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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
Awesome and excellent update!
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Do not mention / post any under age /rape content. If found Please use REPORT button.
(08-02-2026, 07:40 AM)Wanton Wrote: Excellent and amazing update.Please let there be more erotic and exciting conversations among the characters.

Hi ,

I need to know what you mean by "more erotic and exciting conversations among the characters." I am trying to understand what your thoughts are here . Can you explain with examples so that I understand Problem , then only can I fix it .

Last update was mostly about Sher's thoughts.
Deepak Kapoor
Author on amazon

  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
  2. सम्मान और बदला ( 5th-Book in hindi)
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह --किरदार निभाना




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Ekdum lajawab aur bahut badhiya update!
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bahut bahut mast aur danshu story writings!
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bahut badhiya ek mast, mazadar aur super excellent story!
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Just awesome and absolutely thrilling story with brilliant writing skills. Hats off.
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Beautiful and brilliant writing ✍️
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Very nice update
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Let sher succeed a little bit . Don't want Meera and sartaj to fail completely .
Let sher have his moment his touch his fun but if Meera is unaware then it's totally of no use
She should be little aware
Han last moment pe aake sartaj usko bacha le before the full penetration .
That is somewhat my take on this
Rest you are gem of a writer waiting how u bring this up
[+] 1 user Likes Crazy007's post
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Very much sweet and lovely story.
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Jabardast aur bahut bahut mast writing ✍️
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Zabardast update
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Hi Sir

Your writing is awesome and looks very real, I read all your stories on this portal and all are mind blowing,

Request you to add pics and gif wherever something erotic is happening which will spice up the story
[+] 1 user Likes Hotgiri's post
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woow! just woow! Absolutely great update yaar!
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wow! yaar wow! Superb! excellent and exciting update.
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bahut bahut thanks yaar is gajab update ki liye.
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(08-02-2026, 06:15 PM)Crazy007 Wrote: Let sher succeed a little bit . Don't want Meera and sartaj to fail completely .
Let sher have his moment his touch his fun but if Meera is unaware then it's totally of no use
She should be little aware
Han last moment pe aake sartaj usko bacha le before the full penetration .
That is somewhat my take on this
Rest you are gem of a writer waiting how u bring this up

This booked is already published in amazon kindle so you can get idea how i ended this story earlier if you read book. Although i am liking how current version is coming up , i am doing lot of additional chapters here which i will include in next release of  amazon Book . Thanks again for your input.
Deepak Kapoor
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  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
  2. सम्मान और बदला ( 5th-Book in hindi)
https://xossipy.com/thread-72031.html -- सम्मान और बदला
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(08-02-2026, 06:56 AM)Buddha Tailor Wrote: Faadu aur ekdum dhamadar update. Bahut achi writing.

(08-02-2026, 07:40 AM)Wanton Wrote: Excellent and amazing update.Please let there be more erotic and exciting conversations among the characters.

(08-02-2026, 07:55 AM)Jhalla Wrote: Awesome and superb update

(08-02-2026, 11:02 AM)Fantastic Four Wrote: chamatkar aur lovely writings!

(08-02-2026, 11:10 AM)Nusratfaria Wrote: bahut hi mast aur behad hi shandaar writings!

(08-02-2026, 11:18 AM)Huzmakhan Wrote: Ekdum lajawab aur gajab kahaani

(08-02-2026, 11:27 AM)Love Bite Wrote: jabardast aur mast update

(08-02-2026, 11:41 AM)Black Daimond Wrote: Amazing and awesome update! bahut achi writings! bahut acha laga padhke!

(08-02-2026, 12:01 PM)Israt Jahan Momo Wrote: Dashing update! Bahut hi kamuk aur garam kahaani, exciting and sexy writings!

(08-02-2026, 12:35 PM)Damian Wrote: Absolutely mind blowing update! Very sexy and exciting writings!

(08-02-2026, 01:33 PM)Adonis Wrote: Awesome and excellent update!

(08-02-2026, 03:28 PM)Lavoni Wrote: Ekdum lajawab aur bahut badhiya update!

(08-02-2026, 03:36 PM)Nazbeen Wrote: bahut bahut mast aur danshu story writings!

(08-02-2026, 03:52 PM)Uzma Khan Wrote: bahut badhiya ek mast, mazadar aur super excellent story!

(08-02-2026, 04:41 PM)Kasif Wrote: Just awesome and absolutely thrilling story with brilliant writing skills. Hats off.

(08-02-2026, 05:59 PM)Bhosdike. Wrote: Beautiful and brilliant writing ✍️

(08-02-2026, 06:05 PM)Introvert Wrote: Very nice update

(08-02-2026, 06:28 PM)Vik88 Wrote: Very much sweet and lovely story.

(08-02-2026, 06:36 PM)Ishita Wrote: Jabardast aur bahut bahut mast writing ✍️

(08-02-2026, 06:39 PM)Rumana Wrote: Zabardast update

(08-02-2026, 06:51 PM)Hotgiri Wrote: Hi Sir

Your writing is awesome and looks very real, I read all your stories on this portal and all are mind blowing,

Request you to add pics and gif wherever something erotic is happening which will spice up the story

(08-02-2026, 08:49 PM)LENNY Wrote: woow! just woow! Absolutely great update yaar!

(08-02-2026, 09:23 PM)Fanfunda Wrote: wow! yaar wow! Superb! excellent and exciting update.

(08-02-2026, 09:36 PM)Bentley Wrote: bahut bahut thanks yaar is gajab update ki liye.

