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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
#41
भाग ~ १२




उस वक्त दोपहर हो चुकी थी जब मां खलिहान में हमारे पास पहुंची। आते ही उसने अनीता से कहा कि वो घर जा कर फटाफट खाना बनाए। तब तक उसकी जगह दशरथ काका बैलों को हाँकेंगे। 

अनीता बैलों के पीछे पीछे चलते हुए थक चुकी थी इस लिए जैसे ही मां ने उसे घर जाने को कहा तो वो खुश हो गई और साथ ही मेरी तरफ देख कर मुझे ये सोच के चिढ़ाया कि ले तू ऐसे ही लगा रहेगा अब।

"तू अपनी बहन के साथ जा करेजा।" तभी श्यामू काका ने मुझसे कहा─"नहा धो के और खा पी के बाद में बिटिया के साथ ही वापस आ जाना।"

काका की ये बात सुनते ही जहां अनीता का चेहरा उतर गया वहीं मैं हंस पड़ा। खैर मैं और अनीता घर की तरफ चल पड़े। मेरी जगह बैलों को हांकने का काम अब श्यामू काका खुद ही करने लगे थे। 

"हाय आज कितनी गर्मी है।" रास्ते में अनीता अपने दुपट्टे से चेहरे और गले का पसीना पोंछते हुए बोली─"मैं तो पूरा भीग गई हूं। पूरे शरीर में किसकिसी हो रही है।"

"सही कहा...गर्मी तो आज है ही।" मैंने सिर हिला कर कहा─"चल नदी में नहाने चलते हैं।"

"मन तो कर रहा है नदी में नहाने का।" अनीता ने थोड़ी मायूसी में कहा─"पर मां ने कहा है कि घर जा के फटाफट खाना बनाना है मुझे।"

"अरे तो क्या हुआ।" मैंने कहा─"घर जा के भी तो पहले तू नहाएगी ही। उसके बाद ही तो खाना बनाएगी। इससे अच्छा ये है कि यहीं नदी में नहा ले...फिर घर जा के सिर्फ तुझे खाना ही बनाना पड़ेगा।"

"अगर देर हो गई तो मां डांटेगी।" 

"अरे हम जल्दी नहा के चल देंगे घर की तरफ।"

"लेकिन अगर मां को पता चला कि मैं तेरे साथ नदी में नहाने गई थी और इस वजह से खाना बनाने में देर हुई तो????"

"ऐसा कुछ नहीं होगा।" मैंने कहा─"और मां को कैसे पता चल जाएगा भला। न मैं मां को कुछ बताऊंगा और न ही तू बताएगी। हम नदी में जा कर मस्त चार पांच डुबकियां लगाएंगे...थोड़ा तैरेंगे और फिर झट घर चले जाएंगे।"

"ठीक है।" अनीता के चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई─"बस तू मेरे साथ छल मत करना।"

"अरे नहीं करूंगा।" 

"तेरा कोई भरोसा नहीं है।" अनीता फिर से थोड़ा मायूस हुई─"तू हमेशा मां से मुझे डांट पड़वाता है जबकि गलती भी तेरी ही होती है।"

"वो तो मैं बस ऐसे ही तुझे छेड़ता रहता हूं।" मैंने हल्के से मुस्कुरा कर कहा─"तुझे छेड़ने में मुझे मजा आता है।"

"अरे हां...तूने सुना न आज छोटे काका हमारे झगड़े के बारे में क्या बोल रहे थे।" अनीता को एकदम से याद आया तो उसने मुस्कुराते हुए कहा।

"हां सुना मैंने।" मैंने सिर हिलाया─"अगर उनकी बातें सच हैं तो इसका मतलब हम दोनों जो एक दूसरे से झगड़ा करते हैं वो भी हमारा प्यार ही है।"

"मुझे तो नहीं लगता ऐसा।" अनीता ने शेखी से मुंह बना के कहा─"तू तो कभी कभी मुझे अपना दुश्मन मान के मारता भी है। अगर मुझसे प्यार करता तो क्या ऐसे मारता मुझे।"

अनीता की बात सुन कर जाने क्यों मेरे अंदर अजीब सी लहर उठी। एक ऐसी लहर जो आज से पहले कभी महसूस नहीं की थी मैंने। उसको अपलक देखता रह गया मैं और वो अभी भी शेखी से मुंह बनाए मेरे साथ चलती जा रही थी। जब मैं चुपचाप उसे देखते हुए चलता ही रहा तो सहसा उसे मेरे चुप हो जाने का एहसास। उसने गर्दन घुमा कर मेरी तरफ देखा।

"अब ऐसे क्या देख रहा है।" फिर वो मुझे अपनी तरफ अपलक देखता देख बोली─"क्या मैंने गलत कहा।"

"न..नहीं वो...ऐसी बात नहीं है।" मैं थोड़ा सकपका सा गया─"कह तो तू सही रही है कि मैं तुझे कभी कभी मार देता हूं लेकिन ये सच नहीं है कि मैं तुझे अपना दुश्मन मान लेता हूं।"

"फिर क्यों मारता है मुझे।" अनीता ने भोली सूरत बना के मुझे देखा।

"बताया न कि मजा आता है तुझे छेड़ने में और तुझे परेशान करने में।" मेरा दिल जाने क्यों एकाएक धड़कने लगा था।

"कैसा भाई है तू।" अनीता ने मेरे बाजू में हल्के से मार कर कहा─"अपनी बहन को मारने में और छेड़ने में मजा आता है तुझे। सच में बहुत गंदा है तू। जा मुझे तुझसे बात ही नहीं करना अब।"

अनीता ने ये कह कर सच में रूठ जाने जैसा चेहरा बना लिया। ये देख मैं मुस्कुरा उठा।

"तू बात न भी करेगी तब भी तुझे छेड़ूँगा।" मैंने उसके सिर पर एक चपत लगा कर कहा─"समझी...छिपकली।"

"मुझसे दूर रह तू।" 

"अरे श्यामू काका की बात भूल गई क्या तू।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"हमारा इस तरह झगड़ा करना भी प्यार है।"

"चल झूठा।" अनीता ने कहा─"मैं बुद्धू नहीं हूं जो इतना भी न समझूं कि ये तेरा प्यार है या कुछ और।"

"ऐसे तो मैं भी कह सकता हूं कि तेरा मुझसे झगड़ा करना भी प्यार नहीं है।" मैंने कहा─"मतलब तू अपने भाई को अपना दुश्मन मानती है।"

"हाय दय्या कितना झूठा है तू।" अनीता ने आँखें फैला कर कहा─"मैं तो तुझे अपना भाई ही मानती हूं...तू ही मुझे अपनी बहन नहीं मानता।"

"मैं तो मानता हूं।" मैंने एकाएक उसकी तारीफ करने का सोच कर कहा─"तुझे पता है मैं अक्सर अपने दोस्त बबलू से बोला करता हूं कि तू मेरी सबसे प्यारी बहन है। जब तक तुझे देख नहीं लेता और जब तक तुझे छेड़ नहीं लेता तब तक मुझे कुछ अच्छा ही नहीं लगता।"

मेरी ये बात सुनते ही अनीता ने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा। उसकी आंखों में अविश्वास साफ दिख रहा था।

"तू ये झूठ कह रहा है न मुझसे।" फिर उसने कहा─"तू मुझे झूठ मूठ का बहला रहा है न।"

"अब तुझे भरोसा नहीं है तो मैं क्या करूं।" मैंने मायूसी दिखाई─"पर सच तो यही है कि तू मेरी प्यारी बहन है। सुनीता और रानी से भी ज्यादा चाहता हूं तुझे।"

अनीता ये सुन कर और भी हैरत से देखने लगी मुझे। इस बार वो फौरन कुछ न बोली।

"क्या तू सच कह रहा है।" फिर उसने थोड़ा गंभीर हो कर पूछा─"क्या सच में तू मुझे सुनीता और रानी से भी ज्यादा चाहता है।"

"हां...बस मैं तुझे कभी दिखाता नहीं हूं।" मैं भी थोड़ा गंभीर हो गया─"तू भी तो कभी अपना प्यार नहीं दिखाती मुझे। इसी लिए तुझसे झगड़ा करता रहता हूं। अगर तू भी मुझे अपना प्यार दिखाए तो मैं भी तुझे अपना प्यार दिखाऊं और फिर इस तरह झगड़ा न करूं तुझसे।"

अनीता इतना ज्यादा हैरान थी कि उसे अब भी शायद मेरी बातों पर भरोसा नहीं हो रहा था। हम दोनों ही चलते चलते रुक गए थे और एक दूसरे की आंखों में देख रहे थे।

"देख मुझे अभी भी तेरी बात पर भरोसा नहीं हो रहा है।" फिर उसने कहा─"लेकिन फिर भी मैं मान लेती हूं। बाकी मैं तो अब आगे से तुझसे झगड़ा नहीं करूंगी।"

"ठीक है।" मैंने कहा─"तो मेरा भी वादा है तुझसे कि मैं भी तुझसे झगड़ा नहीं करूंगा पर हां तुझे थोड़ा बहुत छेड़ूँगा जरूर क्योंकि जब तक तुझे छेड़ूंगा नहीं तो मुझे कुछ अच्छा ही नहीं लगेगा।"

"मतलब तू खुद को अच्छा लगवाने के लिए मुझे छेड़ेगा।" अनीता ने आँखें फैला कर कहा─"तो ठीक है...मैं भी छेड़ूंगी तुझे।"

"मतलब तुझे भी मुझे छेड़ने से अच्छा लगता है।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"अरे छिपकली यही तो हमारा प्यार है। श्यामू काका यही तो बता रहे थे हमें।"

"अरे हां तू सही कह रहा है।" अनीता ने चौंक कर कहा।

"चल अब...वरना देर हो जाएगी।" मैंने कहा─"पहले हम नदी में नहाएंगे फिर घर जाएंगे...ठीक है।"

"हां चल।" 

अनीता ने खुशी से कहा। फिर अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे ले कर चलने लगी। आम तौर पर ऐसा मैं ही किया करता हूं...मतलब उसका हाथ पकड़ कर जबरदस्ती उसे कहीं ले जाने के लिए खींचता हूं मगर आज उसने खुद मेरा हाथ पकड़ा और खुशी से मुझे नदी तरफ ले जाने लगी थी।

थोड़ी ही देर में हम दोनों नदी के पास पहुंच गए। अनीता अभी भी खुश दिख रही थी। उसे खुश देख मुझे भी अच्छा लग रहा था लेकिन इसके साथ ही मुझे अपने अंदर कुछ अजीब सा भी महसूस हो रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों था।

"काश तेरी तरह मैं भी अपने कपड़े उतार कर नदी में कूद जाती।" नदी के पास पहुंचते ही वो मेरा हाथ छोड़ कर लेकिन थोड़ा मायूस हो कर बोली─"तो कितना मजा आता नहाने में।"

"अरे तो उतार दे न।" मैंने लापरवाही से कहा─"यहां हमारे सिवा है ही कौन।"

"पागल है क्या।" अनीता मेरी बात सुन कर चौंक पड़ी─"और कोई नहीं है तो क्या हुआ तू तो है। तेरे सामने मैं कैसे कपड़े उतार सकती हूं।"

"क्यों....इसमें क्या है।" मैंने भोलापन दिखाया─"जब मैं तेरे सामने अपने कपड़े उतार सकता हूं तो तू भी तो उतार सकती है।"

"एकदम बुद्धू है क्या तू।" अनीता ने आँखें फैला कर कहा─"इतना बड़ा हो गया है फिर भी ऐसी बात करता है। क्या तुझे पता नहीं है कि जब कोई लड़की बड़ी हो जाती है तो वो किसी के सामने अपने कपड़े नहीं उतारती।"

"पर तू तो मेरी बहन है न।" मैंने कहा─"पहले भी तो तू मेरे सामने कपड़े उतारा करती थी।"

"हां तो पहले मैं बहुत छोटी थी इस लिए कपड़े उतार देती थी।" अनीता ने थोड़ा लजा कर कहा─"और तू भी जब छोटा था तो सबके सामने पूरा नंगा ही हो जाता था मगर अब क्या तू पहले जैसे नंगा होता है सबके सामने...नहीं न। क्योंकि अब तू बड़ा हो गया है तो तुझे नंगा होने में शर्म आने लगी है। ऐसे ही मैं बड़ी हो गई हूं तो मुझे भी कपड़ा उतारने में शर्म ही आएगी न।"

"कितनी अजीब बात है न बड़े हो जाने पर कपड़े उतारने में शर्म आने लगती है।" मैंने कहा─"लेकिन अगर इस वक्त हम कपड़े उतार लेंगे तो क्या हो जाएगा भला। देख मैं तो तेरे सामने अब भी पूरा नंगा हो सकता हूं। मुझे तो कोई शर्म नहीं आएगी....फिर तुझे क्यों आएगी शर्म।"

"क्योंकि तू बेशर्म है और मैं नहीं हूं।" अनीता ने फिर से मेरे बाजू में हल्के से मार कर कहा─"मैं तेरे सामने तेरी तरह कपड़े उतार कर नंगी नहीं हो सकती। अच्छा अब ये बातें छोड़ और जल्दी से नहाते हैं। अगर खाना बनाने में मुझे देर हो गई तो मां बहुत डांटेगी।"

मुझे भी लगा कि अब देर नहीं करना चाहिए। इस लिए मैं फटाफट अपने कपड़े उतारने लगा। जबकि अनीता वहीं नदी के किनारे रखे एक चपटे पत्थर पर बैठ के हाथ मुंह धोने लगी।

कपड़े उतार कर मैं नदी में उतरने लगा। गर्मी में जब मस्त शीतल और ठंडे पानी का स्पर्श हुआ तो मन खुशी से लहक उठा। मैं सिर्फ कच्छे में था। जल्दी ही मैं नदी के बीच पहुंच गया और फटाफट डुबकी लगाने लगा। बड़ा ही मजा आया। उधर अनीता मुझे डुबकी लगाते देख मुस्कुराई।

"आ जा न तू भी।" मैंने उसे बुलाया─"यहां पर मस्त ठंडा पानी है। कसम से बड़ा मजा आ रहा है।"

अनीता मुस्कुराते हुए उठी और धीरे धीरे नदी में उतरने लगी। उसने अपना दुपट्टा पाट पर ही रख दिया था। उसके बदन में पीले रंग का कुर्ता और सलवार था। थोड़ी ही देर में वो कमर तक नदी में उतर आई। वो मुझसे बस थोड़ी ही दूरी पर थी इस लिए मैं हाथों से पानी उछाल उछाल कर उसको भिगोने लगा। वो मेरे ऐसा करते ही खुद को बचाने की कोशिश करने लगी मगर जब वो समझ गई कि उसका भीगना निश्चित है तो वो भी हाथों से पानी उछाल उछाल कर मुझ पर डालने लगी।

कुछ ही पलों में अनीता पूरा भीग गई। उसका पीला कुर्ता भीग जाने के कारण उसके बदन से चिपक गया और उसके सीने के उभार साफ नजर आने लगे। तभी मैंने एकदम से पानी में डुबकी लगाई और एक ही पल में अंदर ही अंदर उसके पास पहुंच गया। जैसे ही उसे एहसास हुआ कि मैं बिल्कुल करीब आ गया हूं तो वो मुझसे दूर भागने लगी मगर मैंने पीछे से पकड़ लिया उसे।

"क्या कर रहा है राजू।" अनीता चीखते हुए हंसी─"छोड़ दे मुझे नहीं तो डूब जाऊंगी।"

"तो डूब जा न।" मैं उसे पीछे से पकड़े एकदम से नीचे की तरफ खींचा तो वो छटपटाते हुए पानी में डूबती चली गई।

पानी के अंदर वो बुरी तरह छटपटाई और ऊपर की तरफ उठने के लिए जोर लगाने लगी।

"कुत्ता डुबो के मार डालेगा क्या मुझे।" ऊपर आते ही वो तेज तेज सांस ले कर चिल्लाई─"दूर हट मुझसे।"

"अरे डर क्यों रही है छिपकली।" मैंने उसे अपनी तरफ घुमा कर कहा─"तूने कैसे सोच लिया कि मैं अपनी प्यारी बहन को डुबो के मार डालूंगा।"

मेरी बात सुनते ही अनीता ने अपने चेहरे का पानी पोछ कर मुझे ध्यान से देखा। हम दोनों बिल्कुल करीब थे इस लिए मैं उसके चेहरे के एक एक भाव साफ देख सकता था।

"क्या सच में तुझे ऐसा लगता है।" मैंने बड़े प्यार से उसे देखते हुए पूछा।

"पर तूने अचानक से मुझे अंदर खींच लिया तो मैं डर ही गई थी।" फिर उसने मासूम सी शक्ल बना के कहा।

"तुझे डरने की कोई जरूरत नहीं है।" मैंने अचानक उसके चेहरे को दोनों हाथों से थाम लिया─"तेरा भाई हूं...भले ही तुझसे झगड़ा करता हूं...छेड़ता हूं लेकिन फिर भी तुझे बहुत मानता हूं....तुझे प्यार करता हूं।"

अनीता गौर से देखने लगी मुझे। आंखों में अजीब से भाव थे। ऐसे भाव से उसने आज से पहले कभी नहीं देखा था मुझे।

"आज तुझे क्या हो गया है राजू।" फिर जाने क्या सोच के वो धीमे से बोली─"आज से पहले तो तू कभी ऐसी बातें नहीं करता था मुझसे।"

"क्योंकि आज से पहले तू मुझे इतनी प्यारी नहीं लगती थी।" मैंने मुस्कुरा कर उसके दाएं गाल पर हल्के से चपत लगाई─"हमेशा छिपकली ही नजर आती थी।"

"मारूंगी अगर छिपकली बोलेगा तो।" उसने मासूमियत से आँखें दिखाई।

"फिर क्या बोलूं।"

"मेरा नाम ले...और क्या।"

"तू भी तो मुझे कुत्ता...कमीना कहती है।"

"अब से नहीं कहूंगी।" अनीता ने मेरी आंखों में देखते हुए कहा─"पर तू भी गंदी हरकतें नहीं करेगा।"

"मैंने कब गंदी हरकत की।"

"कल कमरे में गंदी हरकत नहीं की थी तूने??"

"मुझे तो ऐसा कुछ भी याद नहीं है।" मैं समझ तो गया पर अंजान बन के बोला─"तू साफ साफ बता मैंने क्या किया था जिसे तू गंदी हरकत बता रही है।"

अनीता फौरन कुछ न बोली। एकाएक ही उसके चेहरे पर लाज के भाव उभर आए। फिर वो मुझसे नजरें हटा कर धीमे से बोली─"कल कमरे में जब तू मुझे पीछे से पकड़े हुए था तब तू मेरे सी..सीने को जोर से दबाए हुए था...क्या याद नहीं तुझे।"

"अच्छा वो। मैंने एकदम से याद आ जाने का नाटक किया─"मैंने तेरा दू...दूध पकड़ रखा था उसकी बात कर रही है क्या तू।"

"धत्त...क्या बोल रहा है ये।" अनीता बुरी तरह लजा कर बोली─"अपनी बहन से कोई भाई ऐसे बोलता है क्या।"

"पर मैं तो ऐसा ही बोलूंगा।" मैंने एकदम से भोलापन दिखाया─"और फिर गलत क्या बोल रहा हूं मैं....मैंने तेरा दूध ही तो पकड़ा था। उसे कुछ और कहते हैं क्या।"

"बस कर अब।" अनीता सच में बहुत शर्माने लगी थी─"तुझे बिल्कुल भी शर्म नहीं है क्या।"

"अच्छा तू बता उसे कुछ और बोलते हैं क्या।" मैंने कहा─"अगर कुछ और बोलते हैं तो तू मुझे बता दे। मैं अब से वही बोलूंगा।"

"तू कुछ मत बोल समझा।" अनीता ने शर्म से मुस्कुरा कर कहा─"और अब ये बातें बंद कर दे। मुझे नहाने दे...देर हो रही है।"

"चल मैं तुझे नहलाता हूं।" मैंने कहा─"जैसे छोटे में मां नहलाती थी।"

"न तू रहने दे।" अनीता ने मुझे दूर धकेला─"मैं खुद नहा लूंगी। तू भी खुद नहा और जल्दी बाहर निकल।"

"तेरी इसी बात से साबित हो गया कि तू अपने भाई को जरा भी प्यार नहीं करती।" मैंने ऐसा मुंह बना लिया जैसे इस बात से मुझे दुख हुआ हो─"अगर प्यार करती तो मेरी किसी बात से इंकार न करती। मैं तो तुझे सच्चे दिल से अपनी बहन मानता हूं....तुझे प्यार करता हूं। इसी लिए तो तुझे नहलाने को कहा और तू.....।"

अनीता ने आँखें फैला कर देखा मुझे। 

"मतलब मैं तुझे नहलाने से मना कर रही हूं तो मैं तुझे प्यार नहीं करती...ये क्या बात हुई।" अनीता ने कहा।

"हां...यही बात हुई।" मैंने उदास सी शक्ल बना कर कहा─"मैं ही मूर्ख हूं जो ये समझ बैठा था कि मेरी प्यारी बहन मुझे भी वैसा ही प्यार करती है जैसे मैं उसे करता हूं। अब पता चल गया मुझे....तू झूठ बोल रही थी मुझसे। जा मुझे अब तुझसे कोई बात नहीं करना।"

कहने के साथ ही मैं उससे दूर होने लगा। ये देख अनीता एकदम से बेचैन और बेबस सी नजर आने लगी। अगले ही पल वो मेरी तरफ तेजी से बढ़ी।

"ऐसे न बोल राजू।" फिर वो मेरे करीब आ कर गंभीरता से बोली─"मैं भी तुझे प्यार करती हूं। मेरा यकीन कर।"

"बस बस मुझे झूठी तसल्ली न दे तू।" मैं उससे फिर दूर हुआ─"इतना भोला और मूर्ख नहीं हूं मैं जितना तू समझती है। मैं समझ गया हूं कि तू बस दिखावा करती है...सच में प्यार नहीं करती है मुझसे।"

अनीता की शक्ल रो देने वाली हो गई। अगले ही पल उसकी आंखों में आंसू भी दिखने लगे। वो अपलक इस तरह मुझे देखे जा रही थी जैसे उसे मेरी बात से कितना दुख हुआ है।

"अच्छा बता कैसे यकीन करेगा तू।" वो फिर से मेरे करीब आती हुई बोली─"तू जो बोलेगा वही करूंगी....फिर तो यकीन करेगा न मुझ पर।"

मेरी धड़कनें एकाएक तेज हो गईं। मन में जाने कब से पाप पालने लगा था मैं जो मुझे बार बार ऐसा कुछ करने को मजबूर कर देता था जो मैंने इसके पहले कभी सोचा तक नहीं था।

"अब बोल न।" मुझे चुप देख वो व्याकुलता से बोली─"बता ऐसा क्या करूं जिससे तुझे यकीन हो जाए।"

"मतलब मेरे कहने पर तू कुछ भी करेगी।" मैंने धड़कते दिल से उसको परखा।

"हां कुछ भी करूंगी।" उसने पूरी दृढ़ता से कहा─"मैं तुझे दिखाऊंगी कि जैसे तू मुझे प्यार करता है वैसे ही मैं भी तुझे प्यार करती हूं। अब बता जल्दी....क्या करूं मैं।"

मैं जल्दी नहीं बोल सकता था क्योंकि उसे शक हो जाता इस लिए थोड़ा सोचने का नाटक किया। वो इंतजार में मुझे ही देखे जा रही थी।

"ठीक है।" मैंने सोच लेने का दिखावा किया फिर बोला─"अगर तू सच में मुझसे प्यार करती है तो अभी मेरी तरह अपने कपड़े उतार के दिखा।"

अनीता ये सुन कर बुरी तरह चौंक पड़ी। आश्चर्य और अविश्वास से आँखें फाड़े मुझे देखने लगी। इधर मेरी धड़कनें ये सोच कर रुक सी गईं कि कहीं वो मेरी ये बात सुन कर गुस्सा तो नहीं हो जाएगी।

"र..राजू...क्या सच में तू यही चाहता है।" फिर उसने कांपती आवाज में पूछा।

"ह...हां।" मुझे उसकी मासूम सी शक्ल देख बुरा तो लगा मगर मैंने खुद को पत्थर बना लिया।

अनीता बहुत ज्यादा बेबस और मजबूर नजर आने लगी थी। लाज से उसका चेहरा सुर्ख पड़ गया था। कोई और परिस्थिति होती तो शायद वो झट से ऐसा करने से इंकार कर देती मगर इस वक्त जाने क्यों उस पर मुझसे प्यार करने की बात साबित करने की सनक सवार हो गई थी।

उसने नदी के बाहर चारों तरफ कई बार घूम घूम कर नजरें दौड़ाई। जाहिर है ये देखने के लिए नदी के आस पास हमारे अलावा कोई तीसरा इंसान तो नहीं है। जब वो संतुष्ट हो गई कि कोई नहीं है तो उसने मेरी तरफ देखते हुए अपने हाथ पानी के नीचे की तरफ बढ़ाए। इधर मेरी धड़कनें एकाएक ये सोच कर काफी तेज चलने लगीं कि क्या सच में वो अपने कपड़े उतार कर मेरी तरह ऊपर से नंगी होने वाली है।

मैं मन ही मन आश्चर्यचकित हो चला था। सांसें रोके मैं उसकी हर प्रक्रिया को बड़े ध्यान से देखे जा रहा था। अगले कुछ ही पलों में मैंने देखा पानी के अंदर से उसके दोनों हाथ बाहर आए। उसने दोनों हाथों से अपने कुर्ते का निचला छोर पकड़ रखा था। मेरे देखते ही देखते उसने कुर्ते को ऊपर उठाना शुरू कर दिया। कुछ ही पलों में उसका गेहुएं रंग का सपाट पेट दिखने लगा और उसके बीच झलकती उसकी छोटी सी मगर सुंदर सी नाभी भी। मेरी धड़कनें अब धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं।

कुर्ता क्योंकि पानी में भीग जाने से गीला हो गया था इस लिए ऊपर सरकने में थोड़ा समय लग रहा था। जल्दी ही अनीता ने उसे इतना ऊपर उठा लिया कि कुर्ते के अंदर पहने जाने वाली उसकी सफेद रंग की छोटी सी कमीज दिखने लगी। घर में मैंने जाने कितनी ही बार उसकी इस कमीज को देखा था लेकिन कभी ये नहीं सोचा था कि इस छोटे से कपड़े को वो कुर्ते के अंदर पहनती है। जिसको पहनने के बाद उसके दूध थोड़ा दब जाते हैं और साथ ही उसके छोटे छोटे निप्पल भी किसी को नहीं दिखते।

गीला कुर्ता जब थोड़ा और ऊपर हुआ तो अनीता की वो सफेद गीली कमीज भी उसके साथ ऊपर उठने लगी। मेरा हलक सूखने लगा। अगले कुछ ही पलों में मुझे अनीता के सीने के उभारों का निचला हिस्सा दिखने लगा जो पेट से कहीं ज्यादा साफ और गोरा दिख रहा था। 

अनीता अपने गीले कुर्ते को किसी तरह ऊपर सरकाए जा रही थी और इधर अब मुझे एकाएक घबराहट होने लगी थी। मन में तरह तरह के खयाल उभरने लगे थे। इस लिए नहीं कि अचानक से कोई आ न जाए बल्कि इस लिए कि इस सबके चलते अनीता मेरे बारे में....मतलब अपने भाई के बारे में क्या सोचेगी। जाहिर है अच्छा तो नहीं ही सोचेगी क्योंकि कोई भी भाई अपनी बहन को ऐसा कुछ करने को नहीं कह सकता।

"रु..रुक जा अनीता।" मैं घबराहट में बोल पड़ा─"अपना कुर्ता नीचे कर ले मेरी प्यारी बहन।"

मेरी ये बात सुनते ही कुर्ता उतारने की क्रिया कर रहे अनीता के हाथ रुक गए। उसके बाद उसने अपने हाथों को थोड़ा सा नीचे किया ताकि हाथों के बीच से वो मुझे देख सके।

"क्या हुआ।" फिर वो मासूमियत से बोली─"मुझे कुर्ता नीचे करने को क्यों बोल रहा है।"

"क्योंकि मैं समझ गया हूं कि तू भी मुझसे प्यार करती है।" मैंने आगे बढ़ कर उसके बीच में ही रुके हाथों को नीचे किया जिससे उसका कुर्ता भी नीचे हो गया─"अब तुझे अपना कुर्ता उतारने की जरूरत नहीं है। मैं अपनी प्यारी बहन को ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता....मुझे माफ कर दे।"

अनीता की आँखें छलक पड़ीं। पता नहीं उसे क्या हुआ कि एकदम से मुझसे लिपट गई। पहले तो मैं चौंका मगर फिर मैंने भी उसे खुद से छुपका लिया। तभी मुझे उसकी सिसकियां सुनाई दीं।

"अरे...क्या हुआ तुझे।" मैंने झट से उसे खुद से अलग किया─"तू रो क्यों रही है पागल।"

"पता नहीं क्यों मुझे रोना आ गया है राजू।" उसने अपने आंसू पोंछते हुए मासूमियत से कहा─"और पता है उस वक्त मुझे ऐसा लग रहा था कि अगर तू मुझे नहीं रोकता तो जाने मेरा क्या बिगड़ जाएगा।"

"पागल है तू।" मैंने उसे फिर से छुपका लिया─"मानता हूं कि मैं थोड़ा कम बुद्धि का हूं लेकिन इतना मुझे भी पता है कि अभी जो तू कर रही थी वो गलत था।"

"जब तुझे पता था तो क्यों ऐसा करवा रहा था मुझसे।" उसने बड़ी मासूमियत से कहा─"इसी लिए कहती हूं कि तू बहुत गंदा है....हां।"

"चल मान लिया कि मैं गंदा हूं।" मैंने फिर उसे खुद से अलग किया─"लेकिन तेरे ऐसा करने से मैं ये तो जान गया कि तू सच में मुझे बहुत प्यार करती है....मतलब मेरे कहने पर कुछ भी कर सकती है तू। सच कहता हूं अनीता....मुझे इस बात से बहुत खुशी हो रही है।"

"हां तू तो खुश होगा ही।" अनीता ने मेरे बाजू में इस बार थोड़ा जोर से मारा─"मुझे नंगा करवा के मेरे दू....मतलब मेरे उनको देख लिया....गंदा कहीं का।"

