01-02-2026, 12:04 PM
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(24-01-2026, 05:08 PM)Rajan Raghuwanshi Wrote: भाग ~ १८
अगली सुबह नाश्ता पानी कर के मैं और अनीता खेतों की तरफ जाने के लिए घर से निकले। मैंने मां से मांग कर दो रुपया ले लिया था। घर से निकलते ही मैं दौड़ते हुए लाला की दुकान पर गया और वहां से नमकीन गुड़ खरीद लाया।
"ये ले।" मैंने कागज में लिपटे नमकीन गुड़ को अनीता को पकड़ाया─"गहाई के समय जब भी हमें आराम करने का समय मिलेगा तो हम दोनों आमों की तरफ जा के इसे एक साथ खाएंगे।"
"हां ठीक है।" अनीता ने नमकीन गुड़ को अपने दुपट्टे में छुपाया और फिर दुपट्टे के बाकी सिरे को अपनी कमर में लपेट लिया। अब कोई नहीं जान सकता था कि उसने अपने दुपट्टे में कोई चीज कहां छुपा रखी है।
"कल रात मां कितना खुश थी न राजू।" मेरे साथ चलते हुए अनीता ने कहा─"और उसे हमारी उस बात का भरोसा ही नहीं हो रहा था..है न।"
"कैसे होता भरोसा...बात ही ऐसी थी।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा─"खैर ये छोड़...आज नदी में नहाने चलेगी न मेरे साथ।"
"हां वो तो तू न भी कहता तब भी जाती।" अनीता ने कहा─"क्योंकि इस बारे में कल हमारी बात हो चुकी है। और सुन....नदी में आज मैं तुझे खूब नहलाऊंगी...हां।"
"ठीक है।" मैं मन ही मन जाने कैसी कैसी कल्पनाएं करने लगा─"अगर दोपहर के वक्त नदी पर कोई नहीं होगा तो हम खूब मस्ती भी करेंगे....क्या कहती है तू।"
"हां ठीक है।" अनीता मुस्कुराई─"बस तू मुझे ज्यादा तंग न करना। तेरी छोटी बहन हूं तो ये बात याद रखना...हां।"
"देख मस्ती में थोड़ा बहुत इधर उधर हो ही जाता है।" मैंने कहा─"अब इतने में तू तंग हो जाएगी क्या।"
"अच्छा ठीक है मैं नहीं तंग होऊंगी।" अनीता बोली─"जैसे तू करेगा वैसा मैं भी करूंगी।"
"हां ठीक है न।" मैंने कहा─"मैं तुझे किसी भी बात के लिए नहीं रोकूंगा...तू भी मत रोकना मुझे।"
"हां।"
"चल पहले मझले काका के घर चलते हैं।" मैंने कहा─"देखें तो सही कि सुनीता और रानी खेत जा रही हैं या नहीं।"
हम दोनों बातें करते हुए थोड़ी ही देर में दशरथ काका के घर पहुंच गए। मझले काका बाहर ही मिल गए। वो अपने बैलों को खूंटे से छोरने जा रहे थे ताकि उन्हें खेतों पर गहाई के लिए ले जाएं। उनके पास ही उनकी दोनों बेटियां खड़ी थीं। अनीता को मेरे साथ देखते ही दोनों के चेहरे खिल उठे।
"जीजी आज हम दोनों भी खेत जा रहे हैं।" सुनीता ने अपनी खुशी जताते हुए कहा─"बापू ने कहा है कि वहां हम दोनों तुम्हारे और राजू भैया के साथ गहाई में हाथ बटाएंगे।"
"ये तो बहुत अच्छी बात है सुनीता।" अनीता ने मुस्कुराते हुए कहा─"तुम दोनों के रहने से मुझे और राजू को काफी आराम मिलेगा।"
"अरे करेजा तू यहां।" काका की नजर जैसे ही हम पर पड़ी तो वो बोले─"इन दोनों को लेने आया है क्या।"
"हां काका।" मैंने कहा─"मैंने सोचा इन्हें अपने साथ ही ले जाऊं।"
"अच्छा ठीक है।" काका ने कहा─"इन्हें ले के जा अपने साथ। मैं जरा पान सुपाड़ी खा लूं...फिर बैलों को ले कर आता हूं और हां एक चक्कर आमों की तरफ भी लगा लेना। अमिया चोरों ने बहुत परेशान किया हुआ है इस समय।"
"ठीक है काका।" मैंने कहा और फिर सुनीता और रानी को देखते हुए बोला─"चलो तुम दोनों हमारे साथ चलो। काका बाद में आ जाएंगे।"
