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Misc. Erotica गरम रोज
"आआआआआहहहह साली रंडी की औलाआआआआद मां की लौड़ीईईईईईईई....." कहते हुए मुझ पर पीछे से कुत्ते की तरह चिपक गया और फचफचा कर अपना गरमागरम वीर्य मेरी गान्ड में छोड़ने लगा। बाप रे बाप, कितना वीर्य छोड़ रहा था वह। फर्र फर्र करके मेरी गान्ड तो भर ही दिया और मेरी गान्ड के बाहर भी रिस कर निकल रहा था। इस उम्र में भी इन बूढ़ों में इतना वीर्य कहां से पैदा होता है यह सोचकर ही मैं अचंभित थी। खैर अंततः खल्लास हो ही गया और एक मुसीबत टली। मेरी गान्ड के अंदर अब मुझे एक अजीब तरह के खालीपन का अहसास हो रहा था। घनश्याम कुत्ते की तरह हांफते हुए बिस्तर पर एक तरफ लुढ़क गया था। मैंने सर घुमा कर उसकी ओर देखा तो पाया कि उसका शेर अब भीगी बिल्ली की तरह अपने ही वीर्य से लिथड़ा हुआ दुबका हुआ था और घनश्याम मुझे अबतक शान से (क्यों कि स्खलन से तात्कालिक तौर पर सुस्त पड़े मेरे शरीर में फिर से मानो जान आ चुकी थी) चुदती देख कर खिसियानी बिल्ली सा पड़ा हुआ था। मुझे यह देखकर थोड़ी घिन भी हो रही थी कि उसके लंड पर वीर्य के साथ थोड़ा पीला पीला मल भी लगा हुआ था और तभी मुझे अहसास हुआ कि इस हरामी का लंड न केवल मेरा मलद्वार को बल्राकि मल के रास्ते को भी खोल कर रख दिया था और मेरे पेट में मरोड़ सा उठने लगा था। हे भगवान, कहीं, चुदाई खत्म होते होते कहीं बिस्तर पर ही मेरा भर्र भर्र भुस्स न हो जाए। फिलहाल तो सिर्फ भुस्स भुस्स करके मेरे अंदर का गैस बाहर निकल रहा था। चूंकि अब मुझपर दुबारा चुदाई का भूत सवार हो चुका था इसलिए इस वक्त मेरी प्राथमिकता यही थी कि इस भूत को ही तृप्त करूं। मैं यह सोच ही रही थी कि,
"साला घंशू तो गया, ओओओओहहहहह बिटिया, मेरा तो हो ही नहीं रहा है, अब तू ही कुछ जोर लगा कि मेरा भी हो जाए।" भलोटिया हांफते हुए बोला।
"ठीक है मेरे प्यारे दादाजी, अब आपकी पोती निकालेगी आपका।" कहकर मैंने कमान पूरी तरह अपने हाथ में ले ली और उसके ऊपर उछलने लगी। उफ उफ, उसके मोटे लंड को अब मैं बड़े आराम से सर्र सर्र अपनी चूत में सरपट दौड़ाने लगी थी। बड़ा मज़ा आ रहा था। मैं पूरे जोश में थी लेकिन मेरा जोश बड़ी जल्दी ठंढा होने वाला था। मेरे इस नये जोश के आगे वह मोटा भालू ज्यादा देर टिक नहीं सका और फरफरा कर उसके लंड से फौवारा छूटने लगा।
"आआआआह मेरी बिटिया रानी, ओओओओहहहहह तू तो निकली बड़ी सयानी रेएएएएए आआआआआहहहह मां की लौड़ीईईईईईई, गया मैं गया।" कहते हुए फर्र फर्र करके करीब तीस सेकेंड तक फौवारा छोड़ता रहा साला खड़ूस, मादरचोद, कुत्ता कहीं का, बहुत बड़ा चुदक्कड़ बन रहा था हरामी। मुझे बीच मझधार में ही छोड़कर हांफते कांपते हथियार डाल दिया था। वह मुझसे चिपक कर स्थिर रहना चाहता था लेकिन अभी मैं चुदाई के जोश में रुकना नहीं चाहती थी। लेकिन आखिर कब तक। मुझे बड़ी कोफ्त हो रही थी क्योंकि उसका उतना