"हा हा हा...तू भी दूध बोलने जा रही थी न।" मैं ठहाका लग कर हंस पड़ा─"इसका मतलब उनको दूध ही कहते हैं।"

"धत्त बेशर्म।" अनीता बुरी तरह शर्मा गई।

"पर मैंने तेरे दूध नहीं देखे अनीता।" मैंने हंसना बंद कर के कहा─"मैंने सही समय पर तुझे रोक दिया था....वरना तेरे दूध दिख ही जाते मुझे।"

"बेशरम चुप कर जा अब।" अनीता ने लाज और गुस्से में मुझे घूंसा मार दिया।

मैं हंसते हुए उससे दूर चला गया और पानी में डुबकी लगाने लगा। उधर अनीता शर्म से मुस्कुराते हुए किनारे तरफ जाने लगी। 

कुछ देर बाद हम दोनों नहा कर घर की तरफ चल पड़े। अनीता को देख कर मुझे बार बार हंसी आ रही थी मगर मैं अपनी हंसी को रोके हुए था क्योंकि अगर हंसता तो अनीता को बुरा लगता और वो गुस्सा भी हो जाती। वो मेरे साथ ही चल रही थी। उसके कपड़े गीले थे और उसके बदन से चिपके हुए थे। दुपट्टे को उसने अपने सीने पर इस तरह फैलाया हुआ था कि उसके उभार किसी को स्पष्ट नज़र न आएं। 

सारे रास्ते हम दोनों चुप ही रहे थे। ये अलग बात है कि जब भी वो मेरी तरफ देखती तो जाने क्या सोच कर लजा जाती और मुस्कुरा उठती। खैर ऐसे ही कुछ देर में हम घर पहुंच गए। अनीता ने कमरे में जा कर अपने कपड़े बदले और मैं लुंगी ले कर घर के पीछे कुएं तरफ चला गया। थोड़ी ही देर में अनीता भी अपने गीले कपड़े ले कर आ गई।

"अब क्यों उतार दिए तूने ये कपड़े।" मैंने उसे छेड़ा─"उस वक्त तो नहीं उतारे थे।"

"चुप कर।" अनीता ने झूठा गुस्सा दिखाया─"नहीं तो तेरी लुंगी खींच दूंगी। फिर नंगा घूमेगा तू।"

"तेरी तरह नहीं हूं मैं जो कपड़े उतारने में नाटक करे।" मैंने कहा─"मैं तो तेरे कहने पर एक पल में अपनी ये लुंगी खुद ही खींच कर नंगा हो जाऊंगा।"

"हां जानती हूं।" अनीता ने कहा─"तुझे ऐसा करने में लाज तो आएगी ही नहीं।"

"लुंगी खींच दूं क्या।" मैंने कच्छे को पानी से धोते हुए उसे डराया।

"खींच दे...मेरा क्या जाएगा।" अनीता मुस्कुरा उठी। 

उसे लगा मैं बस उसे छेड़ रहा हूं मगर मैं ठहरा बेझिझक कुछ भी कर गुजरने वाला। इस लिए अगले ही पल मैंने लुंगी का छोर खींच कर फैला दिया। पलक झपकते ही मैं आगे से नंगा हो गया जबकि मेरे पोंद(नितंब) लुंगी में ढंके रहे। 

अनीता की नजर जैसे ही मेरे झूलते हुए लंड पर पड़ी तो उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं। फिर एकदम से उसे होश आया तो हड़बड़ा कर चीख पड़ी वो।

"कुत्ते....कमीने....बंद कर इसे वरना तेरा सिर फोड़ दूंगी।" अनीता चीखते हुए बोली और अपने गीले कपड़े वहीं छोड़ अंदर की तरफ भाग गई।

मैं जोर जोर से हंसा और लुंगी को ठीक से कमर में लपेट कर गीले कच्छे को वहीं एक डोरी में डाल कर अंदर चल पड़ा। अचानक मुझे खयाल आया कि कहीं अनीता ये बात मां को न बता दे। ये सोचते ही मैं परेशान हो गया और थोड़ा घबरा भी उठा।



जारी है.............
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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#42
भाग ~ १३



तेल कंघी कर के और कपड़े वगैरह पहन कर मैं कमरे से बाहर निकला और चौके के पास जा कर बैठ गया। थोड़ी ही दूरी पर अनीता रसोई में खाना बना रही थी। मुझ पर नजर पड़ते ही उसने गुस्से से मुंह बना लिया।

इधर मेरी धड़कनें बढ़ी हुईं थी। अंदर घबराहट भी हो रही थी। मन में यही था कि अनीता कहीं मां को मेरी करतूत न बता दे। वैसे तो मां ज्यादातर मेरा ही पक्ष लेती थी लेकिन इस तरह की बात पर संभव था कि वो नाराज या गुस्सा हो जाए। ये सब सोच कर मैं फौरन उठा और रसोई में अनीता के पास गया।

"यहां क्यों आया है।" मुझे अपने पास आया देख वो नाराजगी दिखाते हुए बोली─"चला जा नहीं तो गरम गरम चिमटा छुआ दूंगी तुझे...बेशरम कहीं का।"

"माफ कर दे मुझे।" मैंने कान पकड़ कर उससे मिन्नत की─"मैं बस तुझे छेड़ रहा था। बाकी मेरा कोई गलत मतलब नहीं था।"

"मुझसे बात मत कर।" अनीता ने रोटी सेंकते हुए कहा─"तू बहुत कमीना है...बबलू की संगत में गंदी गंदी बातें सीख गया है तू। आने दे मां को...तेरी सारी करतूत बताऊंगी उसे।"

"मेरी प्यारी बहन....ऐसा मत करना मैं तेरे आगे हाथ जोड़ता हूं।" मैंने सच में अपने हाथ जोड़ लिए─"भगवान के लिए मां को कुछ मत बताना....नहीं तो बहुत मारेगी मुझे।"

"तू मार ही खाने के लायक है।" अनीता ने कहा─"जब तेरी अच्छे से कुटाई होगी तभी सुधरेगा तू।"

"कैसी बहन है तू।" मैंने मासूम सी शक्ल बना कर कहा─"क्या यही तेरा प्यार है। मां से मार खिला कर क्या तुझे खुशी होगी...बता।"

"तो क्यों ऐसा गंदा काम करता है तू।" अनीता ने मेरी तरफ पलट कर देखा। 

"नहीं करूंगा।" मैंने कान पकड़ लिए─"अब से ऐसा नहीं करूंगा...सच्ची में।"

अनीता अपलक देखने लगी मुझे। मैं पूरी तरह मासूम और बेचारा वाली शक्ल बनाए उसे ही देख रहा था। दोनों हाथों से अब भी अपने कानों को पकड़ रखा था मैंने।

"बस इस बार माफ कर दे मुझे।" मैंने फिर मिन्नत की─"देख तुझसे बड़ा हूं फिर भी तेरे आगे हाथ जोड़ रहा हूं...तेरे पांव पड़ रहा हूं...तुझसे मिन्नतें कर रहा हूं। इस बार माफ कर दे...अगली बार से ऐसा नहीं करूंगा।"

"सच कह रहा है न।" अनीता ने संदेह की दृष्टि से देखा मुझे।

"तेरी कसम।" मैंने झट उसके सिर पर हाथ रख दिया─"तू जानती है कि मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूं इस लिए तेरी झूठी कसम नहीं खा सकता।"

"ठीक है।" अनीता ने सामान्य हो कर कहा─"अब दुबारा ऐसा न करना। चल जा बैठ जा वहां पर।"

"तूने माफ कर दिया न मुझे।" 

"हां माफ कर दिया।"

"अब मां को नहीं बताएगी न।"

"हां नहीं बताऊंगी...जा अब।"

"तू कितनी अच्छी है बहन है मेरी।"

"हां वो तो मैं हूं।"

"तू सच में मुझसे बहुत प्यार करती है।"

"हां तू मेरा भाई जो है।"

"मैं भी तुझसे बहुत प्यार करता हूं।"

"हां ठीक है...अब जा रोटियां बनाने दे मुझे।"

"तुझे पता है मेरा क्या मन कर रहा है।"

"क्या मन कर रहा है तेरा।" अनीता ने सवालिया भाव से मुझे देखा।

"मेरा मन कर रहा है....मेरा मन कर रहा है कि मैं अपनी इस प्यारी बहन का गाल चूम लूं।" मैंने कहा और झट से उसका चेहरा थाम कर सच में उसका दाहिना गाल चूम लिया।

"अरे...ये क्या कर रहा है तू।" अनीता बुरी तरह हड़बड़ा गई। 

"अपनी प्यारी बहन को प्यार कर रहा हूं।"

"कर लिया न....अब जा यहां से।" अनीता ने चिमटे से उस जगह इशारा किया जहां मैं रसोई में आने से पहले बैठा था।

"तू भी कर न।" मैंने मासूम सी शक्ल बना के उसको देखा─"तू भी मेरा गाल चूम न।"

"राजू अब बस कर न।" अनीता ने परेशान हो कर कहा─"क्यों तंग कर रहा है मुझे।"

"कहां तंग कर रहा हूं तुझे।" मैंने भोलापन दिखाया─"गाल चूमने को ही तो बोल रहा हूं तुझे।"

"मुझे नहीं चूमना तेरा गंदा गाल।" अनीता ने चिढ़ कर कहा─"अब जा यहां से नहीं तो सच में गरम गरम चिमटा छुआ दूंगी। फिर रोते हुए भागेगा यहां से।"

"हां ठीक है छुआ दे चिमटा।" मैंने रूठ जाने वाली शक्ल बना कर कहा─"पर मैं तब तक नहीं जाऊंगा जब तक तू भी मेरा गाल नहीं चूमेगी।"

अनीता असहाय भाव से देखने लगी मुझे। वो सच में अब परेशान हो चुकी थी मुझसे। उसके चेहरे पर नाराजगी और गुस्सा साफ देखा जा सकता था। फिर उसने आँखें बंद कर के दो तीन गहरी सांस ले कर अपना गुस्सा शांत किया।

"अच्छा..तेरा गाल चूम लूंगी तो चुपचाप चला जाएगा न यहां से।" फिर आँखें खोल कर उसने मुझसे कहा।

"हां...पक्का चला जाऊंगा।"

अनीता थोड़ा आगे सरकी और फिर मेरे बाएं गाल को धीरे से चूम लिया। उसके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे कोमल होठों का स्पर्श महसूस करते ही मेरे पूरे बदन में झुरझुरी सी हुई। 

"तेरे होंठ कितने कोमल हैं अनीता।" जैसे ही वो मेरा गाल चूम कर पीछे सरकी तो मैंने मुस्कुरा कर कहा।

"ह..हां अब जा तू यहां से।" मेरी बात सुनते ही वो थोड़ा लजा गई─"मुझे अब रोटी बनाने दे। मां बापू के आने का समय हो रहा है।"

मैंने भी अब उसे परेशान करना ठीक नहीं समझा। इस लिए मुस्कुराते हुए वापस आ कर अपनी जगह पर बैठ गया। मैंने देखा अनीता मंद मंद मुस्कुरा रही थी। पता नहीं क्या चल रहा था उसके मन में।

#########

दोपहर खा पी कर मैं घर के बाहर खाट बिछा कर लेटा हुआ था। बाहर थोड़ी अच्छी हवा चल रही थी जिससे गर्मी से राहत महसूस हो रही थी। मां ने कहा था कि थोड़ी देर आराम कर ले फिर अनीता को ले कर खेतों पर चले जाना। 

खाट पर लेटा मैं उस सबके बारे में सोच रहा था जो कल से ले कर अब तक घटा था। खाते समय एक बार बबलू आया था मेरे घर। उसने मुझे नदी पर नहाने चलने को कहा था लेकिन मैंने उसे बता दिया था कि मैं घर पर ही नहा चुका हूं और अब खाने के बाद थोड़ा आराम कर के खेत चला जाऊंगा। आम तौर पर मैं उसके साथ ही अपना ज्यादातर समय बिताता था लेकिन कल से उसके साथ रहने का कोई अवसर ही नहीं मिला था मुझे। दूसरी बात मेरी खुद भी इच्छा नहीं हो रही थी उसके साथ कहीं खेलने जाने की। मुझे नहीं पता ऐसा क्यों था मगर सच यही था।

खैर खाट पर लेटा मैं यही सोच रहा था कि अचानक से कितना कुछ बदल गया है। मैं इस बदलाव को महसूस भी कर रहा था तभी तो इस सबके बारे में इतना सोच रहा था। मैं सोच रहा था कि कैसे कल मैंने खेत वाले मकान में बापू और मंजू काकी को चुदाई करते देखा और फिर कैसे उसके बाद मैंने काकी से उस सबके बारे में पूछा। कैसे काकी ने बापू के साथ अपने इस नाजायज रिश्ते के बारे में सब कुछ बताया। उसके बाद कैसे कल रात मंजू काकी ने अपने घर में मेरे लंड की मुट्ठ लगाई। 

मैंने कभी सपने में भी इस सबके बारे में कल्पना नहीं की थी। इतना ही नहीं अनीता और मेरे साथ भी कुछ ऐसा घटा जो घटता तो पहले भी थोड़ा बहुत था लेकिन उसके बारे में हम दोनों ने ही कभी ध्यान नहीं दिया था। बात अगर यहीं खत्म हो जाती तो शायद इसे भुला भी दिया जाता मगर कल से अब तक मेरे और अनीता के बीच कई ऐसी बातें और घटनाएं हो चुकीं थी जिसके कारण अब इसे आसानी से भुलाया नहीं जा सकता था।

मैं सोचने लगा कि जब मैं नहीं भुला पा रहा हूं तो शायद अनीता भी नहीं भुला पा रही होगी। एक पल के लिए मान भी लूं कि वो इस सबके बारे में ज्यादा ध्यान नहीं दे रही होगी लेकिन ये नहीं माना जा सकता कि उसे ये सब किसी पल याद न आता होगा। तो जब याद आता होगा तब तो वो इस बारे में सोचती ही होगी। सवाल यही है कि आखिर वो इस सबके बारे में क्या सोचती होगी। मैंने बहुत सोचा मगर कुछ समझ न आया। 

अचानक मुझे याद आया कि आज नदी में मेरे कहने पर वो अपने प्यार को साबित करने के लिए कुर्ता उतारने लगी थी। अगर मैंने उसे रोका न होता तो पक्का कुर्ता उतार कर वो ऊपर से नंगी हो जाती। उस वक्त...उस वक्त जरूर उसके मन में बहुत कुछ चलता रहा होगा। हालांकि बाद में मेरे रोक देने पर वो मुझसे लिपट कर रोने ही लगी थी और पूछने पर बताया भी था उसने कि अगर मैं उसे न रोकता तो उसे ऐसा लगता जैसे उसका कुछ बिगड़ गया है। 

मैं सोचने लगा कि आखिर क्या बिगड़ जाने की बात कह रही थी वो। इस बारे में भी मैंने बहुत सोचा मगर कुछ समझ न आया। उसके बाद घर के पीछे कुएं में तो मैंने हद ही कर दी थी। लुंगी खोल कर उसको अपना लंड ही दिखा दिया था मैंने। मुझे पता है कि उसको मुझसे ऐसा कर देने की जरा भी उम्मीद नहीं रही होगी...शायद इसी लिए वो गुस्सा हो गई थी और रसोई में भी गुस्से से वो सब कहा था मुझसे। वो तो अच्छा हुआ कि मैंने मिन्नतें कर के उसे बहला फुसला लिया था वरना उसके बता देने से मां के द्वारा मेरी पिटाई होना निश्चित था।

खैर जो भी हो ये तो पक्की बात है कि कुएं में मेरा लंड देखने के बाद अपने सामने उसने जरूर बहुत कुछ सोचा होगा। आश्चर्य तो उसे कुएं पर ही बहुत हुआ था....ठीक वैसे ही जैसे मंजू काकी को मेरा लंड देख के हुआ था। इसका मतलब काकी की तरह अनीता ने भी मेरे पास इतना बड़ा लंड होने की उम्मीद नहीं की रही होगी।

"चल राजू...उठा जा।" तभी मेरे कानों में अनीता की आवाज पड़ी─"खेत नहीं चलना क्या तुझे।"

मैंने झट से आँखें खोल कर उसकी तरफ देखा। नहाने के बाद उसने जो कपड़े पहने थे वो इस वक्त उसके बदन में नहीं थे। शायद खेत में गहाई करने का सोच कर उसने फिर से कपड़े बदल लिए थे।

"मां बापू चले गए क्या।" मैंने उठते हुए पूछा।

"अभी नहीं।" अनीता ने बताया─"वो बाद में आएंगे।" 

"ठीक है।" मैंने खाट से उतर कर कहा─"लेकिन यार धूप बहुत है।"

"रुक मैं तेरे लिए बापू की कोई पुरानी साफी ले कर आती हूं।" अनीता ने कहा─"उसे सिर पर बांध लेगा तो सिर में धूप नहीं लगेगी।"

"हां ये ठीक रहेगा।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"मेरी बहन तो सच में मुझे बहुत प्यार करती है। तभी तो मेरी सेहत का खयाल है तुझे।"

"चल अब तू बातें न बना।" अनीता थोड़ा शर्मा कर बोली─"तू बैठ...मैं आती हूं साफी ले कर।"

मैं वापस खाट पर बैठ गया। मैं उसे ऐसा बोलना नहीं चाहता था मगर जाने क्यों उसकी बात सुन कर मेरे मन में ऐसा बोल देने का कीड़ा कुलबुला उठा था। खैर थोड़ी ही देर में वो साफी ले कर आ गई।

"ये ले बांध ले सिर पर।" 

मैंने उससे साफी ली और उसे सिर पर बांधने लगा। वो मुझे ही देख रही थी। मेरे मन में फिर से शरारत सूझी।

"ऐसे क्या देख रही है।" मैंने उसे छेड़ा─"खा तो नहीं जाएगी मुझे।"

"तुझ कड़वे करेले को कौन खाएगा।" उसने बुरा सा मुंह बना कर कहा।

"तेरे सिवा कौन खा सकता है भला।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा─"वैसे मेरे पास एक खाने वाली चीज है....खाना हो तो बता।"

"क्या सच में।" अनीता एकदम से खुश हो कर बोली─"क्या लाला की दुकान से कुछ खरीद के लाया है। मुझे भी दे न।"

मैं उसकी बात सुन कर जोड़ों से हंसने लगा। मुझे ये सोच के हंसी आई कि मैं उसे बता कुछ और रहा था और वो समझ कुछ और रही थी और अब मांग भी रही थी मुझसे।

"ऐसे हंस क्यों रहा है तू।" मुझे हंसता देख अनीता ने आँखें सिकोड़ कर मुझे देखा।

"बस ऐसे ही....जाने दे।" मैंने उसे बताना बिल्कुल भी ठीक नहीं समझा वरना एक ही पल में शामत आ जाती─"चल अब खेत चलते हैं।"

"अगर कुछ खरीद कर लाया है तो मुझे भी दे न।" अनीता मेरे साथ चलती हुई मासूमियत से बोली।

अब मैं उसे कैसे बताता कि मेरे पास जो चीज है वो लाला के दुकान से खरीदी हुई नहीं है बल्कि मेरी अपनी है। मगर उसे तो ऐसा ही लग रहा था और अब अगर मैं उसे नहीं दूंगा तो वो नाराज हो जाएगी मुझ पर। वैसे भी लंड दिखाने वाले कांड से वो गुस्सा हो गई थी और अब फिर से कोई नया कांड कर देना मेरी सेहत के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं हो सकता था। 

"जो लाया था उसे तो मैंने खा लिया है।" मैंने उससे कहा─"पर तू बता क्या खाएगी। मैं अभी लाला की दुकान से खरीद दूंगा तुझे।"

"सच में????"

"हां सच में।" मैंने कहा─"तू मेरी प्यारी बहन है तो तेरे लिए कुछ भी खरीद दूंगा...पर तू भी उतनी ही बड़ी चीज खरीदने को कहना जिसे मैं खरीद सकूं।"

"मुझे कोई बड़ी चीज नहीं चाहिए।" अनीता ने अपनी ईमानदारी दिखाई─"तू मुझे बस मिट्ठी गोली खरीद दे।"

"ठीक है आ जा फिर।"

मैं उसे लिए जल्दी ही लाला की दुकान पर पहुंच गया। वहां से मैंने आठ आने की मिट्ठी गोली खरीदी और एक रुपए में नमकीन और गुड़ खरीदा। 

"नमकीन गुड़ क्यों लिया तूने।" रास्ते में अनीता ने पूछा─"और तेरे पास इतने पैसे कहां से आए।"

"मझले काका ने एक दिन दो रुपए दिए थे मुझे।" मैंने बताया─"उसमें से आठ आने की एक दिन मैंने लाला की दुकान से मिट्ठी गोली खरीद के खा ली थी। बाकी ये बचे थे तो आज ये ले लिया।"

"मुझे भी नमकीन गुड़ देगा न।" अनीता ने बड़ी उम्मीद से मेरी तरफ देखा।

"अरे सिर्फ अपने लिए थोड़ी खरीदा है मैंने।" मैंने कहा─"तेरे लिए भी खरीदा है। खेत में हम दोनों साथ में खाएंगे....ठीक है न।"

"हां" अनीता खुशी से बोली।

कुछ ही देर में हम दोनों खेतों पर पहुंच गए। खेतों पर इस वक्त हम दोनों के सिवा कोई नहीं था। काका लोग और दोनों काकी घर गई हुई थीं। मैं और अनीता मकान के बाहर ही नीम के पेड़ के पास जा कर बैठ गए।

"अरे राजू।" हम बैठे ही थे कि अचानक उठ कर अनीता बोली─"बापू ने कहा था कि आमों की तरफ जा के भी देख लेना कि कहीं कोई अमियाँ तोड़ने तो नहीं आया।"

"अच्छा...चल फिर जल्दी।" मैं फौरन उठ कर बोला─"वहीं पेड़ों की छांव में बैठ कर नमकीन गुड़ खाएंगे।"

हम दोनों तेजी से आमों की तरफ चल पड़े। हमारे खेतों के एक तरफ आमों के सात आठ पेड़ थे। थोड़ी ही दूरी पर नदी थी। हम जल्दी ही आम के पेड़ों के पास पहुंच गए। पेड़ों की छांव में आए तो ठंडी हवा लगी जिससे मन प्रसन्न हो गया।

"तू उस तरफ देख जा के।" मैंने अनीता से कहा─"और मैं इस तरफ देख लेता हूं।"

"ठीक है।"

हम दोनों अपनी अपनी तरफ के पेड़ों का घूम घूम कर मुआयना करने लगे। कोई नहीं था यहां। इस लिए हम दोनों एक पेड़ के नीचे थोड़ा साफ कर के बैठ गए।

"नमकीन गुड़ के साथ अगर अमिया भी खाएं तो और भी अच्छा स्वाद आएगा।" अनीता ने कहा─"वैसे भी मुझे अमिया बहुत अच्छी लगती हैं...रुक मैं अभी थोड़ी बड़ी बड़ी अमिया तोड़ती हूं।"

कहने के साथ ही अनीता झट से उठी और पेड़ों पर नजर घुमाने लगी। उसके साथ मैं भी उठ गया था और उसी के जैसे पेड़ों पर अमिया देखने लगा था।

"राजू वो देख।" अनीता ने एक डाली की तरफ इशारा किया─"उस डाल पर बड़ी बड़ी अमियों का गुच्छा लगा है।"

"हां तो तोड़ ले न उसे।" मैंने कहा।

अनीता ने आगे बढ़ कर उस गुच्छे की तरफ हाथ बढ़ाया मगर गुच्छा उसकी पहुंच से दूर था। उसने उछल कर उस गुच्छे को पकड़ने की कोशिश की मगर गुच्छा तब भी दूर था।

"ये तो मेरे हाथ में ही नहीं आ रहा।" फिर उसने हताश हो कर मेरी तरफ देखा─"तू कद में मुझसे बड़ा है...तू देख भला।"

मैं आगे बढ़ा और अमिया को तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया मगर समझ आया कि वो गुच्छा मेरी पहुंच से भी दूर है। मैंने उछल कर तोड़ने की भी कोशिश की मगर उस तक नहीं पहुंचा।

"कोई दूसरी अमिया देख के यार।" मैंने हार मान कर कहा─"ये मेरे पहुंच से भी दूर है।"

"पर इस गुच्छे की अमिया बाकियों से बड़ी हैं राजू।" अनीता ने कहा।

"पत्थर से निशाना लगाऊं क्या इन्हें।" मैंने कहा।

"नहीं राजू...ऐसे में पत्थर लगने से ये कुचल जाएंगी।"

"फिर तो यही रास्ता है कि जो पास में हैं उसी को तोड़ लेते हैं।" 

"नहीं...मुझे यही वाली अमिया चाहिए।" अनीता ने जैसे जिद कर ली─"अरे हां...एक काम तू मुझे ऊपर उठा दे तो मैं तोड़ लूंगी इस गुच्छे को।"

"पागल है क्या।" मैंने उसे घूरा─"तू इतनी भारी है...मैं कैसे उठा पाऊंगा तुझे।"

"ज्यादा बकवास न कर।" अनीता ने आँखें दिखाई─"तुझसे तो हल्की ही हूं। चल अब देर न कर....उठा मुझे।"

अनीता मेरी तरफ पीठ कर के उस गुच्छे के नीचे खड़ी हो गई थी और सिर ऊपर कर के गुच्छे को देखने लगी थी। मैं मजबूरन आगे बढ़ा और पीछे से झुक कर दोनों हाथों से उसकी टांगों को समेटा और जोर लगा कर उसे ऊपर उठाना शुरू कर दिया।

"रु...रुक रुक...अरे रुक जा राजू।" अभी मैंने थोड़ा सा ही उठाया था कि अनीता ने घबरा कर कहा।

"अब क्या हुआ।"

"मुझे आगे से उठा न।" उसने कहा─"ताकि ऐसे में मैं गिरूं न और सहारे के लिए हाथों से तुझे पकड़ सकूं।"

मैं घूम कर उसके सामने आया और झुक कर फिर से उसकी टांगों को समेट लिया। उसके बाद जोर लगा कर उसे उठाना शुरू किया। अनीता ने खुद को गिरने से बचाने के लिए अपने दोनों हाथ मेरे कंधों पर रख लिए। सच कह रही थी वो...भारी नहीं हल्की ही थी वो। मैंने बड़े आराम से उसको उठा लिया था।

"थोड़ा और ऊपर राजू।" तभी उसने कहा─"हां हां बस बस।"

"पकड़ में आ गया न गुच्छा।" मैंने पूछा। 

उसको दोनों हाथों से जकड़े था मैं और मेरा चेहरा उसके पेट को छू रहा था इस लिए मैं ऊपर नहीं देख पा रहा था।

"हां पकड़ लिया मैंने।" ऊपर से अनीता ने बताया─"तू बस इतने में ही मुझे पकड़े रह।"

"जल्दी तोड़ ले उसे।"

अनीता हल्की तो थी और मुझे उसको उठाए रखने में ज्यादा मेहनत भी नहीं पड़ रही थी लेकिन उसके पेट से मेरा चेहरा बार बार टकरा जा रहा था जिससे मुझे अजीब सा महसूस होने लगा था। अचानक ही मेरे मन में अजीब अजीब से खयाल आने लगे थे।

"तोड़ लिया मैंने।" तभी ऊपर से अनीता ने कहा─"अब धीरे धीरे नीचे उतार मुझे।"

मैंने ऐसा ही किया। वो धीरे धीरे मेरे द्वारा पकड़ ढीली कर देने से नीचे सरकने लगी। इसके साथ ही मेरा चेहरा उसके पेट से होते हुए ऊपर उसकी छातियों के उभारों से टकराया तो मुझे एकदम मुलायम और सुखद अनुभूति हुई। जैसे ही मुझे खयाल आया कि ये उसकी छातियां हैं तो मेरी धड़कनें तेज हो गईं। उसकी दोनों छातियों के बीच मेरा मुंह और नाक था। अपने चेहरे पर मुझे मुलायम और थोड़ी गर्म सी चीज महसूस हुई और मेरी सांसें थम सी गईं। पता नहीं क्या हुआ मुझे कि मैंने उसकी एक छाती पर मुंह दबा दिया। उफ्फ कितना मुलायम था उसका दूध। अपने होठों पर मुझे उसका छोटा सा निप्पल भी महसूस हुआ।

"क्या कर रहा है राजू।" तभी अनीता धीरे से सिसकी─"गिरा देगा क्या मुझे।"

"ऐसे कैसे गिर जाएगी तू।" मैंने उसकी उस छाती से फौरन मुंह हटा कर कहा─"तू मेरी प्यारी बहन है तो कैसे गिरा सकता हूं तुझे।"

कुछ ही पलों में मैंने उसे नीचे खड़ा कर दिया। अनीता ने अमिया का गुच्छा लिए एक बार मुझे देखा फिर बोली─"देख बाकी अमिया से बड़ी हैं न ये अमिया।"

"हां सही कह रही है तू।" मैंने ये सोच कर राहत की सांस ली कि उसे मेरी करतूत का पता नहीं चला─"चल अब जल्दी से नमकीन गुड़ खाते हैं। अगर घर वाले आ गए तो गड़बड़ हो जाएगी।"

"हां चल जल्दी खा लेते हैं।"

हम दोनों वापस उसी जगह पर आ गए जिस जगह पर पहले साफ कर के बैठे थे। अनीता ने गर्मी लगने के कारण अपना दुपट्टा पेड़ की जड़ में रख दिया और झट बैठ गई। बैठते वक्त जब वो झुकी थी तो उसके कुर्ते का गला आगे की तरफ फैल गया था जिसके अंदर उसकी छातियां कुछ पलों के लिए मुझे साफ दिखीं थी। कुर्ते के अंदर सफेद कमीज पहने थी वो। झुकने से कुर्ते के साथ वो भी थोड़ा फैल गई थी और मुझे उसकी आधी चूचियों के दर्शन हो गए। पलक झपकते ही मेरे पूरे जिस्म में झुरझुरी दौड़ गई थी।

"खड़ा क्यों है तू।" तभी अनीता ने मेरा ध्यान भंग किया─"जल्दी बैठ न।"