वो दोनों खुशी खुशी हमारे साथ चल पड़ीं। वैसे अनीता ने कुछ महसूस किया हो या नहीं लेकिन मैंने ये महसूस किया था कि जैसे ही मैंने सुनीता और रानी को अपने साथ ले जाने की बात कही थी तो काका थोड़ा खुश हो गए थे। इतना ही नहीं...पान सुपाड़ी खाए होने के बाद भी उन्होंने कहा था कि वो पान सुपाड़ी खा के आते हैं कुछ देर में। मतलब साफ था कि दोनों बेटियों के हमारे साथ चले जाने से उन्हें मंजू काकी के साथ अकेला रहने का मौका मिल जाना था। कल काकी के साथ जो वो नहीं कर पाए थे वो अब कर सकते थे। बशर्ते काकी इसके लिए मान जाएं...अन्यथा कल की ही तरह काकी से गुस्सा हो कर काका को फिर से निराश हो जाना पड़ेगा।
ये सब सोच के मेरी इच्छा तो हुई कि कोई जुगाड़ बना कर काका काकी के बीच का ये खेल देखूं मगर चाह कर भी मैं ऐसा कोई जुगाड़ नहीं बना सका। अपनी बहनों के रहते ये संभव ही नहीं था। सुनीता और रानी को तो मैं किसी भी तरह बहला कर अकेले खेत जाने को कह देता मगर अनीता को बहलाना आसान नहीं था। वो कई सारे सवाल करने लगती कि मैं अचानक से किस काम से और कहां जा रहा हूं। जाहिर है मैं उसे कोई जवाब न दे पाता।
मुझे याद आया कि नमकीन गुड़ तो मैं पहले ही लाला की दुकान से खरीद लाया हूं...तो अब ये बहाना चल ही नहीं सकता। मुझे ये सोच के अफसोस हुआ और खुद पर थोड़ा गुस्सा भी आया कि क्यों मैंने नमकीन गुड़ लाने में इतनी जल्दबाजी कर दी। खैर अब क्या कर सकता था मैं। मजबूरन उन तीनों के साथ खेत जाना ही पड़ा।
मगर कहते हैं न कि अगर किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात उसे मिला देने में लग जाती है। ऐसा ही हुआ। क्योंकि तभी श्यामू काका अपने घर से बाहर निकल आए थे और मुझे देखते ही आवाज लगा दिया था उन्होंने। इधर मझले काका बैलों को छोड़ कर पहले ही घर के अंदर जा चुके थे।
"क्या हुआ काका।" मैंने श्यामू काका से पूछा।
"अरे थोड़ा रुक जा करेजा।" वो चलते हुए मेरे पास आए। फिर मेरी तरफ पांच का नोट बढ़ाते हुए बोले─"ये रुपए ले और लाला की दुकान तक चला जा थोड़ा। उससे सौ ग्राम सुपाड़ी, एक तोला लौंग, एक तोला कत्था और पचास ग्राम पत्ता वाली तंबाखू खरीद ला। तब तक मैं फटाफट नाश्ता कर लेता हूं।"
"ठीक है काका।" मैं मन ही मन बड़ा खुश हो गया था लेकिन प्रत्यक्ष में सामान्य भाव से अपनी तीनों बहनों की तरफ देख के बोला─"तुम लोग चलो...मैं काका के साथ आ जाऊंगा थोड़ी देर में।"
मेरी ये बात सुन कर अनीता ने कुछ कहना चाहा मगर काका की मौजूदगी में वो चुप रह गई। फिर सुनीता और रानी को ले कर जाने लगी। मैं समझ गया था कि अनीता की इच्छा मेरे बिना जाने की नहीं थी लेकिन काका की मौजूदगी में वो कुछ बोल न सकी थी।
खैर उन तीनों के जाते ही मैं फौरन लाला के दुकान की तरफ चल पड़ा। एकाएक ही मेरे मन में जाने कैसे कैसे विचार आने शुरू हो गए थे। मैं जल्द से जल्द काका का सारा सामान लाला के यहां से खरीद कर उन्हें दे देना चाहता था और फिर किसी तरह मझले काका के घर पहुंच जाना चाहता था। मैं देखना चाहता था कि वो दोनों इस मौके पर क्या करते हैं।
मैं भागते हुए लाला की दुकान पहुंचा था। उसके बाद उससे फटाफट सारा सामान खरीदा...फिर लाला को पैसे दे कर सरपट दौड़ पड़ा।
बहुत ही कम वक्त में मैं छोटे काका के घर पहुंच गया। उन्हें सामान पकड़ाया। उन्होंने नाश्ता करने को कहा तो मैंने ये कह कर मना कर दिया कि घर से खा के आया हूं। फिर वो बोले बैठ साथ में ही चलते हैं मगर मैंने उनसे कहा─नहीं काका...वो तीनों (अनीता, सुनीता और रानी) अकेले गईं हैं और अभी थोड़ी ही दूर पहुंची होंगी तो मैं जा के उन्हें पा जाऊंगा और उनके साथ ही खेत चला जाऊंगा। मेरी बात सुन काका ने कहा ठीक है।