Thanks , guys, your comments and likes made my Day . Next update in day or two .
Deepak Kapoor
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बीते कल की परतें
 
सरताज के ऑफिस जाने के बाद, शेर को मौका मिल गया। वह मीरा के करीब पहुँचा, जो बालकनी में खड़ी बाहर की ओर देख रही थी। शेर ने अपनी आवाज़ को धीमा और सम्मानजनक बनाया।

 
शेर: "मेमसाह... अगर आप बुरा न मानें, तो क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकता हूँ?"

 
मीरा ने उसकी तरफ देखा। उसने सहजता से कहा, "हाँ शेर, बोलो, क्या बात है?"

 
शेर ने थोड़ा झिझकते हुए, लेकिन अपनी नज़रों को मीरा के चेहरे पर टिकाते हुए कहा, "मेमसाह, आपको और साहब को देख कर लगता है कि आप सरताज साहब से बहुत मोहब्बत करती हैं। पर कभी-कभी आपकी आँखों में उनके लिए जो इज़्ज़त दिखती है, वो मोहब्बत से भी कहीं ज़्यादा गहरी लगती है। ऐसा लगता है जैसे आप दोनों का रिश्ता सिर्फ प्यार का नहीं, उससे भी कहीं बड़ा है... जैसे उन्होंने आपके लिए कुछ ऐसा किया हो जिसे आप कभी भुला नहीं सकतीं।"

 
मीरा के चेहरे के भाव एक पल के लिए बदले। उसकी आँखों में एक पुरानी याद की चमक और सरताज के लिए वो असीम सम्मान उभर आए जिसे शेर ताड़ना चाहता था।

 
मीरा ने एक लंबी सांस ली और मुस्कुराते हुए कहा, "तुमने सही पहचाना शेर। सरताज मेरे लिए सिर्फ मेरे पति नहीं हैं... वह मेरे रक्षक हैं। उन्होंने मुझे उस वक्त सहारा दिया और उस अंधेरे से निकाला जब मुझे लगा था कि मेरी ज़िंदगी खत्म हो गई है। मेरा उनके लिए जो सम्मान है, वो शायद इस दुनिया के किसी भी रिश्ते से ऊपर है।"

 
मीरा की निगाहें दूर कहीं शून्य में टिक गईं, जैसे वह अपनी ज़िंदगी के उस काले दौर की गलियों में वापस लौट गई हो। उसके चेहरे पर एक अजीब सी खामोशी छा गई।

 
 
मीरा ने एक लंबी और भारी सांस लेते हुए कहा, "शेर, मैंने सरताज जैसा इंसान आज तक नहीं देखा। हम दोनों कॉलेज में साथ पढ़ते थे। वह मुझसे चुपचाप मोहब्बत करता था, पर उसने कभी ज़बान से कुछ नहीं कहा। वह बस दूर से मुझे देखता रहता था। फिर घरवालों की पसंद से मेरी शादी आरव से हो गई। आरव अच्छे इंसान थे, मैं उन्हें पसंद करती थी और अपनी शादीशुदा ज़िंदगी में बहुत खुश थी।"

 
उसने अपनी आँखें मूँद लीं, जैसे उस मंज़र को धुंधला करने की कोशिश कर रही हो। फिर धीमी आवाज़ में बोली, "लेकिन फिर... आरव के साथ रहते हुए ही मैं एक ऐसी गहरी मुसीबत में फँस गई, जहाँ से निकलने का मुझे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। मुझे लगा कि मैं सब कुछ खो दूँगी। उस वक्त मुझे सरताज की याद आई। मैं उसके पास एक दोस्त की हैसियत से गई और उससे पूछा कि क्या वह मेरी मदद कर सकता है?"

 
शेर चुपचाप खड़ा सुन रहा था, पर उसका दिमाग तेज़ी से चल रहा था। उसे समझ आ गया कि सरताज ने 'दोस्ती' के नाम पर वो जंग लड़ी थी जो मीरा खुद नहीं लड़ सकती थी।

 
शेर ने पूछा, "तो साहब ने आपकी मदद की, मेमसाह?"

 
मीरा की आँखों में आँसू की एक हल्की सी चमक उभरी, उसने गर्दन हिलाते हुए कहा, "मदद? शेर, उसने अपनी जान की बाजी लगा दी थी मुझे उस नरक से बाहर निकालने के लिए। उसने न सिर्फ मुझे बचाया, बल्कि मेरी इज़्ज़त पर एक खरोंच भी नहीं आने दी। आज मैं जो कुछ भी हूँ, सिर्फ उसकी वजह से हूँ।"

 
शेर ने सर झुका लिया, पर मन ही मन बुदबुदाया, "तो ये बात है... पुराने आशिक़ ने रक्षक बनकर बाजी मार ली। पर मेमसाह, ये एहसान का चश्मा उतारने के लिए ही तो मैंने वो दवा बनाई है। जब नींद गहरी होगी, तो न आरव याद आएगा और न सरताज का अहसान... बस ये शेर होगा और आपकी वो गोरी देह।"

 
शेर के जाने के बाद, मीरा अपने बेडरूम की खामोशी में लौट आई। उसने मेज़ पर रखी सरताज की तस्वीर उठाई और उसे बड़े प्यार से निहारने लगी। उसकी आँखों में बीते कल की परतें खुलने लगीं।

 
उसने तस्वीर को अपने सीने से लगाया और रुंधे हुए गले से फुसफुसाकर कहा, "सरताज... मुझे आज भी वो दिन याद है जब मुझे पता चला कि तुमने मेरी याद में कभी शादी ही नहीं की। मैं अपनी शादीशुदा ज़िंदगी में थी और तुम तन्हा मेरी यादें लिए जी रहे थे। फिर वक्त का ऐसा सितम हुआ कि मैं मजबूर होकर तुम्हारे पास मदद मांगने पहुँची।"

