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Adultery Kayla The Bitch Slut - Season I
#1
Heart  “यह कहानी कायला की है…
उसके सफ़र की…
जो बहुत जल्द आपके सामने आने वाली है…”  Heart
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#2
Season I

शाम का वक्त था... ऑफिस का शोर थम चुका था। कायला अपनी टाइट कसी हुई ब्लैक लेगिंग्स में फाइलें समेट रही थी। ऊपर की ओर लाल, सफेद और काले रंग का चटक कुर्ता,

जो उसकी मांसल छातियों को हल्के से उभार देता था। अंदर से स्लेटी रंग की ब्रा उसके उभरे (36B) के दूधुओं को जकड़ रही थी,और नीचे नीली चड्डी उसकी चूत की गर्मी को भींचे बैठी थी।

उसकी लेगिंग्स इतनी टाइट थी कि हर कदम पर मोटी जांघें कस रही थीं,और हर झुकाव में गांड के गोल उभार उभर आते थे।

तभी उसकी जूनियर ममता पास आती है -- "मैडम, मिश्राजी के डॉगी का कुछ छूट गया है... घर जाते वक्त दे देना।"

कायला ने चुपचाप सिर हिलाया, "ठीक है।"

पैकेट लिया और निकल पड़ी -- बिना कुछ कहे, जैसे किसी हुक्म को मान रही हो।

पंद्रह मिनट में उसकी गाड़ी दीपक मिश्राजी के गेट पर रुकती है।

गली में सिर्फ पत्तों की सरसराहट थी... और उस बीच कायला की चड्डी के नीचे चुपचाप पसीजती चूत।

डोर बेल बजती है -- गेट खुलता है।

सामने से निकलते हैं मिश्राजी -- ढीला सा पायजामा पहने,ऊपर से सफेद बनियान, जो पसीने से चिपक कर उनके बालों भरे सीने को उघाड़े हुए थी।

आँखों में एक अलग ही चमक... उनकी नज़रें टिकी थीं कायला की छातियों पर -- कुछ देर वैसे ही, जैसे किसी भूखे को गरम रोटी दिखाई दे।

लंड में हरकत तो साफ़ दिखती थी, लेकिन उनकी जुबान शालीन बनी रही। उनकी नजरें सीधे कायला की जांघों से लेकर छातियों तक घूमती हैं।

"अरे... कायला तू?"

उसने बस सिर झुका के पैकेट आगे कर दिया।

"अंदर आ जा..."

मिश्राजी का गला सूखा हुआ था -- मन तो उसी पल उसका कुर्ता फाड़ने का कर रहा था, पर खुद को रोके हुए थे।

वो पहली बार उनके घर आई थी, पर जैसे उसके पैर खुद-ब-खुद अंदर बढ़ गए -- जैसे किसी हुक्म की तामीर हो।

अंदर जाते ही कायला ने पैकेट थमाया -- "ये लीजिए"

मिश्राजी ने पैकेट हाथ में लिया, और दरवाज़ा बंद करते हुए बोले--"तू जानती है ना, मेरे पास पचास कुत्ते-कुत्तियाँ हैं... ध्यान ही नहीं रहता कब क्या छूट गया।"

उन्होंने आवाज़ दी -- "गोल्डी!"

एक भारी जर्मन शेफर्ड लपक कर आया -- मिश्राजी के पास से होता हुआ सीधा कायला के पैरों पर सूँघने लगा।

फिर अचानक ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा -- जैसे किसी अजनबी की चूत से उठती गंध पर भूख चढ़ गई हो। कायला की जांघें सिकुड़ गईं।

मिश्राजी बोले, "गोल्डी, No!"

लेकिन कुत्ता रुका नहीं।

"कायला, इसे सेहला... नया चेहरा है, इसलिए शोर कर रहा है।" कायला कुछ नहीं बोलती, धीरे-धीरे झुकती है -- और तभी उसकी मोटी, मांसल गांड लेगिंग्स के अंदर से पूरी तरह फट कर उभर आती है।

उसकी लेगिंग्स इतनी चिपकी हुई थी कि हर बार जब वो झुकती, गांड की लकीरें ऐसे उभरतीं जैसे किसी गीली मिट्टी में लंड दबाया गया हो।

गोल्डी उसकी टांगों के पास चक्कर काटता है, सूँघता है और और ज़ोर से भौंकता है।

कायला हाथ बढ़ाती है -- सहलाना शुरू करती है, लेकिन घबराई हुई सी...

मिश्राजी पास आते हैं -- दोनों झुके हुए, दोनों नीचे... लेकिन एक बूढ़ा लंड खड़ा हो चुका था।

"अरे कायला... अच्छे से सेहला।"

वो पीछे से उसके और पास आए -- और एक हाथ उसकी पीठ पर रख दिया।

"ऐसे नहीं... ऐसे सेहला... जैसे मैं तुझे सेहलाता हूँ... तभी मानेगा ये।"

उनका हाथ उसकी पीठ से नीचे फिसलता है... कमर पार करता हुआ सीधा उसकी गांड पर।

बड़ी, भरी हुई, मोटी गांड... एकदम मांसल।

मिश्राजी ने जैसे ही हाथ रखा, कायला की सांस एकदम भारी हुई।

उनका हाथ लेगिंग्स के ऊपर से ही उसकी गांड की गोलाई पर गोल-गोल घुम रहा था -- जैसे वो रोटी नहीं, कोई गरम चूत की ढक्कन छू रहे हों।

"ये गांड... क्या चीज बनाई है ऊपर वाले ने..." वो खुद बुदबुदाए।

अब हाथ ने सेहलाना नहीं, दबाना शुरू कर दिया -- मोटी गद्दी को अंदर तक दबा रहे थे...

हर दबाव में कायला की सांस रुक रही थी, लेकिन वो रुकी नहीं -- अब भी गोल्डी को सेहला रही थी।

"तू उसे सेहला रही है... और मैं तुझे।"

मिश्राजी अब गांड की लकीर पर अपनी उंगलियाँ फेरा रहे थे -- जहाँ लेगिंग्स में चूत और गांड की सीमाएँ मिलती हैं। कायला की साँस रुक गई।

मोटी, गरम, और पूरी तरह आज्ञाकारी गांड... जो बस रगड़ और लंड के इंतज़ार में थी।

मिश्राजी अब और पास आ चुके थे। कायला झुकी हुई थी, गोल्डी को सेहला रही थी, पर उसकी गांड अब पूरी तरह मिश्राजी की पकड़ में थी।

उन्होंने धीरे-धीरे हाथ पीछे सरकाया -- और उसकी कुर्ती को पीछे से पकड़कर ऊपर खींचना शुरू किया।

धीरे-धीरे, जैसे कोई पुराना पर्दा हटा रहा हो किसी बंद मंदिर से।कुर्ती ऊपर सरकती गई -- कमर से पीठ, और फिर ब्रा की पट्टी तक।

अब उसकी पूरी गांड लेगिंग्स के अंदर से बाहर झाँक रही थी -- फटी हुई नहीं, पर टाइट में फंसी हुई, जैसे चड्डी-लेगिंग्स की सलाखों में कैद कोई चूत की कैदी।

पीठ -- गोरी, नंगी, और झुकी हुई -- अब धीरे-धीरे सामने आ रही थी।

मिश्राजी थोड़ी देर वहीं खड़े रहे -- आंखें भर-भर देखी उन्होंने उसकी गांड और झुकी पीठ।

जैसे मांस की कोई पूजा हो, और वो खुद को पुजारी मान बैठे हों।फिर आराम से सोफे पर बैठ गए -- जैसे किसी मूर्ख लड़की की गांड की नुमाइश देख रहे हों।

दोनों हाथ उठाए -- और दोनों गांड के उभारों पर एक-एक थप्पड़ मारा।

"ठप्प!"

एक बूँद भी हवा न बची अंदर -- कायला की गांड थप्पड़ से हिल कर थरथराई, मगर वो कुछ नहीं बोली।

थप्पड़ के झटके से उसकी दोनों चूचियाँ नीचे झूल गईं -- मगर आवाज़ एक भी नहीं, सिर्फ़ साँस की गर्म भाप उसकी पीठ से उठ रही थी।

मिश्राजी मुस्कराए -- जैसे किसी बंद पेटी की पहली चाबी मिली हो।अगले ही सेकंड उन्होंने उसकी टाइट लेगिंग्स और नीली चड्डी को एक ही झटके में घुटनों तक खींच दिया --

जब मिश्राजी ने उसकी लेगिंग्स और चड्डी खींची -- तो चूत से चिपकी चड्डी एक झटके में चपचप की आवाज़ के साथ उतरी... जैसे रस में डूबी कोई परत हटाई गई हो।

अब चूत और गांड दोनों नंगी, खुली हवा में हिल रही थीं।

गांड अब पूरी तरह उभर चुकी थी -- मोटी, चौड़ी, भरी हुई।

बीच की लकीर से झाँघों के बाल झाँक रहे थे, और गंध गरम होकर हवा में तैर रही थी।

मिश्राजी ने आँखें बंद कर लीं --

"यही तो गांड है जो लायक मर्द को चूत तक ले जाती है..." वो धीरे से बुदबुदाए।

मिश्राजी अब पूरे हक से खेल को आगे बढ़ाते हैं।उन्होंने झुकी हुई कायला को अपने पास खींचा--सीधा घुटनों पर लिटा दिया।

अब कायला उनकी गोदी में एकदम वैसे पड़ी थी जैसे कोई कुतिया जिसे मालिक ने सज़ा के लिए बुलाया हो--मुँह नीचा, गांड ऊपर।

उसकी चौड़ी, गरम, उजली गांड, जो अब पूरी तरह लेगिंग और चड्डी से आज़ाद थी,ठीक मिश्राजी की नज़रों के सामने थी--मुलायम मांस की दो मोटी लपटें,

जो एकदम निवेदन कर रही थीं,"ले लीजिए, मरोड़ दीजिए, दबा दीजिए।"

मिश्राजी ने अब दोनों हाथों से उसकी गांड की दरार को धीरे-धीरे फैलाया।मांस की गोल परतें उनके अंगूठों के बीच से अलग होती गईं,

उनके अंगूठों के नीचे से दरार की गर्मी जैसे साँस बनकर बाहर फूट रही थी--चूत और गुदा के बीच की वह गीली राह, अब आँखों से नहीं, इरादों से खुल रही थी।

और अब उनकी आँखों के सामने दो छेद--एक चूत का, जो भीगा हुआ, चमकता हुआ उनकी जीभ की मांग कर रहा था...

और एक गुदा का, जो सूखा था, लेकिन उसी रस का इंतज़ार कर रहा था।

मिश्राजी ने अपना चेहरा झुकाया--उनकी गर्म साँसें पहले गांड की दरार में घुसीं, फिर जीभ।

जीभ जैसे दीवार पर रेंग रही हो--एक किनारे से दूसरे छेद तक--हर बाल, हर सिलवट को अपने थूक से सींचती हुई,

चूत से गीली मिठास खींचकर गुदा की प्यास तक पहुँचा रही थी।

जैसे कोई तजुर्बेकार मर्द अपने थूक से चेदों की तासीर बराबर कर रहा हो।"अब दोनों रास्ते मेरे बनें..." मिश्राजी मन ही मन बोले।

फिर उन्होंने बारी-बारी दोनों चेदों को चाटना शुरू किया--जीभ से हल्का दबाव, ऊपर से थूक...और नीचे से चूत और गांड की हर नस थरथराने लगी।

कायला की जाँघें हिलने लगी थीं, चूत हल्की भींच में आ गई थी, और बदन से गंध अब लज्जा नहीं, भूख की तरह उठ रही थी।

उसकी साँसें टूटी-फूटी होने लगीं, बदन कांपने लगा, मगर आवाज़ एक भी नहीं--उसकी चुप्पी अब इजाज़त बन चुकी थी।

एक 60 साल का बूढ़ा मर्द, और उसके नीचे झुकी हुई 30 की मांसल औरत--जिसकी गांड और चूत अब सिर्फ़ उस एक ज़ुबान की गवाही पर नम हो रही थी।

थूक अब दोनों चेदों पर बह रहा था--मिश्राजी उन्हें आने वाले खेल के लिए तैयार कर रहे थे।

सिर्फ जीभ से नहीं... इरादों से।

मिश्राजी ने कायला को हल्के से खींचा, और सीधा अपने घुटनों पर लिटा दिया--अब वो एकदम कुतिया की तरह मिश्राजी के सामने झुकी हुई थी।

कायला की जाँघें अब काँप रही थीं -- चूत से रस बहता जा रहा था और गुदा की झुर्रियाँ मिश्राजी की जीभ के स्पर्श से भीग चुकी थीं।

उसके पेट की हर नस अब उस आखिरी धक्के की मिन्नत कर रही थी।

उसने खुद को थोड़ा और झुका दिया -- जैसे कहना चाह रही हो, 'अब ले ही लो मुझे...'