मैं झट उसके सामने बैठ गया। नमकीन गुड़ मैंने पहले ही पेड़ की जड़ में रख दिया था जिसे अनीता ने कागज खोल कर बाहर निकाल दिया था। दूसरे कागज में नमकीन थी जिसे उसने गुड़ की ही तरह कागज खोल के फैला दिया था। नमकीन गुड़ देख अनीता का चेहरा खुशी से चमक रहा था। मैं बार बार उसे ही देखने लगता था। आज से पहले भी मैं उसे देखता आया था लेकिन आज वो मुझे अलग ही दिख रही थी। 

मैं बार बार ये भूल जाता था कि वो मेरी वही बहन है जिससे मैं कल तक झगड़ा करता आया था। हमारा आपस में कभी नहीं बनता था। हर दिन हर वक्त उससे मेरा झगड़ा होता था मगर आज मेरा उससे झगड़ा करने का बिल्कुल भी मन नहीं कर रहा था। पहले जब उस पर नजर पड़ती थी तो मेरी यही कोशिश रहती थी कि उसे तंग करूं...उसे परेशान करूं....या फिर उसे पीट दूं मगर आज ऐसा करने का मन ही नहीं कर रहा था। बस यही मन कर रहा था कि उसे चुपचाप देखता रहूं। वो मुझसे किसी भी बात पर नाराज न हो। मैं समझ नहीं पा रहा था कि मेरा मन ऐसा क्यों कर रहा था।

"अब तू टुकुर टुकुर मुझे क्यों देख रहा है।" अनीता एकदम से बोली तो मैं चौंक पड़ा─"खाता क्यों नहीं...या चाहता है कि सारा मैं ही खा लूं। अगर ऐसा तो ठीक है...मैं सारा नमकीन गुड़ खा लेती हूं...फिर न कहना मुझे....हां।"

"ठीक है तू ही खा ले सारा।" मैं मुस्कुरा कर बोल पड़ा।

ये सुन कर उसने हैरानी से मुझे देखा। मुंह में नमकीन गुड़ चबा रही थी वो मगर मेरी बात सुनते ही उसका चबाना रुक गया।

"क्या तू सच कह रहा है।" फिर उसने उसी हैरानी से कहा─"मतलब सच में मैं ये सब अकेले खा लूं।"

"हां खा ले न।" मैंने मुस्कुरा कर ही कहा।

"मैं सच में खा लूंगी।" अनीता को अब भी यकीन नहीं हो रहा था─"फिर बाद में न बोलना कि मुझे नहीं बचाया।"

"हां नहीं बोलूंगा।" मैंने कहा─"तू सारा खा ले।"

अनीता बड़ा हैरान हुई कि ऐसा क्यों कह रहा हूं मैं। उसके चेहरे पर हैरानी के साथ साथ उलझन के भाव भी उभर आए।

"तेरी तबियत तो ठीक है न राजू।" फिर उसने कहा─"आज तू अजीब बर्ताव कर रहा है मेरे साथ।"

"अब मैंने क्या किया।" मैंने कहा─"तू मेरी प्यारी बहन है....बता ही चुका हूं कि तुझे बहुत प्यार करता हूं मैं। इसी लिए कह रहा हूं कि तू सारा खा ले...मैं कुछ नहीं कहूंगा।"

"आज से पहले तो कभी ऐसा नहीं कहा तूने।" अनीता ने मासूमियत से कहा।

"हां सही कहा।" मैंने कहा─"आज से पहले इस लिए नहीं कहा क्योंकि तब मुझे एहसास नहीं था कि हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। आज जब श्यामू काका ने हमें समझाया तो समझ आया कि सच में हमारा झगड़ना एक तरह का प्यार ही है। तो जब वो झगड़ना प्यार है तो बिना झगड़ा किए ही प्यार से रहें तो कितना अच्छा होगा...है न।"

"हां सही कह रहा है तू।" अनीता ने अब आराम से नमकीन गुड़ चबाते हुए कहा─"हमें एक दूसरे से लड़ना नहीं चाहिए। हमारे झगड़ने से मां को कितना चिल्लाना पड़ता है।"

"सही कहा तूने।" मैंने सिर हिलाया─"इस लिए मैंने सोचा है कि अब से यही कोशिश करूंगा कि मैं तुझसे झगड़ा न करूं बल्कि तू मुझसे छोटी है तो तुझे बस प्यार करूं और जो मैं अपने लिए दुकान से खरीद के लाऊं वो तुझे भी खुशी से खिलाऊं। ये ठीक रहेगा न।"

"हां इससे अच्छा तो कुछ हो ही नहीं सकता।" अनीता ने खुश हो कर कहा─"अगर तू सच में ऐसा करेगा तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा और हां...मैं भी ऐसा ही करूंगी...पक्का।"

"एक बात और।" मैंने कुछ सोच कर कहा─"तुझे तो पता है कि मैं थोड़ बुद्धू हूं इस वजह से मैं कभी कभी जाने अंजाने कुछ गलत कर बैठता हूं। तो अगर मुझसे कभी ऐसा हो जाए तो तू मुझसे नाराज न होना और न ही गुस्सा करना। अगर तुझसे कोई गलती हो जाएगी तो मैं भी तुझ पर गुस्सा नहीं करूंगा। हम दोनों के बीच की बात सिर्फ हमारे ही बीच में रहेगी। उसमें मां बापू को बता देने वाली बात नहीं होगी....क्या कहती है।"

"ठीक है....मुझे मंजूर है।" अनीता ने कुछ पल सोचा फिर झट से सहमति दे दी।

"चल अब जल्दी जल्दी खा ले।" मैंने कहा─"मां बापू आते ही होंगे।"

"तू भी खा न।" 

अनीता ने कागज से नमकीन और गुड ले कर मेरे मुंह की तरफ बढ़ाया तो मैंने मुस्कुराते हुए मुंह खोल दिया। मुझे खिला कर वो थोड़ा मुस्कुराई और मुंह चलाने लगी।

"रुक मैं भी तुझे खिलाता हूं।" 

कहने के साथ ही मैंने कागज से थोड़ी नमकीन और थोड़ा गुड़ लिया। फिर उसे अनीता के मुंह की तरफ बढ़ाया तो उसने भी मुस्कुरा कर मुंह खोल दिया।

"अरे तू तो मुझसे भी ज्यादा मुंह फाड़ती है रे।" ये कहते हुए मैंने उसे छेड़ा तो उसने आँखें दिखाई मुझे। 

मुंह में नमकीन गुड़ भर गया था इस लिए फौरन वो कुछ बोल न सकी थी। 

"अरे मैं तो छेड़ रहा था तुझे।" मैंने उसके गाल को हल्के से सहला कर कहा─"तू आराम से खा।"

"अच्छा सुन।" जब उसका मुंह थोड़ा खाली हुआ तो उसने कहा─"क्या तू मेरी एक बात मानेगा।"

"हां बोल न।"

"तू न...उस बबलू के साथ मत रहा कर।" अनीता ने कहा─"मुझे वो अच्छा नहीं लगता। वो अच्छा लड़का नहीं है।"

"उसने तुझे कुछ बोला क्या।" मैंने चौंक कर उसे देखा। मेरे मन में पलक झपकते ही अनेकों खयाल उभर आए थे।

"नहीं...उसने कहा तो कुछ नहीं।" अनीता ने फिर से हाथ में नमकीन गुड़ ले कर मेरे मुंह की तरफ बढ़ाया जिसे मैंने मुंह खोल कर अंदर ले लिया। उधर अनीता ने खिलाने के बाद आगे कहा─"लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि वो अच्छा लड़का नहीं है।"

"ऐसा कैसे कह सकती है तू।" मैं सोच में पड़ गया।

"क्योंकि तू उसकी संगत में ही बिगड़ रहा है।" अनीता ने जैसे खुल कर बताने का सोच लिया─"पहले तू ऐसा नहीं था मगर अब गंदी हरकतें करने लगा है।"

मैं समझ गया वो किस बारे में बोल रही है। इस लिए इस बार मैं कुछ बोल न सका।

"देख राजू...मैं उमर में तुझसे छोटी हूं इस लिए अच्छा नहीं लगता कि मैं तुझे कोई बात समझाऊं।" अनीता थोड़ा गंभीर हो कर बोली─"मैं तुझे इसी लिए कुत्ता कमीना कहती थी क्योंकि तू उस बबलू के साथ रहता है और वो अच्छा लड़का नहीं है।"

"ठीक है अब से नहीं रहूंगा उसके साथ।" मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा।

"तू भी जानता है कि मां तुझसे कितना प्यार करती है।" अनीता ने कहा─"तेरी गलती होने पर भी वो हमेशा मुझे ही डांटती है इस लिए तुझे भी ऐसा काम करना चाहिए जिससे मां को तेरे किसी काम से या तेरी किसी हरकत से बुरा न लगे।"

"हां मैं समझता हूं ये बात।" मैं ये सोच के अंदर ही अंदर थोड़ा हैरान हुआ कि अनीता कितनी समझदारी की बातें कर रही है मुझसे। मैं तो अब तक यहीं समझता था कि मेरी तरह वो भी भोली और नादान है।

"और हां...मुझे भी ये देख के अच्छा लगेगा कि मेरा भाई ऐसे गंदे लड़के का साथ नहीं करता।" अनीता ने फिर से मुझे खिला कर कहा─"तू मेरी ये बात मानेगा न राजू।"

"तूने इतना प्यार से कहा है तो जरूर मानूंगा।" मैंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा─"पर उसके अलावा मेरी किसी और से ऐसी दोस्ती नहीं है तो फिर किसके साथ खेलने जाऊंगा।"

"अब तू छोटा बच्चा नहीं रहा जो इस तरह खेलने जाए।" अनीता ने कहा─"अब तू बड़ा हो गया है इस लिए बापू और काका लोगों की तरह खेतों में काम कर सकता है। खाली समय में घर में ही हम कोई खेल खेल कर समय बिता सकते हैं।"

"हां ये भी ठीक कहा तूने।" मैंने सिर हिलाया─"तो फिर ठीक है....अब से मैं ऐसा ही करूंगा। मैं रोज काका लोगों के साथ खेतों में काम करूंगा और जब समय मिलेगा तो घर में तेरे साथ खेलूंगा।"

"हम दोनों चंदा खेला करेंगे।" अनीता ने खुश हो के कहा─"मैं तुझे चंदा में रोज हराऊंगी।"

"अरे कभी कभी मुझे भी जिता देना।" मैं मुस्कुरा उठा─"वरना फिर मैं नहीं खेलूंगा।"

"अच्छा चल ठीक है।" अनीता हंस पड़ी─"चार बार जब मैं जीतूंगी तो एक बार तुझे भी जिता दूंगी।"

"मेरी प्यारी बहन ऐसा करेगी मेरे साथ।" मैंने मासूम सी शक्ल बनाई।

"तुझसे छोटी हूं तो इतना तो हक बनता है न मेरा।" अनीता शेखी से मुस्कुराई।

अभी मैं कुछ बोलने ही वाला था कि तभी बापू की आवाज सुनाई दी मुझे। अनीता ने भी उनकी आवाज सुनी।



जारी है................
Read my story 

हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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#43
जब आपसी रिश्तों में व्यभिचार का समावेश हो जाता है, तो कामुकता अपने चरम स्तर पर होती है ?
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#44
Bhai story to masth hai , laken ager bahi bahen ka , chorka ager goun ke koi tai ya chachi ko chodai kera ga to aur maza aiga , kew ke raju ka lund , bhot mota r bara hai , koi tai ko raju pisab kerta dakla to jarur chodai hoga , plz bhai koi tai sai raju ke chudai ki surat kara do ta ke raju 1st chodai sikjai , thanks ? ? plz koi tai ke chodai raju sai kara do
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#45
(16-01-2026, 10:19 AM)rajeev13 Wrote: जब आपसी रिश्तों में व्यभिचार का समावेश हो जाता है, तो कामुकता अपने चरम स्तर पर होती है ?

Totally agree with you.....
My effort is to take this story to the same level but the path should remain logical and natural....I mean कहानी में जो भी घटना घटे...जिसके साथ भी घटे उसका एक लॉजिक हो...वो एकदम स्वाभाविक लगे। बेमतलब का या बिना लॉजिक का जो भी कहानी में डाला जाता है उससे कहानी की वास्तविकता पर बुरा असर पड़ता है....ऐसा मेरा मानना है। 

I don't want to add anything unnecessary to this story
No pointless sex scenes 
No pointless dialogues
Only what makes the story feel real and interesting

Thank you
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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#46
(16-01-2026, 04:23 PM)Punit Kumar Wrote: Bhai story to masth hai , laken ager bahi bahen ka , chorka ager goun ke koi tai ya chachi ko chodai kera ga to aur maza aiga , kew ke raju ka lund , bhot mota r bara hai , koi tai ko raju pisab kerta dakla to jarur chodai hoga , plz bhai koi tai sai raju ke chudai ki surat kara do ta ke raju 1st chodai sikjai , thanks ? ? plz koi tai ke chodai raju sai kara do

Dear brother....only I will decide how to write the story. If I write according to every reader's wishes, the story will lose its authenticity...which I don't want 
If you want to read only about sex then read those stories in which the hero has only sex with everyone.....


Thank you
Read my story 

हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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#47
Update will come soon 
Keep supporting friends......
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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#48
भाग ~ १४




"हाय दय्या बापू आ गए राजू।" अनीता हड़बड़ा कर नमकीन गुड़ कागज में लपेटने लगी─"चल जल्दी...अगर वो इधर आ गए और हमें नमकीन गुड़ खाते देख लिया तो डांटेंगे।"

"तू इसे छुपा ले जल्दी।" मैं जल्दी से उठते हुए बोला─"और हां अपना मुंह भी अच्छे से पोंछ ले। तेरे मुंह के आस पास नमकीन और गुड लगा हुआ है।"

अनीता झट अपने दुपट्टे को उठा कर उससे अपना मुंह साफ करने लगी। मैंने भी हाथ से अपने मुंह को टटोला। जल्दी ही हम दोनों खलिहान की तरफ चल पड़े।

उसके बाद सारा समय गेहूं की गहाई करने में ही गुजरा। बैलों के पीछे चलते चलते मैं और अनीता बहुत थक गए थे। फिर जब श्यामू काका ने बैलों को जुएं से छोरा तब जा कर हम दोनों को फुर्सत मिली और जान में जान आई।

"आज तो तुम दोनों बहुत थक गए होगे न।" दशरथ काका ने मुस्कुराते हुए पूछा।

"हां काका...बहुत ज्यादा।" मैंने थके लहजे में कहा─"अब तो पांव में जान ही नहीं है।"

"हां जानता हूं करेजा।" उन्होंने सिर हिलाया─"तेरे साथ आज अनीता बिटिया भी बहुत थक गई है। ऐसे कामों में मेहनत बहुत लगती है। खैर अब तुम दोनों घर जाओ।"

तभी मझली काकी और छोटी काकी हमारे पास आ गईं। वो दोनों खेतों में गेहूं की कटाई कर रहीं थी। जबकि मां बापू के साथ पुल्लियां बांध रही थी।

मंजू काकी को देखते ही मैं उनसे नजरें चुराने लगा। मेरी धड़कनें एकाएक तेज हो गईं। कल रात का सारा किस्सा एक झटके में याद आ गया मुझे। उधर वो बिल्कुल सामान्य थीं। ऐसा लगा जैसे उन्हें कल रात की घटना से कोई फर्क ही नहीं पड़ा था या फिर शायद ऐसा हो सकता था कि वो सबके सामने ऐसा कुछ भी जाहिर नहीं होने देना चाहती थीं।

"घर जा रही हो क्या काकी।" तभी अनीता ने उन दोनों की तरफ देख उनसे पूछा।

"हां बिटिया।" मंजू काकी ने कहा─"घर जा के खाना पीना भी तो बनाना है। वैसे सुनीता को कह तो आई थी मैं कि खाना बना लेना पर क्या पता वो भूल गई हो और खेलने में व्यस्त हो गई हो।"

दशरथ काका की मौजूदगी में छोटी काकी ने अपना चेहरा घूंघट से ढंक रखा था। वो उनके सामने बोल नहीं सकतीं थी। जेठ भय‌ऊ के रिश्ते में यही नियम...यही रीति रिवाज था हमारे गांव में।

खैर उसके बाद मैं और अनीता दोनों काकियों के साथ ही घर की तरफ चल पड़े। दिन ढलने वाला था फिर भी गर्मी अभी भी महसूस हो रही थी।

अनीता और संगीता काकी आपस में बातें करते हुए आगे आगे जा रहीं थी जबकि मैं और मंजू काकी उनके पीछे चल रहे थे। मेरी इच्छा तो नहीं थी उनके साथ चलने की लेकिन जैसे ही अनीता और छोटी काकी थोड़ा आगे बढ़ीं और मैं भी उनके पीछे थोड़ा तेजी से बढ़ने लगा तो मंजू काकी ने झट मेरा हाथ पकड़ लिया था। फिर इशारे से कहा कि  मैं उनके साथ ही चलूं। इस लिए मजबूरी में मैं उनके साथ चलने लगा था। मेरी धड़कनें बढ़ी हुईं थी। मन में कई तरह के सवाल आ रहे थे।

"तुमने किसी को कुछ बताया तो नहीं न।" मंजू काकी ने धीमे से मुझसे पूछा।

"न..नहीं।" मैंने भी धीमे से जवाब दिया।

"तुम्हें पता है मैं सारा दिन यही सोच सोच के घबराई हुई थी कि कहीं तुम किसी को उस बारे में बता न दो।" काकी ने कहा─"इस चक्कर में मैं ठीक से कटाई भी नहीं कर पा रही थी। कई बार जीजी ने टोक कर मुझसे पूछा था कि मेरा ध्यान किधर है।"

"फिर???"

"फिर क्या।" काकी ने कहा─"मैं उन्हें भला कैसे बताती कि मेरा ध्यान कहां है या मैं क्या सोच सोच के अंदर ही अंदर घबराई हुई हूं।"

"हम्म्म्म।"

"राजू...तुम कभी भूल कर भी किसी को उस बारे में मत बताना।" मंजू काकी ने धीमे स्वर में ही जैसे मिन्नतें की─"वरना बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा। समझ रहे हो न।"

"हां।" मैंने धीमे से ही कहा। फिर सहसा मुझे कुछ याद आया तो मैंने उनसे पूछा─"अच्छा ये बताओ काकी कल रात मैंने ऐसा क्या कर दिया था जो तुम गुस्सा हो गई थी।"

"जाने दो उस बात को।" काकी ने बात को टालना चाहा─"भूल जाओ सब...मैं अब तुमसे गुस्सा नहीं हूं। तुम बस ये बातें किसी को मत बताना। याद रखना कि तुमने वो सब न बताने के लिए जीजी की कसम खाई है।"

"मैं किसी को नहीं बताऊंगा काकी।" मैंने कहा─"अच्छा एक बात पूछूं तुमसे।"

"हां पूछो।"

"कल के बाद क्या तुम बापू से दुबारा मिली हो।" मैंने धड़कते दिल से पूछा।

"नहीं...मैं नहीं मिली उनसे और न ही उन्होंने मुझसे मिलने की कोशिश की।" मंजू काकी ने एक नजर आगे आगे चल रहीं अनीता और छोटी काकी को देख कर कहा─"पर तुम ये क्यों पूछ रहे हो। क्या तुम ये सोच रहे हो कि मैंने और तुम्हारे बापू ने फिर से वो सब किया होगा।"

"तो क्या नहीं किया ऐसा।" मैंने कहा।

"राजू...तुम्हारे द्वारा देख लेने के बाद अब ये मुमकिन नहीं है।" मंजू काकी ने असहज भाव से कहा─"अब अगर तुम्हारे बापू ऐसा करने का सोचेंगे भी तो मैं उन्हें ऐसा नहीं करने दूंगी।"

"क्यों???"

"बस ऐसे ही।" काकी ने कहा─"पहले मैं उनकी बातों में और उनके प्रेम में आ गई थी और बहक भी गई थी। मुझे अच्छे बुरे का खयाल तो था लेकिन उनके प्रेम में अंधी हो कर वो सब करती चली गई थी। पर अब नहीं...मुझे समझ आ गया है कि ये बिल्कुल भी ठीक नहीं है। अगर दुर्भाग्य से किसी दिन तुम्हारे काका द्वारा पकड़ी गई या उन्हें पता चल गया तो मैं कहीं की न रहूंगी। किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी। तुम्हारे काका मुझे धक्के मार के घर से निकाल देंगे और मेरी बेटियां बिना मां के हो जाएंगी। इस लिए अब से मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूंगी तुम्हारे बापू के साथ।"

मंजू काकी की बातें सुन कर मैं सोच में पड़ गया। अंदर ही अंदर मुझे ये सोच कर खुशी भी हुई कि काकी अब बापू के साथ कुछ नहीं करेंगी।

"पर अगर बापू ने तुम्हें इसके लिए मजबूर किया तो।" मैंने पूछा।

"नहीं करेंगे वो मजबूर।" काकी ने कहा─"और अगर करेंगे तो उन्हें अच्छे से समझा दूंगी। उन्हें समझा दूंगी कि अगर वो मेरे साथ जोर जबरदस्ती करेंगे तो सारी लोक लाज भूल कर सबको बता दूंगी। फिर भले ही इसके बाद मेरे साथ भी कितना ही बुरा क्यों न हो जाए।"

"वैसे काकी।" मैंने झिझकते हुए पूछा─"तुमने और बापू ने कितनी बार चु..चुदाई की है अब तक।"

"र...राजू चुप करो।" मंजू काकी ने एकदम से घबरा कर मुझे देखा और फिर आगे आगे चल रहीं अनीता और छोटी काकी को देख बोलीं─"तुम्हें जरा भी खयाल नहीं है क्या कि ऐसी बात अगर उन दोनों के कानों में पड़ गई तो कितना बड़ा गजब हो जाएगा।"

"पर मैंने तो बहुत धीमी आवाज में तुमसे पूछा था काकी।" मैंने भोलापन दिखाया─"इतनी दूर से उन्हें थोड़े न सुनाई देगा।"

"फिर भी तुम्हें इस तरह खुलेआम ऐसी बात मुंह से नहीं निकालनी चाहिए।" काकी ने धीमे स्वर में कहा।

"ठीक है अब से नहीं निकालूंगा।" मैंने कहा─"लेकिन जो मैंने पूछा है उसका जवाब तो दो।"

"देखो मैं तुम्हें सब कुछ बता चुकी हूं।" काकी ने कहा─"तो अब उस बारे में कुछ मत पूछो।"

"बस ये बता दो फिर कुछ नहीं पूछूंगा।"

काकी ने बेबस भाव से मेरी तरफ देखा। 

"पक्का फिर कुछ नहीं पूछोगे न।"

"हां पक्का।"

"हमें ऐसा काम करने के लिए रोज मौका नहीं मिलता था।" फिर काकी ने बताया─"इस एक महीने में ऐसा करने के लिए हमें चार पांच बार ही मौका मिला था। कल खेत के उस कमरे में भी हमने पहली बार ही किया था। मैं तो वहां ऐसा करना ही नहीं चाहती थी क्योंकि तुम्हारे काका खेतों पर ही थे। वो यही समझ रहे थे कि मैं दोपहर का खाना बनाने के लिए घर चली गई हूं। वैसे मैं घर ही जाने वाली थी मगर हंसिया रखने के लिए मकान के उस कमरे की तरफ जाने लगी। सोचा था कमरे में हंसिया रख दूंगी और फिर घर चली जाऊंगी। मुझे नहीं पता था कि कमरे में तुम्हारे बापू आराम कर रहे हैं। फिर जब उन्होंने मुझे वहां आया देखा तो उन्होंने एकदम से पकड़ लिया था मुझे।"

"क्या सच में???"

"हां।" काकी ने कहा─"मैं तो बुरी तरह घबरा ही गई थी और फिर उनसे छोड़ देने की मिन्नतें भी करने लगी थी मगर वो नहीं माने। कहने लगे कि इस वक्त यहां कोई नहीं है। उनका भाई खेतों पर पुल्लियां बांध रहा है तो वो यहां आएगा नहीं। उनका छोटा भाई भी खेतों में काम पर लगा हुआ है। कहने का मतलब ये कि जेठ जी के अनुसार इस काम के लिए हमारे पास बहुत ही अच्छा मौका है। अब क्योंकि मैं तो उनके प्रेम में और उनके प्यार करने के अंदाज में बावरी हो चुकी थी इस लिए जल्दी ही मान गई। उसके बाद ही उन्होंने वो सब करना शुरू कर दिया था।"

"अच्छा तो ये बात है।" मैं धीमे से बोला─"पर मैं भी तो खेतों पर था। क्या तुम दोनों को ये पता नहीं था।"

"पता था।" काकी ने बताया─"लेकिन हमें यही लगा था कि तुम हमेशा की तरह अपने दोस्त के साथ खेलने के लिए खेतों से चले गए होगे। अगर हमें पता होता कि तुम अभी भी खेतों पर हो और कमरे में ही आ जाओगे तो भला हम क्यों ऐसा काम करते।"

"हां ये बात भी ठीक है।" मैंने सिर हिलाया।

"अब जान लिया न सब कुछ।" काकी ने कहा─"अब कुछ मत पूछना मुझसे और न ही मुझसे ऐसी बातें करना सबके सामने।"

"ठीक है।"

"अच्छा एक बताओ।" काकी को कुछ याद आया तो उन्होंने पूछा─"कल जब मैं उस कमरे से चली आई थी तब तुम्हारे बापू ने तुमसे उस बारे में क्या कुछ कहा था।"

"हां...वो बस यही समझा रहे थे कि मैं इस बारे में कभी किसी को कुछ न बताऊं।" मैंने बताया─"फिर उन्होंने मुझे मां की कसम भी खिलाई।"

"अच्छा ऐसा क्या।" काकी के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे─"और तुमने उनसे कुछ नहीं पूछा। मतलब कि क्या तुमने उनसे ये जानने की कोशिश नहीं कि वो मेरे साथ वो सब क्यों और कैसे कर रहे थे।"

"मैं भला उनसे कैसे उस बारे में पूछ सकता था।" मैंने कहा─"मैं तो उस वक्त चुपचाप ही खड़ा था वहां। हां मन ही मन जरूर उस सबको देख के हैरान था।"

"राजू चल।" तभी सामने से अनीता ने आवाज दी।

काकी और मैंने देखा वो छोटी काकी के साथ रुक गई थी। असल में उस जगह से छोटी काकी और मंजू काकी के घर की तरफ को रास्ता मुड़ जाता है इस लिए अनीता ने मुझे हमारे घर की तरफ जाने के लिए आवाज दी थी।

खैर दोनों काकी अपने घर की तरफ जाने वाली पगडंडी पर जाने लगीं और मैं अनीता के साथ अपने घर की तरफ चल पड़ा।

"नमकीन गुड़ खाएगा क्या।" रास्ते में अनीता ने मुस्कुराते हुए पूछा।

"अभी बचा के रखा है क्या तूने।" मैंने हैरानी से पूछा।

"हां...वो क्या है कि दुबारा खाने का मौका ही नहीं मिला।" अनीता ने कहा─"और काका लोगों के सामने इसे निकाल नहीं सकती थी।"

"कहां छिपा रखा था तूने।"

"दुपट्टे में और दुपट्टे को कमर में बांध लिया था।" उसने बताया─"किसी को नहीं पता चला कि मैंने कुछ छुपा रखा है...देखा तुझसे ज्यादा होशियार हूं मैं।"

मैं उसकी इस बात पर मुस्कुरा उठा। उसके होठों पर भी गहरी मुस्कान थिरक रही थी।

"मेरी प्यारी बहन है न।" मैंने कहा─"इस लिए होशियार तो होगी ही।"

"तू भी होशियार है।" उसने अपनी एक उंगली को मेरे दाएं गाल में हल्के से चुभाया─"बस थोड़ा बुद्धू है...हां।"

"अच्छा कल फिर नहाने चलेगी मेरे साथ नदी में।" मैंने बात बदल कर उससे पूछा।

"क्यों...ताकि तू फिर से मुझे कुर्ता उतारने को कहे।" अनीता ने तिरछी नजरों से देखते हुए कहा─"न...मैं तो अब नहीं जाऊंगी तेरे साथ।"

"अरे अब मैं ऐसा करने को नहीं बोलूंगा तुझे।" मैंने कहा─"अब से मैं सिर्फ वो करूंगा जो तू बोलेगी...सच्ची।"

अनीता पलट कर एकटक देखने लगी मुझे। गर्मी के कारण उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें ऐसे लग रहीं थी जैसे सुबह के वक्त गुलाब के फूलों पर शबनम की बूंदें चमक रही होती हैं। जाने क्यों मेरी धड़कनें एकाएक तेज हो गईं।

"तू सच में आज बहुत अजीब बातें कर रहा है।" फिर उसने कहा─"सच सच बता क्या हुआ है तुझे।"

"अ...अरे कुछ नहीं हुआ है मुझे।" मैं उसकी बात पर सकपका गया था फिर सम्हल कर बोला─"ये तो....ये तो बस तेरे लिए मेरा प्यार है। भूल गई क्या श्यामू काका ने सुबह खेतों पर क्या बताया था हमें।"

"अच्छा हां।" अनीता को समझ आया तो उसकी आँखें फैल गईं।

"देख ले...मैं तुझसे कितना प्यार करता हूं।" मैंने धड़कते दिल से कहा─"मतलब कि ये तक बोल रहा हूं कि सिर्फ वही करूंगा जो तू कहेगी।"

"हां तो इसमें क्या है।" अनीता ने कहा─"मैं भी तो ऐसा कर सकती हूं।"

"पर तूने ऐसा बोला तो नहीं मुझसे।" मैंने कहा─"जबकि मैंने इतनी बड़ी बात बोल दी तुझे।"

"ठीक है।" अनीता ने कहा─"तो अब से मैं भी सिर्फ वही करूंगी जो तू कहेगा....अब बोल।"

"और अगर नहीं किया तो।"

"अरे करूंगी...पक्का।"

"चल ठीक है फिर।" मैंने कहा─"कल तू फिर से मेरे साथ नदी में नहाने चलेगी...बोल चलेगी न।"

"हां चलूंगी...अब खुश।"

"नहीं...पहले तू खुश होगी फिर मैं खुश होऊंगा।" मैंने कहा।

"मतलब???"

