27-12-2025, 05:30 PM
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Adultery खुशबू : गोल्ड डिगर हाउसवाइफ
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28-12-2025, 07:58 AM
(This post was last modified: 30-03-2026, 08:59 AM by Dhamakaindia108. Edited 2 times in total. Edited 2 times in total.)
................................................भाग ::- 2 .....…....….........
में खुशबु । मैं 38 साल की हूँ, एक पत्नी और उस सबसे ऊपर, एक ऐसी औरत जो अपनी इच्छाओं को छिपाती नहीं। मेरी शादी मयंक से हुई है, जो 42 साल का है, एक साधारण सा इंसान, प्यार करने वाला, लेकिन बिस्तर पर वो जुनून नहीं जो मुझे चाहिए। मैं कोलकाता के एक मल्टीनेशनल कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर हुं और मेरा पूर्व बॉस, रंजन सिन्हा , 52 साल का एक मर्द, जो अपनी उम्र के बावजूद जवान मर्दों को टक्कर देता है। उसकी कद-काठी, गहरी आवाज़, और वो आँखों में चमक जो मुझे हर बार कमज़ोर कर देती है, वो सब मेरे लिए एक नशा है। ये कहानी उस दिन की है जब मैंने एक शुभ * त्योहार को अपने तरीके से मनाया, और अपने पति को बिना बताए उसकी आँखों के सामने धोखा दिया। बात उस रविवार की है, जब कोलकाता की गलियों में त्योहार की रौनक थी। सुबह-सुबह मैंने घर में पूजा का आयोजन किया। लाल साड़ी पहनकर मैंने मंदिर सजाया, दीये जलाए, और मयंक के साथ मिलकर भगवान से उसकी लंबी उम्र और सेहत की दुआ मांगी। मयंक, जो एक ग्रैमेंट की दुकान चलाते है, हमेशा की तरह मुझे प्यार भरी नज़रों से देख रहा था। उसकी सादगी मुझे प्यार तो करती थी, लेकिन मेरे अंदर की आग को बुझाने के लिए वो काफ़ी नहीं था। मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था। पूजा के बाद, मैंने मयंक से कहा, “सुनो, मुझे ऑफिस का कुछ काम है। मिस्टर सिन्हा के घर से कुछ फाइल्स लेनी हैं। आज तो ऑफिस बंद है, लेकिन वो फाइल्स कल सुबह की मीटिंग के लिए चाहिए।” मैंने अपनी बात को इतना सच्चा बनाया कि मयंक को शक का मौका ही नहीं मिला। उसने हल्की सी नाराज़गी दिखाई, “अरे, खुशबू , आज तो त्योहार है, क्या ज़रूरत है?” मैंने उसका गाल सहलाते हुए कहा, “बस थोड़ी देर की बात है, मेरे राजा। मैं जल्दी वापस आ जाऊँगी।” मेरी मीठी बातों और हल्की सी मुस्कान ने उसे मना लिया। मैंने जानबूझकर एक टाइट ब्लाउज़ और हल्की सी साड़ी चुनी, जो मेरे कर्व्स को उभारे। मेरे बाल खुले थे, और मैंने हल्का मेकअप किया, ताकि मिस्टर सिन्हा को मेरी मंशा साफ़ दिखे। मयंक ने मुझे अपनी गाड़ी से मिस्टर सिन्हा के घर तक छोड़ा। मिस्टर सिन्हा का घर कोलकाता के पॉश इलाके में था। बड़ा सा बंगला, जिसके गेट पर गार्ड खड़ा था। मयंक ने गाड़ी रोकी और कहा, “मैं यहीं रुकता हूँ। जल्दी आना।” मैंने उसे चूमते हुए कहा, “हाँ, बिल्कुल। तुम चाय पी लो पास के ढाबे से।” वो मुस्कुराया और चला गया। मेरे दिल की धड़कनें तेज थीं, लेकिन ये डर की नहीं, बल्कि उत्तेजना की थीं। मैंने मिस्टर सिन्हा को फोन किया, “सर, मैं