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Adultery घर की बात... (short story)
#1
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#2
हेलो दोस्तों, मेरा नाम राइटर (काल्पनिक) है. बहुत समय से अपने जीवन के एक अध्याय को आप सब के साथ शेयर करने का सोच रहा था.. आज अवसर मिला तो सोचा बिना देर किए ये शुभ कार्य कर डालता हूँ.

बहुत समय से मैं अपने चाचा के घर पर उन्हीं के परिवार के साथ रह रहा हूँ… और अब भी रहता हूँ... क्यों? ये आपको कहानी के अंत में पता चल ही जाएगा. दरअसल मास्टर्स के लिए यहीं के एक कॉलेज में दाखिला मिला था. मेरे कहीं और भाड़ा ले कर रहने के आईडिया पर चाचा को बहुत गुस्सा आया था --- पापा तक को कड़े शब्दों में कहा था उन्होंने की जब तक उस शहर में वो या उनकी फैमिली है तब तक मुझे उसी शहर में रहने के लिए कोई कमरा भाड़े पे लेने की आवश्यकता नहीं है.

मैं काफ़ी खुश हुआ था. मेरे मम्मी - पापा भी. पापा को तो अपने छोटे भाई पर बड़ा गर्व भी हुआ था.. रह - रह कर मेरी मम्मी और मुझे कहते रहते की 'देखो, इसे कहते हैं सँस्कार. अपने परिवार के लिए, भाई, बड़े भाई के लिए कुछ भी करने की सोचना; हर किसी को नहीं मिलता --- ना ये सँस्कार और ना ऐसा भाई.'

चाचा के इसी दयालुता की भरपाई करने के लिए ही पापा ने न जाने मुझे कितने तरह की घुट्टी पिलाई... 'चाचा और उनके परिवार का अपने सामर्थ्य -अनुसार ध्यान रखना, चाचा की सेवा करना, समय - समय पर चाची की मदद करते रहना, उनके बच्चों को परेशान नहीं करना, उनको सताना नहीं,'  इत्यादि.

मम्मी और पापा के इसी तरह के कई सीख व उपदेशों की गाँठ बाँध कर एक दिन चाचा जी के यहाँ आ गया.

हालाँकि एक बात तो तय नज़र आई कि चाची कुछ खास खुश नहीं थी. सामने से कुछ बोली भी नहीं, लेकिन उनके हाव भाव से स्पष्ट दिख गया की घर में एक अतिरिक्त सदस्य के बढ़ जाने से और चाहे कुछ हो न हो, वो कम से कम खुश तो नहीं थी. 

चाचा और दोनों बच्चों से बहुत प्यार व अपनापन मिला; पर चाची से उतना नहीं. 

चाची मेरे लगभग सभी बातों का जवाब सिर्फ़ चार शब्दों में देती,

'हाँ', 'ठीक है', 'अच्छा', 'हम्म'.

चाचा के कारण सामने से विरोध न जता कर अच्छे से पेश आती किंतु बड़े शालीन तरीक़े से मुझे ये जता देती की इस घर में तो मैं आ गया लेकिन उनके दिल में मेरा रत्ती भर भी 'स्वागत' नहीं है.

खैर, मैं चाचा से ज़्यादा मतलब रखता था.. क्योंकि देखा जाए तो मैं तो चाचा के घर आया था, और घर के मालिक तो चाचा ही हैं इसलिए एक चाचा के अलावा किसी और ने मेरे बार में क्या सोचा और उसे / उन्हें कैसा लगा, इन सब बातों से मुझे कुछ खास फर्क पड़ना भी नहीं चाहिए था.

पर धीरे - धीरे ही सही, मैंने चाची के दिल में भी जगह बनाना शुरू कर दिया था… नहीं, मैं कोई शौक से उनके दिल में जगह नहीं बनाया और ना ही कोई कोशिश किया.. मैं तो चाहे सुबह हो या शाम,  बच्चों और चाचा जी के साथ समय बिताता था; बच्चे मुझसे बहुत प्यार करने लगे थे. वे चाहे घर में रहे या कॉलेज के लिए निकले, खेले या होमवर्क बनाए, हर समय मुझे ही अपने पास चाहते… और चूंकि मैं भी उन पर अच्छे से ध्यान देता था तो उनके होमवर्क समय पे होने लगे थे और उनकी हैंडराइटिंग भी पहले से काफ़ी सुधर चुकी थी. इस बात की तारीफ़ खुद इनके टीचर चाचा - चाची से पेरेंट - टीचर मीटिंग में करते. 