"देख तू मुझसे छोटी है और प्यारी भी है।" मैंने कहा─"इस लिए जब तू खुश होगी तभी मुझे खुशी महसूस होगी।"

"हैं...क्या तू सच कह रहा है।" अनीता ने आश्चर्य से देखा मुझे।

"तेरी कसम।"

"हां तू मार ही दे मुझे।" अनीता ने मुस्कुरा कर देखा मुझे─"हर वक्त मेरी ही कसम खाता है....गंदा कहीं का।"

"अच्छा चल अपनी कसम खाता हूं।" मैंने कहा─"अब ठीक है न।"

"राजू...तू बात बात पर ऐसे कसम न खाया कर।" अनीता ने गंभीर हो कर कहा─"मुझे अच्छा नहीं लगता तेरा बार बार कसम खाना। मुझे तुझ पर भरोसा है इस लिए अब से तू कसम नहीं खाएगा...समझा न।"

"ठीक है।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"तूने कह दिया तो अब से कसम नहीं खाया करूंगा।"

"देख अपना घर आ गया।" अनीता ने कहा─"मैं तो जाते ही सबसे पहले कुएं में नहाऊंगी...तू क्या करेगा।"

"मैं भी तेरे साथ नहाऊंगा।" मैंने कहा।

"अच्छा...मतलब जो मैं करूंगी वही तू भी करेगा।" अनीता ने आँखें फैला कर पूछा।

"तू बोलेगी तो नहीं करूंगा।" मैंने मायूस हो के उदास सी शक्ल बना ली।

"अरे मैं ऐसा नहीं बोलूंगी।" अनीता ने मेरे सिर के बालों पर हाथ फेरा─"तेरा जो मन करे कर...बस शैतानी मत करना।"

"मैं कहां शैतानी करता हूं।" मैंने भोली सूरत बना के कहा─"मैं तो एकदम भोला और बुद्धू हूं।"

अनीता ये सुन खिलखिला कर हंसने लगी। उसके मोतियों जैसे दांत चमकने लगे। उसके हंसने पर मैंने और भी ज्यादा बुद्धू शक्ल बना ली जिससे वो और भी ज्यादा हंसने लगी।

"तुझे मुझ पर हंसी आ रही है।" मैंने पूछा।

"तू बात ही ऐसी करता है।" 

अनीता हंसते हुए घर के अंदर दाखिल हुई। उसके पीछे मैं भी अंदर दाखिल हुआ। मैं मन ही मन सोचने लगा था कि एक दिन में हम दोनों भाई बहन कितना बदल गए हैं। कल तक हम सिर्फ झगड़ा करते थे। कभी भी एक दूसरे से ऐसे प्यार से बात नहीं करते थे। मैं सोचने लगा कि क्या ये सिर्फ श्यामू काका की बातों का असर था या कुछ और जो फिलहाल मैं सोच नहीं पा रहा हूं। मगर एक सच ये था कि मुझे अनीता से ऐसी बातें करने में बड़ा अच्छा महसूस होता था। मेरा दिल करता था कि बस उसके ही पास रहूं।

#######

"राजू...अब बस कर दे न।" कुएं में अनीता मेरे द्वारा उसको नहलाने पर बोली─"और कितना नहलाएगा मुझे।"

मैं काफी देर से उसे नहला रहा था। कुएं से बाल्टी में पानी खींचता और बाल्टी का सारा पानी धीरे धीरे कर के उसके ऊपर डाल देता। अनीता हर बार यही बोलती कि अब बस कर दे मगर मैं नहीं मान रहा था।

"तू बस नहा अनीता।" आज से पहले बहुत कम ऐसा हुआ था जब मैं इतना प्यार से उसका नाम लेता था वरना छिपकली ही बोलता था उसे─"आज तेरा ये भाई तुझे इतना नहलाएगा कि तुझे सुबह तक गर्मी नहीं लगेगी।"

"अरे अब बस कर दे न।" अनीता पत्थर के पाट में बैठी थी लेकिन ये कहते हुए खड़ी हो गई─"मां बापू आते होंगे और अगर उन्होंने अभी तक हमें नहाते ही देखा तो डांटेंगे।"

"अच्छा एक बाल्टी और नहा ले।" कुएं से पानी खींच कर बाल्टी पकड़े मैं बोला─"इसके बाद नहीं डालूंगा।"

"ठीक है डाल दे।" कहते हुए अनीता वापस पाट पर बैठ गई─"उसके बाद मैं भी तुझे ऐसे ही नहलाऊंगी।"

मैंने मुस्कुराते हुए बाल्टी का पानी उसके सिर पर डालना शुरू कर दिया। पानी सिर से बहते हुए उसके पूरे बदन को भिगोने लगा। सिर से चेहरे पर जब लगातार पानी बहता तो उसकी सांसें फूलने लगती और वो सांस लेने के लिए छटपटाने लगती।

"कितना खराब है तू सांस भी नहीं लेने देता मुझे।" जैसे ही बाल्टी का पानी खत्म हुआ तो उसने जोर जोर से सांस लेते हुए कहा─"पता है कितना सांस भर जाती है। एकदम दम घुटने लगता है।"

"पहले क्यों नहीं बताया मुझे।" मैंने भोलापन दिखाया─"मुझे लगा तुझे मजा आ रहा होगा। इसी लिए तो ऐसे नहला रहा था तुझे।"

"मजा तो सच में आ रहा था राजू।" अनीता मुस्कुराते हुए खड़ी हुई─"चल अब मैं तुझे नहलाती हूं।"

"रहने दे...कुएं से पानी खींच खींच के थक जाएगी तू।" मैंने कहा─"तू जा कपड़े बदल ले। मैं आता हूँ नहा के।"

"नहीं...मैं भी तुझे नहलाऊंगी।" अनीता गीले कपड़े पहने मेरे पास आते हुए बोली─"तूने मुझे नहलाने में इतना सारा पानी कुएं से खींचा...तू भी तो थक गया होगा। ला दे बाल्टी मुझे।"

"अरे मैं खुद नहा लूंगा न।" मैंने कहा─"तू जा कपड़े बदल ले।"

"न मतलब न।" अनीता ने कमर में हाथ रख के कहा─"तूने इतना प्यार से मुझे नहलाया है...इतनी मेहनत की है तो मैं भी नहलाऊंगी तुझे। देख अगर मैंने ऐसा नहीं किया तो मुझे बहुत बुरा लगेगा। मान जा न राजू....मुझे बाल्टी दे दे।"

"अच्छा ठीक है।" मैंने बाल्टी उसकी तरफ बढ़ाई─"पर तू बस एक बाल्टी पानी ही खींचेगी कुएं से।"

"मेरा जितना मन करेगा उतना नहलाऊंगी तुझे।" अनीता ने बाल्टी ले कर कहा─"चल अब तू कपड़े उतार के बैठ जा पाट पर।"

मैं जानता था कि वो मानेगी नहीं इस लिए उसे नाराज करना ठीक नहीं समझा मैंने। अगले ही पल मैंने जल्दी से कपड़े उतारे और सिर्फ कच्छा पहने पाट पर बैठ गया। उधर अनीता कुएं से पानी खींच रही थी।

उसका कुर्ता सलवार पानी में भीगा हुआ था इस लिए उसके बदन से चिपका हुआ था। जैसे ही कुएं से बाल्टी ऊपर आई तो उसने बाल्टी को पकड़ा और फिर मेरी तरफ पलटी। उफ्फ उसकी छातियां साफ दिख रहीं थी मुझे। पूरा कुर्ता उसकी छातियों पर चिपक गया था।

"चल बापू की तरह हर हर गंगे बोल।" फिर वो बाल्टी का पानी मेरे सिर के ऊपर धीरे धीरे डालते हुए बोली।

मैं सच में उसके पानी डालने पर हर हर गंगे बोलने लगा और हाथों से पूरे बदन को मलने लगा। थोड़ी ही देर में बाल्टी का पानी खत्म हो गया तो वो पलट कर फिर से कुएं में बाल्टी डालने लगी। 

नहाते तो हम पहले भी थे कभी कभी इस तरह मगर तब ऐसा एक दूसरे को तंग करने के लिए करते थे मगर आज ऐसा कुछ भी नहीं था। मैं उसे नहलाने में खुशी महसूस कर रहा था और अब वो मुझे खुशी से नहला रही थी।

जब तक उसने दूसरी बार पानी से भरी बाल्टी कुएं से खींची तब तक मैंने अपने पूरे बदन को अच्छे से मल लिया था।

"अरे माटी नहीं लगाएगा क्या बदन में।" बाल्टी लिए मेरी तरफ आते हुए उसने पूछा।

"लगाऊंगा न।" मैंने कहा─"तू ये बाल्टी यहीं रख दे और जा अब।"

"न मैं अभी नहीं जाऊंगी।" उसने बाल्टी मेरे पास रख कर कहा─"तू माटी लगा ले...फिर मैं पानी डालूंगी तेरे ऊपर।"

"मुझे पता है तू मेरे लिए अपना प्यार साबित करना चाहती है।" मैं खड़ा हुआ और फिर उसके कंधे पकड़ कर बोला─"पर तुझे ऐसा करने की जरूरत नहीं है पगली। मैं ऐसे ही महसूस कर सकता हूं कि तू मुझे बहुत चाहती है। अब मैं ये चाहता हूं कि मेरी प्यारी बहन ज्यादा परेशान न हो। तूने अभी बहुत ज्यादा नहाया है और कपड़े भी गीले पहने हैं...ऐसे में तू बीमार भी हो सकती है। इस लिए तू जा और कपड़े बदल ले। मैं नहा के आता हूं थोड़ी देर में।"

अनीता अपलक देखे जा रही थी मुझे। उसकी आंखों में मासूमियत थी और साथ ही प्यार भी। मेरा दिल किया उसके फूले हुए गाल चूम लूं मगर फिर मैंने अपना इरादा बदल दिया। कहीं वो गलत न समझ ले।

"कल मैं नदी में तेरे साथ नहाने चलूंगी।" फिर उसने कहा─"वहां खूब नहलाऊंगी तुझे और तू मुझे मना नहीं करेगा....समझ गया न।"

"हां ठीक है।" मैं मुस्कुरा उठा─"चल अब तू जा।"

वो जैसे ही जाने के लिए मुड़ी तो मेरा मन मचल उठा और मैंने झट कहा─"ठहर जरा।"

उसने पलट कर मेरी तरफ देखा। आंखों से इशारा कर पूछा क्या है। मैं धीरे से उसके पास बढ़ा और उसका चेहरा दोनों हथेली में ले कर झट से उसके फूले हुए गाल को चूम लिया। मेरे ऐसा करते ही वो चौंक पड़ी।

"अब जा।" मैंने उसे छोड़ कर कहा।

"तूने मेरा गाल क्यों चूमा।" उसने हैरानी से मुझे देखा।

"बस ऐसे ही।" मैंने कहा─"तू बहुत प्यारी लग रही थी इस लिए तेरा गाल चूमने का मन किया तो चूम लिया। तुझे बुरा लगा क्या।"

"न..नहीं।" वो थोड़ा लजा कर बोली─"चल अब मैं जा रही हूं। तू नहा ले जल्दी।"

कह कर वो मुस्कुराते हुए चली गई। कुछ देर के लिए मेरी धड़कनें बढ़ गईं थी मगर उसे मुस्कुराते हुए जाता देख मैंने राहत की सांस ली। खैर उसके बाद मैं नहाने में लग गया। नहाते हुए यही सोच रहा था कि एकाएक अनीता का साथ कितना अच्छा लगने लगा है मुझे।


जारी है.............
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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#49
Next update will come soon friends......
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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#50
राजू और अनीता का बॉन्ड अब पहले से ज्यादा गहरा हो रहा है, कल तक झगड़ते थे, और अब इतना प्यार-मोहब्बत वाला हो गया है। वो कुएं पर नहाने वाला सीन बहुत क्यूट और इनोसेंट लगा। राजू का अनीता के गाल चूमना वाला मोमेंट थोड़ा सरप्राइजिंग था, लेकिन ये उनके रिश्ते में आ रहे बदलाव को अच्छे से दिखाता है। शायद श्यामू काका की बातों का असर, या कुछ और... इंटरेस्टिंग है ये ट्विस्ट!

मंजू काकी और बापू वाला साइड प्लॉट भी काफी ग्रिपिंग है। काकी का राजू से बात करना, वो गिल्ट और डर, ये सब बहुत रियल लगता है। गांव की रीति-रिवाज, जैसे घूंघट और जेठ-भाभी के रूल्स, को अच्छे से वीव किया गया है, जो कहानी को ऑथेंटिक बनाता है। डायलॉग्स नैचुरल लगे, जैसे "हाय दय्या बापू आ गए राजू", ये गांव की भाषा की फील देता है। गेहूं की गहाई, खेतों का काम, नदी नहाना, सब कुछ इतना विस्तार से लिखा है कि मैं खुद को वहां इमेजिन कर पाया।

बस एक बात, कहानी में थोड़ा सस्पेंस और तेज पेसिंग हो सकती थी। जैसे काकी का अफेयर वाला पार्ट अच्छा है, लेकिन राजू के मन में क्या चल रहा है, उस पर और डीप इंसाइट मिलती तो बेहतर लगता। और अनीता के साथ राजू का बदलता बिहेवियर, क्या ये सिर्फ भाई-बहन का प्यार है या कुछ और? ये क्यूरियोसिटी बनाए रखती है, जो अच्छी बात है। अगले भाग की उत्सुकता से प्रतीक्षा है... ?
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#51
(18-01-2026, 08:49 PM)rajeev13 Wrote: राजू और अनीता का बॉन्ड अब पहले से ज्यादा गहरा हो रहा है, कल तक झगड़ते थे, और अब इतना प्यार-मोहब्बत वाला हो गया है। वो कुएं पर नहाने वाला सीन बहुत क्यूट और इनोसेंट लगा। राजू का अनीता के गाल चूमना वाला मोमेंट थोड़ा सरप्राइजिंग था, लेकिन ये उनके रिश्ते में आ रहे बदलाव को अच्छे से दिखाता है। शायद श्यामू काका की बातों का असर, या कुछ और... इंटरेस्टिंग है ये ट्विस्ट!

मंजू काकी और बापू वाला साइड प्लॉट भी काफी ग्रिपिंग है। काकी का राजू से बात करना, वो गिल्ट और डर, ये सब बहुत रियल लगता है। गांव की रीति-रिवाज, जैसे घूंघट और जेठ-भाभी के रूल्स, को अच्छे से वीव किया गया है, जो कहानी को ऑथेंटिक बनाता है। डायलॉग्स नैचुरल लगे, जैसे "हाय दय्या बापू आ गए राजू", ये गांव की भाषा की फील देता है। गेहूं की गहाई, खेतों का काम, नदी नहाना, सब कुछ इतना विस्तार से लिखा है कि मैं खुद को वहां इमेजिन कर पाया।

बस एक बात, कहानी में थोड़ा सस्पेंस और तेज पेसिंग हो सकती थी। जैसे काकी का अफेयर वाला पार्ट अच्छा है, लेकिन राजू के मन में क्या चल रहा है, उस पर और डीप इंसाइट मिलती तो बेहतर लगता। और अनीता के साथ राजू का बदलता बिहेवियर, क्या ये सिर्फ भाई-बहन का प्यार है या कुछ और? ये क्यूरियोसिटी बनाए रखती है, जो अच्छी बात है। अगले भाग की उत्सुकता से प्रतीक्षा है... ?
This story is completely rooted in the village and it will showcase every aspect of the rural landscape.
The atmosphere, customs, language and lifestyle are all village-like. My goal is to make every scene and every aspect of this story reflect the way villegers lived and lived in ancient times.

Anyway.... कहानी के बारे में आपने जिन सुंदर शब्दों के द्वारा अपनी प्रतिक्रिया दी है और जिस तरह से मेरा उत्साह बढ़ाया है उससे मुझे बेहद खुशी हुई है। यूं समझिए कि मैं आपके इस रिव्यू से charge हो गया हूं। इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूं कि कहानी में थोड़ा सस्पेंस और पेसिंग हो सकती थी पर ऐसा इस लिए नहीं है कि राजू अभी कुछ मामलों में अनाड़ी है। जैसे जैसे उसे ऐसी चीजों की समझ आएगी या ये कहें कि मैच्योर होगा उससे उसका किरदार या बर्ताव भी बदलता जाएगा। और इसी के साथ उसके डीप इनसाइट में क्या चल रहा है पता चलेगा। आशा है आप सहमत होंगे और समझ भी गए होंगे।

राजू का अपनी बहन के साथ जो रिलेशन डेवलप हो रहा है उसके बारे में अभी उन्हें खुद पूरा पता नहीं है। हम उमर होने के कारण और अपोजिट जेंडर होने के कारण आकर्षण होना स्वाभाविक है। अभी स्पष्ट रूप से कुछ नहीं बताऊंगा क्योंकि उत्सुकता कम हो जाएगी। यही कहूंगा कि इंतजार कीजिए। 

आखिर में फिर से आपके इस रिव्यू के लिए धन्यवाद मित्र। उम्मीद है आप कहानी के हर भाग में ऐसी ही सुंदर प्रतिक्रिया दे कर मेरी हौसला अफजाई करते रहेंगे और मुझे ऊर्जा मिलती रहेगी।

अगला भाग बस थोड़ी ही देर में आ जाएगा।

Thank you
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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#52
भाग ~ १५




दूसरे दिन भी सुबह मैं और अनीता खेतों पर गए और वहां गहाई की। फिर दोपहर होने से पहले काका के कहने पर हमने गहाई करना रोका। उसके बाद हम घर की तरफ चल दिए। इस बार मां हमारे साथ थी इस लिए नदी में जाने का मौका नहीं मिला हमें। इस बात से अनीता और मैं दोनों ही थोड़ा मायूस हो गए थे। मां से नदी में नहाने जाने की बात बोल नहीं सकते थे क्योंकि मां जाने न देती। 

दोपहर में जब हम सब खा पी कर आराम कर रहे थे तो मंजू काकी की दोनों बेटियां आ गईं थी। उन्हें देखते ही मुझे खयाल आ गया था कि जब ये दोनों अपने मामा के साथ नाहरपुर गईं थी तभी मेरे बापू ने इनकी मां के साथ नया रिश्ता बनाना शुरू किया था। उसके बाद वो दोनों इतना आगे बढ़ गए थे कि रिश्ते की सारी मर्यादा ही तोड़ डाली थी।

सुनीता और रानी आंगन के दूसरी तरफ वाले बरामदे में अनीता के साथ चंदा खेल रहीं थी और मैं थोड़ी ही दूरी पर खाट बिछाए लेटा हुआ था। मां ने कहा था कि आराम कर ले इस लिए आराम ही कर रहा था। मां भी रसोई के पास वाले बरामदे में खाट पर लेटी आराम कर रही थी। बापू कहीं गए थे। मैंने सुनीता से पूछा था कि उसके बापू(मझले काका) कहां हैं तो उसने बताया था कि वो अभी थोड़ी देर पहले ही खेतों की तरफ चले गए हैं।

तब से खाट पर पड़ा मैं यही सोच रहा था कि क्या बापू मंजू काकी के घर गए होंगे। मतलब कि हो सकता है उन्हें ये अंदाजा हो गया हो कि उनका मझला भाई खेत चला गया होगा। उसकी दोनों बेटियां तो हमारे घर आ गई हैं। तो अगर दशरथ काका खेत चले गए होंगे तो निश्चित ही मंजू काकी घर में इस वक्त अकेली ही होंगी। 

मुझे याद आया कि सुनीता और रानी के आने के कुछ ही देर बाद बापू घर से चले गए थे। मैं सोचने लगा कि क्या मुझे मंजू काकी के घर जा कर ये देखना चाहिए। मैं काफी देर से खुद को रोके हुए था मगर जब मन न माना तो उठ बैठा। पास ही डोरी में लटकी अपनी शर्ट पहनी और चल पड़ा बाहर की तरफ।

"कहां जा रहा है राजू।" तभी पीछे से अनीता ने मुझे जाता देख पूछ लिया।

"मझले काका के घर जा रहा हूं।" 

"आ न तू भी खेल हमारे साथ।" उसने कहा।

"आता हूं थोड़ी देर में।"

कहने के साथ ही मैं तेजी से बाहर निकल गया। मेरे मन में हलचल मची हुई थी। बार बार यही खयाल आ रहा था कि अगर सच में काका खेत चले गए होंगे तो काकी घर पर अकेली होंगी और मेरे बापू इस मौके पर चौका मारने ही गए होंगे उनके घर।

तेज तेज चलते हुए मैं कुछ ही देर में मझले काका के घर पहुंच गया। मझले काका और छोटे काका के घर अगल बगल ही बने थे। सामने की सड़क बाएं तरफ मुड़ जाती थी जिससे घर का सामने वाला हिस्सा थोड़ा टेढ़ा जैसा दिखता था। दोनों घरों के पीछे काफी खाली जगह थी जिसे चारों तरफ से बारी लगा के रूंध दिया गया था। बारी में कई सारे झाड़ झंखाड़ थे जिसकी वजह से आर पार का न के बराबर ही दिखता था। इसके अलावा कई सारे पेड़ पौधे भी लगे हुए थे। दोनों घरों के पीछे तरफ ही कुआं था जिसमें दोनों काका और काकी का अपना अपना नहाना धोना होता था।

मैं जब काका के घर के सामने पहुंचा तो मेरी नजर श्यामू काका के घर के बाहर जो थोड़ा सा मैदान था वहां पड़ी। श्यामू काका ने बाहर ही नीम के पेड़ के नीचे खाट बिछा रखी थी जिसमें बापू और उनके साथ गांव का एक और आदमी बैठा हुआ था। दोनों बातें कर रहे थे जबकि श्यामू काका थोड़ी ही दूर पर घर के बाहरी दीवार से सटी हुई बनी पट्टी पर बैठे हुए थे। जैसा कि मैंने बताया घर के सामने वाली सड़क मुड़ जाती थी जिसकी वजह से घर का सामना मझले काका के घर के सामने से थोड़ा टेढ़ा दिखता था। इस वजह से श्यामू काका मुझे बगल से बैठे दिख रहे थे। मतलब मुझे देखने के लिए उनको अपनी गर्दन थोड़ा सा टेढ़ी करनी पड़ती। 

खैर बापू को छोटे काका के घर के बाहर गांव के किसी आदमी के साथ बातें करता देख मैंने राहत की सांस ली। मगर अगले ही पल ये भी सोचने लगा कि क्या मेरे बापू घर से यहां इस आदमी से बातें करने ही आए होंगे। या फिर ये हो सकता है कि वो मंजू काकी के घर ही आते रहे होंगे लेकिन श्यामू काका के घर के बाहर उन्होंने उस आदमी को देखा होगा या फिर उस आदमी ने ही बापू को देखा होगा। ऐसे में या तो उसने बापू को अपने पास बुला लिया होगा या फिर बापू को ही मजबूरन उसके पास जाना पड़ गया रहा होगा। खैर जो भी हो...अच्छी बात यही थी कि वो मंजू काकी के घर में नहीं थे। बापू के नजरिए से सोचा जाए तो ये उनका दुर्भाग्य हो गया था। वरना मौका तो बहुत ही अच्छा था उनके पास मंजू काकी के पास जा कर उनके साथ कुछ भी करने का। बशर्ते मंजू काकी उन्हें कुछ करने देतीं।

खैर बापू को वहां बैठा देख मैं सोचने लगा कि अब मैं क्या करूं। मतलब मंजू काकी के घर जाऊं या यहीं से वापस अपने घर लौट जाऊं। सहसा मुझे अनीता का खयाल आया। उसने मुझसे पूछा था कि कहां जा रहा है। मतलब उसे ये लगा था कि मैं अपने दोस्त बबलू के पास जा रहा हूं जबकि मैंने उससे वादा किया था कि अब से उसके साथ नहीं रहूंगा। मैं अपनी बहन को दुबारा नाराज नहीं करना चाहता था। वैसे भी उसके साथ आज मेरा जिस तरह का समय गुजरा था वो बहुत ही अनोखा और मजेदार रहा था।

अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी मंजू काकी घर से बाहर निकलती दिखाई दीं। उन्हें देख मैं फौरन सड़क से उनके घर के अंदर की तरफ मुड़ चला।

उधर काकी के हाथ में कोई बर्तन था जिसे लिए वो मवेशियों के पास पहुंची और उस बर्तन को एक नाद में उलट दिया। शायद बर्तन में वो कुछ मवेशियों के लिए लाई थीं।

"क्या कर रही हो काकी।" मैंने उनके पास पहुंचते ही पूछा।

"गाय के भूसे में चोकर डालने आई थी राजू।" काकी ने बताया─"तुम इस वक्त खड़ी दुपहरी में यहां किसी काम से आए हो क्या।"

"हां वो...मैं काका के पास ये पूछने आया था कि गहाई अभी करेंगे या थोड़ा और ठंडी बेरा हो जाने पर करेंगे।" मैंने फटाफट बहाना बना कर कहा।

"तुम्हारे काका तो कुछ देर पहले खेत चले गए हैं।" काकी ने कहा─"पर तुम अभी मत जाना वहां। ठंडी बेरा हो जाने पर ही गहाई शुरू होगी।"

"तो फिर काका खड़ी दुपहरी में क्यों खेत चले गए हैं।" मैंने पूछा─"छोटे काका और बापू तो अभी यहीं हैं।"

"अरे...अब क्या बताऊं तुम्हें।" काकी ने अजीब भाव से कहा─"मुझसे नाराज हो गए थे तो खेत ही चले गए।"

"क..क्या??? मतलब क्यों नाराज हो गए थे वो तुमसे।" मैंने हैरानी से पूछा।

"अंदर आओ बताती हूं।" 

मैं काकी के साथ अंदर की तरफ चल पड़ा। एकाएक ही मन में कई तरह के विचार उठने लगे थे। जल्दी ही मैं और काकी अन्दर आंगन वाले बरामदे में आ गए। मैं वहीं पास ही रखी खाट पर जा के बैठ गया।

"हां अब बताओ काकी।" मैंने उत्सुकता में पूछा─"काका क्यों नाराज हो गए थे तुमसे।"

"तुम अभी छोटे हो इस लिए शायद न समझो।" काकी ने कहा─"ये जो मरद लोग होते हैं न...सब एक जैसे होते हैं और अपने ही मन की करते हैं।"

"आखिर हुआ क्या है काकी।" 

"खा पी कर हम सब आराम कर रहे थे।" काकी ने बताना शुरू किया─"कुछ देर पहले अचानक सुनीता और रानी ने कहा कि वो दोनों बड़ी मां(मेरी मां) के घर अपनी अनीता जीजी के साथ चंदा खेलने के लिए जाना चाहती हैं। मैंने सोचा ये दोनों चली जाएंगी तो थोड़ा चैन से कुछ देर सो लूंगी वरना इनके शोर शराबे में ठीक से आराम भी नहीं कर पाती मैं। खैर जैसे ही वो दोनों यहां से गईं तो अचानक तुम्हारे काका मेरे पास आ धमके और पता है क्या कहने लगे।"

"क..क्या कहने लगे वो??" अंजानी आशंका से मेरी धड़कनें तेज हो गईं।

"उफ्फ मुझे तो बताने में भी शर्म आती है राजू।" मंजू काकी ने बेबस भाव से कहा─"पर तुमसे भला कहां अब कुछ छुपा रह गया है इस लिए बता देती हूं। मैं इसी खाट में लेटी हुई थी जिसमें अभी तुम बैठे हो। तुम्हारे काका आए फिर पूंछा बच्चियां कहां गईं हैं। हालांकि वो यहीं पास में ही बैठे पान सुपाड़ी खा रहे थे और उन्होंने दोनों बच्चियों की बातें सुन ली थी, फिर भी मुझसे पूछ रहे थे। खैर मैंने बताया कि वो दोनों जीजी के घर गईं हैं। इतना सुनते ही जैसे वो खुश हो गए...झट से बोले फिर तो बढ़िया मौका है तुझे चो...चोदने का।"

"क...क्या???? ऐसा कहा काका ने।" मैंने आश्चर्य से पूछा।

"हां राजू।" काकी ने कहा─"और फिर बिना मेरी मर्जी जाने कहने लगे....चल सीधी हो के लेट का और अपना धोती साया ऊपर कर ले।"

"फिर???"