श्यामू काका से छूटते ही मैं बिजली की रफ्तार से घर से बाहर आया और उसी रफ्तार से मझले काका के घर की तरफ पहुंच गया। एकाएक ही मेरी धड़कनें बढ़ गईं थी। काका काकी की करतूत देखने के लिए मैं उतावला हो चुका था। अंदर से घबरा भी रहा था कि अगर उन्होंने मुझे अपनी आपत्तिजनक हालत में देख लिया तो क्या होगा। निश्चित ही तब कुछ अच्छा नहीं होगा मगर इसके बावजूद मैं उनके घर के अंदर ऐसे दाखिल हुआ जैसे बिल्ली घर में रखे दूध को पीने के लिए दबे पांव पूरे घर का मुआयना करती है।
घर ऐसा था कि बाहर वाली यानी मुख्य दीवार पर कोई दरवाजा नहीं था। उसके बाद अंदर बरोठ वाली दीवार थी जिसमें लकड़ी का दरवाजा लगा हुआ था मगर इस वक्त वो आधा खुला हुआ था। उसके आगे चार फीट चौड़ा गलियारा था। गलियारे के दोनों तरफ कमरों वाली दीवार थी। गलियारे से आगे अन्दर की ओसारी थी जिसे बरामदा या बैठका भी कहते हैं। उसके एक तरफ रसोई थी और आगे लंबा चौड़ा आंगन था। आंगन के आगे एकदम सामने एक कच्ची दीवार थी जिसमें दरवाजा लगा हुआ था। इसी दरवाजे से घर के पीछे तरफ वो कुआं था जिसके बारे में मंजू काकी ने अपनी कहानी में हमें बताया था। आंगन के बाएं तरफ तीन भीती(दीवार) का बरोठ और बरामदा था जिसमें दो कमरे थे....एक भंडार का कमरा था और दूसरा पूजा घर...यहां पूजा घर या कमरे का मतलब है वो कमरा जिसमें हमारे घर परिवार के कुल देवता और बाबा साहब वगैरह रहते हैं। इस कमरे में बिना नहाए कोई नहीं जाता। मतलब छुआ छूत और पवित्रता का बहुत ध्यान दिया जाता है।
खैर मैं बिल्ली के जैसे दबे पांव बरोठ वाले दरवाजे से अंदर दाखिल हुआ और फिर दबे पांव ही गलियारे से होते हुए अंदर वाली ओसारी की तरफ बढ़ा ही था कि तभी अंदर से काका की आवाज मेरे कानों में पड़ी।
"देख मेरा दिमाग न खराब कर।" काका की आवाज─"कल भी तूने नाटक किया था और मैं गुस्से में चला गया था मगर आज कोई नाटक बर्दाश्त नहीं करूंगा मैं।"
"मैंने कहा न मेरा मन नहीं है।" मंजू काकी की आवाज─"तुम समझते क्यों नहीं कि मैं भी इंसान हूं। दिन भर काम कर कर के थक जाती हूं।"
"सिर्फ तू ही काम नहीं करती है।" काका ने कहा─"बाकी सब भी काम करते हैं। मैं खुद भी दिन रात बैलों की तरह जुएं में नधा रहता हूं। चल अब मान जा न यार....कौन सा रोज रोज चोदने का मौका मिलता है। तू तो साली अभी से सठिया गई लगती है। तेरे उमर की औरतें तो रोज अपने मरद से चुदवाती हैं। वो जो मेरा सहनाव है न....वो रोज अपनी औरत को पेलता है और उसकी औरत भी हुमच हुमच के पेलवाती है उससे।"
"हां पर मेरे में इतनी जान नहीं है।" मंजू काकी ने कहा─"मुझसे अब नहीं होता ये।"
"देख फिर तू नाटक करने लगी।" काका की आवाज में इस बार गुस्सा झलका─"बोल रहा हूं न कि करने दे। चल अब जल्दी से अपना धोती साया उठा के लेट जा।"
काका के ऐसा कहने के बाद इस बार काकी के मुख से कोई आवाज नहीं सुनाई दी। शायद उन्होंने काका का कहना मान कर वही करने लगीं थी जो काका ने कहा था। इधर गलियारे के पास छुपे खड़े मेरी धड़कनें तेज तेज चलने लगीं थीं। अंदर हलचल मची हुई थी और मन बार बार ये कहते हुए उकसा रहा था कि आगे बढ़ और अपनी आंखों से देख कि काका काकी कैसे चुदाई करते हैं।