लंबा और मोटा लंड धीरे धीरे छुहारे की शक्ल अख्तियार करने लगा था। मैं ने अपने मन की निराशा को प्रकट नहीं होने दिया और बड़े बेमन से उसके ऊपर से उठने लगी। मुंह से भले ही में कुछ बोली नहीं लेकिन मेरे शरीर की भाषा भलोटिया जैसे खेले खाए औरतखोर से छिपी न रह सकी। वह खिसियाया हुआ था क्योंकि उसे पता था कि मेरे स्खलन से पहले ही उसका पानी निकल गया था और अब चुदाई जारी रखना उस जैसे बुढ़ऊ के वश की बात नहीं थी।
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"बिटिया तू बड़ी मस्त चीज है। तूने तो हमारा दिल खुश कर दिया, लेकिन मुझे लगता है तुम्हारा हुआ नहीं है। दुखी मत हो, हम बूढ़ों को खुश करके जो पुण्य तुमने कमाया है, उसका भरपूर पुरस्कार अवश्य देना चाहूंगा। अरे घंशू, जरा कल्लू को फोन करके बुला ले, हमारी बिटिया को उसके इस पुण्य कार्य का पुरस्कार तो बनता ही है।" भलोटिया अपनी सांसों पर काबू पाकर घनश्याम को संबोधित करते हुए बोला। मेरा दिल उछल कर मानो हलक तक आ पहुंचा। हे भगवान! इन दोनों के बाद अब वह कल्लू मुस्टंडा। इस वक्त मेरे अंदर जो कामुकता की ज्वाला भड़क रही थी, ऐसी हालत में चर्मोत्कर्ष तक पहुंचने से पहले ही इन बूढ़ों का समर्पण कर देना मेरे लिए सचमुच असहनीय था और मैं भीतर ही भीतर पगलाई जा रही थी फिर भी इन दोनों के निपटने के बाद अब मुझे चोदने के लिए उस हब्शी दैत्य को बुलाने की बात सुनकर मुझे ऐसा लगने लगा जैसे सचमुच मैं रंडी कुतिया बना दी गई हूं। यह सच ही तो था। लेकिन चुदास की मारी मुझे इस घटिया, घृणित लगने वाली भूमिका को भी निभाने में इस वक्त कोई ऐतराज नहीं था। मुझे तो बस कैसे भी करके अपने तन में लगी आग बुझाने से मतलब था, वरना मैं पागल ही हो जाती। बड़े अनमने ढंग से और अनिच्छा से घनश्याम को कल्लू को बुलाने के लिए बाध्य होना पड़ा। उधर कल्लू को तो शायद ऐसी परिस्थितियों से अक्सर ही पाला पड़ता था। घनश्याम के मुंह से भलोटिया का संदेश मिलने के मिनट भर के अंदर किसी भूत की तरह कल्लू प्रकट हो गया और आते ही उसे यहां की परिस्थिति को समझते देर नहीं लगी। ऐसी परिस्थितियों से शायद वह पूरी तरह परिचित था और शायद उसे अच्छी तरह से पता था कि ऐसे समय में उसकी भूमिका क्या होती है लेकिन मुझ जैसी कमसिन लड़की को देख कर शायद वह थोड़ा झिझक कर ठिठक गया था। मुझे घनश्याम के साथ आते हुए देखा तो था लेकिन उसे लगा था होगा कि मुझे घनश्याम जबरदस्ती ले कर आया था और अबतक मेरी दुर्गति हो चुकी होगी।
"अरे कल्लू, तुझे क्या सांप सूंघ गया है? ऐसे क्या देख रहा है, इससे पहले ऐसी लौंडिया नहीं देखी है क्या?" भलोटिया उसकी स्थिति देखकर बोला।
"नहीं साहब जी, ऐसी बात नहीं है।" कल्लू जैसे नींद से जागकर हड़बड़ा गया था।
"तो फिर सोच क्या रहा है? अब तुझे निमंत्रण पत्र देना होगा मां के लौड़ू?" भलोटिया झल्ला कर बोला।