 
मीरा की आँखों से एक आँसू टपक कर तस्वीर के फ्रेम पर गिरा।

 
"तुमने मेरे दर्द को अपना दर्द समझा और मुझे उस नरक से निकाला... बिना किसी उम्मीद के, बिना किसी लालच के। जब शंकर की मौत हुई और सब कुछ शांत हुआ, तो तीन महीने बाद जब मैं तुमसे मिली, तो मेरा सर अहसान के बोझ से झुका हुआ था।

 
मुझे लगा कि तुमने मेरे लिए इतना कुछ किया है, तो मैं तुम्हें अपना ये जिस्म सौंप दूँ... मैंने खुद तुम्हें इसकी पेशकश की थी।"

 
वह एक कड़वी और भावुक मुस्कान के साथ बुदबुदाती रही, "मैं जानती थी कि तुम सालों से मुझे चुपचाप प्यार करते आए हो, मुझे लगा था कि तुम इनकार नहीं करोगे। पर उस वक्त भी तुमने मेरा हाथ थामकर मुझे मना कर दिया।

 
वह याद करने लगी कि कैसे सरताज ने उसकी पेशकश ठुकराते हुए कहा था, "अगर मैं आज तुम्हारा यह ऑफर कबूल कर लूँ, तो मुझमें और शंकर में क्या फर्क रह जाएगा?"

उसकी आँखों से एक आँसू टपका जब उसे सरताज के वे शब्द याद आए: "तुमने कहा था कि तुम किसी दोस्त से ऐसा कोई 'एहसान' कबूल नहीं कर सकते। तुमने कहा था कि मुझ पर तुम्हारा कोई कर्ज नहीं है।"

 
मीरा ने ठंडी सांस ली, "जिस शरीर का सौदा करने के लिए शंकर मुझे ब्लैकहोल की तरह निगल रहा था, तुमने उसी शरीर को तोहफे के तौर पर लेने से भी इनकार कर दिया। तुमने मेरी रूह को सम्मान दिया, सरताज... इसीलिए आज मैं तुम्हारी सिर्फ पत्नी नहीं, तुम्हारी दासी हूँ।"

 
मीरा अपनी यादों के समंदर में और भी गहराई से उतरती चली गई। उसने सरताज की तस्वीर को अपने चेहरे के करीब लाया और उसकी आँखों में झांकते हुए बोली, "सरताज, उस दिन तुमने मेरा जिस्म ठुकरा कर मेरी रूह जीत ली थी। मेरे दिल में तुम्हारे लिए वो मोहब्बत जागने लगी थी जो जिस्मानी चाहत से कहीं ऊपर थी... वो एकदम पाक और रूहानी थी। पर तुम... तुम तो जैसे मुझसे दूर भागने लगे थे।"

 
उसकी आँखों में उस शादी का मंज़र तैर गया। "फिर मैंने तुम्हें रिया की शादी में बुलाया। रिया... मेरी ननद, जिसे तुमने शंकर के उसी नरक से बचाया था। जब रिया ने हाथ जोड़कर तुम्हें शुक्रिया कहना चाहा, तो तुमने मुस्कुराकर उसका सर सहला दिया और कहा—'बहनें भाई को शुक्रिया नहीं कहतीं, ये तो मेरा फर्ज था।' तुम्हारी उस सादगी ने मेरा कलेजा जीत लिया था।"

 
मीरा के चेहरे पर एक ममता भरी मुस्कान आई। "वहीं मैं पहली बार तुम्हारी बेटी ज्योति से मिली। जब सच पता चला तो मैं दंग रह गई। वो मासूम बच्ची जिसके माँ-बाप गैंगवार में मारे गए... सिक्युरिटी स्टेशन के उस शोर-शराबे में जब उस रोती हुई बच्ची ने तुम्हारा हाथ थामा, तो तुमने उसे हमेशा के लिए अपना बना लिया। एक कुंवारे मर्द ने एक अनाथ बच्ची को अपनी बेटी का नाम दे दिया... उस दिन मेरी नज़र में तुम्हारी इज़्ज़त आसमान छूने लगी थी।"

 
फिर मीरा का स्वर धीमा और उदास हो गया। "पर उस शादी के बाद तुम फिर गायब हो गए। जैसे तुम मुझसे दूर भागना चाहते थे... शायद तुम्हें डर था कि कहीं मेरे करीब आने से तुम्हारे मन में कोई लालच या कोई कमज़ोर ख्याल न आ जाए। तुम अपनी मर्यादा की दीवार इतनी ऊँची रखना चाहते थे कि मुझे कोई आंच न आए।"

 
मीरा की आँखों से बहते आँसू अब थमने का नाम नहीं ले रहे थे। शेर के उस एक सवाल ने जैसे यादों का कोई पुराना बांध तोड़ दिया था। वह सरताज की तस्वीर को अपने कांपते हाथों से थामे हुए सिसक रही थी।

 
"तुम फिर से अपनी बेटी को लेकर गायब हो गए थे... जैसे अपना फ़र्ज़ पूरा करके तुम मेरी ज़िंदगी से हमेशा के लिए निकल जाना चाहते थे। मैं पागलों की तरह अख़बारों में तुम्हारा नाम ढूँढती थी, टीवी पर तुम्हारी ख़बरों का इंतज़ार करती थी। फिर एक दिन खबर आई कि तुम एक एनकाउंटर में बहुत बुरी तरह ज़ख्मी हो गए हो। मेरा दम ही निकल गया था।"