"थोड़ा खड़ा कर न इसे।" तभी काका की आवाज मेरे कानों में पड़ी।
मैं समझ कि वो अपने लंड को खड़ा करने के लिए काकी से बोल रहे हैं। मैं अब ये देखने के लिए उतावला हो उठा कि क्या सच में काकी ऐसा करती हैं। मैं अपनी घबराहट और डर को किसी तरह दबा कर आगे बढ़ा और उन दोनों को देखने की कोशिश की।
वो आंगन के बाएं तरफ वाले बरामदे में थे। वहीं एक खाट रखी हुई थी और काकी अपना धोती साया ऊपर जांघों तक उठाए काका के लंड को सहलाए जा रहीं थी।
ये दृश्य देखते ही मेरी आँखें फैल गईं। दिलो दिमाग में बिजली सी कौंध उठी। अंदर जो पहले ही हलचल मची हुई वो अब और बढ़ चली।
मैंने देखा काका का लंड मेरे वाले से छोटा था और काकी के सहलाने से अब थोड़ा खड़ा हो गया था। काका आँखें बंद किए जमीन पर खड़े थे। उन्होंने अपने दोनों हाथों से अपनी लुंगी पकड़ रखी थी जोकि उनकी कमर तक उठी हुई थी। उनके लिंग के आस पास कुछ ज्यादा ही घने बाल थे।
"चल छोड़ अब इसे।" तभी वो बोले─"और टांगे फैला कर लेट जा। बहुत नाटक कर रही थी न तू....अब जब हुमच हुमच के चोदूंगा तो तेरी अकल ठिकाने आ जाएगी।"
काका के ऐसा बोलने पर काकी कुछ न बोली। वो पीछे तरफ सरक कर खाट पर लेट गईं और फिर धोती साया को अपनी कमर तक चढ़ा कर अपनी टांगें फैला दी। जैसे ही उन्होंने टांगें फैलाईं तो काका एक हाथ से अपनी लुंगी पकड़े आगे बढ़े और खाट पर चढ़ गए। फिर अपने लिंग को उन्होंने काकी की चूत के मुहाने पर लगाया और अपनी कमर को जोर से आगे धक्का दिया। काका का लिंग काकी की चूत में एक ही बार में पूरा अंदर चला गया। काकी के मुख से हल्की सिसकी निकली जो मैंने साफ सुनी।
उसके बाद काका ने दोनों हाथों को काकी के पेट के अगल बगल खाट में रख कर धक्के लगाना शुरू कर दिया। इधर मेरे अपने लिंग ने ये सब देख कर जाने कब कच्छे में अपना सिर उठा लिया था। मैं अपनी धाड़ धाड़ बजती धड़कनों से अपलक काका को काकी की चुदाई करते देख रहा था। मैं ऐसे कोंड़ पर खड़ा था कि वो दोनों मुझे तभी देख सकते थे जब वो अपनी गर्दन को थोड़ा घुमाएं मगर मैं उन्हें अच्छे से देख पा रहा था। ये अलग बात है कि मुझे न काका का लिंग दिख रहा था और न ही काकी की चूत। मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि आगे बढ़ कर थोड़ा और अच्छे से देखूं क्योंकि ऐसा करने से मैं पकड़ा जा सकता था।
खैर काका अपने हिसाब से पूरा जोर लगा कर काकी को चोद रहे थे। काकी बीच बीच में कभी आहें भरती तो और सिसकियां निकालतीं। इधर मेरे अंदर अजीब सी सनसनी हो रही थी जो सीधा मेरे लिंग में चोट कर रही थी। वो कच्छे के अंदर बुरी तरह अकड़ गया था। न चाहते हुए भी मैं बार बार उसे सहलाने लगता था। जब भी मैं उसे मुठियाता तो मुझे अलग ही मजा आता। मतलब एक मजे की लहर दौड़ जाती बदन में।
मैं अपना लिंग मुठियाते हुए सोचने लगा अब क्या करूं। कैसे मैं काका काकी की चुदाई को और अच्छे से देखूं। घबराहट और डर के मारे आगे बढ़ने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। उधर काका जोर जोर अपनी कमर को ऊपर नीचे किए जा रहे थे।
"चल अब घोड़ी बन जा।" तभी वो अचानक उठे और नीचे जमीन में खड़े हो कर काकी से बोले। काकी शायद समझ चुकीं थी कि आज उनकी कोई दाल गलने वाली नहीं है इस लिए वही करती जा रहीं थी जो काका बोल रहे थे। काका के उठते ही वो उठीं और खाट में ही घोड़ी बन गईं। उनका धोती साया उनके कमर में अटका हुआ था। इस कोड़ पर मैं उनकी बड़ी सी पोंद(नितंब) को अच्छे से देख पा रहा था और उधर काका के खड़े होने से उनके लिंग को।