"इतनी कम उम्र की लड़की...." बोलते बोलते कल्लू रुका। उसकी आवाज में झिझक थी। यहां आया तो अवश्य था लेकिन वह सोचा था होगा कि मेरी दुर्गति हो चुकी होगी।
"साला चूतिया, इसकी उम्र दिखाई दे रही है तुझे? यह दिखाई नहीं दे रहा है कि हम बूढ़ों को जन्नत की सैर करा कर अब और लंड खाने के लिए मरी रही है?" भलोटिया उसे एक तरह से डांटते हुए बोला। डांट खाने वाला काम किया ही था। सबकुछ तो साफ साफ दिखाई दे रहा था कि दो दो बुड्ढे मुझे चोद कर निपट गये थे और नंग धड़ंग अवस्था में बिस्तर पर पसर कर भैंसों की तरह हांफ रहे थे। मैं सफलतापूर्वक उनके लंडों को निचोड़ कर भीगे चूहों की शक्ल में तब्दील कर चुकी थी। भलोटिया गलत नहीं बोल रहा था। उसकी बात और वहां की स्थिति से साफ हो गया था कि उसकी झिझक बेमानी थी। मेरा चेहरा भी बता रहा था कि मैं इस वक्त सचमुच चुदने को बेकरार हूं। पल भर भी नहीं लगा और उसके पैंट का अगला हिस्सा फूल गया था।
"अगर यह मरी जा रही है तो मैं किस मर्ज की दवा हूं। अभी लीजिए।" कहकर वह आनन फानन अपने कपड़ों से मुक्त होने की जद्दोजहद में लग गया। मैं क्या नहीं जानती थी कि जब मैं घनश्याम के साथ अंदर आ रही थी तो मुझे देख कर उसके मन में क्या भावना उत्पन्न हुई होगी? भलोटिया किस तरह का आदमी है वह क्या उससे छिपा हुआ था? भलोटिया के यहां ऐसे स्थानों में जिन महिलाओं को लाया जाता होगा, उनके साथ क्या होता होगा, उसके अंगरक्षक होने के कारण अच्छी तरह से पता होगा। अब मुझ जैसी कमसिन कन्या को घनश्याम के साथ आते हुए देखकर वह तो चकित ही रह गया होगा कि साला बुढ़ऊ की किस्मत में ऐसी लौंडिया कैसे लिखी गई है। मुझे वहां लाए जाने का उद्देश्य से भलि भांति परिचित था। वह तो भगवान से मना रहा था होगा कि काश इन बूढ़ों से मैं सही सलामत निपट जाऊं। उसके बाद तो उनकी जूठन में मुंह मारने का अवसर मिलना तय था। शायद यही उसकी भूमिका भी रहती थी, और देखो, जैसे बिल्ली के भाग से छींका टूटा। मैं एक सुंदर कमसिन कन्या उसके सामने उसकी मनोकामना पूर्ण करने हेतु प्रस्तुत थी। कल्लू के काले चेहरे पर प्रसन्नता के भाव को स्पष्ट देख रही थी।
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जैसे जैसे उसके शरीर से कपड़े खुलते जा रहे थे, उसकी गठी हुई काली काया अपने ज़लाल के साथ प्रकट होती जा रही थी। जब उसका पैंट खुला तो उसके कसे हुए जांघिये मे कैद नाग अकड़ कर विशाल तंबू की शक्ल अख्तियार कर चुका था। बड़ी मुश्किल से उसने अपने हथियार को जंघिए की कैद से आजाद किया और लो, मेरे सामने एक काला कलूटा, कसे हुए शरीर वाला कद्दावर दैत्य पूरी तरह नंगा, मुझे चोदने को बेकरार खड़ा था। उसे देख कर मेरा शरीर सनसना उठा। दो दो बूढ़े मुझे चोद कर निपट चुके थे लेकिन मुझे मंजिल से पहुंचने से पहले ही बीच मझधार में छोड़, हथियार डाल कर मुझे इस दैत्य के आगे परोस कर मानो अपनी शर्मिंदगी से निजात पाना चाह रहे थे। लंड चाहे कितना भी लंबा और मोटा हो, लेकिन