मिश्रा जी ने उसकी कमर पकड़कर धीरे-धीरे ऊपर उठाया, और खुद सोफे से उठ खड़े हुए।

उनकी आँखों में अब सिर्फ भूख नहीं थी -- अब वहाँ अधिकार था।

उसकी कुर्ती ऊपर खिंची हुई थी, गोरी, नरम पीठ खुली थी, और नीचे से लेगिंग व चड्डी एक ही झटके में घुटनों तक उतार दी गई थी।

अब उसकी बड़ी, भरी हुई, उजली गांड -- मिश्राजी के सामने ऐसे फैली थी जैसे पूजा की थाली में रखा गया गरम, मुलायम प्रसाद --

जिसे उठाने से पहले ही मुँह में पानी भर जाए।

मांसल, फूली हुई, और नरम... दो गोल हिस्से ऐसे काँप रहे थे जैसे कोई गर्म रोटी तवे पर रखी हो।

मिश्राजी एक पल को वहीं रुक गए--आँखों से पी रहे थे वो दृश्य।फिर दोनों हाथों से गांड की दरार को अलग किया।

जैसे ही दो अंगूठों के बीच वो मांस फैला, अंदर से दोनों चेद खुल गए--एक चूत का, जो पूरी तरह गीली, थरथराती हुई...

और दूसरा गुदा का, जो सूखा, पर कस के बंद, जैसे कह रही हो 'मुझे भी ले।'

मिश्राजी ने बिना देर किए अपना चेहरा उन दोनों दरवाज़ों के बीच उतारा...

पहले उनकी जीभ चूत की भीगी दीवार पर नीचे से ऊपर ऐसे चली जैसे नम नमक पर जीभ घिसती हो -- हर रगड़ पर कायला की जाँघें सिहरती थीं।

फिर वहीं से गीलापन उठाकर गुदा के रुखे मुँह तक ले गए--थूक के साथ।

गुदा की झुर्रियों में जब पहली बार थूक सरका,तो कायला की पूरी रीढ़ जैसे हरकत में आई--जैसे वहाँ भी कोई भूख धीरे-धीरे जाग रही हो।

'तेरा हर रस्ता अब मेरा होगा...'मन ही मन बुदबुदाते हुए, उन्होंने बारी-बारी दोनों चेदों को चाटना शुरू किया--

हर चाट में थूक, हर फूँक में हुकूमत।

कायला झुकी रही--गुलाम, गीली, और अंदर से कांपती हुई।उसकी आँखें बंद थीं, होंठों पर हल्का कंपन था, पर मुँह से कुछ नहीं--अब उसकी इजाज़त शब्दों से नहीं, उसके फैलाव से झलक रही थी।

उसके चेहरे पर सुकून नहीं, सिर्फ समर्पण था।मिश्राजी अब रुकने वाले नहीं थे--ये चेद अब सजे हैं... अगले तूफ़ान के लिए।

मिश्राजी ने न शादी की थी, न बच्चे हुए -- और औरत की चूत का सुख कितना लिया है, ये तो शायद कोई नहीं जानता।

पर आज जो उनके सामने खड़ी है, वो कोई आम औरत नहीं -- ये तो तीस साल की गरम, मदहोश चूत वाली मादा है, जो खुद चलकर उनकी ज़िंदगी में घुस आई है।

और अब, जब वो उसकी गांड चाटकर उठे, तो आँखों में भूख नहीं थी... अब वहाँ फैसला था।

अब उनकी आँखों में वही ठहराव था जो एक शिकारी की आँखों में आता है जब शिकार खुद सामने आकर गर्दन झुका दे।

अब खेल आगे जाना था, पूरे हक से।

मिश्रा जी अब भी झुकी कायला की गांड को घूर रहे थे -- थूक से भीगी दरार और काँपती जाँघें जैसे उन्हें और रोक रही थीं।

उन्होंने धीरे से उसकी कमर पर हाथ रखा -- दबाव नहीं, बस एक संकेत...

कायला ने खुद ही अपने हाथों को मोड़ा, और धीरे-धीरे उठकर सीधी हो गई -- जैसे हर हरकत अब उसकी मर्जी नहीं, उसी मर्द की इजाज़त से चल रही हो।

जैसे अब वो देखेगा, सीखेगा -- और समझेगा कि असली मर्द और मादा के बीच क्या होता है।

अब मिश्राजी ने हाथ बढ़ाकर कायला की कुर्ती पकड़ी।

बिना कुछ बोले, कायला ने अपने दोनों हाथ ऊपर कर दिए -- जैसे खुद को पूरी तरह पेश कर रही हो,

'ले लीजिए... अब ये जिस्म भी आपका।'कुर्ती ऊपर गई... और नीचे ज़मीन पर फेंकी गई -- जैसे कोई परत हटाई गई हो उस भरे हुए जिस्म पर से।

अब कायला ग्रे ब्रा में खड़ी थी, और नीचे की ओर उसकी चड्डी अब भी घुटनों तक झुकी हुई थी --बीच में चूत का हिस्सा खुला, गीला, और ललचाता हुआ।

ब्रा के अंदर से उसके दूधू ऐसे हिल रहे थे जैसे हर साँस पे अपनी जगह से बाहर आना चाहते हों -- और नीचे की चूत की सिलवटों से अब रस बहकर जाँघ तक सरकने लगा था...

मिश्राजी अब अपनी बनियान उतारते हैं --उनके पसीने और उम्र की गंध अब कमरे में ऐसी फैली थी जैसे किसी पुराने मर्द की चूसी हुई मादा फिर से हाजिर हो।

अंदर से बालों से भरी छाती निकलती है, और साथ में बूढ़े बदन से उठती एक अलग ही मर्दानी महक।

फिर उन्होंने कायला को धीरे से पीछे घुमा दिया -- अब वो सामने नहीं, पीठ करके खड़ी थी।

ब्रा की स्ट्रैप उसकी गोरी पीठ पर खिंच रही थी, और नीचे से गांड अब भी खुली थी -- मोटी, भारी, और नरम।

मिश्राजी की साँसें भारी हो चुकी थीं -- और कायला अब भी चुप,

बस एक जवान, मदहोश मादा की तरह मर्द के स्पर्श में पिघलती हुई।

मिश्राजी अब पूरी तरह काबू में आ चुके थे।

उम्र साठ की, मगर आँखों में लंड जैसी सख़्ती और नीयत में बूढ़े मर्द की भूख।

उन्होंने पीछे से झुकी हुई कायला की ब्रा का हुक खोल दिया।

क्लिक की हल्की सी आवाज़ के साथ वो कसाव ढीला पड़ा, और उसकी भारी 36B की छातियाँ थोड़ी हिलकर सांस लेने लगीं।

दोनों ब्रा स्ट्रैप्स को उन्होंने धीरे-धीरे नीचे सरकाया --

जैसे कोई मर्द अपने हक से किसी औरत के पर्दे हटा रहा हो।

ब्रा हटाकर उन्होंने उसे बगल में सोफे की ओर फेंक दिया।

अब मिश्राजी ने अपने पैरों से कायला की चड्डी और लेगिंग्स पकड़ी -- और धीरे-धीरे घुटनों से नीचे सरका दी।

कायला ने ख़ुद आगे एक-एक पैर उठाकर कपड़े उतारे -- जैसे अपनी नर्मी को खुद हवाले कर रही हो।

मिश्राजी ने भी अब अपना लोअर नीचे सरकाया --अब वो सिर्फ चड्डी में खड़े थे, और उसमें से लंड का उभार साफ़ दिख रहा था --

चड्डी में बंद मगर चिल्लाता हुआ।

कायला अब पूरी तरह नंगी थी -- सामने से भी, पीछे से भी।वो अब एक खुली किताब थी -- सामने से चूत की गीली लकीरें और पीछे से गांड की झुर्रियाँ ऐसे दिख रहीं थीं जैसे कोई पुरानी मगर भूखी कहानी अब फिर से पढ़ी जा रही हो।

छातियाँ खुली, चूत जाँघों के बीच से हल्की सी चमकती हुई, और गांड अब भी नरम और भारी।

मिश्राजी ने एक हाथ से उसकी छातियों में से एक को पकड़ा -- पूरी हथेली में समा रही थी, मगर उभार अब भी बाहर था।

दूसरा हाथ पीठ पर गया -- जहाँ ब्रा का निशान अब भी धँसा हुआ था, उस निशान को उँगलियाँ सहलाती हुई नीचे उतरीं...

कमर, फिर पेट, और सीधा वहाँ...

जहाँ उसकी चूत की झाड़ गीली सांसों से हिल रही थी।

मिश्राजी ने उँगली बीच में घुसाई -- और उसकी गीली पंखुड़ियाँ अब खुलने लगीं।

नरम, गरम, और बेकाबू...

कायला की देह अब काँप रही थी -- सांस तेज़, होंठ सूखे, मगर आवाज़ अब भी नहीं।

वो अब भी एकदम चुप -- एक ऐसी गुलाम मादा, जिसे बस महसूस करना आता है, विरोध नहीं।

मिश्राजी अब अपने भारी होंठों से उसकी पीठ चूम रहे थे --

हर चुम्बन में थूक और मर्दानगी का रंग था।

फिर अचानक... उन्होंने कायला को पकड़ा और मोड़कर सोफे पर बैठा दिया --

कायला अब पूरी तरह नंगी बैठी थी -- और सामने खड़े मिश्राजी, बस चड्डी पहने,जिसके ऊपर से उनका लंड फड़फड़ा रहा था -- जैसे कह रहा हो, अब इंतज़ार नहीं होगा..."

मिश्रा जी ने अपनी आखिरी परत भी उतार दी -- चड्डी धीरे से सरकाई, और उनका लंड अब सीधा तना हुआ जवान मिसाइल जैसा था, जैसे कोई शिकारी जो मादा को चीरने के लिए पैदा हुआ हो।

उनकी उम्र साठ थी, पर उनमें अभी भी उस लंड की ताकत थी जो किसी भी कुतिया को रात भर बाँध कर रख दे।

कायला सामने खड़ी थी, झुकी हुई, पूरी तरह नग्न--जैसे वफ़ादार देह का एक टुकड़ा, जो आज सिर्फ लंड की जागीर थी।

उसकी टाँगें हल्की खुली थीं, चूत की झाँटें रस-भरी चमक के साथ थीं--जैसे हर कोशिका पूछ रही हो, "अब..."

मिश्रा जी ने लंड थामा, हल्के से थूक करते हुए चमड़ी को ऊपर-नीचे किया, फिर उसे चूत के दरवाजे पर ठहराया--जैसे खुद कह रहे हों, "अब तेरा असली रास्ता खुलने वाला है।"

एक धीमा धक्का, फिर एक तेज़ झटका -- चूत ने पूर्ण रूप से मिश्रा जी का स्वागत किया। चूत की दीवारों ने जैसे पहला फूल खिला दिया -- एक धक्के की रस की बारिश।

"आह..." कायला की आवाज़ में कोई डर नहीं था, सिर्फ समर्पण की पुकार--एक मादा की सबसे सच्ची तैयारियाँ।

मिश्रा जी ने पेट के बल उसे झुका दिया, खुद ऊपर चढ़े और उसके कूल्हों को कसकर पकड़ लिया--हर एक धक्का अंदर तक गूंज रहा था।

नीचे की चूत गर्म थी, रस से लथपथ, और पूरी तरह मिश्रा जी के लंड के इंतज़ार में थी।

हर धक्का एक गीत था, चूत और लंड की टूटी रागिनी--जिसमें रस और हवा मिलकर गाती थी।

कुछ देर बाद मिश्रा जी ने कायला को पलटा दिया--पीठ के बल, दोनों पैर हवा में थे, और फिर उन्होंने उसके ऊपर भारी लंड को ताना।

उनकी साँसें तेज़ थीं; चुदाई अब गहराई पकड़ चुकी थी--हर धक्का गांड पर थप्पड़ की तरह जोरदार था।

मिश्रा जी ने कायला को सोफे के किनारे बिठाया। उसकी पीठ सोफे से टिकी, टाँगें खोल दीं, और चूत खुली थी--रस की धारियाँ उसे चमक रही थीं।

फिर मिश्रा जी ने एक नज़र उस पर डाली और हँसते हुए बोले-- "ये चूत अब बस मेरी नहीं रही... "

दो हाथों से गांड फैलाकर मिश्रा जी ने लंड को दरार पर टिकाया, फिर एक तेज़ धक्का -- फिर एक और।

