04-01-2026, 07:21 PM
Dear friends story pasand aaye to like comment jarur karna jisse mujhe motivation mile..........
अगला भाग जल्दी ही आएगा .........
अगला भाग जल्दी ही आएगा .........
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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
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04-01-2026, 07:21 PM
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अगला भाग जल्दी ही आएगा .........
05-01-2026, 07:23 PM
भाग ~ ०५
"हां काका ये तो बढ़िया है।" मैंने कहा─"तो अभी जा रहे हो क्या तुम।" "हां...बस इन मवेशियों को चारा भूसा दे दूं फिर निकलता हूं।" काका की बात सुन कर मैं मन ही मन ये सोच कर खुश हो गया कि अब मैं रात में काकी से सब कुछ जान लूंगा। इसके साथ ही खुशी खुशी मैं ये भी सोचने लगा कि काकी से मुझे और क्या क्या जानने को मिल सकता है। जाने क्यों मैं अजीब अजीब सी कल्पनाएं करने लगा। गतांग से आगे........... दशरथ काका को दो बेटियां थी। बड़ी बेटी उमर में मेरी बहन अनीता से एक साल छोटी थी और उनकी दूसरी बेटी करीब ढाई साल छोटी थी। काका काकी को कोई बेटा नहीं था। काकी का दो बार पेट खराब हुआ था जिससे उनको बहुत तकलीफ हुई थी। शहर के डॉक्टर ने सलाह दी थी कि कुछ साल तक वो बच्चे पैदा करने का न सोचें। इस बात को अब कई साल हो गए थे मगर अब काकी को बच्चा ही नहीं हो रहा था। पता नहीं क्या गड़बड़ी थी जिससे उनको बच्चा नहीं हो रहा था। वैसे मुझे इस बारे में ज्यादा पता नहीं था....बाकी घर वालों को शायद सच पता हो। खैर दशरथ काका मवेशियों को चारा भूसा डाल कर मेरे सामने ही घर से चले गए थे। मंजू काकी को उन्होंने मेरे सामने ही बताया था कि मैं आज रात उनके साथ घर में रहूंगा इस लिए उन्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं है। वैसे तो फिक्र करने जैसी कोई बात ही नहीं थी क्योंकि बगल से ही श्यामू काका का घर था तो वो भी देखरेख कर सकते थे। मगर ये भी था कि वो अपने घर के अंदर ही रहते और रात सो जाने के बाद कहां किसी को कुछ खयाल रहता है। शायद यही सोच कर मझले काका ने मुझे अपने घर पर सोने के लिए कहा था। काका के जाने के बाद मैं काकी के साथ ही घर के अंदर आ गया था। जब से काकी और बापू के संबंधों का मुझे पता चला था तब से काकी के प्रति मेरा नजरिया और मेरे खयाल बदल गए थे। पहले उनसे सामना होने पर झिझक होती थी लेकिन अब ऐसा नहीं था। "तुमने किसी को उस बारे में बताया तो नहीं न।" अन्दर आते ही काकी ने सबसे पहले यही पूछा मुझसे। "मैंने किसी को नहीं बताया काकी।" मैंने कहा─"इतना मुझे भी पता है कि ऐसी बातें किसी को बताना अच्छा नहीं होता।" "सही कहा तुमने।" काकी बोलीं─"ऐसी बातें कभी भूल कर भी किसी को नहीं बताना चाहिए वरना बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता है। इंसान की बदनामी होती है और माथे पर कलंक लग जाता है। गांव समाज के लोग ऐसे इंसान का जीना हराम कर देते हैं।" "अगर ये इतना भयानक है तो तुमने और बापू ने क्यों किया था ऐसा।" मैंने कहा─"ऐसा करने से पहले इस सबके बारे में क्यों नहीं सोचा था काकी।" "बस ये समझ लो राजू कि हमारी मति मारी गई थी।" काकी ने सिर झुका कर कहा─"उस वक्त बस यही लग रहा था कि हम जो कर रहे हैं सही कर रहे हैं।" "तो बताओ काकी।" मैंने उत्सुक हो कर पूछा─"फिर आगे क्या हुआ था बापू और तुम्हारे बीच।" "अभी नहीं राजू।" काकी ने गहरी सांस ली─"अभी तुम्हें वापस अपने घर जाना पड़ेगा। ऐसे में वो कहानी फिर से बीच में रुक जाएगी। तुम एक काम करो....घर जाओ और जीजी को ये बता कर आओ कि आज रात तुम मेरे घर में ही सोओगे। जीजी पूछें तो उन्हें बता देना कि तुम्हारे काका नाहरपुर तुम्हारी छोटी बहनों को लेने गए हैं। "ठीक है काकी।" "और हां...खाना मत खाना।" मैं जैसे ही जाने के लिए पलटा तो पीछे से काकी ने कहा─"वापस आ कर मेरे साथ ही खाना खाना।" मैंने हां में सिर हिलाया और झट से अपने घर की तरफ निकल गया। इस बार मेरी रफ्तार तेज हो गई थी क्योंकि वापस आ कर काकी से सब कुछ जानने की जल्दी थी। घर पहुंच कर मैंने मां को सब कुछ बताया। जब उसने मुझे जाने की इजाजत दे दी तो मैं बड़ी तेजी से वापस काकी के घर की तरफ लगभग दौड़ ही पड़ा। रात का अंधेरा फैलने लगा था। वैसे तो गर्मियों में गांव के सब लोग घर के बाहर खाली पड़ी जमीन पर या फिर घर के अंदर आंगन में खाट बिछा कर सोते थे। लेकिन आज क्योंकि काका नहीं थे और काकी मुझे अपना जो किस्सा बताने वाली थीं वो आंगन में होने की वजह से किसी के कानों तक न पहुंच जाए इस लिए खाट को अंदर बरोठ में बिछा दिया था हमने। खैर सबसे पहले हमने खाना खाया। फिर काकी ने बर्तन धोए ताकि सुबह वो जल्दी से नाश्ता बना खा कर खेतों में कटाई करने जा सकें। सारा काम निपटा कर वो बरोठ में बिछी अपनी खाट पर आ कर बैठ गईं। बरोठ में गर्मी लग रही थी इस लिए मैंने अपनी कमीज उतार कर खाट के सिरहाने रख दिया था। मैं कमर से ऊपर पूरा नंगा था जबकि नीचे छोटा सा पेंट पहने था। उधर काकी को भी गर्मी लग रही थी मगर वो मेरी तरह ऊपर से नंगी हो सकती थीं। अपनी गर्मी को दूर करने के लिए उन्होंने बांस का एक पंखा ले लिया था जिसको धौंक कर वो अपने ऊपर हवा कर रहीं थी। "आज कुछ ज्यादा ही गर्मी है न।" काकी ने धोती के पल्लू से अपने चेहरे का पसीना पोंछते हुए कहा─"मैं तो पसीने में पूरा भीग ही गई।" "तुम अपनी धोती उतार दो काकी।" मैंने कहा─"बदन में थोड़ा हवा लगेगी तो इतनी गर्मी नहीं लगेगी।" "मेरा तो मन करता है कि धोती ब्लाउज सब उतार कर फेंक दूं।" काकी ने शायद गर्मी से परेशान हो कर कहा मगर उनके ऐसा कहने पर मैं चौंक पड़ा। "ये क्या कह रही हो काकी।" मैंने हैरान हो कर कहा─"क्या मेरी तरह तुम भी ऊपर से नंगी हो जाओगी।" "तुम न होते तो हो भी जाती।" काकी इस बार जाने क्या सोच कर मुस्कुराईं─"पर तुम हो तो ऐसा नहीं कर सकती।" "क..क्यों भला।" मैंने भोलापन दिखा कर कहा। ये अलग बात है कि एकाएक ही मेरी धड़कनें तेज हो गईं थी। "क्योंकि तुम अब बड़े हो गए हो।" काकी गहरी नजरों से मुझे देख बोलीं─"मुझे उस हालत में देख कर अगर तुम्हारे मन में गलत विचार आ गया तो.....तो क्या करूंगी मैं।" "ये...ये क्या कह रही हो तुम।" मैं एकदम से चौंक पड़ा। "ज्यादा भोले न बनो राजू।" काकी फिर से मुस्कुराईं─"मुझे पता है कि तुम इतने भी भोले नहीं हो।" "अच्छा ये छोड़ो।" मैं पहले तो सकपकाया फिर बात बदल कर बोला─"और आगे का किस्सा बताओ। मैं सब कुछ जानना चाहता हूं और हां कुछ मत छुपाना मुझसे....हां।" काकी ने बड़े गौर से देखा मुझे। थोड़ी देर तक पता नहीं क्या सोचती रहीं। फिर एक गहरी सांस ली। ####### "तुम्हारे बापू समझ गए थे कि उनके द्वारा इस तरह तारीफें करने से मुझे अब अच्छा लगने लगा था।" मंजू काकी ने आगे का किस्सा सुनाना शुरू किया─"इस लिए उनकी हिम्मत और बढ़ गई थी। अब वो और भी ज्यादा मुझे लुभाने लगे थे।" "कि...किस तरह लुभाने लगे थे वो।" "पहले तो वो मेरी तारीफें ही कर रहे थे।" काकी ने बताया─"लेकिन अब कहने लगे थे कि मेरी नाक में इस छोटे से फूल की जगह अगर एक सोने की नथ होती तो मेरी सुंदरता में चार चांद लग जाते।" "क...क्या सच में।" मेरी आँखें फैलीं। "हां....उनकी ये बात सुन कर मैं और भी पिघल गई।" काकी ने आगे बताया─"झट से मेरे मन में खयाल उभरा कि क्या सच में ऐसा हो सकता है। तभी वो बोले....मंजू मैं कल ही तेरी इस सुंदरता को बढ़ाऊंगा।" "म..मतलब....कैसे।" मैं चकरा गया। "मेरे मन में भी यही सवाल उभरा था।" मंजू काकी ने कहा─"लेकिन मेरे बिना पूछे ही उन्होंने बताया कि वो कल सुनार के यहां से मेरे लिए एक सोने की नथ खरीद कर लाएंगे। मेरे लिए ये बहुत बड़ी बात हो गई थी। आज तक तुम्हारे काका ने ऐसा कुछ ला कर नहीं दिया था। मेरे बहुत झगड़ने पर एक बार वो छोटा सा फूल ले कर आए थे जिसे इस वक्त मैं पहन रखी हूं।" मैंने देखा काकी अपनी नाक में सचमुच एक फूल पहने हुए थीं जो सोने का ही लग रहा था। "औरत अगर सम्हलना न चाहे और वो दिमाग से न सोचे तो समझो ऐसे ही पिघल जाती है वो।" काकी ने आगे कहा─"तुम्हारे बापू मुझे पिघलाना ही तो चाहते थे और मैं सचमुच पिघलती जा रही थी। मुझे चुप देख और कोई विरोध न करता देख उनकी हिम्मत और बढ़ गई। वो समझ चुके थे कि अब अगर वो मेरे साथ कुछ उल्टा सीधा भी करने लगेंगे तो शायद मैं विरोध नहीं करूंगी।" "तो क्या सच में तुमने उनका विरोध नहीं किया था।" मैंने पूछा। "कैसे करती और क्यों करती राजू।" काकी ने कहा─"वो पूरी कुशलता से एक औरत की सुंदरता का बखान कर रहे थे। मुझे रानी की तरह रखने को बोल रहे थे। मेरे लिए सब कुछ करने की बात कह रहे थे तो भला ऐसे में कैसे उनका विरोध करती मैं। हां तुम ये कह सकते हो कि ऐसा एक सच्चे चरित्र वाली औरत कभी न करती। बल्कि वो ये करती कि उसी वक्त उस गैर मर्द को खरी खोटी सुनाती और अपने घर से चले जाने को कह देती। अगर इतने पर भी वो गैर मर्द मनमानी ही करता तो अपनी लाज बचाने के लिए वो शोर मचा देती.....मगर मैं ऐसी औरत नहीं थी शायद। तभी तो ऐसा कुछ भी नहीं किया था मैंने। मतलब मैं उस वक्त उनकी प्रेम भरी बातों में आ गई थी। उनकी रंगीन बातों के जाल में फंसती जा रही थी। इससे भी ज्यादा ये कि मैं अपने अंदर ऐसी चाहत करने लगी थी कि काश ऐसा सच में ही हो जाए।" मैं भौचक्का सा देख रहा था काकी को। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा सच में हो चुका है। "मंजू....मेरी प्यारी मंजू कुछ बोल न मुझसे।" उधर काकी आगे का किस्सा सुना रहीं थी─"जेठ जी ने जब इतने प्यार से मुझे पुकारा तो मैं स्वप्नलोक से बाहर आई और उन्हें देखने लगी। उनकी आंखों में मुझे अपने लिए प्रेम ही प्रेम दिख रहा था। पहले मैं उनसे नजरें नहीं मिला पा रही थी लेकिन अब एकटक उनकी आंखों में ही देखे जा रही थी। अपने अंदर मुझे अजीब सा मीठा एहसास हो रहा था। तभी अचानक वो हुआ जिसकी उस वक्त मैंने कल्पना तक नहीं की थी।" "क...क्या....क्या हुआ था।" मारे उत्सुकता के मैं पूछ बैठा। दिल की धड़कनें एकदम से तेज हो गईं। "उन्होंने एकदम से अपना चेहरा आगे बढ़ाया और फिर मेरे गाल को चूम लिया।" मंजू काकी ने बताया─"उनके ऐसा करते ही मैं बुरी तरह कांप गई। आश्चर्य और अवाक सी हो कर उन्हें देखती रह गई। कुछ बोल ही न सकी मैं...जबकि उन्होंने कहा...तू इतनी प्यारी और सुंदर है कि मैं तुझे चूमने से खुद को रोक ही नहीं पाया मेरी प्यारी मंजू। तूने इसका बुरा तो नहीं माना न।" "क्या सच में तुम्हें बुरा नहीं लगा था काकी।" मैंने हैरत से आँखें फाड़े मंजू काकी से पूछा। "बस अजीब लगा था राजू।" काकी ने कहा─"उनसे मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी इस लिए बहुत अजीब लगा था मगर हां....बुरा नहीं लगा था। क्योंकि चूमने के बाद जो बात उन्होंने कही थी वो सीधा मेरे दिल में उतर गई थी। एक बार फिर से ये सोच कर मेरे अंदर मीठा एहसास होने लगा था कि कितनी खुशनसीब हूं मैं कि मेरे अपने ही जेठ मुझ पर लट्टू हो चुके हैं। मतलब मुझमें इतनी बड़ी बात है कि वो खुद को रोक ही नहीं पा रहे हैं। अचानक इस खयाल ने मुझे थोड़ा मायूस कर दिया कि काश तुम्हारे काका भी ऐसे होते। काश वो भी दिल में उतर जाने वाली ऐसी मीठी बातें करते और मेरी तारीफें करते। ये सब सोच कर बुरा तो लगा मगर क्या कर सकती थी। शायद यही मेरे नसीब में था। मगर उस वक्त जो खुशनसीबी की बरसात हो रही थी उसमें अब मैं भीग जाना चाहती थी। मेरा मन कर रहा था कि मैं खुद को अब जेठ जी के हवाले कर दूं।" "तो क्या सच में ऐसा कर दिया तुमने।" "शायद कर ही देती...अगर उसी समय घर में किसी के आ जाने का आभास न हुआ होता।" काकी ने बताया─"थोड़ी मायूसी तो हुई थी लेकिन ये अच्छा ही हुआ था क्योंकि खुले आसमान के नीचे जिस हालत में मैं जेठ जी की बाहों में थी उस हालत में अगर कोई देख लेता तो बहुत बड़ी आफत हो जाती। खैर मेरी छोटी बिटिया रानी आ गई थी इस लिए जल्दी ही हम दोनों सम्हल गए। जेठ जी ने जल्दी से मुझे कमरे में पहुंचाया और फिर जमीन पर आहिस्ता से खड़ा कर दिया। रानी बाहर आंगन में खेलने लगी थी। इधर मेरी हालत फिर से खराब और अजीब हो गई थी क्योंकि मेरा गीला साया फिर से मेरी छातियों से फिसल गया था और मेरी दोनों छातियां जेठ जी के सामने उजागर हो गईं थी। शर्म तो बहुत आई लेकिन अब क्या कर सकती थी। मैंने जल्दी से साए को ऊपर खींच कर अपनी नंगी छातियों को उनसे छुपाना चाहा मगर तभी जेठ जी ने मेरा हाथ पकड़ लिया।" "क...क्या????? मतलब...मतलब ऐसा क्यों किया बापू ने।" मैं एकदम से झटका खा कर पूछ बैठा काकी से। "मैं भी ऐसे ही झटका खा गई थी।" काकी ने कहा─"मैंने जब हड़बड़ा कर उन्हें देखा तो वो बोले.....क्यों इतनी खूबसूरत चीज को मुझसे छुपा रही है मंजू। कुछ देर देख लेने दे न मुझे। इन खूबसूरत पर्वत शिखरों को अपनी आंखों में बसा लेने दे न।" "क्या...बापू ने सच में ऐसा कहा।" मैंने चकित हो कर पूछा। "हां राजू ऐसा ही कहा था उन्होंने।" काकी ने कहा─"मेरे दिमाग ने तो काम ही करना बंद कर दिया था। सपने में भी नहीं सोचा था कि जेठ जी ऐसे मिजाज के होंगे। ऐसी रंगीन और मीठी बातें करते होंगे।" "फिर तुमने क्या किया।" "मुझे कुछ करने का मौका ही कहां मिल रहा था राजू।" मंजू काकी ने बताया─"अभी तो में उनकी उसी बात पर खुद को सामान्य बनाने में लगी थी कि अगले ही पल उन्होंने एक और गजब कर दिया।" "क...क्या.....ऐसा क्या कर दिया था बापू ने।" मेरी धड़कनें एकाएक तेज तेज चलने लगीं थी। मन ही मन हैरान था कि मेरे बापू ये क्या क्या कर रहे थे काकी के साथ। "इससे पहले कि मैं कुछ सोच समझ पाती।" उधर काकी ने आगे बताया─"तुम्हारे बापू तेजी से आगे बढ़े। फिर एकदम से मेरी दोनों छातियों को उन्होंने अपने दोनों हाथों में थाम लिया और फिर बारी बारी से मेरे दोनों निप्पल को मुंह में भर कर चूस लिया। उसके बाद झट से पीछे हो गए।" "क..क्या????? म...मतलब...ये क्या कह रही हो तुम।" काकी की बात सुनते ही मैं बुरी तरह उछल पड़ा था। मारे आश्चर्य के मेरा मुंह खुला का खुला रह गया था। अगर यही बात किसी और ने मुझे बताई होती तो मैं किसी कीमत पर भरोसा न करता मगर ये बात काकी खुद बता रहीं थी इस लिए भरोसा करना मजबूरी बन गई थी। मैं सोचने लगा कि काकी अपने बारे में भला इतना बड़ा झूठ क्यों बोलेंगी। मेरी नजरों में वो खुद को इस तरह क्यों गिराएंगी। "हां राजू यही सच है।" तभी मंजू काकी ने कहा─"उस वक्त जब तुम्हारे बापू ने ये गजब किया था तो डर के मारे मेरी चीख ही निकल गई थी। बड़ी मुश्किल से मुंह में हथेली रख कर अपनी चीख को दबाया था। फिर जल्दी से साया को ऊपर खींच कर अपनी नंगी छातियों को छुपा लिया था। मुझे जेठ जी से ऐसे दुस्साहस की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि दो ही पलों में उन्होंने कितना बड़ा गजब कर दिया है मेरे साथ। भय से थरथर कांपे जा रही थी मैं।" "मुझे भी यकीन नहीं हो रहा काकी।" मैं बोल पड़ा─"सच में बापू ने गजब ही कर दिया था। अच्छा फिर आगे क्या हुआ।" "इस सबके बाद उस दिन फिर कुछ और नहीं हुआ।" काकी ने गहरी साँस ले कर कहा─"मेरी छोटी बेटी रानी आंगन में ही खेल रही थी और बड़ी बेटी सुनीता भी किसी भी वक्त आ सकती थी। इस लिए जेठ जी ने फिर और कुछ नहीं किया था और चले गए थे मगर जाते जाते ये जरूर कह गए थे कि वो कल मेरे लिए सोने की नथ ले कर आएंगे। मैं कोई जवाब देने की हालत में ही नहीं थी इस लिए चुप ही रही। खैर उनके जाने के बाद मैंने राहत की सांस ली। किसी तरह कपड़े पहने और घर के काम में लग गई। घुटने का दर्द थोड़ा कम हो गया था इस लिए ज्यादा परेशानी नहीं हो रही थी मगर सारा दिन मेरे दिलों दिमाग में वही सब चलता रहा था। मैं कितना भी कोशिश करती उस सबको भुलाने की मगर हर बार वही सब याद आता। कभी कभी ये भी सोचने लगती कि क्या मुझे इस बारे में तुम्हारे काका को बता देना चाहिए। फिर सोचती कि नहीं....मुझे उनको कुछ नहीं बताना चाहिए वरना नाहक में उनका अपने बड़े भाई के साथ क्लेश हो जाएगा। दूसरी बात ये भी थी कि कहीं न कहीं मेरे मन में ये भी था कि....एक बार देखना चाहिए कि जेठ जी सच में क्या वैसा करते हैं जो मुझसे कह कर गए हैं। ये भी तो हो सकता है कि उन्होंने उस वक्त वैसा मौका देख कर मुझसे वो सब झूठ ही कहा हो।" "तो क्या फिर तुमको पता चला इस बात का।" "हां दूसरे ही दिन जेठ जी घर पर आ गए थे।" मेरी उम्मीद के विपरीत काकी ने बताया─"मुझे तो भरोसा ही नहीं हो रहा था कि वो सच में आ गए हैं।" "जब वो आए थे तब उस वक्त क्या मझले काका घर पर नहीं थे।" "वो खेतों पर थे।" काकी ने कहा─"असल में जेठ जी ने वक्त ही ऐसा चुना था घर पर आने का। उन्हें पता था कि उनके मझले भाई दोपहर से पहले घर नहीं लौटेंगे। संजोग से उस वक्त मेरी दोनों बेटियां भी घर पर नहीं थी। वो दोनों पड़ोस में रहने वाली सरला के साथ नदी में नहाने चली गईं थी। सिर्फ मैं ही थी घर पर। उस वक्त मैं रसोई में खाना बना रही थी। जब मैंने तुम्हारे बापू को देखा तो एकदम से घबरा गई थी। ये सोच कर दिल की धड़कनें बढ़ गईं थी कि जाने आज वो क्या बोलने वाले हैं और जाने क्या करने वाले हैं।" "क्या वो कुछ गलत करने के इरादे से आए थे।" मैंने धड़कते दिल से पूछा। "लगा तो मुझे भी यही था।" मंजू काकी ने बताया─"इसी लिए तो उन्हें देख के घबरा गई थी मैं। उस वक्त घर में कोई नहीं था तो ये भी लग रहा था कि कहीं कोई आ न जाए और गलत सोच ले। खैर मैंने डरते हुए धीमे से पूछा कि आप क्यों आए हैं जबकि घर में कोई नहीं है। जवाब में उन्होंने अपने कुर्ते के जेब से एक डिब्बी निकाली और मेरे पास आ कर कहा...मैं अपना वादा पूरा करने आया हूं मेरी प्यारी मंजू। देख ले मैं तेरे लिए सोने की नथ ले कर आया हूं। "क्या सच में?????" मैं आश्चर्य से बोला। "हां राजू।" काकी ने कहा─"मुझे भी बड़ा आश्चर्य हुआ था और ये सोच कर झटका भी लगा था कि सच में उन्होंने वो किया था जो पिछले दिन बोल कर गए थे। अचानक मेरे मन में खयाल उभरा कि....इसका मतलब वो मुझसे प्रेम का झूठा दिखावा नहीं कर रहे थे। मतलब उन्होंने मुझसे जो जो कहा था वो सब दिल से ही कहा था। मेरे प्रति प्रेम होने की वजह से कहा था। सच कहती हूं राजू...उस वक्त जब मुझे ये एहसास हुआ तो एकदम से मैं अंदर ही अंदर खुशी से झूम उठी थी। एक बार भी ये नहीं सोचा कि ये जो हो रहा है वो सही नहीं है। बल्कि यही लगने लगा था कि जिस तरह जेठ जी ने मुझे अपने प्रेम का सबूत दे दिया है वैसे ही अब मुझे भी उनको जताना चाहिए कि मेरे मन में भी उनके लिए कुछ है।" "क्या सच में तुम्हारे मन में ऐसा कुछ था काकी।" मैंने हैरानी से मंजू काकी की तरफ देख कर पूछा। "हां राजू।" उन्होंने कहा─"तुम ही सोचो कि अगर ऐसा न होता तो क्या मैं उस सबको इस तरह बिना कोई विरोध किए कबूल करती चली जाती। मतलब कुछ तो था ही न मेरे मन में। तभी तो मैं जेठ जी के किसी भी बर्ताव पर गुस्सा नहीं हो रही थी। तभी तो मैं उस सबके बारे में तुम्हारे बापू से कुछ कह नहीं रही थी।" "हां सही कह रही हो तुम।" मैंने सहमति में सिर हिलाया─"तो फिर तुमने आगे क्या किया था।" "जब जेठ जी ने डिब्बी में बंद सोने की नथ मुझे दी तो मैंने उसे धीरे से उठा लिया।" काकी ने बताया─"उस वक्त मैं उनके सामने घूंघट किए हुए थी इस लिए मैं बेझिझक खुशी से मुस्कुराए जा रही थी और वो मेरा खुशी से मुस्कुराना नहीं देख सकते थे। मैंने उसी खुशी से डिब्बी को खोला तो उसके अंदर सच में एक बहुत ही सुंदर सोने की नथ मौजूद थी। उसे देख मेरे बदन का रोम रोम सिहर उठा था। तभी जेठ जी बोले...एक बार इस नथ को अपनी नाक में पहन कर मुझे दिखा मंजू। मैं देखना चाहता हूं कि इस नथ को पहनने के बाद मेरी मंजू कितनी प्यारी और कितना सुंदर दिखती है। उनकी ये बात सुन कर फिर से मेरा रोम रोम सिहर उठा। ये सोच कर धड़कनें बढ़ गईं कि कैसे मैं उनकी इस चाहत को पूरा कर पाऊंगी। वैसे तो मेरा मन यही करना चाह रहा था मगर एक झिझक थी जिसकी वजह से ऐसा करने की हिम्मत नहीं हो रही थी।" "तो क्या फिर तुमने उस नथ को सच में नहीं पहना था।" "ऐसा कर ही नहीं सकती थी मैं।" काकी ने लंबी सांस खींच कर कहा─"मैं भला उस इंसान का कैसे दिल तोड़ देती जिसने मुझे ये एहसास कराया था कि मेरी कितनी अहमियत है....मैं कितनी सुंदर हूं। और तो और किस कदर मैं उनके दिलो दिमाग में छा गई हूं। उन्होंने सच्चे दिल से अपना वादा निभाते हुए नथ ला कर दी थी तो कैसे मैं उसे पहनने से इंकार कर देती। वैसे भी वो नथ कोई मामूली नथ नहीं थी। बल्कि सोने की नथ थी जिसे मेरे जेठ जी अपने प्रेम की निशानी के रूप में मेरे लिए लाए थे।" "मतलब तुमने उस नथ को पहना था।" जाने क्यों मुझे उनकी इस बात से मायूसी हुई। "हां उसे तो पहनना ही था राजू।" मंजू काकी बोलीं─"उस वक्त मेरा दिल और मेरा जमीर यही चाहता था कि मैं अपने जेठ जी की खुशी के लिए वो नथ पहन लूं और फिर उन्हें दिखाऊं। मैंने उसी वक्त खाना बनाना छोड़ा और रसोई से निकल कर कमरे की तरफ चल पड़ी। पहले तो लगा था कि पीछे पीछे कहीं जेठ जी भी न चले आएं मगर वो बाहर ही खड़े रहे थे। इधर कमरे में आ कर मैंने नाक से अपने इस फूल को निकाला और फिर तुम्हारे बापू की लाई उस नथ को पहन लिया। उसके बाद जब मैंने शीशे में खुद को देखा तो उस नथ को पहने मैं अलग ही दिख रही थी। सच में वो नथ उस छोटे फूल से कहीं ज्यादा सुंदर और अनोखी लग रही थी। शीशे में खुद को देखते हुए मैं सोचने लगी कि अब कैसे घूंघट हटा कर मैं नथ पहने खुद को जेठ जी को दिखाऊंगी। मुझे अब बहुत ज्यादा शर्म आने लगी थी। तभी बाहर से जेठ जी की आवाज आई। वो पूछ रहे थे कि क्या मैंने नथ पहन लिया है और अगर पहन लिया है तो अब जल्दी से बाहर आ कर उन्हें दिखाऊं।" "काफी मस्त कहानी है काकी।" मैं न चाहते हुए भी बोल पड़ा─"फिर आगे क्या हुआ। क्या फिर तुमने कमरे से बाहर निकल कर बापू को नथ दिखाया।" "बाहर जाने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी राजू।" मंजू काकी ने कहा─"दिल की धड़कनें बढ़ी हुई थीं। अन्दर से जी घबरा रहा था। मन में तरह तरह के विचार आ रहे थे। ये भी डर लग रहा था कि कहीं कोई आ न जाए। जब मैं काफी देर तक कमरे से बाहर न निकली तो जेठ जी मानो बेचैन हो उठे थे। एक बार फिर से उन्होंने आवाज दी मुझे मगर जब मैं फिर भी बाहर न निकली तो शायद वो ये समझे कि मैं ही उन्हें अंदर आने का इस तरह से इशारा कर रही हूं।" "क..क्या??? मतलब...क्या फिर वो कमरे में ही आ गए थे।" मैंने हैरानी से पूछा। "हां राजू।" काकी ने कहा─"जब वो एकदम से कमरे में ही आ गए तो मैं बुरी तरह घबरा गई। डर के मारे होश उड़ गए थे मेरे। मुझे सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि वो इस तरह कमरे में ही आ धमकेंगे। मेरी अजीब सी हालत देख वो बोले....माफ करना...जब तू बाहर नहीं निकली तो मुझे लगा शायद तू मुझे ही उस तरह अंदर बुलाने का इशारा कर रही है। तू कुछ बोल भी तो नहीं रही थी। कमरे का दरवाजा खुला हुआ था इस लिए अंदर सब कुछ साफ दिख रहा था। मैंने घबरा कर जल्दी से घूंघट कर लिया था इस लिए वो मेरा चेहरा नहीं देख सकते थे। एकाएक मुझे ये खयाल आया कि ये कैसी अजीब स्थिति हो गई है। मतलब कि मैं अपने कमरे में घूंघट किए खड़ी थी और वो कमरे में आ कर अब इस बात का इंतजार कर रहे थे कि कब मैं अपना घूंघट हटा कर उन्हें चेहरा दिखाऊं। ये बिल्कुल वैसा ही था जैसे ब्याह के बाद पहली रात को नई नवेली दुल्हन कमरे में खाट पर घूंघट किए बैठी अपने मरद के आने का इंतज़ार कर रही होती है। इस खयाल के आते ही मेरा पूरा बदन थरथरा गया। मैंने सोचा कहीं ऐसा ही तो नहीं हो जाएगा मेरे साथ क्योंकि उस वक्त कुछ ऐसी ही परिस्थितियां बन गई थी।" "फिर???" "अब ऐसे तो न तरसा मेरी प्यारी मंजू।" काकी ने आगे बताना शुरू किया─"अचानक जेठ जी की ये बात सुन कर मैं अंदर तक कांप गई लेकिन जिस मनमोहक अंदाज में उन्होंने ऐसा कहा था उसे सुन कर मेरा रोम रोम खुशी से नाच उठा था। मन किया कि झट से घूंघट हटा कर अपने उस दीवाने को चेहरा दिखा दूं मगर शर्म और झिझक के कारण ऐसा नहीं कर पाई थी मैं। तभी मुझे महसूस हुआ कि वो मेरी तरफ धीरे धीरे बढ़ने लगे हैं। ये देख मैं फिर से घबरा उठी और मेरी धड़कनें तेज हो गईं। मन में खयाल उभरा कि अब क्या करूं। कैसे इस विकट स्थिति से खुद को बचाऊं। उधर वो एकदम मेरे पास आ गए। फिर अचानक से बोले....तू बहुत जालिम है मेरी प्यारी मंजू। क्यों अपने इस दीवाने को इतना तरसा रही है। क्यों अपने इस आशिक को तू अपना ये चांद जैसा चेहरा नहीं दिखा रही है। तू बोल तो इसके लिए तेरे आगे हाथ जोड़ लूं और तुझसे भीख मांगू। इतना कहते ही सच में उन्होंने अपने हाथ जोड़ लिए। मैं हैरान परेशान और भौचक्की सी देख रह गई उन्हें। फिर एकदम से हड़बड़ाहट में मेरे मुंह से निकल गया....ये ये क्या कर रहे हैं जेठ जी। मेरे आगे हाथ जोड़ कर मुझे शर्मिंदा मत कीजिए।" "फिर???" मैं भौचक्का सा हो कर पूछ बैठा। "फिर क्या...मैंने इतना कहा और फिर हिम्मत जुटा कर झट से अपना घूंघट ऊपर कर लिया।" काकी ने कहा─"अपने उस दीवाने को अब और ज्यादा तरसाने की हिम्मत नहीं थी मुझमें। कितनी मासूमियत से और कितनी आस लगाए वो मेरा चेहरा देखने के लिए खड़े थे और मैं उन्हें मायूस कर दूं? नहीं राजू....इतनी पत्थर दिल नहीं बन सकती थी मैं। खैर जैसे ही मैंने अपना घूंघट ऊपर किया तो मेरा चेहरा उनकी आंखों के सामने उजागर हो गया। वो बिना पलकें झपकाए एकटक देखने लगे लगे थे मुझे और मैं मारे शर्म के जैसे जमीन पर गड़ जाने वाली थी। लेकिन किसी तरह उनसे नजरें मिलाए रही। मैं चाहती थी कि वो अच्छी तरह से मेरा चेहरा देख लें। तभी अचानक वो आगे बढ़े और झपट कर मुझे अपने सीने से लगा लिया।" "क्या????" मतलब क्या सच में उन्होंने ऐसा किया।" मैं हैरान रह गया। "हां राजू उन्होंने ऐसा ही किया था।" काकी ने कहा─"और मैं हक्की बक्की रह गई थी। डर के मारे मेरी चीख निकलते निकलते रह गई थी। उधर मुझे सीने से छुपकाए वो बोले....उफ्फ मंजू...तू सच में बहुत सुंदर है। बहुत नाजुक है। जी करता है इसी तरह सीने से लगा कर तुझे अपने अंदर समा लूं। तुझे देख कर अब मैं खुद को सम्हाल नहीं पा रहा मेरी रानी। मन कर रहा है कि जी भर के तुझे प्यार करूं। जेठ जी जाने क्या क्या बोले जा रहे थे और मैं उनके सीने से लगी झटके खा रही थी। उनकी बातें मेरे हृदय की गहराईयों में उतरती जा रहीं थी। मन में बस यही खयाल था कि आज तक इस तरह का प्यार तो तुम्हारे काका ने भी नहीं किया है मुझे। क्या उन्हें एक पल के लिए भी खयाल नहीं आया होगा कि मैं इसी तरह का प्यार पाने के लायक हूं। एक औरत को अपने मरद से प्यार ही तो चाहिए होता है। वो चाहती है कि उसका मरद जेठ जी की तरह ही उसकी तारीफें करे और उसको अहमियत दे। भले ही बाद में अपनी हवस मिटाने लिए वो उसकी टांगों के बीच जोर जोर से धक्के लगाता रहे।" जारी है.............