हाँ, ये सब कोई दो तीन दिन या सप्ताह में नहीं हुआ.. समय लगा. तकरीबन तीन महीने. दिन थोड़ा कम ज़्यादा हो सकता है… 

साथ ही, घर के कई कामों में भी हाथ बंटाता था… 

इन सभी कारणों से चाची का मन मेरे प्रति नर्म होने लगा था.

इसी तरह दो साल बीत गए…

कॉलेज के एग्जाम्स में मैंने अभी तक बहुत अच्छा रिज़ल्ट लाया था. आसपास के मोहल्लों के लड़के - लड़कियों को ट्यूशन भी देने लगा था और मुझसे पढ़ कर उनके परीक्षा परिणाम भी बहुत बढ़िया आने लगे थे. साथ ही मेरा एक छोटा - सा फ्रेंड्स ग्रुप भी बन गया था और मेरे कुछेक गुणों के कारण सब मेरे कायल भी हो गए थे. इन सबकी ख़बर चाचा - चाची को बराबर मिलती रहती… चाचा को तो बहुत गर्व होता, पर चाची का.... पता नहीं!

इन सब के बावजूद भी मैं बहुत अच्छे से जानता था की चाचा के कारण ही मुझे इस घर में स्थान मिला है; जाने अंजाने मुझसे हुई एक भी ग़लती चाची के मन में मेरे प्रति खटास भर सकती है. दो साल कोई कम समय नहीं होता लेकिन करियर के नज़रिए से अभी मैं बहुत निश्चिंत नहीं था. आज के समय में सिर्फ़ कॉलेज पास ऑउट होना ही किसी भी तरह की नौकरी की गारंटी नहीं है. मेरे ग्रुप के निशांत की बात ही कर लूँ; उसके बाप को रिटायर होने में अब बस साल भर का समय रह गया है.. छोटा भाई अब भी पढ़ाई कर रहा है... कुछ समय पहले ही इसके बड़ी बहन की शादी हुई थी; अपर मिडिल क्लास वाले घर में शादी कराने के चक्कर में इसके बाप को 2 - 3 जगह से क़र्ज़ लेना पड़ा था. वो क़र्ज़ अभी पूरा चुकता हुआ नहीं है. थोड़ा - थोड़ा कर के चुकाया जा रहा है और अब निशांत के माँ - बाप को निशांत से भी कुछ उम्मीदें हैं. इसलिए बेचारा पिछले चार महीने से नौकरी के लिए मारा - मारा फिर रहा है. पढ़ने में कितना अच्छा या बुरा था ये मुझे नहीं मालूम लेकिन ये खुद कहता रहा है कि, 

अपन को कभी पढ़ाई में मन लगा ही नहीं.” 

अब चूँकि कुछ ज़िम्मेदारियाँ इस पे भी आने लगीं थीं इसलिए एक कंप्यूटर कोचिंग सेंटर से ADCA कोर्स कर लिया
था; उस पे भी DTP में ख़ास ध्यान दिया था… अब जहाँ भी नौकरी के लिए अप्लाई करता वहाँ या तो वैकेंसी नहीं होती या फिर अँग्रेज़ी, हिंदी टाइपिंग के अलावा दो और भाषा टाइपिंग में सिद्धहस्त होने का बिन माँगा सुझाव दिया जाता. कभी Word per minute ज़्यादा होने की माँग होती तो कभी टैली जानकार होने की माँग होती…. और अगर टैली आती भी है तो कॉमर्स बैकग्राउंड होने की शर्त लग जाती! 

ठीक ऐसी समस्याओं से मुझे भी दो चार होना पड़ता है.. फ़िलहाल फूल टाइम नौकरी की जरूरत है नहीं मुझे लेकिन अगर कभी पार्ट टाइम नौकरी करने की नौबत आ गई तो तब मेरी क्या और कैसी परिस्थिति होगी; यही सोच - सोच कर अक्सर बहुत डर जाता हूँ.
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#3
चाची को कभी 'औरत' की नज़र से देखा नहीं... हमेशा 'चाची' को अपनी 'मम्मी' का ही दूसरा रूप माना. लेकिन 'चाची' और 'मम्मी' में अंतर तो होता ही है. यहाँ भी यही बात हुई. कितनी ही कोशिश किया की 'चाची' को इज़्ज़त वाली नज़रों से ही देखूँ ... पर एक तो उनका मेरे प्रति रूखा व्यवहार और दूसरा उनका एकदम माल वाला फिगर.!

कई बार उठते - बैठते, चलते या काम करते समय उनका जिस्म का कटाव कुछ यूँ प्रदर्शित हुआ है मेरे आँखों के सामने की अंग तो छोड़ो; एक - एक रोआं तक खड़ा हो जाता.