एक स्त्री की भूख शांत न कर सके तो ऐसा लंड किस काम का। अब मेरे सामने यह काला कलूटा दैत्य, मेरा तारणहार बन कर उद्धार करने हेतु कामदेव का अवतार बन कर प्रकट हुआ था, प्रथमदृष्टया तो पूरी तरह सक्षम चुदक्कड़ दिखाई दे रहा था। लंबा कद और गजब का गठा हुआ शरीर था उसका। अपने शरीर के अनुपात में ही उसका लंबा लंड किसी गधे के लंड से कम नहीं था। कोयले की तरह काले लंड के आगे का चमड़ा पलटा हुआ था और उसका गुलाबी सुपाड़ा चमचमा रहा था। चुदने को बेकरार एक महिला के लिए एक आदर्श मर्द दिखाई दे रहा था लेकिन वह कितने पानी में था यह तो आगे पता चलने वाला था। हालांकि मेरी चूत और गांड़ को चोद चोद कर इन कमीनों ने सुजा कर रख दिया था लेकिन मेरी चुदास ज्यों की त्यों बरकरार थी। दूसरी बार मुझपर जो उत्तेजना का बुखार चढ़ा वह तो मुझे तपा तपा कर मानो मेरे प्राण ही हर लेने वाला था। हे भगवान, इस राक्षस में इतनी शक्ति दे देना कि मुझ प्यासी को भरपूर तृप्ति प्रदान करने में सक्षम हो, यही कामना करते हुए मैं उसके सम्मुख समर्पण करने को तैयार हो गई।
इससे पहले कि कल्लू मुझे चोदना शुरू करता, मैंने अपने अगल बगल दृष्टि घुमाई तो पाया कि भलोटिया और घनश्याम उसी तरह नंग धड़ंग अवस्था में मेरी चुदाई देखने को उत्सुक दिखाई दे रहे थे। भलोटिया तो अभी तक बिस्तर पर भैंस की तरह पसरा हुआ था लेकिन घनश्याम उठकर सोफे पर जाकर बैठ गया था। मैंने देखा कि घनश्याम के सिकुड़े लंड पर अब भी मेरी गुदा से निकला पीला मल लिथड़ा हुआ था जिसे धो कर साफ़ करने का भी उसे होश नहीं था, सूअर कहीं का। मुझे उसे देख कर घिन आ रही थी। मैं जानती थी कि मेरी गुदा से भी उसके वीर्य से लिथड़ा मल अभी भी रिस रिस कर बाहर निकल रहा था जिसके कारण मुझे भी खुद को धो पोंछ कर साफ होने की आवश्यकता थी लेकिन उस गंदगी से घृणा होने के बदले मुझ पर मेरी भड़कती चुदास हावी थी। मुझे अपनी गंदगी की इस वक्त रत्ती भर भी परवाह नहीं थी और न ही बिस्तर के गंदा होने की। भाड़ में जाए बिस्तर, जब भलोटिया और घनश्याम को उस गंदगी से कोई परहेज नहीं था तो मैं तो ठहरी चुदास की मारी लंडखोर (क्योंकि अब मैं सचमुच एक बड़ी ल़डखोर में तब्दील होती जा रही थी और इस वक्त तो जैसे रेगिस्तान में जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी, मैं क्यों परवाह करती)। हां थोड़ी भयभीत अवश्य हो रही थी कि यह कल्लू, जैसा कि वह शारीरिक रूप से दिखाई दे रहा था, पता नहीं कितनी जबरदस्त कुटाई करने वाला था। जानती थी कि उसके मन में क्या चल रहा है और मैं खुद भी चुदने के लिए मरी जा रही थी फिर भी अपने मुंह से बोल कर प्रकट नहीं करना चाहती थी। इससे मेरी छिनाल वाली छवि उजागर जो हो जाती। मैं उस परिस्थिति में भी अपना विरोध व्यक्त करते हुए बोली,
"नहीं नहीं, आपलोगों ने मुझे समझ क्या रखा है? मैं कोई बाजारू महिला हूं क्या कि कोई भी मेरे साथ कुछ भी कर ले?"