बाहर हूँ।” उसकी गहरी आवाज़ ने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए, “आ जा, खुशबू । दरवाजा खुला है।” अंदर जाते ही मैंने देखा मिस्टर सिन्हा अपने लिविंग रूम में था, सिर्फ़ एक ढीली कुर्ती और पायजामा पहने। उसकी छाती के बाल और मज़बूत कंधे मुझे हमेशा से ललचाते थे। उसने मुझे देखा और उसकी आँखों में वही भूख थी जो मुझे हर बार दीवाना बना देती थी। “ खुशबु , आज तो त्योहार है। फिर भी काम?” उसने मज़ाक में कहा, लेकिन उसकी नज़रें मेरी साड़ी के पल्लू से मेरी कमर तक भटक रही थीं। मैंने हँसते हुए कहा, “हाँ, सर, लेकिन काम तो काम है। और वैसे भी, आपके साथ काम करने में मज़ा आता है।” मेरी आवाज़ में वो शरारत थी जो उसे समझ आ गई। उसने मुझे अपने पास बुलाया, और मैं उसके करीब गई। उसका हाथ मेरी कमर पर रखा गया, और मेरी साँसें तेज हो गईं। “ मयंक बाहर है न?” उसने पूछा, और मैंने हल्का सा सिर हिलाया। “उसे कुछ नहीं पता, सर। वो बस चाय पी रहा है।” मिस्टर सिन्हा ने हँसते हुए कहा, “तू तो बड़ी हरामिन है, खुशबू।” मैंने उसकी आँखों में देखा और कहा, “हरामिन ही तो चाहिए आपको, सर।” बस, यही वो पल था जब हमारी नज़रें टकराईं, और कमरे में गर्मी बढ़ गई। उसने मेरी साड़ी का पल्लू धीरे से खींचा, और मैंने उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की। मेरी साड़ी फर्श पर गिरी, और मैं सिर्फ़ अपने टाइट ब्लाउज़ और पेटीकोट में थी। मेरे स्तन ब्लाउज़ में कसे हुए थे, और मेरी साँसों के साथ वो ऊपर-नीचे हो रहे थे। सिन्हा ने मेरे ब्लाउज़ के हुक खोलने शुरू किए, एक-एक करके, और हर हुक के खुलने के साथ मेरी उत्तेजना बढ़ रही थी। “ खुशबु , तेरे ये चूचे कितने मस्त हैं,” उसने कहा, और उसका हाथ मेरे स्तनों पर गया। मैंने हल्का सा कराहा, “आह्ह… सर, धीरे…” लेकिन मेरी आवाज़ में वो कमज़ोरी थी जो उसे और उकसा रही थी। उसने मुझे सोफे की तरफ धकेला, और मैं चारों हाथ-पैरों के बल झुक गई, मेरी गांड हवा में थी, और मेरा चेहरा सोफे के मुलायम कुशन में दबा हुआ था। उसने मेरा पेटीकोट ऊपर उठाया, और मेरी पैंटी को एक झटके में नीचे खींच दिया। मेरी चूत पहले से ही गीली थी, और उसने अपनी उंगलियाँ मेरी चूत पर फिराईं। “आह्ह… सर… उफ्फ…” मैं कराह रही थी, और मेरी आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। उसने मेरी गांड पर एक हल्का सा थप्पड़ मारा, “ खुशबु , तू तो पहले से तैयार है।” मैंने हँसते हुए कहा, “आपके लिए हमेशा तैयार हूँ, सर।” उसने अपना पायजामा उतारा, और उसका लंड मेरे सामने था। करीब 7 इंच का, मोटा, और सख्त। मैंने उसे हाथ में लिया और धीरे-धीरे सहलाने लगी। “सर, ये तो मेरे पति के लंड से कहीं बड़ा है,” मैंने शरारत से कहा। मिस्टर सिन्हा ने मेरे बाल पकड़े और कहा, “तो फिर इसे चूस, खुशबू । दिखा कितनी बड़ी रंडी है तू।” मैंने उसका लंड अपने मुँह में लिया, और धीरे-धीरे चूसने लगी। मेरी जीभ उसके लंड के सिरे पर घूम रही थी, और वो कराह रहा था, “उह्ह… खुशबू … तू तो जादू करती है।” मैंने और जोर