06-01-2026, 11:06 AM
08-01-2026, 02:44 PM
08-01-2026, 02:46 PM
भाग ~ ०६
मंजू काकी की बातें सुन कर मैं खुद भी झटके खा रहा था। भरोसा नहीं हो रहा था कि मेरे बापू ने ये सब कहा होगा और ये सब किया होगा मगर काकी के अनुसार यही हकीकत थी तो भरोसा करना ही था। इस सबके बाद मेरे मन में जाने कितने ही प्रकार के खयाल उभरने लगे थे जो मुझे अब बेचैन किए जा रहे थे। "तुम्हें पता है राजू फिर आगे क्या हुआ।" तभी काकी ने ये कह कर मेरा ध्यान खींचा─"तुम्हारे बापू ने मुझे खुद से अलग किया और अपने दोनों हाथों से मेरा चेहरा थाम कर बिना किसी झिझक के और बिना कुछ सोचे अपने होठ मेरे होठों पर रख दिया।" "क..क्या???? ये क्या कह रही हो काकी।" मैंने आश्चर्य से आँखें फाड़ कर कहा। "हां राजू यही सच है।" काकी ने बताना शुरू किया─"इतना ही नहीं उसके बाद वो मेरे होठों को इस तरह चूमने चाटने लगे जैसे मेले में बिकने वाली ठंडी मलाई को खरीद कर छोटे छोटे बच्चे चाटा करते हैं। पहले तो मैं उनके ऐसा करने पर बुरी तरह हड़बड़ा गई थी और घबरा भी गई थी लेकिन फिर मैंने बिना कोई विरोध किए उन्हें ऐसा करने दिया। यकीन मानो राजू....मैंने उस वक्त उन्हें बिल्कुल भी नहीं रोका। इस लिए नहीं कि ये गलत था या पाप था बल्कि इस लिए कि वो जो कर रहे थे मेरे लिए एकदम नया था। उससे मुझे एक अलग ही तरह का आनंद मिल रहा था। उधर होठों के बाद वो एक एक कर के मेरे पूरे चेहरे को चूमने लगे थे। मुझे बहुत ज्यादा गुदगुदी हो रही थी मगर उनके ऐसा करने से असीम आनंद भी आ रहा था। मेरा पूरा बदन उस आनंद में सराबोर होता जा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे मैं उस अलौकिक आनंद में डूबती जा रही हूं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। मैं इस तरह के आनंद से पूरी तरह अंजान थी। मन कर रहा था कि वो बिना रुके ऐसे ही मुझे चूमते रहें। मैं सातवें आसमान में उड़ने लगी थी। मेरे समूचे बदन में एक अलग ही गर्मी बढ़ती जा रही थी।" "फिर????" "किसी न किसी बहाने उस सबको रुकना था तो रुक गया।" काकी ने गहरी सांस ले कर कहा─"जैसे मैं उनके चूमने चाटने से आनंद में डूबती जा रही थी वैसे ही जेठ जी भी डूबते जा रहे थे। न उन्हें किसी बात का होश रह गया था और न ही मुझे मगर तभी कुछ ऐसा हुआ जिससे मैं एक झटके में होश में आ गई और उन्हें रोक दिया।" "ऐ...ऐसा क्या हो गया था।" मुझे समझ न आया तो मैंने काकी से पूछा। "वो जो कर रहे थे उसमें वो होश खो बैठे थे।" मंजू काकी ने बताया─"तभी तो जोश में होश खो कर उन्होंने अचानक ही अपना एक हाथ मेरी छाती पर रख दिया और फिर उसे पकड़ कर जोर से दबा दिया था। उनके ऐसा करते ही मुझे जबरदस्त झटका लगा था। मैं एकदम होश में आ गई थी। होश में आते ही मैंने झट से उनका वो हाथ अपनी छाती से अलग कर दिया था। मेरे ऐसा करते ही वो भी होश में आ गए थे और फिर उन्हें फौरन ही एहसास हुआ कि अंजाने में उनसे ये कुछ ज्यादा ही हो गया है। उन्होंने इसके लिए झट से मुझसे माफी मांगी। इधर होश में आते ही अब मैं शर्म से गड़ी जा रही थी। यकीन ही नहीं हो रहा था कि ये सब क्या हो गया है। एकाएक मुझे खयाल आया कि घर में इस वक्त हम दोनों के सिवा कोई नहीं है। सब जानते हैं कि तुम्हारे बापू रिश्ते में मेरे जेठ लगते हैं। ऐसे में इस तरह उनका कमरे में मेरे साथ होना किसी के भी मन में गलत विचार ही पैदा करता। यही सब सोच कर अब मुझे बहुत ज्यादा घबराहट होने लगी थी। अचानक से ही मुझे पूरे गांव समाज के सामने बदनाम हो जाने का डर सताने लगा। मैंने हिम्मत जुटा कर जेठ जी से जाने को कहा। अब तक वो भी पूरी तरह होश में आ चुके थे इस लिए उन्हें भी एहसास हो चुका था कि अब उनका इस तरह यहां रहना ठीक नहीं है। इस लिए वो वहां से चल पड़े। दरवाजे के पास पहुंच कर अचानक वो रुक गए। फिर पलट कर मेरे पास आए और बोले...मेरी प्यारी मंजू...मेरी प्यारी रानी...मेरे वैसा करने से तुझे बुरा तो नहीं लगा न। अगर लगा हो तो माफ कर दे अपने इस दीवाने को। उनकी ये बात सुन कर मेरी धड़कनें तेज हो गईं। मन तो किया कि झट से लिपट जाऊं उनसे मगर जानती थी कि ऐसा करना अब सही नहीं है। कोई भी आ सकता था। इस लिए मैंने कहा कि मुझे उनकी किसी बात से बुरा नहीं लगा है। इस वक्त उन्हें जाने के लिए इस लिए कह रही हूं क्योंकि यही सही होगा। अगर कोई आ गया और किसी को शक हो गया तो आफत हो जाएगी। मेरी बात सुन कर उन्होंने सहमति में सिर हिलाया और फिर मेरा गाल चूम कर चले गए। उनके जाने के बाद मैंने राहत की सांस तो ली मगर काफी देर तक खड़ी उस सबके बारे में सोचती रही जो अब तक मेरे और उनके बीच हुआ था। मुझे पूरा एहसास था कि ये सब गलत है लेकिन उनके प्यार में जो अलौकिक आनंद मिला था उसके बारे में सोच कर ही अब मुझे अजीब सी खुशी महसूस होने लगी थी। खैर मुझे याद आया कि मुझे खाना भी बनाना है अभी। तुम्हारे काका के आने का समय भी हो रहा था। ये सोच कर मैंने जल्दी से नथ निकाल कर उसे वापस डिब्बी में डाला और उसे संदूक में छुपा दिया। उसके बाद मैं फिर से नाक में इसी फूल को पहन कर कमरे से बाहर निकल आई। रसोई के पास पहुंची ही थी कि जेठ जी को वहां खड़ा देख चौंक पड़ी। मुझे हैरानी हुई कि वो अब तक यहीं थे।" "ऐ...ऐसा क्यों।" "मुझसे अभी कुछ कहना था उन्हें।" काकी ने बताया─"जब मैं उनके पास पहुंची तो वो फिर से वही बोले जो कमरे में बोले थे....तुझे सच में मेरे वैसा करने पर बुरा नहीं लगा न मेरी रानी। शायद वो पूरी तसल्ली कर लेना चाहते थे। इधर उनकी बात सुन कर मुझे शर्म तो बहुत आई मगर जवाब देना मजबूरी थी। इस लिए धीमे से न में सिर हिला कर कहा....मुझे कोई बुरा नहीं लगा जेठ जी लेकिन हम दोनों ही जानते हैं कि ये सब गलत है। अगर किसी को पता चल गया तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा। मेरी ये बात सुन कर उन्होंने कहा....हां जानता हूं मेरी प्यारी मंजू...जानता हूं कि ये दुनिया वालों की नजर में गलत है मगर हमारी नजर में तो बिल्कुल नहीं है।" "क..क्या??? मतलब वो ऐसा कैसे बोल सकते थे।" मैंने हैरत से आँखें फाड़ कर पूछा। "मैं भी ऐसे ही हैरान हुई थी राजू।" काकी ने बताया─"मुझे हैरान देख उन्होंने कहा कोई चीज या कोई बात तब गलत होती है जब उसमें कोई जोर जबरदस्ती करता है...सामने वाले की रजामंदी से नहीं करता। जबकि अगर कोई चीज दो लोगों की सहमति से होती है तो वो सही होती है क्योंकि इससे वो दोनों एक दूसरे का अहित नहीं कर रहे होते बल्कि आपसी सहमति से जो करते हैं उससे उन्हें खुशी मिल रही होती है। जेठ जी की ये बातें सुन कर मैं हैरान तो हुई लेकिन सोच में भी पड़ गई थी। तभी उन्होंने पूछा...अब तू बता मेरी रानी...मेरी प्यारी मंजू कि क्या तुझे मेरा प्रेम कबूल है। अजीब कशमकश में पड़ गई थी मैं लेकिन ये भी एहसास था कि पहले मेरे मन में उनके लिए भले ही सिर्फ कुछ ही था लेकिन अब शायद उस कुछ से ज्यादा हो चुका है। मुझे याद आया कि कैसे अभी थोड़ी देर पहले उन्होंने मुझे प्यार किया था। मतलब कि इस तरह से जैसे की मैं कभी कल्पना ही नहीं कर सकती थी। मेरे लिए वो सब नया था लेकिन उसकी वजह से मेरी आत्मा तक असीम आनंद में डूब गई थी। तुम्हारे काका ने तो ऐसा कभी सपने में भी नहीं किया था। प्यार करना तो जानते ही नहीं थे वो। उन्हें तो बस इतना ही पता है कि औरत का धोती साया कमर तक उठा दो और फिर उसकी टांगों के बीच अपना खूंटा डाल कर धक्के लगाना शुरू कर दो। धक्के लगाते हुए भले ही वो जल्दी ही शांत पड़ जाएं मगर इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा।" इतना बोल कर मंजू काकी सांस लेने के लिए रुकीं तो इस बार मैं कुछ न बोला। असल में उन्होंने आखिरी बात ही ऐसे विषय पर की थी कि मैं झिझक के मारे कुछ बोल ही न सका था और न ही पूछ सका था। "इस लिए जब तुम्हारे बापू ने मुझसे वो सब पूछा तो मैंने थोड़ा सोचने के बाद बेझिझक उनका प्रेम कबूल कर लिया।" उधर मंजू काकी ने खुद ही आगे का किस्सा बताना शुरू कर दिया─"मुझे भी यही लगा कि जब दो लोग किसी बात के लिए सहमत होते हैं तो सचमुच वो गलत नहीं होता। हां दुनिया की नजर में जरूर ये गलत ही होता है। खैर इसके लिए जेठ जी ने कहा कि हमारे पास अब यही एक रास्ता है कि हम अपने इस प्रेम को दुनिया वालों की नजरों से छुपा कर रखें। उनकी ये बात सुन कर उस वक्त मेरे अंदर बड़ी अजीब सी हलचल मच गई थी। मन में तरह तरह के खयाल आने लगे थे मगर जाने क्यों अब मैं यही करना चाह रही थी। तभी तो जेठ जी की हर बात से सहमत हो गई थी। तभी तो उस वक्त डर और घबराहट होने के बाद भी एक खुशी महसूस हो रही थी। बस यही हसरत थी कि जेठ जी के साथ प्रेम का ये सफर आगे बढ़े और फिर गहरा ही होता चला जाए। खैर उस वक्त वो घर में ज्यादा देर रुक नहीं सकते थे इस लिए जाते जाते बोले....मेरी प्यारी मंजू अब तू किसी बात की फिक्र न करना। अब से तेरी हर खुशी का खयाल मैं रखूंगा। हम दोनों को जब भी मौका मिलेगा हम एक दूसरे को जी भर के प्यार करेंगे। मेरी रानी....मेरी प्यारी मंजू तू भी ऐसा करेगी न....बता मुझे। मैं तो उनकी बातें सुन कर ही मंत्रमुग्ध हो गई थी। धड़कनें तेज तेज चलने लगीं थी। दिलो दिमाग में बड़ी तेज हलचल शुरू हो गई थी। मैंने जल्दी से खुद को सम्हाला और झट से हां में सिर हिला कर उन्हें बताया कि हां मैं भी ऐसा करूंगी। बस यही थी हमारी कहानी।" "क...क्या???? म...मतलब बस इतना ही।" मैं एकदम से झटका खा गया। मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि काकी इतना बस बता कर किस्सा खत्म कर देंगी। मैं तो अभी ये उम्मीद किए बैठा था कि वो बापू के साथ अपनी चुदाई का किस्सा भी बताएंगी। मगर काकी ने किस्सा खत्म कर के मुझे बहुत ज्यादा मायूस कर दिया था। "क्यों...क्या तुम्हें कुछ और भी जानना है मुझसे।" काकी ने सवालिया नजरों से मुझे देखा। "ह..हां....मतलब ये कि...तुम और ब...बापू ने वो काम कब और कैसे शुरू किया था जो आज खेत के उस कमरे में कर रहे थे।" मैंने झिझकते हुए उनसे अपनी मंशा जाहिर की और पूछा। "तुम्हारे हिसाब से क्या कर रहे थे हम।" काकी ने उल्टा सवाल कर दिया। मुझसे कुछ बोला न गया। कहना तो मैं चाहता था कि तुम और बापू वहां चुदाई कर रहे थे लेकिन इस तरह खुल कर कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी। "क्या हुआ....बताओ न...हम क्या कर रहे थे उस कमरे में।" "तुम जानती हो काकी कि मैं क्या पूछ रहा हूं और तुम दोनों क्या कर रहे थे।" मैंने सिर झुका कर धीमे से कहा। "मैं तो बहुत कुछ जानती हूं राजू।" काकी ने कहा─"पर जानना तो तुम्हें है न इस लिए खुल कर पूछो कि किस बारे में जानना चाहते हो।" मैं एकदम से चौंक कर काकी को देखने लगा। एकाएक वो अजीब तरह का बर्ताव करने लगीं थी। उनके होठों पर हल्की मुस्कान थी। मैं सोच में पड़ गया कि अब ये क्या है। "ठीक है....अगर तुम्हें नहीं जानना है तो अब आराम से सो जाओ।" तभी काकी बोलीं─"मुझे भी अब नींद आ रही है। गेहूं की कटाई कर के बहुत थक गई हूं आज।" कहने के बाद काकी सच में ही खाट पर लेट गईं। इधर मैं अंदर ही अंदर ये सोच कर हड़बड़ा उठा कि अब मैं आगे का किस्सा कैसे जान सकूंगा। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मेरे पूछने पर काकी अचानक से उल्टा सवाल क्यों करने लगीं थी। अरे जैसे अब तक सब कुछ बताती आई थीं वैसे ही आगे का भी तो बता सकती हैं। फिर अचानक से ये क्या हो गया है उन्हें। "ज्यादा मत सोचो बच्चू।" काकी ने मुस्कुरा कर कहा─"चुपचाप सो जाओ।" "ये...ये गलत बात है काकी।" मैंने एकदम से नाराज होने का नाटक किया─"तुमने वादा किया था कि सब कुछ बताओगी। फिर बता क्यों नहीं रही हो।" "अरे तो मैं कहां अपना वादा तोड़ रही हूं राजू।" काकी ने कहा─"मैं तो सब कुछ बताने को तैयार हूं। तुम खुद ही नहीं पूछ रहे तो मैं क्या करूं।" "पूछ तो रहा हूं मैं।" "क्या पूछ रहे हो।" काकी बोलीं─"मुझे तो समझ ही नहीं आया कि तुम मुझसे आखिर अब क्या जानना चाहते हो। जरा खुल कर सही से पूछो तो मुझे समझ आए और फिर मैं तुम्हें बताऊं।" मैं समझ गया कि काकी अब मेरी टांग खींचने में लग गई हैं। जबकि उन्हें भी अच्छे से पता है कि मैं उनसे क्या जानना चाहता हूं मगर अब वो नाटक करने लगी हैं। इस बात से गुस्सा तो बहुत आया उन पर मगर कर भी क्या सकता था। बस मन मसोस कर रह गया। थोड़ी देर चुपचाप नाराज हो के खाट पर पड़ा रहा। मन ही मन काकी को बुरा भला भी कह रहा था। ये भी सोच रहा था कि काकी से सब कुछ जान के ही रहूंगा चाहे कुछ भी हो जाए। अचानक मन में आया कि क्या सच में मैं खुल कर उनसे पूछूं। मतलब कि खुल कर चुदाई जैसे शब्द बोलूं। इससे ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि काकी गुस्सा हो जाएंगी। बाकी गलती तो उन्होंने और बापू ने ही की है। मतलब अपराधी तो वो दोनों ही हैं। गलत काम तो उन दोनों ने ही किया है तो इसके लिए वही दोनों झुकेंगे....हां। "अरे अभी सोए नहीं क्या तुम।" तभी मंजू काकी ने ये कह कर जैसे मुझे फिर छेड़ा। "मैं इतना जल्दी सोने वाला नहीं हूं।" मैंने एक झटके में उठ कर कहा─"तुमको बताना ही पड़ेगा कि तुम और बापू आज खेत वाले कमरे में जो कर रहे थे वो कैसे शुरू हुआ था।" "मुझे समझ नहीं आ रहा कि तुम किस बारे में बोल रहे हो।" काकी ने मुस्कुरा कर कहा─"थोड़ा खुल कर बताओ राजू। मैं अनपढ़ गवार औरत हूं। मुझे इस तरह कोई बात समझ नहीं आती है।" मेरा मन किया कि मैं अपने बाल नोचने लगूं। पता नहीं क्यों अंजान बन रहीं थी वो। मैंने सोचा कहीं ऐसा तो नहीं कि वो सच में चाहती हैं कि मैं खुल कर चुदाई जैसे शब्द बोलूं। हां शायद यही बात है...तभी तो वो बार बार खुल कर पूछने को कह रही हैं। ये सोचते ही मैंने फैसला कर लिया कि अब मैं ऐसा ही करूंगा। मतलब कि अब मैं ऐसे ही खुल कर पूछूंगा उनसे। अगले ही पल मैंने अपने अंदर हिम्मत जुटानी शुरू कर दी। "ठीक है फिर...अब मैं खुल कर तुमसे पूछता हूं।" मैंने हिम्मत जुटा कर एक लंबी सांस ली─"तो सुनो...आज खेत वाले कमरे में तुम और बापू जो कर रहे थे उसे चु..चुदा...चुदाई बोलते हैं....हां चु...चुदाई। तो अब बताओ कि तुम्हारे और बापू के बीच ये चुदाई वाला काम कब और कैसे शुरू हुआ था।" "र..राऽऽऽऽजू....ये कैसी गंदी बात बोल रहे हो तुम।" काकी एक झटके में उठ कर बैठ गईं और मुंह फाड़ कर बोलीं─"हाय राम कितने बेशर्म हो तुम। अपनी काकी से इतना गंदा कैसे बोल सकते हो तुम।" "अब तुम नाटक न करो काकी।" मैं अंदर ही अंदर थोड़ा घबराया तो जरूर मगर फिर हिम्मत कर के बोला─"तुम खुद ही मुझसे खुल कर पूछने को कह रही थी तो मैंने खुल कर पूछ लिया तुमसे। अब तुम ये नाटक बंद करो और खुल कर बताओ जो मैंने पूछा है...हां।" "आए हाए...हमारे राजू को सब कुछ खुल कर जानना है।" मंजू काकी ने रंग बदल कर फिर से मुझे छेड़ा─"वैसे मानना पड़ेगा...हमारे राजू सच में अब बड़े हो गए हैं। इतने बड़े कि अब इस तरह गंदे शब्द बोलने लगे हैं। हमारे राजू को ऐसे गंदे शब्दों का मतलब भी पता है...है न राजू।" मैं बुरी तरह शर्मा गया। दिल की धड़कनें तो पहले से ही बढ़ी हुईं थी और...और अंदर हलचल मची हुई थी। मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरे वैसा बोलने पर काकी मुझे इस तरह छेड़ने लगेंगी। एकाएक ही अजीब सी हालत हो गई थी मेरी। तभी काकी खिलखिला कर हंस पड़ीं। मैंने चौंक कर उनको देखा। मुझे बिल्कुल भी समझ न आया कि वो अचानक हंस क्यों पड़ी हैं। जब सच में मुझे कुछ न सूझा तो मैंने मुंह बना लिया और दूसरी तरफ को चेहरा कर लिया। मेरे ऐसा करते ही काकी और भी जोरों से हंसने लगीं। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे एकदम से मेरा मजाक बन गया है। ये सोचते ही मैं चिढ़ गया और मेरा दिमाग खराब होने लगा। "इस तरह क्यों हंस रही हो।" मैं बुरी तरह चिढ़ कर बोला─"और मुझे गुस्सा न दिलाओ। नहीं तो सुबह सबको बता दूंगा कि तुम और बापू आज खेत वाले कमरे में क्या कर रहे थे।" मेरी ये बात सुनते ही काकी का हंसना एकदम से बंद हो गया। मुझे गुस्से में देख थोड़ा घबरा भी गईं वो। सबको बता देने की बात सुन कर एकदम से उन्हें एहसास हुआ कि मैं सचमुच ऐसा कर सकता हूं। क्योंकि मैं अपने भोलेपन और नादानी में अक्सर यही करता आया था। मैं बड़ी से बड़ी बात सबके सामने बेझिझक बोल देता था। उस वक्त मुझे जरा भी एहसास या ज्ञान नहीं होता था कि मैं सबके सामने क्या बोल बैठा हूं। घर के लोग कुछ पल के लिए अवाक रह जाते थे लेकिन फिर ये मेरी नादानी और नासमझी समझ कर नजरअंदाज कर देते थे। ऐसा बहुत ही कम होता था कि मेरे ऐसा बोल देने पर घर वाले मुझे डांट दें या मुझे ऐसा नहीं बोलना चाहिए जैसी बात समझाएं। शायद यही वजह थी कि जब किसी ने सख्ती से लगाम नहीं लगाई तो मैं इतना लापरवाह और दुस्साहसी हो गया था। खैर इस वक्त मेरी ऐसी धमकी सुन कर काकी का हंसना बंद हो गया था और वो एकाएक गंभीर हो उठीं थी। "माफ कर दो राजू।" फिर उन्होंने धीरे से कहा─"मैं तो बस छेड़ रही थी तुम्हें। तुम तो मेरे सबसे अच्छे बच्चे हो...और अच्छे बच्चे इस तरह गुस्सा नहीं होते।" "पर मुझे अच्छा नहीं लगा।" मेरा अभी भी मुंह बना हुआ था। "अब माफ भी कर दो न राजू।" काकी ने इस बार प्यार से कहा─"और हां तुम वो सब जानना चाहते हो न तो चलो सब कुछ बताती हूं तुम्हें।" "सब कुछ खुल कर बताओगी।" मैंने झट से उन्हें याद दिलाया─"जैसे मैंने खुल कर तुमसे पूछा था उसी तरह तुम भी खुल कर सब कुछ बताओगी मुझे....हां।" "ठीक है...जैसे तुम चाहते हो वैसे ही बताती हूं" काकी ने कहा। मैं अंदर ही अंदर ये सोच के खुश हो गया कि काकी मुझसे डर गईं हैं और मेरे डर से अब सब कुछ खुल कर बताने वाली हैं। अगले ही पल मेरे मन में तरह तरह के खयाल आने शुरू हो गए थे। जारी है............