"साली रंडी की औलाद, तू तो बाजारू औरत से भी गयी गुजरी है। इतना कुकर्म करके भी शराफत का दिखावा कर रही है हरामजादी। इसकी बात पर मत जाओ कल्लू। भीतर ही भीतर चुदने के लिए मरी जा रही है और मुंह से शराफत झाड़ने से बाज नहीं आ रही है कुतिया। चोद मां की लौड़ी को।" घनश्याम मेरी बात सुनकर डपटते हुए बोला। कमीना सचमुच में मनोवैज्ञानिक था। मेरे भीतर की भावना को ताड़ लिया था इसलिए अपने उद्देश्य की असफलता पर तनिक खीझ रहा था और उसकी आवाज में तनिक रुखाई भी थी।
"हम तो तुम्हारे भले के लिए कल्लू को बुलाए थे। तुम्हारी मर्जी नहीं है तो हम मना कर देते हैं।" भलोटिया बोल उठा। उसकी बात सुनकर मैं सहम गई, कहीं सचमुच मुंह के पास आया हुआ यह लजीज व्यंजन मुझ भूखी के पास से हटा न लिया जाए। झट से बोली,
"मेरा भला किस चीज में है यह आपने खुद ही तय कर लिया और बिना मुझ से पूछे इस कल्लू चाचा को यहां बुला लिया, इसी बात से नाराज़ हूं मैं। इनको बुलाने के पीछे आपका उद्देश्य क्या है यह न इनसे छिपा है और न ही मुझसे तो अब इन्हें मना करने का क्या तुक है। आईए चाचाजी आप भी बहती गंगा में हाथ धो लीजिए।" मैं अपनी आवाज में थोड़ी नाराजगी दिखाते हुए बोली। हालांकि मेरे कथन में कल्लू के लिए आमंत्रण स्पष्ट था। मैं ने भी अब खुला खेल फर्रूखाबादी खेलने का फैसला कर लिया था। जब चुदना ही है तो रोते कलपते चुदने का क्या फायदा। क्यों ना खुल कर चुदने का लुत्फ लिया जाए, रंडी तो बन ही चुकी हूं तो क्यों न अपनी रंडीपन भी दिखा ही दूं।
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❤️❤️❤️❤️❤️
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रेखा के दो ब्वॉयफ्रेंड्स में एक * लड़का भी था और उसने एक बार बताया भी था कि चमड़ा कटे हुए लंड से चुदने का अलग ही मजा मिलता है। अभी जब कल्लू के चमड़ा कटे हुए लंड का चमचमाता विशाल लंड का दर्शन हुआ तो मैं सर से पांव तक सनसना उठी। पहली बार ऐसे लंड का दर्शन कर रही थी। अद्भुत, अद्वितीय, लोमहर्षक दृश्य था वह। उसके लंड के ऊपर उभरे हुए नसों के कारण थोड़ा भयावह भी था। लेकिन जो भी था, इस वक्त मुझे एक दमदार लंड से चुदाई की बेहद जरूरत थी। वाह, इसे कहते हैं किस्मत। बैठे बिठाए कटे हुए लंड से चुदने का मजा मिलने वाला था और वह भी बड़े उपयुक्त अवसर पर। हालांकि यहां दो दो कामुक बूढ़े दर्शक बने मौजूद थे लेकिन मुझे परवाह नहीं थी।
"जैसी आप सबकी मर्जी।" कहकर कल्लू मेरी ओर आगे बढ़ा। आगे बढ़ते समय उसके हर कदम के साथ उसका तना हुआ लंड पूरे जलाल के साथ झूम रहा था। बड़ा दिलकश नज़ारा था। मेरी चूत फड़क उठी थी। ज्यों ज्यों वह पास आता जा रहा था, उसकी दृष्टि में अजीब सी चमक बढ़ती जा रही थी। शायद आज से पहले मुझ जैसी कमसिन कन्या उसे नसीब नहीं हुई थी। कभी मेरे चेहरे को देखता, कभी मेरी चूचियों को देखता और कभी चुद चुद कर फूली हुई चिकनी रसीली चूत को देखता। मेरी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। दिल धाड़ धाड़ धड़क रहा था। जब वह बिल्कुल मेरे पास पहुंचा, तो उसके चेहरे का भाव बिल्कुल बदल चुका था। वह बिल्कुल किसी शिकारी कुत्ते की तरह मुझे भंभोड़ डालने को आतुर दिखाई दे रहा था। एक पल को तो मैं भी सहम गई थी लेकिन चुदने की चाह में कुछ भी झेलने को तैयार हो गई। सहसा वह मुझ पर पागलों की तरह टूट पड़ा और बेतहाशा मेरे रसीले होंठों को चूसने लगा और साथ ही मेरी चूचियों को अपने पंजों में दबोच कर मसलना शुरू कर दिया।