"धप-धप" की आंधी चल रही थी कमरे में।

कायला को फिर से पेट के बल झुकाया गया, मिश्रा जी उसके पीछे चढ़े हुए, दोनों टाँगों के बीच में बैठे -- फिर से सीधी चूत।

हर हिलावट पसीने से भीगी थी, हवा गरम होती जा रही थी--किसी थकान की कोई उम्मीद न थी।

उनका लंड पूर्ण रूप से अपनी भूमिका में था--हर खिंचाव, हर धक्का चूत के रस को समेटकर बाहर आ रहा था।

फिर क्लाइमेक्स आया। कायला को चार हाथ-पाँव पर झुका दिया गया। गांड उठा हुआ, चूत खुल चुकी थी, और मिश्रा जी पीछे से तैयार थे।

उन्होंने गांड फैलाई, लंड रगड़ा, फिर एक जोरदार धक्का--चूत अब रस से टपक रही थी।

और फिर अचानक आखिरी धक्का -- लंड बाहर निकला, और गरम-गाढ़ा वीर्य सीधे कायला की गांड पर उँडेल दिया गया।

वीर्य की गरमी उसकी गांड से होते हुए जांघों पर बह रही थी -- कुछ बूँदें फर्श पर टपकीं।कायला अब भी उसी पोज़ में जमी हुई थी -- जैसे पूरे बदन का कंट्रोल निकल गया हो।

उसकी साँसें टूट-टूट कर बाहर आ रही थीं, और छातियाँ हर धड़कन पर हिल रही थीं।

मिश्रा जी ने धीमे से उसकी नंगी पीठ पर हाथ फेरा -- एक मर्द का मालिकाना स्पर्श।

'देख... ये अब सिर्फ मेरी नहीं रही,' उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा, 'ये अब वो मादा है जिस पर मोहर लग चुकी है...'कायला ने कुछ नहीं कहा -- बस आँखें बंद कर लीं, जैसे उसने खुद को पूरी तरह सौंप दिया हो।

फिर थोड़ी देर बाद, उसने थरथराते हाथों से कपड़े उठाए -- और उठते वक्त उसकी जांघों के बीच से वीर्य की एक बूँद नीचे सरकती चली गई..."

कायला धीरे-धीरे उठी, कोई शब्द नहीं बोली। कपड़े पहनने लगी, बाल ठीक किए, बैग उठाया, और दरवाज़े की ओर बढ़ी।

कायला ने दरवाज़ा खोला, लेकिन उससे पहले एक बार पलटकर मिश्रा जी की ओर देखा -- उनकी नज़रें अब भी उसकी खुली जाँघों की तरफ थीं।

उसने कुछ नहीं कहा, बस आँखें झुका लीं।

फर्श पर गिरा वीर्य अब भी लिपका हुआ था -- और उसके अंदर की गरमी अब भी थमी नहीं थी।

मिश्रा जी चड्डी पहनकर सोफे पर बैठे रहे आँखें बंद कीं... और थकी सी आवाज़ में बस इतना कहा -- "ऐसे ही आती-जाती रहना..."

दरवाज़ा बंद हुआ, लेकिन उस कमरे की हवा अब भी उसी गंध से भारी थी...

एक और मादा की सब्मिशन की खुशबू।
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#3
Season I - Episode II

रात का वक़्त था। आसमान पर आधा चाँद, और मोहल्ले की गली में पीली स्ट्रीटलाइट्स की टिमटिमाती रोशनी।

कायला के मम्मी-पापा बाहर गए थे, और घर में गाढ़ा सन्नाटा पसरा था।

उस सन्नाटे में, एक गूंगी, गाढ़ी भूख उसके अंदर साँस लेने लगी -- वही, जो मिश्रा जी के साथ पहली बार के बाद से कभी शांत नहीं हुई थी।

कायला के जिस्म में एक खिंचाव-सा उठा -- जैसे उसके भीतर मादा कुतिया की आत्मा पलट रही हो,जिसे न इज़्ज़त चाहिए न इजाज़त।

धीरे-धीरे उसने कपड़े उतारने शुरू किए -- हर परत उतरते ही साँसें भारी होती गईं।

नंगी होने के बाद, अलमारी से पुराना चमड़े का पट्टा निकाला, गले में बाँधा।

आईने में खुद को देखा -- भारी, झूलते उरोज; गोल, मांस से भरी गांड हवा में; जाँघों के बीच चमकती, गीली चूत; और चेहरा... जैसे किसी मालिक की पालकायला मादा, पूरी तरह पेश।

चारों हाथ-पाँव पर झुककर वो आँगन की तरफ बढ़ी। ठंडी मिट्टी ने घुटनों को चूम लिया, रात की हवा ने नंगी चमड़ी पर सनसनाहट दौड़ा दी।

नीम के पुराने पेड़ के पास जाकर रुक गई -- गर्दन में पट्टा, भारी छातियाँ नीचे झूलतीं, गांड उठी हुई, और चूत से गरम भाप जैसी महक उठती हुई।

तभी गली का एक आवारा कुत्ता अधखुले गेट से अंदर झाँकने लगा।

उसकी आँखें नंगी मादा के जिस्म पर टिक गईं -- और वो ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा।

गेट की दरार से कायला की गोरी चमड़ी पीली रोशनी में चमक रही थी, बाकी सब छाया में छुपा था।

यही शोर सुनकर सामने वाले घर से मोनू बाहर निकला -- 35 साल का, लंबा-चौड़ा, फिट मगर थोड़ा भारी, शादीशुदा, और आँखों में भूखी चमक।

उसने पहले कुत्ते को लात मारकर भगाया, फिर आधा खुला गेट देखकर धीरे-धीरे अंदर झाँका।

गेट से झाँकते ही उसकी साँस अटक गई --

अंधेरे में पहले बस पीठ और दूधों की झलक दिखी, फिर आँखें मिलते ही उसने साफ़ देखा -- कायला, नंगी... चारों हाथ-पाँव पर, भारी गांड हवा में, हल्की खुली चूत, गर्दन में पट्टा, और ठंडी हवा में काँपती।

मोनू के होंठों पर वही शिकारी मुस्कान थी।

लंड पैंट में धड़क रहा था, जैसे कह रहा हो -- "बस निकाल मुझे..."

गेट को उसने धीरे से खोला, चर्रर्र की आवाज़ गूँजी, और वो फिसलते कदमों से पेड़ की तरफ बढ़ा।

उसकी नज़र कायला के गले में बँधे पट्टे से नीचे सरकी -- भारी, झूलते दूध, पसलियों से नीचे गोल पेट, और फिर हवा में उठी हुई कायला की गांड, जिसके नीचे चमकती गीली दरार में हल्की चाँदनी पड़ रही थी।

पास पहुँचते ही उसने पट्टे की जंजीर को उँगलियों में लपेटा, हल्के झटके से खींचा।

कायला की गर्दन आगे को आई, और कायला चारों पाँवों पर रेंगते हुए उसकी तरफ सरक गई।

दोनों की नज़रें मिलीं -- कायला की आँखें पूरी तरह भीगी हुई, जैसे कह रही हों "जो चाहो करो".

मोनू झुककर कायला के कान के पास आया --

"अरे वाह... कायला कुतिया बनके घूम रही है यहाँ... ये पट्टा किसने बाँधा?"

कायला के कान में उसकी गर्म साँस उतरी, और कायला ने अनजाने में होंठ काट लिए।

वो कायला को देखने का मज़ा ले रहा था, और साथ-साथ कायला को छूने की शुरुआत।

पहले उँगलियाँ कायला के गले से होते हुए कंधे पर गईं -- हल्के-हल्के, जैसे तुझे चिढ़ा रहा हो।

फिर कंधे से नीचे सरकते हुए, हथेली कायला के भारी दूधों तक पहुँची।

उसने एक-एक दूध को पूरी हथेली में भरकर तौला, जैसे उनका वज़न महसूस कर रहा हो।

अंगूठों से निप्पल के चारों ओर गोल-गोल घूमाया, फिर धीरे-धीरे दबाव बढ़ाता गया --

पहले हल्की पकड़, फिर मसलना, और फिर चुटकी लेकर निप्पल मरोड़ना।

कायला की साँसें भारी होने लगीं, और कायला के होंठों से हल्की कराह निकली।

मोनू ने निप्पल को होंठों में लिया, पहले जीभ से चाटा, फिर हल्के दाँतों से दबाया।

उसकी जीभ बार-बार टिप पर रुकती, जिससे कायला के पूरे जिस्म में झटके दौड़ते।

इसी बीच, उसका दूसरा हाथ कायला की पीठ के नीचे सरकने लगा।

पहले कायला की गांड के गोल हिस्सों को दबाया, फिर हथेली से गाल अलग कर दरार में उँगलियाँ ले गया।

कायला की गरम दरार पर उँगली की हल्की रगड़ हुई, और चूत से चिपचिपा रस अंगूठे पर लग गया।

वो मुस्कुराया --

"ऑफिस जाती है तो कुछ दिखाई नहीं देता, सब कुछ ढका हुआ..." उसने धीरे से कहा, निप्पल को फिर से चूसते हुए,

"आज तो सब नंगा सामने है... और इतना गीला... जैसे पहले से मेरा इंतज़ार कर रही हो।"

उसने उँगली चूत में हल्के से डाली -- पहले सिर्फ टिप, फिर धीरे-धीरे आधी, फिर पूरी।

उँगली अंदर-बाहर होने लगी, और हर बार बाहर निकलते ही रस की पतली लकीर कायला की जाँघ पर गिरने लगी।

मोनू ने दूसरी उँगली भी डाल दी, और अब वो दोनों को अंदर गहराई में घुमाते हुए, कायला के रस को फैलाने लगा।

कायला पीछे की तरफ हल्का-सा झुक गई, जैसे उसकी उँगलियों को और जगह दे रही हो।

वो बीच-बीच में कायला की गांड पर थपकी भी देता, जिससे तेरा पूरा बदन हिल जाता।

उसकी दो उँगलियाँ कायला की चूत में गहरे तक धँसी हुई थीं।

हर धक्का अंदर तक जा रहा था, और हर बार बाहर आने पर रस की पतली, गरम परत उसकी उँगलियों पर चिपक जाती।

मोनू का अंगूठा बीच-बीच में कायला के चूत के ऊपर वाले हिस्से को हल्के-हल्के रगड़ देता, जिससे कायला के शरीर में छोटे-छोटे झटके उठते।

फिर उसने दूसरी हाथ को कायला की गांड की दरार के ऊपर लाकर बस वहीं रगड़ना शुरू किया --

गांड के छेद के ठीक ऊपर उसकी उँगली का दबाव, लेकिन अंदर नहीं डाली...

बस गीलेपन को फैला रहा था, जैसे धीरे-धीरे कायला को तैयार कर रहा हो।

कायला के होंठों से एक लंबी कराह निकली --

"म्म्म... आह..."

कायला की जाँघें अनजाने में और खुलने लगीं।

मोनू ने कायला की चूत में डली दोनों उँगलियों को एक आखिरी बार गहरे तक धकेला, फिर धीरे-धीरे बाहर निकाला।

रस से चमकती उसकी उँगलियाँ चाँदनी में गीले शीशे जैसी लग रही थीं।

उसने उन्हें आँखों के सामने उठाकर देखा, फिर कायला के कान के पास झुककर फुसफुसाया --

"देख... मेरी कुतिया कितनी गीली है...तू"

उसकी गीली उँगलियाँ अब कायला के निप्पल पर आ गईं -- ठंडे रस की नमी और गर्म उँगली का स्पर्श, दोनों ने मिलकर कायला को और काँपा दिया।

वो हल्के से मुस्कुराया, और फिर से हाथ नीचे ले गया, जैसे तय कर रहा हो कि अब अगला कदम उठाना है या कायला को और छेड़ना है।

मोनू ने पैंट की बेल्ट खोली, फिर ज़िप नीचे खिसकाकर पैंट और चड्डी को पूरी तरह टखनों तक गिरा दिया।

अब उसका मोटा, गरम, आधा खड़ा लंड आज़ाद होकर बाहर था -- ऊपर की नसें हल्की-हल्की धड़क रही थीं, और नीचे भारी, गरम अंडकोष हल्का-हल्का झूल रहे थे।

वो एक कदम आगे आया, लंड कायला के होंठों से बस एक इंच दूर।

कायला की नज़र उसके लंड से ऊपर उसकी आँखों में गई, और फिर वापस नीचे उतर आई।

कायला धीरे-धीरे दोनों हाथों से उसे थामती है -- एक हाथ लंड पर ऊपर-नीचे सरकता हुआ, दूसरा हाथ नीचे अंडकोष को सहलाता हुआ।

मोनू ने हल्की कराह निकाली, "हाँ... ऐसे ही..."