08-01-2026, 03:23 PM
भाग ~ ०७
इधर मैं सब कुछ जानने की उत्सुकता में मरा जा रहा था और उधर मंजू काकी कुछ सोचने लगीं थी। उनके चेहरे पर शर्म और झिझक साफ दिख रही थी। मैं नादान तो था पर इतना समझ सकता था कि एक औरत जो मुझे अपने बेटे की तरह मानती रही है उसको पूरी निर्लज्जता से वो बातें बताने में शर्म और झिझक लगना स्वाभाविक है। कोई और वक्त होता तो मैं खुद उनसे इस मामले में कुछ पूछने की हिम्मत तो क्या ऐसा सोचने का भी न सोचता। मगर कहीं न कहीं मैं ये अच्छी तरह समझ रहा था कि उनकी कमजोरी मेरे हाथ में है और वो वही करने को मजबूर रहेंगी जो इस वक्त मैं चाहूंगा। "अब चुप बैठी क्या सोच रही हो काकी।" मेरे सब्र का बांध जब टूट गया तो मैं थोड़ा खीझ कर बोला─"जल्दी बताओ न। मुझे जल्द से जल्द सब कुछ जानना है।" मंजू काकी ने अजीब भाव से मेरी तरफ देखा। पता नहीं क्या चल रहा था उनके मन में। "उस दिन जो कुछ हमारे बीच हुआ था।" काकी ने गहरी सांस ले कर बताना शुरू कर दिया─"उससे ये बात साफ हो गई थी कि अब हम सिर्फ घर वालों या गांव समाज की नजरों में जेठ और भयऊ रह गए हैं जबकि असल में हम एक दूसरे के प्रेम में पड़े या एक दूसरे के आकर्षण में पड़े इंसान बन चुके हैं। उस दिन के बाद से जेठ जी के प्रति मेरे सोचने का नजरिया बदल गया था। अब मैं उनके बारे में जेठ जी के रिश्ते से नहीं बल्कि अपने दीवाने और प्रेमी के नए बन चुके रिश्ते से सोचने लगी थी। हमारे बीच ऐसा बहुत कुछ हो चुका था जो एक जेठ और भयऊ के रिश्ते में होना बहुत बड़ा अपराध या पाप माना जाता है मगर ये सिर्फ हम दोनों ही जानते थे और ये भी कि ऐसा हमने अपनी मूक सहमति से ही किया था। अब ये रिश्ता भी खुशी से स्वीकार कर लिया था।" "फिर???" "उस दिन के बाद कुछ दिन तो ऐसे ही गुजर गए।" मंजू काकी ने कहा─"जेठ जी किसी न किसी बहाने मेरे घर आ तो जाते थे लेकिन मेरी बेटियों के रहने से कोई ऐसा मौका नहीं मिल रहा था जिससे हम एक दूसरे से वैसी बातें कर सकें जो दो प्रेमियों के बीच होती हैं या ऐसे सम्बन्ध में बंधे दो व्यक्तियों के बीच होती हैं। इधर इतने दिनों में मेरे अंदर ऐसा बदलाव आ गया था कि अब हर पल बस जेठ जी के ही बारे में सोचती रहती थी। उनसे मिलने या उन्हें देखने की इच्छा होती रहती थी और जब ऐसा नहीं होता तो मन में बहुत बेचैनी होती। कुछ भी अच्छा न लगता। जब कुछ दिनों तक हमें बात करने का वैसा मौका न मिला तो सहसा एक दिन मेरे मन में सवाल उभरा कि क्या जेठ जी का भी मेरे जैसे हाल होगा। क्या वो भी मेरी तरह मिलने के लिए बेकरार और बेचैन होंगे। अगर ऐसा है तो फिर वो कोई ऐसा मौका क्यों नहीं तलाशते जिसमें हम थोड़ा खुल कर और थोड़ी बेफिक्री से एक दूसरे से मिल सकें और साथ ही कुछ प्यार की मीठी बातें कर सकें। अचानक ही ये सब सोचने के चलते मेरे मन में ये खयाल आने लगे कि कहीं जेठ जी मेरे साथ छल तो नहीं कर रहे। मतलब कि उन्हें जो करना था वो कर चुके हैं तो अब वो मुझसे मिलना ही न चाहते हों। हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं था मगर मेरा मन तरह तरह की बातें सोचने लगा था। इसकी वजह यही थी कि एक हफ्ता गुजर गया था और जेठ जी से मेरी कोई बात न हो सकी थी।" "फिर कैसे तुम दोनों को मौका मिला था बात करने का।" मैंने उत्सुकता से पूछा। "उसके कुछ समय बाद अचानक एक दिन नाहरपुर से मेरा भाई मंगल यहां आया।" काकी ने बताया─"वो मेरी दोनों बेटियों को लेने आया था। काफी समय से मेरे मायके वालों ने सुनीता और रानी को नहीं देखा था तो मां ने उसे भेजा था यहां। खैर रात रुकने के बाद दूसरे दिन वो अपनी दोनों भांजियों को ले गया। अब घर में मैं और तुम्हारे काका ही रह गए थे। तुम्हारे काका तो खेत चले गए थे पर मैं घर में थी....अकेली। पता नहीं जेठ जी को कैसे पता चल गया था कि मेरी दोनों बेटियों को मेरा भाई ले गया है। वो ये भी जानते थे कि उनका मझला भाई दोपहर तक खेतों में ही रहेगा। दोपहर में खाना खाने आएगा और थोड़ा आराम करने के बाद फिर खेत चला जाएगा।" "अच्छा समझ गया।" मैं बोल पड़ा─"सुनीता और रानी के जाने से तुम दोनों को मिलने के लिए मौका मिल गया था।" "हां सही कहा।" काकी ने कहा─"जैसा कि मैंने तुम्हें बताया तुम्हारे बापू को ये पता चल गया था। इस लिए उन्होंने भी इस मौके को नहीं गंवाया। गंवाते भी कैसे...मेरे जैसी हालत तो उनकी भी हो चुकी थी। हालांकि उनके बारे में अब मैं यही सोच बैठती थी कि शायद उन्होंने मेरे साथ छल किया है इसी लिए मिलने का मौका नहीं तलाश कर रहे हैं। खैर वो तब आए जब दोपहर को थोड़ा आराम करने के बाद तुम्हारे काका वापस खेत चले गए थे। अब वो शाम से पहले नहीं आने वाले थे। यानि शाम तक मैं अपने घर में अकेली ही रहने वाली थी और ये बात तुम्हारे बापू भली भांति जानते थे इसी लिए तो वो ऐसे वक्त पर घर आए थे। मगर इस बात का भी खयाल रखा था कि कोई उन्हें मेरे घर में घुसते हुए देख न ले।" काकी के मुख से बापू के घर आने की बात सुन कर एकाएक मेरी धड़कनें ये सोच कर बढ़ चलीं थी कि अब इसके आगे काकी वही बताएंगी जिसे जानने और सुनने के लिए मैं अब तक बहुत ज्यादा उत्सुक और बेचैन हो उठा था। "उस वक्त घर में मैं अकेली थी और झूठे बर्तन धोने के बाद कमरे में बाल सवार रही थी।" उधर काकी आगे बता रहीं थी─"मुझे तो पता ही नहीं था और न ही अंदेशा था कि उस वक्त कोई चुपके से आ जाएगा। तुम्हारे बापू इतना अच्छा मौका देख कर अलग ही रंग में आ गए थे।" "म...मतलब....कैसे रंग में आ गए थे वो।" "बता रही हूं...सब जान जाओगे।" काकी जाने क्या सोच कर अजीब भाव से मुस्कुरा उठीं─"मैं तो हर बात से बेखबर अपने कमरे में बाल सवार रही थी। इधर तुम्हारे बापू एकदम चुपके से मेरे कमरे की तरफ बिना कोई आवाज किए आ गए थे। फिर बिना कोई आहट किए कमरे में भी घुस आए। उस वक्त मैं उनकी तरफ पीठ किए खड़ी थी और सामने दीवार में लगी कील पर शीशा टांग रही थी। जैसे ही वो मेरे पीछे एकदम मेरे करीब आए वैसे ही शीशे में उनका चेहरा मुझे दिख गया मगर इससे पहले कि मैं कुछ सोच पाती या कर पाती उन्होंने पीछे से झट मुझे पकड़ कर दबोच लिया।" "क...क्या सच में????" मेरी आँखें फैल गईं। "हां राजू।" काकी ने कहा─"मेरे मुख से तो डर और घबराहट के मारे चीख ही निकल जाने वाली थी पर मैंने जल्दी से अपनी चीख को ऐन समय पर रोक लिया था। उधर जेठ जी पीछे से पूरा मुझे खुद से सटाए मेरे बाएं कान के पास अपना चेहरा ला कर बोले...कैसी है मेरी प्यारी मंजू....तुझे इस तरह अपनी बाहों में लेने के लिए कब से तड़प रहा था मैं। उनके इतना कहते ही मैं एकदम से पिघलती चली गई। इसके पहले तक उनके प्रति जो थोड़ी बहुत नाराजगी पैदा हुई थी वो उनकी बात सुनते ही दूर हो गई। अब उनकी बात सुन कर अंदर खुशी उभर आई थी। उधर वो अब भी मुझे वैसे ही पकड़े हुए थे और पीछे से मेरे कान और मेरे गाल को छूते तो मेरा पूरा बदन सिहर उठता। दिल की धड़कनें तो पहले ही बढ़ गईं थी। घबराहट भी हो रही थी लेकिन न उनसे छूटने की कोशिश कर रही थी और न ही उन्हें कह रही कि मुझे छोड़ दो।" "फिर???" "ये...ये क्या कर रहे हैं आप।" काकी ने आगे बताना शुरू किया─"आखिर कुछ तो मुझे बोलना ही था। मेरे पेट पर जमे उनके हाथ धीरे धीरे ऊपर मेरी छातियों की तरफ सरक रहे थे जिससे मेरी धड़कनें और सांसें और तेज हो गईं थी। पूरा बदन थरथरा रहा था लेकिन अंदर बेचैनी हो रही थी। मैंने उनसे कहा....दरवाजा खुला है...अगर किसी ने देख लिया तो मुसीबत हो जाएगी। मैंने ये कहा जरूर लेकिन मेरे ऐसा बोलने का मतलब वो बखूबी समझ गए थे। वो समझ गए थे कि मुझे उनके उस तरह पकड़ने से कोई एतराज नहीं है बल्कि दरवाजा खुला है कि बात कह कर मैं उन्हें यही जता रही हूं कि जो मन मरे कीजिए लेकिन ये भी खयाल कीजिए कि दरवाजा खुला है। मतलब मैं साफ साफ उनसे कह रही थी कि दरवाजा तो बंद कर दीजिए....फिर जो मन करे कीजिए मेरे साथ।" "तो क्या फिर बापू ने ये समझ कर कमरे का दरवाजा बंद कर दिया था।" मैंने अपनी बढ़ चली धडकनों के साथ पूछा। "बाहर का दरवाजा तो वो पहले ही बंद कर आए थे।" मंजू काकी ने बताया─"इस लिए उन्हें किसी के आ जाने का डर ही नहीं था। तभी तो बोले....चिंता मत कर मेरी प्यारी मंजू...मैं बाहर का दरवाजा बंद कर के आया हूं इस लिए न तो कोई यहां आ पाएगा और न ही कुछ देख पाएगा। मैं उनकी ये बात सुन कर अंदर ही अंदर ये सोच के सिहर गई कि जेठ जी शायद पहले से ही सब कुछ सोच कर आए हैं। तभी तो बाहर का दरवाजा बंद कर के मेरे कमरे में आए थे और एकदम से मुझे पकड़ लिया था। तभी वो बोले....कब से तुझे प्यार करने के लिए तड़प रहा था मेरी प्यारी रानी। मन तो बहुत करता था कि बिना किसी की परवाह किए तेरे पास चला जाऊं और फिर अपनी प्यारी और सुंदर मंजू को कस के ऐसे ही पकड़ लूं और....और फिर। इतना कह कर वो एकदम चुप हो गए थे। मेरे मन में ये जानने की उत्सुकता जाग उठी थी कि और फिर क्या....मतलब आगे वो क्या कहना चाहते थे। जी तो किया कि पूछ लूं उनसे मगर शर्म और झिझक के कारण पूछने की हिम्मत न हुई...पर शायद वो समझ गए थे। तभी तो बोले...और फिर तेरा ये ब्लाउज उतार कर तेरी सुंदर और मुलायम छातियों को अपने हाथ में लेकर सहलाऊं...इन्हें दबाऊं...और मुंह में भर कर जी भर के चूसूं।" "क...क्या सच में ऐसा कहा था बापू ने।" मैं मारे हैरत के पूछ बैठा। "हां राजू ऐसा ही कहा था उन्होंने।" काकी ने कहा─"उनकी ये बातें सुन कर मैं शर्म से लाल हो गई थी। पहले से ही बढ़ी हुई मेरी धड़कनें और सांसें और भी तेज हो गईं थी। मन में तरह तरह के खयाल उभरने लगे थे और मेरा बदन....मेरा बदन तो अजीब से सुखद एहसास में डूबने लगा था।" "तो क्या तुमने बापू से कुछ नहीं कहा था।" "शर्म और झिझक से नहीं कह पा रही थी राजू।" काकी ने कहा─"मगर भला कब तक खुद को कुछ करने या बोलने से रोके रहती। जब तुम्हारे बापू वो सब कहने के बाद एकाएक अपने दोनों हाथों को ऊपर कर मेरी छातियों को ही पकड़ लिया तो बुरी तरह कसमसा उठी मैं। मुंह से आह के साथ साथ सिसकी निकल गई। बदन में उत्तेजना भर गई। उसी उत्तेजना में बोल पड़ी थी मैं....शश्श्श्श् ये क्या कर रहे हैं आप..ऐसा मत कीजिए न...मुझे बहुत शर्म आ रही है। मेरी ये बात सुन कर वो बोले....अब मुझसे कैसी शर्म मेरी रानी। मैं तो पहले ही तेरी ये छातियां देख चुका हूं और सिर्फ देख ही नहीं चुका हूं बल्कि इन्हें प्यार भी कर चुका हूं। इतना कह कर एकदम से उन्होंने मेरी दोनों छातियों को मसल दिया जिससे मेरे मुंह से आह निकल गई।" मंजू काकी की कहानी में अब बातें खुल कर होने लगीं थी इस लिए एक तरफ जहां मेरी धड़कनें बढ़ चलीं थी वहीं दूसरी तरफ मेरे अंदर अजीब सा रोमांच भी होने लगा था। मैं अब उस तरह की बातें सुनने को उत्सुक हो उठा था जिस तरह की बातें मेरा दोस्त बबलू बताया करता था। "बापू के ऐसा करने पर....मतलब कि जब उन्होंने तुम्हारी छातियों को मसल दिया तब क्या तुमने उन्हें कुछ नहीं कहा था।" मैंने हिम्मत कर के पूछा। "मैं भला क्यों कहती राजू।" काकी ने हल्के से शर्मा कर कहा─"अगर कहना ही होता तो पहले ही कह कर उन्हें ये सब करने से रोक देती। अब उन्हें रोकने या कोई विरोध करने का समय नहीं रहा था राजू....जैसे वो पूरी तरह मन बना बैठे थे कि अब उन्हें मेरे साथ यही सब करना है वैसे ही मैं भी तो मन बना बैठी थी। बेशक उस वक्त मैं या वो इसे प्रेम ही कहते लेकिन हम दोनों ही जानते थे कि ये सिर्फ प्रेम नहीं था बल्कि उसके साथ साथ कुछ और भी था। हां राजू....प्रेम के अलावा ये वही था जिसे दुनिया वासना या हवस कहती है। आज के समय में सच्चा प्रेम या निहस्वार्थ प्रेम कोई नहीं करता। आज के समय में लोगों की सोच और नजरिया उतना साफ एवं पवित्र नहीं रहा जैसे सौ साल पहले के लोगों में होता था। आज का इंसान सिर्फ अपना मतलब निकालने से मतलब रखता है। किसी से प्रेम भी करता है तो सिर्फ उस चीज के लिए जिसके लिए ये सारी दुनिया पागल हुई पड़ी है..यानी लंड और चूत के लिए।" काकी के मुख से यूं खुल्लम खुल्ला लंड और चूत सुन कर मैं आश्चर्यचकित रह गया था। हैरत से मुंह फाड़ कर देखने लगा उन्हें। एक ही पल में मेरे अंदर बड़ी तेज हलचल मच गई थी। काकी भी समझ गईं थी कि उनके ऐसा बोलने पर मैं क्या सोचने लगा हूं या मेरी क्या हालत हो गई है। शर्म तो उन्हें भी आई थी ऐसा बोलने पर लेकिन शायद उन्होंने सोच लिया था कि सब कुछ खुल कर ही मुझे बताएंगी। "हैरान मत हो राजू।" तभी काकी ने मुझसे कहा─"तुमने ही कहा था न कि सब कुछ खुल कर बताऊं इस लिए बता रही हूं।" "फि...फिर आगे क्या हुआ काकी।" मैं उनकी बात सुन कर थोड़ा असहज तो हुआ लेकिन फिर पूछा। "उस वक्त मैंने भले ही तुम्हारे बापू को वो सब न करने को कहा था लेकिन हम दोनों ही जानते थे कि हकीकत में न मेरा ऐसा मतलब था और न ही उन्हें रुक जाना था।" काकी ने कहा─"तभी तो मेरे मना करने पर भी वो नहीं रुके। बल्कि और भी जोरों से मेरी छातियां मसलने लगे थे। उनके ऐसा करने पर मैं कसमसा तो रही थी लेकिन अब मेरे अंदर अजीब सा मजा आने लगा था। पूरा बदन एक मीठे एहसास से सराबोर होने लगा था। मुझे पता ही न चला कब मेरा एक हाथ पीछे उनके सिर पर पहुंच गया जो उनके बालों को सहलाने के साथ साथ जोश और मदहोशी के चलते खींचने लगा था। तुम्हारे बापू पक्के खिलाड़ी थे। मेरे ऐसा करने पर तुरंत समझ गए थे कि मेरे अंदर हवस का नशा छाने लगा है। इस लिए अब वो मेरी छातियां मसलने के साथ साथ पीछे से मेरी गर्दन, कान और गालों को भी चूमने लगे थे। उनके ऐसा करते ही मैं बावरी होने लगी। एक अजीब सा नशा मुझे बेचैन करने लगा। मेरी आँखें मदहोशी में बंद हो गईं। तभी वो बोले....मेरी प्यारी मंजू...जितनी तू सुंदर है उतना ही सुंदर तेरा ये बदन है। मन करता है तेरे पूरे बदन को चूमूं और मलाई की तरह चाटूं। उनकी ये बात सुनते ही मैं और भी ज्यादा सिहर उठी। वो लगातार मेरी छातियां भी मसले जा रहे थे...मुझे चूमते भी जा रहे थे और बीच बीच में ये सब बोलते भी जा रहे थे जिससे अब मैं बुरी तरह नशे में छटपटाने लगी थी। मेरी सांसें और धड़कनें हद से ज्यादा बढ़ गईं थी। खुशी और नशे का खुमार प्रतिपल बढ़ता जा रहा था। मेरा जी करने लगा था कि सारी शर्म छोड़ कर मैं जेठ जी की तरफ घूम जाऊं और फिर मैं भी उन्हें वैसे ही चूमने चाटने लगूं जैसे वो कर रहे थे।" "तो क्या सच में तुमने ऐसा ही किया था।" मैंने उत्सुकता से पूछा। "क्या करती राजू...मैं अब अपने होश में ही नहीं रह गई थी।" काकी ने बताया─"जब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैं बिजली की सी रफ्तार से घूम गई थी जेठ जी की तरफ। फिर इससे पहले कि वो कुछ सोच समझ पाते मैं पूरी बेशर्म हो के टूट पड़ी थी उन पर। मुझे उनके जैसा करना तो नहीं आ रहा था लेकिन उत्तेजना और खुमारी में जो मेरा मन करता वहीं करती जा रही थी।" "क्या क्या कर रही थी तुम।" मैंने धड़कते दिल से पूछा। "सबसे पहले तो मैंने तुम्हारे बापू के होठों को ही चूमना शुरू किया था।" काकी ने कहा─"मुझे नहीं पता कि ये कैसे कर लिया था मैंने। बस कर बैठी थी....तुम्हारे बापू तो हड़बड़ा ही गए थे मेरे ऐसा करने पर। शायद उन्हें इतना जल्दी मुझसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। इधर मैं उनके होठों को कभी चूमती तो कभी उन्हीं के जैसे चाटने लगती। फिर उनके गालों को चूमने लगी। मेरे दोनों हाथ कभी उनका चेहरा थाम लेते तो कभी उनके बदन में फिसलने लगते। जेठ जी को समझते देर न लगी थी कि अब मेरे अंदर आग सी लग गई है। वो मुस्कुराए और फिर बोले....ओह मंजू...मेरी प्यारी रानी...मेरी सुंदर रानी तेरा भी वही हाल हो गया है न जो मेरा हो चुका है। इस लिए इससे पहले कि इतने अच्छे मौके पर कोई आ कर बाधा पैदा कर दे हमें अपने प्यार को जल्द से जल्द आगे बढ़ाना चाहिए।" "म...मतलब????" "क्या राजू....इतना भी नहीं समझे।" काकी ने थोड़ी हैरानी जाहिर की─"उनका मतलब वही करने से था जिसे लोग चु...चुदाई कहते हैं।" "क...क्या?????? मतलब सच में???" मैं उछल ही पड़ा ये जान कर। "और नहीं तो क्या।" काकी शर्म से मुस्कुराई─"उस वक्त क्योंकि मेरे अंदर खुमारी छा गई थी और ऊपर से उत्तेजित भी हो चुकी थी इस लिए उनकी बात सुनते ही मैं कुछ भी करने को तैयार हो गई थी। अगर मेरी हालत सामान्य होती तो शायद ऐसा करने का इतना जल्दी साहस नहीं कर पाती मैं। उधर जेठ जी भी ये बात समझते थे। वो जानते थे कि अभी लोहा पूरी तरह गर्म है इस लिए बिना देर किए चोट कर देना चाहिए वरना अगर लोहे की गर्माहट कम हो गई तो शायद मैं उन्हें आगे बढ़ने से रोक दूंगी। तभी तो उन्होंने कोई देर नहीं की थी। झट से मुझे अलग किया और जल्दी जल्दी मेरी धोती खोलने लगे और बोले....मुझे अपनी प्यारी मंजू का सुंदर बदन देखना है। फिर उसे अच्छे से प्यार करना है। तू देखना मेरी रानी....तेरा ये आशिक तुझे वो खुशी देगा....वो मजा देगा जिसके बारे में तूने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।" "क्या तुम ये कह रही हो कि बापू तुम्हारी धोती खोल कर तुम्हें नंगा करने लगे थे।" मैंने अपनी शंका का समाधान करने की गरज में पूछा। "हां राजू...वो मुझे नंगा ही कर रहे थे।" काकी ने मेरी शंका का समाधान करते हुए कहा─"और मैं इतना उत्तेजित थी कि उन्हें रोक भी नहीं रही थी बल्कि ये चाहती थी कि वो जो भी कर रहे हैं वो झटपट करें। खैर जल्दी ही उन्होंने मेरी धोती खोल कर वहीं खाट पर फेंक दी। अब मेरे बदन में सिर्फ साया और ब्लाउज था। उस उत्तेजना में भी मुझे अपनी इ्उस हालत पर शर्म आई लेकिन मैंने जरा भी खुद को छुपाने की कोशिश नहीं की बल्कि उसी हालत में उनके सामने खड़ी थी। उधर वो आँखें फाड़े मेरा बदन और ब्लाउज में कैद मेरी छातियों को घूरने लगे थे। ब्लाउज में कसी मेरी छातियां एकदम सीधा उन्हें ही निशाना बनाए हुए थीं और वो जैसे सच में घायल हो के खड़े थे।" "फिर????" "अचानक जैसे उन्हें होश आया।" काकी ने आगे बताया─"तो झट आगे बढ़ कर मुझे अपने सीने से छुपकाया...मेरी पीठ को सहलाया और सहलाते हुए नीचे मेरे नितंबों तक पहुंच गए। उनके ऐसा करते ही मैं बुरी तरह गनगना गई। पूरा बदन थरथरा गया। सांसें अटक गईं। बेचैनी बढ़ गई। उधर उन्होंने इतना करने के बाद मुझे खुद से अलग किया और फिर ब्लाउज के ऊपर से ही मेरी छातियों को पकड़ कर पहले मसला फिर एक छाती के निप्पल को मुंह में भर लिया। उफ्फ राजू....सच कहती हूं उनके ऐसा करते ही मेरी आह निकल गई...उत्तेजना में सिसक उठी मैं। पूरे बदन में सनसनी फैल गई। मैंने झट से उनके सिर को थाम लिया और अपनी छाती पर दबाने लगी। वो ब्लाउज के ऊपर से ही मेरे निप्पल को मुंह में भरे बच्चों की तरह चूसे जा रहे थे और मैं पागल हुई जा रही थी। तभी वो निप्पल मुंह से निकाल कर बोले....मंजू...मेरी रानी कितना सुंदर तेरा ये दूध है। मन करता है छोटा बच्चा बन के सारा दिन ऐसे ही पीता रहूं। काश तेरी छातियों से दूध भी निकलता तो और भी आनंद आता। कहने के साथ ही उन्होंने मेरी दूसरी छाती के निप्पल को मुंह में भर लिया और उसे भी चूसना शुरू कर दिया। मेरी हालत खराब होने लगी थी। पूरा बदन मजे की तरंगें में अब उड़ने लगा था। मुझे अब जमीन पर खड़े रहना मुश्किल होने लगा था। उधर वो मेरी छाती को चूसने में लगे हुए थे और दूसरी को मसले जा रहे थे। इधर मेरी उत्तेजना बढ़ती ही जा रही थी। मैं अपनी टांगें आपस में मसलने लगी थी क्योंकि टांगों के बीच मौजूद मेरी चू....चूत में बड़े ज़ोर की खुजली होने लगी थी।" "ऐ...ऐसा क्यों काकी।" मुझे सच में समझ न आया कि काकी की चूत में खुजली क्यों होने लगी थी। "क्योंकि....क्योंकि मेरी वो...मतलब मेरी चू..चूत पानी छोड़ने लगी थी राजू।"