से चूसा, और मेरे मुँह से “म्म्म…” की आवाज़ निकल रही थी। कुछ देर बाद, उसने मुझे फिर से सोफे पर झुकाया। “ खुशबु , आज तेरी गांड मारूँगा।” मेरे दिल में एक हल्का सा डर था, लेकिन उत्तेजना उससे कहीं ज्यादा। मैंने कहा, “सर, धीरे करना… मेरी गांड अभी तक इतना बड़ा लंड नहीं ले पाई।” उसने मेरी गांड पर थोड़ा तेल लगाया, और अपनी उंगलियाँ अंदर-बाहर करने लगा। मैं कराह रही थी, “आह्ह… उफ्फ… सर…” फिर उसने अपने लंड को मेरी गांड के छेद पर रखा और धीरे से दबाव डाला। “आआह्ह…” मैं चीखी, लेकिन दर्द के साथ-साथ मज़ा भी आ रहा था। उसने धीरे-धीरे अपने लंड को मेरी गांड में घुसाया, और हर धक्के के साथ मेरी साँसें रुक रही थीं। “थप-थप” की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी, और मैं चिल्ला रही थी, “सर… और जोर से… मेरी गांड फाड़ दो… आह्ह…” उसने मेरे बाल पकड़े और और जोर से धक्के मारने लगा। “ खुशबु , तेरा पति तो तुझे ऐसा मज़ा नहीं दे सकता।” मैंने कराहते हुए कहा, “नहीं, सर… वो तो बस नाम का मर्द है… आप ही मेरी चुदाई करो… मेरी चूत को आपके माल से भर दो…” मेरी गंदी बातों ने उसे और जोश में ला दिया। उसने मुझे पलटा और मेरी चूत में अपना लंड घुसा दिया। “थप-थप-थप” की आवाज़ और तेज हो गई, और मैं चिल्ला रही थी, “आह्ह… उह्ह… सर… और जोर से… मेरी चूत फाड़ दो…” उसका हर धक्का मुझे जन्नत की सैर करा रहा था। मेरी चूत गीली थी, और उसका लंड अंदर-बाहर हो रहा था। करीब 20 मिनट की चुदाई के बाद, उसने कहा, “खुशबू , मैं झड़ने वाला हूँ।” मैंने चिल्लाते हुए कहा, “सर, मेरे अंदर ही झड़ जाओ… मेरी चूत को अपने माल से भर दो…” और फिर उसने एक जोरदार धक्का मारा, और मैंने महसूस किया कि उसका गर्म माल मेरी चूत में भर रहा था। “आह्ह…” मैंने एक लंबी सिसकारी भरी, और मेरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई। चुदाई के बाद, मैंने अपनी साड़ी ठीक की, लेकिन मेरी पैंटी अभी भी गीली थी। मिस्टर सिन्हा ने मेरे चूची पर कुछ नोट फेंके और कहा, “ये ले, अपनी मेहनत की कमाई।” मैंने हँसते हुए नोट उठाए और अपनी साड़ी में रख लिए। मेरी चूत से उसका माल अभी भी टपक रहा था, और हर कदम के साथ मुझे एक अजीब सी उत्तेजना हो रही थी। मैं बाहर निकली, और मयंक गाड़ी में मेरा इंतज़ार कर रहा था। उसने नाराज़गी भरे लहजे में कहा, “इतनी देर क्यों लगी, खुशबू ?” मैंने हँसते हुए कहा, “अरे, सर के साथ कुछ जरूरी डिस्कशन था। ये लो, तुम्हारे लिए गिफ्ट।” मैंने उसे वो नोट दिए, जो अभी भी मेरे पसीने और मिस्टर सिन्हा के माल की महक से सने थे। मैंने मयंक को गले लगाया और उसके होंठों को चूमा। मेरी चूत से मिस्टर सिन्हा का माल अभी भी रिस रहा था, और मेरे मन में एक शरारती मुस्कान थी।
28-12-2025, 10:45 AM
Pati ko bhi koi khusbhu dila do cheating do tarfa karwao to maza aey
28-12-2025, 03:28 PM
30-12-2025, 07:22 PM
(This post was last modified: 17-05-2026, 01:23 PM by Dhamakaindia108. Edited 2 times in total. Edited 2 times in total.)