 
उसने याद किया कि वह कैसे बेतहाशा उसे ढूँढने की कोशिश कर रही थी, तभी उसके फोन की घंटी बजी। "ज्योति ने मुझे अस्पताल से फोन किया... मुझे तब पता चला कि तुमने ज्योति को ये समझा रखा था कि अगर तुम्हें कुछ हो जाए या तुम न रहो, तो वो सिर्फ मेरे पास आए। तुमने आखिरी वक्त में भी सिर्फ मुझ पर भरोसा किया।"

 
मीरा का गला भर आया, "मैं भागती हुई अस्पताल पहुँची। जब मैंने तुम्हें वहां बिस्तर पर बेजान पड़ा देखा, पट्टियों में लिपटा हुआ... तो मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे सीने से सारी हवा ही निकल गई हो। मेरा दिल जैसे धड़कना भूल गया था। उस पल मुझे एहसास हुआ कि तुम मेरे लिए क्या हो… तुम सिर्फ एक रक्षक या दोस्त नहीं थे, तुम मेरी जीने की वजह बन चुके थे।"

 
उसने तस्वीर पर अपना सिर टिका दिया, अस्पताल के उस ख़ौफ़नाक मंजर को याद करते हुए, जहाँ सरताज की ज़िंदगी और मौत के बीच की जंग ने मीरा को पूरी तरह तोड़कर रख दिया था। वह बस रोए जा रही थी, उस अहसान और प्यार के बोझ तले दबी हुई जिसे सरताज ने कभी जताने तक नहीं दिया था।

 
मीरा के आँसू अब उसके गालों से होते हुए सरताज की तस्वीर पर गिर रहे थे। उस अस्पताल की गलियारों की ठंडक और वो घुटन उसे आज भी महसूस हो रही थी।

 
"तुम आईसीयू में थे, ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे। मैं ज्योति के सामने खुद को मज़बूत दिखाने की कोशिश कर रही थी, क्योंकि वह नन्ही सी बच्ची पूरी तरह टूट चुकी थी। तभी नर्स आई और उसने मुझे तुम्हारा सारा निजी सामान सौंप दिया ताकि मैं उसे संभाल कर रख सकूँ।"

 
मीरा ने अपनी आँखें मूँद लीं, जैसे वह फिर से उसी कमरे में खड़ी हो। "ज्योति एक बच्ची ही तो थी, वह तुम्हारी कार की चाबियों से खेल रही थी। तभी उसने तुम्हारा पर्स उठाया और उसे खोलकर चहकते हुए बोली—'आंटी, देखो! पापा के पर्स में मेरी और आपकी फोटो है' उसके उन मासूम लफ्ज़ों ने जैसे मेरे कलेजे को चीर दिया था।"

 
उसने याद किया कि कैसे कांपते हाथों से उसने सरताज का वो पुराना लेदर का पर्स हाथ में लिया था। "जब मैंने देखा, तो उसमें ज्योति की तस्वीर के साथ-साथ मेरी कॉलेज के दिनों की वो पुरानी तस्वीर रखी थी। वह तस्वीर इतनी पुरानी हो चुकी थी कि उसके किनारे मुड़ने लगे थे, लेकिन तुमने उसे किसी बेशकीमती खजाने की तरह संभाल कर रखा था।"

 
मीरा की सिसकियाँ और तेज़ हो गईं। "उस एक पल में मुझे समझ आया कि तुम मुझसे कितनी गहराई से मोहब्बत करते आए हो। इतने सालों तक, बिना कुछ कहे, बिना किसी उम्मीद के, तुमने मुझे अपने दिल के सबसे करीब रखा था। तुम अपनी खामोशी में मेरा नाम जपते रहे और मैं अनजानी बनी रही। उस दिन मुझे अहसास हुआ कि तुम्हारी खामोशी में कितनी तड़प और कितना प्यार छिपा था।"

 
मीरा ने तस्वीर को चूमते हुए अपनी आँखें बंद कर लीं, मानो वह उस शपथ को फिर से दोहरा रही हो जो उसने अस्पताल के उस ठंडे गलियारे में ली थी।

 
"उस पल मैंने खुद से एक वादा किया, एक प्रतिज्ञा ली कि तुम्हें बचाने के लिए मैं किसी भी हद तक जाऊँगी। मैंने तुरंत अपने पति आरव और अपने सास-ससुर को फोन किया। मैंने उनसे बस इतना कहा कि सरताज आईसीयू में हैं और इस शहर में छोटी ज्योति के अलावा उनका अपना कोई नहीं है, इसलिए जब तक वह पूरी तरह ठीक नहीं हो जाते, मैं अस्पताल में उनके पास ही रहूँगी।"

 
मीरा के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई जब उसने अपने परिवार की प्रतिक्रिया याद की। "आरव और मम्मी-पापा ने एक पल के लिए भी मना नहीं किया। उनकी नज़र में तुम हमेशा से एक बहुत ही सम्मानित इंसान और मेरे एक सच्चे दोस्त थे। उन्होंने बस इतना कहा—'बिल्कुल मीरा, तुम वहीं रहो और उनका पूरा ख्याल रखो, फिक्र की कोई बात नहीं है।'"

 
उसने एक लंबी और गहरी सांस ली, "वे कभी नहीं जान पाए कि तुमने किस तरह उनकी बेटी रिया और उनकी बहू, यानी मेरी इज़्ज़त की रक्षा की थी। उनके लिए तुम सिर्फ एक 'अच्छे दोस्त' थे, लेकिन मेरे लिए तुम वो रक्षक थे जिसने हमारे पूरे परिवार के सम्मान को अपने लहू से सींचा था। वे उस बलिदान से अनजान थे जिसे तुम अपनी खामोशी में दबाए बैठे थे, और मैं... मैं बस तुम्हारी सलामती के लिए दुआएं मांग रही थी।"