ओह ओह, बड़ी बेसब्री दिखा रहा था वह, साथ ही साथ अपनी पाशविक प्रवृत्ति का परिचय भी दे रहा था। बड़ी बेरहमी से मेरी चूचियों को मसलने लगा था। मैं आह भी नहीं निकाल सकती थी, मेरे होंठ जो उसके होंठों के कब्जे में थे। मैं छटपटा रही थी और वह मुझपर हावी होता जा रहा था। मैं सचमुच थोड़ी सहम सी गई थी। उसके दैत्याकार शरीर के नीचे मैं पिसती हुई बेबसी में हाथ पैर मारने लगी लेकिन अब मेरे छटपटाने के फलस्वरूप फैली हुई मेरी जांघों के बीच वह आ चुका था। मैं बिल्कुल बेबस थी और मेरे विरोध करने का शारीरिक श्रम व्यर्थ समझ कर जो कुछ मेरे साथ हो रहा था उसे स्वीकार करना ही मैंने उचित समझा। मैं ने छटपटाने का प्रयास करना भी बंद कर दिया। मेरी स्थिति को दोनों बूढ़े बड़े मजे ले कर देख रहे थे। खासकर घनश्याम को तो बड़ा सुकून मिल रहा था होगा कि चलो जो प्रताड़ना देने में वह असफल रहा था उसकी भरपाई कल्लू कर रहा था।
कल्लू कुछ देर मेरे होंठों का रस चूसने के बाद मेरे होंठों को मुक्त किया। मुझे लग रहा था जैसे मेरे रक्तिम होंठ और लाल हो कर आगे की ओर उभर आए हों। तभी उसने मेरी चूचियों को मसलना बंद किया लेकिन यह क्षणिक राहत थी। दरअसल जो हमला उसने अपने मुंह से मेरे होंठों पर बोला था, वह हमला अब मेरी चूचियों पर होने वाला था। आआआआह ओओओओहहहहह जैसे ही उसने मेरी एक चूची पर मुंह लगाया, मेरे मुक्त मुंह से बरबस ही सिसकारी निकल पड़ी। उसके होंठों का स्पर्श ज्यों ही मेरी चूची पर हुआ, बेसाख्ता यह सिसकारी निकली थी। यह स्पर्श मुझे राहत भी प्रदान करने वाला था साथ ही मेरे अंदर की कामुकता को हवा देने वाला भी था।
"शाबाश मेरे शेर।" यह भलोटिया की आवाज थी। साला कमीना मोटू।
"बड़ी जबरदस्त चीज लाये हैं सर जी।" कल्लू सर उठा कर बोला।
"सब घंशू की कृपा है। ऐसी मस्त बुरचोदी बिटिया भगवान सबको दे।" भलोटिया बोला। कितना घटिया और घृणित बात थी यह लेकिन उसकी बात सुनकर मैं और भी ज्यादा उत्तेजित हो गई।
"इस उम्र में इतना बड़ा बड़ा मस्त चूची! गजब है गुरूजी।" कल्लू बोला।
"साला प्रशंसा करना बंद कर मादरचोद और निचोड़ निचोड़ कर चोद मां के लौड़े।" घनश्याम तिक्त स्वर में बोला। उसे कल्लू के मुंह से मेरी प्रशंसा अखर गई थी। उसकी बात सुनकर जहां मुझे गुस्सा आया वहीं मुझे मजा भी आया कि वह चिढ़ रहा था।
"जो सच है वही तो बोला। तुम बेवजह बिटिया पर खीझ को कल्लू पर दिखा रहे हो।" भलोटिया बोला तो घनश्याम खिसिया कर रह गया। इधर अब कल्लू पहले किसी कुत्ते की तरह मेरी चूचियों को चाटने लगा। ओह ओह मैं पगलाई जा रही थी। चाटने के बाद वह अपने मुंह मुंह भर भर कर मेरी चूचियों को जोर जोर से किसी भुक्खड़ की तरह चूसने लगा। इस्स्स्स इस्स्स्स यह कल्लू तो मुझे तड़पा कर मार ही डालने पर आमादा था। इसी दौरान मैंने महसूस किया कि मेरी चूत पर उसके गरमागरम मूसल का