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Adultery एक पत्नी का सफर
#41
Outstanding update and nice story
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#42
पूजा रेणु से नज़रें मिलाने से डर रही थी।
संजय से फ़ोन पर हँसकर बात की, “हाँ जान, सब ठीक है, बस पढ़ाई का प्रेशर है।”
पर हर रात वो तकिया भीगोती रही।

राजू का कोई मैसेज नहीं आया था।
पूजा ने कई बार लिखा –
“राजू… तुम ठीक हो ना…?”
पर टाइप करके डिलीट कर दिया।
उसे लगता था – अगर उसने मैसेज किया तो राजू फिर लौट आएगा,
और वो फिर टूट जाएगी।

आज कॉलेज आई तो बेंच पर बैठी ही थी कि विक्रम दिख गया।
वो मुस्कुराया।
पूजा का दिल ज़ोर से धड़क गया।
उसके होंठों की वो गर्मी याद आ गई।
उसके हाथों की पकड़।
पर तुरंत राजू की याद भी आई –
राजू का नंगा बदन।
उसका चौड़ा सीना।
उसके मुँह से आती दारू की तेज़ बू।
उसकी उंगलियाँ पूजा के बूब्स पर।
उसका मोटा, लंबा लंड जो संजय से कहीं ज़्यादा बड़ा था।
और फिर वो धक्के…
हर धक्के में पूजा की चूत फटती हुई महसूस हो रही थी।
उसका मंगलसूत्र उसके बूब्स के बीच उछल रहा था –
जैसे चिल्ला रहा हो –
“धोखेबाज़… धोखेबाज़… धोखेबाज़…”

पूजा ने आँखें बंद कीं।
उसके बदन में सिहरन दौड़ गई।
उसकी चूत अभी भी हल्की गीली थी –
राजू का वीर्य सूख चुका था, पर उसकी गंध अभी भी थी।
हर बार जब वो पैर हिलाती, चिपचिपाहट महसूस होती।
उसके निप्पल्स सख्त हो गए थे।
कुर्ते के अंदर बिना ब्रा के, वो साफ़ दिख रहे थे।
“नहीं… नहीं सोचना मुझे…
पर याद आ रहा है…
राजू का लंड मेरे मुँह में…
उसकी नसें… उसकी गर्मी…
मैंने उसे चूसा था…
उसके मुँह से दारू की बू आ रही थी…
पर मुझे अच्छा लग रहा था…
उसने मेरी चूत चाटी थी…
उसकी जीभ अंदर तक…
मैं झड़ गई थी… दो बार…
फिर उसने मुझे चोदा…
धीरे-धीरे… फिर तेज़…
हर धक्के में मुझे लगा मैं टूट जाऊँगी…
पर मुझे और चाहिए था…
मैंने उससे कहा था…
‘राजू… और तेज़…’
मैंने खुद अपनी कमर ऊपर की थी…
मैंने खुद उसे अपने अंदर गहराई तक लिया था…
और जब वो झड़ा…
उसका गर्म वीर्य मेरी चूत में…
मुझे लगा मैं पूरी हो गई…
पर अब…
अब मैं खाली हूँ…
संजय… मुझे माफ़ कर दो…”

पूजा ने खुद से कहा,
“नहीं पूजा… नहीं…
तू फिर से नहीं तोड़ सकती संजय से किए वादे…
नहीं…”

ठीक उसी पल फ़ोन वाइब्रेट हुआ।
राजू का मैसेज।
“पूजा जी,
आपके साथ बिताए पल मेरे लिए सबसे बेहतरीन थे।
मैं आपसे प्यार करने लगा था।
और ना चाहते हुए भी शायद आपने मुझे खुद को सौंप दिया था।
मैं नहीं चाहता कि आपके साथ ये फिर हो
और मैं भी अपनी पत्नी को धोखा दूँ।
तो मैं वापस अपने गाँव जा रहा हूँ।
आप हमेशा खुश रहना।
अलविदा।
आपका राजू”

पूजा की आँखें भर आईं।
उसने फ़ोन सीने से लगाया।
होंठ काँप रहे थे।
आँसू टपकने लगे।
तभी प्रोफेसर अवस्थी आए।
56 साल के।
सफेद बाल, मोटा चश्मा, पर आँखों में हमेशा वही गंदी चमक।
कैंपस में सब जानते थे – अवस्थी सर लड़कीबाज़ हैं।
पूजा को पहले भी कई बार गंदी नज़र से देखते पकड़ा गया था।
उसके बूब्स को घूरते, उसकी कमर को नापते।
एक बार तो लाइब्रेरी में उसकी जाँघ पर हाथ रख दिया था।

“अरे पूजा… आँखों में आँसू…?”
उनकी आवाज़ में बनावटी चिंता थी।

“कुछ नहीं सर…”

“अरे बताओ तो… अपने टीचर से कुछ नहीं छिपाते…”