काकी जैसे ही घोड़ी बनी तो काका खाट पर चढ़ गए और पीछे से अपना लिंग काकी की चूत पर डालने लगे। जैसे ही लिंग अंदर घुसा तो उन्होंने काकी की कमर को दोनों हाथों से पकड़ा और फिर जोर जोर से उन्हें पेलने लगे।
"ले साली....बहुत नाटक कर रही थी न।" काका पेलते हुए बोले─"आज जी भर के चोदूंगा तुझे।"
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" न चाहते हुए भी काकी की आहें निकल पड़ीं─"थोड़ा और जोर से चोदो न।"
"और कितना जोर से चोदूं तुझे।" काका ने काकी के दाएं नितंब पर एक थप्पड़ मारा जिससे काकी उछल पड़ीं─"आज मजा नहीं आ रहा क्या तुझे।"
काका की इस बात से इधर अचानक मैं थोड़ा चौंक पड़ा। पलक झपकते ही मुझे बापू का खयाल आ गया। काकी कई बार बापू से पेलवा चुकी थीं और इस वक्त मस्ती में वो जोर से करने को बोल रहीं थी। जाहिर है काका का छोटा लिंग होने की वजह से उन्हें बापू जैसा मजा नहीं आ रहा था। और शायद इसी लिए जोर से करने को बोल रहीं थी उनसे।
"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् आ रहा है सुनीता के बापू।" काकी ने झट कहा─"बस ऐसे ही जोर जोर से करो।"
"अपना ब्लाउज तो खोल जरा।" काका ने धक्के लगाते हुए कहा─"कई दिन से तेरी चूचियां नहीं मसली मैंने।"
काकी ने झुके हुए किसी तरह एक हाथ से अपना बैलेंस बनाया और एक हाथ से ही ब्लाउज के बटन खोलने लगीं। थोड़ी देर में जब बटन खुल गए तो उन्होंने ब्लाउज को फैला दिया। मैंने साफ देखा...उनकी बड़ी बड़ी छातियां नीचे झूलने लगीं थी। काका के हर धक्के पर उनमें अजीब सी थिरकन होती थी। काका ने झट अपना एक हाथ आगे बढ़ाया और उनकी एक चूची को मुट्ठी में पकड़ लिया।
"शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् थोड़ा धीरे दबाओ न।" काकी सिसकी ले कर बोलीं─"दर्द होता है।"
"आज तो तुझे दर्द बर्दाश्त करना ही पड़ेगा।" काका ने धक्के लगाते हुए कहा─"आज तुझ पर रहम नहीं करूंगा मैं। आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् अरे नहीं....लगता है मेरा छूटने का समय आ गया है।"
"आह्ह्ह्ह्ह् संभालो खुद को।" काकी ने आह भर के कहा─"मुझे हर बार की तरह बीच में मत छोड़ना....वरना इस बार से करने नहीं दूंगी...बताए देती हूं।"
काका जोर जोर काकी की छातियां मसलने लगे ताकि काकी के भी झड़ने का समय आ जाए। अपने धक्कों को उन्होंने कम कर दिया था। इधर मेरा बुरा हाल हुआ जा रहा था। कच्छे के अंदर मेरा लिंग अब दर्द करने लगा था। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं। मजा भी आ रहा था, घबराहट भी हो रही थी, डर भी लग रहा था....बस समझ नहीं आ रहा था कि लिंग के दर्द को कैसे दूर करूं। एक बार तो खयाल आया कि कच्छे से लंड निकाल कर मुट्ठी लगाऊं मगर डर की वजह से ऐसा करने की हिम्मत नहीं हुई।
"अब नहीं रुका जाएगा रे।" उधर काका ने सिसकी ले कर कहा─"मेरा समय निकट आ गया है। आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् हाय मैं तो गया रे।"
काका कहते हुए जोर जोर से झटका खाने लगे। उनका सारा पानी काकी की चूत में ही छूटता चला गया। जैसे ही झटके खत्म हुए तो वो असमर्थ से हो कर तथा अपना लिंग बाहर निकाल कर वहीं खाट पर ही लुढ़क गए।