"उनकी ऐसी बातें सुन कर मेरा दिमाग खराब हो गया।" मंजू काकी ने कहा─"एक तो वैसे ही कटाई कर कर के थकी हुई थी, ऊपर से सुनीता ने खाना भी नहीं बताया था तो खेत से आने के बाद नहा धो के खाना बनाया। फिर सबको खिलाया पिलाया और अब ऊपर से उनके लिए धोती साया ऊपर करूं। मतलब समझते ही नहीं कि मैं भी इंसान हूं और मुझे भी थकान और पीड़ा महसूस होती है। पर नहीं....उन्हें इससे क्या। जब जिस वक्त उनकी इच्छा होगी तो उनके कहने पर मैं किसी गुलाम की तरह अपना धोती साया ऊपर उठा लूं और वो मेरी टांगों के बीच अपना खूंटा डाल कर धक्के लगाने लगें।"

"तो...तो क्या तुमने उनके कहने पर अपना धोती साया ऊपर नहीं उठाया फिर।" मैंने धड़कते दिल से पूछा।

"मैंने साफ मना कर दिया था।" काकी ने कहा─"कह दिया था कि मेरे बस का नहीं है ये। मैं भी इंसान हूं और काम कर कर के बुरी तरह थक गई हूं। एक आदमी ये भी सोचता है कि खड़ी दुपहरी में क्यों ऐसा काम करे जिससे गर्मी में और भी बुरा हाल हो जाए मगर उनको तो बस पानी निकालने से मतलब है। जब मैंने साफ मना कर दिया तो गुस्सा होने लगे। उनके गुस्सा होने पर भी जब मैं राजी न हुई तो गालियां देते हुए और पैर पटकते हुए खेत की तरफ चले गए।"

"तुमने रोका नहीं उनको।"

"जिसे सिर्फ अपने सुख की पड़ी हो ऐसे आदमी को क्यों रोकूं मैं।" काकी ने कहा─"मैंने नहीं रोका उन्हें...।"

"क्या काकी...मेरे इतने अच्छे काका को नाराज कर दिया तुमने।" मैंने उन्हें छेड़ा─"अभी अगर मेरे बापू ने ऐसा बोला होता तो क्या उन्हें भी मना कर देती तुम।"

"र...राजू।" काकी ने आँखें फैला कर कहा─"कुछ तो शर्म करो। कैसी बातें कर रहे हो तुम।"

"लो अब मैं अपनी काकी से मजाक भी न करूं।" मैंने भोलापन दिखा कर बुरा सा मुंह बनाया।

"बिल्कुल करो मजाक।" काकी ने कहा─"लेकिन इस तरह का नहीं राजू। मत भूलो कि मैं तुम्हारी भौजी नहीं बल्कि काकी हूं। कोई भी लड़का अपनी काकी से ऐसा मजाक नहीं करता।"

"मंजू....मेरी प्यारी मंजू।" ये बोलते हुए मैं एकदम से हंसने लगा।

काकी ये सुन कर बुरी तरह शर्मा गईं। 

"हाय दय्या राजू कितने खराब हो तुम।" काकी ने शर्म से जबरन आँखें दिखा कर कहा।

"वैसे बापू छोटे काका के घर के बाहर ही बैठे हैं।" मैंने उन्हें फिर छेड़ा।

"अच्छा अब समझी।" काकी ने कहा─"घर में तुमने अपने बापू को नहीं देखा होगा तो सोचा होगा वो मेरे घर आए होंगे। इसी लिए ये देखने तुम यहां आए हो और मुझसे बहाना बना रहे थे...है न।"

"न..नहीं नहीं काकी।" मैं बुरी तरह सकपका गया─"मैं सच में गहाई करने के बारे में ही पूछने आया था काका से।"

"ये बात तो तुम घर में जीजी से भी पूछ सकते थे।" काकी ने मेरी चोरी पकड़ ली─"खड़ी दुपहरी में यहां आने की क्या जरूरत थी। मतलब साफ है कि तुम यही जांच करने आए हो कि जेठ जी मेरे घर आए हैं या नहीं।"

इस बार कोई बहाना न बना सका मैं। मेरी चोरी सच में पकड़ ली थी काकी ने। मैं सिर झुका लेने के सिवा कुछ न कर सका।

"कितने शैतान हो गए हो तुम।" तभी काकी ने कहा─"एक ही दिन में कितना बदल गए हो। मैं तो तुम्हें कितना भोला और नादान समझती थी राजू।"

मैं अब भी कुछ न बोला। ये अलग बात है कि अन्दर ही अंदर मुझे बुरा लगने लगा था। काकी का ऐसा कहना पता नहीं क्यों मुझे अच्छा नहीं लग रहा था।

"अब तुम ये गलत बोल रही हो काकी।" मैंने एक झटके में सिर उठा कर और थोड़ा नाराज हो कर बोला─"मैं तो अब भी कहीं न कहीं भोला और नादान ही हूं पर तुम और बापू क्या हो। जो तुम दोनों ने किया क्या वो बहुत अच्छा था।"

मेरी ये बात सुनते ही काकी हक्की बक्की सी देखने लगी मुझे। शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि मैं ऐसा बोल सकता हूं उन्हें। फिर एकदम से उनके चेहरे पर शर्म और अपराध भाव उभर आए।

"तुम्हारा जो मन करे करो।" मैं खाट से उतर कर बोला─"मुझे उससे कोई लेना देना नहीं है...जा रहा हूं।"

काकी ने मुझे रोका मगर मैं न रुका। मेरा दिमाग खराब हो गया था। मन ही मन काकी को बुरा भला कहते हुए मैं अपने घर की तरफ चल पड़ा। उधर काकी एकाएक घबरा उठीं थी और साथ ही पछताने भी लगीं थी कि क्यों उन्होंने मुझे ऐसा कहा।

#######

घर पहुंच कर मैं भी अनीता और सुनीता व रानी के साथ चंदा खेलने लगा। अनीता बार बार मेरी तरफ देखती थी क्योंकि मेरे चेहरे पर थोड़ा नाराजगी के भाव थे। वो जानना चाहती थी कि मैं किस लिए नाराज दिख रहा हूं मगर सुनीता और रानी की मौजूदगी में उसने मुझसे पूछा नहीं। खैर ऐसे ही हम काफी देर तक खेलते रहे जिससे समय थोड़ा गुजर गया। बापू अभी तक घर नहीं आए थे। हालांकि अब मैं ये सोच भी नहीं रहा था कि वो श्यामू काका के यहां से मंजू काकी के घर गए होंगे या नहीं। 

कुछ देर में मां आई और मुझसे कहा कि मैं खेतों पर जाऊं। मां के कहने पर मैंने जब खेलना बंद कर दिया तो अनीता ने भी खेलना बंद कर दिया। सुनीता और रानी भी उठ कर अपने घर जाने लगीं।

"तू अगर थक गई हो तो न जा खेत।" मां ने अनीता से कहा─"राजू अपने काका के साथ गहाई कर लेगा। तू रात के लिए खाना बना लेना।"

"अभी तो रात का खाना बनाने में बहुत समय है मां।" अनीता ने कहा─"अभी मैं भी राजू के साथ जाऊंगी। शाम होने से पहले ही आ जाऊंगी। उसके बाद जल्दी से जूठे बर्तन धो के खाना बना लूंगी।"

"ठीक है जा फिर अपने भाई के साथ।" मां ने कहा─"जूठे बर्तन मैं लूंगी। उसके बाद ही आऊंगी अब।"

"चल राजू हम चलते हैं।" अनीता ने खुश हो के कहा मुझसे।

मैं बिना कुछ बोले चल पड़ा बाहर की तरफ। अभी हम बाहर ही पहुंचे थे कि तभी अनीता एकदम से चौंक कर बोली─"राजू रुक थोड़ा। नमकीन गुड़ लाना तो भूल ही गई मैं।"

मेरा जवाब सुने बिना ही वो पलटी और दौड़ते हुए अंदर की तरफ चली गई। मैं नीम के पेड़ के पास खड़ा उसके आने का इंतज़ार करने लगा। थोड़ी ही देर में वो भागते हुए आई।

"ले आई मैं।" फिर उसने अपनी कमर के पास दुपट्टे में छुपाया नमकीन गुड़ दिखाते हुए बोली─"चल अब।"

इतने में ही उसकी सांसें फूल गईं थी जिससे उसके सीने के उभार ऊपर नीचे होने लगे थे। मैंने एक नजर उसे देखा और चल पड़ा।

"क्या हुआ चुप क्यों है तू।" रास्ते में उसने मुझसे पूछा─"खेलते समय भी नाराज दिख रहा था तू। कुछ हुआ है क्या।"

"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।" मैंने हल्के से मुस्कुरा कर उससे कहा─"तू मेरे साथ है तो अब सब ठीक है।"

अनीता ध्यान से देखने लगी मुझे। जैसे समझने की कोशिश कर रही हो कि मेरे ऐसा बोलने का क्या मतलब है या मेरे मन में इस वक्त क्या चल रहा है।

"किसी किसी वक्त तेरी बातें मुझे बिल्कुल भी समझ नहीं आती।" फिर उसने कहा─"पता नहीं क्या बोल देता है। मैं सोचती ही रह जाती हूं। तू साफ साफ क्यों नहीं बोला करता है।"

"अरे बुद्धू तो मैं हूं।" मैंने कहा─"फिर तुझे क्यों नहीं समझ आती मेरी बात।"

"शायद मैं भी बुद्धू हूं ही ही ही।" अनीता बोली और खुद ही हंसने लगी। 

मैं भी उसकी बात पर मुस्कुरा उठा। सच में अब मेरा मूड ठीक हो गया था। मुझे हैरानी भी हुई कि उससे बातें करते ही मेरा मूड ठीक हो गया है। तभी तो उसकी बात पर मुस्कुराने लगा था।

"अच्छा बता न क्यों नाराज था उस समय।" उसने फिर से पूछा।

"जाने दे न।" मैंने कहा─"अब सिर्फ ये मायने रखता है कि तेरे साथ होने से मैं ठीक हूं।"

"क्या सच कह रहा है तू।" अनीता ने चलते हुए मेरी तरफ देखा─"मतलब सच में मैं तेरे साथ हूं तो तुझे अच्छा लग रहा है।"

"हां...क्या तुझे मेरे साथ अच्छा नहीं लग रहा।"

"हां मुझे भी अच्छा लग रहा है।" अनीता ने मुस्कुरा कर कहा─"पर आज से पहले...मतलब कल तक ऐसा नहीं लगता था।"

"क्यों।" मैं मन ही मन ये सोच के चौंका कि वो भी वही महसूस कर रही है जो मैं महसूस कर रहा था─"कल तक कैसा लगता था तुझे।"

"यही लगता था कि तू मेरी आंखों के सामने न आया करे।" अनीता ने कहा─"क्योंकि तू हर वक्त मुझे तंग करता था न। गलती तेरी होती थी फिर भी मां मुझे ही डांटती थी इस लिए तुझ पर गुस्सा आता था मुझे।"

"चल वो सब भूल जाते हैं।" मैंने कहा─"अब से हम कोई झगड़ा नहीं करेंगे बल्कि अच्छे से रहेंगे और एक दूसरे को आज जैसे ही प्यार करेंगे।"

"हां ठीक है।" अनीता ने खुशी से कहा─"अब से हम कोई झगड़ा नहीं करेंगे।"

"मैं तेरी खुशी के लिए कुछ भी करूंगा और तू मेरी खुशी के लिए कुछ भी करना।" मैंने उससे कहा─"बोल करेगी न ऐसा।"

"अगर तू ऐसा करेगा तो हां मैं भी करूंगी।" अनीता ने गर्दन घुमा कर मेरी आंखों में देखा।

"मैं तो पक्का करूंगा अनीता।" मैंने कहा─"तुझे भरोसा न हो तो आजमा के देख ले।"

"मुझे भरोसा है तुझ पर।" 

ऐसी ही मीठी मीठी बातें करते हुए हम दोनों थोड़ी देर में खेत पहुंच गए। वहां पर मझले काका खेतों से पुल्लियां उठा उठा कर खलिहान में इकट्ठा कर रहे थे। अभी सिर्फ वो ही थे खेत में। 

"और कोई नहीं आया क्या काका।" मैंने उनसे पूछा।

"आते ही होंगे करेजा।" काका ने कहा─"तू एक काम कर जरा आमों की तरफ का चक्कर लगा ले। थोड़ी देर पहले मैंने दो तीन लड़कों को देखा था वहां...फिर जा के भगाया उनको।"

"ठीक है काका।" मैंने कहा─"मैं एक चक्कर लगा के आता हूं...चल अनीता।"

मैं और अनीता आमों की तरफ चल पड़े। 

"अच्छा हुआ काका ने हमें आमों का चक्कर लगाने के लिए कह दिया।" थोड़ी दूर चलने के बाद सहसा अनीता ने कहा─"अब हम दोनों आराम से वहां छांव में बैठ के नमकीन गुड़ खाएंगे। किसी को पता भी नहीं चलेगा...हां।"

"तू हर वक्त नमकीन गुड़ को ही याद करती रहती है क्या।" मैं हंसते हुए बोला─"घर से चलते समय भी तुझे इसकी याद आ गई थी तो तू उल्टे पैर भाग कर अन्दर इन्हें लेने चली गई थी और अब यहां फिर से इसी की बात।"

मेरी बात सुन कर अनीता झेंप गई और शर्मा कर मुस्कुराने लगी।

"वैसे एक बात कहूं।" मैंने धड़कते दिल से कहा─"तू जब शर्माती है तो और भी अच्छी लगती है।"

"धत्त...क्या बोलता है।" अनीता मेरी बात सुन और ज्यादा शर्मा गई। उसके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों पर बहुत ही गहरी मुस्कान उभर आई थी।

"ले..अब मैं अपनी प्यारी बहन की तारीफ भी न करूं।" मैंने मुंह बनाया तो वो हंस पड़ी।

"अच्छा तो तू इस तरह मेरी तारीफ कर रहा है।" वो मुस्कुराते हुए बोली।

"हां और क्या।" मैंने कहा─"तुझे अच्छा नहीं लगा तो बता दे...नहीं करूंगा अब से।"

"मैंने ये नहीं कहा कि मुझे अच्छा नहीं लगा।" अनीता ने कहा─"बल्कि मुझे तो बहुत अच्छा लग रहा है कि मेरा भाई मेरी तारीफ कर रहा है।"

"देख आदमी तारीफ उसी की करता है जो सुंदर और प्यारा होता है।" मैंने जैसे उसे शीशे में उतारा─"तू सुंदर और प्यारी है इस लिए तेरी तारीफ कर रहा हूं।"

"अच्छा क्या सच में।" अनीता पहले तो चौंकी फिर थोड़ा शर्माते हुए बोली─"मतलब क्या सच में मैं तुझे सुंदर और प्यारी दिखती हूं।"

"हां तू बहुत प्यारी है और सुंदर भी।" मेरा दिल जोरों से धक धक करने लगा─"और जब तू इस तरह शर्माती है तो और भी अच्छी लगती है।"

"धत्त....चुप कर तू।" अनीता अपनी तारीफ से खुश तो बहुत हुई लेकिन शर्माने की बात से उसे शर्म आने लगी।

"अच्छा चल छोड़ इस बात को।" मैंने बात बदली─"तू इस तरफ देख...मैं उस तरफ देख लेता हूं।"

अनीता को बोल कर मैं दूसरी तरफ वाले पेड़ों की तरफ बढ़ चला। तभी एक तरफ दो तीन लड़के थोड़ा दूर खड़े नजर आए। वो हमारे आमों की तरफ ही देख रहे थे। जैसे ही उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो वो तीनों उल्टे पैर भाग खड़े हुए वहां से। जमीन पर आम के कुछ पत्ते गिरे पड़े थे। जाहिर है जब दोपहर में यहां कोई नहीं था तब कोई न कोई अमिया चोर यहां अमिया झोरने आया था।

"सुबह के वक्त जब हम दोनों यहां आए थे तब ये पत्ते नहीं थे न।" तभी अनीता मेरी तरफ आते हुए बोली─"लगता है दोपहर में किसी ने अमिया झोरी हैं।"

"सही कहा।" मैंने दूर एक तरफ हाथ से इशारा कर कहा─"देख उधर...वो लड़के यहां अमिया झोरने की फिराक में ही थे। अभी जब उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो देख साले कैसे भागे जा रहे हैं।"

"हां सही कह रहा है तू।" अनीता उस तरफ देखते हुए बोली─"तीन जने दिख रहे हैं। मतलब अब दोपहर में भी यहां किसी न किसी को आम ताकने के लिए रहना होगा। तभी बचेंगे आम...नहीं तो ये लोग सब झोर डालेंगे।"

"कल से मैं खा पी कर आ जाया करूंगा यहां।" मैंने कहा─"फिर देखता हूं कैसे ये साले अमिया झोरते हैं।"

"मैं भी तेरे साथ आऊंगी।" अनीता ने झट से कहा─"लाएगा न मुझे भी अपने साथ।"

"मां अगर आने देगी तो आ जाना।" मैंने कहा─"चल अभी तो तुझे नमकीन गुड़ खाना है न।"

"अरे हां...मैं तो भूल ही गई थी।" अनीता आँखें फैला कर मुस्कुरा उठी─"चल जल्दी...नहीं तो बाकी लोग भी अगर आ गए तो हमें गहाई करने जाना पड़ेगा।"

मैं मुस्कुराते हुए उसके साथ उसी जगह पर आया जिस जगह पर सुबह बैठ कर हमने नमकीन गुड़ खाया था। अनीता ने कमर से अपना दुपट्टा छोरा और फिर उसके अंदर से नमकीन गुड़ हाथ में ले कर दुपट्टे को पेड़ की जड़ में रख दिया। उसके बाद बैठने के लिए जैसे ही वो झुकी सुबह की तरह फिर से उसके कुर्ते का गला फैल गया और उसके साथ ही अंदर पहनी सफेद कमीज का भी जिससे मुझे आधे से ज्यादा उसकी छातियां दिख गईं। पलक झपकते ही ये देख कर मेरे पूरे बदन में झुरझुरी दौड़ गई।

"अरे खड़ा क्यों है।" तभी वो बैठने के बाद बोली─"बैठ न जल्दी।"

मैं झट से बैठ गया। अब तक उसने अपनी गोंद में नमकीन और गुड़ वाले दोनों कागजों को खोल लिया था। मेरे देखते ही देखते उसने दोनों में से थोड़ा थोड़ा नमकीन गुड़ हाथ में लिया और फिर मेरे मुंह की तरफ बढ़ाया।

"ले पहले तू खा।" फिर उसने मुस्कुराते हुए कहा तो मैंने इस तरह मुंह खोल दिया जैसे अचानक मैं उसके सम्मोहन में फंस गया होऊं।

मुंह में नमकीन गुड़ चबाते हुए मैंने भी कागज़ों से नमकीन गुड़ हाथ में ले कर उसके मुख की तरफ बढ़ाया। पहले वो मुस्कुराई फिर धीरे से अपना मुंह खोल दिया तो मैंने आहिस्ता से उसके मुंह में नमकीन गुड़ डाल दिया।

"कितना अच्छा लग रहा है न।" वो मुंह चलाते हुए मगर मुस्कुरा कर बोली।

"हां।" मैंने कहा─"ऐसा लग रहा है जैसे हम दोनों प्रेमी हैं....है न।"

मेरी ये बात सुनते ही अनीता एकदम से चौंक पड़ी। उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं। नमकीन गुड़ चबाता हुआ उसका मुंह एकदम रुक गया।

"ये...ये क्या कह रहा है तू।" फिर उसने हैरानी से कहा─"क्या हम प्रेमी हैं।"

मुझे अपनी कही हुई बात का थोड़ा देर से एहसास हुआ और जब हुआ तो मैं खुद बुरी तरह चौंक पड़ा। एक ही पल में मेरी धड़कनें रुक सी गईं। समझ न आया कि अब क्या बोलूं। मैं जानता था कि अनीता भले ही मुझसे उमर में छोटी है लेकिन इतना तो उसे भी पता होगा कि प्रेमी प्रेमिका क्या होते हैं या किसे कहते हैं। उसके बाद जब उसने हैरानी से पूछा तो मुझे समझ ही न आया कि क्या बोलूं। मैंने खुद को सम्हाला और फटाफट कोई जवाब सोचने लगा।

"बता न राजू।" अनीता मुझे चुप देख बोली─"क्या सच में हम प्रेमी हैं। ऐसा कैसे कह सकता है तू।"

"अरे तो क्या हो गया।" मैंने अपनी बौखलाहट को छुपाते हुए कहा─"मैंने तो बस ऐसे ही कहा था। कह देने से हम प्रेमी थोड़े न हो जाएंगे।"

"पर राजू...तूने ऐसा कैसे कह दिया।" अनीता अपलक मुझे ही देखे जा रही थी।

"अरे पागल मैंने तो ऐसा बोल कर सिर्फ उदाहरण दिया था।" मैंने कहा─"क्योंकि सुना है प्रेमी लोग भी इसी तरह एक दूसरे को खिलाते पिलाते हैं।"

"क्या वो लोग सच में ऐसा करते हैं।" अनीता ने चकित भाव से पूछा।

"देख...मैंने तो नहीं देखा कभी।" मैंने कहा─"सिर्फ सुना है मैंने ऐसा....अब ये सच है या झूठ मुझे नहीं पता।"

"किससे सुना है तूने।" अनीता ने एकाएक मुझे घूरते हुए पूछा─"क्या तेरे उस दोस्त बबलू ने ये बताया है तुझे।"

"हां....और नरेश ने भी बताया था।" मैंने कहा─"नरेश को पहले पता नहीं था। उसने किसी से सुना था कि बहुत पहले कई ऐसे प्रेमी थे जो आज भले ही इस दुनिया में नहीं है मगर उनका प्रेम अमर है।"

"क्या सच में।" अनीता को यकीन न हुआ─"कौन थे वो।"

"उनका नाम....रुक याद करता हूं।" मैं अपने दिमाग पर जोर डालते हुए बोला─"हां याद आया...नरेश उन लोगों का नाम लैला मजनू....शीरी फरहाद और सोनी...माह....महिवाल हां सोनी महिवाल बताया था।"

"बड़ी अजीब बात है।" अनीता ने सिर खुजाते हुए कहा─"मैंने तो अब से पहले कभी ये नाम नहीं सुने।"

"छोड़ जाने दे न।" मैंने कहा─"और जल्दी से इसे खा कर चलते हैं यहां से।"

"हां ठीक है।"

कहने के साथ ही अनीता और मैं फिर से नमकीन गुड़ खाने लगे। इधर मैं ये भी सोचने लगा कि क्या सच में अनीता को ऐसे प्रेमियों के बारे में कुछ पता नहीं है। और क्या उसे ये भी पता नहीं है कि प्रेम क्या होता है। तभी मुझे याद आया कि जब शुरू में मैंने उससे प्रेमी वाली बात कही थी तब वो एकदम चौंक पड़ी थी और कहने लगी थी मैं ऐसा कैसे कह सकता हूं। मतलब...मतलब वो थोड़ा बहुत जानती है कि प्रेमी क्या होता है या प्रेम क्या होता है। मैं सोचने लगा कि इस बारे में उसे कितना पता होगा। वैसे मुझे भी तो ज्यादा पता नहीं है। बस उतना ही पता है जितना नरेश और बबलू ने बताया था।

"अच्छा सुन न।" तभी अनीता ने चुप्पी तोड़ी─"क्या तुझे पता है प्रेम क्या होता है।"

"मुझे कैसे पता होगा।" मैंने सफेद झूठ बोला। असल में मैं उसे ये नहीं जताना चाहता था कि मैं इस बारे में जानता हूं क्योंकि हो सकता है कि इस बात से वो ये सोचने लगे कि मैं अभी जो कर रहा हूं उसके पीछे कहीं मेरा कोई उल्टा सीधा इरादा तो नहीं है। इस लिए बोला─"मुझे कैसे पता होगा भला....मैंने थोड़े न कभी किसी से प्रेम किया है।"

"अच्छा...जब तुझे नहीं पता है तो ये कैसे पता है कि प्रेम किसी से किया जाता है।" 

अनीता ने जब ये कहा तो मैं अंदर ही अंदर बुरी तरह चौंक पड़ा। अंजाने में मैं जो बोल गया था अनीता ने उसे ऐसा पकड़ा था कि मैं सोच भी नहीं सकता था। खैर मैं भी इतना जल्दी मात खा जाने वाला नहीं था।

"क्योंकि ये बात मुझे उन्हीं दोनों से पता चली थी।" मैंने कहा─"उन्होंने ही बताया था कि प्रेम दो लोगों में होता है और वो दो लोग एक दूसरे से प्रेम करते हैं।"

"अच्छा तो कैसे करते हैं वो प्रेम।" अनीता ने पूछा।

"मुझे नहीं पता।" मैं सच में प्रेम के ज्ञान से पूरा परिचित नहीं था इस लिए बोला─"और मैंने पूछा भी नहीं उनसे। तू ही बता....क्या तुझे पता है इसके बारे में।"

"मुझे पता होता तो तुझसे क्यों पूछती बुद्धू।" अनीता कह कर हंस पड़ी।

"क्या सच में तुझे नहीं पता।" मैंने संदेह की दृष्टि से उसे देखा।

"अब क्या कसम खा के बोलूं।" उसने मुझे घूरा।

"नहीं...छोड़ इस बात को।" कहने के साथ ही मैं उठ कर खड़ा हो गया─"बाकी का तू खा ले। मैं नहीं खाऊंगा....और थोड़ा जल्दी कर।"

"बस थोड़ा सा ही बचा है।" अनीता ने दोनों कागजों को गोंद से उठा लिया और फिर खड़े हो कर कहा─"ले थोड़ा सा तू ले ले और बाकी मैं खा लेती हूं।"

कुछ देर बाद हम दोनों हाथ मुंह साफ कर के खलिहान तरफ आ गए। मैंने मझले काका को बताया कि तीन लोग अमिया झोरने के फिराक में थोड़ा दूर खड़े थे।

मां के अलावा सब आ गए थे। श्यामू काका ने दोनों पाले में बैलों को जुएं में नध दिया था। इस लिए हम दोनों अपनी अपनी तरफ के पाले में जा कर बैलों को हांकने लगे।


जारी है...........
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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#53
भाग ~ १६




मैं और अनीता अपने अपने पाले में बैलों के पीछे चलते हुए गेहूं की गहाई कर रहे थे। श्यामू काका एक बड़ा सा लट्ठ लिए गेहूं को किनारों से ठेल कर वापस पाले में बैलों के नीचे उछाल दे रहे थे। इधर मैं और अनीता बार बार एक दूसरे को देखते और यूं ही मुस्कुरा उठते। मैं ये तो जानता था कि मुझे अपनी छोटी बहन का साथ अच्छा लगने लगा है और हमारे बीच जो चल रहा था उससे मुझे एक अलग ही सुखद अनुभूति हो रही थी इसी लिए उससे नजरें मिलने पर मैं मुस्कुरा उठता था। मगर मैं ये नहीं समझ पा रहा था कि अनीता क्यों मुझे देख के मुस्कुरा उठती थी। मैं जानना चाहता था कि उसके मन में क्या है। क्या वो भी मेरी तरह वही महसूस कर रही है जो मैं महसूस कर रहा हूं।

खैर शाम ढलने से पहले ही काका के कहने पर गहाई रोक दी हम दोनों ने। थोड़ी देर में मां, दोनों काकी और दशरथ काका हमारे तरफ आए। काका ने कहा कि कल से सुनीता और रानी भी आएंगी और गहाई में हमारी मदद करेंगी। इसके साथ ही बारी बारी से हमें आमों को भी ताकना होगा।

उसके बाद हम घर जाने लगे। बापू और दोनों काका अभी खेतों पर ही थे जबकि बाकी हम सब घर की तरफ चल पड़े थे। मैं और अनीता आगे आगे चल रहे थे जबकि मां और दोनों काकी एक साथ पीछे पीछे बातें करते हुए आ रहीं थी।

"क्या हुआ।" अनीता को धीरे चलता देख मैंने पूछा─"चला नहीं जा रहा क्या तुझसे।"

"पांव दुख रहे हैं राजू।" उसने मेरी तरफ देख के कहा─"बहुत थक गई हूं...सच्ची में।"

"थक तो जाएगी ही।" मैंने कहा─"दोनों जून घंटों बैलों के पीछे चलना जो पड़ता है। तू कहे तो अपने कंधे में लाद लूं तुझे।"

"क..क्या???" अनीता ने चौंक कर कहा─"मां देखेगी तो मुझे ही डांटेगी।"

"कुछ नहीं बोलेगी।" मैंने कहा─"और अगर कुछ बोलेगी तो कह दूंगा कि तू थक गई है इस लिए मैंने खुद तुझे अपनी पीठ पर बैठा लिया है।"

"नहीं...रहने दे।" अनीता ने कहा─"तू भी तो बहुत थक गया है। वैसे भी घर अब ज्यादा दूर नहीं है। मैं चल लूंगी।"

"ठीक है।" मैंने कहा─"मैं रात में तेरे पांव दबा दूंगा तो तुझे आराम मिल जाएगा।"

"ये क्या कह रहा है तू।" अनीता ने हैरानी से देखा─"तू मेरे पांव दबाएगा???"