उन्होंने पूजा की पीठ पर हाथ रखा।
धीरे-धीरे सहलाने लगे।
हाथ नीचे सरक रहा था।
पूजा की कमर तक पहुँच गया।
उसके कुर्ते के नीचे हाथ डालने की कोशिश कर रहे थे।
पूजा सिहर गई।
उसके बदन में फिर वही सिहरन –
राजू की उंगलियों की याद।
पर अब ये गंदा था।

“सर… प्लीज़…”

“अरे शर्मा मत… मैं तुम्हारा दर्द समझता हूँ…”
हाथ और नीचे।
पूजा की गांड पर पहुँच गया।
हल्के से दबाया।

तभी कोई बोला,
“सर… प्रिंसिपल साहब बुला रहे हैं।”

अवस्थी सर ने हाथ हटाया।
पर जाते-जाते पूजा के कान में फुसफुसाए,
“कभी अकेलापन लगे…
मेरे कमरे में आ जाना…
मैं तुम्हें बहुत आराम दूँगा…”
और बहुत गंदी, बहुत भूखी मुस्कान के साथ चले गए।
पूजा काँप रही थी।
उसने अपना दुपट्टा कसकर ओढ़ लिया।
जैसे कोई ढाल हो।
तभी विक्रम पास आके बोला।
“हाय पूजा… क्या हुआ? रो रही हो?”
उसकी मुस्कान पहले जैसी ही थी।
पूजा ने सिर उठाया।
उसकी आँखें लाल थीं।
वो कुछ नहीं बोली।
बस फ़ोन अपनी गोद में छिपा लिया।
और आँसू पोंछते हुए बोली,
“कुछ नहीं… बस घर की याद आ गई…”
विक्रम उसके बगल में बैठ गया।
उसकी जाँघ पूजा की जाँघ से सटी हुई।
“अगर दिल करे तो बता देना… मैं हूँ ना…”
पूजा ने उसकी ओर देखा।
उसके होंठ फिर से करीब थे।
पूजा का मन हुआ की इनको चूम लू।
"नहीं। पूजा तू अपने पति को फिर धोख़ा नहीं देगी। चाहे उसके लिए तुझे कुछ भी करना पड़े। "
वो धीरे से बोली,
“विक्रम… मुझे अकेला छोड़ दो प्लीज़…”
विक्रम चौंका।
फिर मुस्कुराया।
“ठीक है… जब मन करे बुला लेना…”
और चला गया।
पूजा अकेली बेंच पर बैठी रही।
राजू का मैसेज फिर पढ़ा।
फिर फ़ोन बंद कर दिया।
और धीरे से फुसफुसाई,
“अलविदा राजू…
तू सही था…
हम दोनों ने एक-दूसरे को बचा लिया था…
और अब…
हम दोनों को दूर जाना ही था…”

उसने अपना मंगलसूत्र छुआ।
और पहली बार बहुत देर तक उसे कसकर पकड़े रही।
जैसे संजय को वापस पकड़ रही हो।
जैसे खुद को वापस पकड़ रही हो।
वो उठी।
बैग उठाया।
और बिना किसी को देखे हॉस्टल चली गई।
उस दिन के बाद…
राजू का नंबर उसने ब्लॉक कर दिया।
और खुद से वादा किया –
“बस एक आखिरी बार टूटी थी मैं…
अब फिर कभी नहीं…”
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#43
very hot and lust full with emotional inncent story and more add hot pics
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#44
This is one of the most intriguing stories I have read in the recent times. Great plot. Great feeling. Thank you, Tiska ji
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#45
Awesome update and lovely story
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#46
अगले कुछ दिन – कॉलेज और हॉस्टल

(धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे… सब कुछ बदल रहा था)