मेरा नाम खुशबू है। 30 साल। फिगर 36-28-38 – छाती इतनी भरी कि कुर्ती के बटन पर हमेशा खिंचाव रहता है, कमर पतली, हिप्स गोल और स्कर्ट में परफेक्ट लगती हुं। गोरी स्किन, लंबे बाल जो हमेशा रबड़ में बंधे रहते हैं, और आँखें जो मेरी सारी गुप्त बेचैनी छिपा नहीं पातीं। मैं एक मीडियम साइज़ की प्राइवेट कंपनी में सीनियर डायरेक्टर हूँ। मेरा बॉस – श्री सिन्हा – 55 साल के। लंबे कद, फिट बॉडी, सूट में हमेशा शार्प लगते हैं, गहरी आवाज़, और वो नज़रें जो मीटिंग में भी मेरी तरफ ठहर जाती हैं। लेकिन उनकी आँखों में कुछ ऐसा है जो मुझे हर मीटिंग के बाद रातों को जगाता रहता है।
शुरू में सब प्रोफेशनल था। रिपोर्ट्स, मीटिंग्स, ओवरटाइम। लेकिन धीरे-धीरे चीज़ें बदल गईं। लेट नाइट मीटिंग्स में वो मेरे पास ज्यादा देर तक खड़े रहते। "खुशबू... ये प्रेजेंटेशन बहुत अच्छा है" कहकर उनकी उँगलियाँ मेरी कमर पर हल्के सा टच हो जातीं। मैं सिहर जाती, लेकिन कुछ कहती नहीं। वो भी कुछ नहीं कहते। बस नज़रें टकराती हैं और वो हल्के से मुस्कुरा देते हैं। एक शाम की बात है। ऑफिस में लेट हो गया था। 9:30 बज चुके थे। ज्यादातर लोग चले गए थे। मैं अपनी डेस्क पर रिपोर्ट फाइनल कर रही थी। लाइट्स कम हो चुकी थीं – सिर्फ मेरी और श्री सिन्हा के केबिन की लाइट जल रही थी। वो अचानक मेरे पास आए। कोई आवाज़ नहीं। बस मेरे पीछे खड़े हो गए। इतने पास कि उनकी साँस मेरे कंधे पर लग रही थी। गर्म, भारी। मेरी साँस थम गई। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था – इतनी तेज़ कि ऑफिस की खामोशी में भी सुनाई दे रहा था। वो बोले नहीं। बस खड़े रहे। उनकी साँस मेरे कान पर। फिर धीरे से बोले, "खुशबू... आज तुम... बहुत सुंदर लग रही हो।" मेरा गला सूख गया। मैंने कुछ कहा नहीं। वो और पास आए। अब कोई जगह नहीं बची। उनकी साँस मेरे गर्दन पर। "ये कुर्ती... तुम पर कितनी अच्छी लग रही है।" मैं सिहर उठी। "सर..." आवाज़ निकली नहीं सही से। वो नाम बोलते ही tension और बढ़ गई। उनका हाथ धीरे से मेरी कमर पर गया – सिर्फ छुआ। वो स्पर्श... जैसे आग लग गई। मैंने हटाया नहीं। हटा नहीं पाई। उनकी उँगलियाँ कमर पर फिसलीं – बहुत धीरे, बहुत नरम। कुर्ती के नीचे से छुआ। मेरी छाती पर हल्का स्पर्श। दबाया नहीं। बस महसूस किया। मेरी सिसकी निकल गई – बिना आवाज़ के। पूरा बदन काँप रहा था। साँस रुक-रुक कर आ रही थी। वो मेरे कान के पास और करीब आए। "खुशबू... मैं जानता हूँ ये गलत है... मैं तुम्हारा बॉस हूँ... लेकिन जब से तुम ऑफिस में आई हो... मैं तुम्हें देखता ही रह जाता हूँ। तुम्हारा ये फिगर... 36-28-38... मेरे दिमाग में रहता है।" मैंने फुसफुसाया, "सर... कोई देख लेगा... ऑफिस में..." लेकिन मेरी आवाज़ में मना करने की ताकत नहीं थी। अंदर से कुछ पिघल रहा था। डर, शर्म, और वो निषिद्ध चाहत। उनका हाथ मेरी कमर पर