कायला झुककर पहले अंडकोष को चूमती है, फिर उन्हें एक-एक करके मुँह में लेकर जीभ से चारों ओर गीला करती है।

कायला की गरम साँस और जीभ की नमी से उसके अंडकोष भारी और और भी गरम हो जाते हैं।

फिर कायला ऊपर आती है, लंड के नीचे से टिप तक जीभ फेरते हुए, जैसे पूरी लंबाई को नाप रही हो।

टिप पर पहुँचकर उसे गोल-गोल चाटती है, और धीरे से मुँह में खींच लेती है।

पहले आधा, फिर पूरा -- होंठ कसकर, जीभ चारों तरफ घूमती हुई।

लार कायला के होंठों के कोनों से बहकर ठुड्डी तक आ रही है, और मोनू के भारी अंडकोष अब कायला की ठुड्डी से टकराकर झूल रहे हैं, हर बार गहरी ठोकर के साथ।

मोनू ने कायला के बालों की मुट्ठी पकड़ी, और धकेलना शुरू किया --

हर बार लंड कायला के गले की गहराई तक धँसता, कायला की आँखों में पानी आ जाता, और मुँह से चप-चप-चप की आवाज़ गूँजती।

"चूस... ऐसे जैसे मेरी आखिरी साँस बचानी हो..." वो दाँत भींचकर फुसफुसाता है।

कायला थोड़ी देर बाद लंड मुँह से निकालती है, होंठ लाल और गीले, और कहती है --

"आह... मोनू... जोर से सांस ...लेती है"

मोनू बस मुस्कुराता है, और लंड को कायला के होंठों पर फिर रखता है --

"अभी तो बस शुरुआत है, कुतिया... इसे पूरा गीला कर..."

मोनू ने कायला के होंठों पर लंड टिकाया, आँखों में सीधी नज़र डालते हुए हल्के से अंदर धकेला।

इस बार वो गला तक नहीं ले गया -- बस इतना कि कायला गरम, कसकर पकड़े होंठों से उसे गीला करती रहे।

कायला की जीभ हर बार नीचे की नस पर सरकती, और मोनू की साँस भारी होती जा रही थी।

कुछ धक्कों के बाद उसने खुद ही बाहर खींच लिया, और गरम, गीले लंड को कायला के होंठों और गाल पर हल्के-हल्के रगड़ने लगा।

लार और उसकी गरमी कायला के चेहरे पर फैल गई।

वो झुककर कायला के कान में फुसफुसाया --

"कुतिया... क़िस्मत में जो होता है... सब मिलता है... और कायला की क़िस्मत में मैं हूँ।"

उसने लंड की टिप को फिर कायला के होंठों पर दबाया, जैसे तुझसे फिर मुँह में लेने की माँग कर रहा हो, और कायला के बाल अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ लिए।

जैसे ही रिदम तेज़ हुआ, फोन बजा -- स्क्रीन पर "Mummy"।

मोनू ने कायला के बाल कसकर पकड़ लिए, इशारा किया -- मुँह से मत निकालना, और कॉल उठा ली।

आवाज़ एकदम सीधी-सादी -- "हाँ मम्मी..."

मम्मी: "कहाँ है मोनू? पापा बुला रहे हैं।"

मोनू (कमर धीरे-धीरे चलाते हुए): "अरे... इधर गुप्ता अंकल के घर में एक कुत्ता घुस आया था..."

मम्मी: "तो?"

मोनू (कायला के सिर को और नीचे धकेलते हुए): "सोचा देख लूँ... फिर सुना कि गुप्ता अंकल घर पे नहीं हैं... उनकी लड़की अकेली थी... तो कुत्ते को भगा रहा था।"

मम्मी: "अच्छा, कब आ रहा है?"

मोनू (गहरी साँस दबाते हुए): "बस थोड़ी देर में... यहाँ का काम निपटा के..."

नीचे कायला लार से उसका लंड भिगो रही थी, और गले में उतरते हर धक्के के साथ हल्की कराह रोकने की कोशिश कर रही थी।

मम्मी: "ठीक है, जल्दी आना... पापा पूछ रहे थे।"

मोनू (होंठों पर मुस्कान): "जी मम्मी... आता हूँ..."

कॉल कटते ही उसने कायला के बाल छोड़कर तुझे खड़ा किया, पलटा, और चारों हाथ-पाँव पर झुका दिया।

"अब चूत में ले मेरी...कुतिया" -- और एक झटके में पूरी तरह अंदर अंदर घुसना चाहा। पर नाकाम

फिर मोनू ने कायला की कमर पकड़कर और झुका दिया -- अब कायला की गांड एकदम ऊपर उठी हुई थी, और चूत पूरी तरह खुली हुई।

उसने एक हाथ से पेड़ का तना पकड़कर बैलेंस बनाया, दूसरे से अपना मोटा लंड पकड़ा।

वो हल्का झुका, अपने होंठों से कायला के कान के पास फुसफुसाया --

"पीछे से आसान नहीं होता... तेरी जैसी टाइट चूत में घुसाने के लिए सही तैयारी चाहिए..."

उसने लंड पर थूक गिराया, फिर हाथ से पूरी लंबाई पर मल दिया -- चिकनाई और गर्माहट एक साथ।

फिर उँगलियों में थोड़ा थूक लेकर कायला की चूत के होंठों पर लगाया, और धीरे-धीरे उँगली अंदर सरकाई।

"म्म्म... ये देख... कैसे पकड़ रही है मेरी उँगली..."

कायला हल्की सी कराह निकाली, और मोनू ने उँगली से कायला के अंदर गोल-गोल घुमाकर नमी फैला दी।

अब उसने लंड का टिप कायला के चूत के मुहाने पर रखा, हल्के-हल्के दबाया --

पहले बस थोड़ा सा अंदर, फिर एकदम झटके से पूरी गहराई तक धँसा दिया।

कायला की कमर एकदम आगे को धकेली, मुँह से आह्ह की आवाज़ निकली।

"बस... अब देख कैसे फिसलता है..."

वो धीमे-धीमे बाहर खींचता और फिर पूरे बल से अंदर मारता -- हर बार 'थप-थप' की गीली आवाज़ के साथ।

लंड कायला के अंदर इतना गीला हो चुका था कि हर स्लाइड में एक गरम, चिकना एहसास फैल जाता।

मोनू ने लंड बाहर निकाला और कायला को और झुकाया, कायला के दोनों हाथ ज़मीन पर टिके हुए, गांड हवा में।

उसने कायला के पीठ के नीचे से हाथ बढ़ाकर दूध को मसलते हुए, दूसरे हाथ में थूक भरी और अपने मोटे, धड़कते लंड पर मल दी।

फिर उसने एक भरपूर थूक कायला की चूत के मुँह पर टपकाई, उँगली से हल्के-हल्के घुमा कर गीलापन फैला दिया।

"अब देख, कुतिया..." वो फुसफुसाया, और लंड का सिरा कायला की चूत के चेद पर रख दिया।

पहले हल्के-हल्के रगड़ा, ताकि कायला और भीग जाए, फिर एक झटके में आधा लंड अंदर डाल दिया।

कायला की चीख सी निकल पड़ी -- आह्ह...... मम्मी, पर रात में ये कहीं दीवारों के बीच दब गयी।

मोनू ने पकड़ बनाए रखी, हल्का-सा बाहर खींचा, फिर और अंदर धकेला।

धीरे-धीरे पूरा लंड कायला के अंदर डूब गया, और उसकी जाँघें, जिन पर हल्के बाल थे, कायला की चिकनी गांड से टकराईं।

उस रगड़ में पसीने की गरमी और बालों की चुभन थी -- कायला सिहर गई।

फिर शुरू हुआ असली खेल --

"थप-थप-थप"... हर धक्के पर उसकी जाँघें कायला की गांड से टकरातीं, रस की बूंदें नीचे गिरतीं, और हवा में गीली ताल गूँजती।

मोनू के हाथ कभी कायला के दूध दबाते, कभी गांड पर जोरदार थप्पड़ मारते, और कभी उँगलियाँ चूत के मुँह पर दबाते।

"इतनी टाइट चूत है कायला की ... लगता है पहली बार खुल रही है आज पूरा," उसने कराहते हुए कहा।

"अह्ह्ह्ह.............. आराम से," कायला हाँफते हुए बोली।

उसके हर ठोके के साथ, लंड फिसलकर और गहराई में जाता, फिर गीली आवाज़ के साथ बाहर आता।

पसीना उसकी छाती से टपककर कायला की पीठ पर गिरता, और दोनों की साँसें तेज़ से तेज़ होती जातीं।

मोनू का चेहरा कायला के गले के पास आ गया, उसकी सांसें गरम और टूटती हुई।

आखिरी कुछ धक्के इतने गहरे थे कि लगता था पूरा पेट भर देगा।

अचानक वो लंड बाहर खींचता है, और बिना वक्त गँवाए एक झटके में कायला को पकड़कर पलट देता है।

कायला का सीना पेड़ से सट जाता है -- भारी, पसीने से चमकते उरोज तने के खुरदरेपन से दब जाते हैं, निप्पल उस छूअन से और भी सख्त हो जाते हैं।

मोनू पीछे से कमर पकड़ता है, लंड को जड़ तक तानता है, और गरम, गाढ़ा वीर्य कायला की गांड और जांघों के बीच गिरा देता है।

गर्मी का एक लहर सा अहसास फैल जाता है -- मोटी, गरम बूँदें नीचे सरककर कायला की टांगों के बीच से बहने लगती हैं।

वो हाथ से वीर्य कायला की गांड पर फैला देता है -- धीरे, जैसे अपने नाम का निशान छोड़ रहा हो।

फिर कायला के कान के पास झुककर फुसफुसाता है,

"अब याद रख... ये चूत मेरी है।"

तभी दूर से एक कार रुकने की आवाज़ आती है -- कपूर अंकल लौट आए हैं। अचानक दूर से कार का हॉर्न सुनाई दिया।

कपूर अंकल अपनी कार से उतरे और सीधे घर की तरफ चले गए। कायला के घर के सामने रहते हैं इनका बेटा है सनी।

मोनू झट से पैंट ऊपर करता है, कायला को देख मुस्कुराता है,

"दीवाली आने वाली है... अब कायला मेरी पटाखा है... कैसे फूटेगी, ये उस दिन बताऊँगा।"

वो गली के मोड़ पर मुड़कर अपने घर की तरफ चलता है।

कायला वहीं पेड़ से सटी, अभी भी सांसें संभालने की कोशिश में, हल्की कांपती खड़ी है।

उधर मोनू के घर के गेट पर घंटी बजने की टन-टन आवाज़ सुनाई देती है।

उसकी मम्मी की ऊँची आवाज़ साफ सुनाई देती है --

"बहुत देर कर दी... आधा घंटा पहले कॉल किया था! चल, पापा बुला रहे हैं।"

दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आती है... और सब चुप।

कायला धीरे-धीरे घर के अंदर जाती है, सोफे पर गिरती है, और थकान, पसीना, और वीर्य की मिली-जुली गरमी में बेसुध होकर सो जाती है।
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#4
Bahut badhiya...
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#5
Season I - Episode 3

शाम के करीब चार बजे का समय था, मोहल्ले में दिवाली की रौनक और सर्दी की चुभन -- दोनों अपनी पूरी शिद्दत पर थीं। हर घर में रंग-बिरंगी लाइटें लटक रही थीं, लेकिन कायला के आँगन का नज़ारा -- किसी भी रोशनी से ज़्यादा आँखें चुराने वाला था।

वो आँगन में झुकी हुई रंगोली बना रही थी, उसकी कमर की लचक ऐसी थी कि लोअर उसकी भारी गांड की दरार में बुरी तरह फँसा हुआ था। हर बार जब वो आगे झुककर रंग भरती, कपड़े में दबा बैंगनी चड्डी का पतला किनारा ऐसे उभर आता--जैसे किसी को सीधा उँगली रखकर खींच लेने का न्यौता दे रही हो... और नीचे से हल्की-सी गंध, गरम साँसों जैसी, हवा में तैरकर सीधा दिमाग पे चढ़ जाती। वो पतली-सी लकीर चड्डी और त्वचा के बीच की, बस इतनी कि सोचते ही उँगलियाँ खुद-ब-खुद कसने लगें।

उसका गोरा, भरा-पूरा बदन पसीने की हल्की नमी में चमक रहा था। ढीले लोअर और कसी हुई ब्लैक शॉर्ट टी-शर्ट के बीच से कभी-कभी बैंगनी ब्रा की स्ट्रैप बाहर फिसलकर दिख जाती। हवा का झोंका आया, टी-शर्ट उसके 36B के गोल-मटोल, लचकते दूधों पर चिपक गई--जैसे कपड़े हटाना अब बस औपचारिकता रह गया हो। निपल की हल्की-सी उभार ने कपड़े के नीचे अपनी मौजूदगी का ऐलान कर दिया, और वो गरमाहट से फड़फड़ाती सांसें... जैसे किसी को सीधे पकड़कर दबा लेने का इशारा कर रही हों।