"हां तो क्या हुआ।" मैंने कहा─"तू मेरी छोटी बहन है...मेरी प्यारी बहन है। थक गई है तो इतना तो कर ही सकता हूं मैं। वैसे भी तुझे प्यार करता हूं तो तुझे दर्द में कैसे देख सकता हूं मैं।"

अनीता हैरानी से एकटक देखने लगी मुझे। इधर मेरा दिल फिर से धक धक करने लगा।

"नहीं राजू।" फिर उसने कहा─"तू मेरे पांव दबाएगा तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा।"

"क्यों।" 

"बस ऐसे ही।"

"पर मैं तो अपनी प्यारी बहन के पाव दबाऊंगा।" मैंने कहा─"और हां सुन...मुझे अच्छा लगेगा ऐसा करने से।"

"तो फिर मैं भी तेरे पांव दबाऊंगी।" अनीता ने एक नजर पीछे पीछे आ रहीं मां और दोनों काकी पर डालने के बाद कहा─"मैं भी तुझसे प्यार करती हूं। मैं भी तुझे दर्द में नहीं देख सकूंगी।"

"वैसे कितनी अजीब बात है न।" मैंने धड़कते दिल से वो बोला जो एकाएक ही मैं महसूस करने लगा था─"मतलब कि हम एक दूसरे से प्यार करते हैं इस लिए एक दूसरे का पाव दबाने को बोल रहे हैं...है न।"

"हां ये तो तूने सही कहा।" अनीता हल्के से चौंकी।

"इसका मतलब।" मैंने कहा─"अगर हमारे बीच ये प्यार न हो तो हम एक दूसरे के लिए ऐसा कर ही नहीं सकते...है न।"

"ह..हां शायद तू ठीक कह रहा है।" अनीता को भी जैसे ये एहसास हुआ─"तो क्या इस प्यार की वजह से हम ऐसा करने को बोल रहे हैं।"

"हां।" मैंने कहा─"और तुझे पता है वो नरेश क्या बोल रहा था।"

"क्या।"

"कह रहा था कि प्यार में लोग ऐसे ही काम करते हैं।" मैंने कहा─"मतलब कि दोनों लोग एक दूसरे के लिए ही सोचते हैं और एक दूसरे की खुशी के लिए कुछ भी करते हैं।"

"क्या सच में।" अनीता को आँखें फैली।

"हां।" मैंने सिर हिलाया─"मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था उसकी बात का। पर अब जब हम दोनों एक दूसरे के लिए ये सब करने को कह रहे हैं तो लग रहा है कि शायद वो सच कह रहा था।"

"हाय दय्या...इसका तो ये मतलब हुआ न राजू कि हम दोनों प्रेमी हैं।" अनीता की आँखें आश्चर्य से फट पड़ीं।

"ये...ये तू क्या कह रही है।" मैं खुद भी चकित हो उठा─"हम प्रेमी कैसे हो सकते हैं।"

"अरे तू ही तो बता रहा है कि नरेश प्रेमियों के बारे में ऐसा ऐसा बोल रहा था।" अनीता ने कहा─"और अब ये भी बता रहा है कि प्रेमी लोग ही एक दूसरे के लिए ऐसा कहते और करते हैं। तो जब हम भी वैसा ही एक दूसरे को कह रहे हैं और एक दूसरे के लिए करने को कह रहे हैं तो प्रेमी ही हुए न।"

"पर हम तो भाई बहन हैं न।" मैं उलझ सा गया─"और हमारा प्यार भाई बहन वाला है।"

"हां ये तो है।" अनीता के चेहरे पर सोचो के भाव उभर आए─"तो फिर हम दोनों वैसा ही एक दूसरे के लिए क्यों कर रहे हैं जैसे प्रेमी लोग एक दूसरे के लिए करते हैं।"

"मुझे क्या पता।" मैं सच में थोड़ी दुविधा में पड़ गया─"लगता है इस बारे में मुझे नरेश और बबलू से पूछना पड़ेगा। उन्हें पता होगा कि हम दोनों एक दूसरे के लिए वैसा ही करने को क्यों बोल रहे हैं जो प्रेमी लोग एक दूसरे को बोलते हैं।"

"न..नहीं जाने दे।" अनीता ने कहा─"तू उनसे इस बारे में कोई बात नहीं करेगा और न ही तू उनसे मिलेगा। तूने मुझसे वादा किया है न कि तू अब से उनका साथ नहीं करेगा।"

"हां मुझे याद है।" मैंने कहा─"लेकिन फिर ये कैसे पता चलेगा कि हम एक दूसरे के लिए ऐसा क्यों करने को बोल रहे हैं।"

"हां तो क्या हो गया।" अनीता ने कहा─"ये जानना जरूरी है क्या। वैसे भी श्यामू काका ने बताया था कि ये सब भाई बहन के बीच का प्यार होता है...हां राजू...काका की बात ही सच होगी क्योंकि काका उमर में नरेश और बबलू से बड़े हैं तो जितना काका को पता होगा उतना उन्हें थोड़े न पता होगा।"

"शायद तू सही कह रही है।" मैंने सहमति में सिर हिला कर कहा─"खैर जाने दे इस बात को। मैं तो इतना जानता हूं कि तू मेरी बहन है और मैं तुझे बहुत प्यार करता हूं। तेरी खुशी में ही मेरी खुशी है...हां।"

"मैं भी तुझसे बहुत प्यार करती हूं।" अनीता भला कहां पीछे रहने वाली थी─"तेरी खुशी में ही मेरी खुशी है। अगर तू मेरे लिए कुछ भी कर सकता है तो मैं भी तेरे लिए कुछ भी कर सकती हूं...हां।"

"अरे राजू बेटा सुन तो।" तभी पीछे से मां ने पुकारा।

मैं और अनीता अपनी जगह पर रुक गए और पलट कर मां को देखने लगे। दोनों काकी अपने अपने घर की तरफ मुड़ गईं थी और मां अकेले ही हमारे पीछे आ रही थी।

"क्या हुआ मां।" वो जैसे ही पास आई तो मैंने पूछा।

"घर चल... लाला की दुकान से कुछ सामान मंगवाना है।" मां ने कहा─"घर में मसाले खत्म हो गए हैं। तुझे कुछ पैसे दूंगी तो ले आना।"

"ठीक है मां।"

थोड़ी देर में जब हम घर पहुंचे तो मां ने संदूक से निकाल के कुछ पैसे दिए मुझे और बताया कि क्या क्या सामान लाना है। पैसे ले कर मैं लाला की दुकान की तरफ दौड़ गया। दुकान से ला कर मैंने सारा सामान मां को पकड़ाया और फिर आंगन में खाट बिछा कर उसमें आराम करने लगा। अनीता भी मेरे पास आ कर बैठ गई।

"नहाने नहीं गई तू।" मैंने पूछा उससे।

"पसीना तो सुखा लूं।" उसने कहा─"ऐसे नहाने लगूंगी तो नुकसान कर देगा।"

"हां ये तो है।"

"अच्छा..पांव दबा दूं तेरे।" 

"न..नहीं।" मैं हल्के से चौंका─"बापू ने देख लिया तो बहुत डांटेंगे।"

"पर बापू तो अभी आए ही नहीं।"

"हां पर कभी भी आ सकते हैं।"

"एक काम कर।" अनीता ने कहा─"अंदर कमरे में चल। वहीं दबा दूंगी तेरे पांव।"

"अरे रहने दे पागल।" मैं उठ कर बैठ गया─"तुझे इतना परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। खा पी के रात में सोना ही है। रात भर जब अच्छे से सोऊंगा तो सब ठीक हो जाएगा।"

अनीता मुझे एकटक देखने लगी। उसके चेहरे पर संसार भर की मासूमियत उभर आई थी। गर्मी के कारण उसके चेहरे पर पसीने की हल्की बूंदें झिलमिला रहीं थी। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा। मेरा मन किया कि आगे बढूं और उसे चूम लूं।

"तू भूल रहा है कि हमारे बीच क्या बातें हुईं थी।" फिर उसने कहा─"हमने फैसला किया था कि एक दूसरे की हर बात मानेंगे और एक दूसरे के दर्द को दूर करेंगे।"

"हां मुझे याद है।" मैंने सिर हिलाया─"पर यार मुझे अच्छा नहीं लगेगा कि मेरी प्यारी बहन मेरे पांव दबाए।"

"क्यों अच्छा नहीं लगेगा।"

"बस ऐसे ही।" मैंने कहा─"पांव तो वो दबाती है जो नौकरानी होती है। तू मेरी नौकरानी थोड़े न है....तू तो मेरी बहन है...मेरी जान है।"

"अच्छा।" उसके चेहरे पर चमक उभरी।

"और नहीं तो क्या।" मैं मुस्कुरा उठा─"मैं भले ही तेरे पांव दबाऊं चलेगा...लेकिन तू मेरे पांव दबाए ये मुझे अच्छा नहीं लगेगा।"

अनीता बड़े गौर से देखने लगी मुझे। उसके चेहरे पर एकाएक कई सारे रंग आते जाते नजर आए। इधर मेरी धड़कनें फिर से तेज हो गईं थी। मैं समझ नहीं पाता था कि जब भी मैं उससे ऐसी बातें करता था तो मेरी धड़कनें क्यों बढ़ जाती हैं।

"बहुत अजीब बातें करता है तू।" फिर उसने मासूमियत से कहा─"लेकिन फिर भी मुझे बहुत अच्छ लगता जब तू मेरे लिए ऐसा बोलता है।"

"क्या सच में।" मैं एकदम अंदर ही अंदर खुश हो गया।

"हां राजू।" अनीता मुस्कुराई─"एक बात बताऊं....अभी तक मुझे तेरी ये बातें अजीब ही लगती थीं लेकिन अब तेरी बातें सुन के मुझे अच्छा लगता है। एक बात और...मेरा मन करता है कि तू ऐसी ही बातें करे और मैं बस सुनती जाऊं।"

"तो ठीक है फिर।" मैं खुश हो कर बोला─"अब से मैं तुझसे ऐसी ही बातें करूंगा।"

"हां।" अनीता भी खुशी से मुस्कुराई।

"तू भी मुझसे ऐसी बातें करेगी न।"

"पर मेरे से तो तेरे जैसी बातें करना आएगा ही नहीं।" अनीता एकाएक मायूस सी हो गई।

"इसमें कौन सी बड़ी बात है।" मैंने कहा─"मुझे भी तो नहीं आता....पर मैं वही बोलता हूं जो अंदर से मेरा दिल कहता है। मतलब तेरे साथ रहने से मुझे जो जो महसूस होता है वहीं बोलता हूं।"

"अच्छा।" अनीता की आँखें हैरानी से फैलीं─"फिर मैं भी ऐसा ही करुंगी...हां।"

"अरे अनीता।" तभी मां ने आवाज लगाई─"अब बैठी ही रहेगी या नहाने भी जाएगी।"

"हां मां जा रही हूं।" अनीता ने ऊंचे स्वर में मां से कहा फिर मुझसे सामान्य स्वर में बोली─"चल तू भी चलेगा नहाने।"

"हां चल।"

हम दोनों खुशी खुशी चल पड़े कुएं की तरफ। मां नहा चुकी थी इस लिए कुएं में अब कोई नहीं था। मैं और अनीता जल्दी ही घर के पीछे कुएं में पहुंच गए।

"तू अपने कपड़े उतार।" अनीता ने रस्सी बाल्टी उठाते हुए मुझसे कहा─"तब तक मैं पानी खींचती हूं...और हां तू रोकेगा नहीं मुझे। मेरा जब तक मन करेगा तब तक नहलाऊंगी तुझे।"

"ठीक है पर यदि हमें देर हुई और मां ने गुस्सा किया तो।" मैंने कपड़े उतारते हुए कहा।

"तेरे लिए थोड़ी सी डांट खा लूंगी।" अनीता मुस्कुराई─"जैसे हमेशा खाती हूं...ही ही ही।"

मैं समझ गया कि वो अब वही करेगी जो उसने कहा है। असल में वो भी वही करने लगी थी जो अब उसका दिल कह रहा था।

मैं पत्थर के चौड़े पाट पर बैठ गया। कुछ ही देर में अनीता ने कुएं से पानी खींचा और उसे लिए मेरी तरफ आई।

"चल बापू की तरह हर हर गंगे बोल।"

जैसे ही उसने मेरे सिर पर पानी डालना शुरू किया मैं हर हर गंगे बोलते हुए दोनों हाथों से अपना बदन मलने लगा। इस वक्त कुएं का शीतल और ठंडा पानी बदन में पड़ने से बड़ा ही आनंद आ रहा था।

"अरे तू भी साथ साथ नहा ले न।" मैंने एकाएक उठ कर उससे कहा─"ऐसे में एक ही समय पर हम एक साथ नहा लेंगे वरना अगर देर हुई तो मां डांटेगी।"

"हां ये तो सही कह रहा है तू।" अनीता को मेरी बात सही लगी इस लिए वो सहमत हो गई।

"ला दे बाल्टी।" मैंने उसके हाथ से बाल्टी लेते हुए कहा─"चल अब तू बैठ मैं पानी खींचता हूं।"

अनीता ने मजबूरन बाल्टी मुझे पकड़ा दी और जा कर पाट पर बैठ गई।

"मेरे सिर पर पानी मत डालना तू।" फिर उसने कहा─"कल दोपहर को मूड़ धोऊंगी मैं।"

"ठीक है।" 

जल्दी ही मैंने कुएं से पानी खींचा और फिर जा कर अनीता का सिर बचा के उसके ऊपर डालने लगा। अनीता फटाफट दोनों हाथ चला कर अपना बदन मलने लगी।

"राजू कितना मस्त लग रहा है।" जैसे ही बाल्टी का पानी खत्म हुआ तो उसने खुशी से कहा─"लगता है बस नहाती रहूं।"

"हां तो तू नहा न।" मैंने दुबारा कुएं पर बाल्टी डालते हुए कहा─"मैं पानी खींच खींच के तुझे भी अच्छे से नहला दूंगा और खुद भी नहा लूंगा।"

"पर मुझे अच्छा नहीं लगेगा राजू।" अनीता ने कहा─"मुझे भी पानी खींचने दे न।"

"नहीं अभी तू नहा।" मैंने कहा─"तू मुझे कल नदी में जितना चाहे नहलाना लेकिन कुएं से पानी मैं ही खींचूंगा।"

मैंने जल्दी से बाल्टी बाहर खींची और जा कर अनीता को नहलाया। उसके बाद एक और बाल्टी पानी खींचा और फिर उसे पाट के पास रख मैं खड़े खड़े ही अपने बदन पर माटी लगाने लगा। इधर अनीता पत्थर के पाट पर अपनी एड़ियां घिसने लगी थी।

पूरे बदन में और सिर में माटी लगाने के बाद मैंने बाल्टी के पानी को पूरा सिर से डाल लिया। एक ही बार ही आधे से ज्यादा माटी मेरे बदन से उतर गई। उसके बाद मैंने फिर से पानी खींचा और फिर से उसे सिर पर डाल लिया।

"बैठ के नहा न।" अनीता ने कहा─"तेरा आधा पानी तो मेरे ऊपर ही गिर जा रहा है।"

"तूने माटी नहीं लगाया क्या।" मैंने अनीता से पूछा।

"तेरे सामने थोड़े न लगाऊंगी।" अनीता मुस्कुराई और थोड़ा लजाई भी─"तेरी तरह अपने कपड़े उतार कर बदन में माटी नहीं लगा सकती।"

"अच्छा।" मैं बोला─"फिर कैसे लगाएगी।"

"तू नहीं होता तो कुर्ता उतार देती।" अनीता ने कहा─"फिर लगाती।"

"मतलब मैं न होता तो पूरा नंगी हो जाती तू।" मैंने हैरानी से आँखें फैला कर उसे देखा।

"नहीं...पागल है क्या तू।" अनीता ने चौंक कर कहा─"मैं नंगी थोड़े न होती।"

"तूने ही तो कहा कि कुर्ता उतार देती।"

"हां तो उसके अंदर मैं कमीज पहनती हूं।" अनीता फिर थोड़ा लजाई─"कुर्ता उतार देती और कमीज पहने रहती। उससे माटी लगाने में आसानी होती है।"

"अगर ऐसा है तो तू अभी भी तो अपना कुर्ता उतार सकती है।" मैंने एकदम से भोलापन दिखाया─"कमीज तो तू पहने ही है...उसमें क्या है। अच्छे से माटी लगा के नहा ले...तभी अच्छा महसूस होगा। गर्मी से जो पसीना बहता है उस तरह में वो भी अच्छे से बदन में से छूट जाएगा। वरना ऐसे ही गंध मारता रहेगा।"

"नहीं...मैं तेरे सामने कुर्ता नहीं उतार सकती।" अनीता बोली─"समझा कर बुद्धू।"

"अब इसमें समझना क्या है भला।" मैंने नासमझने का नाटक किया─"कमीज तो तू पहने ही रहेगी न तो फिर क्या समस्या है।"

"ऐसा तुझे लगता है।" अनीता ने घूर कर देखा मुझे─"पर मुझे तो पता है कि समस्या क्या है। अब चल ये बातें छोड़ और पानी खींच...या मुझे ही बाल्टी दे...मैं खींचती हूं।"

"क्या यार।" मैंने बुरा सा मुंह बनाया─"तेरे भले के लिए कह रहा हूं फिर भी मेरी बात नहीं मान रही तू। पहले तो बड़ा कह रही थी कि मेरी हर बात मानेगी और मेरे कहने पर कुछ भी करेगी।"

"अच्छा ठीक है।" अनीता कुछ पल सोच के बोली─"एक काम कर...जरा देख के आ बापू तो नहीं आए खेत से और मां को भी देख लेना वो क्या कर रही है।"

मुझे उसके कहने का मतलब तो समझ न आया लेकिन उसके कहने पर मैं झट अंदर की तरफ भागता हुआ गया। आंगन में नजर घुमाई....बापू अभी नहीं आए थे। फिर मैंने मां की तलाश में नजरें घुमाई तो वो मुझे रसोई में दिखी। रात के लिए खाना बनाने में लगी थी वो। मैं फौरन पलट कर वापस कुएं के पास आया।

"बापू तो अभी तक नहीं आए।" फिर मैंने अनीता को बताया─"और मां रसोई में खाना बनाने में लगी है। वैसे बापू और मां को देख आने के लिए क्यों कहा तूने।"

"वो इस लिए ताकि जब मैं कुर्ता उतार कर सिर्फ कमीज पहने रहूं तो उन दोनों में से कोई यहां आ न जाए। तू न होता तो मां के आने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन तेरे सामने अगर मैं सिर्फ कमीज में रहूंगी तो मां बहुत डांटेगी मुझे और बापू ने अगर मुझे ऐसे दिख लिया तो वो भी डांटेंगे। ऊपर से मुझे बहुत लाज भी आएगी जिससे मैं बापू से नजरें न मिला सकूंगी फिर।"

"अच्छा तो ये बात है।" मैं समझते हुए बोला─"पर अभी तो बापू आए ही नहीं हैं और मां रसोई में खाना बनाने में लगी हुई है इस लिए तू आराम से कुर्ता उतार सकती है न।"

"अब तूने कहा है तो तेरे कहने पर उतारना ही पड़ेगा मुझे।" अनीता ने थोड़ा शर्माते हुए कहा─"लेकिन तू मुझसे वादा कर कि ये बात तू भूल कर भी किसी को नहीं बताएगा।"

"हां ठीक है नहीं बताऊंगा।" मेरी धड़कनें ये सोच कर एकाएक तेज हो गईं कि अनीता सच में मेरे कहने पर अपना कुर्ता उतारने वाली है। 

मेरे वादा करते ही अनीता ने बैठे बैठे ही अपने कुर्ते को उतारना शुरू कर दिया। उसका चेहरा एकाएक शर्म से सुर्ख पड़ने लगा था। लेकिन चेहरे पर वैसे भाव नहीं थे जैसे उस दिन नदी पर उसके द्वारा कुर्ता उतारे जाने पर उभर आए थे। उस दिन वो मेरे कहने पर कुर्ता उतारने तो लगी थी लेकिन उसके चेहरे पर मजबूरी और बेबसी साफ दिखने लगी थी। बाद में मेरे रोक देने पर वो जाने क्या सोचते हुए मुझसे लिपट कर रोने लगी थी।

खैर मैं धड़कते दिल के साथ उसे ही देखे जा रहा था। थोड़ी ही देर में जब कुर्ता थोड़ा ऊपर हो गया तो मुझे फिर से उसका पेट दिखने लगा। मेरी धड़कनों के साथ साथ मेरी सांसें भी तेज होने लगीं। एकाएक मुझे होश आया तो मैं ये सोच कर झट से कुएं में बाल्टी डालने लगा कि कहीं अनीता ये न सोच बैठे कि मैंने गलत नीयत से उसे करता उतारने के लिए कहा है और अब उसे कुर्ता उतारते हुए यूं एकटक देख भी रहा हूं।

जब मैं कुएं से पानी खींच कर पलटा तो देखा अनीता अपने कुर्ते को उतार कर एक तरफ रख रही थी। अब उसके ऊपरी बदन पर सिर्फ सफेद रंग की कमीज थी जो गीली हो चुकी थी और अब उसके सीने और पीठ पर चिपकी हुई थी। ये देख कर मुझे थोड़ा झटका सा लगा और मेरे अंदर हलचल भी मच गई। 

कुछ साल पहले तक मैंने उसे ऊपर से नंगा देखा था लेकिन पिछले कुछ सालों से मैंने कभी इस तरह कमीज में भी नहीं देखा था। जाहिर है वो भी मेरी तरह जवान हो चुकी थी। अब क्योंकि मैं एक लड़का था तो मेरी जवानी सिर्फ कच्छा उतार दिए जाने पर ही लोगों को दिखाई देती जबकि अनीता एक लड़की थी तो उसकी जवानी सीने में उभरे उभारों से लोगों को उसके कपड़ों के ऊपर से भी नजर आ जाती है। 

खैर मैंने खुद की हालत को किसी तरह सामान्य किया और आगे बढ़ कर उसके करीब आया।

"उतार लिया....चल अब मैं पानी डाल रहा हूं तेरे ऊपर।" मैंने सामान्य भाव से ही कहा ताकि उसे अटपटा न लगे और वो मेरे सामने खुद को सामान्य बनाए रख सके─"उसके बाद तू भी जल्दी से माटी लगा लेना।"

कहने के साथ ही मैं उसके सामने खड़ा हो कर बाल्टी का पानी उसका सिर बचा कर उस पर डालने लगा। न चाहते हुए भी अनीता अपने हाथों को बदन के अलग अलग हिस्सों पर मलने से रोक न सकी। इस चक्कर में उसका सीना मेरे सामने खुल सा गया और मैंने उसके दुधिया उभारों को स्पष्ट रूप से कमीज में देखा। सफेद रंग की पतली सी कमीज थी वो। पानी में गीला हो जाने से कमीज पूरी उसके उभारों पर चिपक गई थी जिससे उसके भूरे रंग के चूचक साफ दिखने लगे थे।

मैं लगातार पानी की धार उसके ऊपर डाले जा रहा था और मेरी निगाहें उसके सीने के उन चूचकों पर जमी थीं। अनीता का सारा ध्यान अपना बदन मलने पर था। इस बीच कई बार उसकी हथेली और उसकी कलाई उसकी छातियों से टकराई जिससे वो अजीब तरह से इधर उधर हिले और पिचके। पलक झपकते ही मेरे पूरे बदन में सनसनी दौड़ गई। कच्छे के अंदर कैद मेरे लंड में हलचल होने लगी। तभी बाल्टी का पानी खत्म हो गया और अच्छा हुआ कि मुझे होश भी आ गया वरना निश्चित ही अनीता मुझे अपनी छातियों पर घूरते हुए देख लेती। उसके बाद ये भी निश्चित था कि वो असहज हो जाती और वो ये भी सोच बैठती कि मेरे मन में उसके प्रति इस वक्त क्या चल रहा है।

"चल अब तू माटी लगा।" मैं बाल्टी ले कर फिर से कुएं की तरफ बढ़ चला─"तब तक मैं पानी खींच के खुद नहा रहा हूं।"

मेरे अच्छे और सामान्य बर्ताव को देख अनीता काफी ज्यादा सहज दिख रही थी और अब उसका शर्माना भी कम हो गया था। हालांकि उसने अपनी छातियों को छुपाने के लिए अपने दोनों घुटनों को छातियों से चिपका लिया था। खैर जैसे ही मैं कुएं में बाल्टी डालने लगा तो उसने पास ही रखी माटी को झट अपनी उंगलियों से कुरेद कर लिया और फिर उसे जल्दी जल्दी अपनी दोनों हथेलियों में घिस कर उसका पानी मिश्रित गाढ़ा घोल जैसा बनाया और फिर बाकी बची माटी को अपने पास ही रख उस घोल बन चुकी माटी को अपने बदन में लगाना शुरू कर दिया। पहले उसने दोनों हाथों पर लगाया। चेहरे पर लगाया और फिर एक नजर मेरी तरफ देखा। मैं पानी खींचने में लगा हुआ था। ये देख उसने झट से बाकी बचा घोल अपने पेट और कमीज के अंदर हाथ डाल कर छातियों पर लगाया। फिर थोड़ा कमर और पीठ पर लगाने की कोशिश की।

मतलब जबतक मैं कुएं से पानी खींच कर वापस उसके पास आया तब तक में उसने ये सारी क्रिया कर ली थी। जाहिर है वो मेरे सामने उस माटी को कमीज के अंदर हाथ डाल कर अपनी छातियों पर नहीं लगा सकती थी क्योंकि ऐसा करने से उसे लाज आती और उसकी समझ के अनुसार उसकी छातियां मुझे नजर आ जातीं।


जारी है.............
Read my story 

हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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#54
(19-01-2026, 08:38 AM)Rajan Raghuwanshi Wrote: This story is completely rooted in the village and it will showcase every aspect of the rural landscape.
The atmosphere, customs, language and lifestyle are all village-like. My goal is to make every scene and every aspect of this story reflect the way villegers lived and lived in ancient times.

Anyway.... कहानी के बारे में आपने जिन सुंदर शब्दों के द्वारा अपनी प्रतिक्रिया दी है और जिस तरह से मेरा उत्साह बढ़ाया है उससे मुझे बेहद खुशी हुई है। यूं समझिए कि मैं आपके इस रिव्यू से charge हो गया हूं। इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूं कि कहानी में थोड़ा सस्पेंस और पेसिंग हो सकती थी पर ऐसा इस लिए नहीं है कि राजू अभी कुछ मामलों में अनाड़ी है। जैसे जैसे उसे ऐसी चीजों की समझ आएगी या ये कहें कि मैच्योर होगा उससे उसका किरदार या बर्ताव भी बदलता जाएगा। और इसी के साथ उसके डीप इनसाइट में क्या चल रहा है पता चलेगा। आशा है आप सहमत होंगे और समझ भी गए होंगे।

राजू का अपनी बहन के साथ जो रिलेशन डेवलप हो रहा है उसके बारे में अभी उन्हें खुद पूरा पता नहीं है। हम उमर होने के कारण और अपोजिट जेंडर होने के कारण आकर्षण होना स्वाभाविक है। अभी स्पष्ट रूप से कुछ नहीं बताऊंगा क्योंकि उत्सुकता कम हो जाएगी। यही कहूंगा कि इंतजार कीजिए। 

आखिर में फिर से आपके इस रिव्यू के लिए धन्यवाद मित्र। उम्मीद है आप कहानी के हर भाग में ऐसी ही सुंदर प्रतिक्रिया दे कर मेरी हौसला अफजाई करते रहेंगे और मुझे ऊर्जा मिलती रहेगी।

अगला भाग बस थोड़ी ही देर में आ जाएगा।

Thank you
Whenever I get some free time from my busy work schedule, I will definitely come here to motivate you.
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#55
(19-01-2026, 03:42 PM)rajeev13 Wrote: Whenever I get some free time from my busy work schedule, I will definitely come here to motivate you.

Thank you brother
Read my story 

हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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#56
भाग ~ १७




मेरी धड़कनें बढ़ी हुई थीं और अंदर हलचल भी मची हुई थी लेकिन मैं अपने बर्ताव को और अपनी भावनाओं को उस पर जाहिर नहीं करना चाहता था इस लिए सामान्य भाव से पानी लिए मैं उसके पास आ गया।

"माटी लगा लिया तूने।" मैंने उससे पूछा─"अगर लगा लिया है तो बता...पानी डालूं तेरे ऊपर।"

"अभी रुक जा।" उसने हाथों पर लगी माटी को अच्छे से मलते हुए कहा─"पहले इसे मल लूं फिर डालना पानी। तब तक तू नहा न।"

मैंने बाल्टी का पानी अपने ऊपर डाल लिया और फिर से कुएं में जा कर बाल्टी डालने लगा। मैं चाहता था कि अनीता पूरी तरह मुझसे सहज हो जाए ताकि अगर मेरे कहने पर उसे दुबारा कभी अपना कुर्ता उतारना पड़े तो उसे सोचना न पड़े और न ही कोई झिझक हो।

दुबारा जब पानी खींच कर आया तो अनीता अपने पूरे बदन में माटी मल चुकी थी। जैसे ही मुझे पानी लाता देखा तो उसने मुझे पानी डालने का इशारा किया। मैं आगे बढ़ कर उसके ऊपर पानी डालने लगा। वो फिर से अपने पूरे बदन में जल्दी जल्दी हाथ फेरते हुए गिरते पानी से माटी धोने लगी। इस चक्कर में एक बार फिर से मुझे उसकी छातियां स्पष्ट दिखने लगीं और उसके हाथों और कलाइयों से टकराने की वजह से अजीब तरह हिलते व पिचकते उसके दूध दिखने लगे। एक बार फिर से मेरा पूरा बदन सनसना उठा। कच्छे में कैद लंड में हलचल हुई।

"अब कैसा लग रहा है तुझे।" मैंने उसे सहज करने के लिए पूछा─"माटी लगा कर नहाने से अच्छा लग रहा है न।"

"हां राजू।" अनीता खुशी से बोली─"अब बहुत अच्छा लग रहा है। ये चिकनी माटी लगा कर नहाने से अब एकदम तरोताजा लग रहा है। एक बाल्टी और डाल दे न मेरे ऊपर।

"अभी ले।" मैं झट बोला─"अपनी प्यारी और सुंदर बहन के हर हुकुम का पालन करूंगा मैं।"

वो मेरी इस बात पर मुस्कुरा उठी। इधर मैं भी मुस्कुराते हुए कुएं से पानी खींचने लगा। थोड़ी ही देर में मैं पानी ले कर आया और उसके ऊपर डालने लगा। इस बार वो खुल कर अपने हाथ बदन पर घुमा फिरा रही थी। शायद अब वो सहज हो गई थी और उसकी शर्म भी दूर हो गई थी। ऐसा अक्सर होता है....शुरुआत में इस तरह का जब कोई काम करना होता है तो उसमें शर्म और झिझक महसूस होती ही है मगर एक बार जब ऐसा कर लिया जाता है तो सारी शर्म और झिझक दूर हो जाती है। 

अनीता के साथ यही हो रहा था। दूसरे, शायद वो ये भी सोचती रही होगी कि मैं कोई गैर मर्द या लड़का तो हूं नहीं....मतलब उसका अपना भाई ही हूं और जब मैं खुद ही कह रहा हूं ऐसा करने के लिए तो इतना क्या सोचना। तीसरी बात...उसे अपना प्यार भी तो साबित करना था....तो अगर ऐसा करने से प्यार साबित हो जाता है तो यही सही।

"मजा आ गया राजू।" बाल्टी का पानी खत्म हुआ तो उसने अपने चेहरे का पानी पोंछते हुए लेकिन खुशी से मुस्कुरा कर कहा─"मन तो अभी भी कर रहा है कि बस नहाती ही रहूं लेकिन देर होने से मां डांटेगी और बापू भी न आ जाएं कहीं इस लिए अब नहीं नहाऊंगी। एक काम कर तू....एक बाल्टी और पानी खींच दे ताकि मैं अपना ये कुर्ता धो लूं। फिर कुर्ता लपेट कर चली जाऊंगी।"

"ठीक है।" 

मैं जल्दी ही कुएं से पानी खींच कर लाया और उसके सामने रख दिया। उसने अपने कुर्ते को उठाया और इस बार बेझिझक मेरे सामने अपनी छातियों के इस तरह उजागर हो जाने की परवाह किए बिना कुर्ते को बाल्टी के पानी में डुबाया और उसे रगड़ने लगी। रगड़ने की क्रिया में उसकी छातियां हल्के हल्के हिलने लगीं। ये देख मेरे अंदर सिहरन होने लगी। कच्छे में कैद लंड फिर से हरकत करने लगा। मैं उसकी हिलती छातियों से नजर हटाने की पूरी कोशिश कर रहा था मगर अब जब वो मेरी आंखों के सामने ही थीं तो क्या करता। 

मन में कई तरह के खयाल उभर रहे थे। एक खयाल ऐसा था जो बार बार मुझे उकसा रहा था कि मैं इस बारे में कुछ बोलूं मगर मैं पूरी बेदर्दी से उस घटिया खयाल को दबा दे रहा था।

"अच्छा अनीता।" तभी एकाएक मैंने उससे पूछा─"अब से तू रोज मेरे साथ ऐसे ही नहाएगी न।"

"हां क्यों नहीं।" उसने सिर उठा कर मेरी तरफ देखा─"अगर इस तरह का मौका रोज मिलेगा तो जरूर नहाऊंगी...पर इससे तुझे ही तो मेहनत करनी पड़ेगी। मुझे तो तू पानी खींचने ही नहीं देता।"