रुक गया। हल्का दबाव। मैं आँखें बंद कर लीं। उनकी साँस मेरे गाल पर। होंठ इतने पास कि बस छूने वाले थे। लेकिन छुए नहीं। वो silence... इतना गहरा, इतना तीव्र कि ऑफिस की AC की आवाज़ भी दूर लग रही थी। हर सेकंड में दिल धड़कता, साँस थमती, बदन सिहरता। tension इतनी intense कि मेरी आँखों में आँसू आ गए। डर था – कोई स्टाफ आ जाएगा, कोई कैमरा कैच कर लेगा – लेकिन चाहत भी उतनी ही तेज़। फिर बाहर से लिफ्ट की आवाज़ आई – कोई क्लीनर आ रहा था। वो पीछे हट गए। एक कदम। बस एक कदम। मैंने कुर्ती ठीक किया। चेहरा गरम, साँसें तेज़। वो मुस्कुराए – वो मुस्कान जो अब मेरे दिल में उतर चुकी थी। "रिपोर्ट... कल सुबह देख लूँगा। घर जाओ।" मैंने सिर हिलाया। कुछ बोली नहीं। वो चले गए। मैं वहीं बैठी रही, काँपती हुई। रात भर नींद नहीं आई। मन में बस वो स्पर्श, वो साँस, वो silence। अब हर शाम, हर मीटिंग के बाद, हर लिफ्ट में वो tension। कभी हाथ ब्रश होता है, कभी नज़रें टकराती हैं, कभी अकेले में "खुशबू... अच्छा काम" कहते हुए कमर छू जाते हैं। स्पर्श कभी पूरा नहीं होते – लेकिन tension हर बार और तीव्र। साँसें थमती हैं। दिल कान में गूँजता है। हम रुकते हैं – हमेशा रुकते हैं। लेकिन मन चीखता है "बस एक बार... और करीब... बस एक बार..."। ये गुप्त रोमांस... ऑफिस की दीवारों के अंदर छिपा, डरावना, मीठा, निषिद्ध लेकिन इतना लाजवाब जो आज भी जारी है है। अगले दिन ऑफिस का माहौल बदला-बदला सा था। रात की उस घटना के बाद मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मैं श्री सिन्हा की आँखों में आँखें डालकर देख सकूँ। मैं अपनी डेस्क पर सिर झुकाए काम कर रही थी, लेकिन मेरा पूरा ध्यान उनके केबिन के दरवाजे पर था। दोपहर के वक्त इंटरकॉम की घंटी बजी। मेरा दिल ज़ोर से धड़का। "खुशबू, जरा केबिन में आओ। एक कॉन्फिडेंशियल फाइल डिस्कस करनी है," सर की वही भारी और मखमली आवाज़। मैं अपनी कुर्ती ठीक करते हुए उनके केबिन में दाखिल हुई। उन्होंने अंदर से दरवाजा लॉक नहीं किया, लेकिन उसे बस हल्का सा सटा दिया। वह अपनी बड़ी सी रिवॉल्विंग चेयर पर बैठे थे, चश्मा हटाकर मुझे देख रहे थे। "बैठो," उन्होंने सामने वाली कुर्सी की तरफ इशारा किया। जैसे ही मैं बैठी, उन्होंने एक फाइल मेरी तरफ सरकाई। "इस प्रोजेक्ट के लिए हमें इस संडे को ऑफिस आना पड़ सकता है। सिर्फ तुम और मैं।" 'सिर्फ तुम और मैं'—इन शब्दों ने मेरे पेट में अजीब सी खलबली मचा दी। मैंने फाइल की तरफ देखा, लेकिन अक्षर धुंधले लग रहे थे। अचानक वह अपनी कुर्सी से उठे और घूमकर मेरे ठीक पीछे आकर खड़े हो गए। उनकी मौजूदगी की गर्मी मुझे अपनी पीठ पर महसूस हो रही थी। उन्होंने झुककर अपना एक हाथ टेबल पर रखा और दूसरा हाथ... बहुत धीरे से मेरे कंधे पर। उनकी उँगलियाँ मेरे बन (bun) से निकले छोटे बालों के साथ खेलने लगीं। "कल रात तुम