पूजा अब हर सुबह उठकर तैयार होती।
साड़ी की जगह अब सलवार-सूट।
दुपट्टा कंधे पर नहीं, गले में लपेटकर।
जितना हो सके, उतना ढँककर।
विक्रम को देखते ही नज़रें झुकाकर निकल जाती।
उसका मैसेज आता तो डिलीट कर देती।
राजू का नाम भी मन में नहीं लाना चाहती थी।
पर रात को जब रेणु और रमेश की फ़ोन सेक्स की आवाज़ें आतीं –
रेणु की सिसकारियाँ, “आह्ह… रमेश… और ज़ोर से…”
तो पूजा तकिए में मुँह दबाकर रोने लगती।
और फिर राजू की याद आ जाती –
उसका मोटा लंड, उसकी गर्म साँसें, उसका वीर्य उसकी चूत में…
पूजा की उंगलियाँ अनजाने में अपनी चूत पर चली जातीं।
वो खुद को रोकती, पर रोक नहीं पाती।
हर रात वो झड़कर सोती।
और हर सुबह खुद से नफ़रत करती।
अवस्थी सर अब खुलकर आगे बढ़ रहे थे।
क्लास में पूजा को बोर्ड पर बुलाते।
पीछे से खड़े होकर उसकी कमर को “गलती से” छूते।
“अरे पूजा… तुम थोड़ी कमज़ोर हो गई हो ना…
प्राइवेट क्लास लेनी पड़ेगी…
मेरे चैंबर में… शाम 4 बजे के बाद…”
पूजा को लगा – शायद सच में पढ़ाई में मदद मिलेगी।
वो बहुत इज़्ज़त करती थी अवस्थी सर की।
“जी सर… ठीक है।”
हर शाम 4 से 6 बजे।
अवस्थी सर का चैंबर।
दरवाज़ा बंद।
कूलर की आवाज़।
और अवस्थी सर की नज़रें पूजा की छाती पर।
कुर्ते का गला जितना भी ढँका होता, वो उसे नीचे खींचने की कोशिश करते।
“अरे पूजा… यहाँ लिखो…”
कहकर उसकी पीठ पर हाथ फेरते।
कभी कलम गिराकर झुकते और पूजा की जाँघों को घूरते।
पूजा समझ नहीं पा रही थी।
उसका मन कहता – सर तो मदद कर रहे हैं।
पर बदन सिहर जाता।
हर लेक्चर में पूजा जब भी बोर्ड पर जाती, अवस्थी सर की कुर्सी से उठते ही नहीं।
बस घूरते रहते।
उसकी नज़रें पूजा के पतले कुर्ते के गले से शुरू होतीं –
वो गला जो पसीने से हल्का गीला होकर चिपक जाता था।
उसके गोरे-गोरे बूब्स का आकार साफ़ दिखता।
निप्पल्स हर बार खड़े हो जाते –
कभी ठंडी हवा से, कभी डर से, कभी अनजानी उत्तेजना से।
अवस्थी सर की जीभ होंठों पर फिरती।
उसकी आँखें लालच से चमकतीं।
अवस्थी का मन (हर बार)
“साली के निप्पल्स आज फिर खड़े हैं…
इतने सख्त…
जैसे चिल्ला रहे हों – ‘चूसो हमें…’
इसे तो रोज़ चोदने का मन करता है…
इसके बूब्स को मुँह में लेकर दाँत से काटूँ…
इतना चूसूँ कि ये मेरे नाम की आहें भरे…
फिर इसकी चूत…
कितनी तंग होगी…
मेरा 9 इंच का लंड इसके अंदर पेलूँगा…
इसे इतना चोदूँगा कि ये मेरे नीचे लेटकर गिड़गिड़ाएगी…
‘सर… और… सर… और ज़ोर से…’
हाहाहा… बस थोड़ा और इंतज़ार…”
क्लास खत्म होते ही अवस्थी सर पूजा को रोकते।
“पूजा… ज़रा मेरे साथ आना… कुछ डाउट है ना?”
कॉरिडोर में लोग कम।
अवस्थी सर पूजा के बिल्कुल पीछे-पीछे चलते।
उनका लंड पहले से ही तना हुआ।
पूजा चलती तो उसकी गांड हल्की-हल्की हिलती।
अवस्थी सर का हाथ “गलती से” उसकी कमर पर टच होता।
फिर धीरे से नीचे सरकता।
गांड के कर्व पर रुक जाता।
हल्का सा दबाव।
पूजा सिहर जाती।
अवस्थी का मन कहता
“क्या माल है…इतनी मुलायम गांड…इसे तो मैं दोनों हाथों से पकड़कर…
अपना लंड इसके बीच में रगड़ूँगा…फिर धीरे-धीरे अंदर करूँगा…
ये चीखेगी…पर मज़ा आएगा…”