उसके बालों से पसीने की बूंदें गर्दन और कॉलरबोन पर लुढ़क रही थीं। पसनीे की खुशबू में मिली उसकी देह की गरमी और हर हरकत में मांस का धीमा-धीमा खेल -- सब मिलकर ऐसा मंजर बना रहे थे कि कोई भी मर्द,चाहकर भी, अपनी नज़र और होश काबू में न रख पाए।

बाजू के घर से मोनू निकलता है -- कायला का पड़ोसी, मोहल्ले के कॉरपोरेटर का बेटा... और अब तो पुराना चोदन भी। आँखों में वही भूख थी -- जो एक बार चख चुका हो, उसकी प्यास और गहरी हो जाती है। साथ में आया था सनी -- सामने वाले घर का लड़का। बाहर रहता है, बस दिवाली पर ही यहाँ आता है अपने मम्मी-पापा के साथ त्योहार मनाने।

दोनों गले मिले और फिर नज़रें सीधी कायला के झुके हुए शरीर पर। लोअर की सिलवटें उसकी गांड के बीच ऐसे फँसी थीं जैसे वहीं अटककर कह रही हों -- "खींच ले मुझे"

मोनू (आँखें मिचमिचाकर, होंठ चाटते हुए): "देख बे सनी... सामने जो रंगोली बना रही है -- वही है कायला।"

सनी (हँसकर, नज़रें चिपकाकर): "भाई... लग रहा है जैसे चूत रंगों से नहीं, किसी और रस से भीगी हो। माल देखके ही लंड भारी हो गया।"

मोनू (धीमे, भारी साँस में): "साले, तू सोच रहा है... मैं तो इसे चख चुका हूँ। याद है पिछली बार जब इसके मम्मी-पापा बाहर गए थे...? यहीं आँगन में, नीम के पेड़ के तले पकड़ा था इसे। पूरी नंगी... पीठ पेड़ से चिपकाकर, गांड दोनों हाथों में भर के, चूत में लंड ऐसे ठोंका कि नीम के पत्ते भी हिल-हिल के गवाही दे रहे थे। पूरी रात इसकी सिसकारियाँ मोहल्ले में गूँज रही थीं।"

सनी (साँस खींचते हुए, आँखें लाल): "क्या बात कर रहा है बे... सुनते-सुनते ही खून दौड़ रहा है।"

मोनू (हल्की मुस्कान के साथ): "और आज मन कर रहा है फिर से वही दीवाली जलाऊँ... पर इस बार तू भी साथ होगा। आधा तू, आधा मैं... और बीच में इसकी कराहें।"

सनी (हँसकर, पर आवाज़ भारी): "भाई... अगर तूने दिला दिया न, तो लंड पे पटाखा बाँध के फोड़ दूँ।"

कायला अब भी झुकी हुई थी -- रंग उठाती, उँगलियाँ पोंछती, और कभी-कभी नीचे के होंठ को हल्के से दबा देती। उसके चेहरे पर शांति थी, मगर कपड़ों में सुलगता हुआ ताप... हर हरकत में एक लज्जा, लेकिन उस लज्जा के नीचे गहराई तक भीगी हुई चूत की धड़कन।
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#6
मोनू ने फोन निकाला और कॉल किया --

मोनू: "कायला... आज रात प्लान है। कोई बहाना बनाकर निकल लेना -- और इस बार सनी भी साथ रहेगा... मतलब दोनों मिलकर तेरी दीवाली जलाएँगे।"

उसके होंठों के किनारे हल्की मुस्कान तैर गई, जैसे किसी ने पहले से ही उसके भीतर की आग को पहचान लिया हो।कायला ने फोन काँधे से थामे रखा... झुकी ही रही, आवाज़ धीमी मगर बुझी नहीं।

कायला: "हम्म... ठीक है..."

उस एक "हम्म" में, एक पूरी रात की कराहें, आहें और गीलेपन का वादा छुपा था।

दिवाली की शाम

हर घर में रौशनी थी, लेकिन कुछ घरों के अंदर अंधेरा अब भी बदन में उतरने को तैयार था।

कायला ने अपने सफेद अनारकली सूट में खुद को तैयार किया -- अंदर वही बैंगनी ब्रा और चड्डी। ब्रा के टाइट हुक में दूध हल्के-हल्के उभर आए थे, और चड्डी का पतला कपड़ा उसकी भीगी चूत की दरार में हल्का-सा घुसकर चिपक गया था। नीचे चुस्त सफेद चूड़ीदार उसकी मोटी जाँघों से चिपका हुआ। बदन ढका हुआ था, लेकिन कपड़ों के नीचे गरमी की लहरें पहले से ही दौड़ रही थीं।

बाल सँवारते वक़्त उसकी उंगलियाँ हल्के-हल्के काँप रही थीं... नज़रें झुकी हुईं, मगर दिल की धड़कन ऊपर चढ़ी हुई। काजल की पतली लाइन आँखों में डाली, होंठों पर कुछ नहीं लगाया... फिर शीशे में अपनी ही आँखों में देखते हुए, हल्की सी मुस्कान के साथ जैसे खुद से कहा --

"आज तू फिर से चूसी जाएगी... और इस बार अकेले नहीं।"

सीने से लगती ब्रा के नीचे दूधों में हल्की सिहरन थी... अनारकली का कपड़ा उनकी लचक को महसूस कर रहा था। चुस्त चूड़ीदार के अंदर, चूत की गरमी धीरे-धीरे फैल रही थी, वहाँ हल्की नमी भी ... कपड़ा भीगने लगा था।

उसने जलता दिया उठाया और घर के बाहर रखे दीप सजाने लगी। हर बार जब वो झुकती,दुपट्टा गले से नीचे गिरकर उसके भरे दूधों के सिरों पर चिपक जाता, और हवा के हल्के झोंके में कपड़ा निप्पल की टिप पर कसने लगता। नीचे कपड़े की परतों के बीच से उसकी मोटी, भरी जाँघों की गरमी सीधी ऊपर उठ रही थी।

कायला के घर के सामने, सनी के घर के गेट पर मोनू और सनी खड़े थे। दोनों ने कुर्ता-पायजामा पहना था, लेकिन नज़रों में दीयों की चमक नहीं -- कायला के दूधों और गांड की गरमी थी। सनी की आँखें जैसे उसके हर कदम पर उसकी गांड के झटकों को माप रही थीं, और पायजामे के नीचे उसका उभार बढ़ता जा रहा था।

दिये रखकर वो अंदर आई और मिठाई की थाली उठाने लगी, फिर अपनी मम्मी से कहा --"मम्मी... गुलाब जामुन नहीं हैं मिठाई में। पापा शायद लाना भूल गए।"

मम्मी ने माथा सिकोड़ा,फिर उसने दीयों की एक थाली उठाई और एक कायला को दे दी और बाहर आँगन में निकलते हुए वह बोली -- अब क्या करूँ? तू एक काम कर... फिर बोलीं --"अरे वो तो दो घंटे बाद आएँगे पूजा से पहले... तू ही ले आ, अभी टाइम है।"

कायला ने सिर हिलाया, लेकिन अंदर की धड़कन और तेज़ हो गई, पेट में तितलियाँ उड़ने लगीं।

तभी मोनू और सनी सामने आ गए --मोनू, "नमस्ते आंटी, हैप्पी दिवाली!"

सनी, "हैप्पी दिवाली, आंटी!"

मम्मी मुस्कराकर बोलीं -- "हैप्पी दिवाली बेटा, कैसे हो तुम दोनों?"

दोनों: "बढ़िया हैं, आंटी।"

मोनू ने चालाकी से कहा --" आंटी क्या कायला, मिठाई लेने जा रही हैं क्या? हम भी जा रहे हैं, साथ ले आते हैं।"

मम्मी ने तुरंत हामी भर दी --"हाँ, चले जाओ बेटा... अभी पूजा में टाइम है।"

ये सुनते ही मोनू ने सनी को आँख मारी --"जा, कार निकाल ला फटाफट... आज की मिठाई गरम-गरम चाहिए।"

कायल़ा की मम्मी अंदर जाने लगती और बोलती हैं -- "कायल़ा, तू होके आ, मैं बाकी का काम देखती हूँ, ज्यादा कुछ बचा नहीं है।"

सनी कार लेने गया, तब मोनू कायला के कान के पास झुककर फुसफुसाया -- "थोड़ा धीरे चल... और गांड हिलाना मत भूल... सनी को मज़ा लेने दे पीछे से उसको भी पता चलना चाहिए तू क्या चीज़ है।"

उसकी गरम साँसें कायला की गर्दन से नीचे उतर रही थीं, जैसे कपड़ों के अंदर उसकी रीढ़ की हड्डी तक सरक रही हों।

कायला ने कुछ नहीं कहा... बस अपनी चाल थोड़ी धीमी कर दी। सफेद पायजामा हर क़दम पर उसकी गोल गांड से खिंचने लगा... चाल में हल्का झटका था -- और सनी की निगाह सीधी वहाँ अटक गई।

अब वो रंगोली वाली लड़की नहीं थी -- आज की रात दो लंडों की दीवाली बनने जा रही थी।

मोनू और कायला आगे चल रहे थे, सनी कार लेकर पीछे आ रहा था -- उसकी नजरें कायला की मटकती गांड पर जमी थीं।

सनी ने कार उनके पास रोकी। कायला अंदर बैठी -- पीछे की सीट पर, साथ में मोनू। सनी ड्राइविंग सीट पर। बैठते ही मोनू का हाथ उसके घुटने पर टिक गया,

और उंगलियाँ धीरे-धीरे पायजामे के कपड़े पर घूमने लगीं। कायला की सांसें तेज़ हो गईं, आँखें सड़क पर थीं लेकिन बदन पीछे की सीट पर कैद हो चुका था।

गाड़ी धीमे-धीमे आगे बढ़ी... मगर कायला की साँसें तेज़ हो गईं। वो जानती थी, ये रास्ता मिठाई की दुकान का नहीं -- ये चूत की थाली सजने का रास्ता था।

उसका दिल धड़क रहा था... मिठाई का रस तो बस बहाना था, आज उसकी चूत का असली प्रसाद चढ़ने वाला था।

गाड़ी कुछ ही दूरी चली थी... लेकिन शीशे बंद थे, और अंदर अब साँसें भारी हो चुकी थीं। कायला की चुस्त सफेद चूड़ीदार के नीचे उसकी मोटी जाँघें पसनीे से गीली थीं -- वहाँ से उठती गरमी अब पूरे कार में फैल रही थी, और मोनू की साँसों में घुल रही थी।

कार के अंदर हल्की-सी धुंध जमने लगी थी, और हवा में पसनीे, इत्र और भीगी चूत की मिली-जुली खुशबू तैर रही थी -- इतनी भारी कि सनी भी स्टीयरिंग पर उंगलियां कसने लगा।

मोनू (हल्की मुस्कान के साथ, आँखें कायला के बदन पर गड़ाए): "कायला... मिठाई तो हमारे पास पहले से है... अब तो बस

टेस्ट लेना बाकी है।"

कायला ने सिर झुका लिया, मगर उसकी उँगलियाँ सीट की कुंडी कसने लगीं -- जैसे चुपचाप कह रही हों, "अब और मत रुकाओ।" वो पहले भी मोनू के लंड का मज़ा ले चुकी थी... और जानती थी कि अब जो होने वाला है, वो सीधा उसकी रगों में उतर जाएगा।

उसकी जाँघें हल्के-हल्के आपस में रगड़ने लगीं, जैसे लंड के लिए जगह तैयार कर रही हों।

मोनू ने सीट से झुककर हाथ बढ़ाया -- धीरे से उसकी अनारकली को नीचे से पकड़ा और ऊपर की ओर सरकाया। कायला ने कुछ नहीं कहा... बस आँखें आधी मूँद लीं और हाथ ऊपर कर दिए, जैसे खुद अपने कपड़े से जुदा होने की इजाज़त दे रही हो।

अनारकली अलग हुई, तो मोनू की नज़रें सीधे बैंगनी ब्रा पर पड़ीं। उसने कायला को हल्का सा अपने तरफ घुमाया... उसकी गोरी पीठ पर ब्रा का पतला सा स्ट्रैप था। 'क्लिक' -- दोनों हाथों से मोनू ने स्ट्रैप खोला, और ब्रा पैरों तक आकर रुक गई।