अपने ग्रुप के दोस्तों से सुन रखा था की एक आयु सीमा के पश्चात् हर महिला के जिस्म में बदलाव आता है और मन में कई खुमारियाँ कुलबुलाने लगातीं हैं. 

चाची के मन में क्या चल रहा है, पता नहीं… खुमारी कुछ है भी या नहीं… ये भी पता नहीं.. पर दो बातें स्पष्ट दिख रही थीं जब से मैंने इनके यहाँ रहना शुरू किया था…

१) जिस्म कमाल का भरा हुआ है.

२) हिरणों की तरह ही काली, खिंचीं आँखें बरबस ही किसी को भी आकर्षित कर सकती हैं… इनकी आँखें जैसे हर पल कुछ कहती हैं, कुछ चाहती हैं… बस, कोई समझने वाला नहीं है… मैं भी नहीं. 

बावजूद इन सब के, मैंने अब तक चाची को ले कर अपने मन में किसी ग़लत विचार को कभी ठहरने नहीं दिया — चाचा जी के खातिर. 

वैसे तो योग वगैरह बहुत पहले से करता आ रहा था पर चाचा ने एक तरह से फोर्स कर के मुझे क़रीब के एक जिम में भर्ती करवा दिया. इसी जिम से लग कर एक स्पोर्ट्स क्लब है जहाँ स्विमिंग, स्प्रिंटिंग, बैडमिंटन, इत्यादि सिखाया जाता है.. चाचा के ही एक मित्र का है ये क्लब और इनका बेटा यहाँ का हेड कोच है. इसी के अंडर में मुझे बॉक्सिंग के लिए भी भर्ती करवाया चाचा ने. पता नहीं क्यों उनको मुझसे ज़्यादा इनमें दिलचस्पी और जल्दी थी.. 

कारण पूछने पर इतना ही कहा उन्होंने की “सीख लो बेटा, पता नहीं कब, कहाँ क्या जरूरत पड़ जाए?”

ये उनकी एक नेक सलाह मान कर मैंने कोई आपत्ति नहीं की और बिना फिर कोई सवाल किए डेली जिम और क्लब जाने लगा.

जिसकी जरूरत बहुत जल्द पड़ी भी…

हुआ ये की एक दिन घर लौटने में चाचा को लेट हो गया था.. अमूमन साँझ 6:00 - 6:30 बजे तक लौट आते थे, उस दिन 8:00 बज गए… 

अंदर आते ही सोफा पर धप्प से बैठ गए… 

और नीचे फर्श की ओर देख कर कुछ सोचने लगे.

पहले तो चाची को लगा की दिन भर की थकान और ऑफिस का टेंशन होगा; लेकिन जब काफ़ी देर तक चाचा उठे नहीं अपनी जगह से तो चाची को चिंता हुई…

वो उनके पास आ कर बैठी; 

बहुत केयरिंग टोन में पूछी,

“क्या हुआ है?”

“कुछ नहीं.”    चाचा फर्श पर से अपनी नज़रें हटाए बिना जवाब दिया. 

चाची कुछ सेकंड चुप रही इस आशा में की शायद चाचा आगे कुछ और भी बोलेंगे.. पर जब ऐसा नहीं हुआ तो वो खुद बोली,

“कुछ तो हुआ.. और जो कुछ भी हुआ है वो बहुत सीरियस है. है न?”

चाचा अब भी कहीं खोए हुए थे… सिर्फ़ एक “ह्म्म” में उत्तर दिया उन्होंने. हिले नहीं. वहीं बैठे रहे. 

चाची कुछ देर तक उनके पास में ही बैठी रही. उनको देख कर लग रहा था की वो बहुत कुछ पूछना चाह रही है लेकिन पूछ नहीं पा रही. अंत में चाची चाचा को हाथ मुँह धो कर फ्रेश होने को बोल कर चली गई. 

मैं पास ही के एक कमरे में पर्दे के ओट से सब देख व सुन रहा था. 

डिनर के दौरान भी चाचा को गंभीर व चिंतित देखा… उस समय भी चाची दो बार पूछी, और मैंने भी पूछा पर उन्होंने कुछ नहीं बताया.

अगले दिन चाचा के ऑफिस चले जाने के बाद चाची से पूछने पर पता चला की कल दरअसल 3 - 4 लड़कों से थोड़ी बकझक हो गई थी गाड़ी पार्किंग को ले कर. 

“लड़कों ने कुछ किया क्या? हाथ उठाया क्या चाचा पर?” मैंने पूछा.