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#47
शाम 6:15 बजे – कॉलेज गेट के बाहर
पूजा बैग कंधे पर लटकाए, थकी-थकी चल रही थी।  
वो सिर झुकाए चल ही रही थी कि सामने से आती यूनिफॉर्म में एक परिचित शक्ल दिखी।
इंस्पेक्टर विजय।  
वही विजय जिसने उस दिन मुन्ना की दुकान पर उसे बचाया था।  
उसकी वर्दी, उसकी चौड़ी छाती, उसकी आवाज़ – सब याद आ गया।  
विजय ने भी उसे देख लिया।  
उसकी आँखों में एक पल को वही पुरानी तस्वीर कौंध गई –  
पूजा का डरा हुआ चेहरा, उसकी आधी नंगी हालत, उसके तने हुए निप्पल्स जो उसकी पीठ पर दब रहे थे।  
उसके बदन में एक हल्की सी सिहरन दौड़ गई।
"Hi पूजा जी…?” विजय ने मुस्कुराते हुए आवाज़ दी।
पूजा रुक गई।  उसका चेहरा शर्मा गया।  
“ह… हाय विजय जी…”
“अरे आप… आप यहाँ…?”
“वो… मैं यहीं कॉलेज में पढ़ती हूँ…”  
फिर एकदम से झुककर बोली,  
“उस दिन… सच में बहुत-बहुत शुक्रिया… आप न होते तो…”
विजय ने हाथ जोड़कर रोका।  
“अरे कोई बात नहीं पूजा जी… ड्यूटी थी।”
फिर थोड़ा रुककर, हल्की मुस्कान के साथ,  
“चाय पियोगी? पास में ही एक ढाबा है… बहुत अच्छी चाय मिलती है।”
पूजा एक पल सोची।  
फिर हल्के से सिर हिलाया।  
“अभी…?”
“हाँ… क्यों नहीं?”
विजय की बुलेट पर।  
पूजा पीछे बैठी।  
उसने दुपट्टा अच्छे से लपेटा, पर फिर भी विजय की चौड़ी पीठ से उसके बूब्स हल्के-हल्के रगड़ खा रहे थे।  
हर गड्ढे में एक झटका।  
पूजा की साँसें तेज़ हो गईं।  
विजय ने भी महसूस किया – उसकी पीठ पर दो मुलायम गोलाकार दबाव।
विजय का मन  
“यही बूब्स थे ना… उस दिन भी ऐसे ही दब रहे थे…  
आज भी तने हुए हैं…  
कितने मुलायम थे…  
काश मैं पलटकर…  
नहीं विजय… कंट्रोल कर…  
ये वो लड़की है जिसे तूने बचाया था…  
पर… पर आज ये खुद मेरे साथ है…”
ढाबे पर
दो कुल्हड़ वाली चाय।  टेबल पर।  
विजय ने बताया,  
“मुन्ना को जेल हो गई है।  
उसने कई लड़कियों को ब्लैकमेल किया था।  
आप चिंता मत करो… मैंने आपका नाम कहीं आने ही नहीं दिया।  
वरना खामखा बदनामी हो जाती।”
पूजा की आँखें नम हो गईं।  
“थैंक यू विजय जी… आप बहुत अच्छे हो…”
“अरे आप शर्मिंदा कर रही हैं…  बस विजय कहिए ना…”
“ओके… विजय…”  
पूजा ने शरमाते हुए कहा।
फिर हल्के मज़ाक में,  
“वैसे… तुम सबकी ऐसे ही मदद करते हो… या सिर्फ़ मेरी ही…?”
विजय हँसा।  “अरे सबकी करता हूँ…”
“मतलब मैं भी बाकियों की तरह ही हूँ…?”  
पूजा ने होंठ बनाते हुए कहा।
“अरे नहीं-नहीं पूजा जी… आप तो स्पेशल हो… इतनी खूबसूरत… और क्या ही कहूँ…”
पूजा शर्मा गई।  
“अरे बस मज़ाक मत करो… इतनी भी नहीं हूँ…  
और ये पूजा जी क्या… बस पूजा कहो ना…”
“ओके… पूजा…”
दोनों हँसे।  
चाय खत्म हुई।  
नंबर एक्सचेंज हुए।
विजय ने बाइक स्टार्ट की।  
पूजा फिर पीछे बैठी।  
इस बार उसने थोड़ा और करीब खिसककर बैठ गई।  
उसके बूब्स विजय की पीठ से पूरी तरह दबे हुए थे।  
हर ब्रेक में एक झटका।  
पूजा की साँसें तेज़।  
विजय का लंड पैंट में तन गया।
हॉस्टल से थोड़ा पहले पूजा ने कहा,  
“यहीं छोड़ दो…  
हॉस्टल में खाली लोग बातें बनाएँगे…”
विजय ने बाइक रोकी।  
पूजा उतरी।  
दुपट्टा संभालते हुए बोली,  
“थैंक यू विजय… सच में…”
विजय मुस्कुराया।  
“कोई नहीं पूजा… कभी ज़रूरत हो… कभी भी…  
फोन करना।  
मैं हूँ ना…”
पूजा ने हल्के से सिर हिलाया।  
और हॉस्टल की तरफ़ चल दी।  
पर उसके कदमों में एक अजीब सी हल्कापन था।  
जैसे कोई बोझ हल्का हो गया हो।
और विजय बाइक स्टार्ट करके चला गया।  
पर उसकी पीठ पर अभी भी पूजा के बूब्स का दबाव महसूस हो रहा था।
विजय का मन
“पूजा…  तुम्हें फिर से बचाने का मौका मिले… तो मैं ज़िंदगी भर बचाता रहूँगा…”  
और पूजा के मन में पहली बार कई दिनों बाद एक हल्की सी मुस्कान थी।  
शायद…  शायद कोई अपना फिर से मिल गया हो।
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#48
अवस्थी सर के घर – शाम 5:45 बजे
Extra classes
अवस्थी सर का घर कॉलेज से थोड़ा दूर, पुराने क्वार्टर में था।
एक छोटा सा दो कमरों का फ्लैट।
दीवारें पुरानी, फर्नीचर पुराना, पर साफ़-सुथरा।
हवा में हल्की-हल्की अगरबत्ती की खुशबू।
पूजा टेबल पर बैठी नोट्स देख रही थी।
अवस्थी सर बोले,
“ज़रा पानी लाता हूँ…”
और वो किचन की तरफ़ चले गए।
तभी डोरबेल बजी।
डिलीवरी बॉय था।
बड़ा सा पार्सल।
“अवस्थी सर के लिए…”
पूजा उठी।
“मैं बुलाती हूँ…”
वो अंदर के कमरे में गई।
वो कमरा देखते ही रुक गई।
दीवार पर एक बड़ी सी फोटो लगी थी।
अवस्थी सर – जवान, हँसते हुए।
उनके बगल में एक सुंदर औरत – साड़ी में, मंगलसूत्र, सिंदूर।
उस फोटो पर ताज़ा फूलों का हार चढ़ा हुआ था।
पास में ही एक छोटी फोटो – सिर्फ़ औरत की।
उस पर भी हार।
और सामने एक छोटा सा दीया जल रहा था।
पूजा की साँस रुक गई।
वो बस देखती रही।
“सर…?”
उसकी आवाज़ अपने आप धीमी हो गई।
अवस्थी सर अंदर आए।
डिलीवरी बॉय को पार्सल लिया और वापस भेज दिया।
फिर पूजा वहीँ खड़ी थी – फोटो के सामने।
“सर… ये…?”
अवस्थी सर ने एक लंबी साँस ली।
उनकी आँखें नम थीं, पर मुस्कान थी।
“ये मेरी पत्नी थी… शालिनी…
बीस साल पहले एक एक्सीडेंट में चली गईं…
हमारी शादी को सिर्फ़ पाँच साल हुए थे… बच्चे नहीं हुए… तब से मैं अकेला हूँ…”
उन्होंने फोटो को प्यार से देखा।
“हर साल उनकी बरसी पर मैं फूल चढ़ाता हूँ… और बाकी दिन… दूसरों के बच्चों को पढ़ाकर… उनकी कमी पूरी करने की कोशिश करता हूँ…”
पूजा की आँखें भर आईं।
वो कुछ बोल नहीं पाई।
बस अवस्थी सर को देखती रही।
“सर… मुझे… मुझे माफ़ करना… मैंने कभी नहीं सोचा था…”
अवस्थी सर ने हल्के से सिर हिलाया।
बस एक उदासी।
“कोई बात नहीं पूजा…
तुम क्या जानती… मैं भी… मैं भी कभी-कभी भूल जाता हूँ कि मैं कौन हूँ…”
फिर वो मुस्कुराए।
उस मुस्कान में दर्द था, पर सच्चाई भी।
“तुम पढ़ो… अच्छे से पढ़ो… मेरे लिए नहीं… अपने लिए… और शालिनी के लिए भी…”
पूजा की आँखों से आँसू बह निकले।
वो कुछ नहीं बोली।
बस सिर झुकाकर बोली,
“मैं बहुत अच्छे से पढ़ूँगी सर… पक्का…”
अवस्थी सर ने उसका सिर सहलाया।
पूजा उस दिन घर लौटी तो उसका दिल भारी था।
पर पहली बार कई दिनों बाद… सुकून महसूस किया।
क्योंकि अब उसे पता था –
हर इंसान के अंदर कोई न कोई दर्द छिपा होता है।
और शायद… अवस्थी सर भी सिर्फ़ अकेलेपन में डूबे हुए थे।
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#49
hi bro... update mast tha par awasthi sir ke sath sex accident karwao or wo bhi emotionaly pooja unse shadi kare or apnee naye pati ke roop me sweekar kare.. or khoob sir ke hissab se sex kare... jo itne salo se apnii desire chhupa rakhe the apne patni ka dharam bhi nibhaye.
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#50
or Shadi wali ye baat sirf pooja or professor ka secreat rahe...