"कर दिया न सत्यानाश।" काकी बुरी तरह किलस कर लगभग गुर्रा उठीं─"कहा था मैंने की बीच में न छोड़ना मुझे। खुद तो निपट गए और मुझे मझधार में छोड़ दिया।"
"मैं क्या करूं छूट गया तो।" काका अपनी उखड़ी सांसों को काबू करते हुए बोले─"कोशिश तो किया था मैंने लेकिन नहीं सम्हाल पाया। माफ कर दे अब।"
कहने के साथ ही वो खाट से नीचे उतरे और अपना कच्छा पहन कर लुंगी को अच्छे से कमर में बांध लिया।
"हां जाओ अब।" काकी अभी भी गुस्से में थीं─"अब दुबारा करने को कहा तो देखना।"
काका कुछ न बोले। बगल में ही दीवार पर टिकाया हुआ अपना लट्ठ उठाया और बाहर जाने के लिए मेरी तरफ आने लगे। ये देख एकदम से मैं घबरा गया। झट वहां से भागा और सीधा सड़क पर ही रुका।
कुछ देर में जब वो बाहर आए तो मैं खुद को सामान्य बनाए रखने का प्रयास करते हुए सड़क से उनके घर की तरफ बढ़ा। ऐसा इस लिए ताकि उन्हें यही लगे कि मैं अभी अभी ही आया हूं। शुक्र था कि श्यामू काका के घर के बाहर कोई नहीं था। अगर कोई होता तो मुझे मझले काका के घर के अंदर से इस तरह भागते हुए आता देख लेता। उसके बाद निश्चित ही उसे किसी बात का संदेह हो जाता।
"अरे करेजा तू....गया नहीं अभी।" काका ने थोड़ा चौंक कर पूछा।
"वो मैं जा ही रहा था कि तभी श्यामू काका ने मुझे सुपाड़ी वगैरह लाने के लिए लाला की दुकान भेज दिया। अभी दे कर ही आ रहा हूं मगर अब अचानक प्यास लग आई तो सोचा आपके घर में पानी पी लूं...फिर जाऊं।"
"ठीक है जा अंदर...पी ले पानी।" काका ने बैलों को खूंटों से छोरते हुए कहा─"तेरी काकी अन्दर ही है अभी।"
मेरे देखते ही देखते काका बैलों को ले कर चले गए। इधर मैं अपनी धाड़ धाड़ बजती धड़कनों को किसी तरह काबू करते हुए अंदर की तरफ चल पड़ा। इस बार क्योंकि काका नहीं थे और काकी से तो मैं पूरी तरह खुल चुका था इस लिए अंदर जाने में मुझे कोई झिझक न हुई।
मैं जानता था कि काकी अभी भी उसी मुद्रा में खाट पर होंगी इस लिए तेजी से अंदर पहुंचा। मैंने देखा काकी खाट से उतर कर अपने ब्लाउज के बटन लगा रहीं थी। उनका साया तो धोती के अंदर ही था लेकिन धोती का पल्लू जमीन पर गिरा पड़ा था।
मुझे एकदम से आ गया देख वो बुरी तरह उछल पड़ीं। हड़बड़ाहट में उन्हें समझ ही न आया कि क्या करें। भौचक्की सी हो के मुझे ही देखने लगीं थी। उनके ब्लाउज में ऊपर के दो बटन अभी भी खुले हुए थे जिसके बीच मुझे उनकी छातियों की गोलाईयां साफ दिख रहीं थी।
"ये क्या कर रही हो काकी।" मैंने चौंक पड़ने का नाटक किया─"कपड़े पहन रही हो या उतार रही हो। अच्छा अच्छा...समझ गया।"
"क..क..क्या समझ गए तुम।" काकी एकदम से चौंक कर बोलीं और साथ ही फटाफट ब्लाउज के बटन लगाने लगीं।
"क्या खुल कर बताऊं।" मैं अर्थपूर्ण भाव से मुस्कुराया।
"क्या मतलब।" काकी के चेहरे पर एकाएक घबराहट के भाव उभर आए।
"मतलब ये कि काका अभी अभी यहां से बाहर निकले हैं।" मैंने कहा─"और तुम यहां इस हालत में हो तो पक्का तुम दोनों वही कर रहे थे जो उस दिन खेत वाले कमरे में तुम और बापू कर रहे थे।"
"र...राजू....क्या बोल रहे हो....चुप हो जाओ।" काकी बुरी तरह चौंक पड़ी─"किसी ने सुन लिया तो अनर्थ हो जाएगा।"
"पर मैंने सही कहा न।"
काकी कुछ न बोलीं बस सिर हिला कर मूक सहमति दे दी। तभी अचानक मुझे शरारत सूझी।
"वैसे एक बात बताऊं।" मैंने धड़कते दिल से कहा─"मैंने अभी थोड़ी देर पहले अपनी आंखों से सब कुछ देखा है।"
