पिक ली, 

ये वाला लगभग दूसरे वाले पिक जैसा ही था, पर इसमें वह थोड़ा पीछे होकर मोबाइल को थोड़ा झुकाकर ली… इससे इस पिक में उसका पेट, गोल गहरी नाभि और कमर पर ठीकठाक परिमाण में जमी चर्बी भी नज़र आ गई. 

तीनों ही पिक बड़े ज़बरदस्त सेक्सी और हॉट लग रहे थे. एक बार को तो आशा भी गर्व से फूली ना समाई और होंठों के किनारों पर एक गर्वीली मुस्कान बिखर जाने से रोक भी न पाई. आशा गौर से थोड़ी देर अपनी पिक्स को देखती और इतराती रही. फ़िर मन मसोस कर रणधीर को सेंड कर दी. 

पिक मिलने के बाद मुश्किल से दो से तीन सेकंड हुए होंगे कि रणधीर का मैसेज आ गया… 

एक के बाद एक... 

कुल तीन मैसेज…!

पहले दो मैसेज तो स्माइलीज़ और दिल से भरे थे…

तीसरा मैसेज कुछ यूँ था…

‘ऊम्माह्ह्ह... वाओ... आशा डार्लिंग... यू आर जीनियस ... सो सो सो ब्यूटीफुल... अमेजिंग बॉडी यू हैव गोट.. आई लव यू... ऊम्माह्ह्ह्ह.... टेक केयर आशा बेबी.. सी यू टुमॉरो.’

मैसेज पढ़कर भावहीन-सी खड़ी रही वो. मैसेज पढ़कर रणधीर, उसका चेहरा, उसकी उम्र, नाम, कद-काठी, कारनामे, सब उसकी आँखों के आगे तैरने से लगे…. मन घृणा से भर गया… सिर झटकते हुए मोबाइल बिस्तर पर पटकी और चली गई चेंज करने.......



जारी रहेगा....
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#12
Fascinating update...but I'm more curious to know,,,asha ki aisi kya majburi rahi k randhir use pasand nahi h fir v use apna nude pics bheji...

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#13
Reps and likes added.
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#14
(17-02-2026, 04:14 PM)Blackdick11 Wrote: Fascinating update...but I'm more curious to know,,,asha ki aisi kya majburi rahi k randhir use pasand nahi h fir v use apna nude pics bheji...

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अगले अपडेट पर काम हो रहा है.    Lift
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#15
(17-02-2026, 04:15 PM)Blackdick11 Wrote: Reps and likes added.

Thank you. And the same is done here.   Namaskar
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#16
Update 2:-

[Image: AuSMVWbB_o.jpg]


‘सिन्हा’... ‘मि० रणधीर सिन्हा...’ शहर के किसी कोने के एक बड़े से हिस्से में एक जाना माना नाम... कई क्षेत्रों में कई तरह के बिज़नेस हैं. बहुत कम समय में बेहिसाब पैसा कमाया है. ईश्वरीय कृपा ऐसी रही है कि जिस काम या व्यापार में हाथ आजमाते, सौ प्रतिशत सफ़ल होते. धर्मपत्नी को गुज़रे कई साल हो गए… दो बेटे और एक बेटी हैं और तीनों ही विदेशों में बस गए हैं. घर में अकेले रहने की आदत सी पड़ गई है रणधीर को. घर से काम और काम से घर. यही रोज़ की दिनचर्या रही है रणधीर बाबू की अब तक. पर पिछले कुछ महीनों से काफी टाइम घर पर बिताना हो रहा है रणधीर बाबू का…

इसका कारण भी बड़ा रंगीन (और संगीन) है.