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#51
Outstanding update and nice story and waiting for next update
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#52
Bhai in sab me us pati ki kya galti jisne ise itni azafi di uske bare me writer ke kya vichar hai
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#53
next update bro..
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#54
Waiting for update
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#55
Very hot, stimulating......
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#56
अब पूजा अवस्थी सर से काफी बात करती थी। अवस्थी पूजा का जिस्म देख पागल हो जाता था।
एक दिन पूजा का दरवाज़े पर आई extra class केलिए
हवा में गर्मी थी।  
जून की उस शाम में भी उष्णता थी।  
पूजा ने बस स्टॉप से पैदल चलकर अवस्थी सर के क्वार्टर तक का रास्ता तय किया था।  
उसके पैरों में हल्की-हल्की थकान थी, पर मन में एक अजीब सा डर भी।  
पिछले कुछ दिनों से अवस्थी सर का व्यवहार बदल रहा था।  
पर पूजा ने खुद को समझाया था –  
“सर तो बेचारे हैं… अकेले हैं… शायद अनजाने में…”
वो दरवाज़े पर खड़ी हुई।  
उसने नीले रंग का कुर्ता पहना था – थोड़ा टाइट।  
उसके भरे हुए बूब्स कुर्ते में साफ़ उभरे हुए थे।  
सफेद सलवार पतली कॉटन की – गांड का हर कर्व दिख रहा था।  
पैंटी की लाइन भी।  
दुपट्टा गले में तीन बार लपेटा हुआ था।  
पसीने की वजह से कुर्ता पीठ से चिपक गया था।  
ब्रा की स्ट्रिप्स साफ़ दिख रही थीं।  
गर्दन पर पसीने की बूँदें।  
होंठ सूखे हुए।
उसने दरवाज़ा खटखटाया।  
एक बार।  
दो बार।  
तीसरी बार।
अंदर से आवाज़ आई –  
“आओ बेटा… दरवाज़ा खुला है।”  दरवाज़ा खुला।  
अवस्थी सर ने खुद नहीं खोला।  
वो अंदर थे।  कुर्सी पर।  सफेद कुर्ता-पायजामा।  चश्मा।  
बाल सफेद।  पर आँखें – लाल।  भूखी।
पूजा ने जूते उतारे।  अंदर कदम रखा।  
घर में हल्की-हल्की अगरबत्ती की खुशबू थी।  
पर उस खुशबू में कुछ और भी था –  
अकेलेपन की बू।  
और कुछ गंदा।
“आओ बेटा… बैठो।”  
अवस्थी सर ने मुस्कुराते हुए कहा।  
उनकी नज़रें पूजा के बूब्स पर एक सेकंड रुकीं।  
फिर आँखें मिलाईं।
पूजा सिर झुकाकर “नमस्ते सर…”
अवस्थी की आँखे पूजा के cleavge मे घुस गयी
टेबल पर किताबें बिखरी हुई थीं।  
अवस्थी सर ने पूजा को अपने बगल में बिठाया।  
उनकी जाँघ पूजा की जाँघ से सटी हुई।  
पूजा ने दुपट्टा और कस लिया।  
पर अवस्थी सर का हाथ “पेन लेने” के बहाने पूजा की जाँघ पर।  
धीरे से ऊपर सरकता हुआ।  
पूजा सिहर गई।  
उसकी साँसें तेज़ हो गईं।  
पर वो कुछ नहीं बोली।  
वो खुद को समझा रही थी –  
“शायद अनजाने में…”
अवस्थी मन में
“साली आज बहुत टाइट कुर्ता पहनी है…  निप्पल्स साफ़ दिख रहे हैं…  
आज इसे पूरा निपटा दूँगा… "
अवस्थी बोला-“पूजा बेटा, ऊपर वाली अलमारी में एक ज़रूरी बुक है… तुम ले आओ ना। मेरी कमर दुख रही है।”
पूजा उठी।  स्लिप पर चढ़ी।  
हर कदम पर उसकी गांड हिल रही थी।  
अवस्थी सर नीचे खड़े।  
उनका लंड पहले से तना हुआ।  
उनकी साँसें तेज़।
जब पूजा सबसे ऊपर पहुँची,  
कुर्ता कमर तक ऊपर उठ गया।  
पूरा कमर और गांड का निचला हिस्सा दिख रहा था।  
पैंटी की इलास्टिक भी।  
अवस्थी सर ने बोला मैं सहारा दे देता हूँ, अपने दोनों हाथ उसकी गांड पर रखे।  पूजा ने सोचा नहीं ज्यादा
और जान-बूझकर ज़ोर से दबाया।    
गांड का पूरा गोश्त उनके हाथों में था।
“आह्ह… सर…!!!”
पूजा की चूत में बिजली दौड़ गई।  
“ओह सॉरी सॉरी…मुझे लगा तुम गिर जाओगी क्या करू बुढा हु ना तो जोर ज्यादा लगाना पड़ता है, वैसे इन बूढ़ी हथेलियों में अभी भी जान है ना…?”