"क..क्या??????" काकी का आश्चर्य से मुंह खुल गया।
"हां काकी।" मैं उनकी इस हालत पर मुस्कुरा उठा─"गलियारे से सब देख रहा था। मैं देख रहा था कि कैसे काका ने तुम्हें धोती साया ऊपर कर के लेट जाने को कहा और फिर जब तुम लेट गई तो कैसे वो तुम्हें चो...चोदने लगे। इतना ही नहीं फिर उन्होंने तुमसे कहा कि चल अब घोड़ी बन जा....आज तुझपे कोई रहम नहीं करूंगा।"
"बस करो राजू।" काकी का शर्म के मारे बुरा हाल हो गया─"कुछ तो शर्म करो।"
"और ये भी देखा कि अंत में जब काका जल्दी झड़ गए तो तुमने कैसे उन्हें खरी खोटी सुनाई।" मैं बेझिझक बोलता चला गया─"बेचारे...मेरे प्यारे काका...माफ कर दे बोल कर चुपचाप चले गए थे यहां से।"
"हाय दय्या....कितने खराब हो राजू।" काकी जो अब तक खुद को सम्हाल चुकीं थी, उन्होंने मुझे घूरते हुए कहा─"ये सब देखते हुए तुम्हें तनिक भी शर्म नहीं आई। कितना भोला समझती थी मैं तुम्हें....और तुम दो ही दिन में इतने शातिर हो गए।"
"मैं तो अभी भी भोला ही हूं काकी।" मैंने कहा─"पर इन दो दिनों से जो कुछ देख सुन रहा हूं उसकी वजह से कुछ तो बदलाव आएगा ही न मुझमें। मेरे लिए जो चीज नई होगी उसके बारे में जानने और समझने के लिए मन में उत्सुकता तो जागेगी ही न। तुमने बापू वाले किस्से को इस तरह सुनाया था कि उस सबको फिर से देखने के लिए मैं मजबूर तो हो ही जाऊंगा न।"
"अच्छा...और किस चीज के लिए मजबूर हो गए हो।" काकी ने अपनी धोती का पल्लू हाथ से पकड़े एकाएक मेरी तरफ आते हुए थोड़ा अजीब भाव से पूछा─"बताओ राजू...और किस चीज के लिए मजबूर हो तुम।"
मैं उनके पूछने के अंदाज पर एकदम से चौंक पड़ा। धड़कनें पलक झपकते ही तेज हो गईं। वो पल्लू पकड़े मेरी तरफ धीरे धीरे चली आ रहीं थी। पल्लू को उन्होंने अपने सीने में नहीं डाला था और न ही सीने को छुपाने का कोई उपक्रम किया था।
"ये...ये क्या पूछ रही हो काकी।" मैं घबरा सा गया।
"क्या हुआ....ठीक ही तो पूछ रही हूं।" काकी अब मेरे एकदम पास आ गईं─"तुम ही तो बोल रहे हो कि जो कुछ तुमने देखा और सुना है उसे फिर से देखने के लिए तुम मजबूर हो गए हो तो अब बताओ....और किस चीज के लिए मजबूर हो।"
"अ...और...और तो कुछ नहीं।" मैं बौखला सा गया।
"क्या तुम उसके लिए मजबूर नहीं हो।" काकी मेरे एकदम पास आ कर और एकदम मुझसे सट कर बड़े अजीब भाव से बोलीं─"बताओ न राजू...क्या तुम किसी के साथ चुदाई करने के लिए मजबूर नहीं हो।"
काकी के मुख से इस तरह खुल्लम खुल्ला चुदाई शब्द सुन कर मैं चकित रह गया। मेरे रोंगटे खड़े हो गए। पूरा बदन जूड़ी के मरीज की तरह कांप उठा। हालत ऐसी हो गई कि कुछ बोला ही न गया मुझसे।
तभी मैं बुरी तरह उछल पड़ा। अचानक मुझे अपने लिंग में उनके हाथ की छुअन महसूस हुई। मैं झट से पीछे हट गया और आश्चर्य से काकी को देखने लगा।
"क्या हुआ....आज मुझसे मुट्ठ नहीं लगवाओगे।" काकी ने उसी अजीब भाव से कहा─"देखो कैसे तुम्हारा ये खड़ा है।"
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि काकी को अचानक से ये क्या हो गया है। कुछ देर पहले तो वो मुझे शर्म करने की बात बोल रहीं थी और अब वो इस तरह का अजीब बर्ताव कर रही हैं।
मैं पीछे हटा तो काकी मेरी तरफ फिर से बढ़ीं और फिर से मेरे लंड को पैंट के ऊपर से पकड़ने लगीं। मैं बुरी तरह कांप गया और बुरी तरह असमंजस में भी पड़ गया। एक तो वैसे ही गर्मी का मौसम था दूसरे इस हालत में मैं पसीना पसीना हो गया था।