(विस्तृत अपडेट अगले दो दिन में.)
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#17
कहानी का दूसरा कैरेक्टर—Mr. Randhir Sinha—काफी इंटरेस्टिंग लग रहा है।
छोटी-सी इंट्रो में तो बड़े ही सभ्य और सज्जन टाइप के इंसान दिखते हैं, लेकिन पिछले अपडेट के बाद थोड़ा डाउट तो बनता है कि सच में वैसे ही हैं या कुछ और।
अब तक जिस काम में हाथ डाला, वहाँ सफल ही रहे हैं।
देखना है आशा के मामले में उनकी किस्मत कितनी उनकी साथ देती है
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#18
Biwi pehle hi chal basi....
bachhe settle ho gaye videsh m....
aur akelapan...aise m insaan ki dabi hui ya adhuri rah gayi khwahishen chikhe marti h...
& also I’d like to know k randhir babu asha ke chakkar mein kaise pad gaye.
kahan mile?? kaise mile??
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#19
(14-02-2026, 12:23 AM)The_Writer Wrote:
अपने वक्षों पर लगातार पड़ते उसके हाथों के दबाव और चुम्बनों से वह कामोत्तेजित होकर कसमसाने लगी… बिना ब्रा का हल्की गुलाबी ब्लाउज, भूरे निप्पल और उसके आसपास के हिस्से लार से बुरी तरह भीग गए... साथ ही हाथों के दबाव और यौन-क्रीड़ा ने ब्लाउज की सिलाई को बेतरतीब ढंग से ख़राब कर दिया है. तंग ब्लाउज में कैद चूचियों के नीचे पड़ते दबाव, गोल - सुडौल चूचियों को ब्लाउज के ऊपर के खुले क्षेत्र से बाहर निकल आने को कह रहे थे. खुले, काले बाल कमर तक नागिन की भांति लहराने लगे. खुले गले का ब्लाउज का कंधे वाला बॉर्डर अब मानो धीरे-धीरे कंधे से ही नीचे उतर जाने को उतावले होने लगे. एक धक्के से उसे सुला दी… उस बंद कमरे में उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था और ना ही किसी के होने का सवाल था. उसे लिटा कर वह भी उसके बगल में लेट गई. थोड़ी देर चुप्पी छाई रही. फ़िर वह उठ बैठी; अपने लम्बे बालों को संभाली; पर अब वे उसके चेहरे पर से होकर लटकने. उसे गुदगुदी होने लगी --- उसके हटाने से पहले ही वो हँसते हुए अपने बालों को उसके चेहरे से हटा ली. दोनों एक-दूसरे की आँखों में एकटक देखते रहे – दोनों ही के आँखों में एक-दूसरे के प्रति भूख साफ़ दिख रही थी – पर एक अंतर के साथ ... आशा की आँखों में यौन क्षुधा के साथ-साथ अपनत्व का भाव था— पर, पर उसकी आँखों में सिर्फ़ और सिर्फ़ स्वयं के यौन क्षुधा को तृप्त करने की शीघ्रता थी.......

Yeh dekhna kafi interesting hoga ki current situation kaise is scene tak lead karti hai.

anyways, quite engaging story and narration.
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#20
(14-02-2026, 12:23 AM)The_Writer Wrote:
अपने वक्षों पर लगातार पड़ते उसके हाथों के दबाव और चुम्बनों से वह कामोत्तेजित होकर कसमसाने लगी… बिना ब्रा का हल्की गुलाबी ब्लाउज, भूरे निप्पल और उसके आसपास के हिस्से लार से बुरी तरह भीग गए... साथ ही हाथों के दबाव और यौन-क्रीड़ा ने ब्लाउज की सिलाई को बेतरतीब ढंग से ख़राब कर दिया है. तंग ब्लाउज में कैद चूचियों के नीचे पड़ते दबाव, गोल - सुडौल चूचियों को ब्लाउज के ऊपर के खुले क्षेत्र से बाहर निकल आने को कह रहे थे. खुले, काले बाल कमर तक नागिन की भांति लहराने लगे. खुले गले का ब्लाउज का कंधे वाला बॉर्डर अब मानो धीरे-धीरे कंधे से ही नीचे उतर जाने को उतावले होने लगे. एक धक्के से उसे सुला दी… उस बंद कमरे में उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था और ना ही किसी के होने का सवाल था. उसे लिटा कर वह भी उसके बगल में लेट गई. थोड़ी देर चुप्पी छाई रही. फ़िर वह उठ बैठी; अपने लम्बे बालों को संभाली; पर अब वे उसके चेहरे पर से होकर लटकने. उसे गुदगुदी होने लगी --- उसके हटाने से पहले ही वो हँसते हुए अपने बालों को उसके चेहरे से हटा ली. दोनों एक-दूसरे की आँखों में एकटक देखते रहे – दोनों ही के आँखों में एक-दूसरे के प्रति भूख साफ़ दिख रही थी – पर एक अंतर के साथ ... आशा की आँखों में यौन क्षुधा के साथ-साथ अपनत्व का भाव था— पर, पर उसकी आँखों में सिर्फ़ और सिर्फ़ स्वयं के यौन क्षुधा को तृप्त करने की शीघ्रता थी.......

वाह, क्या वर्णन है! उत्तम!
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