उसने उसके निप्पलों को दोनों अंगूठों से दबाया, हल्का घुमाया, और फिर एक पर होंठ रखकर उसे गर्म-गर्म चूस लिया -- कायला के मुँह से हल्की सिसकारी निकली।

अब कायला के दूध खुले थे -- गुलाबी, तने हुए, जैसे किसी को बुला रहे हों कि आ, चूस के सारा रस पी जा। उसकी साँसें और तेज़ थीं, होंठ हल्के काँप रहे थे।

मोनू ने उसका दुपट्टा, चूड़ीदार और अनारकली एक तरफ संभाल कर रख दिया -- ताकि बाद में पहनने में परेशानी न हो। अब बस बैंगनी चड्डी बाकी थी -- चिपकी हुई, भीगी हुई, गांड और चूत के हर कर्व को जकड़े हुए।

मोनू ने बिना एक पल गँवाए चड्डी भी नीचे खींच दी। कायला अब पीछे की सीट पर पूरी नंगी थी। उसकी चूत हल्की खुली थी -- नमी और गरमी का रंग उसमें घुला हुआ। रस की एक पतली बूँद उसकी जांघ से नीचे लुढ़क रही थी, और मोनू ने झुककर उसे जीभ से पकड़ लिया।

मोनू ने उसकी बाँह पकड़कर उसे झुकने का इशारा किया -- ठीक वैसे ही जैसे पहले उसने उसे कुतिया पोज़ में लिया था। कायला अब सीट पर झुकी हुई थी -- पीछे मोनू, और उसके सामने कायला की बड़ी, चौड़ी गांड... बीच में रस टपकाती चूत।

मोनू झुका -- उसकी जीभ सीधी कायला की चूत पर लगी।

एक लंबा, गीला, धीमी चटाई... ऊपर से नीचे तक।

"छुट्टी के बाद की चूत भी आज कॉलेज खुलवा रही है...", उसने मन में सोचा, होंठों के कोनों पर शरारती मुस्कान तैर गई।

कायला की उँगलियाँ सीट की पकड़ कसने लगीं -- एक धीमी "ह्म्म..." उसके गले से फिसली, जैसे कोई रुक-रुक कर साँस छोड़ रहा हो।

सनी रियरव्यू मिरर में झाँकते-झाँकते अब पैंट के अंदर हाथ घुसेड़ चुका था -- उसकी नज़र कायला की कांपती गांड पर अटक गई थी।

मोनू अब उसके कुल्हों को दोनों हाथों से भरके पकड़ चुका था --पहले चूत, फिर गोल-मोल कुल्हा, फिर बीच की दरार से जीभ फिसलती हुई गांड के छेद तक जा पहुँची।"अबे साली... यहाँ तक गीला है?" -- उसने हँसते हुए, जीभ के सिरे से छेद पर एक लंबी चटाई की ।

कायला के बदन में झटके उठे -- उसकी पीठ हल्की सिकुड़ गई, होंठ और कसकर भीच गए।गाड़ी अब सुनसान रास्ते पर पहुँच चुकी थी, तभी मोनू ने सनी को इशारा किया --"चल, पुराने सुनसान हाइवे पर ले चल... जहाँ कोई नहीं आता। आज वहीं जलाएँगे दीवाली की असली रौशनी।"

कार के मुड़ते ही बाहर का शोर गायब हो गया, बस इंजन की घरघराहट और कायला की भीगी सांसें बाकी रह गईं, अंदर का माहौल अब भाप से भी भारी था -- शीशे बंद, और हवा में कायला के पसीने, भीगी चूत और मोनू की साँसों का मिला-जुला नशा तैर रहा था।

पीछे की सीट पर कायला, आँखें बंद किए, अपना गरम, नंगा बदन पूरी रज़ामंदी के साथ मोनू की जीभ के नीचे रखे थी -- जैसे किसी को अपने अंदर जलाने का न्यौता दे रही हो।

शहर का शोर पीछे छूट चुका था।अब गाड़ी में सिर्फ तीन चीज़ें थीं -- कायला की चूत की भीगी महक, मोनू की गरम साँसें, और सनी की आँखों में जलती भूख।

मोनू झुका हुआ था -- उसकी जीभ कायला की चूत के भीगे होंठों से लेकर गांड के छेद तक हर इंच पर घूम रही थी, हर चटाई में उसकी लार और कायला का रस मिलकर गाढ़ा स्वाद बना रहे थे।

सनी मिरर से सब देख रहा था -- और उसके पायजामे के अंदर लंड ने पत्थर बनकर तंबू तान लिया था, नज़रों से कायला की फड़कती गांड हट ही नहीं रही थी।

एक लंबी चटाई के बाद...के बाद मोनू ने सिर उठाया -- उसकी ठुड्डी कायला के रस से चमक रही थी।उसने कायला को सीधा किया और उसकी आँखों में देखा -- वो आँखें भीगी हुईं, लेकिन उनमें ना शर्म थी, ना डर... बस प्यास और आदेश मानने की आदत।

मोनू ने धीरे-धीरे अपना कुर्ता उतारा... फिर पायजामा... और आख़िर में चड्डी नीचे खींच दी।अंदर से उसका मोटा, लंबा, नसों से भरा लंड बाहर आया -- पहले ही कायला की चूत देखकर सख़्त,गरम,और धड़कता हुआ।

मोनू (धीमे, गरम आवाज़ में): "अब, कुतिया... जैसे आँगन में चूस रही थी... वैसे ही कर।"

कायला ने बिना एक शब्द बोले उसकी नोक पर जीभ का गीला, धीमा चाट मारा -- फिर होंठ खोलकर पूरा लंड मुँह में भर लिया।

"श्लप... चप्प... ह्म्म... चप्प...!" लार की आवाज़ें अब कार के अंदर गूंजने लगीं -- उसका मुँह मोनू की जड़ों तक चला जाता, गाल अंदर धँसते, और आँखें ऊपर उठी रहतीं -- जैसे उसकी हर साँस मोनू की आँखों से बँधी हो।

मोनू की साँसें अब भारी हो रही थीं -- "हाआआ... ऐसे ही... सारा दूध खींच ले, साली..."

कायला बीच-बीच में लंड बाहर निकालती, जीभ से नोक पर गोल-गोल घुमाती, फिर एक झटके में गहराई तक ले जाती।

लार मोनू के लंड से टपककर उसकी जाँघों और सीट पर फैल रही थी -- गीली, गरम, और कायला के होंठों से टूटने को तैयार नहीं।

सनी ने अब गाड़ी को झाड़ियों वाले सुनसान रास्ते में मोड़ दिया -- ऐसा कोना जहाँ से रोड दिखता था, पर कोई उन्हें देख नहीं सकता था।

कार रुकते ही कायला का मुँह अब भी मोनू के लंड पर था -- मोनू हल्के झटकों से उसकी गर्दन को और अंदर धकेल रहा था।

सनी धीरे-धीरे कार से उतरा -- जैसे हर कदम में अपने लंड का बोझ महसूस कर रहा हो।उसने कुर्ता-पायजामा उतारा, और आख़िर में उसकी चड्डी और उसके हटते ही अंदर से बाहर आया लंबा,मोटा,नसों से भरा लंड -- जो कायला के गले की गहराई नापने को तैयार था।

सनी पूरी तरह नंगा हो गया --और अपने कपड़ों को कार में रखा।मोनू तो पहले से ही नंगा था, उसका लंड हवा में फड़क रहा था।

मोनू ने कायला के बाल पकड़कर उसे ऊपर खींचा -- और कार का दरवाज़ा खोलकर नीचे उतारा।अब कायला खुले आसमान के नीचे थी -- पूरी तरह नंगी, चूत और गांड से टपकती हुई, दोनों मर्दों के बीच में।

वो घुटनों के बल बैठी -- बायें तरफ मोनू, दायें तरफ सनी।

दोनों के लंड तने हुए, नसों से उभरे, गर्मी से धड़कते हुए, कायला के चेहरे के बिल्कुल पास।उसकी साँसें अब दोनों लंडों की गरम महक से भर रही थीं -- होंठों पर शरारती, भूखी मुस्कान तैर रही थी।

कायला ने पहले सनी का लंड पकड़ा -- गरम, मोटा, और हल्के से कांपता हुआ।उसने टिप पर जीभ का गोल चक्कर लगाया -- फिर होंठ फैलाकर पूरा लंड गले की गहराई तक उतार दिया।"ग्ल्प... श्लर्प... हाआआ..." -- उसके गले के अंदर लंड घुसने की आवाज़ कार के बाहर गूंज रही थी।

सनी की सांस अटक गई --"ओह्ह्ह... साली... पूरा गटक गई..."

कायला ने मुँह से लंड छोड़ा -- लार की पतली,चमकदार लकीर उसके होंठों से सनी के लंड तक लटक रही थी -- और अगले ही पल वो मोनू की तरफ झुकी।उसका लंड भी गहराई तक मुँह में भर लिया -- जड़ों तक ले जाकर हल्के झटके से छोड़ा, फिर फिर से अंदर।

अब वो बारी-बारी से दोनों का स्वाद ले रही थी --एक बार सनी, एक बार मोनू।उसकी लार और चूत का रस जैसे जीभ से बाहर बह रहा था, दोनों लंडों को चमका रहा था। कभी हल्की, गीली चटाई, कभी तेज़, गहरे ठोकर से गला भरना -- मोनू और सनी दोनों का दम घुट रहा था मज़े में।

मोनू ने कार का पिछला दरवाज़ा खोला -- आधा बैकसीट पर लेटकर बोला,"अब यहाँ आ..., गहराई तक चूस..."

कायला झुकी -- मोनू का मोटा, गरम लंड फिर से उसके मुँह में।उसके होंठ खिंचकर टाइट हो गए, गाल अंदर धँस गए, और आँखें ऊपर उठीं -- मोनू की सांसें अब भारी होने लगीं।

तभी पीछे से सनी आया -- बिना आवाज़ किए।उसने कायला की गांड दोनों हाथों से ऊपर उठाई, और कायला खुद ही अपना पिछला हिस्सा और ऊँचा कर दी।अब उसकी गांड हवा में थी, भीगी हुई चूत पूरी खुली, जैसे किसी को न्योता दे रही हो -- रस की पतली लकीर उसकी जाँघों से नीचे बह रही थी।

सनी ने कुछ नहीं कहा -- बस अपना गरम, धड़कता लंड सीधे चूत के मुँह पर रखा...और एक ही ठोकर में पूरा अंदर घुसा दिया।

"थप... छप... हाआआ... आह्ह्ह!"

भीगी चूत ने बिना रुकावट सनी को पूरा निगल लिया -- अंदर रस के साथ टाइट मांस की पकड़ उसकी जड़ों तक चिपक गई।

अब कायला की हालत --

मुँह में मोनू का मोटा, गर्म लंड...

चूत में सनी का गहरा, तेज़ ठोका...

दोनों तरफ से वो भर चुकी थी --उसकी टूटी-टूटी सिसकियाँ, थरथराता बदन, और ज़मीन पर टपकती लार गवाही दे रही थी कि आज उसकी देह पूरी तरह तोड़ी जा रही है।

मोनू ने बाल पकड़कर मुँह से लंड निकलवाया -- खुद उठकर गाड़ी के बाहर आया। सनी अब भी चूत में घुसा था, अपनी गांड हिलाते हुए अंदर को और खोल रहा था।

सनी का लंड तेजी से उसकी चूत में अंदर-बाहर हो रहा था, और उसी रफ़्तार से कायला अपना मुँह मोनू के लंड पर ऊपर-नीचे कर रही थी।

मोनू बोला --"रुक जा... अब मेरी बारी है इस कुतिया की चूत फाड़ने की।"

सनी रुक जाता है और एक आख़िरी झटका कायला की चूत में लगाता है, फिर लंड उसकी चूत से बाहर निकलता है -- लंड चूत के रस से चमक रहा है।

मोनू, कायला के बाल पकड़कर उसका मुँह लंड से हटाता है। और उसने कायला को बालों से पकड़कर ही गाड़ी के सामने ले जाता है, फिर हल्के गरम बोनट पर लिटा दिया। बोनट पर पीठ पड़ते ही 'चटाक' की आवाज़ आई -- गरम मेटल का झटका उसके बदन में उतर गया। कायला ने हल्की सिसकी भरी, आँखें बंद, जाँघें ढीली।

उसका बदन पसीने से भीगा हुआ -- भारी, झूलते दूध हर सांस पर काँप रहे थे। गांड लालिमा लिए उठी हुई, और चूत से अब भी गरम रस की धार बह रही थी। गरमी, लार, पसनीा और सेक्स की गंध ने पूरी हवा को गाढ़ा कर दिया था।

मोनू ने कायला की टाँगें दोनों तरफ से पकड़कर चौड़ा फैला दिया -- बोनट के किनारे से उसकी आधी गांड हवा में लटक रही थी, और बीच से रस की पतली, गरम धार टपककर बोनट पर चिपचिपी लकीर बना रही थी।

उसने अपना लंड कायला की चूत के मुँह पर रखा -- गरमी से भाप जैसी निकल रही थी -- और बिना इंतज़ार किए "ठप्!" की आवाज़ के साथ पूरा एक ही झटके में अंदर डाल दिया।

कायला की चीख गले से फिसलकर हवा में घुल गई -- "आह्ह्ह... हाआआ... हाआ...!"