पूजा ने हँस दिया।  "है सर बिल्कुल है"
पर उसकी साँसें तेज़ थीं।  
नीचे उतरते वक्त।  
अवस्थी सर ने अपनी मोटी तर्जनी उंगली  
सीधे पूजा की गांड की दरार में घुसा दी।  
कपड़े के ऊपर से ही, पर इतनी ज़ोर से कि पूजा चीखी।
“आआआह्ह्ह…!!!!!”
बैलेंस बिगड़ा।  
पूजा सीधे अवस्थी सर के ऊपर गिरी।
उसके बूब्स अवस्थी सर के मुँह पर।  कपड़े के उपर से ही।
अवस्थी सर ने तुरंत मुँह खोला।  
एक निप्पल पूरा मुँह में।  
ज़ोर-ज़ोर से चूसा।  
दोनु हाथ से पूजा की गांड को और ज़ोर से दबाया।  
पूजा की सिसकियाँ निकल रही थीं।  
“आह्ह… सर… आह्ह… छोड़ो…”
पर उसका बदन काँप रहा था।  
अवस्थी मन में
“साली की चूचियाँ मेरे मुँह में… काश बीच मे कपड़े न होते
इसकी गांड मेरे हाथ में…  
अभी इसे यहीं चोद डालूँ…  
इसकी चूत फाड़ दूँ…
पूजा ने अचानक झटका दिया।  
खुद को अलग किया।  
उसका चेहरा लाल।  
निप्पल्स कीजगह पर गिला हो गया था।
अवस्थी बोला "सॉर्री, मैं संभाल नहीं पाया शायद इन बुढी हड्डियों मे इतनी जान नहीं है"
“सॉरी, मैं… मैं जाती हूँ…”
वो भागी।  
बिना कुछ बोले।
अवस्थी ने सोचा साला ज्यादा तो नहीं कर दिया। कहीं बुरा न मान ले।
हॉस्टल आके पूजा बेड पर गिर पड़ी।  
उसकी साँसें तेज़।  वो फूट-फूट कर रोने लगी।
“ये क्या हो रहा है मेरे साथ…?  सर जान-बूझकर कर रहे हैं…  मेरी गांड में उंगली…  मेरे बूब्स चूसे…  मैं सिसक रही थी…?  
छिः… छिः… कितने गंदे हैं सर। अब मैं उनके पास कभी नहीं जाऊंगी"
अवस्थी सर का घर  
अवस्थी सर अकेले।  बेड पर लेटे।  अपना लंड सहला रहे थे।  
पूजा के जिस्म को याद कर रहे थे।  उसके बूब्स का स्वाद।  
उसकी गांड की गर्मी।
अवस्थी मन में  
“आज तो बस शुरुआत थी…  साली की चूचियाँ मेरे मुँह में थीं…  
इतना मज़ा…  अगली बार इसे पूरी नंगी करूँगा…  इसकी चूत चाटूँगा…  
अपना लंड इसके मुँह में दूँगा…  फिर इसे घोड़ी बनाकर…  
इसकी चूत और गांड दोनों फाड़ दूँगा…”
और वो झड़ गए।  पूजा का नाम लेते हुए।
पूजा का कमरा ,पूजा बेड पर।  तकिया गले लगाकर।  रो रही थी।  
और खुद से पूछ रही थी –  
“अब मैं क्या करूँ…? ये क्या हुआ था इसमें किसकी गलती थी।”
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#57
कमरे में अकेले  
दरवाज़ा बंद।  
पूजा का मन दो हिस्सों में लड़ रहा था।
एक हिस्सा चीख रहा था –  
“ये क्या हो रहा है तेरे साथ…?  जिस सर की तू इतनी इज़्ज़त करती है…  वो तेरी गांड दबा रहे थे…  तेरे बूब्स चूस रहे…  छिः पूजा… छिः…!!!”
दूसरा हिस्सा खुद को समझा रहा था –  
“नहीं… नहीं…  सर तो बस सहारा दे रहे थे…  
इस उम्र में वो ऐसा थोड़े करेंगे…  बेचारे अकेले हैं…पत्नी गुज़र गई…  
20 साल से अकेले हैं…अगर करना होता तो दूसरी शादी कर लेते।
तू ही गलत सोच रही है…  सब तेरी गंदी सोच है…  सर तो कितने अच्छे हैं…  शरीफ हैं…  तू ही गलत है…”
और रोने लगी।
“नहीं पूजा… नहीं…  तू गलत नहीं सोचेगी…  सर अच्छे हैं…  
सब तेरी गलती है…  तू ही गंदी हो गई है…मुन्ना वाले हादसे के बाद तुझे ही सब बुरे लगने लगे हैं। "
और उस रात वो सोई नहीं।  
बस लेटी रही।  अपने आप से लड़ती रही।  
उसकी अपनी बनाई हुई सच्चाई से।
और सुबह फिर वही हुआ।  
वो उठी।  तैयार हुई।  
और फिर से अवस्थी सर के घर चली गई।  
क्योंकि अब वो खुद को समझा चुकी थी –  
“सर तो बस मदद कर रहे हैं…  तू ही गलत सोचती है…”
पूजा बस आँखें बंद करके चल रही थी।  
उस रास्ते पर…  
सोचते हुए
“शालिनी मैम…  मुझे माफ़ कर दो…  मैंने आपके पति पर शक किया…  
मैंने सोचा वो गलत हैं…  पर वो तो बस…मदद कर रहे थे
20 साल से अकेले…  आपको इतना प्यार करते हैं…  
हर साल फूल चढ़ाते हैं…  मैंने उनकी इज़्ज़त पर उँगली उठाई…  मैंने सोचा वो मुझे…  
पर वो तो बस मदद कर रहे थे…  सब मेरी गंदी सोच थी…  
मैं ही गंदी हूँ मैम…  मैं ही…  मैं ही पापी हूँ…”
पूजा दरवाज़े पर थी पूजा के मन में उथल पुथल थी। 
“मलाकल मैं बिना बोले भाग गई थी…  सर रात भर रोए होंगे…  
उनकी बीवी की फोटो को देखकर रोए होंगे… मैं कितनी स्वार्थी हूँ…  
मैंने उन्हें दुख दिया…  मुझे सॉरी बोलना ही पड़ेगा…  
वरना मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगी…”