काकी ने शर्म से झिझकते हुए कहा─"मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मेरा मूत किसी भी समय छूट जाएगा। तभी अचानक जेठ जी ने मेरे निप्पल को मुंह से निकाला और जल्दी जल्दी मेरे ब्लाउज के बटन खोलने लगे। सारे बटन जब खुल गए तो उन्होंने झट से मेरा ब्लाउज निकाल दिया। ब्लाउज के निकलते ही मेरी छातियां उनके सामने पूरी नंगी हो गईं। मुझे बड़ी शर्म आई और इस बार मैं उनकी नजरों से अपनी छातियों को छुपाने से खुद को रोक न सकी। मैंने अपने दोनों हाथों को कैंची की शक्ल दे कर सीने पर रख लिया जिससे मेरी छातियों का काफी हिस्सा छुप गया...बाकी तो नंगा ही रहा। उधर मेरे ऐसा करते ही जेठ जी मुस्कुराए और फिर बोले....अपनी इन सुंदर छातियों को मुझसे न छुपा मेरी प्यारी मंजू। मुझे देखने दे जी भर के। इन्हें देख कर मुझे पागल हो जाने दे।" "बापू सच में बड़ी अजीब अजीब बातें करते थे।" मैं हैरानी में बोल पड़ा। "हां सही कहा तुमने।" काकी ने हल्के से हंस कर कहा─"पर उनकी वो बातें मेरे दिल में उतर जाती थीं। लाज तो आती थी लेकिन उनकी मीठी बातें सुन कर मैं खुश भी हो जाती थी। उनकी तारीफ सुन कर जितनी खुशी होती उतना ही ये सोच कर खुद पर गर्व भी होता कि मैं और मेरी चीजें ऐसी हैं जिन्हें देख कर जेठ जी दिल खोल कर तारीफ कर रहे हैं....शायद ही ऐसा किसी औरत को नसीब होता होगा। हालांकि गायत्री जीजी का खयाल आता तो फिर यही सोचती कि जेठ जी उनकी भी तो ऐसे ही तारीफें करते होंगे। आखिर जीजी भी तो सुंदर हैं।" मां के बारे में काकी से ऐसा सुन कर मुझे अच्छा तो लगा मगर साथ ही थोड़ा अजीब भी लगा। एक पल के लिए मां के बारे में जाने क्या क्या सोच गया मैं। "फिर आगे क्या हुआ।" मैंने मां से ध्यान हटा कर काकी से पूछा─"क्या फिर तुमने बापू के कहने पर अपनी छातियों से हाथ हटा लिए थे।" "हां...भला कब तक उन्हें ऐसे छुपाए रखती।" काकी ने कहा─"वो तो लाज की वजह से छुपाए थी जबकि मन तो यही कर रहा था कि जेठ जी जो चाहते हैं वही हो। जब मैंने थोड़ी देर में अपने हाथ हटाए तो उन्होंने एकदम से लपक कर मेरी उन दोनों छातियों को थाम लिया। उनका स्पर्श होते ही पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई। फिर से मदहोशी का नशा छाने लगा। उधर वो मेरी छातियों को कभी सहलाते तो कभी जोर से मसल दे रहे थे। फिर आगे बढ़े और फिर से एक एक कर के निप्पल चूसने लगे। मैं फिर से मजे में उड़ने लगी। मजे में फिर से मैंने उनके सिर को पकड़ लिया और छातियों पर दबाने लगी। पलक झपकते ही मेरी हालत फिर से खराब हो गई। अचानक मेरे मुंह से निकला....उफ्फ जेठ जी...ऐसा मजा पहले कभी नहीं महसूस किया था मैंने। मुझे ऐसे ही मजा दीजिए....मेरी छातियों को ऐसे ही चूसिए...आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् चूसते चूसते मेरा दूध खींच लीजिए। मदहोशी में कही गईं मेरी ये बातें सुन कर जेठ जी और जोरों से मेरी छातियां मसल मसल कर निप्पल चूसने लगे। मैं बुरी तरह मचलने लगी। टांगों के बीच की खुजली और भी बढ़ गई। मुझसे बर्दाश्त करना मुश्किल होने लगा। तभी जेठ जी बोले....रानी तेरे दूध बहुत मीठे हैं...मन तो नहीं भर रहा लेकिन क्या करूं समय का भी खयाल करना है। अगर कोई आ गया तो ये सारा मजा किरकिरा हो जाएगा। कहने के साथ ही उन्होंने अपना एक हाथ नीचे सरकाया और झट साया के ऊपर से मेरी चू....चूत पर रख दिया। मैं बुरी तरह कांप गई। टांगों को सख्ती से भींच लिया जिससे उनका वो हाथ वहीं फंस गया। उनके हाथ की उंगलियां मेरी चू..चूत के मुहाने पर दस्तक दे रहीं थी। तभी उन्होंने अपनी दो उंगलियों को हरकत दी और मेरी चूत को सहलाने लगे। उनके ऐसा करते ही मैं तड़प उठी। मुंह से सिसकी निकल गई। सांसें अटक गईं। उधर वो मेरी चूत को सहलाते रहे। मैं ज्यादा देर खुद को खड़े न रख पाई और वहीं खड़े खड़े ही मुझे झटके लगने लगे। मैं झटके खा खा के झड़ने लगी थी। उस वक्त मुझे कोई होश नहीं था....बस ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मैं आनंद की अनंत ऊंचाइयों में पहुंच कर ठहर गई हूं और इसके साथ ही जैसे हर चीज अपनी जगह पर ठहर गई हो...एकदम सन्नाटा सा छा गया हो।" "फि...फिर????" काकी की बातें सुन मैं खुद भी कहीं अटक सा गया था और जैसे ही होश आया तो मारे उत्सुकता के पूछा। "फिर क्या....मैं तो उस वक्त बस बेहाल ही हो गई थी राजू।" काकी ने गहरी सांस ले कर कहा─"सारा नशा पानी बन कर मेरी टांगों के बीच से निकल गया था। मुझे तो पता भी नहीं था कि मैं अब भी जमीन पर खड़ी थी या जेठ जी ने मुझे खाट पर लेटा दिया था। जब हालत कुछ ठीक हुई तो पता चला मैं खाट पर पड़ी हूं और जेठ जी मेरे दोनों तरफ खाट पर हाथ टिकाए मेरे ऊपर थे और मुझे ही देखे जा रहे थे। जैसे ही मैंने आँखें खोल कर उन्हें अपने ऊपर से खुद को यूं देखते पाया तो एकदम शर्म से दोहरी हो गई मैं। नशा और जोश ठंडा हुआ तो अपनी हालत का अच्छे से एहसास हुआ था तभी तो उस हालत में खुद को और जेठ जी को देख बुरी तरह लजा आई थी मुझे। मैं ज्यादा देर तक जेठ जी से नजर न मिलाए रख सकी थी बल्कि शर्म से मुस्कुरा कर मैंने अपना चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया था। ये देख जेठ जी मुस्कुरा उठे फिर बोले....क्या हुआ मेरी रानी। इतना क्यों शर्मा रही है। उनकी बात सुन कर मैं और भी बुरी तरह लजा गई। कुछ कहते न बना....बोलने की हिम्मत ही न हुई थी और वो...मुस्कुराए जा रहे थे। फिर बोले....मेरी प्यारी मंजू कितनी मतलबी है तू। उनकी ये बात सुन मैंने झट से उनकी तरफ हैरानी से देखा। मैं समझने की कोशिश करने लगी थी कि आखिर मैं किस बात पर मतलबी बन गई हूं। मेरी इस उलझन को उन्होंने ही दूर किया। बोले...अरे मेरी भोली रानी...मेरे कहने का मतलब ये है कि तूने तो मजा ले लिया और अब शांत भी हो गई है मगर तेरे इस दीवाने का क्या....तेरा ये आशिक तो अभी भी अधर में ही लटका हुआ है। उसे भी तो आनंद की चरम सीमा तक पहुंचा दे मेरी रानी।" जारी है................
09-01-2026, 05:34 PM
I think kahani pasand nahi aa rahi kisi ko
Koi like comment hi nahi kar raha.....thats not good What can I do if no one responds? If no one motivates or appreciates me how will I write?
12-01-2026, 08:56 AM
भाग ~ ०८
"बापू किस चरम सीमा में पहुंचा देने को बोल रहे थे तुमसे।" मुझे समझ न आया तो मैंने काकी से पूछा। मेरे पूछने पर काकी जाने क्या सोच कर हंस पड़ी। उनके यूं हंस पड़ने से मैं ये सोच कर मायूस सा हो गया कि कितना नादान और नासमझ हूं मैं जो उनकी कुछ बातें अच्छे से समझ ही नहीं पाता हूं। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे काकी के सामने मेरी इज्जत उतर गई हो। "क्या तुम सच में इतने भोले और नादान हो जो चरम सीमा जैसी बात नहीं समझते।" काकी ने अपलक मेरी तरफ देखते हुए कहा─"या फिर तुम समझ तो गए हो मगर मेरे मुख से खुल्लम खुल्ला सुनना चाहते हो। बताओ यही बात है न।" "न...नहीं नहीं काकी।" मैं झट बोला─"मैं सच में नहीं समझ पाया हूं। तभी तो तुमसे पूछ बैठा हूं।" "ठीक है...तो फिर सुनो।" काकी ने एक गहरी सांस ली─"चरम सीमा उसे कहते हैं जिसमें इंसान मजे में इतना ज्यादा डूब जाता है कि फिर उसे किसी भी बात का होश ही नहीं रह जाता। कोई भी चीज जब हद से ज्यादा हो जाती है तो इंसान उसे अति हो जाना कहता है या फिर चरम सीमा के बाहर कह देता है। हर चीज को सोचने का अपना अपना नजरिया होता है....अपनी अपनी सोच होती है लेकिन कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें एक खास नाम दे कर उसके एहसास हो बयां किया जाता है। खुशी, आनंद और दुख दर्द ऐसी ही चीजें हैं जो अगर हद से ज्यादा महसूस हों तो हम यही कहते हैं कि ये अपनी चरम सीमा तक या उससे भी ऊपर पहुंच गई है। तुम्हारे बापू की दो उंगलियां उस वक्त मेरे द्वारा अपनी टांगों को भींच लेने से मेरी चू..चूत में फंसी रह गईं थी और वो मेरी चूत को सहलाने के साथ साथ कुरेदने भी लगे थे। इससे मैं पूरा मदहोश हो गई थी। मुझे इतना आनंद आने लगा था कि मैं उसके मजे से सातवें आसमान में उड़ने लगी थी और फिर उस स्थिति में जब मैं और मेरे अंदर के जज्बात मेरे काबू से बाहर हो गए तो उस मजे में बेकाबू हुए जज्बात पानी बन कर मेरी उस योनि के रास्ते बाहर निकल गए थे। ये वो स्थिति होती है जिसमें इंसान अत्यधिक आनंद में डूब जाता है और वो उस आनंद को काबू नहीं रख पाता।" "हम्म्म्म समझ गया।" मैंने काकी की बात गौर से सुनने के बाद सिर हिलाया─"खैर फिर आगे क्या हुआ। मतलब कि बापू ने जब तुम्हें वैसा कहा था तब तुमने क्या किया था।" "मैं तो लाज और शर्म की वजह से कुछ करने की हालत में ही नहीं थी राजू।" काकी ने बताना शुरू किया─"इस लिए जब जेठ जी के कहने का मतलब मुझे समझ आया तो मैंने बुरी तरह शर्मा कर बस इतना ही कहा कि आपको जो करना है कीजिए।" "क्या सच में???" "हां और क्या।" काकी ने थोड़ा लजा कर कहा─"मैं ये तो कह नहीं सकती थी कि मुझे कुछ नहीं करना है या उन्हें कुछ करने नहीं देना है या वो मेरे घर से ही चले जाएं। ऐसा बोलने का मतलब था उनकी कही बात का सच हो जाना। मतलब कि जो उन्होंने मुझे मतलबी होने वाली बात कही थी उसका सच हो जाना। बात भी सही थी...इससे तो यही साबित होता न कि जब तक मुझे मजा आ रहा था तब तक मैंने उन्हें किसी बात के लिए नहीं रोका और जब मैं मजे और आनंद को पा चुकी तो अब शरीफ बन कर उन्हें कुछ भी करने से मना कर रही हूं....इतना ही नहीं उन्हें अपने घर से भी जाने को कह रही हूं।" "हां ये तो सही कहा तुमने।" मैंने भी समझ कर सिर हिलाया─"तो फिर जब तुमने बापू से कहा कि आपको जो करना है कीजिए तो फिर बापू ने क्या कुछ किया था।" "वो तो उन्हें करना ही था राजू।" मंजू काकी ने कहा─"इतना आगे बढ़ने के बाद ऐसा कौन मरद होगा जो औरत की ऐसी बात मान कर बिना कुछ किए ही चला जाएगा। दुनिया में इतना शरीफ मरद अब कोई नहीं रहा राजू। किसी भूखे के सामने अगर अच्छे पकवान से भरी थाली रखी हो तो क्या वो बिना कुछ खाए भूखा ही उठ कर चला जाएगा....नहीं न। वैसा ही हाल जेठ जी का था। उस वक्त अगर मैं मना भी करती तब भी वो नहीं रुकते। खैर यहां तो मैंने ऐसा कह कर कुछ भी करने की एक तरह से छूट ही दे दी थी।" "इसका मतलब बापू ने फिर तुम्हारे साथ कुछ किया था...है न।" "हां।" "क्या किया था बापू ने।" "वही जो सारी दुनिया के मर्द करते हैं।" काकी के चेहरे पर शर्म की लाली उभर आई─"मतलब कि...चु...चुदाई।" "क..क्या????" मेरी आँखें फैलीं─"क्या तुम सच कह रही हो।" "भला मैं तुमसे झूठ क्यों बोलूंगी।" काकी ने कहा─"जब इतना कुछ सच बताया है तो ये भी सच ही है। तुम खुद सोचो कि अगर ये सच न होता तो क्या आज मैं और तुम्हारे बापू खेत वाले उस कमरे में वो सब कर रहे होते।" "हां ये भी सही कहा तुमने।" मैंने कहा─"खैर मुझे ये वाला किस्सा भी खुल कर पूरा बताओ।" "राजू कुछ तो शर्म करो।" काकी ने आँखें फैला कर कहा─"तुम्हारी काकी हूं मैं। थोड़ी तो लिहाज और मर्यादा रहने दो हमारे बीच।" "मैं ये सब नहीं जानता।" मैंने भोलापन दिखा कर जिद की─"जब तुमने इतना कुछ खुल कर बताया है तो इसके आगे का भी मुझे बताओ।" मेरी बात सुन कर काकी कुछ पलों तक मुझे अजीब तरह से देखती रहीं। उनके चेहरे पर शर्म और झिझक झलक रही थी। इधर मेरी धड़कनें बढ़ चलीं थी। तभी काकी ने मुझसे नजर हटाई और दूसरी जगह नजर टिका कर ऐसे बताने लगीं जैसे उस जगह पर उन्हें वही सब दिखने लगा हो जो बापू ने उनके साथ किया था। ######## "आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" मंजू के मुख से मजे में डूबी सिसकी निकल गई। त्रिभुवन उसकी बड़ी बड़ी छातियों को दोनों हाथों से पकड़े कभी मसल देता तो कभी झुक कर एक निप्पल को मुंह में भर लेता। खाट पर पड़ी मंजू बुरी तरह मचल उठती थी। "मंजू...मेरी रानी।" त्रिभुवन ने मुंह से निप्पल को जोर से खींचा और फिर छोड़ कर कहा─"आज तेरा सारा दूध निचोड़ लूंगा। तेरी इन सुंदर और गोरी चूचियों को दबा दबा के लाल कर दूंगा।।" "शश्श्श्श् ऐ....ऐसी बातें न करिए न।" मंजू शर्म से दोहरी हो कर बोली─"मुझे बहुत शर्म आ रही है।" "अब किस बात की शर्म मेरी रानी।" त्रिभुवन ने उचक कर उसके होठों को चूम कर कहा─"अब हमारे बीच शर्म नहीं रहनी चाहिए। अब तो बस हर शर्म लिहाज को दूर कर के बस प्यार ही करना चाहिए। बोल मेरी रानी करेगी न प्यार। भई...मैं तो अपनी सुंदर रानी को दबा के प्यार करूंगा।" कहने के साथ ही त्रिभुवन झुका और फिर से मंजू की छातियों को मसल मसल कर निप्पल को चूसने लगा। मंजू फिर से मचलने लगी। कमरे में कभी उसकी आहें गूंज उठतीं तो कभी मादक सिसकियां। उसकी टांगों के बीच फिर से हरारत होने लगी थी। उसकी चूत फिर से रिसने लगी थी जिससे उसे खुजली होने लगी थी। इधर त्रिभुवन निप्पल को छोड़ नीचे सरका। मंजू का गेहुंए रंग का सपाट पेट देख उसके मुंह में जैसे पानी आ गया। पेट के बीच में गहरी नाभी को देख तो उससे रहा ही न गया। झट से झुक कर वो पेट और नाभि को चूमने चाटने लगा। मंजू और भी ज्यादा मचलने लगी। "शश्श्श्श् जे...जेठ जी गुदगुदी हो रही है।" मंजू मजे में सिसक उठी। "गुदगुदी हो रही है या मजा आ रहा है मेरी रानी को।" त्रिभुवन ने सिर उठा कर पूछा। "ह...हां हां मजा ही आ रहा है जेठ जी।" मंजू मजे में आँखें बंद किए सिसक के बोली। "चिंता मत कर मेरी मंजू।" त्रिभुवन बोला─"आज तुझे ऐसा मजा आएगा जिसका तूने कभी सोचा तक नहीं होगा।" इतना कहते ही त्रिभुवन फिर झुका और फिर से मंजू का पेट और नाभी को चूमना चाटना शुरू कर दिया। नाभी के बस थोड़ा ही नीचे साया था जिसकी डोरी उसके चेहरे के बिल्कुल पास ही थी। उसने एक हाथ से साया की वो डोरी पकड़ी और झटके से खींच दी जिससे गांठ खुल गई। मंजू को जैसे ही इसका पता चला वो थोड़ी हड़बड़ा सी गई। "जे...जेठ जी क्या कर रहे हैं।" मंजू ने झट से आँखें खोल कर त्रिभुवन को देखा। "अपनी प्यारी मंजू की सुंदरता को उजागर कर रहा हूं रानी।" त्रिभुवन ने कहा─"इसके अंदर सबसे अनमोल चीज छुपी हुई है। उसी को तो देखना है मुझे और फिर उसे प्यार भी करना है।" मंजू समझ गई कि त्रिभुवन उसकी चूत की बात कर रहा है। इस लिए वो बुरी तरह शर्मा गई। चेहरे पर लाज के साथ साथ एकाएक घबराहट उभर आई। उसने न में सिर हिला कर त्रिभुवन से कहा कि नहीं...ऐसा मत कीजिए मगर त्रिभुवन भला अब कहां मानने वाला था। उसने दूसरी गांठ को भी खोला और साया को नीचे खींचने लगा मगर वो ज्यादा नीचे न सरक सका क्योंकि मंजू लेटी हुई थी और उसके पिछवाड़े में वो दबा हुआ था। त्रिभुवन चाहता तो साया को बिना उतारे ही नीचे से ऊपर उठा कर मंजू की बुर को उजागर कर देता मगर उसका मन यही था कि मंजू के बदन पर कोई कपड़ा ही न रहे। "अपनी कमर को थोड़ा सा उठा मेरी रानी।" फिर उसने कहा─"ताकि मैं तेरा ये साया नीचे सरका कर इसे तेरे बदन से अलग कर सकूं।" "न...नहीं न।" मंजू शर्म से बोली─"उसे मत निकालिए न।" "मैं तो निकालूंगा रानी।" त्रिभुवन ने जैसे जिद की─"मैं अपनी प्यारी मंजू को पूरी तरह नंगा देखना चाहता हूं।" मंजू बेबस सी हो गई। वो समझ चुकी थी कि उसके मना करने का अब कोई फायदा नहीं है। उसे ये भी खयाल आया कि ऐसी हालत में अगर कोई आ गया तो बड़ा भारी अनर्थ हो जाएगा। मतलब जो कुछ करना है उन दोनों को जल्दी ही करना होगा। ये सोच कर मंजू ने अपनी कमर को थोड़ा सा उठा लिया जिससे त्रिभुवन ने झट से उसका साया नीचे खींच दिया। साया हटते ही मंजू की चूत एकदम उजागर हो गई। चूत के चारों तरफ घने काले बाल(झांठें)थे। मंजू को जैसे ही एहसास हुआ कि अब उसकी चूत पूरी नंगी हो चुकी है तो उसने हड़बड़ा हर जल्दी से उसे अपने दोनों हाथों से छुपा लिया। उसकी धड़कनें रुक सी गईं थी। उसे इतनी लाज आई कि उसने दोनों हाथों से अपनी चूत को छुपाए कस के आँखें बंद कर ली। ये देख त्रिभुवन मुस्कुराया ही नहीं बल्कि हंस भी पड़ा। "क्या हुआ मेरी रानी।" उसने कहा─"मेरी छोटी रानी से अपने हाथ हटा न। देखने तो दे कि ये भी तेरी तरह सुंदर है या नहीं।" "उफ्फ जेठ जी...ऐसी बातें न कीजिए न।" मंजू हद से ज्यादा लजा गई। त्रिभुवन मुस्कुरा उठा। वो ये भी समझ गया था कि मंजू लाज के कारण अपने हाथ नहीं हटाएगी इस लिए उसने खुद आगे हाथ बढ़ा कर उसके हाथों को चूत से हटाने के लिए थोड़ा सा जोर लगाया। इधर मंजू ने भी झट से जोर लगा कर अपने हाथ को चूत पर दबाया। "ये क्या कर रही है रानी।" त्रिभुवन उसका हाथ हटाने की कोशिश करते हुए बोला─"अपनी इस छोटी रानी के दर्शन तो करने दे।" "न..नहीं नहीं जेठ ऐसा मत कीजिए न।" मंजू बुरी तरह लजा रही थी। उसने अभी भी अपनी आंखों को कस के बंद किया हुआ था। त्रिभुवन ने इस बार ताकत का स्तेमाल किया और कुछ ही पलों में मंजू के हाथों को उसकी चूत से हटा दिया। मंजू बुरी तरह छटपटा के रह गई। "ये क्या मेरी प्यारी मंजू।" त्रिभुवन उसकी चूत के आसपास उगे काले जंगल को देख बोला─"तूने तो अपनी छोटी रानी को घनघोर जंगल में छुपा रखा है।" मंजू का शर्म से बुरा हाल हो गया। उसने फिर से अपनी चूत को छुपाने के लिए हाथ बढ़ाया लेकिन त्रिभुवन पहले से तैयार था इस लिए उसने उसके हाथों को पकड़ लिया। "भगवान के लिए जेठ जी ऐसे मत देखिए न।" मंजू लजा कर बोली─"और ऐसी बातें भी न कीजिए। मुझे सच में बहुत शर्म आ रही है।" "अच्छा ठीक है नहीं करूंगा बातें।" त्रिभुवन ने भी वक्त की नजाकत को समझा─"पर मैं अपनी छोटी रानी को तो प्यार करूंगा ही।" इतना कह त्रिभुवन एकदम से झुका और मंजू की गदराई हुई जांघ को चूम लिया। उसके ऐसा करते ही मंजू मचल उठी और उसके मुख से सिसकी निकल गई। इधर त्रिभुवन चूमते हुए उसकी चूत के किनारे पर आ गया। मंजू ये सोच के घबरा उठी कि क्या वो उसकी चूत को भी चूमने वाला है। उसने तो ऐसा होने की कभी कल्पना ही नहीं की थी। उसका पति ये सब सपने में भी नहीं सोचता था। उसने तो मंजू के होठों पर भी कभी आज तक चुम्बन नहीं लिया था। "शश्श्श्श् उफ्फ जे..जेठ जी ये क्या कर रहे हैं आप।" अपनी चूत के पास जैसे ही उसने त्रिभुवन के होठों को महसूस किया तो बोल पड़ी─"भगवान के लिए वहां मुंह मत रखिए। वो बहुत गंदी जगह है।" "मेरी प्यारी मंजू का कुछ भी गंदा नहीं है।" त्रिभुवन ने सिर उठा कर उसकी तरफ देखते हुए कहा─"फिर चाहे वो मेरी रानी की चूत हो या गान्ड।" चूत गान्ड सुनते ही मंजू का एक बार फिर से शर्म से बुरा हाल हो गया। इधर त्रिभुवन इतना बोलने के बाद फिर से झुक कर उसकी चूत के आस पास चूमने लगा। मंजू बुरी तरह छटपटाने लगी। एक बार फिर से उसके अंदर बेचैनी बढ़ने लगी थी। वासना का नशा फिर से मजे का रूप ले कर उसे हवाओ में उड़ाने लगा था। तभी मंजू उछल पड़ी क्योंकि अचानक ही उसने अपनी चूत पर त्रिभुवन की हथेली महसूस की। त्रिभुवन उसकी चूत को सहलाने लगा था। फिर सहसा चूत के आसपास उगे बालों को उंगलियों से हटाया जिससे मंजू की चूत का गुलाबी हिस्सा नजर आने लगा। "शश्श्श्श्...ये क्या कर रहे हैं आप।" मंजू मचलते हुए सिसकी─"वहां हाथ मत लगाइए...वो गंदी जगह है।" "पर मुझे तो ये बड़ी प्यारी जगह नजर आ रही है मेरी रानी।" त्रिभुवन जैसे नशे में बोला─"कितनी सुंदर है तेरी चूत और देख कितना गीली हो गई है।" मंजू ये सुन कर शर्म से और भी पानी पानी हो गई। उसने झट अपनी टांगों को सिकोड़ कर चूत को छुपाना चाहा मगर त्रिभुवन ने उसे ऐसा नहीं करने दिया। उसने दोनों हाथों से उसकी जांघों को थाम लिया था। मंजू बेबस सी हो गई। तभी त्रिभुवन ने उसकी चूत में उंगली घुसेड़ दी जिससे मंजू उछल पड़ी। "आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" वो मजे के तरंग में सिसक उठी। एक ही पल में उसका पूरा बदन मजे और उत्तेजना में कांप उठा। उधर त्रिभुवन उसकी चूत में उंगली डाले अंदर बाहर करने लगा। मंजू और भी ज्यादा मजे और उत्तेजना में मचलने लगी। आँखें बंद किए वो अपना सिर कभी इधर तरफ करती तो कभी दूसरी तरफ। इधर त्रिभुवन का हाल भी कुछ ठीक नहीं था। बड़ी देर से उसने खुद को रोके हुए था। लुंगी के अंदर कच्छे में उसका हथियार पूरा अकड़ गया था और मंजू की गुलाबी चूत में समा जाने के लिए मानो त्रिभुवन को मजबूर किए जा रहा था। "अब बर्दाश्त नहीं हो रहा मेरी रानी।" फिर उसने उंगली करते हुए मंजू से कहा─"मेरा हथियार तेरी इस चूत में जाने के लिए बेकरार हो उठा है। तू बता...