“नहीं, पर वो (चाचा) कह रहे थे कि स्थिति बहुत ख़राब हो गई थी. कुछ भी हो सकता था.”

“ठीक कहाँ पर हुआ ये सब?”

“***** मिष्ठान्न नाम के दुकान के सामने.”

“चाचा वहाँ पे…??”

“हाँ, उनको उस दुकान की मिठाई बहुत पसंद है न, खरीदने गए थे; तुमको भी तो बहुत अच्छा लगता है वहाँ की मिठाई…”

“हम्म्म…”   मैं आगे कुछ बोलूँ उसके पहले ही चाची खुद बताने लगी,

“बाइक दुकान के सामने लगा कर अंदर गए थे… पेमेंट कर के बाइक स्टार्ट कर के आगे बढ़ते की अचानक पीछे से एक बाइक आ कर बैलेंस खोते हुए इन के बाइक को ज़रा सा छू गई. इन्होंने बस इतना ही कहा कि ‘अरे देख के’... इसी बात पे वे लड़के इनसे झगड़ने लगे.” 

“ओह!”

मैंने ज्यादा कुछ पूछा नहीं. पूछने लायक कुछ ख़ास था भी नहीं. थोड़ी देर चाची के साथ इधर - उधर की बातें कर के वापस अपने काम में लग गया.

[Image: pl0SljdB_o.jpeg]


पर जब तक उनसे बात कर रहा था तब तक चोर नज़रों से उनके लो - कट ब्लाउज से बाहर उभर कर निकले माँसल पीठ को देखता रहा. एक बार के लिए मेरे अंदर का जानवर कुछ यूँ जागा की लगभग उनकी गदराई पीठ पर अपने दाँत बिठा ही देता!

कैसे कंट्रोल किया मैंने खुद को ये मेरा भगवान ही जानता है.

रही बात चाचा और उन लड़कों के बीच की — मैंने सोचा की ये सब आजकल होता रहता है.. हालाँकि ऐसा होना तो नहीं चाहिए लेकिन अब अगर कभी हो जाए तो बीच का एक आसान रास्ता निकाल लेना चाहिए. एक बार हो गया चाचा के साथ… डेली थोड़े न होगा. 

पर मेरा ऐसा सोचना गलत साबित हुआ…

एक बार फिर ऐसा ही हुआ…

चाचा के साथ…

उसी दुकान के सामने…

उन्हीं दो लड़कों के साथ…

लेकिन, 

इस बार मैं भी था… 

चाचा के साथ, उन्हीं के बाइक पर… 

जब चाचा मिठाई के दो डिब्बे पैक करवा कर बाइक पर बैठने जा रहे थे तभी मैंने देखा दो लड़के जो हमारी जगह से कुछ कदम पीछे एक बाइक के साथ खड़े थे, टहलते हुए आए और चाचा की ओर देखते हुए बोले,

"नमस्ते अंकल, आज यहाँ... ?"

"हाँ, बस... मिठाई लेने.."   चाचा ज़रा -सा मुस्करा कर जवाब दिया.

"अरे तो हमें भी खिलाईए कभी, अंकल. डेली देख रहे हैं की आप मिठाई ले जा रहे हैं. बाँट कर नहीं खाने से, अकेले - अकेले खाने से खाना पचता नहीं है... शुगर हो जाता है.. पता है न?"   एक लड़का ये कह कर 'हो हो' से हँस पड़ा.

दूसरा लड़का भी हँसा लेकिन तुरंत पहले वाले को टोकते हुए अपने हिस्से का ज्ञान देते हुए बोला,

"अबे शुगर नहीं बे, डायबिटीज होता है."

पहला वाला 2 सेकंड सोचा और फिर बोला,

"वही.. अब जो हो... कुछ होता तो है न, है की नहीं अंकल..?"

चाचा अब तक बाइक स्टार्ट कर चुके थे; नज़रें घूमा कर मुझे इधर - उधर ढूँढ़ने लगे...

पहला वाला खुद को ज़्यादा फ्रेंडली दिखाने के चक्कर में था.. बोला,

"किसको ढूँढ़ रहे हैं..? कोई है का साथ में?"

इस पे दूसरा लड़का तपाक से बोला,

"अबे आँटी आयीं होंगी साथ में."

ये सुन कर पहला वाला दूसरे वाले को देख कर चौंकने की एक्टिंग करते हुए बोलता है,

"अबे का बात कर रहा है बे..?! आँटी भी आयीं हैं का?? कहाँ हैं??"

दूसरा वाला धीरे से बोला,

"कंपनी देने आई होगी..!"