अवस्थी मन में (दरवाज़ा खोलते ही)**  
“आ गई साली…क्या करने आई है बुरा तो नहीं लगा इसे ज्यादा कल। "
अवस्थी- "सॉर्री पूजा कल के लिए... वो"
 पूजा बात काट के  सॉरी बोलती है  
पूजा“सर… कल मैं… मैं बहुत गलत कर आई…  बिना कुछ बोले चली गई…  आपको बुरा लगा होगा…  मुझे बहुत शर्मिंदगी हो रही है…”
**अवस्थी (धीमी आवाज़ में, आँखें नम)**  
“कोई बात नहीं बेटा… मुझसे ही गलती हुई थी…  मुझे तुम्हें सँभालना चाहिए था… गलती से तुम मेरे ऊपर आ गिरी चोट तो नही लगी थी न”
पूजा बोली " नहीं सर गलती मेरी है आपको मेरी चिंता है और मुझे.....मुझे लगा आप मेरा फायदा उठा रहे हैं, ई am sorry सर"
अवस्थी मन में “ओहो तो साली को लगत हहै उसकी गलती है अभी थोड़ा acting करनी पड़ेगी। अब बस थोड़ा सा और…  बस थोड़ा सा और रोना है…  फिर ये खुद ही मेरे गले लग जाएगी…"
 अवस्थी का रोना शुरू  
वो अचानक दीवार की तरफ़ मुड़े।  
शालिनी की फोटो की तरफ़।  
और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे।
अवस्थी (रोते हुए) दर्द भरी आवाज़ में
“देखो शालिनी… देखो…  मैंने किसी को हाथ तक नहीं लगाया 20 साल में…  और आज ये मुझ पर इल्ज़ाम लगा रही है…  
कि मैंने जान-बूझकर…  जान-बूझकर छुआ है…  मैंने उसकी इज़्ज़त को हाथ लगाया है…  मैं मर क्यों नहीं जाता…”