स्पर्श हुआ। मैं सर से पांव तक गनगना गई। इसी पल का तो बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रही थी मैं। लेकिन कल्लू बड़ा धूर्त था। वह धीरे-धीरे मेरी चूत के ऊपर अपना लंड ऊपर ही ऊपर घिसने लगा था। मेरे अंदर आग धधकने लगी थी। यह हरामी सूअर का बच्चा सीधे अपना लंड पेल क्यों नहीं दे रहा है? यह मेरे सब्र का इम्तिहान था। सहसा कल्लू मेरी चूचियों को चूसना छोड़ कर मेरे चेहरे को देखने लगा। मैं समझ गई कि मेरी चूत पर अपने लंड के घर्षण की प्रतिक्रिया देख रहा था। उत्तेजना के मारे मेरा चेहरा लाल भभूका हो गया था, जिसे देखकर वह मुस्करा रहा था।
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"अबे खाली खेलता ही रहेगा कि चोदेगा भी।" विलंब होता देख कर भलोटिया से रहा नहीं जा रहा था।
"खाना गरम कर रहे हैं गुरूजी।" कल्लू उसी तरह मुस्कुरा कर बोला। उसकी बात सुनकर मुझे बड़ा गुस्सा आ रहा था। साला बड़ा आया गरम करने वाला। गरम करने के चक्कर में खाना जल रहा है इसका भी होश नहीं था उसे। यह मेरे सब्र की इंतहा थी।
सहसा न जाने मुझ पर क्या पागलपन सवार हुआ कि जैसे ही मुझे अहसास हुआ कि उसका लंड मेरी चूत के मुंह के सामने आ गया है, मैंने अपनी कमर ऊपर उछाल दी। यह जोखिम भरा कदम था लेकिन मैं तो पगलाई हुई थी। एक ही झटके में कल्लू का आधा लंड मेरी चूत को चीरता हुआ अन्दर दाखिल हो गया। पनियायी हुई चूत थी। घुस गया अंदर। उसी के साथ मेरी चीख भी निकल गई। जी हां, पीड़ा से। जैसी करनी वैसी भरनी। मैं झट से उसके लंड से मुक्त होना चाह रही थी लेकिन कल्लू तो मानो इसी पल का इंतजार कर रहा था। ऐसे कैसे निकलने देता। उसने मुझे दबोच कर अपनी ओर से और एक करारा धक्का लगा दिया।
"आआआआआआहहहह मर गईईईईईईईईई...... निकाल निकाल आआआआआहहहह......." मैं फिर से चीख पड़ी।
"ऐसे कैसे निकाल सकते हैं मेरी छम्मक छल्लो। लिया तुम्हीं ने है।हा हा हा हा।" वह दानव पूरा जड़ तक लंड पेल चुका था। मैं पीड़ा से बिलबिला रही थी लेकिन कल्लू भी कम बड़ा चुदक्कड़ नहीं था। पूरा ठोंक कर रुक गया और मेरी चूत की गहराई का आनंद लेने लगा था। मैंने कल्लू के लंड को भलोटिया की तुलना में कम आंकने की ग़लती की थी। अब पता चल रहा था कि यह गलती कितनी महंगी साबित हो रही थी। उसका लंड मेरी कोख तक जा पहुंचा था इसलिए मुझे अंदर भी दर्द हो रहा था। लेकिन मैं यह भी जानती थी इस पीड़ा के उस पार आनंद ही आनंद मिलने वाला था। इसलिए मैं दांत भींचकर उस पीड़ा को पीने लगी थी। पहले भी ऐसी स्थिति से दो चार हो चुकी थी इसलिए मेरा अंदाजा गलत नहीं हो सकता था। मैं उसके नीचे दबी हुई हलकान हुई जा रही थी। सच में कुछ पलों बाद ही जैसे सारी पीड़ा न जाने कहां छूमंतर हो गई थी।
"बहुत बढ़िया" घनश्याम मेरी हालत से खुश होकर बोला। उसे क्या पता था कि उसने यह बोलने में थोड़ी देर कर दी थी। अब तो सचमुच उसका कथन मेरे लिए भी लागू हो रहा था। सचमुच बहुत बढ़िया हुआ मेरे लिए भी। मुझे अपने अंदर परिपूर्णता का अहसास होने लगा। एक बाहरी अंग अब मेरे अंदर समा कर मानो मेरे शरीर का ही हिस्सा बन गया था। अब मुझ उस अंग में हरकत की चाहत थी‌। एक हलचल की जरूरत थी। अब कल्लू का रुकना मुझे अखरने लगा था।