क्या मैं अपना लंड डाल दूं तेरी चूत में।" उसकी बात सुनते ही मंजू बुरी तरह लजा गई। उससे कुछ बोला न गया। हालांकि उसकी जो हालत थी उसके चलते अब वो भी यही चाहती थी कि त्रिभुवन जल्दी से उसे चोदना शुरू कर दे और ऐसा चोदे कि उसकी चीखें निकलने लगें। "बोल न मेरी प्यारी मंजू।" उसे चुप देख त्रिभुवन बोला─"देख जब तक तू मुझसे कहेगी नहीं कि चूत में लंड डाल दो तब तक मैं नहीं डालूंगा।" मंजू ये सुन कर शरमाई तो बहुत लेकिन सहसा उसके चेहरे पर बेचैनी के साथ बेबसी भी झलक उठी। "अ...आपका जो मन करे की...कीजिए।" फिर उसने किसी तरह धीमे से कहा। उसकी आँखें अब भी बंद थीं। "एक बार बोल दे न मेरी रानी।" त्रिभुवन ऊपर की तरफ खिसक कर उसके चेहरे के पास आ गया। फिर झुक कर उसने मंजू के कांपते होठों को चूम लिया। मंजू को पता ही नहीं था कि वो नीचे से ऊपर आ गया है इस लिए जैसे ही उसे अपने होठों पर त्रिभुवन के होंठ महसूस हुए तो वो एकदम से चौंक पड़ी थी। न चाहते हुए भी उसने आँखें खोल कर त्रिभुवन की तरफ देखा। उफ्फ उसकी आंखों में वासना के लाल डोरे झलक रहे थे। ऐसा लगा जैसे कितना नशे में है वो। "क्यों इतना तड़पा रही है अपने इस दीवाने को मेरी रानी।" त्रिभुवन उसकी आंखों में देखते हुए बोला─"अपने मुख से खुल कर एक बार बोल न कि मेरी चूत में अपना लंड डाल दीजिए।" "ऐ...ऐसी बातें मत कीजिए न।" मंजू ने शर्म से चेहरा दूसरी तरफ फेर कर कहा─"आपको को करना है कीजिए....पर जल्दी कीजिए।" त्रिभुवन ये सुन कर मुस्कुरा उठा। वो अच्छी तरह समझता था कि मंजू इस वक्त बहुत ज्यादा शर्मा रही है। एक तो वो रिश्ते में उसका जेठ लगता था...दूसरे उसने ये सब कभी सपने में भी नहीं सोचा था और न ही कभी अपने पति से बोला था। इस लिए उसका यूं शर्माना स्वाभाविक था। यही बहुत बड़ी बात थी कि वो अपने जेठ के साथ इतना कुछ करती चली आई थी। त्रिभुवन ने झुक कर उसके गाल को चूमा फिर बोला─"बस एक बार अपने मुख से बोल दे रानी। फिर मैं सच में जल्दी से वही करने लगूंगा जो हम दोनों चाहते हैं।" मंजू समझ चुकी थी कि जब तक वो बोलेगी नहीं तब तक उसे इसी हालत में रह कर तड़पते रहना पड़ेगा। इस लिए उसने आँखें बंद कर के हिम्मत जुटाई और बोली─"अ..आप बहुत गंदे हैं। कितना बेबस कर रहे हैं मुझे। मैंने आज तक कभी अपने मरद से ऐसे नहीं बोला है।" "पर मैं तो तेरा प्रेमी हूं मेरी प्यारी मंजू।" त्रिभुवन ने मुस्कुराते हुए कहा─"जो तूने अपने मरद से कभी नहीं कहा वो अपने इस दीवाने से कह दे न। मैं चाहता हूं कि हमारे बीच किसी भी चीज का न पर्दा रहे और न ही कोई शर्म। असली मजा तभी आता है मेरी रानी जब हर चीज बेशर्म हो के खुल कर बोली और की जाए। तू एक बार बोल तो मेरी रानी....फिर देखना कितना मजा आएगा तुझे।" "ठी...ठीक है।" मंजू ने कहा─"जेठ जी मुझे अब ज्यादा न तड़पाइए...मेरी चू...चूत में अपना लं...लंड डाल कर मुझे चोदिए न।" इतना कह कर मंजू ने शर्मा कर दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया। उसकी नंगी छातियां उसकी तेज चलती सांसों से ऊपर नीचे होने लगीं थी। उधर त्रिभुवन उसकी बात सुनते ही खुश हो गया। उसे मंजू के मुख से ऐसी बात सुन कर एक अलग ही तरह का नशा चढ़ गया था। अब उसने देर नहीं की। झट से उठा और फटाफट अपने कपड़े उतारे लगा। कमीज और लुंगी को उसने एक तरफ फेंक दिया और फिर कच्छे का नाड़ा खोल कर निकाल दिया। उसका काला लंड उछल कर बाहर आ गया था। उसने आँखें बंद किए लेटी मंजू की तरफ देखा और फिर चुपके से उसके करीब गया। अगले ही पल उसने मंजू का एक हाथ पकड़ा और उसे अपने लंड पर रख दिया। मंजू को जैसे ही किसी गर्म और ठोस चीज पर अपना हाथ महसूस हुआ तो उसने झट से आँखें खोल कर उस तरफ देखा। त्रिभुवन को एकदम नंगा देख उसकी आँखें फैल गईं और फिर जैसे ही उसकी नजर अपने हाथ पर पड़ी तो ये देख कर उसे झटका लगा कि त्रिभुवन ने उसके हाथ को अपने लंड पर रखा हुआ है। उसने हड़बड़ा कर अपना हाथ उसके लंड से हटाना चाहा मगर त्रिभुवन ने उसे ऐसा नहीं करने दिया। "मेरी रानी....एक बार इसे अपने हाथ से सहला दे।" फिर वो बोला─"देख तेरी गुलाबी चूत को देख कर ये कैसे खड़ा हो गया है। इसे अच्छे से सहला कर बता कैसा है ये।" मंजू ने फिर से हाथ हटाने के लिए जोर लगाया मगर त्रिभुवन ने उसके हाथ को मजबूती से पकड़े रखा। उधर मंजू का शर्म से बुरा हाल हो चुका था। बेबस हो कर बोली─"क...क्या कर रहे हैं आप। छोड़ दीजिए न...बहुत शर्म आ रही है मुझे।" "मेरी रानी...मैंने बताया न कि ऐसे वक्त पर अगर खुल कर सब कुछ करेगी और बोलेगी तो तुझे बहुत मजा आएगा। इस लिए शर्मा मत और खुल कर इसे अच्छे से पकड़ ले।" मंजू चाहती तो थी लेकिन शर्म और झिझक के कारण वो ऐसा कर नहीं पा रही थी। एकाएक उसने अपनी आँखें बंद की और दो तीन बार गहरी गहरी सांसें ली। फिर आँखें खोल कर उसने त्रिभुवन के लंड की तरफ देखा। अगले ही पल वो एकदम से उठ कर बैठ गई। त्रिभुवन उसे उठ कर बैठते देख थोड़ा चौंका लेकिन बोला कुछ नहीं। उधर मंजू ने बैठने के बाद खुद ही उसके लंड को पकड़ लिया और हल्के हल्के सहलाने लगी। "उफ्फ मेरी रानी।" त्रिभुवन के अंदर मजे की लहर दौड़ गई─"तेरे कोमल हाथ कितना अच्छा महसूस करा रहे हैं मुझे। हां ऐसे ही मेरी रानी....थोड़ा और जोर से पकड़ कर सहला इसे।" मंजू की नजरें लंड पर जमी थीं। वो सोचने लगी कि इतना बड़ा लंड तो उसके मरद का भी नहीं है। "ये....ये कितना बड़ा है आपका।" फिर उसने कहा। "क्या बड़ा है मेरी रानी।" "आपका ये लं...लंड।" "पसंद आया न तुझे।" "ह...हां।" "तो इसको एक बार चूम न।" "क...क्या????" मंजू शर्म और हैरत से चौंक पड़ी─"छी...ये क्या कह रहे हैं आप। भला कोई इसे चूमता है क्या।" "तुझे अभी पता ही नहीं है मेरी प्यारी मंजू कि दुनियां में लोग क्या क्या करने लगे हैं।" त्रिभुवन ने कहा─"आज कल मर्द औरत की चूत चाटता है और औरत मर्द का लंड मुंह में ले कर चूसती है।" "छी ये क्या बोल रहे हैं आप।" मंजू चकित सी बोली─"न..नहीं नहीं...मैं नहीं मानती कि लोग ऐसा करते होगे...और अगर करते भी हैं तो क्या। मैं तो ऐसा गंदा काम नहीं करूंगी और न ही आपको करने दूंगी।" "ठीक है मेरी रानी।" त्रिभुवन ने इसके लिए मंजू को मजबूर करना ठीक नहीं समझा─"मैं तुझे किसी बात के लिए मजबूर नहीं करूंगा।" मंजू कुछ देर तक उसके लंड को सहलाती रही। त्रिभुवन का लंड अब पूरी तरह अकड़ चुका था। मंजू को यकीन नहीं हो रहा था कि किसी आदमी का हथियार इतना बड़ा हो सकता है। जब त्रिभुवन से बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया तो उसने मंजू को रोका और सीधा लेट जाने का इशारा किया। मंजू तो कब से यही चाह रही थी कि त्रिभुवन जल्द से जल्द उसकी चुदाई करना शुरू कर दे। मंजू के लेटते ही त्रिभुवन उसके ऊपर आया और झुक कर उसकी छातियों को मसलने लगा और निप्पल को मुंह में भर चूसने खींचने लगा। मंजू एक ही पल में गनगना उठी। पूरे बदन में मजे की लहर दौड़ उठी थी उसके। उसने त्रिभुवन के सिर को थाम कर अपनी छातियों पर दबाना शुरू कर दिया था। "तेरे ये दूध सच में बहुत मीठे हैं मेरी रानी।" त्रिभुवन ने सिर उठा कर मंजू से कहा─"मन करता है बस ऐसे ही मसलते हुए चूसता रहूं मगर अब बर्दाश्त नहीं हो रहा।" कहने के साथ ही वो नीचे सरका। उसका फनफनाया हुआ लंड मंजू के पेट से टकराते हुए सीधा उसकी चूत के पास पहुंच गया। मंजू को जैसे ही महसूस हुआ कि त्रिभुवन का लंड उसकी चूत के पास पहुंच गया है तो सिसक उठी। "अब डाल दीजिए न।" उससे बर्दाश्त न हुआ तो मजबूरन बोल पड़ी─"कब से तड़पा रहे हैं मुझे। अब चोदिए न मुझे।" मंजू के मुख से इस बार बेझिझक खुल्लम खुल्ला ये सुन कर त्रिभुवन मुस्कुरा उठा। उसने झट उसकी टांगों को फैलाया और एक हाथ से अपने लंड को पकड़ कर मंजू की चूत में घुसाने लगा। "ले मेरी रानी।" फिर वो बोला─"अब नहीं तड़पाऊंगा तुझे। अब तो तुझे कस कस के चोदूंगा।" "आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" अपनी चूत के अंदर त्रिभुवन का लंड महसूस होते ही मंजू मजे में सिसक उठी। उधर त्रिभुवन ने अपने लंड का टोपा उसकी चूत में घुसाया और फिर दोनों हाथों को खाट पर इधर उधर जमाने के बाद एकदम से जोर का धक्का मार दिया। "आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् म..र गई।" मंजू दर्द और मजे से आह भर कर सिसक उठी─"धीरे से डालिए न।" त्रिभुवन से अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था इस लिए उसने उसकी बात को अनसुना कर दिया और फिर से तेज धक्का दिया जिससे इस बार उसका पूरा लंड मंजू की चूत को चीरते हुए अंदर तक समा गया। "आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्।" मंजू की इस बार दर्द से हल्की चीख निकल गई। "बस मेरी रानी।" पूरा लंड घुसेड़ कर त्रिभुवन बोला─"पूरा अंदर जा चुका है। अब तुझे दर्द नहीं बल्कि मजा आएगा।" कहने के साथ ही त्रिभुवन जोर जोर से अपनी कमर को आगे पीछे करके लगा। पलक झपकते ही कमरे में मंजू की आहें और सिसकियां गूंजने लगीं। त्रिभुवन के धक्के लगाने से उसी बड़ी बड़ी चूचियां उछल पड़ती थीं। जिन्हें देख त्रिभुवन ने झुक कर उसकी चूची का एक निप्पल मुंह में भर लिया। एक तरफ से वो धक्के मार रहा था और दूसरी तरफ से वो उसका निप्पल चूसता जा रहा था। इस दोहरे हमले से मंजू का मजा दोगुना हो गया और वो मस्ती में आ कर और जोरों से आहें भरने लगी। "आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् कितना मजा आ रहा है जेठ जी।" फिर वो मजे में आँखें बंद किए बोली─"आज से पहले ऐसा मजा कभी नहीं आया मुझे। आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् आपका लंड तो मेरी बच्चादानी तक पहुंच रहा है। हाए ऐसा लगता है जैसे कोई गरम गरम सलिया मेरी नाजुक सी चूत में घुस गया है। उफ्फ आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श्....ऐ...ऐसे ही जोर जोर से चोदिए मुझे।" मंजू जो अब तक शर्मा रही थी वो अब मजे और मस्ती में पूरा बेशर्म हो गई थी। "हां मेरी रानी।" त्रिभुवन उसकी बातें सुन कर और जोर से धक्के मारते हुए बोला─"ले मेरी प्यारी मंजू...आज मैं तुझे ऐसा मजा दूंगा जिससे तू तृप्त हो जाएगी रानी। उफ्फ तेरी चूत तो काफी कसी हुई है रे। क्या दशरथ तुझे चोदता नहीं है।" "शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् किसी...किसी दिन ही वो मुझे चो...चोदते हैं जे...जेठ जी।" मंजू मस्ती में बोली─"ले...शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह्...लेकिन उनका आपकी तरह इतना बड़ा नहीं है इस लिए आपको मेरी चू..चूत कसी हुई लग रही है। आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् हाय कितना मस्त चोदते हैं आप...शश्श्श्श् कितना मजा आ रहा है मुझे।" "अब से तुझे ऐसे ही मजा आएगा मेरी रानी।" त्रिभुवन ने थोड़ा आगे हो कर उसके होठ चूम लिए─"अब से मैं तुझे ऐसे ही हुमच हुमच के चोदूंगा। बोल मुझसे चुदवाएगी न मंजू।" "ह...हां म...मैं ऐसे ही आपसे चुदवाऊंगी जेठ जी।" मंजू मजे के आनंद में डूबी बोली─"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् रो...रोज ऐसे ही चुदवाऊंगी आपसे। आप मुझे ऐसे ही शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् ऐसे ही चोद कर मजा देना।" "हां मेरी रानी।" धक्के लगाने से त्रिभुवन की सांसें अब फूल गईं थी─"मैं तुझे रोज ऐसे ही मजा दूंगा। आज से तू मेरी है....आज से तेरी ये चूत मेरी है...है न मेरी रानी।" "ह...हां जे...जेठ जी।" मंजू ने मजे में फौरन जवाब दिया─"अब से शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् अब से मेरी ये चूत आपकी है। उफ्फ शश्श्श्श् अब से आप ऐसे ही मेरी चूत में अंदर तक अपना लंड घुसेड़ कर मुझे चोदना।" एकाएक ही मंजू बुरी तरह मचलने लगी। त्रिभुवन अब और भी तेज तेज धक्के लगाने लगा था। मंजू मजे के सातवें आसमान में थी। उसने त्रिभुवन की पीठ पर अपने दोनों हाथों से पकड़ बनाई और मजे में उसे अपनी तरफ खींचने लगी। त्रिभुवन को अपनी पीठ पर उसके नाखून गढ़ते महसूस हुए। उसे हल्का दर्द तो हुआ मगर उसने परवाह नहीं की। वो मजे में पागल होने लगा था। उसके बदन का लहू बड़ी तेजी से दौड़ते हुए उसके अंडकोष की तरफ आ रहा था। यही हाल मंजू का भी था। मजे में पता नहीं क्या क्या बोलने लगी थी वो। उसकी आहें और सिसकियां पूरे कमरे में गुंज रहीं थी। शुक्र था कि घर के बाहर का दरवाजा बंद था वरना अगर कोई आ जाता तो जरूर उसके कानों में मंजू की आहें भरने और सिसकियां भरने की आवाजें पड़ जातीं। "अ..और जोर से चोदिए जेठ जी।" मंजू मस्ती में पगलाई बोली─"आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् हां ऐसे ही...हाय मैं हवाओं में उड़ रही हूं। ऐसा लगता है मेरी नसों में दौड़ता खून मेरी चूत की तरफ भागता हुआ आ रहा है।" "मेरा भी यही हाल है रानी।" तेज तेज धक्के मारते हुए त्रिभुवन बोला─"मेरे झड़ने का समय आ गया है। क्या मैं तेरी चूत में झड़ जाऊं।" "न...नहीं नहीं शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह्।" मंजू सिसकते हुए बोली─"बाहर ही झड़िएगा जेठ जी....आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् लगता है मैं भी झड़ने वाली हूं। शश्श्श्श् जोर जोर से चोदो मुझे। हाय फाड़ दो मेरी चूत को। हाय मेरी अम्मा....बहुत मजा आ रहा है.... शश्श्श्श् जेठ जी....मैं झड़ने वाली हूं....संभालिए मुझे।" कहने के साथ ही मंजू एकदम से अकड़ गई। उसने दोनों टांगों की कैंची बना कर त्रिभुवन को इतना जोर से जकड़ लिया कि त्रिभुवन चाह कर भी तेज तेज अपनी कमर न हिला सका। उधर मंजू कस के आँखें बंद किए और त्रिभुवन को जकड़े झटके खाने लगी। जाने कितने ही झटके लगे उसे और फिर वो एकदम से शांत पड़ गई। उसकी पकड़ ढीली पड़ी तो त्रिभुवन ने पूरा जोर लगा कर धक्के मारने शुरू कर दिए। वो खुद भी झड़ने वाला था इस लिए मजे में पागल हो कर बेतहाशा जोर लगा के धक्के मारे जा रहा था। "आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् मंजू....मेरी रानी मैं आ रहा हूं।" मजे की चरम सीमा में पहुंचने से पहले ही त्रिभुवन ने झटके से लंड को मंजू की चूत से बाहर खींचा और फिर जोर जोर से मुट्ठ मारते हुए अपने लंड का पानी मंजू के पेट और नाभी पर गिराता चला गया। पहले की दो तीन पिचकारियां इतनी तेज थीं कि वो उछल कर मंजू के सीने और चेहरे तक पहुंच गईं थी। मंजू को इसका होश ही नहीं था। क्योंकि वो अभी भी आँखें बंद किए चरमसुख के एहसास में डूबी थी। इधर झड़ने के बाद त्रिभुवन असहाय सा हो कर मंजू के बगल में ही खाट पर पसर गया। जारी है............
12-01-2026, 08:58 AM
भाग ~ ०९
मंजू काकी जब ये सब बता कर चुप हो गई तो मैं एक झटके से वर्तमान में आ गया। मैं उनकी मदमस्त चुदाई की कहानी में ऐसे डूब गया था जैसे बापू और काकी को वो सब करते हुए मैं वहीं कमरे में खड़ा अपनी आंखों से देख रहा था। मंजू काकी की इस कहानी से मैं खुद बहुत उत्तेजित हो गया था और जाने कब से मैं अपने खड़े लंड को भींचे जा रहा था। मुझे अपने लंड के अगले भाग में चिपचिपा सा महसूस हो रहा था जिससे मुझे बड़ा अजीब भी लग रहा था। "ये...ये तुम क्या कर रहे हो राजू।" तभी मंजू काकी ने जब ये पूछा तो मैं एकदम से चौंक पड़ा। मुझे ध्यान ही नहीं रह गया था कि काकी बिल्कुल मेरे सामने ही अपनी खाट पर बैठी हैं और मुझे यूं अपना लंड भींचते देख सकती हैं। मैंने हड़बड़ा कर झट से अपना हाथ अपने लंड से हटा लिया। पलक झपकते ही मुझे ये सोच के शर्म आई कि मैं काकी के सामने ये क्या कर रहा था और तो और मुझे ये ध्यान क्यों नहीं रह गया था कि काकी के सामने मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। शायद काकी के मुख से उनकी और बापू की चुदाई का किस्सा सुनने में और उसके मजे में मैं इतना डूब गया था कि अंजाने में ही मुझसे ये सब होता चला गया था। इधर जब मैंने झट से हाथ हटा लिया तो काकी जाने क्या सोच के मुस्कुरा उठीं मगर जल्दी ही उन्होंने अपनी मुस्कान छुपा ली और फिर हैरानी जाहिर करते हुए बोलीं─"तुम तो सच में बड़े हो गए हो राजू। तभी तो मेरे मुख से ऐसी कहानी सुन कर तुम अपनी नुन्नी को इस तरह भींच रहे हो।" मुझसे शर्म के मारे कुछ बोल न गया। यहां तक कि सिर उठा कर उनकी तरफ देखने की भी हिम्मत न पड़ी। मुझे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि इस कहानी में आगे कहीं मुझसे ऐसा हो जाएगा और फिर मुझे काकी के सामने शर्मिंदा होना पड़ जाएगा। "आए हाए देखो तो अब कैसे शर्मा रहे हैं।" उधर काकी ने एकदम से मुझे छेड़ते हुए कहा─"अपनी काकी और बापू की चु...चुदाई वाली कहानी सुन कर लगता है हमारे राजू की नुन्नी खड़ी हो गई है...है न राजू।" काकी की बात सुन कर मैं और भी ज्यादा शर्मा गया। दिलो दिमाग में बड़ी तेज हलचल मच गई थी। समझ न आया कि अब क्या करूं। "अच्छा मुझे भी तो दिखाओ कि मेरी कहानी सुन कर तुम्हारी नुन्नी कैसे खड़ी हुई है।" तभी मंजू काकी अपनी खाट से उठ कर मेरे करीब आ कर बोलीं। मैं तो हड़बड़ा ही गया उन्हें इस तरह अपने करीब आया देख के। शर्म घबराहट और आश्चर्य से मैं उन्हें देखने लगा। मुझे सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि काकी ऐसा भी बोल सकती हैं और ऐसा कर भी सकती हैं। "न..नहीं नहीं।" मैं बुरी तरह हड़बड़ाया और घबराया हुआ बोल पड़ा─"ये...ये क्या कर रही हो तुम...नहीं दूर जाओ मुझसे।" मेरी इस हालत पर काकी खिलखिला कर हंस पड़ीं। हंसते हुए वो मेरी खाट पर बैठ गईं और फिर बोलीं─"अरे दिखाओ न राजू। मैं तुम्हारी नुन्नी को खा थोड़े न जाऊंगी।" "प..पागल हो क्या।" मैं एकदम से उनसे दूर सरकते हुए बोला─"तुमको शर्म नहीं आती ऐसा बोलते हुए।" "आए हाए इतना कुछ देखने और सुनने के बाद तुम शर्माने की बात करते हो।" मंजू काकी ने आँखें फैला कर कहा─"तुम तो सच में बड़े चालू हो गए हो राजू। मतलब जब तक तुम्हें सब कुछ जानना था तब तक तुम्हें शर्म जैसे शब्द से कोई मतलब नहीं था और अब जब मैं तुम्हें सिर्फ अपनी नुन्नी दिखाने को बोल रही हूं तो तुम्हें शर्म का खयाल आ गया। वाह राजू...तुम्हारा तो जवाब ही नहीं कोई।" काकी की बातें सुन कर मैं बेजुबान सा हो गया। सच ही तो कहा था उन्होंने। अगर मुझे सच में शर्म का इतना ही खयाल था तो उनसे मुझे ये सब पूछना और जानना ही नहीं चाहिए था। तभी माना जाता कि मैं पहले की तरह भोला और नादान हूं और मुझे शर्म तथा मर्यादा का भी खयाल है। "वो...वो मैं कैसे....दिखा सकता हूं।" फिर मैं अटकते हुए उनसे बोला─"मुझे शर्म आ रही है।" "मुझे भी तो खुल कर सब कुछ बताने में शर्म ही आ रही थी राजू।" काकी ने कहा─"मगर फिर भी तुमने जिद की थी कि तुम्हें सब कुछ खुल कर ही बताऊं। तो अब तुम्हें भी मेरे कहने पर अपनी नुन्नी दिखानी पड़ेगी।" "प...पर तुम क्यों देखना चाहती हो।" मैं सच में सोच में पड़ गया था इस लिए पूछा। "वैसे तो मैं देखने की बात न कहती।" काकी ने कहा─"मगर अब हमारे बीच बहुत कुछ बदल गया है। कल तक मैं यही समझती थी कि तुम बहुत भोले और नादान हो लेकिन जब तुमने मुझसे उस बारे में सब कुछ जानने की जिद की...