"हम्म... या प्रोटेक्शन?!?"

पहले वाले का इतना कहना था की दोनों साथ में ज़ोर से 'हा हा हो हो' कर के हँसने लगे.

जब चाचा मिठाई लेने दुकान में घुसे थे तभी मैं बगल के एक दुकान जा कर एक डबल मिंट सिगरेट का पैकेट और चार पासपास लेने लगा था. वहीं खड़ा हो कर इन दोनों लड़कों की बकचोदी सुन रहा था इतनी देर. जब अंदर से एक फीलिंग आई की बहुत हो गया अब घर चलना चाहिए तब जल्दी से चाचा के पास पहुँच कर बाइक में पीछे बैठने लगा...

मुझे, एक लड़के को चाचा के साथ देख कर पहले तो वे दोनों लड़के हड़बड़ा गए... थोड़ा पीछे हुए... और फिर पहला वाला बोला,

"ओह बेटा साथ में है.."

दूसरा धीरे से बोला,

"ज़रूरी नहीं की बेटा ही हो..."

इस बात पे पहला वाला ऐसा खुश हुआ मानो कोई बहुत ही गुप्त बात उसे पता चल गया है...

थोड़ा आगे आ कर बोला,

"क्या अंकल... दूसरे शौक भी रखते हैं क्या...?!!"

अब तो चाचा और मेरा, दोनों का दिमाग बहुत गरम हो गया.

चाचा ज़ोर से, लगभग चीखते हुए बोले,

"क्या बोला रे तुम..??"

मैं बाइक पर से उतर चुका था... चाचा जी का मिजाज और आवाज़ सुन कर शायद दोनों की फट गई होगी इसलिए दोनों चूतियों की तरह हँसते हुए, कुछ कदम पीछे अपनी बाइक की तरफ बढ़ चुके थे.

मैं उनकी ओर गया और ज़ोर से बोला,

"इधर आ ना मादर***... बताते हैं की हम कौन हैं?"

मेरे मुँह से 'मादर***' सुन कर पहले वाले लड़के ने ऐसे रियेक्ट किया मानो उसका ईगो बहुत बुरी तरह चोटिल हुआ है. मेरी तरफ गुस्से से आँखें बड़ी - बड़ी करता हुआ बोला,

"क्या बोला रे तुम?"

"इधर आएगा तब न सुन पाएगा रे मादर***..."   मैंने भी पुरज़ोर तरीके से चिल्ला कर कहा.   

अब तक वहाँ भीड़ जमा होने लगा था. बच्चे, बूढ़े, जवान.. हर उम्र के लोग वहाँ हम लोगों को देखने लगे थे.

पहले वाले लड़के को हीरोगिरी करने की सूझी शायद...

वह मेरी तरफ़ आने लगा... पूरे ताव में... उसे देख कर लग रहा था की ये शायद मुझे कच्चा ही चबा जाएगा.... दूसरा लड़का बाइक स्टार्ट कर के पहले वाले को पीछे से बुलाने लगा,

"अबे आजा.. छोड़ उसको. देर हो रहा है... चलते हैं."

"रूक ना... इस मादर*** को बहुत जादे गर्मी चढ़ा है. तुम गाड़ी स्टार्ट रखो... इ साला को दुई मिनिट में समझाते हैं की किससे बात कर रहा है..?!"

कहते हुए जैसे ही मेरे बहुत पास आया मैंने सेकंड भर की भी देर न करते हुए 'तड़ाक' से उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया. इतना अचानक से मैंने मारा था की वो अपना गाल पकड़ कर 4 - 5 कदम पीछे हो कर लगभग गिरने से खुद को बचाया. जब थोड़ा होश आया की उसके साथ क्या हुआ है तब मारे गुस्से और अपमान से बेचारा रूआँसा हो कर दौड़ते हुए आकर मुझपे झपट पड़ा और मुझे मारने के लिए 4 - 5 बार हाथ घूमाया... जोकि बेकार ही गया.. कुछ दिनों की ट्रेनिंग के कारण मैं भी पूरे जोश में था.. इसलिए मौका मिलते ही उसका कॉलर पकड़ कर दो जोरदार मुक्का मारा.

फिर मुड़ कर चाचा के पास आ कर बाइक पे पीछे बैठ गया. चाचा जल्दी से बाइक स्टार्ट कर के घर की ओर चल दिए.

मैंने एक बार पीछे उस लड़के की ओर देखा.. दूसरा वाला लड़का अपने बेहोश पड़े दोस्त को सँभाल रहा था.


जारी है....
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