 
मीरा ने सरताज की तस्वीर को अपने चेहरे से सटा लिया, उसकी यादों का सिलसिला अब उस एक फ़ोन कॉल पर आकर ठहर गया जिसने उसकी दुनिया बदल दी थी।

 
"अस्पताल में जब तुम बेहोश थे, तब तुम्हारे मोबाइल पर तुम्हारी बहन का कनाडा से फ़ोन आया। मैंने कांपते हाथों से फ़ोन उठाया और उन्हें बताया कि तुम आईसीयू में हो। जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं मीरा बोल रही हूँ, उनकी आवाज़ में एक अजीब सा सुकून आ गया। उन्होंने बस इतना कहा—'मीरा? शुक्र है भगवान का कि तुम उसके पास हो। अब मुझे यकीन है कि वह ठीक हो जाएगा क्योंकि वह सही हाथों में है। वह कॉलेज के दिनों में हमेशा तुम्हारे बारे में बातें किया करता था।'"

 
मीरा की आँखों से फिर आँसू बहने लगे। "मैं सन्न रह गई थी... वह सुनकर मेरा सिर चकराने लगा। मुझे ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया को तुम्हारी उस खामोश मोहब्बत का पता था, सिवाय मेरे। तुम्हारी बहन, तुम्हारे दोस्त, शायद हर कोई जानता था कि तुम मुझसे कितनी शिद्दत से प्यार करते हो, बस मैं ही अंधी बनी रही जो तुम्हारी उस बेपनाह चाहत को नहीं देख पाई।"

 
उसने एक लंबी सांस ली और तस्वीर की आँखों में देखते हुए बुदबुदाया, "तुमने अपनी मोहब्बत को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, सरताज। तुमने उसे एक ऐसी ताकत बनाया कि तुम दूर रहकर भी मेरी हिफाज़त करते रहे। मुझे आज भी खुद पर पछतावा होता है कि मैंने तुम्हें समझने में इतनी देर क्यों कर दी।"

 
मीरा के चेहरे पर एक दर्दभरी मुस्कान उभर आई जब उसने उस रात को याद किया।

 
"जब अस्पताल से चंदन हमें घर ले आया, तो उसका एक ही मकसद था कि मैं और ज्योति थोड़ा आराम कर सकें। चंदन ने बड़े प्यार से कहा था, 'मेमसाह, ज्योति छोटी है, उसे घर की नींद चाहिए और आपको भी हिम्मत जुटानी होगी।' घर पहुँचकर मैंने ज्योति को खिला-पिलाकर सुला दिया, पर मेरा मन तुम्हारे पास अस्पताल में ही अटका था।"

 
मीरा ने अपनी उंगलियाँ अपनी आँखों पर फेरीं, जैसे वह उस फोन की स्क्रीन को फिर से देख रही हो। "मुझे तुम्हारी बहन को तुम्हारी सेहत की खबर देनी थी, पर तुम्हारा फोन लॉक था। मेरे पास उनका नंबर भी नहीं था। मैं परेशान थी, सोच रही थी कि क्या कोड होगा? फिर न जाने क्या सोचकर, मैंने एक अंदाज़े पर अपनी जन्मतिथि के चार अंक दबाए... और फोन खुल गया।"

 
मीरा की आवाज़ फिर से भारी हो गई। "मैं स्तब्ध रह गई थी सरताज। तुम सालों से मुझसे दूर थे, तुमने कभी मुझे जन्मदिन की बधाई तक नहीं दी क्योंकि मैं किसी और की पत्नी थी... तुमने अपनी मर्यादा कभी नहीं लांघी। पर तुम्हारे फोन का ताला आज भी मेरी जन्मतिथि  से खुलता था। तुम मुझे भुलाने का ढोंग कर रहे थे, पर हकीकत ये थी कि मेरा वजूद तुम्हारी हर सांस और तुम्हारी हर चीज़ में रचा-बसा था।"

 
वह तस्वीर को अपने माथे से लगाकर सिसकने लगी। "कितना अकेले झेला है तुमने ये सब? कितनी खामोशी से तुमने उस प्यार को पाला जो कभी तुम्हारा हो ही नहीं सकता था?"

 
मीरा की यादों का सिलसिला अब उस रात की बेचैनी पर आ टिका था, जब सरताज अस्पताल में मौत से लड़ रहा था और वह घर पर उसके लिए दुआएं मांग रही थी।

 
उसने कमरे के कोने में लगी गुरु गोबिंद सिंह जी की तस्वीर की ओर हाथ जोड़ लिए। हालांकि मीरा खुद * धर्म को मानने वाली थी, पर वह बखूबी जानती थी कि सरताज के आदर्श क्या थे। सरताज का पूरा जीवन गुरु गोबिंद सिंह जी की शिक्षाओं और एक 'संत सिपाही' की मर्यादा के इर्द-गिर्द बुना हुआ था।

 
मीरा ने उस रात को याद करते हुए प्रार्थना की, "हे वाहेगुरु... अपने इस सच्चे अनुयायी की रक्षा करना। उसे कुछ मत होने देना। वह एक सच्चा संत सिपाही है, जिसने कभी अपनी मर्यादा नहीं लांघी।"

 
उसे कॉलेज के वो दिन याद आए जब सरताज अक्सर कहा करता था कि जब भी उसकी ज़िंदगी में कोई मुश्किल मोड़ आता है या उसे किसी कठिन विकल्प को चुनना होता है, तो वह बस एक ही बात सोचता है—'इस स्थिति में मेरे गुरु महाराज क्या करते?' उसी आदर्श ने उसे मीरा के प्रति उसकी खामोश मोहब्बत में भी डिगने नहीं दिया था। उसने कभी भी उस प्यार को वासना या धोखे की आंच नहीं लगने दी थी।