इतना ही नहीं सब कुछ खुल कर बताने को मुझे मजबूर किया तो मैं ये सोचने पर मजबूर हो गई कि क्या सच में तुम इतने भोले हो जो ऐसी जिद कर रहे हो। मतलब कि अगर सच में भोले होते तो इस तरह जानने की जिद न करते और न ही मेरे सब कुछ बताने पर बीच बीच में मुझसे सवाल करते। इतने में ही मैं समझ गई कि तुम अब पहले वाले राजू नहीं रहे बल्कि बड़े हो गए हो। इतने बड़े कि तुम औरत और मरद के बीच बनने वाले ऐसे संबंधों पर ध्यान दे रहे हो और तुम्हारा एक एक बात पूछना ये साबित करता है कि तुम्हें चुदाई के बारे में भी सब पता है।" मंजू काकी ने तो ये सब कह कर मानो मुझे बेनकाब ही कर दिया। मुझसे कुछ बोला न गया। ऐसा लगा जैसे मेरी चोरी पकड़ी गई हो और अब मैं उनके सामने गुनाहगार बन के बैठा हूं। "हो सकता है कि तुम्हारे अंदर अब भी थोड़ा बहुत भोलापन बाकी हो लेकिन ये तो पक्की बात है कि तुम पहले जितने भोले नहीं रहे।" काकी ने आगे कहा─"इस लिए अब मैं देखना चाहती हूं कि जो बातें सुन कर तुम अपनी नुन्नी को मसल रहे थे उसमें कितना बदलाव आ गया है...चलो अब दिखाओ मुझे।" मेरी धड़कनें काफी तेज चल रहीं थी। अंदर हलचल मची हुई थी। शर्म ऊपर से आ रही थी....समझ नहीं आ रहा था कि ऐसी स्थिति से खुद को कैसे बचाऊं। उधर काकी मेरी तरफ देखते हुए इस इंतजार में बैठी थीं कि मैं उन्हें अपनी नुन्नी दिखाऊं।" "अब दिखाओ भी...इतना क्या सोच रहे हो राजू।" काकी ने कहा─"मैंने कहा न कि मैं उसे खा नहीं जाऊंगी।" "और....और किसी को बताओगी भी नहीं।" मैंने कुछ सोच कर झट से कहा─"वादा करो कि किसी को नहीं बताओगी कि तुमने मेरी नु...नुन्नी देखी है।" "ठीक है किसी को नहीं बताऊंगी।" काकी ने मुस्कुरा कर कहा─"चलो अब जल्दी से दिखाओ।" मैं मजबूर हो चुका था। मैं ये भी समझ गया था कि अगर मैंने ऐसा नहीं किया तो वो उसी तरह मुझे धमकी दे सकती हैं जैसे मैं उन्हें दे रहा था। खैर अब क्या हो सकता था...गलती तो मुझसे हो ही गई थी जो ये ध्यान नहीं रखा था कि उनके सामने अपने लंड को न मसलूं। मैंने शर्माते हुए अपने छोटे से पैंट के उस हिस्से से अपना हाथ हटा लिया। अब तक मेरा लंड शांत हो गया था इस लिए पहले जैसा उसमें उभार नहीं रह गया था। "ऐसे नहीं राजू।" तभी काकी ने कहा─"पूरा पैंट और कच्छा उतार कर दिखाओ।" "क..क्या????" मैं उछल पड़ा। "हां और क्या।" काकी ने कहा─"ऐसे थोड़े न दिखेगा कुछ। चलो पैंट और कच्छा उतारो अब।" मैं बेबस सा हो कर उठ कर खड़ा हुआ और फिर धीरे धीरे पैंट को खोलने लगा। शर्म और घबराहट से बुरा हाल था मेरा। बड़े अजीब अजीब खयाल आ रहे थे मुझे। पैंट का बटन खोल कर मैंने उसे नीचे सरका दिया। उसके बाद कच्छे का नाड़ा खोलने लगा। थोड़ी ही देर में मैंने कच्छे को भी शर्माते हुए नीचे सरका दिया। जैसे ही कच्छा कमर से सरक कर नीचे जांघों के नीचे घुटनों के पास आया तो मेरा शांत पड़ा लंड उनके सामने उजागर हो गया। काकी की तरफ देखने की मेरी हिम्मत न हुई क्योंकि अब और ज्यादा शर्म महसूस होने लगी थी मुझे। उधर जैसे ही मेरे लंड पर काकी की नजर पड़ी तो उनकी आँखें चौड़ी हो गईं। चेहरे पर आश्चर्य उभर आया और मुंह अविश्वास से खुल गया। "र...राजू ये...ये क्या है।" फिर वो मारे आश्चर्य के बोलीं तो मैं ये सोच कर थोड़ा घबराया कि क्या हो गया अब। झट से उनकी तरफ देखा तो उन्हें हैरत से मेरे लंड को देखते पाया। "हाय दय्या ये...ये तो नुन्नी नहीं है।" उधर काकी ने कहा─"ये...ये तो....ये तो पूरा लं...लंड है राजू। हे भगवान भरोसा नहीं हो रहा मुझे। मैं तो...मैं तो तुम्हें बच्चा समझ रही थी राजू। पर...पर तुम तो सच में बहुत बड़े हो गए हो। हाय दय्या...तुम्हारा तो ये इतना बड़ा है जितना तुम्हारे काका का भी नहीं है।" काकी अविश्वास से जाने क्या क्या बोले जा रहीं थी और मैं अपने कच्छे को पकड़े चुपचाप खड़ा उन्हें देखे जा रहा था। शर्म तो अभी भी आ रही थी मुझे लेकिन काकी का हाल देख और उनकी बातें सुन कर एकाएक मुझे ये एहसास होने लगा कि मेरा लंड देख काकी चकित हैं। अचानक वो सरक कर मेरे बिल्कुल करीब आ गईं तो मैं थोड़ा हड़बड़ाया और अभी कच्छे को ऊपर ही करने वाला था कि तभी काकी ने कहा─"क...क्या म..मैं इसे हाथ लगा कर देखूं राजू।" "क...क्यों???" मैं घबरा कर बोला─"हाथ क्यों लगाओगी तुम।" "बस देखने के लिए राजू।" काकी अभी भी हैरान थी─"इसे हाथ से छू कर यकीन करना चाहती हूं कि ये नुन्नी ही है या सच में लं...लंड बन गया है।" ये सुन कर मुझे अजीब तो लगा मगर मैंने उन्हें ऐसा करने से इंकार नहीं किया। एकदम से मुझे एहसास हुआ था कि अब काकी से डरने या घबराने की जरूरत नहीं है मुझे। क्योंकि अगर ऐसी बात होती तो काकी मेरा लंड देखते ही नाराज होती या फिर गुस्सा करतीं। जबकि यहां तो वो मेरा लंड देख के हैरान हैं और अब उसे छू कर अपनी तसल्ली करना चाहती हैं। जब मैं चुपचाप खड़ा ही रहा तो काकी को लगा शायद मैंने उन्हें अपना लंड छूने की अनुमति दे दी है। अगले ही पल उन्होंने हाथ बढ़ाया। उनकी नजरें अपलक मेरे लंड पर ही टिकी हुईं थी। इधर मेरी धड़कनें बढ़ी हुईं थी। मन में अनेकों प्रकार के खयाल उभर रहे थे। तभी काकी ने अपने कांपते हाथ से मेरे लंड को आहिस्ता से छुआ तो मेरा पूरा बदन कांप गया। मेरा लंड शांत था और नीचे झूल रहा था लेकिन जैसे ही काकी के हाथ का स्पर्श हुआ तो जैसे उसमें जान आने लगी। उधर उसको अपलक देखते हुए काकी ने आहिस्ता से उसे पकड़ लिया। "शश्श्श्श् क...काकी।" मेरे मुंह से सिसकी निकल गई। पूरे बदन में झुरझुरी दौड़ गई। मेरी सिसकी सुन कर काकी ने झट से मेरी तरफ देखा। उन्हें समझने में देर न लगी कि उनके इस तरह पकड़ लेने से मेरे अंदर मजे की लहर दौड़ गई है इसी लिए मैं सिसक उठा हूं। "र...राजू...ये...ये तो सच में लं..लंड बन गया है।" फिर उन्होंने धीरे से काका─"मुझे यकीन नहीं हो रहा कि इस उमर में तुम्हारा ये इतना बड़ा हो सकता है।" मैं कुछ न बोला। वो अब भी मेरे लंड को पकड़े हुए थीं और मेरे पूरे बदन में झुरझुरी हो रही थी। उनके कोमल हाथों का स्पर्श ऐसा था कि उसकी वजह से मेरे बदन में सनसनी सी होने लगी थी। इतना ही नहीं इससे मेरे लंड में भी हरकत होने लगी थी। उसमें जान आने लगी थी। उनकी नसें उभरने लगीं थी। तभी मंजू काकी ने लंड पर जमी अपनी हथेली को धीरे से पीछे...मतलब उसकी जड़ की तरफ खींचा जिससे लंड के आगे वाले हिस्से की चमड़ी पीछे की तरफ खिंचने लगी। अगले कुछ ही पलों में जब चमड़ी और ज्यादा खिंच गई तो लंड का गुलाबी टोपा आधे से ज्यादा दिखने लगा। "शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह्।" न चाहते हुए भी मजे के एहसास से मेरी सिसकी फिर से निकल गई। मेरा पूरा बदन सिहर उठा। पहले हल्की हल्की झुरझुरी हो रही थी मगर अब तेज तेज होने लगी। उधर काकी विस्मय से देखते हुए मेरे लंड की चमड़ी को आहिस्ता आहिस्ता आगे पीछे करने लगीं थी। पहली बार मेरे अलावा किसी ने मेरे लंड को छुआ था और सिर्फ छुआ ही नहीं था बल्कि आहिस्ता आहिस्ता मुट्ठ भी मारे जा रहीं थी। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी वक्त आएगा। ऐसा लग रहा था जैसे मैं कोई सपना देख रहा हूं जिसमें मेरी अपनी सगी काकी मेरे लंड को इस तरह सहलाए जा रही है। एकाएक ही मेरे बदन में होने वाली सनसनी में इजाफा हो गया। मजे से मेरी आँखें बंद होने लगीं और उधर मेरा लंड तेजी से अपना आकार बढ़ाने लगा। देखते ही देखते वो अपने पूरे आकार में आ गया। काकी आश्चर्य से आँखें फाड़े उसके आकार को देख रहीं थी। वो मुट्ठ लगाना भूल गईं थी और मैं मजे की अलग ही दुनिया में उड़ रहा था। मन कर रहा था कि काकी ऐसे ही मेरा मुट्ठ लगाती रहें मगर जब अचानक से उनका मुट्ठ मारना रुक गया तो मैंने आँखें खोल कर उनकी तरफ देखा। वो चकित सी मेरे लंड को देखे जा रहीं थी। "रु...रुक क्यों गई काकी।" मैं मजे के एहसास में जैसे शर्म भूल गया─"वैसे ही करो न। बड़ा मजा आ रहा है मुझे।" मेरी बात सुनते ही काकी होश में आईं और थोड़ा हड़बड़ा सी गईं। चौंक कर मेरी तरफ देखा। मेरी हालत देखते ही समझ गईं कि जो मैंने कहा है वो एकदम सच कहा है। मुझसे नजर हटा कर उन्होंने झट से अपने उस हाथ को देखा जिसमें अभी भी उन्होंने मेरा लंड पकड़ा हुआ था। ये देखते ही उन्होंने हड़बड़ा कर अपना हाथ खींच लिया। एकाएक ही उनके चेहरे पर हैरानी के साथ शर्म के भाव उभर आए। शायद उन्हें एहसास हो गया था कि अंजाने में वो मेरी मुट्ठी करने लगीं थी। "क...क्या हुआ काकी।" मैं भोलेपन में बोल पड़ा─"अपना हाथ क्यों हटा लिया तुमने। फिर से वैसा ही करो न।" "न..नहीं नहीं...राजू...ये अच्छी बात नहीं है।" उन्होंने कहा─"और...और हां तुम अब इसे कच्छे में डाल लो और पैंट पहन लो।" कहने के साथ ही वो पीछे हट गईं। चेहरे पर उभरे ढेर सारे पसीने को उन्होंने अपनी धोती के आंचल से पोंछा और फिर मेरी खाट से उठ कर अपनी खाट पर जा कर बैठ गईं। अचानक ही अजीब सा बर्ताव करने लगीं थी वो। मैं हैरान परेशान हो के उन्हें ही देख रहा था। समझ न आया कि एकदम से उन्हें क्या हो गया है। "काकी क्या हो गया।" मैं पूछा─"फिर से वैसा ही करो न।" "र...राजू चुप हो जाओ।" काकी ने अजीब लहजे में कहा─"वैसा करना गंदी बात होती है। तुम जल्दी से अपना पैंट पहन लो और सो जाओ। रात बहुत हो गई है।" "पर मुझे तो अच्छा लग रहा था काकी।" मैंने भोलापन दिखाते हुए कहा─"फिर से करो न।" "न..नहीं राजू।" काकी ने बेचैन और परेशान हो कर कहा─"मन जाओ बेटा...ये गंदी बात होती है।" "अगर ये गंदी बात होती है तो फिर क्यों मेरे बापू के साथ तुम ये गंदा काम कर रही थी।" मैंने थोड़ा नाराज हो कर कहा─"तब क्या तुम्हें ये अच्छा लग रहा था....हां...बताओ।" काकी से कुछ कहते न बना। उन्हें भी एहसास था कि मैंने जो बोला है वो उनके लिए एक कड़वा सच है। किसी चीज को अपने लिए सही और दूसरे के लिए गलत नहीं कह सकती थीं वो। "देखो राजू।" फिर उन्होंने कहा─"मैं मानती हूं कि मैंने और तुम्हारे बापू ने जो किया वो गलत था और इसी लिए तुमसे भी कह रही हूं कि ये गंदी बात है। समझने की कोशिश करो...तुम अभी छोटे हो।" "बहुत गंदी हो तुम।" मैंने नाराज हो कर अपने कच्छे को पहनते हुए कहा─"मैं कल ही काका को बताऊंगा कि तुम और बापू क्या कर रहे थे। बापू के बारे में भी मां से बताऊंगा। सबको बताऊंगा कि तुम दोनों कितने गंदे हो।" मेरी ये बात सुनते ही काकी बुरी तरह घबरा गईं। डर के मारे चेहरा फक्क पड़ गया उनका। "न..नहीं नहीं राजू....भगवान के लिए किसी को कुछ मत बताना।" फिर वो डर कर बोलीं। "नहीं...अब मैं तुम्हारी कोई बात नहीं मानूंगा।" मैंने पैंट का बटन लगाते हुए कहा─"सबको बताऊंगा कि तुम खेत वाले कमरे में मेरे बापू से चु...चुदवा रही थी।" मंजू काकी का पलक झपकते ही डर के मारे बुरा हाल हो गया। एक ही पल में घर परिवार और गांव समाज में बदनाम हो जाने का डर सताने लगा उन्हें। ये भी कि उनकी काली करतूत का पता चलते ही दशरथ काका उन्हें धक्के मार कर घर से निकाल देंगे। "और हां....ये भी बताऊंगा कि तुम मुझे अपने घर में अकेला पा कर मेरी नुन्नी को हिला रही थी।" मैंने उनके डर में और ज्यादा इजाफा किया। "न...नहीं नहीं राजू...भगवान के लिए दया करो मुझ पर।" काकी झट से उठ कर मेरे पास आ गईं─"तुम तो बहुत अच्छे लड़के हो...ऐसी बातें किसी से नहीं बताओगे...कह दो राजू किसी को नहीं बताओगे।" "तुम मुझे अब बहलाने की कोशिश न करो...सब समझता हूं मैं।" मैंने कहा। मंजू काकी बुरी तरह परेशान और चिंतित हो उठी थीं। उनको अच्छी तरह पता था कि मैं सबको बता भी सकता हूं क्योंकि मैं ऐसा ही हूं। जब काकी समझ गईं कि अब मैं मानने वाला नहीं हूं तो उन्होंने मजबूरी में फैसला ले लिया। "अच्छा सुनो....अगर मैं वैसा ही करूंगी तब नहीं बताओगे न।" फिर उन्होंने मुझसे पूछा। "वै...वैसा...मतलब???" मुझे जैसे समझ न आया तो पूछा। "मतलब अगर मैं वैसे ही तुम्हारी नुन्नी सहलाऊँ तो तुम मेरे और अपने बापू के बारे में वो वाली बात किसी को नहीं बताओगे न।" काकी ने धीमे से कहा। "पर तुमने तो कहा था कि मेरी वो नुन्नी नहीं रही।" मैंने भोलापन दिखाते हुए कहा─"बल्कि लं...लंड बन गई है।" "हां वही....मेरा वही मतलब था राजू।" काकी ने थोड़ा शर्मा कर कहा─"अगर मैं फिर से तुम्हारा लं....लंड सहलाऊं तो किसी को कुछ नहीं बताओगे न।" "हां...फिर नहीं बताऊंगा।" मैंने थोड़ा सोचने का नाटक कर के कहा। "सच कह रहे हो न।" काकी ने बड़े ध्यान से मेरी तरफ देखा। "हां..एकदम सच्ची कह रहा हूं।" मैंने जोर दे कर कहा─"किसी को कुछ नहीं बताऊंगा।" मंजू काकी अपलक मुझे देखते हुए जाने क्या सोचने लगीं। मैं भी धड़कते दिल से उन्हें ही देख रहा था। पूरा भोला बने रहने का नाटक कर रहा था मैं। असल में मुझे भी एहसास हो चुका था कि मेरे भोला बने रहने पर ही मेरे परिवार वाले मेरी हर बात मान लेते हैं। "पर मैं कैसे मान लूं कि तुम सच में किसी को कुछ नहीं बताओगे।" तभी काकी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा। "फिर कैसे मानोगी।" "जीजी की कसम खाओगे तो मान लूंगी कि तुम किसी को नहीं बताओगे।" काकी ने अपनी समझ में ब्रह्मास्त्र चलाया। इधर मैं सोच में पड़ गया कि कसम खाऊं या नहीं। मैं ये भी सोचने लगा कि मेरे कसम खाने के बाद काकी अपनी बात से मुकर भी सकती है। मतलब वो बाद में कह देगी कि अब वो मेरा लंड नहीं सहलाएगी और मैं इस लिए अब उनका काला सच किसी को नहीं बता सकता क्योंकि मैंने अपनी मां की कसम खा ली है। मतलब...मतलब एक तरह से ये उनकी जीत हो जाएगी और मेरी हार। इतना ही नहीं इससे एक तरह से वो मुझे बेवकूफ भी बना देंगी। "फिर तुम भी सुनीता और रानी की कसम खाओ।" मैंने सोचने के बाद कहा। "म...मैं...पर किस लिए।" काकी को समझ न आया। "वो इस लिए कि मेरे कसम खा लेने के बाद तुम मुकर न जाओ।" मैंने कहा─"तुम मुझे मूर्ख नहीं बना सकती काकी। इतना मुझे भी पता है कि बाद में तुम मेरा लंड नहीं सहलाओगी...हां। इस लिए मैं अकेले मां की कसम नहीं खाऊंगा। पहले तुम सुनीता और रानी की कसम खा के कहो कि तुम मेरा लंड वैसे ही सहलाओगी जैसे अभी थोड़े देर पहले सहला रही थी। जब तुम कसम खा के ऐसा बोलोगी तब मैं भी मां की कसम खा लूंगा...हां।" मंजू काकी ये सुन कर आश्चर्य से देखने लगीं मुझे। उन्हें यकीन न हुआ कि मैं इतनी गहरी बात सोच सकता हूं और इसके लिए उन्हें उनकी ही बेटियों की कसम खाने को बोल सकता हूं। "तु...तुम तो सच में बहुत होशियार और चालू हो गए हो राजू।" फिर उन्होंने चकित हो कर कहा─"पर मेरे मन में तो ऐसा कुछ था ही नहीं।" "मैं कैसे मान लूं।" मैंने झट कहा─"तुमने भी ऐसा ही बोला था मुझे। मतलब तुमको मुझ पर भरोसा नहीं था तभी मां की कसम खाने को कहा..तो अब मुझे भी तुम पर भरोसा नहीं है इस लिए सुनीता और रानी की कसम खाओ...तभी मानूंगा...हां।" मंजू काकी समझ गईं कि अब वो मुझे सच में बेवकूफ नहीं बना सकती हैं। अब मैं पहले वाला राजू नहीं रहा जो ऐसी चालाकियां करना नहीं जानता था। काकी को ये भी एहसास हुआ कि वो फंस चुकी हैं। मतलब अगर वो चाहती हैं कि मैं उनकी काली करतूत के बारे में किसी को न बताऊं तो उन्हें इस वक्त मेरा लंड सहलाना ही पड़ेगा। "ठीक है...मैं सुनीता और रानी की कसम खाती हूं कि जब तुम जीजी की कसम खा लोगे तो।" काकी ने कहा─"तो मैं तुम्हारे लं....लंड को वैसे ही सहलाऊंगी।" मैं ये सुन के खुश हो गया। इतना ही नहीं कच्छे के अंदर बंद मेरा लंड भी खुश हो गया। "हम्म्म्म तो अब मैं भी मां की कसम खाता हूं कि तुम्हारे और बापू के बारे में किसी को कुछ नहीं बताऊंगा।" मैंने कहा─"चलो अब आओ और मेरे इसको सहलाओ।" शर्म तो मुझे आई लेकिन जो मजा मैं महसूस कर चुका था उस मजे को फिर से पाने के लिए मैं बेशर्म बन जाने को तैयार था। उधर काकी मेरी बात सुन कर बेबस भाव से उठीं और आहिस्ता से मेरी खाट पर आ कर बैठ गईं। जारी है...............
12-01-2026, 09:02 AM
Kahani pasand aaye to like comment jarur kare...........
12-01-2026, 03:52 PM
beautiful story, plz bhai new update dow ???
12-01-2026, 03:53 PM
whe are waiting for new update
12-01-2026, 04:22 PM
(This post was last modified: 12-01-2026, 04:23 PM by rajeev13. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
It will be really exciting.. Keep going...
Kya is kahani me aage jaakar maa-bete ke beech bhi sambhog hoga ?
13-01-2026, 06:42 AM
13-01-2026, 06:45 AM
13-01-2026, 06:58 AM
(12-01-2026, 04:22 PM)rajeev13 Wrote: It will be really exciting.. Keep going... Thanks bro...... I can't reveal the secrets ? It is good if some things are revealed at the right time. Well I promise that readers won't be disappointed. Stay tuned in and keep encouraging me with your likes and comments Thank you
13-01-2026, 10:52 PM
(13-01-2026, 06:58 AM)Rajan Raghuwanshi Wrote: Thanks bro...... Will wait for next update...
14-01-2026, 08:14 AM
भाग ~ १०
"अच्छा राजू मैं ये कर तो रही हूं लेकिन तुम इसके बारे में भूल कर भी किसी को मत बताना।" खाट पर मेरे पास बैठते ही काकी ने कहा─"इतना तो तुम भी जानते हो कि अगर इस बारे में किसी को पता चला तो कितना बड़ा अनर्थ हो जाएगा। मैं तो बदनाम होऊंगी ही तुम भी हो जाओगे। इतना ही नहीं इसके लिए अगर तुम्हारे काका मुझे मारेंगे या घर से निकाल देंगे तो तुम्हारे साथ भी कम बुरा नहीं होगा...तुम समझ रहे हो न।" "हां काकी...ये मैं समझता हूं।" मैंने सहमति से सिर हिला कर कहा─"तुम चिंता मत करो मैं किसी को नहीं बताऊंगा। अब तुम जल्दी से मेरे इसको सहलाओ न।" "ठीक है...पर अपना पैंट और कच्छा तो नीचे करो।" काकी ने कहा। मैंने झट से अपना पैंट और कच्छा उतारना शुरू कर दिया। थोड़ी ही देर में मैं उनके सामने नीचे से नंगा हो गया। मेरा लंड एक बार फिर से उनकी आंखों के सामने उजागर हो गया। इतनी देर में वो फिर से शांत पड़ गया था। ये सोच कर ही मेरी धड़कनें तेज हो गईं थी कि अब काकी फिर से मेरा लंड मुठियाएंगी। ये सोचते ही मेरे पूरे बदन में रोमांच की लहर दौड़ गई। नंगा होने के बाद मैं थोड़ा शर्माते हुए काकी को देखने लगा। उधर मंजू काकी मेरे शांत पड़े लंड को अजीब भाव से देख रहीं थी। उनके अंदर भी इस वक्त हलचल मच गई रही होगी। सहसा उन्होंने मेरी तरफ देखा। हम दोनों की नजरें मिलीं। फिर वो खिसक कर मेरे बिल्कुल करीब आ गईं। मेरी धड़कनें और ज्यादा तेज हो गईं। "र...राजू इस बारे में किसी को बताना मत।" फिर उन्होंने धीरे से अपना हाथ मेरे लंड की तरफ बढ़ते हुए कहा। "नहीं बताऊंगा काकी।" मैंने झट कहा─"किसी को भी नहीं बताऊंगा।" अगले ही पल काकी ने मेरा लंड पकड़ लिया। उनके हाथ का कोमल स्पर्श होते ही मेरे पूरे बदन में सिहरन दौड़ गई और मेरे लंड के साथ साथ मेरे अंडकोशों में भी सनसनाहट होने लगी। उधर काकी अपलक मेरे लंड को देखते हुए धीरे धीरे उसे सहलाने लगीं। हम दोनों ही गर्मी से नहाए हुए थे मगर पसीना पोछने की सुध किसी को नहीं थी। थोड़ी ही देर में मेरा लंड उनके सहलाने से अपने पूरे आकार में आ गया। उसका आकार ऐसा था कि वो काकी की मुट्ठी में पूरा फिक्स हो गया था। ये देख काकी के चेहरे पर विस्मय के भाव थे। आंखों में हैरानी उभर आई थी। "शश्श्श्श् काकी...कितना अच्छा लग रहा है मुझे।" मैं मजे में बोला─"पहले जैसे इसको आगे पीछे करो न।" ये सुनते ही काकी लंड को मुट्ठी में लिए आगे पीछे करने लगी जिससे मेरा मजा दोगुना हो गया। मजे में मेरी आँखें झपकने लगीं। "शश्श्श्श् आह्ह्ह्ह्ह् हां काकी ऐसे ही।" मैं सिसियाते हुए बोला─"थोड़ा जल्दी जल्दी आगे पीछे करो न।" काकी वैसा ही करने लगीं। मेरा मजा और भी ज्यादा बढ़ गया। मैं मजे की वजह से हवाओं में उड़ने लगा। मेरा पूरा बदन एक अद्भुत एहसास से कांपने लगा। उधर काकी की भी सांसें तेज हो गईं थी। उनके अंदर भी बड़ी तेज हलचल मच गई थी। जल्दी जल्दी मुट्ठ लगाने की वजह से ब्लाउज में कैद उनकी चूचियां हिल रहीं थी। "क...क्या बापू का भी तुमने ऐसे ही हिलाया था काकी शश्श्श्श्।" मेरे मन में अचानक ये खयाल आया तो मैंने मजे में पूछा उनसे। "न...