उसके नाखून बोनट पर खुरच गए, पीठ नीचे गरम मेटल से चिपकी हुई, और ऊपर से मोनू का मोटा लंड उसकी गहराई में धड़क रहा था।

मोनू ने पकड़ मज़बूत की -- एक हाथ से उसकी टाँग उठाई, दूसरा हाथ उसकी गर्दन के पास दबाए रखा, और तेज़, गहरे ठोके मारने लगा।

"ठप... ठप... छप... ठप!" -- हर ठोका रस की आवाज़ के साथ टकरा रहा था।

कायला के दूध ऊपर-नीचे झूलते हुए मोनू के हाथ से टकरा रहे थे --उसकी साँसें टूट-टूटकर बाहर आ रही थीं, जैसे हर ठोके पर अंदर से कुछ और खुल रहा हो।

सनी, जो पास खड़ा था, उसकी गांड को नीचे से पकड़कर दबा रहा था, और हर ठोके पर मुस्कुराकर देख रहा था।उसने झुककर कायला के एक दूध को मुँह में ले लिया --"चुस्स्स... स्लर्प..." -- मोनू नीचे से ठोक रहा था, सनी ऊपर से चूस रहा था, और कायला बीच में आंखें बंद किए सिसक रही थी। वो उसके दूधू पे थूक के चाट रहा था ।

सनी उसकी छातियाँ दोनों हाथों में जकड़कर मसल रहा था, फिर झुककर दूध को मुँह में भर लेता है -- "चप... चप...", गरम साँसें उसके निप्पल को गीला कर रही थीं।मोनू के हर ठोके से सनी के मुँह में छातियाँ उछल रही थीं -- और सनी जैसे और भूखा हो रहा था।

सनी ऊपर से उसके दूध चूसते-चूसते अब नीचे सरका, और चूत के पास आकर थप्पड़ मारा।"चटाक!" कायला हल्की काँपी, मगर दोनों मर्दों के बीच पूरी तरह खुली पड़ी रही।

मोनू गरजकर बोला -- "ले साली... अब ये तेरी दिवाली का असली पटाखा फूटेगा!" और उसने ठोकों की रफ़्तार दोगुनी कर दी -- बोनट हिलने लगा, रस चारों तरफ फैल गया, और कायला का बदन काँपता हुआ सिसकियों में टूट रहा था।

मोनू का लंड कायला की चूत में धड़धड़ाते हुए घुस रहा था, जैसे हर झटके में उसके अंदर तक कोई हथौड़ा पड़ रहा हो।कायला की पीठ कार के बोनट से लगी थी, मोनू ने अब उसकी दोनों टाँगें पकड़ हवा में कर रखी थी -- और सनी उसकी छातियों को दोनों हाथों से जकड़े, बार-बार होंठों में दबाकर दूध खींच रहा था।

"चप... चप... ह्म्म..." -- सनी के मुँह और कायला के कराहने की आवाज़ें हवा में घुली थीं।

बोनेट पर मोनू की ठोकरें तेज़ हो चुकी थीं -- सनी ने झुककर उसके कान के पास कहा,"कुतिया, अब तुझे ऐसी जगह ले चलेंगे जहाँ तू साँस भी नहीं ले पाएगी..."उसने अपने हाथ से मोनू को इशारा किया।

मोनू ने बिना कुछ बोले लंड बाहर निकाला -- वो गीलेपन से चमक रहा था, नसें फूली हुईं। वो ड्राइवर सीट तक गया, चाबी घुमाई, और "टक... ठक..." की आवाज़ के साथ डिक्की खुल गई।

बोनट पर लेटी कायला अब भी हांफ रही थी, छातियाँ ऊपर-नीचे हो रही थीं। सनी ने उसके बालों से पकड़कर ऊपर खींचा, मोनू ने कमर से थामा--दोनों के हाथ उसकी गांड और जाँघों के बीच खेलते रहे, चलते-चलते कभी थप्पड़, कभी उँगलियों का हल्का दबाव। दोनों मर्दों ने उसे सहारा दिया -- उसके पैर लड़खड़ा रहे थे, मगर उन्होंने उसे संभालकर डिक्की की तरफ़ ले जाया।

गाड़ी के औज़ार, टायर और हल्की सी धूल के बीच उसकी नंगी पीठ टिकाई गई -- ठंडे मेटल का स्पर्श और पसीने की गर्मी का मिलन उसे और सिहराने लगा।

बोनेट की गरमी से उसका बदन अब भी तपा हुआ था, और हवा लगते ही उसकी भीगी चूत में हल्की सिहरन दौड़ गई।गाड़ी के पीछे पहुँचते ही सनी ने एक हाथ से डिक्की का दरवाज़ा खोला। ढक्कन ऊपर उठा, और अंदर औज़ारों व टायर की गंध वाली, बंद जगह सामने आ गई।

उन्होंने उसे डिक्की में धकेल दिया--औज़ार, टायर और गर्द के बीच उसकी नंगी पीठ टिक गई।कायला अब किसी स्टेपनी की तरह फँसी थी--हर तरफ से भरने और ठोकने के लिए तैयार। उसकी चूत से पानी अब रुक नहीं रहा था, जाँघों के बीच बहकर कार के फर्श तक पहुँच रहा था।

"चल... अब यहाँ तेरा असली टेस्ट होगा..." सनी ने मुस्कुराकर कहा। मोनू ने हँसते हुए उसके बालों की एक लट खींची,"अब तू हमारी स्टेपनी है, कुतिया... ।" कायला की आँखों में कोई जवाब नहीं -- बस गहरी, भीगी प्यास।

सनी ने गाड़ी का ढक्कन को पकड़कर पूरा ऊपर उठाया, और अपने लंड को कायला की चूत के बिलकुल सामने एडजस्ट किया। एक धीमे धकेल के साथ, लंड ने गीली, गर्म राह को चीरते हुए अंदर अपना रास्ता बना लिया -- "थप... छप... थप......" की आवाज़ हर झटके के साथ गूँजने लगी।कायला की "आह... हह... हह..." हवा में गूंज रही थी, कमर हर वार के साथ झटके खा रही थी।
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#7
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#8
उसका बदन हर सेकंड पसीने और रस से और भी फिसलता जा रहा था। डिक्की की दीवारों पर उसके नाखून खिंच रहे थे, और माहौल में सिर्फ़ तीन चीज़ें थीं -- गरम साँसें, चिपचिपी आवाज़ें, और हवा में तैरती कायला की भीगी गंध।

कुछ ही सेकंड बाद, मोनू भी डिक्की में घुस आया -- घुटनों के बल बैठकर उसने अपना मोटा लंड कायला के मुँह के पास लाया। मोनू, जो सामने था, कायला के सिर के पास बैठ गया -- उसने उसके बालों की मुट्ठी बनाई और गरजकर कहा,"अबे कुतिया... ये मुँह खाली क्यों है? भर इसे!"

कायला ने बिना देर किए होंठ खोले -- लंड धीरे-धीरे गले की गहराई तक फिसल गया। उसके गले की मांसपेशियाँ कस गईं, आँखों से पानी निकल आया -- लेकिन उसने लंड बाहर नहीं निकाला। अब दोनों तरफ़ से उसका जिस्म झूल रहा था -- एक तरफ़ सनी की कमर के ठोकर, दूसरी तरफ़ मोनू की जड़ तक भरी धक्के।

अब गाड़ी की डिक्की में सिर्फ़ दो आवाज़ें थीं--"चप... थप... छपक...", और कायला की भारी सिसकियाँ, जो हर सेकंड और बेकाबू हो रही थीं।

उसके गले की गहराई में लंड जाते ही कायला की आँखों से पानी बह निकला -- मगर उसने एक बार भी पीछे नहीं खींचा।

उसकी नाक दबने लगी, साँस घुट रही थी -- फिर भी होंठ और कसकर बंद, जैसे लंड को जकड़े रखना ही उसका मकसद हो।

कायला की उंगलियाँ डिक्की के किनारे पकड़कर कस गईं -- उसके होंठ खुले, मगर आवाज़ सिर्फ़ टूटी-फूटी साँसों में निकली,

"हह... अह्ह... ओह्ह..."

मोनू ने अपना मोटा लंड कायला के होंठों पर मारा --"ठप्प... ठप्प..." -- फिर खुद ही उसकी ठुड्डी पकड़कर मुँह और खोल दिया और पूरा लंड अंदर धकेल दिया।

अब कायला बीच में फँसी हुई थी --पीछे से सनी की बेधड़क पेलाई, आगे से मोनू की चुसाई -- हर बार सनी धक्का मारता तो मोनू के लंड की जड़ उसके होंठों से टकराती, और कायला का गला और गहराई तक भर जाता।

"छप... ठप... श्लर्प... गप... हाआआ..."

ये आवाज़ें गाड़ी की सुनसान डिक्की में गूंज रही थीं, जैसे किसी ने दीवाली के पटाखों की जगह उसकी चूत और मुँह में असली धमाके भर दिए हों।

सनी नीचे से झुककर उसकी गांड को दबाता, फिर बीच की दरार में उँगलियाँ घुसाकर छेड़ता -- और मोनू ऊपर से उसके गाल पकड़कर लंड और गहराई में धकेलता। कायला की आँखों से पानी बह रहा था, मुँह से लार और रस मिलकर मोनू के लंड पर चमक रहे थे, और नीचे उसकी चूत सनी की मार से बिलकुल कच्ची होकर फिसल रही थी।

सनी का लंड कायला की चूत में पूरी रफ़्तार से आ-जा रहा था -- हर ठोकर पे उसकी गांड ऊपर उठती और फिर मेटल की डिक्की पर धप्प से गिरती, जिससे गाड़ी हल्की-हल्की हिल रही थी।

चूत का रस का चिपचिपा बहाव अब उसकी जाँघों से टपककर डिक्की के फर्श पर जमा हो रहा था।

मोनू गरजकर बोला -- "ले साली... आज तुझे बिना हिला छोड़े नहीं जाने दूँगा... अब तैयारी कर, दोनों तरफ से पटाखा फूटेगा।"

सनी अब पूरे दम से ठोक रहा था -- हर झटके पर कायला की गांड डिक्की की निचली सतह से टकराती और धपाक की आवाज आती। उसकी चूत इतनी गीली हो चुकी थी कि हर धक्के के साथ "छपाक... छपाक..." की तेज़ आवाज निकलती, जैसे पानी में हाथ मार रहे हों।

मोनू ऊपर से उसका मुँह भरे बैठा था -- कभी उसके बाल पकड़कर गहराई में धकेलता, कभी उसकी ठुड्डी उठाकर उसे अपनी आँखों में देखने पर मजबूर करता। "देख मेरी आँखों में, कुतिया... देख, कैसे चूस रही है..."मोनू के लंड से कायला का गला पूरा भरा हुआ था, आवाज बस घुटी-घुटी निकल रही थी। "उम्म्... उम्म्म्... आआन... आआन... उम्म्म्..."