"चलो न राजू....आज फिर से तुम्हारी मुट्ठ लगा देती हूं।" काकी ने मेरे लिंग को सहलाते हुए कहा─"आज फिर से तुम अपना वीर्य मेरे चेहरे और मेरी छातियों पर गिरा देना।"
"क...क्या बोल रही हो काकी।" मैं बदहवास सा बोला─"किसी ने देख लिया तो आफत आ जाएगी। मुझे खेत जाना है....गहाई करना है वहां....और...और तुम्हें भी तो खेत जाना है न।"
"हां जाना तो है राजू।" काकी अभी भी अजीब बर्ताव ही कर रहीं थी─"पर पहले इस वक्त तुम्हारा मुट्ठ लगा दूं....ये भी तो अब जरूरी हो गया है...देखो कैसे खड़ा है तुम्हारा...लं..लंड।"
न...नहीं नहीं मुझे नहीं लगवाना मुट्ठ।" मैं घबरा कर फिर से पीछे हट गया─"पता नहीं अचानक से क्या हो गया है तुम्हें। जा रहा हूं मैं।"
कहने के साथ ही मैं जैसे ही पलट कर जाने को हुआ तो पीछे से काकी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और अपनी तरफ खींच लिया।
"रुक जाओ न राजू।" फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़े ही कहा─"जाने की इतनी जल्दी क्या है। कुछ देर अपनी काकी के पास रुको न।"
"न..नहीं मुझे जाना है....छोड़ो मुझे।"
"सुनो राजू।" काकी का बर्ताव थोड़ा सा बदला─"तुमने तो सब देख ही लिया है। ये भी जान गए हो कि तुम्हारे काका मुझे मझधार पर छोड़ कर चल गए हैं।"
"हां तो???"
"क..क्या....क्या ऐसा नहीं हो सकता कि अपने काका का अधूरा काम तुम पूरा कर दो।" काकी ने ये कह कर जैसे मेरे ऊपर बंब ही फोड़ दिया।
"क...क्या???"
मैं उछल पड़ा। आश्चर्य से मेरी आँखें फट पड़ीं। यकीन ही न हुआ कि ऐसी बात काकी कह सकती हैं।
"मुझे पता है कि ये बहुत गलत बात है राजू।" फिर वो एकाएक संजीदा हो के बोलीं─"मगर फिर भी मैं खुद ऐसा करने को कह रही हूं तुमसे।"
"नहीं नहीं....ये गलत है।" मैं हैरान परेशान के साथ साथ घबराहट और दुविधा में बोला─"मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता।"
"तो अब सोच लो राजू।" काकी ने एकदम से मेरा चेहरा थाम लिया─"भूल जाओ कि इस वक्त तुम्हारे सामने तुम्हारी काकी खड़ी है....ये सोचो कि मैं एक ऐसी औरत हूं जो तुम्हें अपनी खुशी से वो काम करने को कह रही हूं जिसे करने के लिए तुम्हारी उम्र के लड़के जाने कहां कहां भटकते हैं और जाने क्या क्या जुगाड़ लगाते हैं।"
मैं अवाक सा देखता रह गया उन्हें। अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा मेरी काकी कह रही हैं। मेरे अंदर बड़ा तेज तूफान उठा हुआ था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि ऐसे वक्त पर मैं क्या करूं। काकी से जो रिश्ता था उसका एक डर था, दूसरे...किसी को पता चल जाने का डर....और सबसे बड़ा डर ये कि मैंने ऐसा काम कभी किया ही नहीं है। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि मेरी जगह कोई और होता तो ऐसा सुनहरा मौका किसी कीमत पर नहीं छोड़ता। मगर मैं अपनी हालत से बेबस था। समझ ही नहीं पा रहा था कि क्या करूं।
काकी का अचानक से रंग बदलना और फिर मुझसे इस तरह का काम करने को कहना मेरी कल्पना में ही नहीं था। मुझे ये भी डर सता रहा था कि कहीं वो मेरे साथ कोई खेल तो नहीं खेल रही हैं। अभी तो ये है कि उनकी कमजोर नस मेरे हाथ में है लेकिन ऐसा कुछ हो जाने से क्या पता मैं खुद किसी मुसीबत में फंस जाऊं।
जारी है...................


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