 
मीरा ने अपने आँसू पोंछे और मन ही मन बुदबुदाया, "सरताज, तुम उस गुरु के सच्चे शिष्य हो जिसने कभी झुकना नहीं सीखा। और मैं... मैं भी अब तुम्हारी परछाई बनकर रहूँगी।"

 
मीरा की यादों का कारवां अब उस भावुक पल पर ठहर गया था, जब घर का पुराना नौकर चंदन भी उसके साथ घुटनों के बल बैठ गया था। उस रात सन्नाटा इतना गहरा था कि उन दोनों की सिसकियों की आवाज़ें दीवार से टकरा रही थीं।

 
चंदन की आँखों से आँसू बह रहे थे और उसका गला रुँधा हुआ था। उसने कांपते हुए हाथ जोड़कर मीरा से कहा था, "मेमसाह, मैंने अपनी पूरी उम्र गुज़ार दी, पर सरताज साहब जैसा इंसान आज तक नहीं देखा। भगवान ऐसे हीरे को हमसे नहीं छीन सकता।"

 
मीरा ने देखा था कि चंदन की रूह तक कांप रही थी जब उसने एक पुरानी बात याद की। चंदन ने रोते हुए बताया था, "मेमसाह, जब मेरी बेटी ने 12वीं में बहुत अच्छे नंबर लाए और उसका सपना डॉक्टर बनने का था, तो मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि मैं उसे मेडिकल कॉलेज भेज सकूँ। मैंने अपनी बिटिया से कह दिया था कि हम इतने बड़े कॉलेज का खर्च नहीं उठा सकते। हमारी तो किस्मत ही ऐसी है।"

 
चंदन ने अपनी आँखों को पोंछते हुए आगे कहा था, "साहब को जब इस बारे में कहीं से पता चला, तो उन्होंने मुझे डाँटते हुए अपने पास बुलाया। उन्होंने कहा—'चंदन, तेरी बच्ची मेरी अपनी बच्ची जैसी है। तूने मुझे इस बारे में पहले क्यों नहीं बताया? तू फिक्र मत कर, उसकी पढ़ाई और डॉक्टर बनने का सारा खर्च मैं उठाऊँगा।' मेमसाह, उन्होंने बिना किसी को बताए मेरी बेटी का भविष्य बना दिया। हे भगवान, इस भले आदमी की जान बख्श दे।"

 
मीरा चंदन की बातें सुन रही थी और उसे लग रहा था जैसे सरताज की अच्छाइयों का कोई अंत ही नहीं है। वह न सिर्फ एक बेहतरीन अफसर था, बल्कि एक ऐसा फरिश्ता था जो खामोशी से दूसरों के आंसू पोंछता था। उस रात उन दोनों की मिली-जुली प्रार्थनाओं में एक ही तड़प थी कि वह 'संत-सिपाही' बस एक बार अपनी आँखें खोल दे।

 
मीरा ने सरताज की तस्वीर को अपने गालों से छुआ, जैसे वह उस पुरानी मुस्कान की तपिश को आज भी महसूस कर पा रही हो। उन कठिन दिनों के बाद आई वह राहत की पहली किरण उसे आज भी याद थी।

 
"शायद उस दिन गुरु महाराज ने हमारी पुकार सुन ली थी, सरताज। तुम धीरे-धीरे मौत के पंजे से बाहर आने लगे। तुम्हारी सेहत में सुधार होने लगा और मैंने अपना सारा वक्त, अपनी पूरी जान तुम्हें वापस खड़ा करने में लगा दी। तुम्हारी पट्टी बदलने से लेकर तुम्हें दवा खिलाने तक, मुझे और कुछ याद ही नहीं रहता था।"

 
मीरा के होठों पर एक कोमल सी मुस्कान खिल गई। "एक दिन, जब तुम थोड़े होश में आए, तो तुमने अपनी वही पुरानी शराफत दिखाई। तुमने धीरे से मुझे मना करने की कोशिश की कि मैं अपना इतना वक्त तुम्हारे पीछे बर्बाद न करूँ। मुझे याद है, उस दिन पहली बार मैं तुम पर बुरी तरह बिगड़ गई थी। मैंने गुस्से में कह दिया था—'चुपचाप लेटे रहिए, मैं आपकी एक नहीं सुनने वाली!'"

 
मीरा ने याद किया कि सरताज ने उस वक्त कैसे प्रतिक्रिया दी थी। "मेरी उस डाँट पर तुम्हारे चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान आई थी जिसे मैं कभी नहीं भूल सकती। ऐसा लगा जैसे तुम्हें मेरा वो अधिकार जताना, मेरा वो गुस्सा बहुत प्यारा लगा हो।

 
फिर मैंने तुम्हें बताया कि आरव और मेरा पूरा परिवार मेरे इस फैसले में मेरे साथ खड़ा है और वे सब चाहते हैं कि मैं तुम्हारी सेवा करूँ।"

 
उसने एक लंबी सांस ली। "तुम्हारे चेहरे पर उस वक्त जो इत्मीनान दिखा था, उसने मेरा कलेजा चीर दिया था। तुम अस्पताल के बिस्तर पर पट्टियों में लिपटे, मौत से लड़कर वापस आ रहे थे, लेकिन उस वक्त भी तुम्हारे दिमाग में सिर्फ यही चिंता थी कि कहीं तुम्हारी वजह से मेरी शादीशुदा ज़िंदगी में कोई कड़वाहट न आ जाए। तुम अपनी फिक्र छोड़कर मेरे घर के सुकून के बारे में सोच रहे थे।"