"हां तो क्या हुआ।" मैंने भोलापन और अपना प्यार दिखाया─"तू मेरी छोटी बहन है। ऊपर से तुझे मैं बहुत प्यार करता हूं तो तुझे मेहनत कैसे करने दे सकता हूं। मैं चाहता हूं कि तू बस खुश रह और तेरे लिए मैं कुछ भी करूं।"

"राजू.... क्या सच में तू मुझसे बहुत प्यार करता है।" 

उसने पता नहीं क्या सोच कर ये पूछा। मैं समझ न सका लेकिन उसकी आँखें और उसका मासूम चेहरा इस वक्त अलग ही तरह की चमक बिखेर रहा था। मेरा दिल फिर से तेज तेज धड़कने लगा।

"क्या तुझे भरोसा नहीं है मुझ पर।" मैंने धड़कते दिल से पूछा।

"तू जो इतना कुछ मेरे लिए कर रहा है उससे तो यही लगता है कि तू सच में मुझसे यानी अपनी बहन से बहुत प्यार करता है।" अनीता ने कहा─"लेकिन जाने क्यों ऐसा भी लगता है कि ये बहुत अजीब है।"

"अ...अजीब क्यों लगता है तुझे।"

"पता नहीं।" अनीता ने कहा─"शायद उस लिए कि ये सब कुछ एकदम से होने लगा है। इसके पहले कभी तूने इतने प्यार से मुझसे बातें नहीं की और न ही कभी मेरे लिए इतना कुछ किया है।"

"हां समझता हूं मैं।" उसकी बात से मैं पूरी तरह सहमत था─"और सच कहूं तो मैंने भी कई बार ये सोचा है मगर हर बार यही खयाल आता है कि इसके पहले शायद मैं नासमझ था....बल्कि हम दोनों ही नासमझ थे। फिर जब श्यामू काका ने हमें वो सब बताया तो सोचने लगा कि उनकी बात भी सही है। मतलब हम झगड़ा करते हैं मगर सच में उस झगड़े में एक दूसरे के दुश्मन नहीं होते हम। हर भाई बहन में झगड़े होते हैं तो हम भी करते थे....पर इस झगड़े में दुश्मनी जैसी कोई बात नहीं होती थी। अगर कुछ था तो सिर्फ ये कि बिना झगड़ा किए हम दोनों को ही खुशी नहीं मिलती थी। बिना झगड़ा किए चैन ही नहीं मिलता था। तो जब काका के अनुसार ये हमारा आपस का प्यार ही है तो क्यों न इस प्यार को बिना कोई झगड़ा किए आगे बढ़ाया जाए। जिस प्यार से अंजान हो के हम दोनों आपस में झगड़ते थे उस प्यार के बारे में जान कर क्यों न अब हम प्यार से ही रहें....एक दूसरे से प्यार से बातें करें....एक दूसरे के सुख दुख को समझें। बस....जब ऐसे खयाल आए तो मैंने सोच लिया अब से यही करूंगा।"

"सही कह रहा है तू।" अनीता ने कहा─"माना कि ये थोड़ा अजीब लगता है मगर उससे भी ज्यादा ये अच्छा लगता है। और पता है....मेरा दिल करता है कि हम दोनों हमेशा ऐसे ही रहें....क्या कहता है तू।"

"मैंने तो सोच ही लिया है कि अब से हमेशा ऐसा ही रहूंगा और तुझसे कभी झगड़ा नहीं करूंगा।" मैंने कहा─"बाकी तू क्या करेगी ये तेरे ऊपर है। मैं तुझे किसी बात के लिए न तो कुछ बोलूंगा और न ही मजबूर करूंगा। मैं बस ये चाहता हूं कि अब से मेरी प्यारी बहन मुझसे खुश रहे।"

मेरी बात सुन कर अनीता अपलक देखने लगी मुझे। एकाएक उसकी आंखों में आंसू झलकने लगे। अचानक जाने उसे क्या हुआ कि वो एक झटके से खड़ी हो गई। उसे अपनी नग्नता का जरा भी खयाल न आया। फिर लपक कर मेरे करीब आई और एकदम से मुझसे लिपट गई।

"अरे....क्या हुआ।" मैं उसकी इस क्रिया से चौंक पड़ा।

"कुछ नहीं।" उसने मुझसे लिपटे हुए ही भारी गले से कहा─"बस मेरा मन किया कि तेरे सीने से लिपट जाऊं।"

उसकी गीली कमीज में कैद उसकी ठोस और हल्की मुलायम चूचियां मेरे सीने में धंस गईं थी। यहां तक कि उसके निप्पल साफ साफ मुझे महसूस हो रहे थे। ठंडे पानी में नहाने के कारण वो एकदम खड़े हो गए थे। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई नुकीली चीज मेरे सीने में चुभ गई हो। मेरा पूरा बदन थरथरा गया था। दिल की धड़कनें तो एक पल के लिए रुक ही गईं थी। एक सुखद अनुभूति हुई थी जिससे मेरी आँखें बंद हो गईं थी।

"हां ठीक है।" फिर एकदम से मैं बोला─"चल अब दूर हो मुझसे। अगर किसी ने देख लिया तो गड़बड़ हो जाएगी।"

"थोड़ी देर चिपके रहने दे न राजू।" अनीता और भी ज्यादा कस के चिपक गई मुझसे─"तुझसे ऐसे छुपकी हूं तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।"

"अगर ऐसा है तो कमरे में जहां सिर्फ हम दोनों हों वहां छुपक लेना।" मैंने उसे खुद से अलग करते हुए कहा─"लेकिन यहां ये ठीक नहीं है। घर वालों के अलावा किसी और ने देख लिया तो गलत ही सोचेगा और मैं नहीं चाहता कि हम दोनों के इस प्यार को कोई गलत सोचे....क्या तू ऐसा चाहती है।"

"न..नहीं नहीं राजू।" अनीता झट बोली─"मैं भी ऐसा नहीं चाहती।"

"चल अब तू अपना कुर्ता ले कर जा।" मैंने एक नजर उसकी भीगी चूचियों पर डाली। एकाएक मुझे शरारत सूझी तो बोला─"अरे ये क्या...तेरे दूध की नोक कितना ज्यादा कमीज में उठी हुई दिख रही है।"

ये सुन अनीता बुरी तरह हड़बड़ा गई। उसने झट से अपनी चूचियों को देखा। मेरी बात सच जानते ही उसे बड़े जोर की शर्म आई। उसने झट से अपने हाथों की कैंची बना कर अपनी छातियों को छुपा लिया।

"तू न सच में बहुत गंदा है।" फिर वो शर्म से लाल होते हुए और थोड़ा झूठा गुस्सा दिखा कर बोली─"तू बस यही देखता है न और इसी लिए तूने मेरा कुर्ता उतरवाया था न....बेशर्म कहीं का...बोल अब।"

"क्या सच में तुझे ऐसा लगता है।" मैंने एकदम से गंभीर शक्ल बना ली─"क्या तुझे लगता है कि मैं अपनी बहन के बारे में ऐसा सोच सकता हूं।"

मुझे एकदम से गंभीर हो गया देख और मेरी गंभीर बातें सुन कर अनीता का वो झूठा गुस्सा और शर्म दोनों ही कपूर की तरह गायब हो ग‌ए।

"अरे...मैं तो छेड़ रही थी तुझे...बुद्धू।" फिर वो हल्के से मुस्कुराई─"चल अब तू भी मुस्कुरा।"

मैं मुस्कुराने लगा।

"चल अब मैं जा रही हूं मैं।" 

उसने अपने हाथों की कैंची हटा ली जिससे उसकी चूचियां फिर से दिखने लगीं। उसने फौरन मेरी नजरों को पकड़ लिया। उसे फिर से शर्म आई लेकिन इस बार उसने कुछ नहीं कहा मुझे। बल्कि मुस्कुराते हुए वापस पाट पर गई और फिर झुक कर बाल्टी में पड़े अपने कुर्ते को धोने लगी। झुकने के कारण उसकी कमीज के अंदर छुपी उसकी चूचियां आधे से ज्यादा दिखने लगीं मुझे। मेरी आँखें फैल गईं और हलक सूखने लगा।

मैंने झट से उसकी चूचियों से नजरें हटा ली। एकाएक ही मुझे एहसास होने लगा था कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। वो तो नादान और मासूम है...उसे ध्यान ही नहीं आया कि झुकने से उसकी लाज दिखने लगी है मगर मुझे तो बार बार इसका फायदा नहीं उठाना चाहिए। 

खैर थोड़ी देर में वो गीला कुर्ता अपने सीन में लपेट कर चली गई। उसके जाने के बाद मैं भी फौरन नहा धो के अंदर चला आया। कपड़े वगैरह बदल कर मैं आंगन में ही खाट पर लेट गया।

अभी मैं लेटा ही था कि तभी बबलू आ गया। उसके साथ में नरेश भी था।

"क्या रे आज कल कहां गायब रहता है तू।" बबलू ने मुझे आँखें दिखाते हुए कहा─"दो दिन से खेलने नहीं आया।"

"हां वो खेतों में गहाई चालू है न।" मैंने बताया─"तो दोनों जून गहाई करनी पड़ती है मुझे इस लिए खेलने आने का समय ही नहीं मिलता।"

"अच्छा छोड़....चल नदी तरफ चलते हैं।" 

नरेश ने कहा और कहने के साथ ही कोई इशारा करने लगा। मैं समझ तो गया लेकिन तभी मुझे याद आया कि अनीता ने मुझे इन दोनों के साथ जाने से मना किया था। अब अगर मैं गया तो निश्चित ही वो नाराज हो जाएगी मुझसे।

"बहुत थक गया हूं यार।" मैंने बुरी सी शक्ल बना के कहा─"दोनों जून बैलों के पीछे पीछे घंटों चलना पड़ता है जिसकी वजह से पांव बहुत ज्यादा दुख रहे हैं।"

"क्या यार।" बबलू ने बुरा सा मुंह बनाया─"सब मजा खराब कर दिया तूने।"

"सही कहा।" नरेश बोल पड़ा─"आज अच्छा मौका था इसको दिखाने का मगर ये तो पांव दुखने का बहाना बना रहा है।"

"देख राजू....बड़ी मुश्किल से ऐसा मौका मिला है।" बबलू ने धीमे से कहा─"इस लिए पाव का दर्द भूल जा और चल हमारे साथ।"

"नहीं यार।" मैंने कहा─"सच में पांव में जान नहीं है। अभी नहा धो के आया हूं और अब सिर्फ खाट में लेट कर आराम करना चाहता हूं। तुम दोनों जाओ और जो मौका मिला है उसका फायदा उठाओ। मैं फिर कभी देख लूंगा।"

तभी मां रसोई से बाहर आती दिखी। उसने मेरे पास बबलू और नरेश को खड़ा देखा तो हमारे पास ही आने लगीं।

"तुम दोनों इस समय यहां?" मां ने दोनों को देखते ही पूछा─"क्या राजू को खेल खिलाने के लिए लेने आए हो।"

"हां काकी।" नरेश झट बोल पड़ा।

"पर वो नहीं जा सकता।" मां ने स्पष्ट कहा─"तुम दोनों को पता है...मेरा राजा बेटा दो दिन से सारा दिन खेतों में गहाई करवा रहा है अपने काका लोगों के साथ। एक बार भी नहीं कहा कि वो ये काम नहीं करेगा...जानते हो क्यों....क्योंकि अब वो समझदार हो गया है। उसे समझ आ गया है कि गांव में फालतू आवारा बागने से कहीं अच्छा है जिम्मेदारियों को समझ कर घर और खेतों के काम करना। मेरा राजा बेटा अब तुम दोनों की तरह गांव में आवारागर्दी नहीं करेगा। तुम दोनों भी मेरे बेटे से सीखो कि कैसे जिम्मेदारी से घर और खेतों का काम किया जाता है।"

"हम भी काम करते हैं काकी।" नरेश को मां की बात और उसका ताना अच्छा नहीं लगा इस लिए बोला─"हम दिन भर गांव नहीं घूमते हैं। खेलने भी तभी जाते हैं जब घर और खेतों के काम से समय मिलता है।"

"नरेश सही कह रहा है काकी।" बबलू भी बोल पड़ा─"समय मिलने पर ही हम खेलने जाते हैं।"

"ये बात उन्हें जा कर बताओ जो तुम्हारे बारे में कुछ जानता ही न हो।" मां को एकाएक गुस्सा आ गया─"मुझे अच्छे से पता है कि तुम दोनों कितना अपने घर और खेतों का काम करते हो। मालती और चंदा से अक्सर भेंट होती है मेरी....वो दोनों सारी करतूतें बताती हैं मुझे कि तुम क्या करते हो और क्या नहीं करते।"

बबलू और नरेश एकदम चुप रह गए। चेहरे का रंग उड़ गया था उनका। मैं भी मन ही मन ये सोच के घबरा उठा कि कहीं मां को मेरे बारे में भी तो कुछ उल्टा सीधा पता नहीं चल गया है।

"छोड़ न मां....और जा यहां से।" मैंने कहा─"और तू चिंता न कर...मैं कहीं नहीं जाने वाला। मैंने इन दोनों को बोल दिया है कि सारा दिन खेत में गहाई करने से मेरे पांव बहुत दुख रहे हैं तो मैं खेलने नहीं जाऊंगा।"

"क्या सच में तेरे पांव बहुत दुख रहे हैं बेटा।" मां ने एकाएक फिक्रमंद हो कर पूछा।

"हां मां।" मैंने कहा─"पर तू चिंता मत कर। आराम करूंगा तो ठीक हो जाएगा।"

"अरे ऐसे कैसे ठीक हो जाएगा भला।" मां ने कहा─"तेल से मालिश करनी होगी। अच्छा सुन....जब सब खा पी लेंगे तो मैं तेल से मालिश कर दूंगी तेरे पांवों में। फिर तुझे अच्छे से आराम मिल जाएगा।"

"अच्छा राजू....हम अब जा रहे हैं।" बबलू ने धीमे से कहा और नरेश को चलने का इशारा किया।

मैंने भी उन्हें नहीं रोका। मां के सामने ऐसा कर भी नहीं सकता था। मैं नहीं चाहता था कि उनकी वजह से मां मुझसे नाराज हो जाए।

***********

रात में जब सबका खाना पीना हो गया तो मां ने मुझे मालिश करवाने के लिए कहा। मैं आंगन में अलग खाट पर लेटा हुआ था जबकि मां और अनीता एक साथ दूसरी खाट पर लेटती थीं। बापू घर के बाहर नीम के पास खाट पर लेटे हुए थे। 

मां खुद रसोई में जा कर सरसों के तेल में लहसुन डाल कर तेल को हल्का गुनगुना कर के लाई थी। वो मेरे पास ही खाट पर पांवों की तरफ बैठ गई।

"गुनगुने तेल से मालिश कर दूंगी तो जल्द आराम मिल जाएगा तुझे।" फिर वो मेरी एक टांग पर तेल से मालिश करते हुए बोली─"दो दिन से तू दोनों जून लगातार मेहनत कर रहा है इस लिए थकान ज्यादा हो गई है तुझे।"

"मां...मैं भी राजू की मालिश कर दूं।" बगल से ही मां की खाट पर लेटी अनीता बोल पड़ी।

"नहीं रहने दे।" मां ने कहा─"तू भी तो थक गई है। इसकी मालिश कर दूं...फिर तेरे भी पांव की मालिश कर दूंगी।"

"थकी तो तू भी है मां।" अनीता ने कहा─"तुझे भी तो मालिश करवाने की जरूरत है।"

"अरे मेरी तो काम करने की आदत पड़ी हुई है।" मां ने कहा─"इस लिए अब इतना ज्यादा थकान का अनुभव नहीं होता।"

"हां...पर फिर भी मां थक तो जाती ही है तू।" अनीता ने कहा─"अब ऊपर से सोने के समय पर तू राजू की मालिश कर रही है...फिर मेरी भी मालिश करने को कह रही है। ऐसे में और भी तो थक जाएगी। एक काम करती हूं....जब तू राजू और मेरी मालिश कर देगी तो मैं तेरे पांव की मालिश कर दूंगी।"

"अरे नहीं नहीं।" मां झट बोली─"तुझसे अपने पांव थोड़े न छुवाऊंगी मैं। हमारे यहां बेटियों से पांव नहीं छुआएं जाते बल्कि खुद उनके पांव छुए जाते हैं।"

"तो फिर मैं मां की मालिश कर दूंगा।" मैं एकदम से बोल पड़ा─"ठीक है न मां।"

"अच्छा...मेरा राजा बेटा अपनी मां की मालिश करेगा?" मां ने बड़े स्नेह से मुस्करा कर कहा।

"हां क्यों नहीं।" मैंने कहा─"मैं तेरी मालिश कर दूंगा। जब तू इतना थके होने पर भी हमारी मालिश कर रही है तो मुझे भी तो तेरे बारे में सोचना होगा न मां।"

"मेरा राजा बेटा।" मां ने थोड़ा सा आगे सरक कर मेरे चेहरे को प्यार से सहलाया─"अपनी मां से बहुत प्यार करता है न।"

"हां मां।" मैंने कहा─"मैं तुझे बहुत चाहता हूं और हां....अनीता को भी बहुत प्यार करता हूं।"

"अच्छा।" मां को थोड़ी हैरानी हुई─"कब से भला।"

"बस अभी कल से ही मां।" मैं मुस्कुरा उठा─"और पता है मां...अनीता भी मुझे बहुत प्यार करती है। अब हम दोनों झगड़ा नहीं करते।"

"अरे वाह।" मां को इस बार आश्चर्य हुआ─"तुम दोनों में इतना बड़ा परिवर्तन कैसे हो गया। कल तक तो तुम आपस में झगड़ते ही रहते थे। फिर एक दूसरे से इतना प्यार कैसे हो गया।"

कहने के साथ ही मां अनीता की तरफ घूमी फिर उससे पूछा─"क्या राजू सही कह रहा है। क्या सच में तुम दोनों अब झगड़ा नहीं करते।"

"हां मां।" अनीता मुस्कुरा कर बोली─"हमने परसों से झगड़ा नहीं किया।"

"हाय दय्या क्या सच में।" मां की आश्चर्य से आँखें फैल गईं─"पर...पर इतना बड़ा परिवर्तन हुआ कैसे।"

"मैं बताता हूं मां।" 

कहने के साथ ही मैंने मां को श्यामू काका वाली बात विस्तार से बता दी। फिर ये भी बताया कि उनकी बातों के बाद हम दोनों ने क्या सोचा और फिर कैसे अब हम दोनों झगड़ा नहीं करते बल्कि एक दूसरे से प्यार से बात करते हैं। इतना ही नहीं एक दूसरे का खयाल भी रखते हैं।

"अरे मोरी दय्या।" मां ने आश्चर्य से खुले अपने मुंह पर हथेली रख के कहा─"ये..ये तो सच में अचरज की बात हो गई।"

"कल तक हमें भी ये अचरज ही लग रहा था मां।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा─"लेकिन सच यही है।"

"चल....अगर तुम दोनों अब एक दूसरे से अच्छे से मिलजुल के रह रहे हो तो ये बहुत अच्छी बात है।" मां ने फिर से मालिश करना शुरू कर दिया─"मैं भी सोचती थी कि कब तुम दोनों को अकल आएगी और कब तुम दोनों प्यार से मिलजुल के रहोगे। खैर ऊपर वाले का लाख लाख धन्यवाद कि उसने समय रहते तुम दोनों को अकल दे दी। इससे मेरे अंदर की भी अब ये चिंता दूर हो गई।"

"अब से हमारे कारण तुझे कोई परेशानी नहीं होगी मां।" अनीता बोल पड़ी─"और न ही हमसे तंग आ कर तुझे हम पर चिल्लाना पड़ेगा।"

"ओह मेरी प्यारी बिटिया आ तो जरा मेरे पास।" मां ने उसे प्यार से बुलाया और जब अनीता मुस्कुराते हुए उसके पास आ गई तो उसने उसके भी चेहरे को प्यार से सहलाया। फिर बोली─"अब जा के तुझमें समझदारी वाली बात आई है। मैं बहुत खुश हूं अब। जा खाट पर बैठ....मैं जल्दी से तेरे भाई की मालिश कर के तेरी भी मालिश करती हूं।"

अनीता खुशी खुशी वापस अपनी खाट पर जा के बैठ गई। इधर मैं सोचने लगा था कि सचमुच हमारे इस रवैए से कितना परिवर्तन आ गया है। जो मां कल तक हमारे झगड़े पर सिर्फ अनीता को ही डांटती थी वो अब उसे भी मेरी तरह प्यार से दुलारने लगी थी। ये सब सोचते ही मुझे अंदर से बड़ी खुशी हुई।

मैंने गर्दन घुमा कर अनीता की तरफ देखा। उसने भी मुझे देखा और हम दोनों एक साथ मुस्कुरा उठे। जाने क्यों एकाएक मेरी धड़कनें तेज हो गईं।

थोड़ी देर बाद जब मेरी मालिश हो गई तो मां ने उठ कर अनीता की भी मालिश की। उसके बाद मैं उसी तेल से मां की मालिश करने लगा। बीच बीच में अनीता भी मां के घुटनों के थोड़ा ऊपर मालिश कर देती थी। मां ने उससे कहा था कि अगर उसे मालिश ही करना है तो वो बस घुटनों के ऊपर करे। मां के अनुसार घुटनों के नीचे मालिश करने से खुद मां को पाप लगेगा कि उन्होंने बेटी से पांव की मालिश करवाई।

मैंने और अनीता ने मिल के काफी देर तक मां की मालिश की। मां इतनी थकी हुई थी कि हमारे मालिश करते करते ही खाट पर सो गई। अनीता ने एक दो बार उसे पुकारा मगर मां की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न हुई। जाहिर है उसे मालिश से जब आराम मिला तो वो गहरी नींद में सो गई थी।

"मां तो गहरी नींद सो गई राजू।" अनीता ने धीमे से कहा─"चल अब बंद कर देते हैं मालिश करना।"

"हां ठीक है।" मैंने कहा─"तू ये तेल की कटोरी कहीं रख दे। उसके बाद तू भी मां के साथ सो जा। कल सुबह हमें खेतों पर फिर से गहाई करने जाना है।"

"कल तो सुनीता और रानी भी जाएंगी।" अनीता ने कहा─"उनके रहने से शायद हमें कम मेहनत करनी पड़े।"

"हां...पर वो छोटी हैं तो जल्दी थक भी जाएंगी।" मैंने कहा─"ऐसे में हमें ही करना होगा।"

"चल कोई बात नहीं।" अनीता ने कहा─"बीच बीच में थोड़ा बहुत तो आराम मिलेगा ही हमें।"

"हां सही कहा।" मैंने सिर हिलाया─"खैर चल अब सो जा तू....और वो तेल की कटोरी कहीं दूसरी जगह रख दे।"

अनीता ने कटोरी उठा कर रसोई के पास बनी एक पट्टी पर रख दी और फिर जा के मां के साथ लेट गई। कुछ देर तक तो हम जागते ही रहे मगर फिर जाने कब हमारी आंख लग गई।



जारी है.............
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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#57
कहानी का अगला भाग जल्द ही आएगा मित्रों........
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हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


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#58
भाग ~ १८




अगली सुबह नाश्ता पानी कर के मैं और अनीता खेतों की तरफ जाने के लिए घर से निकले। मैंने मां से मांग कर दो रुपया ले लिया था। घर से निकलते ही मैं दौड़ते हुए लाला की दुकान पर गया और वहां से नमकीन गुड़ खरीद लाया।

"ये ले।" मैंने कागज में लिपटे नमकीन गुड़ को अनीता को पकड़ाया─"गहाई के समय जब भी हमें आराम करने का समय मिलेगा तो हम दोनों आमों की तरफ जा के इसे एक साथ खाएंगे।"

"हां ठीक है।" अनीता ने नमकीन गुड़ को अपने दुपट्टे में छुपाया और फिर दुपट्टे के बाकी सिरे को अपनी कमर में लपेट लिया। अब कोई नहीं जान सकता था कि उसने अपने दुपट्टे में कोई चीज कहां छुपा रखी है।

"कल रात मां कितना खुश थी न राजू।" मेरे साथ चलते हुए अनीता ने कहा─"और उसे हमारी उस बात का भरोसा ही नहीं हो रहा था..है न।"

"कैसे होता भरोसा...बात ही ऐसी थी।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा─"खैर ये छोड़...आज नदी में नहाने चलेगी न मेरे साथ।"

"हां वो तो तू न भी कहता तब भी जाती।" अनीता ने कहा─"क्योंकि इस बारे में कल हमारी बात हो चुकी है। और सुन....नदी में आज मैं तुझे खूब नहलाऊंगी...हां।"

"ठीक है।" मैं मन ही मन जाने कैसी कैसी कल्पनाएं करने लगा─"अगर दोपहर के वक्त नदी पर कोई नहीं होगा तो हम खूब मस्ती भी करेंगे....क्या कहती है तू।"

"हां ठीक है।" अनीता मुस्कुराई─"बस तू मुझे ज्यादा तंग न करना। तेरी छोटी बहन हूं तो ये बात याद रखना...हां।"

"देख मस्ती में थोड़ा बहुत इधर उधर हो ही जाता है।" मैंने कहा─"अब इतने में तू तंग हो जाएगी क्या।"

"अच्छा ठीक है मैं नहीं तंग होऊंगी।" अनीता बोली─"जैसे तू करेगा वैसा मैं भी करूंगी।"

"हां ठीक है न।" मैंने कहा─"मैं तुझे किसी भी बात के लिए नहीं रोकूंगा...तू भी मत रोकना मुझे।"

"हां।"

"चल पहले मझले काका के घर चलते हैं।" मैंने कहा─"देखें तो सही कि सुनीता और रानी खेत जा रही हैं या नहीं।"

हम दोनों बातें करते हुए थोड़ी ही देर में दशरथ काका के घर पहुंच गए। मझले काका बाहर ही मिल गए। वो अपने बैलों को खूंटे से छोरने जा रहे थे ताकि उन्हें खेतों पर गहाई के लिए ले जाएं। उनके पास ही उनकी दोनों बेटियां खड़ी थीं। अनीता को मेरे साथ देखते ही दोनों के चेहरे खिल उठे।

"जीजी आज हम दोनों भी खेत जा रहे हैं।" सुनीता ने अपनी खुशी जताते हुए कहा─"बापू ने कहा है कि वहां हम दोनों तुम्हारे और राजू भैया के साथ गहाई में हाथ बटाएंगे।"

"ये तो बहुत अच्छी बात है सुनीता।" अनीता ने मुस्कुराते हुए कहा─"तुम दोनों के रहने से मुझे और राजू को काफी आराम मिलेगा।"

"अरे करेजा तू यहां।" काका की नजर जैसे ही हम पर पड़ी तो वो बोले─"इन दोनों को लेने आया है क्या।"

"हां काका।" मैंने कहा─"मैंने सोचा इन्हें अपने साथ ही ले जाऊं।"

"अच्छा ठीक है।" काका ने कहा─"इन्हें ले के जा अपने साथ। मैं जरा पान सुपाड़ी खा लूं...फिर बैलों को ले कर आता हूं और हां एक चक्कर आमों की तरफ भी लगा लेना। अमिया चोरों ने बहुत परेशान किया हुआ है इस समय।"

"ठीक है काका।" मैंने कहा और फिर सुनीता और रानी को देखते हुए बोला─"चलो तुम दोनों हमारे साथ चलो। काका बाद में आ जाएंगे।"

वो दोनों खुशी खुशी हमारे साथ चल पड़ीं। वैसे अनीता ने कुछ महसूस किया हो या नहीं लेकिन मैंने ये महसूस किया था कि जैसे ही मैंने सुनीता और रानी को अपने साथ ले जाने की बात कही थी तो काका थोड़ा खुश हो गए थे। इतना ही नहीं...पान सुपाड़ी खाए होने के बाद भी उन्होंने कहा था कि वो पान सुपाड़ी खा के आते हैं कुछ देर में। मतलब साफ था कि दोनों बेटियों के हमारे साथ चले जाने से उन्हें मंजू काकी के साथ अकेला रहने का मौका मिल जाना था। कल काकी के साथ जो वो नहीं कर पाए थे वो अब कर सकते थे। बशर्ते काकी इसके लिए मान जाएं...अन्यथा कल की ही तरह काकी से गुस्सा हो कर काका को फिर से निराश हो जाना पड़ेगा।

ये सब सोच के मेरी इच्छा तो हुई कि कोई जुगाड़ बना कर काका काकी के बीच का ये खेल देखूं मगर चाह कर भी मैं ऐसा कोई जुगाड़ नहीं बना सका। अपनी बहनों के रहते ये संभव ही नहीं था। सुनीता और रानी को तो मैं किसी भी तरह बहला कर अकेले खेत जाने को कह देता मगर अनीता को बहलाना आसान नहीं था। वो कई सारे सवाल करने लगती कि मैं अचानक से किस काम से और कहां जा रहा हूं। जाहिर है मैं उसे कोई जवाब न दे पाता। 

मुझे याद आया कि नमकीन गुड़ तो मैं पहले ही लाला की दुकान से खरीद लाया हूं...तो अब ये बहाना चल ही नहीं सकता। मुझे ये सोच के अफसोस हुआ और खुद पर थोड़ा गुस्सा भी आया कि क्यों मैंने नमकीन गुड़ लाने में इतनी जल्दबाजी कर दी। खैर अब क्या कर सकता था मैं। मजबूरन उन तीनों के साथ खेत जाना ही पड़ा।

मगर कहते हैं न कि अगर किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात उसे मिला देने में लग जाती है। ऐसा ही हुआ। क्योंकि तभी श्यामू काका अपने घर से बाहर निकल आए थे और मुझे देखते ही आवाज लगा दिया था उन्होंने। इधर मझले काका बैलों को छोड़ कर पहले ही घर के अंदर जा चुके थे।

"क्या हुआ काका।" मैंने श्यामू काका से पूछा।

"अरे थोड़ा रुक जा करेजा।" वो चलते हुए मेरे पास आए। फिर मेरी तरफ पांच का नोट बढ़ाते हुए बोले─"ये रुपए ले और लाला की दुकान तक चला जा थोड़ा। उससे सौ ग्राम सुपाड़ी, एक तोला लौंग, एक तोला कत्था और पचास ग्राम पत्ता वाली तंबाखू खरीद ला। तब तक मैं फटाफट नाश्ता कर लेता हूं।"