अवस्थी का मन (रोते-रोते भी हँस रहा है)
“रो… और ज़ोर से रो…  ये देख… ये टूट रही है…  अब ये खुद ही बोलेगी – ‘मेरी गलती है’…  अब ये खुद ही मेरे पैरों में होगी…”
पूजा का मन (दिल टूट रहा है)“नहीं… नहीं…  मैंने सर को इतना दुख दिया…?  इनकी बीवी देख रही होगी…मुझे शर्मिंदा देख रही होगी…मैं कितनी नीच हूँ…  मैंने इनके साथ ऐसा सोचा…  मैं ही गंदी हूँ…मैं ही गलत हूँ…”
पूजा घुटनों पर  पूजा ज़मीन पर बैठ गई।  अवस्थी सर के पैर पकड़ लिए।  रोते-रोते।
पूजा (फूट-फूट कर)“सर… माफ़ कर दीजिए…  मैंने बहुत गलत सोचा… मैंने आपको गलत समझा…  मैं बहुत बुरी हूँ…  मेरी ही गंदी सोच है…  
मैंने ही आपको दुख पहुँचाया…  आप बिल्कुल साफ़ हैं…  आप तो मुझे बेटी जैसे मानते हैं…  मैंने ही… मैंने ही सब गलत किया…”
अवस्थी मैं में“हाँ… हाँ… रो…  अब तूने खुद ही कबूल कर लिया…  
अब तू मेरे सामने हमेशा झुकेगी…  अब तू खुद ही मेरे बेड पर आएगी…  खुद ही बोलेगी – ‘सर… मुझे सज़ा दो’…”
पूजा रोते-रोते घुटनों पर बैठ गई।  
अवस्थी सर को गले लगा लिया।  
बहुत ज़ोर से।  
उसके बूब्स उनके सीने पर दब गए।  
उसकी साँसें उनकी गर्दन पर।  
उसके आँसू उनके कुर्ते पर।

“सर… मैं सबसे गंदी लड़की हूँ…  मैंने आपके 20 साल के तप को कलंकित किया…  मैंने आपको राक्षस समझा…  जबकि आप तो भले मानुस हैं…आप जो कहें मैं करूँगी…  बस मुझे माफ़ कर दीजिए…  या… या आप जो चाहें वैसी बन जाऊँगी…खुब मेहनत करूँगी”
अवस्थी सर ने पूजा को और कसकर गले लगाया।  उनका चेहरा पूजा की गर्दन में।  होंठ उसकी नस पर।  हाथ उसकी कमर से नीचे।  
गांड पर।  पूजा अलग नहीं हुई। उसे पुरा भरोसा था अब अवस्थी पर। 
अवस्थी का मन “हो गया… अब ये मेरी गुलाम है…  खुद बोली – ‘आप जो चाहें वैसी बन जाऊँगी’…  अब अगली बार ये मेरे बेड पर होगी…  
और जब मैं इसका कुर्ता उतारूँगा…  तो ये रोएगी और बोलेगी – ‘सर… मैंने आपका दिल तोड़ा था…  अब आप मेरे बदन को तोड़ दो…  जैसा चाहें वैसा करो…’”
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#58
Excellent update and awesome story and waiting for next update
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#59
Hot....more please
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#60
Waiting for update
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