बहुत जल्दी चली गई थीं," उन्होंने मेरे कान के पास फुसफुसाया। मेरी साँसें फिर से बेकाबू होने लगीं। "सर... काम खत्म हो गया था..." मेरी आवाज़ काँप रही थी। "काम तो कभी खत्म नहीं होता, खुशबू," कहते हुए उन्होंने अपना हाथ नीचे की तरफ सरकाया। उनकी हथेली मेरी पीठ के बीचों-बीच रुकी, जहाँ मेरी कुर्ती का कपड़ा सबसे ज्यादा खिंचा हुआ था। उन्होंने वहाँ हल्का सा दबाव बनाया। मैं कुर्सी पर जमी रह गई। डर था कि कोई भी शीशे के दरवाजे के बाहर से देख सकता है, लेकिन वह रिस्क ही जैसे मेरे शरीर में बिजली दौड़ा रहा था। उन्होंने अपना चेहरा मेरे गले के पास झुकाया और एक लंबी गहरी साँस ली। "तुम्हारी परफ्यूम... या शायद ये तुम्हारी अपनी खुशबू है... मुझे पागल कर रही है।" तभी बाहर किसी के ज़ोर से बात करने की आवाज़ आई। वह फ़ौरन सीधे खड़े हो गए और अपनी चेयर पर वापस जा बैठे, जैसे कुछ हुआ ही न हो। "ठीक है, इस फाइल को कल तक तैयार कर लेना," उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा ताकि बाहर सुनाई दे। मैं काँपते पैरों से बाहर निकली। संडे का इंतज़ार अब एक मीठे खौफ जैसा लग रहा था। खाली ऑफिस, बंद कमरे और सिन्हा सर। क्या मैं खुद को रोक पाऊँगी? , रविवार का दिन आया। पूरा ऑफिस सन्नाटे में डूबा था। बाहर की तपती धूप और अंदर की ठंडी AC की हवा के बीच एक अजीब सा विरोधाभास था—ठीक वैसा ही जैसा मेरे मन के अंदर चल रहा था। डर और बेताबी का संगम। संडे: खाली ऑफिस और गहराता सन्नाटा मैं ऑफिस पहुँची। आज मैंने जानबूझकर एक गहरी नीली (Navy Blue) रंग की फॉर्मल कुर्ती पहनी थी, जिसका गला थोड़ा छोटा था पर फिटिंग इतनी सटीक कि मेरी छाती का उभार और कमर का मोड़ साफ झलक रहा था। जैसे ही मैंने सिन्हा सर के केबिन का दरवाजा खटखटाया, अंदर से उनकी भारी आवाज़ आई, "आ जाओ।" वो आज सूट में नहीं थे। उन्होंने शर्ट की आस्तीनें ऊपर चढ़ा रखी थीं और ऊपर के दो बटन खुले थे। मुझे देखते ही उनकी आँखों में एक चमक सी आ गई। "बैठो, खुशबू। मैंने कॉफी मंगवाई है," उन्होंने कहा। हम काम करने लगे, लेकिन फाइलें तो बस एक बहाना थीं। टेबल के नीचे से जब भी उनकी नज़रें मेरी कुर्ती के बटनों पर टिकतीं, मुझे महसूस होता कि बटन कभी भी टूट सकते हैं। माहौल में बिजली सी दौड़ रही थी। अचानक, लैपटॉप की स्क्रीन पर इशारा करते हुए वो मेरे पास आए। इस बार वो रुके नहीं। उन्होंने अपना हाथ मेरी कुर्सी के हत्थे पर रखा और दूसरा हाथ सीधे मेरी कमर के उस कर्व पर, जहाँ से स्कर्ट या पजामी शुरू होती है। "खुशबू... आज कोई नहीं है यहाँ। न स्टाफ, न कैमरे की फिक्र," उन्होंने मेरे कान के पास फुसफुसाया। उनकी गर्म साँसें मेरे गले को भिगो रही थीं। उन्होंने अपनी उँगलियाँ मेरी कमर पर थोड़ी और मजबूती से टिका दीं। "तुम्हें अंदाजा नहीं है कि इस सादगी में तुम कितनी कयामत लगती