सनी नीचे से उसकी गांड पर थप्पड़ मारता -- "चटाक!" -- फिर और तेज़ ठोकर लगाता, जिससे कायला का पूरा बदन आगे की तरफ खिसकता और मोनू के लंड में और गहराई तक दब जाता।

अब तीनों का रिदम एक जैसा हो चुका था -- सनी का ठोका = मोनू का धक्का = कायला का घुटा हुआ कराहना।उसका बदन पसीने और चूत के रस से पूरी तरह भीग चुका था।

मोनू ने उसके मुँह से लंड निकाला, उसकी ठुड्डी पकड़कर लार टपकने दी -- फिर हँसते हुए बोला, "सनी... अब इसे उल्टा कर देते हैं... आज इसे असली स्टेपनी का मतलब समझा देते हैं।"

मोनू ने ठुड्डी छोड़ते हुए एक हाथ से कायला का बालों का मुट्ठा पकड़ा, और दूसरे हाथ से उसकी गर्दन के पीछे दबाव डालते हुए बोला -- "चल... उठ कुतिया।"कायला की साँसें अभी भी भारी थीं, होंठों पर लार चिपकी हुई थी। वो आधी उठी ही थी कि सनी ने पीछे से उसकी जांघ पकड़कर खींच लिया। कायला अब स्लाइड होकर डिक्की के किनारे आ गई।

सनी ने उसके दोनों हाथ पकड़े, और एक झटके में उसे घुमाया -- अब कायला पाँव ज़मीन पर, कमर झुकाए, सिर और कंधे डिक्की के अंदर। उसकी गांड सनी की तरफ़ पूरी उभरी हुई थी, चूत और गांड दोनों चमक रहे थे।

सनी ने नीचे झुककर उसके कूल्हों को दोनों हाथों से थामा, अंगूठे उसकी गांड के गोल हिस्से में दबे हुए -- "अब मज़ा आएगा..."पीछे से उसका मोटा, गरम लंड कायला की गीली चूत के होंठों पर रगड़ खा रहा था, और हर बार वो हल्के से कराह रही थी।

उधर मोनू, डिक्की के अंदर, उसने कायला का चेहरा अपने लंड के पास खींच लिया। उसने ज़बरदस्ती उसके मुँह में लंड ठूँस दिया -- कायला के होंठ खिंच गए, गाल फूल गए, और गला फिर से भरने लगा।अब पोज़िशन तैयार थी -- सनी पीछे से धंसने लगा, हर धक्के में कायला का सिर मोनू की जाँघों से टकराता, और मोनू का लंड उसके गले में और गहराई तक चला जाता।

डिक्की के अंदर हवा, पसीने की गंध, और "धप-चप-ग्लप" की मिली-जुली आवाज़ें गूंज रही थीं।

सनी ने अपनी पकड़ और कस ली -- दोनों हाथ कायला की कमर पर। मोनू ने उसके बालों की मुट्ठी कसकर खींची, ताकि उसका मुँह लंड से ज़रा भी दूर न जाए।

पहला सिंक हुआ धक्का -- सनी ने ज़ोर से पीछे से धँसाया, और उसी पल मोनू ने अपना लंड उसके गले में एकदम अंदर तक ठूँस दिया। कायला की आँखें फैल गईं, गले से "उह... घ्ह्क्क..." जैसी घुटी हुई आवाज़ निकली, और उसकी नाक से हल्की गरम हवा फूटी।

दूसरा धक्का -- दोनों के कमर के मूवमेंट एकदम टाइम पे, जैसे किसी गंदी लय में बज रहा हो। पीछे से "धप!" -- आगे से "ग्लप!"

उसके शरीर में हर बार झटका ऊपर से नीचे तक फैल जाता, जाँघें थरथरातीं, और चूत से गीला रस टपककर ज़मीन पर गिरता।

सनी अब और तेज़ हो गया -- "अब रुकना मत मोनू...!"

मोनू ने उसकी ठुड्डी दबाकर मुँह और खोला, और अपना लंड और गहराई में डाल दिया, यहाँ तक कि कायला का माथा उसकी नाभि से लग गया। उसके गाल अंदर-बाहर हो रहे थे, आँखें पानी से भर चुकी थीं, लेकिन दोनों मर्दों की लय नहीं टूटी।

तीसरा धक्का -- सनी के टक्कर से कायला की गांड पूरे बल से आगे उछली, और उसी टाइम मोनू ने अपना लंड गले में आख़िरी हद तक ठेल दिया। उसका गला सिकुड़ा, एक गरम लार की धारा मोनू के लंड के नीचे बह निकली और उसकी जाँघ पर गिर गई।

अब कार की डिक्की में सिर्फ तीन चीज़ें गूंज रही थीं -- "धप-ग्लप-चप! ... धप-ग्लप-चप!" और बीच-बीच में कायला की घुटी हुई सिसकियाँ, जो लार, पसीने और चूत के रस में डूबी हुई थीं।

सनी ने पीछे से धक्का मारते-मारते अचानक रुककर कमर पीछे खींची। कायला ने हांफते हुए गहरी सांस ली -- गले से मोनू का लंड अब भी आधा बाहर निकला था, लार उसके होंठों से टपक रही थी।

सनी बोला -- "आज तेरे साथ दिवाली में होली खेलेंगे... सफेद होली... चुदाई का सफेद रंग।!"

उसने दोनों हाथों से कायला की कमर पकड़कर उसे ऊपर खींचा और मोड़ दिया। अब कायला की पीठ डिक्की की दीवार से लग चुकी थी, पैर ज़मीन पर टिके, और उसकी छाती खुलकर मोनू की तरफ थी। गर्दन पीछे झुकी हुई, साँसें उखड़ी हुई, बाल पसीने से चिपके हुए -- बस नंगी त्वचा की गरमी थी।

सनी फिर से उसके सामने आया, लंड हाथ में पकड़कर ऊपर-नीचे करने लगा। कायला की आँखें उसकी नज़रों में अटकी हुई थीं, और अगले ही पल -- "आऽऽ रहा हूँ रंडी!"

सनी ने एक झटके में अपना वीर्य छोड़ दिया -- गर्म, गाढ़ा फव्वारा सीधा उसकी दोनों छातियों पर गिरा। पहली बूँद के लगते ही कायला के होंठ खुल गए, गर्मी ने उसकी त्वचा को जलता सा बना दिया। हर स्प्लैश उसके निप्पलों से नीचे लुढ़कता, पेट पर बहता और नाभि में इकट्ठा हो जाता।

सनी हाँफते हुए पीछे हट गया, लंड अब भी आधा सख़्त। मोनू बिना देर किए उसकी जगह आ गया -- उसने कायला की दोनों छातियाँ पकड़कर ऊपर उठाईं, और खुद को उन उभारों के बीच पोज़िशन किया।

"अब मेरी बारी... सांस रोक कुतिया।"

दो तेज़ स्ट्रोक... और मोनू ने भी अपना गरम लावा छोड़ दिया -- सीधा उसके गले और ठुड्डी पर।

वीर्य की धार उसके गले से फिसलकर पहले से गीली छाती पर आ मिली, जिससे कायला पूरी तरह से पसीने और दो मर्दों के गरम रस में नहा गई।

डिक्की में अब बस तीन चीज़ें रह गई थीं --भारी साँसें, वीर्य की गंध, और कायला की भीगी, चमकती हुई त्वचा।

कायला, अब डिक्की में पड़ी -- आँखें बंद, उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी, वीर्य में भीगी हुई। माहौल शांत चारों तरफ़ हल्की ठंडी हवा थी -- मगर उसमें अब भी गाढ़े रस और गर्म मर्दानगी की बू तैर रही थी। सनी और मोनू कार के किनारे टिके खड़े थे -- लंड अब ढीले, मगर गर्मी अभी भी बदन में सुलग रही थी। पसीने की बूंदें उनकी गर्दन और छाती से बहकर पेट तक गिर रही थीं। हवा उनको सुखाने में लगी थी, दोनों अपनी सांसों काबू में कर रहे थे।

मोनू ने गाड़ी के अंदर से एक दुपट्टा उठाया, पहले अपना लंड पोंछा, फिर सनी को दिया। सनी ने भी चुपचाप पोंछा और वही गीला दुपट्टा कायला के नंगे बदन पर फेंक दिया।"कुतिया, साफ कर ले... गुलाब जामुन ले लिए हैं," मोनू ने हँसते हुए कहा। मोनू की आवाज़ ठंडी थी, मगर उसमें आदेश का वजन था।

कायला ने थकी आँखें खोलीं -- बिना जवाब दिए वही दुपट्टा उठाकर अपने सीने, पेट और नाभि से वीर्य पोंछने लगी -- हर जगह से गर्म, चिपचिपी परत हटाती हुई।।दोनों मर्द कुर्ता-पायजामा पहन चुके थे -- सनी ने मुस्कुराकर कहा, "मोनू, सच में आज मज़ा आ गया... दीवाली का पटाखा तूने सही कहा था।"

मोनू ने उसकी ब्रा और चड्डी ज़मीन पर फेंक दी,"अब ये नहीं पहनना तुझे, कुतिया..."और अनारकली सूट और चुड़ीदार उसकी तरफ़ बढ़ाया,"ये डाल और चल अंदर..."

कायला धीरे-धीरे उठी -- पाँवों में थरथराहट और चूत में अब भी बाकी गर्माहट।उसने बिना ब्रा-चड्डी के कपड़े पहने -- पतला कपड़ा उसके गीले बदन से चिपक गया, हर कर्व को उभारता हुआ।। तीनों वापस गाड़ी में बैठे -- इंजन चालू, मगर माहौल भारी।कोई कुछ नहीं बोला, बस थकी साँसें, गरम सन्नाटा, बदन से रिसती वो नशीली गंध और कायला की जाँघों के बीच अब भी हल्की चिपचिपाहट।

गाड़ी डिक्की बंद होने के बाद चुपचाप चल रही थी --अंदर सिर्फ़ हल्की "ह्ह... ह्ह..." वाली थकी साँसें, सीटों पर पसीने और वीर्य की गंध, और पीछे की सीट पर कायला के कपड़ों में अब भी रिसते गरम निशान।

मोनू ड्राइव कर रहा था, सनी साइड में बैठा खिड़की से बाहर देख रहा था, मगर उसकी नज़रें बीच-बीच में रियर-व्यू मिरर से कायला के चेहरे पर जाती थीं -- उसके गाल अब भी लाल थे, बाल उलझे हुए, उसे सुलझाते हुए और होंठ हल्के-हल्के काँप रहे थे।

कुछ ही देर में गाड़ी कायला के घर के गेट पर रुकी। कायला ने दरवाज़ा खोला -- जैसे ही पाँव नीचे रखा, उसकी जाँघों के बीच हल्की सी सरसराहट हुई, याद दिलाते हुए कि अंदर अब भी गर्मी बाकी है।

मोनू ने सीट से झुककर एक पैकेट उसकी ओर बढ़ाया -- "ये मिठाई ले जा... अगली बार फिर आऊँगा, इस बार तेरे घर में। बता देना कब आना है।" कायला ने एक हल्की मुस्कराहट दी -- "पता चल जाएगा तुम्हें... अभी के लिए, हैप्पी दिवाली।"

तभी दरवाज़े पर उसकी मम्मी आ गई -- पूजा की थाली हाथ में, माथे पर हल्का पसनीा।

"चल जल्दी आ, पूजा का टाइम हो रहा है!" -- मम्मी की आवाज़ बिलकुल मासूम, मगर कायला के कानों में वो दूसरी ही धड़कनों के साथ मिल गई।

मोनू ने पैकेट मम्मी की तरफ़ बढ़ाया,

" वन्स अगेन, हैप्पी दिवाली आंटी..." -- एक नज़र कायला पर डालते हुए।

कायला बिना जवाब दिए, वही भीगा दुपट्टा और अंदर अब भी चिपकी गरमाहट के साथ, घर के अंदर चली गई -- सीधे पूजा में शामिल होने।

पीछे मोनू और सनी अपनी-अपनी गाड़ियों में बैठकर अपने घर की पूजा के लिए निकल गए --अब पूरे मोहल्ले में अगरबत्ती और दीपक की खुशबू थी...मगर उनके दिल में जो महक रही थी, वो किसी और ही पूजा का प्रसाद थी --गर्म, गाढ़ा, और सिर्फ़ उनके लिए बना।

घर के अंदर -- अगरबत्ती की महक, दीयों की रोशनी, मम्मी की आवाज़... और बीच में कायला। हाथ में पूजा की थाली थी, पर आँखों में कार की डिक्की का अँधेरा।

पूजा के बाद मोहल्ला पटाखों की आवाज़ और हँसी से गूंज उठा था।बच्चे फुलझड़ी, चकरी और अनार जला रहे थे।

मोनू अपने घर के बाहर था -- मम्मी-पापा, पत्नी और मोहल्ले के लोगों के साथ पटाखे चला रहा था।पास में ही सुनील जी, मोहल्ले के कॉरपोरेटर, लड़ी जलाने की तैयारी कर रहे थे।

कायला भी अपने आँगन में थी, चेहरे पर हल्की थकान, मगर बाहर से सब कुछ सामान्य।भीतर के कपड़ों के नीचे अब भी गर्मी और नमी थी, लेकिन आस-पास की रौशनी और हँसी में वो बस एक और पड़ोसन लग रही थी।दूर से पटाखों की चमक मोनू के चेहरे पर पड़ती थी, मगर उसकी आँखों में कोई कहानी नहीं थी -- बस दिवाली की एक और शाम।
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#9
"अगर मेरी कहानी ने तेरे अंदर कुछ जगा दिया हो --

कोई गंदी सोच, कोई छुपी हुई चाह...

तो मुझे लिख भेज ना, चुपचाप, धीमे से...

मैं तेरा हर लफ़्ज़ महसूस करूँगी।

-- तुम्हारी कायला ?"
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