"ठीक है काका।" मैं मन ही मन बड़ा खुश हो गया था लेकिन प्रत्यक्ष में सामान्य भाव से अपनी तीनों बहनों की तरफ देख के बोला─"तुम लोग चलो...मैं काका के साथ आ जाऊंगा थोड़ी देर में।"

मेरी ये बात सुन कर अनीता ने कुछ कहना चाहा मगर काका की मौजूदगी में वो चुप रह गई। फिर सुनीता और रानी को ले कर जाने लगी। मैं समझ गया था कि अनीता की इच्छा मेरे बिना जाने की नहीं थी लेकिन काका की मौजूदगी में वो कुछ बोल न सकी थी।

खैर उन तीनों के जाते ही मैं फौरन लाला के दुकान की तरफ चल पड़ा। एकाएक ही मेरे मन में जाने कैसे कैसे विचार आने शुरू हो गए थे। मैं जल्द से जल्द काका का सारा सामान लाला के यहां से खरीद कर उन्हें दे देना चाहता था और फिर किसी तरह मझले काका के घर पहुंच जाना चाहता था। मैं देखना चाहता था कि वो दोनों इस मौके पर क्या करते हैं।

मैं भागते हुए लाला की दुकान पहुंचा था। उसके बाद उससे फटाफट सारा सामान खरीदा...फिर लाला को पैसे दे कर सरपट दौड़ पड़ा।

बहुत ही कम वक्त में मैं छोटे काका के घर पहुंच गया। उन्हें सामान पकड़ाया। उन्होंने नाश्ता करने को कहा तो मैंने ये कह कर मना कर दिया कि घर से खा के आया हूं। फिर वो बोले बैठ साथ में ही चलते हैं मगर मैंने उनसे कहा─नहीं काका...वो तीनों (अनीता, सुनीता और रानी) अकेले गईं हैं और अभी थोड़ी ही दूर पहुंची होंगी तो मैं जा के उन्हें पा जाऊंगा और उनके साथ ही खेत चला जाऊंगा। मेरी बात सुन काका ने कहा ठीक है। 

श्यामू काका से छूटते ही मैं बिजली की रफ्तार से घर से बाहर आया और उसी रफ्तार से मझले काका के घर की तरफ पहुंच गया। एकाएक ही मेरी धड़कनें बढ़ गईं थी। काका काकी की करतूत देखने के लिए मैं उतावला हो चुका था। अंदर से घबरा भी रहा था कि अगर उन्होंने मुझे अपनी आपत्तिजनक हालत में देख लिया तो क्या होगा। निश्चित ही तब कुछ अच्छा नहीं होगा मगर इसके बावजूद मैं उनके घर के अंदर ऐसे दाखिल हुआ जैसे बिल्ली घर में रखे दूध को पीने के लिए दबे पांव पूरे घर का मुआयना करती है।

घर ऐसा था कि बाहर वाली यानी मुख्य दीवार पर कोई दरवाजा नहीं था। उसके बाद अंदर बरोठ वाली दीवार थी जिसमें लकड़ी का दरवाजा लगा हुआ था मगर इस वक्त वो आधा खुला हुआ था। उसके आगे चार फीट चौड़ा गलियारा था। गलियारे के दोनों तरफ कमरों वाली दीवार थी। गलियारे से आगे अन्दर की ओसारी थी जिसे बरामदा या बैठका भी कहते हैं। उसके एक तरफ रसोई थी और आगे लंबा चौड़ा आंगन था। आंगन के आगे एकदम सामने एक कच्ची दीवार थी जिसमें दरवाजा लगा हुआ था। इसी दरवाजे से घर के पीछे तरफ वो कुआं था जिसके बारे में मंजू काकी ने अपनी कहानी में हमें बताया था। आंगन के बाएं तरफ तीन भीती(दीवार) का बरोठ और बरामदा था जिसमें दो कमरे थे....एक भंडार का कमरा था और दूसरा पूजा घर...यहां पूजा घर या कमरे का मतलब है वो कमरा जिसमें हमारे घर परिवार के कुल देवता और बाबा साहब वगैरह रहते हैं। इस कमरे में बिना नहाए कोई नहीं जाता। मतलब छुआ छूत और पवित्रता का बहुत ध्यान दिया जाता है।

खैर मैं बिल्ली के जैसे दबे पांव बरोठ वाले दरवाजे से अंदर दाखिल हुआ और फिर दबे पांव ही गलियारे से होते हुए अंदर वाली ओसारी की तरफ बढ़ा ही था कि तभी अंदर से काका की आवाज मेरे कानों में पड़ी। 

"देख मेरा दिमाग न खराब कर।" काका की आवाज─"कल भी तूने नाटक किया था और मैं गुस्से में चला गया था मगर आज कोई नाटक बर्दाश्त नहीं करूंगा मैं।"

"मैंने कहा न मेरा मन नहीं है।" मंजू काकी की आवाज─"तुम समझते क्यों नहीं कि मैं भी इंसान हूं। दिन भर काम कर कर के थक जाती हूं।"

"सिर्फ तू ही काम नहीं करती है।" काका ने कहा─"बाकी सब भी काम करते हैं। मैं खुद भी दिन रात बैलों की तरह जुएं में नधा रहता हूं। चल अब मान जा न यार....कौन सा रोज रोज चोदने का मौका मिलता है। तू तो साली अभी से सठिया गई लगती है। तेरे उमर की औरतें तो रोज अपने मरद से चुदवाती हैं। वो जो मेरा सहनाव है न....वो रोज अपनी औरत को पेलता है और उसकी औरत भी हुमच हुमच के पेलवाती है उससे।"

"हां पर मेरे में इतनी जान नहीं है।" मंजू काकी ने कहा─"मुझसे अब नहीं होता ये।"

"देख फिर तू नाटक करने लगी।" काका की आवाज में इस बार गुस्सा झलका─"बोल रहा हूं न कि करने दे। चल अब जल्दी से अपना धोती साया उठा के लेट जा।"

काका के ऐसा कहने के बाद इस बार काकी के मुख से कोई आवाज नहीं सुनाई दी। शायद उन्होंने काका का कहना मान कर वही करने लगीं थी जो काका ने कहा था। इधर गलियारे के पास छुपे खड़े मेरी धड़कनें तेज तेज चलने लगीं थीं। अंदर हलचल मची हुई थी और मन बार बार ये कहते हुए उकसा रहा था कि आगे बढ़ और अपनी आंखों से देख कि काका काकी कैसे चुदाई करते हैं।

"थोड़ा खड़ा कर न इसे।" तभी काका की आवाज मेरे कानों में पड़ी। 

मैं समझ कि वो अपने लंड को खड़ा करने के लिए काकी से बोल रहे हैं। मैं अब ये देखने के लिए उतावला हो उठा कि क्या सच में काकी ऐसा करती हैं। मैं अपनी घबराहट और डर को किसी तरह दबा कर आगे बढ़ा और उन दोनों को देखने की कोशिश की।

वो आंगन के बाएं तरफ वाले बरामदे में थे। वहीं एक खाट रखी हुई थी और काकी अपना धोती साया ऊपर जांघों तक उठाए काका के लंड को सहलाए जा रहीं थी।

ये दृश्य देखते ही मेरी आँखें फैल गईं। दिलो दिमाग में बिजली सी कौंध उठी। अंदर जो पहले ही हलचल मची हुई वो अब और बढ़ चली।

मैंने देखा काका का लंड मेरे वाले से छोटा था और काकी के सहलाने से अब थोड़ा खड़ा हो गया था। काका आँखें बंद किए जमीन पर खड़े थे। उन्होंने अपने दोनों हाथों से अपनी लुंगी पकड़ रखी थी जोकि उनकी कमर तक उठी हुई थी। उनके लिंग के आस पास कुछ ज्यादा ही घने बाल थे।

"चल छोड़ अब इसे।" तभी वो बोले─"और टांगे फैला कर लेट जा। बहुत नाटक कर रही थी न तू....अब जब हुमच हुमच के चोदूंगा तो तेरी अकल ठिकाने आ जाएगी।"

काका के ऐसा बोलने पर काकी कुछ न बोली। वो पीछे तरफ सरक कर खाट पर लेट गईं और फिर धोती साया को अपनी कमर तक चढ़ा कर अपनी टांगें फैला दी। जैसे ही उन्होंने टांगें फैलाईं तो काका एक हाथ से अपनी लुंगी पकड़े आगे बढ़े और खाट पर चढ़ गए। फिर अपने लिंग को उन्होंने काकी की चूत के मुहाने पर लगाया और अपनी कमर को जोर से आगे धक्का दिया। काका का लिंग काकी की चूत में एक ही बार में पूरा अंदर चला गया। काकी के मुख से हल्की सिसकी निकली जो मैंने साफ सुनी।

उसके बाद काका ने दोनों हाथों को काकी के पेट के अगल बगल खाट में रख कर धक्के लगाना शुरू कर दिया। इधर मेरे अपने लिंग ने ये सब देख कर जाने कब कच्छे में अपना सिर उठा लिया था। मैं अपनी धाड़ धाड़ बजती धड़कनों से अपलक काका को काकी की चुदाई करते देख रहा था। मैं ऐसे कोंड़ पर खड़ा था कि वो दोनों मुझे तभी देख सकते थे जब वो अपनी गर्दन को थोड़ा घुमाएं मगर मैं उन्हें अच्छे से देख पा रहा था। ये अलग बात है कि मुझे न काका का लिंग दिख रहा था और न ही काकी की चूत। मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि आगे बढ़ कर थोड़ा और अच्छे से देखूं क्योंकि ऐसा करने से मैं पकड़ा जा सकता था।

खैर काका अपने हिसाब से पूरा जोर लगा कर काकी को चोद रहे थे। काकी बीच बीच में कभी आहें भरती तो और सिसकियां निकालतीं। इधर मेरे अंदर अजीब सी सनसनी हो रही थी जो सीधा मेरे लिंग में चोट कर रही थी। वो कच्छे के अंदर बुरी तरह अकड़ गया था। न चाहते हुए भी मैं बार बार उसे सहलाने लगता था। जब भी मैं उसे मुठियाता तो मुझे अलग ही मजा आता। मतलब एक मजे की लहर दौड़ जाती बदन में।

मैं अपना लिंग मुठियाते हुए सोचने लगा अब क्या करूं। कैसे मैं काका काकी की चुदाई को और अच्छे से देखूं। घबराहट और डर के मारे आगे बढ़ने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। उधर काका जोर जोर अपनी कमर को ऊपर नीचे किए जा रहे थे।

"चल अब घोड़ी बन जा।" तभी वो अचानक उठे और नीचे जमीन में खड़े हो कर काकी से बोले। काकी शायद समझ चुकीं थी कि आज उनकी कोई दाल गलने वाली नहीं है इस लिए वही करती जा रहीं थी जो काका बोल रहे थे। काका के उठते ही वो उठीं और खाट में ही घोड़ी बन गईं। उनका धोती साया उनके कमर में अटका हुआ था। इस कोड़ पर मैं उनकी बड़ी सी पोंद(नितंब) को अच्छे से देख पा रहा था और उधर काका के खड़े होने से उनके लिंग को। 

काकी जैसे ही घोड़ी बनी तो काका खाट पर चढ़ गए और पीछे से अपना लिंग काकी की चूत पर डालने लगे। जैसे ही लिंग अंदर घुसा तो उन्होंने काकी की कमर को दोनों हाथों से पकड़ा और फिर जोर जोर से उन्हें पेलने लगे।

"ले साली....बहुत नाटक कर रही थी न।" काका पेलते हुए बोले─"आज जी भर के चोदूंगा तुझे।"

"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" न चाहते हुए भी काकी की आहें निकल पड़ीं─"थोड़ा और जोर से चोदो न।"

"और कितना जोर से चोदूं तुझे।" काका ने काकी के दाएं नितंब पर एक थप्पड़ मारा जिससे काकी उछल पड़ीं─"आज मजा नहीं आ रहा क्या तुझे।"

काका की इस बात से इधर अचानक मैं थोड़ा चौंक पड़ा। पलक झपकते ही मुझे बापू का खयाल आ गया। काकी कई बार बापू से पेलवा चुकी थीं और इस वक्त मस्ती में वो जोर से करने को बोल रहीं थी। जाहिर है काका का छोटा लिंग होने की वजह से उन्हें बापू जैसा मजा नहीं आ रहा था। और शायद इसी लिए जोर से करने को बोल रहीं थी उनसे।

"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् आ रहा है सुनीता के बापू।" काकी ने झट कहा─"बस ऐसे ही जोर जोर से करो।"

"अपना ब्लाउज तो खोल जरा।" काका ने धक्के लगाते हुए कहा─"कई दिन से तेरी चूचियां नहीं मसली मैंने।"

काकी ने झुके हुए किसी तरह एक हाथ से अपना बैलेंस बनाया और एक हाथ से ही ब्लाउज के बटन खोलने लगीं। थोड़ी देर में जब बटन खुल गए तो उन्होंने ब्लाउज को फैला दिया। मैंने साफ देखा...उनकी बड़ी बड़ी छातियां नीचे झूलने लगीं थी। काका के हर धक्के पर उनमें अजीब सी थिरकन होती थी। काका ने झट अपना एक हाथ आगे बढ़ाया और उनकी एक चूची को मुट्ठी में पकड़ लिया।

"शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् थोड़ा धीरे दबाओ न।" काकी सिसकी ले कर बोलीं─"दर्द होता है।"

"आज तो तुझे दर्द बर्दाश्त करना ही पड़ेगा।" काका ने धक्के लगाते हुए कहा─"आज तुझ पर रहम नहीं करूंगा मैं। आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् अरे नहीं....लगता है मेरा छूटने का समय आ गया है।"

"आह्ह्ह्ह्ह् संभालो खुद को।" काकी ने आह भर के कहा─"मुझे हर बार की तरह बीच में मत छोड़ना....वरना इस बार से करने नहीं दूंगी...बताए देती हूं।"

काका जोर जोर काकी की छातियां मसलने लगे ताकि काकी के भी झड़ने का समय आ जाए। अपने धक्कों को उन्होंने कम कर दिया था। इधर मेरा बुरा हाल हुआ जा रहा था। कच्छे के अंदर मेरा लिंग अब दर्द करने लगा था। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं। मजा भी आ रहा था, घबराहट भी हो रही थी, डर भी लग रहा था....बस समझ नहीं आ रहा था कि लिंग के दर्द को कैसे दूर करूं। एक बार तो खयाल आया कि कच्छे से लंड निकाल कर मुट्ठी लगाऊं मगर डर की वजह से ऐसा करने की हिम्मत नहीं हुई।

"अब नहीं रुका जाएगा रे।" उधर काका ने सिसकी ले कर कहा─"मेरा समय निकट आ गया है। आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् हाय मैं तो गया रे।"

काका कहते हुए जोर जोर से झटका खाने लगे। उनका सारा पानी काकी की चूत में ही छूटता चला गया। जैसे ही झटके खत्म हुए तो वो असमर्थ से हो कर तथा अपना लिंग बाहर निकाल कर वहीं खाट पर ही लुढ़क गए।

"कर दिया न सत्यानाश।" काकी बुरी तरह किलस कर लगभग गुर्रा उठीं─"कहा था मैंने की बीच में न छोड़ना मुझे। खुद तो निपट गए और मुझे मझधार में छोड़ दिया।"

"मैं क्या करूं छूट गया तो।" काका अपनी उखड़ी सांसों को काबू करते हुए बोले─"कोशिश तो किया था मैंने लेकिन नहीं सम्हाल पाया। माफ कर दे अब।"

कहने के साथ ही वो खाट से नीचे उतरे और अपना कच्छा पहन कर लुंगी को अच्छे से कमर में बांध लिया।

"हां जाओ अब।" काकी अभी भी गुस्से में थीं─"अब दुबारा करने को कहा तो देखना।"

काका कुछ न बोले। बगल में ही दीवार पर टिकाया हुआ अपना लट्ठ उठाया और बाहर जाने के लिए मेरी तरफ आने लगे। ये देख एकदम से मैं घबरा गया। झट वहां से भागा और सीधा सड़क पर ही रुका।

कुछ देर में जब वो बाहर आए तो मैं खुद को सामान्य बनाए रखने का प्रयास करते हुए सड़क से उनके घर की तरफ बढ़ा। ऐसा इस लिए ताकि उन्हें यही लगे कि मैं अभी अभी ही आया हूं। शुक्र था कि श्यामू काका के घर के बाहर कोई नहीं था। अगर कोई होता तो मुझे मझले काका के घर के अंदर से इस तरह भागते हुए आता देख लेता। उसके बाद निश्चित ही उसे किसी बात का संदेह हो जाता।

"अरे करेजा तू....गया नहीं अभी।" काका ने थोड़ा चौंक कर पूछा।

"वो मैं जा ही रहा था कि तभी श्यामू काका ने मुझे सुपाड़ी वगैरह लाने के लिए लाला की दुकान भेज दिया। अभी दे कर ही आ रहा हूं मगर अब अचानक प्यास लग आई तो सोचा आपके घर में पानी पी लूं...फिर जाऊं।"

"ठीक है जा अंदर...पी ले पानी।" काका ने बैलों को खूंटों से छोरते हुए कहा─"तेरी काकी अन्दर ही है अभी।"

मेरे देखते ही देखते काका बैलों को ले कर चले गए। इधर मैं अपनी धाड़ धाड़ बजती धड़कनों को किसी तरह काबू करते हुए अंदर की तरफ चल पड़ा। इस बार क्योंकि काका नहीं थे और काकी से तो मैं पूरी तरह खुल चुका था इस लिए अंदर जाने में मुझे कोई झिझक न हुई। 

मैं जानता था कि काकी अभी भी उसी मुद्रा में खाट पर होंगी इस लिए तेजी से अंदर पहुंचा। मैंने देखा काकी खाट से उतर कर अपने ब्लाउज के बटन लगा रहीं थी। उनका साया तो धोती के अंदर ही था लेकिन धोती का पल्लू जमीन पर गिरा पड़ा था।

मुझे एकदम से आ गया देख वो बुरी तरह उछल पड़ीं। हड़बड़ाहट में उन्हें समझ ही न आया कि क्या करें। भौचक्की सी हो के मुझे ही देखने लगीं थी। उनके ब्लाउज में ऊपर के दो बटन अभी भी खुले हुए थे जिसके बीच मुझे उनकी छातियों की गोलाईयां साफ दिख रहीं थी।

"ये क्या कर रही हो काकी।" मैंने चौंक पड़ने का नाटक किया─"कपड़े पहन रही हो या उतार रही हो। अच्छा अच्छा...समझ गया।"

"क..क..क्या समझ गए तुम।" काकी एकदम से चौंक कर बोलीं और साथ ही फटाफट ब्लाउज के बटन लगाने लगीं।

"क्या खुल कर बताऊं।" मैं अर्थपूर्ण भाव से मुस्कुराया।

"क्या मतलब।" काकी के चेहरे पर एकाएक घबराहट के भाव उभर आए।

"मतलब ये कि काका अभी अभी यहां से बाहर निकले हैं।" मैंने कहा─"और तुम यहां इस हालत में हो तो पक्का तुम दोनों वही कर रहे थे जो उस दिन खेत वाले कमरे में तुम और बापू कर रहे थे।"

"र...राजू....क्या बोल रहे हो....चुप हो जाओ।" काकी बुरी तरह चौंक पड़ी─"किसी ने सुन लिया तो अनर्थ हो जाएगा।"

"पर मैंने सही कहा न।"

काकी कुछ न बोलीं बस सिर हिला कर मूक सहमति दे दी। तभी अचानक मुझे शरारत सूझी।

"वैसे एक बात बताऊं।" मैंने धड़कते दिल से कहा─"मैंने अभी थोड़ी देर पहले अपनी आंखों से सब कुछ देखा है।"

"क..क्या??????" काकी का आश्चर्य से मुंह खुल गया।

"हां काकी।" मैं उनकी इस हालत पर मुस्कुरा उठा─"गलियारे से सब देख रहा था। मैं देख रहा था कि कैसे काका ने तुम्हें धोती साया ऊपर कर के लेट जाने को कहा और फिर जब तुम लेट गई तो कैसे वो तुम्हें चो...चोदने लगे। इतना ही नहीं फिर उन्होंने तुमसे कहा कि चल अब घोड़ी बन जा....आज तुझपे कोई रहम नहीं करूंगा।"

"बस करो राजू।" काकी का शर्म के मारे बुरा हाल हो गया─"कुछ तो शर्म करो।"

"और ये भी देखा कि अंत में जब काका जल्दी झड़ गए तो तुमने कैसे उन्हें खरी खोटी सुनाई।" मैं बेझिझक बोलता चला गया─"बेचारे...मेरे प्यारे काका...माफ कर दे बोल कर चुपचाप चले गए थे यहां से।"

"हाय दय्या....कितने खराब हो राजू।" काकी जो अब तक खुद को सम्हाल चुकीं थी, उन्होंने मुझे घूरते हुए कहा─"ये सब देखते हुए तुम्हें तनिक भी शर्म नहीं आई। कितना भोला समझती थी मैं तुम्हें....और तुम दो ही दिन में इतने शातिर हो गए।"

"मैं तो अभी भी भोला ही हूं काकी।" मैंने कहा─"पर इन दो दिनों से जो कुछ देख सुन रहा हूं उसकी वजह से कुछ तो बदलाव आएगा ही न मुझमें। मेरे लिए जो चीज नई होगी उसके बारे में जानने और समझने के लिए मन में उत्सुकता तो जागेगी ही न। तुमने बापू वाले किस्से को इस तरह सुनाया था कि उस सबको फिर से देखने के लिए मैं मजबूर तो हो ही जाऊंगा न।"

"अच्छा...और किस चीज के लिए मजबूर हो गए हो।" काकी ने अपनी धोती का पल्लू हाथ से पकड़े एकाएक मेरी तरफ आते हुए थोड़ा अजीब भाव से पूछा─"बताओ राजू...और किस चीज के लिए मजबूर हो तुम।"

मैं उनके पूछने के अंदाज पर एकदम से चौंक पड़ा। धड़कनें पलक झपकते ही तेज हो गईं। वो पल्लू पकड़े मेरी तरफ धीरे धीरे चली आ रहीं थी। पल्लू को उन्होंने अपने सीने में नहीं डाला था और न ही सीने को छुपाने का कोई उपक्रम किया था।

"ये...ये क्या पूछ रही हो काकी।" मैं घबरा सा गया।

"क्या हुआ....ठीक ही तो पूछ रही हूं।" काकी अब मेरे एकदम पास आ गईं─"तुम ही तो बोल रहे हो कि जो कुछ तुमने देखा और सुना है उसे फिर से देखने के लिए तुम मजबूर हो गए हो तो अब बताओ....और किस चीज के लिए मजबूर हो।"

"अ...और...और तो कुछ नहीं।" मैं बौखला सा गया। 

"क्या तुम उसके लिए मजबूर नहीं हो।" काकी मेरे एकदम पास आ कर और एकदम मुझसे सट कर बड़े अजीब भाव से बोलीं─"बताओ न राजू...क्या तुम किसी के साथ चुदाई करने के लिए मजबूर नहीं हो।"

काकी के मुख से इस तरह खुल्लम खुल्ला चुदाई शब्द सुन कर मैं चकित रह गया। मेरे रोंगटे खड़े हो गए। पूरा बदन जूड़ी के मरीज की तरह कांप उठा। हालत ऐसी हो गई कि कुछ बोला ही न गया मुझसे।

तभी मैं बुरी तरह उछल पड़ा। अचानक मुझे अपने लिंग में उनके हाथ की छुअन महसूस हुई। मैं झट से पीछे हट गया और आश्चर्य से काकी को देखने लगा।

"क्या हुआ....आज मुझसे मुट्ठ नहीं लगवाओगे।" काकी ने उसी अजीब भाव से कहा─"देखो कैसे तुम्हारा ये खड़ा है।"

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि काकी को अचानक से ये क्या हो गया है। कुछ देर पहले तो वो मुझे शर्म करने की बात बोल रहीं थी और अब वो इस तरह का अजीब बर्ताव कर रही हैं। 

मैं पीछे हटा तो काकी मेरी तरफ फिर से बढ़ीं और फिर से मेरे लंड को पैंट के ऊपर से पकड़ने लगीं। मैं बुरी तरह कांप गया और बुरी तरह असमंजस में भी पड़ गया। एक तो वैसे ही गर्मी का मौसम था दूसरे इस हालत में मैं पसीना पसीना हो गया था।

"चलो न राजू....आज फिर से तुम्हारी मुट्ठ लगा देती हूं।" काकी ने मेरे लिंग को सहलाते हुए कहा─"आज फिर से तुम अपना वीर्य मेरे चेहरे और मेरी छातियों पर गिरा देना।"

"क...क्या बोल रही हो काकी।" मैं बदहवास सा बोला─"किसी ने देख लिया तो आफत आ जाएगी। मुझे खेत जाना है....गहाई करना है वहां....और...और तुम्हें भी तो खेत जाना है न।"

"हां जाना तो है राजू।" काकी अभी भी अजीब बर्ताव ही कर रहीं थी─"पर पहले इस वक्त तुम्हारा मुट्ठ लगा दूं....ये भी तो अब जरूरी हो गया है...देखो कैसे खड़ा है तुम्हारा...लं..लंड।"

न...नहीं नहीं मुझे नहीं लगवाना मुट्ठ।" मैं घबरा कर फिर से पीछे हट गया─"पता नहीं अचानक से क्या हो गया है तुम्हें। जा रहा हूं मैं।"

कहने के साथ ही मैं जैसे ही पलट कर जाने को हुआ तो पीछे से काकी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और अपनी तरफ खींच लिया।

"रुक जाओ न राजू।" फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़े ही कहा─"जाने की इतनी जल्दी क्या है। कुछ देर अपनी काकी के पास रुको न।"

"न..नहीं मुझे जाना है....छोड़ो मुझे।"

"सुनो राजू।" काकी का बर्ताव थोड़ा सा बदला─"तुमने तो सब देख ही लिया है। ये भी जान गए हो कि तुम्हारे काका मुझे मझधार पर छोड़ कर चल गए हैं।"

"हां तो???"

"क..क्या....क्या ऐसा नहीं हो सकता कि अपने काका का अधूरा काम तुम पूरा कर दो।" काकी ने ये कह कर जैसे मेरे ऊपर बंब ही फोड़ दिया।

"क...क्या???" 

मैं उछल पड़ा। आश्चर्य से मेरी आँखें फट पड़ीं। यकीन ही न हुआ कि ऐसी बात काकी कह सकती हैं। 

"मुझे पता है कि ये बहुत गलत बात है राजू।" फिर वो एकाएक संजीदा हो के बोलीं─"मगर फिर भी मैं खुद ऐसा करने को कह रही हूं तुमसे।"

"नहीं नहीं....ये गलत है।" मैं हैरान परेशान के साथ साथ घबराहट और दुविधा में बोला─"मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता।"

"तो अब सोच लो राजू।" काकी ने एकदम से मेरा चेहरा थाम लिया─"भूल जाओ कि इस वक्त तुम्हारे सामने तुम्हारी काकी खड़ी है....ये सोचो कि मैं एक ऐसी औरत हूं जो तुम्हें अपनी खुशी से वो काम करने को कह रही हूं जिसे करने के लिए तुम्हारी उम्र के लड़के जाने कहां कहां भटकते हैं और जाने क्या क्या जुगाड़ लगाते हैं।"

मैं अवाक सा देखता रह गया उन्हें। अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा मेरी काकी कह रही हैं। मेरे अंदर बड़ा तेज तूफान उठा हुआ था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि ऐसे वक्त पर मैं क्या करूं। काकी से जो रिश्ता था उसका एक डर था, दूसरे...किसी को पता चल जाने का डर....और सबसे बड़ा डर ये कि मैंने ऐसा काम कभी किया ही नहीं है। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि मेरी जगह कोई और होता तो ऐसा सुनहरा मौका किसी कीमत पर नहीं छोड़ता। मगर मैं अपनी हालत से बेबस था। समझ ही नहीं पा रहा था कि क्या करूं।

काकी का अचानक से रंग बदलना और फिर मुझसे इस तरह का काम करने को कहना मेरी कल्पना में ही नहीं था। मुझे ये भी डर सता रहा था कि कहीं वो मेरे साथ कोई खेल तो नहीं खेल रही हैं। अभी तो ये है कि उनकी कमजोर नस मेरे हाथ में है लेकिन ऐसा कुछ हो जाने से क्या पता मैं खुद किसी मुसीबत में फंस जाऊं।


जारी है...................
Read my story 

हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)


  flamethrower It's Rajan  flamethrower
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#59
Sorry, I was too busy so couldn't get enough time for replying but look like next update gonna be blast :)
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#60
इस कहानी के इस भाग में टेंशन और उत्तेजना दोनों पीक पर पहुँच गई है। काकी में अचानक परिवर्तन आना (पहले शर्म, फिर सीधे प्रपोज करना) बहुत अच्छा twist है। राजू की घबराहट, डर और लालच का मिक्सचर बहुत रियल लग रहा है, वो जो inner conflict दिखा रहे हो, वो पढ़ने में काफी मजा देता है।

कुछ पॉइंट्स जो मुझे खास पसंद आए:
- काका-काकी की चुदाई सीन डिटेल में अच्छा लिखा है, लेकिन over-described नहीं लगा – बैलेंस ठीक रखा।
- काकी का "सुनीता के बापू" वाला स्लिप – ? ये लाइन कमाल की है, पूरा मूड चेंज कर देती है।
- राजू का वो डर कि "कहीं खेल तो नहीं, खेल रही" ये सोच बहुत natural है, 99% लड़के ऐसे ही सोचेंगे।
- क्लाइमेक्स पर काकी का direct "अधूरा काम पूरा कर दो" ओ भाई साहब, दिल की धड़कन बढ़ा दी!

अब आगे क्या होने वाला है, ये suspense kill कर रहा है:
- राजू मानेगा या भागेगा?
- अगर माना तो first time का सीन कैसा होगा – nervous, awkward या suddenly wild?
- कहीं बाकी सब महिलाएं न आ जाएँ!
- काकी सच में desperate है या राजू को trap करने की कोशिश?

प्लीज अगला भाग जल्दी डालो भाई।  
इंतज़ार नहीं हो रहा – राजू का जवाब क्या होगा?  
काकी आगे क्या करेगी अगर राजू मना कर देगा?
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