हो।" मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे लगा वो भी इसे सुन सकते हैं। मैंने धीरे से पीछे मुड़कर उनकी तरफ देखा। उनके चेहरे पर वही जानलेवा मुस्कान थी। ""सर... हमें काम पूरा करना चाहिए," मैंने कमजोर आवाज़ में कहा, लेकिन मेरा हाथ खुद-ब-खुद उनकी शर्ट की बाजू को छूने लगा। वो और करीब आए। अब हमारे बीच कागज के एक टुकड़े जितनी भी जगह नहीं बची थी। उन्होंने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया। उनकी अँगूठी का ठंडा अहसास और उनके हाथों की गर्माहट... एक अद्भुत विरोधाभास था। तभी, गलियारे में किसी के चलने की आहट सुनाई दी—शायद गार्ड राउंड पर था। हम दोनों एक पल के लिए जम गए। वो पीछे नहीं हटे, बस मेरी आँखों में गहराई से देखते रहे, जैसे कह रहे हों—'अगली बार कोई नहीं रोक पाएगा।' The End
30-12-2025, 07:27 PM
(This post was last modified: 17-05-2026, 01:24 PM by Dhamakaindia108. Edited 2 times in total. Edited 2 times in total.)
update complete
30-12-2025, 07:30 PM
30-12-2025, 07:51 PM
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06-01-2026, 06:02 PM
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06-01-2026, 06:10 PM
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07-01-2026, 07:00 AM
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07-01-2026, 09:32 AM
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10-01-2026, 08:27 PM
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10-01-2026, 09:34 PM
10-01-2026, 09:36 PM
11-01-2026, 07:14 AM
(This post was last modified: 17-05-2026, 01:21 PM by Dhamakaindia108. Edited 2 times in total. Edited 2 times in total.)
12-01-2026, 07:36 AM
(This post was last modified: 17-05-2026, 01:25 PM by Dhamakaindia108. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
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17-01-2026, 09:11 PM
(This post was last modified: 18-01-2026, 08:33 PM by Dhamakaindia108. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
27-01-2026, 09:14 PM
27-01-2026, 11:37 PM
(This post was last modified: 27-01-2026, 11:41 PM by ARJos. Edited 2 times in total. Edited 2 times in total.)
ये सारी कहानियाँ किरदारों के नाम बदल कर और authors के नाम बदल कर पोस्ट करा रहा है। ये कहानियाँ पहले ही xossipy पे पोस्ट हो चुकी हैं।
Example: ये ऊपर ऑडिटिंग ऑफिसर वाली कहानी “प्रोमोशन की मजबूरी” है जो लेखक Deenu की कई कहानियों में से एक है। Original कहानी Rohit भाई ने xossipy पे यहाँ पोस्ट की है: https://xossipy.com/thread-25588-post-45...pid4552886 |
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