 
मीरा ने सरताज की तस्वीर को सीने से लगाते हुए उस दिन को याद किया, जब उनकी मर्यादा की दीवार पहली बार थोड़ी सी डगमगाई थी। वह नज़ारा उसकी आँखों के सामने किसी साफ़ तस्वीर की तरह तैर गया।

 
"तुम अस्पताल से घर आ चुके थे और काफी हद तक ठीक हो रहे थे। मुझे आज भी याद है, उस दिन मैंने सफ़ेद रंग की साड़ी पहनी थी। तुम बिस्तर पर लेटे थे और मैं तुम्हारे सिर के नीचे का तकिया ठीक करने के लिए झुकी थी। उसी पल... मेरी साड़ी का पल्लू मेरे कंधे से सरक गया।"

 
मीरा की आवाज़ में एक हल्की सी थरथराहट थी। "मुझे एहसास भी नहीं हुआ कि मेरा पल्लू गिर चुका है। मेरे वक्ष उस सफ़ेद महीन कपड़े के नीचे किसी रसीले फलों की तरह आज़ाद होकर तुम्हारे सामने थे। पहली बार मैंने तुम्हारी उन मज़बूत आँखों में एक दरार देखी। तुम्हारी नज़रें कुछ लम्हों के लिए वहीं ठहर गईं... मैंने देखा कि कैसे तुम्हारी सांसें भारी हो गईं और तुम्हारी मर्यादा उस एक पल के लिए घुटनों पर आ गई थी।"

 
उसने अपनी आँखें मूँद लीं, जैसे उस खिंचाव को आज भी महसूस कर रही हो। "पर तुम तो सरताज थे... तुमने पूरी ताक़त लगाकर अपनी नज़रों को फेर लिया। उस पूरे दिन तुम्हारा मिज़ाज बदला हुआ था, तुम खामोश थे, जैसे खुद से ही लड़ रहे हो। और अगले ही दिन जब मैं आई, तो तुमने बड़ी बेरुखी से कह दिया कि तुम्हारा तबादला हो गया है और तुम शहर छोड़कर जा रहे हो।"

 
मीरा मुस्कुराई, पर उसकी आँखों में दर्द था। "मैं जानती थी सरताज, तुम काम की वजह से नहीं जा रहे थे। तुम उस खिंचाव से, उस तड़प से भाग रहे थे जो तुम्हें मेरी ओर खींच रही थी। तुम्हें डर था कि कहीं तुम्हारी ये खिंचाव मेरे और तुम्हारे उस पवित्र रिश्ते को जलाकर राख न कर दे। तुम फिर से हार मानकर भाग जाना चाहते थे ताकि मेरी ज़िंदगी में कोई आंच न आए।"

 
मीरा ने तस्वीर को अपने होंठों से छुआ, जैसे वह सरताज की उस निस्वार्थ रूह को चूम रही हो। उस विदाई की रात का एक-एक शब्द उसके कान में आज भी गूँज रहा था।

 
"तबादले से पहले तुमने मेरे पूरे परिवार को खाने पर बुलाया था। मुझे लगा था कि तुम सिर्फ शुक्रिया कहोगे, पर तुमने जो किया उसकी उम्मीद किसी को नहीं थी।

 
तुमने आरव का हाथ थामकर सबके सामने कहा था—'आरव बाबू, एक दोस्त को मौत के मुँह से निकालने के लिए अपनी पत्नी को दिन-रात अस्पताल भेजने के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए। मैं ताउम्र आपका कर्जदार रहूँगा। और मीरा का कर्ज तो मैं कभी उतार ही नहीं सकता, क्योंकि ये मुझे मौत के दरवाजे से खींचकर वापस लाई हैं।'"

 
मीरा की आँखों से आँसू फिर से बह निकले। "लेकिन फिर तुमने वो बात कही जिसने हम सबकी रूह कंपा दी। तुमने अपनी वसीयत और ज्योति की ज़िम्मेदारी के बारे में सबको बताया।
तुमने कहा था—'अपनी मौत को करीब देख कर मैंने कुछ फैसले लिए हैं। मेरी गैर-मौजूदगी में मेरी सारी जायदाद और ज्योति की कानूनी गार्जियन मीरा होगी। मुझे पता है कि मीरा ज्योति को अपनी औलाद की तरह पालेगी, जैसा कि वो पिछले कुछ दिनों से कर भी रही है।'

 
मीरा ने तस्वीर को हिलाते हुए गुस्से और प्यार के मिले-जुले स्वर में कहा, "उस वक्त मेरा जी किया कि मैं सबके सामने तुम्हें एक ज़ोरदार थप्पड़ मारूँ! तुम अपनी मौत की बात इतनी आसानी से कैसे कर सकते थे सरताज? तुम्हें क्या लगा, तुम चले जाओगे और मैं तुम्हारी यादों के सहारे ज्योति को पालती रहूँगी? तुमने मेरा सम्मान तो पूरी दुनिया के सामने बढ़ा दिया, पर मेरा कलेजा चीर दिया।"

 
मीरा की यादों का सफर अब उस नागपुर वाले दौर पर पहुँच गया था। सरताज के तबादले ने उन दोनों के बीच फिर से मीलों का फासला पैदा कर दिया था, लेकिन इस बार वह पूरी तरह गायब नहीं हो सका था।

 
"तुम चले तो गए सरताज, पर छोटी ज्योति के दिल को साथ नहीं ले जा पाए। वह बच्ची मुझसे इतना जुड़ गई थी कि उसे मुझसे दूर रखना तुम्हारे लिए भी मुमकिन नहीं था। इसीलिए हर छुट्टियों में तुम उसे मेरे पास पुणे भेज देते थे। ज्योति के बहाने ही सही, तुम्हारा एक हिस्सा हमेशा मेरे घर में चहकता रहता था।"