नहीं।" काकी ने साफ झूठ बोला जबकि वो खुद बता चुकी थीं। "पर आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् तुमने तो अपनी कहानी में मुझे बताया था।" मैंने आँखें खोल कर उनकी तरफ देखा─"तुमने बताया था कि बापू ने खुद तुम्हारा हाथ अपने लं..लंड पर रखा था और फिर तुमसे कहा था कि इसे प्यार करो...सहलाओ।" "ह..हां वो...मैंने बस उनका उसे पकड़ा ही था और थोड़ा सा सहलाया था।" काकी ने झिझकते हुए कहा─"पर इस तरह नहीं हिलाया था जैसे तुम्हारा हिला रही हूं।" "अच्छा काकी एक बात बताओ।" मैंने पूछा─"क्या मेरा ये लं..लंड बापू के लंड जैसा है।" "चुप करो राजू।" काकी ने शर्मा कर कहा─"ऐसी बातें न करो न।" "क...क्यों काकी।" "बस न करो।" काकी ने कहा─"अच्छा नहीं लग रहा।" "पर बापू के साथ तो तुम्हें सब अच्छा लग रहा था न।" मैंने भोलापन दिखाते हुए कहा─"तो अभी अच्छा क्यों नहीं लग रहा।" "क्योंकि...क्योंकि तुम बच्चे हो राजू।" काकी को जैसे जवाब न सूझा था मगर अब बहाना बनाते हुए बोलीं─"तुम अभी इस सबके लिए छोटे हो जबकि तुम्हारे बापू बड़े हैं।" "अच्छा...पर तुमने तो कुछ देर पहले ये कहा था कि मेरा लंड दशरथ काका से बड़ा है।" मैंने कहा─"मतलब...मैं उमर में भले ही काका से छोटा हूं लेकिन मेरा लंड तो उनसे बड़ा ही हुआ न। इसका मतलब....इसका मतलब जो काम काका और बापू कर सकते हैं वो मैं भी कर सकता हूं....क्योंकि..क्योंकि मेरा लंड बड़ा है...है न।" मेरी ये बात सुन कर काकी हैरानी से मेरी तरफ देखने लगीं। शायद उन्हें भरोसा नहीं हुआ था कि मैं इतना कुछ सोच सकता हूं। "बताओ न काकी।" तभी मैंने फिर पूछा─"मैं वो काम कर सकता हूं न।" काकी को समझ न आया कि अब क्या बोलें। मेरी बातों ने उन्हें इतना हैरान और सोचने पर मजबूर कर दिया कि इस चक्कर में वो मेरे लंड को मुट्ठ लगाना ही भूल गईं। "रुको मत काकी।" तभी मैंने उन्हें याद दिलाया─"इसे हिलाती रहो न। मुझे बहुत मजा आ रहा है।" ये सुनते ही काकी थोड़ हड़बड़ाईं और झट से मुट्ठ लगाने लगीं। उनके चेहरे पर बड़े अजीब से भाव थे। जैसे कुछ सोच रही हों। "क्या सोचने लगी काकी।" मैंने कहा─"बताओ न...मैं वो काम...मतलब मैं चु..चुदाई कर सकता हूं न।" "उफ्फ राजू...मत करो न ऐसी गंदी बातें।" काकी बुरी तरह हैरान परेशान हो कर बोल पड़ीं। "क्यों काकी...जब इस वक्त तुम और मैं ये गंदा काम कर सकते हैं।" मैंने कहा─"तो गंदी बातें क्यों नहीं कर सकते।" काकी एक बार फिर लाजवाब हो गईं। उनके चेहरे की परेशानी और ज्यादा बढ़ गई। मुझे उनको इस तरह परेशान देख मजा आने लगा था। मैं ये सोच के भी खुश हो रहा था कि इस वक्त काकी को मैं अपनी बातों से लाजवाब कर दे रहा था। उधर काकी धीरे धीरे मुट्ठ लगा रहीं थी और मेरे पूरे बदन में सनसनी दौड़ रही थी। मेरा लन्ड एकदम सख्त हो चुका था और अब उसमें ऐसी अदभुत सनसनी होने लगी थी जिसकी वजह से मैं हवा में उड़ता हुआ महसूस कर रहा था। "आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् कितना मजा आ रहा है काकी।" मैं मजे के तरंग में बोला─"थोड़ा और जोर से हिलाओ न।" काकी ने मुट्ठ लगाने की रफ्तार थोड़ा सा तेज कर दी। उनकी चूचियां फिर से हिलने लगीं। मेरी नजरें उन्हीं पर जमी थीं। एकाएक मेरे मन में खयाल आया कि मेरे बापू इन्हीं छातियों को जोर जोर से दबा चुके हैं...इन्हें मसल चुके हैं...इन्हें मुंह में भर के चूस चुके हैं। ये सब खयाल आते ही मैं सोचने लगा क्या मैं भी ऐसा कर सकता हूं। क्या काकी मुझे भी ऐसा करने देंगी। "शश्श्श्श् काकी...वो...वो तुम्हारे दूध कितना हिल रहे हैं देखो।" ये सुनते ही काकी ने चौंक कर पहले मुझे देखा और फिर झट से अपनी छातियों को। छातियों पर से धोती का पल्लू पहले ही गिरा हुआ था इस लिए उन्हें अपनी छातियां साफ हिलती हुई दिखीं। अगले ही पल शर्म से लाल हो गईं वो। "कितने गंदे हो तुम राजू।" फिर वो शर्म और झिझक से जबरन मुस्कुरा कर बोलीं─"और कितने चालू भी हो। अपनी काकी से ऐसी बातें करने में तुम्हें बिल्कुल भी शर्म नहीं आ रही।" "अच्छा मुझे शर्म नहीं आ रही तो मैं गंदा हो गया।" मैंने कहा─"और तुम जो मेरे बापू के साथ की हो वो गंदा नहीं है।" काकी सकपका गईं। कुछ बोलते न बना उनसे। सच ही कहा है किसी ने कि दूसरों को बोलना बड़ा आसान होता है लेकिन जब खुद पर बात आती है तो इंसान ऐसे ही निरुत्तर हो जाता है और शर्मसार भी हो जाता है। "अब क्यों चुप हो गई काकी।" मैंने कहा─"अगर ऐसी बात करने से मैं गंदा हूं तो तुम और बापू भी तो गंदे ही हो।" "अच्छा छोड़ो इस बात को।" मजबूरन काकी ने बात बदली─"मैं अब कुछ नहीं बोलूंगी तुम्हें...पर..पर तुम भी ऐसी बातें अब मत करो मुझसे।" "क्यों...मैं तो करूंगा।" मैंने स्पष्ट कहा─"जब तुम और बापू एक दूसरे से ऐसी बातें कर सकते हो तो मैं क्यों नहीं। और...और मैंने तो तुम्हें नहीं रोका कि तुम मुझसे ऐसी बातें न करो। तुम भी करो मुझसे गंदी बात...हां।" मंजू काकी समझ चुकीं थी कि इस बारे में मुझे कुछ समझाना बेकार है। एक तो उनकी नजर में और उनकी समझ में मैं भोला और नादान हूं दूसरे सबका लाडला होने के कारण थोड़ा जिद्दी भी हूं इस लिए वही करूंगा जो मेरा मन करेगा। "आह्ह्ह्ह्ह् शश्श्श्श् काकी कुछ हो रहा है मुझे।" एकाएक मुझे ऐसा लगने लगा जैसे मेरा मूत निकलने वाला है। पूरे बदन में बड़ी तेज झुनझुनी होने लगी थी। ऐस लग रहा था जैसे मेरे अंदर समाई कोई चीज बदन के हर हिस्से से खिंचते हुए मेरे अंडकोशों की तरफ बढ़ी तेजी से भागती हुई आ रही है। काकी ने जब ये सुना तो वो समझ गईं कि मैं झड़ने वाला हूं इस लिए उन्होंने मुट्ठ लगाने की रफ्तार और तेज कर दी। मैं खड़े खड़े मजे में बुरी तरह सिसकने लगा। मजे की इंतिहां में मेरी आँखें बंद हो गईं। मेरे पांव कांपने लगे और फिर अचानक मुझे ऐसा लगा जैसे मैं मजे की अनंत ऊंचाइयों में पहुंच गया हूं। हर चीज मेरे काबू से बाहर हो गई और मैं झटके खाते हुए झड़ने लगा। मेरे लंड से निकलती पिचकारियां मंजू काकी के सिर...चेहरे और सीने को भिगोती जा रहीं थी। सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि काकी को सम्हलने तक का मौका न मिला। आखिर में वीर्य का कुछ हिस्सा उनकी हथेली में भी लग गया। "छी छी राजू...ये क्या कर दिया तुमने।" काकी ने हड़बड़ा कर मेरा लंड छोड़ा और एक झटके में मुझसे दूर होते हुए खाट से नीचे ही उतर गईं। इधर उनकी बात सुन कर भी मैं कुछ न बोला। मैं कुछ बोलने की हालत में ही नहीं था। आखिरी पलों में मैंने ऐसा महसूस किया था जैसे मेरे अंदर से मेरी जान ही निकल गई हो। मैं ज्यादा देर तक खड़े न रह सका...और घुटनों के बल गिर कर दोनों हाथों से खाट को थाम लिया। मेरी आँखें बंद थीं....सांसें उखड़ी हुईं थी। अंदर अभी भी वही मजे का एहसास था जिसमें मैं डूबा हुआ था। उधर काकी बुरा सा मुंह बनाए अपनी धोती से मेरे वीर्य को अपने बदन के हर उस हिस्से से पोंछती जा रहीं थी जहां जहां वो जा के गिरा था। थोड़ी देर बाद जब मुझमें एक नई जान आई तो मैं सबसे पहले खाट पर अच्छे से बैठा और फिर आँखें खोल कर काकी की तरफ देखा। वो अभी भी अपनी धोती के पल्लू से मेरा वीर्य पोछे जा रहीं थी। इस वक्त वो अपने सीने पर गिरे मेरे वीर्य को पोंछ रहीं थी। ये देख मैं हैरान हो गया। मुझे समझ न आया कि ये सब क्या है। तभी सहसा उनकी नजर मुझ पर पड़ी। मुझे अपनी तरफ देखता देख वो दो कदम मेरी तरफ बढ़ीं। "देखो...क्या किया है तुमने।" फिर वो अपने सीने पर गिरे मेरे वीर्य को दिखाते हुए बोलीं─"पूरा गंदा कर दिया है मुझे। छी...उल्टी सी आने लगी है मुझे। अब रात में मुझे नहाने जाना पड़ेगा...वरना सो नहीं पाऊंगी।" "माफ कर दो काकी।" मैं एकदम अपराध भावना से बोल पड़ा─"मुझे नहीं पता ये कैसे हो गया...मगर..मगर ये है क्या काकी।" मेरी ये बात सुन कर काकी ने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा। "हाय दय्या...कितने भोले बन रहे हैं।" काकी ने कहा─"इन्हें पता ही नहीं है कि जो उन्होंने मेरे बदन में गिराया है वो है क्या...क्या कहने।" "म...मैं सच में नहीं जानता काकी कि ये क्या है।" मैं वाकई अंजान था और अब जानने को उत्सुक था─"बताओ न क्या है ये।" काकी मुझे ऐसे देखने लगीं जैसे मैं कोई अजूबा हूं। कुछ देर तक वो बड़े ध्यान से मुझे देखती रहीं। शायद समझने की कोशिश कर रहीं थी कि मैं सच बोल रहा हूं या झूठ। "कुछ नहीं है...सो जाओ चुपचाप।" फिर उन्होंने थोड़ा नाराज लहजे में कहा─"और हां मैं नहाने जा रही हूं। जब मैं लौट कर आऊं तो मुझे तुम गहरी नींद में सोते हुए दिखना....अगर नहीं दिखे तो खैर नहीं तुम्हारी..बताए देती हूं।" इतना कह कर काकी झट वहां से चल दीं। मैं हक्का बक्का सा खाट पर बैठा रह गया। समझ में नहीं आया कि अचानक से ये क्या हो गया है। एकाएक मुझे अपने नंगेपन का एहसास हुआ तो मैं झट उठ कर अपना कच्छा और पैंट पहनने लगा। उधर काकी घर के पिछले हिस्से में मौजूद कुएं की तरफ चली जा रहीं थी। ######## मैं मंजू काकी की नाराजगी और गुस्सा देख के थोड़ा डर गया था इस लिए जब वो नहाने के लिए कुएं पर चली गईं थी तो मैं चुपचाप खाट पर लेट गया था। कुछ देर तक तो मैं उस सब के बारे में ही सोचता रहा था मगर फिर जाने कब मेरी आंख लग गई थी। मुझे नहीं पता कब काकी नहा के वापस आईं और कब वो भी सो गईं। खैर सुबह हुई तो मैंने देखा काकी की खाट मेरे बगल से गायब थी। मैं समझ गया कि वो पहले ही जाग चुकीं होंगी और खाट को वापस दूसरी जगह रख दिया है। मैंने काकी की खोज में इधर उधर देखा तो वो मुझे आंगन में झाड़ू लगाती हुई नजर आईं। उन्हें देखते ही मेरे मन में रात का सारा किस्सा उभर आया। मेरे पूरे बदन में झुरझुरी दौड़ गई। मुझे याद आया कि कैसे रात काकी ने मेरे लंड की मुट्ठ लगाई थी और फिर कैसे उनका सीना गंदा हो गया था। हालांकि मैं अब भी ये नहीं जान सका था कि उनका सीना गंदा कैसे हुआ था जिसे वो अपने धोती के पल्लू से साफ कर रहीं थी। खैर मन में ये जानने की जिज्ञासा तो हुई लेकिन काकी से पूछने की हिम्मत न हुई। मैं झट खाट से उठा। मुझे बहुत जोर का पेशाब लगा हुआ था जिसके कारण कच्छे के अंदर मेरा लंड पूरा खड़ा हुआ था। पैंट के ऊपर से उसका उभार साफ दिख रहा था। मैं जैसे ही खाट से उठा तो खाट ने आवाज पैदा की जो काकी के कानों तक पहुंच गई। काकी ने पलट कर मेरी तरफ देखा। मैंने भी उन्हें देखा। नजरें मिलीं तो मैंने झट से उनसे नजरें हटा ली और घर के पीछे तरफ मूतने के लिए चल पड़ा। मैंने कनखियों से उनकी तरफ देखा...वो मेरे पैंट में बने उभार को देखे जा रहीं थी। इससे मुझे शर्म आई इस लिए मैं दौड़ते हुए सीधा कुएं की तरफ भाग चला। कुछ देर में हाथ मुंह धो कर मैं वापस आया और खाट के सिरहाने रखी अपनी कमीज को पहनने लगा। उधर काकी झाड़ू लगा चुकीं थी और अब गोबर से चौके की लिपाई कर रहीं थी। मुझे कमीज पहनता देख वो समझ गईं कि अब मैं अपने घर जाने वाला हूं। "राजू...इधर आओ जरा।" उन्होंने चौका लीपते हुए ही मुझे बुलाया तो एकदम से मेरी धड़कनें बढ़ चलीं। मैं सोचने लगा क्या अब भी वो नाराज हैं। मैं धीरे धीरे चल कर उनके पास पहुंचा। मुझे अपने पास आया देख उन्होंने लीपना बंद किया और फिर मेरी तरफ देखते हुए पूछा─"घर जा रहे हो क्या।" "ह..हां।" "अच्छा सुनो।" फिर उन्होंने थोड़ा धीमे स्वर में कहा─"कल रात वाली बात किसी को मत बताना..ठीक है न।" "ठीक है...मैं किसी को नहीं बताऊंगा।" "इस बात को याद रखना कि तुमने जीजी की कसम खाई है।" काकी ने जैसे चेतावनी देते हुए कहा─"इस लिए अगर तुमने किसी को उस बारे में कुछ भी बताया तो जीजी मर जाएंगी। क्या तुम चाहते हो कि ऐसा हो।" "न..नहीं नहीं।" मैं झट बोल पड़ा─"मैं किसी को कुछ नहीं बताऊंगा। मेरी मां को कभी कुछ नहीं होगा...हां।" "बहुत बढ़िया।" काकी के चेहरे पर राहत के भाव उभरे─"मुझे पता है कि तुम बहुत होशियार हो और जीजी को बहुत चाहते हो।" "काकी...क्या तुम नाराज हो मुझसे।" मैंने कुछ सोच कर पूछा। "नहीं तो...मैं भला तुमसे क्यों नाराज होऊंगी।" काकी ने बड़े स्नेह से कहा। "अच्छा तो फिर रात में क्यों नाराज हो गई थी मुझसे।" मैंने अपनी जिज्ञासा के कारण पूछा─"और...और ऐसा मैंने क्या कर दिया था जिससे तुम नाराज तो हुई ही बाद में नहाने भी चली गई थी।" मेरी बात सुन कर काकी जाने क्यों थोड़ा मुस्कुराई फिर बोलीं─"हां रात में मैं तुमसे नाराज हो गई थी।" "क्यों।" "तुमने काम ही ऐसा कर दिया था।" "क्या कर दिया था मैंने।" "क्या तुम्हें नहीं पता।" "मुझे पता होता तो तुमसे क्यों पूछता।" काकी फिर थोड़ा मुस्कुराई और कुछ सोचने लगीं। इधर मेरी जिज्ञासा चरम पर पहुंच गई। "बताओ न काकी...क्या कर दिया था मैंने जो तुम मुझसे नाराज हो गई थी।" "तुमने मेरे ऊपर अपना वी...वीर्य गिरा दिया था राजू।" काकी ने थोड़ा झिझकते हुए बताया─"और वो भी बहुत सारा...इसी लिए तुमसे नाराज हुई थी मैं।" "वीर्य????" मैंने आँखें सिकोड़ कर पूछा─"ये वीर्य क्या होता है काकी।" मेरे इस सवाल पर काकी इस बार हंस ही पड़ीं। शायद उन्हें मेरे भोलेपन पर हंसी आ गई थी। उनके इस तरह हंसने पर मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे एक बार फिर से मैं मूर्ख बन गया हूं। "तुम ऐसे क्यों हंस रही हो।" मैंने बुरा सा मुंह बना कर कहा। "क्या तुम सच में नहीं जानते कि वी...वीर्य क्या होता है।" काकी ने अपनी हंसी रोक कर मुझसे पूछा। "अगर जानता क्यों पूछता तुमसे।" मैंने पहले जैसे ही बुरा सा मुंह बना के कहा─"मैंने तो ये नाम आज पहली बार सुना है तुमसे।" मंजू काकी को ये सुन कर हैरानी हुई। शायद ये सोच कर उन्हें हैरानी हुई थी कि इस उमर में ज्यादातर लड़कों को इस बात का पता हो जाता है फिर मुझे कैसे पता नहीं है। दूसरी बात...जब मुझे चुदाई के बारे में पता है तो फिर वीर्य के बारे में पता क्यों नहीं है। "बड़ी हैरानी की बात है राजू कि तुम्हें चु..चुदाई के बारे में तो पता है।" फिर उन्होंने कहा─"लेकिन वीर्य के बारे में तुम्हें कोई जानकारी नहीं है। ऐसा कैसे हो सकता है।" "अब नहीं पता तो नहीं पता।" मैंने सिर झुका कर कहा─"इसमें मेरी क्या गलती है। तुम्हें पता है तो बताती क्यों नहीं मुझे।" "अच्छा ठीक है बताती हूं।" काकी ने मुस्कुराते हुए कहा─"वीर्य एक ऐसी चीज होती है जिससे औरत को बच्चे पैदा होते हैं।" "क..क्या???? ये क्या कह रही हो तुम।" मैं बुरी तरह चौंक पड़ा। मुझे सच में ये नहीं पता था। "हां राजू।" काकी ने कहा─"औरत और मरद दोनों के अंदर वीर्य बनता है। फिर जब औरत मरद आपस में चु..चुदाई करते हैं और मरद का वीर्य औरत की चूत के अंदर चला जाता है तो उससे औरत पेट से हो जाती है।" "क्या सच में ऐसा होता है काकी।" मैं अभी भी चकित था। "हां राजू।" काकी ने बताया─"जब औरत और मरद का वीर्य उचित समय पर आपस में मिल जाता है तो औरत पेट से हो जाती है। मर्द के वीर्य को बीज भी कहते हैं। एक तरह से मर्द अपना ये बीज औरत के अंदर डाल देता है...मतलब बो देता है जिससे उस बीज में से ठीक वैसे ही बच्चे की उत्पत्ति होती है जैसे खेतों में गेहूं का बीज बोने से गेहूं के पौधे की उत्पत्ति होती है और फिर गेहूं पैदा होता है।" "ये...ये तो...ये तो सच में बड़ी हैरानी की बात है काकी।" मैंने चकित हो कर कहा─"मुझे तो इस बारे में कुछ पता ही नहीं था। मुझे तो एक बार मां ने बस यही बताया था कि ऊपर से भगवान जी अपना एक दूत भेजते हैं जो चुपके से औरत के पेट में छोटा सा बच्चा डाल के चला जाता है। फिर नौ महीने बाद वो बच्चा पेट से निकल आता है।" काकी मेरी ये बात सुन कर मुस्कुरा उठीं। "तो क्या मां ने मुझे गलत बताया था काकी।" मैंने पूछा─"मैं अभी जा के मां से पूछूंगा कि मुझे इस बारे में झूठ क्यों बताया था उसने।" "अरे अरे...राजू ऐसा मत करना।" काकी मेरी बात सुन कर बुरी तरह हड़बड़ा गईं─"इस बारे में जीजी से कोई बात मत पूछना।" "क्यों।" "देखो बात ये है कि जब हमारे बच्चे उम्र में बहुत छोटे होते हैं तब हम माएं अपने बच्चों का मन बहलाने के लिए ऐसे ही झूठ बता दिया करती हैं।" काकी ने कहा─"कोई भी मां इस बारे में सच नहीं बताती क्योंकि कम उम्र में बच्चों के मन में ऐसी बातें नहीं डाली जाती। दूसरी बात ये ऐसा विषय होता है जिसके बारे में एक मां अपने बेटे को नहीं बता सकती....क्योंकि ये मर्यादा के विरुद्ध होता है और साथ ही इसे अच्छा भी नहीं माना जाता। इस लिए तुम भूल कर भी जीजी से इस बारे में कुछ मत कहना और न ही कुछ पूछना।" "ठीक है नहीं पूछूंगा।" मैंने कहा─"अच्छा काकी ये बताओ जब शुरू में बच्चे को इस बारे में कुछ नहीं पता होता तो फिर कैसे वो बड़ा हो के बच्चा पैदा कर लेता है। उसे कैसे पता होता है कि बच्चे कैसे पैदा करते हैं।" "बच्चा जब बड़ा हो जाता है तो इस बात का ज्ञान उसे खुद ही हो जाता है।" काकी ने बताया─"या फिर गांव समाज के लोगों द्वारा उसे पता चल जाता है...या फिर उसे अपने यार दोस्तों से पता चल जाता है। ऐसा कभी नहीं होता कि बच्चा बड़ा हो जाए और वो ऐसी बातों से अंजान रहे। तुम्हें भले ही अभी तक वीर्य के बारे में और बच्चा पैदा करने के बारे में नहीं पता था लेकिन ये तो तुम्हें पता चल ही चुका है कि चुदाई क्या होती है...है न।" "ह...हां।" मैंने धीमे से कहा। "क्या मैं जान सकती हूं कि तुम्हें ये कैसे पता चला।" काकी के ऐसा पूछते ही मैं हड़बड़ा गया। धड़कनें तेज हो गईं और मैं थोड़ा घबरा भी गया। "अरे घबराओ मत राजू। मैं किसी से कुछ नहीं बताऊंगी।" काकी मेरे अंदर की हालत को समझ कर बोलीं─"मुझे पता है कि हर लड़का या लड़की को कभी न कभी कहीं न कहीं से ये बातें पता चल ही जाती हैं। अभी मैंने तुमसे यही तो कहा था कि गांव समाज के लोगों द्वारा या अपने दोस्त यारों से पता चल जाता है। मतलब तुम्हें भी ये बात अपने किसी दोस्त से ही पता चली होगी...है न।" मैंने हां में धीरे से फिर हिला दिया। "किस दोस्त ने ये सब बताया है तुम्हें।" काकी ने पूछा। "वो...वो ब..बबलू ने।" "हम्म्म्म मुझे लग ही रहा था कि उसी ने तुम्हें ये सब बताया होगा।" काकी ने कहा─"तो क्या उसने तुम्हें ये नहीं बताया था कि वीर्य क्या होता है और बच्चे कैसे पैदा होते हैं।" "नहीं...और मैंने ज्यादा उससे कुछ पूछा भी नहीं।" मैंने भोलापन दिखा कर कहा─"वो खुद ही कभी कभी ये बताया करता है।" "अच्छा।" काकी के चेहरे पर हैरानी के भाव उभर आए─"किस तरह....मतलब किसके बारे में ये सब बताया करता है वो।" "वो...वो उसका एक दोस्त है।" मैंने झिझकते हुए कहा─"वही उसको ऐसी बातें बताया करता है। फिर बबलू मुझे बताता है।" "तो क्या तुम्हें ऐसी बातें सुन कर अच्छा लगा करता है।" "प..पहले नहीं अच्छा लगता था।" मैंने भोलापन दिखाना जारी रखा─"मतलब अजीब लगता था मुझे। फिर धीरे धीरे मुझे भी अच्छा लगने लगा।" "फिर??" "फिर कुछ नहीं।" मैंने काकी की तरफ देखा। "कुछ नहीं???? ये क्या बात हुई।" काकी को हैरानी हुई─"उसकी ये बातें सुन कर क्या तुम्हारे मन में कभी ये खयाल नहीं आया कि अगर सुनने में तुम्हें अच्छा लगता है तो ऐसा करने में और भी तो अच्छा लगेगा।" "ऐसा कुछ नहीं है।" मैंने कहा─"मैं ज्यादा नहीं सोचता था इसके बारे में। मुझे तो सबसे ज्यादा खेलना ही अच्छा लगता है तो इस लिए थोड़ी देर में उसकी बातें भूल जाता था।" काकी को मेरी ये बात सच लगी क्योंकि मेरे घर परिवार के सभी लोग मेरे भोलेपन और मेरी नादानियों से परिचित हैं। "अच्छा ठीक है...छोड़ो इस बात को।" काकी ने कहा─"और हां ये बहुत अच्छी बात है कि तुमने अब से पहले कभी ऐसी चीजों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन अब भी ध्यान मत दो। अभी तुम छोटे हो...समझ रहे हो न।" "हम्म्म्म अब मैं जाऊं।" मैंने काकी से कहा─"मुझे संडास लगी है।" "हां ठीक है जाओ तुम।" काकी ने कहा─"और हां उस सबके बारे में किसी को बताना मत।" "हां नहीं बताऊंगा काकी।" मैं बाहर की तरफ जाते हुए बोला और निकल गया उनके घर से। मन में काकी की बताई हुई बातें ही चल रहीं थी। जारी है............