 
मीरा ने याद किया कि कैसे सरताज दूर रहकर भी उसके परिवार का साया बना रहा। "मेरे पापा के उस प्रॉपर्टी वाले केस में जब सब रास्ते बंद हो गए थे, तब तुमने अपनी पहचान और संपर्कों का इस्तेमाल करके उस मुसीबत को हल किया था। जब पापा ने तुम्हारा शुक्रिया अदा करना चाहा, तो तुमने बस इतना कहकर उन्हें चुप करा दिया कि—'मीरा का परिवार मेरा अपना परिवार है' तुमने कभी अहसान नहीं जताया, बस चुपचाप अपना फर्ज निभाते रहे।"

 
मीरा की आँखों में एक गहरा सुकून था। उसे याद आ रहा था कि कैसे सरताज ने बिना किसी स्वार्थ के उसके पूरे मायके और ससुराल का भरोसा जीत लिया था।
 
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मीरा की यादों का कारवां उस सबसे दुखद और काली रात पर आकर ठहर गया, जब आरव की एक कार एक्सीडेंट में मौत हो गई थी। वह याद करके मीरा का दिल आज भी कांप उठता था।


 
"आरव के अचानक चले जाने से मेरी तो दुनिया ही उजड़ गई थी, सरताज। मैं उस सदमे में ऐसी डूबी थी कि मुझे अपने आस-पास का कुछ होश नहीं था। पर जैसे ही तुम्हें खबर मिली, तुम चंद घंटों के भीतर नागपुर से यहाँ मेरे पास पहुँच गए थे।"

 
मीरा ने ठंडी सांस ली और उन दिनों को याद किया जब सरताज एक मज़बूत ढाल बनकर उसके परिवार के आगे खड़ा हो गया था। "मेरे ससुर जी अपने जवान बेटे को खोकर पूरी तरह टूट चुके थे। तुमने सारी कागजी कार्रवाई से लेकर अंतिम संस्कार तक की हर ज़िम्मेदारी ऐसे निभाई जैसे तुम इस घर के सगे बेटे हो।"

 
उसने याद किया कि कैसे सात दिनों तक सरताज ने साये की तरह सबका ख्याल रखा और जब सब कुछ थोड़ा सामान्य हुआ, तब वह चुपचाप अपनी ड्यूटी पर वापस लौट गया।

 
मीरा की आँखों में अपने ससुर जी के लिए सम्मान उभरा जब उसने उनके शब्द याद किए। "तुम्हारे जाने के बाद पापा जी ने मुझसे कहा था—'मीरा, सरताज बिल्कुल एक सगे बेटे की तरह है। उसने बिना कहे वो सारी ज़िम्मेदारियाँ उठा लीं जो शायद आरव के होने पर उसे उठानी पड़तीं। वह सच में समझता था कि हम और तुम किस दौर से गुजर रहे हैं।' तुम्हारी उस निस्वार्थ सेवा ने मेरे ससुराल वालों के दिल में तुम्हारी वो जगह बना दी थी जिसे कोई और कभी नहीं ले सकता था।"

 
मीरा ने तस्वीर को बार चूमकर उसे अपनी छाती से लगा लिया। वह उन छह महीनों को कभी नहीं भूल सकती थी, जब वह एक ज़िंदा लाश बनकर रह गई थी।

 
"मैं छह महीने तक जैसे किसी गहरे अंधे कुएं में गिरी हुई थी, सरताज। मुझे न दुनिया का होश था, न अपनी सुध। जब तुमने पापा जी से मेरी हालत के बारे में सुना, तो तुमने ही रिया को मेरे पास भेजा और हम दोनों को नागपुर बुलाया ताकि मैं उस घर की दीवारों से बाहर निकल सकूँ।"

 
उसने याद किया कि कैसे सरताज ने एक-एक तिनका जोड़कर उसका घोंसला फिर से आबाद किया था। "वहाँ तुमने मेरा ऐसा ख्याल रखा जैसे कोई कांच की गुड़िया को संभालता है। और फिर एक शाम... तुमने अपनी सालों की खामोशी तोड़ी। तुमने मुझसे कहा कि तुम मुझे ताउम्र अपनी पलकों पर बिठाकर रखना चाहते हो। तुमने न सिर्फ मुझे मनाया, बल्कि मेरे ससुराल वालों के पास जाकर उन्हें भी अपनी नेकनीयती का यकीन दिलाया कि तुम मुझे एक मुकम्मल परिवार दोगे।"

 
"शेर... तुम पूछ रहे थे न कि मेरी आँखों में प्यार से भी बढ़कर क्या है? वो मेरा सब कुछ हैमेरी ज़िंदगी, मेरी इज़्ज़त, मेरा वजूद... सब सरताज की बदौलत है। वह सिर्फ़ मेरा पति नहीं, मेरा भगवान है।"

 
उधर अपने क्वार्टर में बैठा शेर अपनी उस जादुई शीशी को चमका रहा था। उसे मीरा की इस गहरी वफादारी का अंदाज़ा तो था, पर उसे यकीन था कि उसकी जड़ी-बूटियों में वो दम है जो इस 'महानता' और 'सम्मान' के परदे को हटा देगा।

 
शेर ने शीशी को चूमते हुए कहा, "बड़े शरीफ बने फिरते हो दरोगा जी! पर ये शेर इतना शरीफ नहीं है। जो मलाई आपने अहसान के नाम पर छोड़ दी, उसे ये शेर अब अपनी दवा के दम पर चख कर रहेगा। मेमसाह को पता भी नहीं चलेगा कि कब उनका 'रक्षक' बदला और कब ये 'भक्षक' उनके बिस्तर तक पहुँच गया।"
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