14-01-2026, 08:16 AM
भाग ~ ११
जैसे ही घर पहुंचा तो देखा बापू बाहर मवेशियों को चारा भूसा डाल रहे थे। उन्हें देखते ही मुझे खेत के कमरे वाली उनकी करतूत याद आ गई और मेरी धड़कनें थोड़ा तेज हो गईं। मैं उनका सामना नहीं करना चाहता था इस लिए तेजी से घर के अंदर की तरफ बढ़ा मगर उन्होंने मुझे देख लिया। "अरे राजू कहां था रात को।" उन्होंने मुझे आवाज दे कर पूछा। "वो...वो मझले काका के घर में था।" मैंने थोड़ा झिझक के साथ बताया─"काका सुनीता और रानी के लेने नाहरपुर जा रहे थे तो बोले रात काकी के पास ही रुकूं।" "अच्छा ठीक है।" बापू ने कहा─"एक काम कर तू नाश्ता कर ले और अनीता के साथ खेतों पर चला जा। आज गेहूं की गहाई करनी है।" "ठीक है।" मैंने कहा और अंदर चला गया। अंदर मां रसोई में नाश्ता बना रही थी। मुझे देखते ही बोली दांत साफ कर के नाश्ता कर ले तो मैंने उन्हें बताया कि अभी संडास जा रहा हूं मैं। करीब आधा घंटे में मैं सुबह वाले सारे काम से फुर्सत हुआ और नाश्ता करने के लिए चौके में आ के बैठ गया। अनीता रसोई में थाली रखे नाश्ता लगा रही थी। थोड़ी ही देर में वो थाली ले के आई और मेरे बगल से बैठ गई। "दूर बैठ मुझसे।" मैंने उसको घूरा─"और ये क्या मेरी थाली कहां है।" "अरे उसके साथ ही खा ले बेटा।" मां ने कहा─"बहन ही तो है तेरी।" "बहन नहीं छिपकली है ये।" मैंने झट कहा─"कल बोल रही थी मुझसे कि बात मत करना। इस लिए मुझे नहीं खाना इसके साथ।" "क्यों रे...तू ऐसा बोल रही थी मेरे राजा बेटा को।" मां ने अनीता को घूरा। अनीता ये सोच कर हड़बड़ा गई कि कहीं मैं मां को ये न बता दूं कि अंदर कमरे में हमारे बीच क्या हुआ था और कैसी बातें हुईं थी। "अरे वो तो मैं ऐसे ही बोल रही थी मां।" फिर उसने जल्दी से कहा─"तू तो जानती है कि हम दोनों का ये रोज का है।" "हां ठीक है अब ज्यादा बातें न कर।" मां ने उसे घूरते हुए ही कहा─"और जल्दी से खा के राजू के साथ खेतों पर जा।" इधर मेरा मूड बिगड़ा हुआ था। अनीता के साथ नाश्ता करने की इच्छा नहीं थी मेरी मगर मां के कहने पर मैं मन मार कर उसके साथ ही नाश्ता करने लगा। "मुंह क्यों बना रहा है।" अनीता ने धीमे से कहा─"मेरा भी तेरे साथ खाने का मन नहीं है....गंदा कहीं का।" "देख ले मां ये गंदा बोल रही है मुझे।" मैंने झट उसकी शिकायत मां से कर दी। "नहीं मां झूठ बोल रहा है ये।" अनीता हड़बड़ा कर बोली─"मैं तो चुपचाप नाश्ता कर रही हूं।" "मुझे बहरी न समझ।" मां ने गुस्से से देखा अनीता को─"मुझे भी सुनाई दिया कि तूने क्या बोला है उसे।" अनीता कुछ बोल न सकी। सिर झुकाए चुपचाप नाश्ता करने लगी। इधर मां से उसको डांट पड़वा कर मैं खुश हो गया। तभी बापू आ गए। उन्हें देख मेरी धड़कनें अनायास ही बढ़ गईं। कल से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि घर के अंदर मैं किसी से डरा होऊं और चुप रहा होऊं। मगर कल जो कुछ देखा था और जो कुछ बापू ने बोला था उसके बाद से मुझमें ये बदलाव आ गया था। जाने क्यों बापू को देखते ही मेरी धड़कनें बढ़ जाती थीं और मैं कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाता था। "दशरथ तो देर से ही आएगा।" उधर बापू मां से बोले─"उसकी वजह से मझली(मंजू काकी) भी देर से ही आएगी। तो तू ऐसा करना छोटी(संगीता काकी) और तू कटाई करना...मैं पुल्लियां बांधूंगा और श्यामू इन दोनों के साथ रह कर गेहूं की गहाई करवा लेगा।" "हां यही ठीक रहेगा।" मां ने कहा─"और हां आमों की भी तकाई करनी होगी। वो बगल वाली शकुंतला बता रही थी कि दोपहर में जब वहां कोई नहीं होता तो गांव के कुछ लड़के अमिया पीटने जाते हैं।" "हां मुझे भी कई लोगों ने ये बताया है।" बापू ने हमारे बगल से ही एक बोरी बिछा कर बैठते हुए कहा─"मैं सोच रहा हूं कि जब तक कटाई और गहाई नहीं हो जाती तब तक आमों को बच्चे लोग ताक लेंगे।" "ताक तो लेंगे।" मां ने थाली में बापू के लिए नाश्ता सजाते हुए कहा─"मगर लूक लगने से अगर ये बीमार पड़ गए तो मुसीबत हो जाएगी।" "हां जानता हूं।" बापू ने कहा─"मगर मजबूरी है क्या करें...कटाई गहाई छोड़ कर हम आम तो नहीं ताक सकते न। कुछ दिनों तक तो इन्हें ही आमों की तकाई करनी होगी। दशरथ की बेटियां भी इन दोनों के साथ में रहेंगी तो बारी बारी से ताक लिया करेंगे ये लोग।" "ठीक है...जैसा तुम्हें ठीक लगे।" मां ने कहा और आ कर बापू के सामने थाली रख दी। थोड़ी देर में मेरा और अनीता का नाश्ता हो गया तो अनीता जूठी थाली ले कर आंगन में नर्दे के पास रखने चली गई और मैं उठ कर आंगन में रखी एक खाट पर बैठ गया। असल में मैं बापू के पास नहीं बैठे रहना चाहता था। "अरे राजू...जा के देख श्यामू बैलों को ले कर गया कि नहीं।" बापू ने ऊंचे स्वर में मुझसे कहा। मैं खाट से उठ कर श्यामू काका के घर की तरफ दौड़ पड़ा। कुछ ही देर में मैं श्यामू काका के घर पहुंच गया। "अरे करेजा...सही वक्त पर आया है तू।" श्यामू काका चौके के पास बैठे बोले─"आ बैठ मेरे पास...तू भी नाश्ता कर ले।" "नहीं काका...मैंने अभी अभी नाश्ता किया है।" मैंने कहा─"वो बापू ने मुझे ये देखने के लिए भेजा है कि तुम बैलों को ले कर खेत गए हो कि नहीं।" "हां वो मैं नाश्ता कर के निकलने ही वाला हूं।" श्यामू काका ने बताया─"वैसे आज तुझे गहाई करवानी है। बड़े भैया ने तुझे ये बताया कि नहीं।" "हां बताया उन्होंने।" मैंने कहा─"लेकिन जब दशरथ काका आ जाएंगे तो हमें आमों की रखवाली करनी होगी।" "हां वो भी जरूरी है करेजा।" काका ने कहा─"गांव के कुछ लड़के अमिया झोरने पहुंच जाते हैं दोपहर में। अगर रखवाली नहीं होगी तो पेड़ों में कुछ नहीं बचेगा बबुआ।" तभी संगीता काकी थाली ले कर आईं और काका के सामने रख दी। "अरे एक और थाली लगा के ले आ।" काका ने काकी से कहा─"राजू भी खाएगा मेरे साथ में।" "न काका मैं नहीं खाऊंगा।" मैंने पेट पकड़ते हुए कहा─"मेरा पेट भरा हुआ है।" "अरे तो क्या हुआ करेजा।" श्यामू काका ने कहा─"एक दो रोटी और खा ले मेरे साथ। तेरी उमर में मैं पेट भरा होने के बाद भी भौजी के हाथ की बनी चार रोटियां खा जाता था।" "पर मैं नहीं खा पाऊंगा काका।" मैंने हाथ खड़े कर दिए─"तुम्हारे जैसी क्षमता नहीं है मुझमें।" "क्षमता बनानी पड़ती है राजू।" काकी एक दूसरी थाली में नाश्ता लाते हुए बोलीं─"तुम्हारे काका अपनी भौजी के हाथ का बना खा लेते थे तो तुम अपनी इस काकी के हाथ का बना खा लो।" मैं मना करता ही रह गया मगर न काका माने न काकी। मेरे सामने थाली में दो रोटी, टमाटर की चटनी और आम का अचार रख दिया था काकी ने। मैंने असहाय भाव से काका काकी दोनों को देखा। "अरे खा ले करेजा।" काका ने मुस्कुराते हुए कहा─"तेरी काकी ने इतना प्यार दुलार से कहा है तो खा ले।" मैंने काकी की तरफ देखा। वो सच में बड़े प्यार से मुझे देखते हुए मुस्कुरा रहीं थी। मैं भी जबरन मुस्कुराया और फिर धीरे धीरे खाने लगा। ऐसी ही बातों के साथ थोड़ी देर में मेरा और काका का नाश्ता हो गया। मैंने मुश्किल से उन दो रोटियों को खाया था मगर काका ने कई बार रोटियां ली और पेट भर के खाया था। "तू मेरे साथ ही चलेगा या अपने बापू के साथ आएगा।" काका ने बरामदे में रखी खाट पर बैठे पान सुपाड़ी खाते हुए मुझसे पूछा। "चलने को तो मैं तुम्हारे साथ ही चल दूंगा काका।" मैंने कहा─"पर क्या पता बापू को मुझसे कुछ और भी कहना हो और...और हां अनिता भी है। उसको भी तो मेरे साथ ही खेतों पर जाना है।" "तो फिर तू जा घर।" काका ने कहा─"मैं पान सुपाड़ी खा लूं फिर बैलों को ले के निकलता हूं....बड़े भैया पूछें तो बता देना कि मैं बैलों को ले कर चला गया हूं।" मैंने सिर हिलाया और दौड़ पड़ा अपने घर की तरफ। घर आ कर मैंने बापू को बताया कि काका बैलों को ले कर जा रहे हैं। बापू ने मुझे अनीता को साथ ले कर जाने को कहा और बरामदे में जा कर अपनी थैली से पान सुपाड़ी खाने बैठ गए। मैं अनीता को ले कर घर से खेतों के लिए निकल पड़ा। एकाएक मुझे खयाल आया कि मंजू काकी अभी भी घर में अकेली हैं तो क्या बापू इसे सुनहरा मौका समझ कर उनके घर जाएंगे। वैसे तो मैंने दोनों को खेतों पर रंगे हाथों पकड़ लिया था तो संभव है कि दोनों ही डर के कारण ऐसा न करें मगर क्या पता....बापू इसके बावजूद काकी के घर पहुंच ही जाएं। मैंने सोचा क्या मुझे ये देखना चाहिए। फिर खयाल आया कि अगर बापू ने देख लिया और वो गुस्सा हो गए तो???? "अब तुझे क्या हुआ।" तभी अनीता ने मेरा ध्यान भंग किया─"इतना चुप हो के क्या सोच रहा है।" "क..कुछ भी तो नहीं।" मैं ऐसे चौंक पड़ा जैसे मेरी चोरी पकड़ी गई हो। फिर सम्हल कर बोला─"और अगर कुछ सोच भी रहा हूं तो तुझे उससे क्या...अपने काम से काम रख...छिपकली कहीं की।" अनीता ने गुस्से से मुझे घूरा। "मैं छिपकली हूं तो तू क्या है।" फिर उसने पलटवार किया─"तू न बहुत गंदा है....एक नंबर का कमीना है....कुत्ता है।" "ज्यादा बोलेगी तो एक लगा दूँगा कान में।" मैंने एकदम से तैश में आ कर कहा─"और बता तो मैं किस बात पर कमीना और कुत्ता हो गया....हां बता मुझे।" अनीता फौरन कुछ बोल न सकी। थोड़ा सकपका गई थी वो या उसे समझ ही न आया था कि क्या जवाब दे...मगर वो मुझसे हार मानने वालों में से नहीं थी। "तू कमीना है तो है...कुत्ता है तो है बस।" अनीता ने नजरें चुराते हुए कहा। पता नहीं क्यों मुझे उसकी बात सुन कर हंसी आ गई। मुझे हंसते देख उसने चौंक कर मेरी तरफ देखा। फिर बुरा सा मुंह बना लिया। "हंस क्यों रहा है।" वो बोली─"क्या मेरे कुत्ता कमीना बोलने से तुझे मजा आया है जो ऐसे हंस रहा है।" "नहीं...मुझे इस बात पर हंसी आई कि तुझे कोई जवाब नहीं सूझा।" मैंने कहा─"और तू असल बात बता नहीं सकी।" "कौन सी असल बात।" अनीता ने आँखें सिकोड़ कर मुझे देखा। "तू जानती है।" "मैं कुछ नहीं जानती...झूठ मत बोल।" "नहीं तू...अच्छे से जानती है।" "मैंने कहा न मैं नहीं जानती।" अनीता ने खिसिया कर कहा─"कुछ भी बकता है...गंदा कहीं का।" "अच्छा तो बता...किस बात पर गंदा हूं मैं।" मैंने सड़क पर रुक कर उससे पूछा। अनीता को भी मजबूरन रुक जाना पड़ा। मेरे पूछने पर वो फिर से कुछ पलों तक कुछ न बोली। उसके चेहरे पर बेबसी साफ दिखाई दी मुझे। "क्या हुआ...बता न।" मैंने मुस्कुरा कर कहा─"अगर तुझमें हिम्मत है तो बता किस बात पर गंदा हूं मैं।" "मेरी हिम्मत न देख।" उसने आँखें फैला कर कहा─"तेरे से ज्यादा हिम्मत है मुझमें।" "हां तो बता न फिर।" मैंने उसे उकसाया─"मैं भी तो देखूं सच में मुझसे ज्यादा तेरे में हिम्मत है या झूठ मूठ का दम भर रही है।" "बकवास न कर।" वो फिर से खिसियाई। "बस निकल गई हवा।" मैंने उसकी खिल्ली उड़ाई─"सुन...गरजने वाले बरसते नहीं और बरसने वाले गरजते नहीं तेरी तरह....समझी छिपकली।" अनीता अब बुरी तरह किलस गई थी। मैंने उसे ताव दे दिया था और वो ताव खा भी गई थी इस लिए उसका चेहरा तमतमा गया था। "तू समझता क्या है खुद को।" फिर वो मेरे कंधे पर मार कर बोली─"तेरे से एक आना कम नहीं हूं मैं समझा।" "फिर से गरज रही है।" मैंने फिर उसकी खिल्ली उड़ाई─"तू बस फालतू में गरजती ही रह बाकी तेरे में कोई दम नहीं है।" "तुझमें बड़ा दम है न तो दिखा।" उसने मुझे घूरा। "मेरे में तो बहुत दम है...तू जो बोलेगी वो दिखा सकता हूं मैं।" मैंने सीना चौड़ा कर के कहा─"लेकिन तेरे में दम नहीं है इस लिए जो मैं कर सकता हूं वो तू नहीं कर सकती। बस बक बक ही कर सकती है तू....हां।" "ज्यादा उड़ मत।" अनीता फिर खिसिया गई─"तू भी बक बक ही कर रहा है। तुझमें भी इतना दम नहीं है कि जो मैं बोलूं वो तू कर के दिखा दे।" "लगा शर्त।" मैंने अपनी हथेली उसके सामने की─"तू शर्त लगा फिर देख मैं क्या करता हूं।" "हां तो लगा ले शर्त।" अनीता भी तैश में थी─"अगर सच में तुझमें दम है तो तू वही करेगा जो मैं बोलूंगी....वरना यही मानूंगी तू बस डींगे मारता है।" "हां ठीक है।" मैंने कहा─"अब शर्त सुन..जो तू बोलेगी अगर मैंने वो कर के दिखा दिया तो फिर तू भी वो करेगी जो मैं बोलूंगा। मंजूर है तो बोल...नहीं तो अभी के अभी मान ले कि तेरे में कोई दम नहीं है।" "हां मंजूर है मुझे।" अनीता ने ताव में आ कर बिना सोचे समझे शर्त मंजूर कर ली। "ऐसे नहीं।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा─"मां की कसम खा के बोल।" "मां की कसम क्यों।" अनीता ने आँखें सिकोड़ी। "मुझे तुझ पर भरोसा नहीं है।" मैंने कहा─"क्या पता बाद में तू शर्त पूरी करने से मुकर जाए....इस लिए मां की कसम खा के बोल कि तुझे ये शर्त मंजूर है।" "मुझे भी तुझ पर भरोसा नहीं है।" अनीता ने कहा─"तू भी मां की कसम खा के बोल कि मैं जो करने को कहूंगी तू वो कर के दिखाएगा।" "हां ठीक है।" मैंने झट कहा─"मैं मां की कसम खा के बोलता हूं कि तू जो बोलेगी वो कर के दिखाऊंगा। चल अब तू भी मां की कसम खा के यही बात बोल।" जवाब में अनीता ने भी ताव में मां की कसम खा ली। इधर मैं अंदर ही अंदर बड़ा खुश हुआ उसके इस तरह कसम खा लेने से। उधर अनीता भी इस बात से खुश दिखी कि मैंने मां की कसम खा ली है इस लिए अब मैं वही करूंगा जो वो बोलेगी। जाहिर है उसके मन में मुझसे बदला लेने का ही कोई न कोई खयाल होगा। मैं जानता था वो कुछ ऐसा करने को बोलेगी जो उसकी समझ में मैं कर ही नहीं सकता। "चल अब बता क्या करना है मुझे।" मैंने कहा। "सोचने दे मुझे।" अनीता ने अपने सिर को हल्के से खुजाते हुए कहा। "अब क्या चार दिन लगाएगी सोचने में।" मैंने उसके सिर पर हल्के से चपत लगाई। "कुत्ता...सोचने दे न मुझे।" उसने खिसिया कर आँखें दिखाई मुझे। मैं चुप हो गया। हम दोनों खेतों की तरफ जा रहे थे। खेत दिखने लगे थे। इधर मैं भी सोचने में लग गया था कि आखिर अनीता मुझे क्या करने को कहेगी। शर्त जीतने के बाद का तो मैंने अभी से सोच लिया था कि उससे क्या करवाऊंगा। थोड़ी ही देर में हम खेतों पर पहुंच गए। अभी से धूप में तपन महसूस हो रही थी जबकि अभी तो सुबह का ही समय था। खेतों पर बने मकान के पास जैसे ही हम पहुंचे तो अनायास ही मुझे कल की वो घटना याद आ गई जो मकान के उस छोटे से कमरे में घटी थी। कमरे में मेरे बापू मंजू काकी को खाट पर झुकाए पीछे से उन्हें चोदने में लगे हुए थे। पलक झपकते ही मेरे बदन में एक रोमांचक झुरझुरी दौड़ गई। "मैंने सोच लिया।" तभी अनीता थोड़ा ऊंची आवाज में बोल पड़ी तो मैंने चौंक कर उसको देखा। "अच्छा...तो फिर बता क्या करना है मुझे।" "अगर तुझमें हिम्मत है तो फूला कुम्हार के खेत वाली बावड़ी में घुस के दिखा।" अनीता ने बाएं तरफ फूला कुम्हार के खेतों की तरफ इशारा कर के कहा। फूला कुम्हार के खेत हमारे खेतों से थोड़ा दूर थे मगर यहां मसला दूर का नहीं था बल्कि कुछ और था। असल में पूरा गांव जानता है कि फूला के खेत की बावड़ी के अंदर एक खोह(सुरंग) है जो अंदर ही अंदर पता नहीं कहां तक चली गई है। कई बार उसमें से ऐसे खतरनाक जीव जंतु दिखे हैं जो इंसानों की जान के लिए खतरा हैं। हालांकि बावड़ी थोड़ी गहरी है इस लिए वो जीव ऊपर जमीन पर नहीं आ पाते मगर जब बरसात में बावड़ी के पानी का स्तर ऊपर आ जाता है तो खतरा बहुत ज्यादा होता है। कई लोगों ने सरपंच से इस बारे में शिकायत की थी कि फूला कुम्हार को अपने खेत की उस बावड़ी को मिट्टी डाल कर भाठ देना चाहिए मगर वो ऐसा करने से साफ मना कर देता है। उसका यही कहना होता है कि आज तक उसकी बावड़ी की वजह से किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ है तो वो क्यों उसे भाठे। दूसरे जब उसे कभी कोई खतरा नहीं हुआ तो बाकी के लोग क्यों ऐसा बोलते हैं। बात भी सही थी कि आज तक कभी किसी की जान का नुकसान नहीं हुआ था और न ही किसी के साथ कोई हादसा हुआ था। बस एक डर था लोगों में कि क्या पता कभी ऐसा हो ही जाए। गांव का कोई भी व्यक्ति उस बावड़ी के पास नहीं जाता था। हर कोई अपने बच्चों को भी यही सलाह देता था कि भूल कर भी फूला के खेतों पर न जाए और अगर जाएं भी तो उस बावड़ी के पास न जाएं। फूला के खेत की वो बावड़ी बहुत पुरानी थी। किसी को नहीं पता कि उसे किसने बनवाया था। गांव के बूढ़े बुजुर्ग यही कहते हैं कि वो खुद भी छोटे से उसे ऐसी ही देखते आए हैं। उनके बुजुर्गों का कहना था कि पुराने समय में वो बावड़ी राजा रजवाड़ों ने बनवाई थी। बावड़ी में बनी खोह(सुरंग) के द्वारा राजा के गुप्तचर आया जाया करते थे। तब से वो ऐसी ही थी। अब क्योंकि राजा रजवाड़े रहे नहीं और न ही उनके गुप्तचर तो बावड़ी सदियों से ऐसे ही सूनी पड़ी रही थी। फूला कुम्हार के दादा परदादा ने अपने समय में उसे ऐसे ही रहने दिया था क्योंकि उसमें पानी हमेशा रहता था जो पीने के काम आता था। खैर अनीता ने मुझे उसी बावड़ी में घुसने को कहा तो एक बार के लिए तो मेरी सांसें हलक में ही फंस गईं। भय की तीव्र लहर पूरे बदन में दौड़ गई थी। "पागल है क्या।" मैं भय से बोल पड़ा─"उस खतरनाक बावड़ी में आज तक जब कोई अन्दर नहीं घुसा तो भला मैं कैसे घुस सकता हूं। नहीं नहीं...तू कुछ और करने को बोल मुझे।" "क्यों...निकल गई हवा।" अनीता मुस्कुरा उठी─"अभी तो बड़ा सीना चौड़ा कर के बोल रहा था कि मेरे कहने पर कुछ भी कर सकता है तो अब कर के दिखा।" "यार तुझे भी पता है कि बावड़ी में घुसना कितना खतरनाक है।" मैंने कहा─"मां बापू को पता चला तो जान ले लेंगे और....और तू भी तो सोच कि अगर सच में मेरे साथ कुछ हो गया तो क्या होगा। घर वाले तो रो रो के पागल ही हो जाएंगे। और...क्या तू भी ये चाहती है कि मेरे साथ कुछ बुरा हो जाए।" "न...नहीं नहीं।" अनीता झट बोली─"मैं ऐसा नहीं चाहती।" "तो फिर कोई दूसरा काम करने को बोल।" मैंने कहा─"जिसमें मेरी जान वान जाने का खतरा न हो।" अनीता सोचने लगी। मैंने भी राहत की सांस ली। अभी वो सोच ही रही थी कि तभी श्यामू काका बैलों के साथ आते दिखाई दिए। "ले छोटे काका आ गए।" मैंने कहा─"अब कैसे हम अपनी शर्त पूरी कर सकेंगे।" "तू हार मान ले तो पूरी हो जाएगी शर्त।" अनीता ने चिढ़ाते हुए कहा। "न...मैं ऐसे हार नहीं मानूंगा।" मैंने दृढ़ता से कहा─"शर्त तो अब लग चुकी है हमारे बीच। इस लिए जब तक सच में हम में से किसी एक की हार नहीं होगी तब तक ये खेल खत्म नहीं होगा। एक काम कर तू तब तक सोच ले कि मुझसे क्या करवाएगी। गहाई से जब हम फुर्सत हो जाएंगे तब ये खेल फिर से शुरू करेंगे...क्या बोलती है।" "हां ठीक है।" अनीता न कहा─"मुझे मंजूर है। बस तू मत मुकर जाना।" "अरे तू अपनी सोच...छिपकली।" मैंने उसे चिढ़ाया तो उसका मुंह बन गया। "बड़े भैया नहीं आए क्या अभी।" श्यामू काका ने आते ही पूछा। "आते ही होगे।" मैंने बताया। "एक काम करते हैं।" श्यामू काका ने कहा─"जब तक बड़े भैया आते हैं तब तक हम इन बैलों से गहाई शुरू कर देते हैं।" मैंने सहमति में सिर हिलाया तो काका बैलों को ले कर खलिहान की तरफ चल पड़े। उनके पीछे मैं और अनीता भी चल पड़े। कुछ ही देर में हम खलिहान में थे। काका ने गेहूं की ढेर सारी पुल्लियां साफ सुथरे खलिहान में गोलाकार में फैला दी। फिर जुएं में दोनों बैलों को पिरोया। दोनों बैलों के मुंह में जालीदार डोरी का मुस्का लगा दिया ताकि बैल गेहूं न खा सकें। "चल करेजा।" सब व्यवस्थित करने के बाद काका ने मुझसे कहा─"बैलों को हांकना शुरू कर।" मैं हाथ में एक डंडा ले कर बैलों के पीछे पीछे उन्हें हांकते हुए चलने लगा। दोनों बैल जुएं में नधे हुए थे इस लिए मेरे हांकते ही गोलाकार परिधि पर चलते हुए घूमने लगे। उनके चलने से नीचे जमीन पर फैली हुई गेहूं की पुल्लियां कुचली जाने लगीं। "तू खड़ी क्या देख रही है।" मैंने चुपचाप खड़ी अनीता को घुड़की दी─"चल तू भी मेरे साथ बैलों को हांक।" "अरे उसे खड़ी रहने दे करेजा।" श्यामू काका ने कहा─"अभी बड़े भैया आएंगे तो वो भी दो बैलों को ऐसे ही जुएं में नध देंगे...फिर तेरी तरह ये भी उन्हें हांकना शुरू कर देगी।" "अरे तो क्या तब तक ये महारानी की तरह खड़ी रहेगी काका।" मैंने बुरा सा मुंह बनाया। "अरे तो क्या हो गया करेजा।" श्यामू काका बोले─"तेरी छोटी बहन है...थोड़ी देर सुस्ता लेने दे। कुछ देर में तो वैसे ही बेचारी बैलों के पीछे चक्कर लगाएगी।" "इसको मेरी खुशी नहीं देखी जाती छोटे काका।" अनीता ने कहा─"ये कहने को मेरा बड़ा भाई है लेकिन इसके अंदर मेरे लिए न कोई दया है न कोई प्यार।" "ऐसी बात नहीं है बिटिया।" श्यामू काका ने एक बड़े लट्ठ से बाहर की तरफ फैल जा रहे गेहूं को वापस बैलों के नीचे खिसकाते हुए कहा─"उसके अंदर तेरे लिए दया स्नेह प्यार सब है....बस वो तुझे दिखाता नहीं है कभी।" "ऐसा बोल कर तुम मेरा मन बहल रहे हो छोटे काका।" अनीता ने मेरी तरफ देख कर बुरा सा मुंह बनाया─"जबकि सच यही है कि इसके अंदर सच में अपनी छोटी बहन के लिए कोई दया कोई प्यार नहीं है। अगर होता तो ये हर वक्त मुझसे झगड़ा न करता और न ही मुझे तंग करता।" "तू अभी छोटी है बिटिया।" श्यामू काका ने जैसे उसे समझाया─"इस लिए तू सच को महसूस नहीं कर सकती। हर भाई बहन के बीच इसी तरह झगड़ा होता है। वो दोनों इसी तरह एक दूसरे को तंग करते हैं....क्योंकि यही उनके प्यार करने का तरीका होता है। इंसान अपनी उमर के हिसाब से ही अपनी भावनाओं को जाहिर करता है। छोटी उमर में प्यार और स्नेह जैसी भावनाओं से वो अंजान होते हैं इस लिए अपनी भावनाओं को झगड़े के रूप में व्यक्त करते हैं। फिर जब बड़े हो जाते हैं और उन्हें समझ आती है तब ये झगड़ा एकदम से बंद हो जाता है...उसके बदले वही प्यार और स्नेह खुल कर बाहर आ जाता है जिससे छोटी उमर में वो अंजान होते थे। छोटी उमर में किए झगड़े जब याद आते हैं तो खुद पर ये सोच कर हंसी आती है कि कितने नादान हुआ करते थे हम जो एक दूसरे से हर वक्त लड़ते थे और हर वक्त एक दूसरे को तंग करते थे। जबकि वो भी एक तरह का स्नेह ही होता है मगर नासमझ होने के कारण हम समझ नहीं पाते।" "मतलब...तुम ये कह रहे हो काका कि अभी जो हम एक दूसरे से झगड़ा करते हैं उसमें भी हमारा एक दूसरे के लिए प्यार ही होता है।" मैंने चकित हो कर काका से पूछा। "हां करेजा।" काक ने कहा─"ये एक तरह का भाई बहन के बीच प्यार ही होता है। लड़ाई झगड़ा दो तरह का होता है। एक वो जो तुम दोनों करते हो और एक वो जो दुश्मन लोग करते हैं। दोनों झगड़ों में बहुत फर्क होता है। तुम दोनों के झगड़े की एक सीमा होती है, उसमें गुस्से का अंश बस नाम के लिए होता है जबकि दुश्मन के झगड़े में कोई सीमा नहीं होती और न ही उसके गुस्से के अंश में। इसी लिए वो एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। एक दूसरे की जान तक ले लेते हैं। अब तू खुद सोच कि क्या तेरा और तेरी बहन का झगड़ा इस तरह का है।" "न..नहीं काका।" मैंने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा─"हम दोनों को एक दूसरे पर गुस्सा तो आता है लेकिन वो गुस्सा ऐसा नहीं होता है कि हम एक दूसरे का दुश्मनों की तरह कत्ल ही कर दें।" "हां छोटे काका।" अनीता भी बोल पड़ी─"राजू सही कह रहा है। मुझे भी इसके ऊपर ऐसा गुस्सा कभी नहीं आता।" "तो अब समझ जाओ कि तुम दोनों के बीच में जो झगड़ा होता है वो असल में भाई बहन के बीच का प्यार ही होता है।" काका ने कहा─"भले ही वो लड़ाई झगड़ा लगता है मगर असल में वो सिर्फ प्यार और स्नेह ही होता है।" "क्या तुम सच कह रहे हो छोटे काका।" अनीता को जैसे भरोसा न हुआ। "अरे बिटिया मैं भला तुझसे झूठ क्यों बोलूंगा।" श्यामू काका ने उसके पास जा कर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा─"तुझे पता है जब मैं और नीलू(छोटी और इकलौती बुआ) छोटे थे तब ऐसे ही झगड़ा करते रहते थे। वो मुझसे छोटी थी तो मैं हर वक्त उसे तंग करता था और वो मुझसे परेशान हो कर कभी चीखती, कभी रोने लगती तो कभी खिसिया कर मेरे बाल नोचने लग जाती थी। जब वो मेरे बाल नोचने लगती तो मैं उसे दो थप्पड़ लगा देता। फिर वो रोते हुए बड़े भैया से शिकायत कर देती जिससे बड़े भैया मुझे खूब डांटते।" "क्या सच में।" अनीता की आँखें हैरत से फैल गईं थी। "हां बिटिया।" श्यामू काका मुस्कुराए─"जैसे तुम दोनों का झगड़ना रोज का काम है वैसे ही मेरा और नीलू का झगड़ा करना रोज का काम था। ऐसा नहीं था कि वो बेचारी कोई गलती करती थी या आगे से मुझसे झगड़ा करती थी...बल्कि वो तो मैं ही होता था जो आगे से उसे छेड़ देता था और फिर हमारा झगड़ा शुरू।" "मतलब आप जान बूझ के बुआ को तंग करते थे।" अनीता मुस्कुराई। "असल में मुझसे खुद रहा नहीं जाता था।" श्यामू काका ने कहा─"मतलब कि जब तक मैं उससे झगड़ा नहीं करता था तब तक मुझे ऐसा लगता था जैसे आज किसी बात की कमी है। मुझे खाली खाली सा लगता था। कुछ अच्छा ही नहीं लगता था। फिर मैं नीलू को परेशान करता या उसे छेड़ता तो जब वो मुझसे झगड़ा करने लगती तब एहसास होता कि हां अब मजा आ रहा है।" "फिर तो तुम बहुत गंदे थे छोटे काका।" अनीता ने कहा─"बेचारी बुआ को कितना तंग करते थे तुम।" "पर यही हमारे बीच का असल प्यार था बिटिया।" श्यामू काका ने कहा─"प्यार दुलार के कई रूप होते हैं। आज भले ही तुझे ऐसा लगता है लेकिन जब तू बड़ी हो जाएगी और तेरा ब्याह हो जाएगा तब तुझे समझ आएगा कि ये वास्तव में क्या था। अब जब तेरी नीलू बुआ आएगी तो उससे पूछना कि जो हम करते थे वो क्या था।" "अब तो मैं पूछूंगी ही बुआ से।" अनीता ने मुस्कुरा कर कहा। "अरे देख बड़े भैया भी आ गए।" श्यामू काका ने बापू की तरफ देख कर कहा─"तू भी तैयार हो जा अब। थोड़ी ही देर में तुझे भी दूसरे पाले में बैलों को हांकना होगा।" जारी है............ |
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