"अब रुके काहे चाचा जी‌।" मैं बेसाख्ता बोल उठी। मेरी लरजती आवाज़ में एक अबूझ, एक अजीब सी कसक थी। काम क्षुधा की तड़प थी।
"यह हुई ना बात।" कल्लू प्रसन्न हो उठा। मेरे अंदर के आग की तपिश को महसूस कर चुका था वह।
"यही खासियत है इस लड़की में।" भलोटिया बोला।
"हां सर जी। वह तो पता चल ही गया। कमसिन संगमरमरी देह, सख़्त चूंचियां। कसी हुई, चमचमाती गरमागरम चूत और सबसे मजेदार चीज यह है कि साली चुदने के लिए मरी जा रही, चुदास के मारे बेहाल लौंडी। यह लौंडिया तो मनमाफिक चोदने के लिए एकदम फिट है।" कल्लू उद्गार निकाल बैठा और घनश्याम के ऊपर तो मानो घड़ों पानी पड़ गया। कल्लू की तो निकल पड़ी थी। मेरी चूत की गहराई में डूबा कल्लू का मूसल मेरे अंदर की गरमी को अच्छी तरह से महसूस कर रहा था। चकित भी था और मुदित भी था यह महसूस करके कि मुझ जैसी इतनी कम उम्र की लड़की के अंदर ऐसी आग भी है। वह अब मुझे चोदने के लिए अच्छी पोजीशन लेने लगा। उसने मेरी टांगों को ऊपर उठा कर लिया और अपने लंड के प्रहार के लिए मेरी चूत को सहूलियत भरे अवस्था में ले आया। अब शुरू हुआ।
आह, उसका लंड का मेरी चूत की अंदरूनी दीवारों को रगड़ता हुआ धीरे-धीरे सरकता सरकता बाहर निकल रहा था। अभी करीब एक दो इंच अन्दर ही था कि दुबारा उसी धीमी रफ्तार से अंदर घुसने लगा। ओह ओह मेरी मां, कितना सुखद था वह घर्षण। मेरा रोम-रोम तरंगित हो उठा था। फिर वही क्रिया दोहराई जाने लगी तो धीरे-धीरे मैं दूसरी दुनिया की ओर बढ़ने लगी। ओह वह सुखद स्वर्गीय अहसास। मैं उसके शरीर से चिपकने की चेष्टा करने लगी लेकिन जिस पोजीशन में वह मुझे चोद रहा था उसमें यह संभव नहीं था। उसके शरीर से पसीने की बदबू आ रही थी लेकिन वह बदबू भी मुझे प्रिय लग रहा था। उस पसीने की बदबू से मुझ पर अजीब तरह का नशा चढ़ रहा था। धीरे-धीरे धीरे-धीरे उसके चोदने की रफ्तार बढ़ने लगी। उतना लंबा और मोटा कालिया नाग सर्र सर्र मेरी चूत में अंदर बाहर हो रहा था। ओह ओह, खतना किया हुआ लंड बिना किसी प्रकार की तकलीफ़ दिए इतनी सुगमतापूर्वक मेरी चूत में उधम मचा रहा था कि पूछिए ही मत। उसी पोजीशन में चोदते हुए वह मेरी चूचियों को भी चूसता जा रहा था। यह दोहरी उत्तेजक हरकत से मैं इतनी जल्दी चर्मोत्कर्ष में पहुंच गयी जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।
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"आआआआआहहहह मांआंआंआंआं ओओओओहहहहह... ‌‌" मैं थरथराती हुई स्खलन के सुख सागर में डूबती चली गई। मेरी हालत से अनभिज्ञ नहीं था कल्लू, लेकिन उसने तो अभी चोदना शुरू ही किया था। उसने चोदने की रफ्तार दुगुनी कर दी। इस दौरान मेरी चूचियों से खिलवाड़ करना, दबाना और चूसना बदस्तूर जारी था। परिणाम यह हुआ कि पांच मिनट होते न होते कामुक हरकतों से मेरे शरीर में पुनः मेरे बेजान शरीर में नवजीवन का संचार हो गया और मेरी कमर खुद ब खुद उछल उछल कर मेरी चूत को लंड खाने में सहयोग प्रदान करने लगी।
"आह आह आह, गुरूजी लौंडिया तो बहुत बड़ी लंडखोर है। साली कैसे गप्प गप्प खाए जा रही है।" कल्लू मुदित मन चोदता हुआ बोला।
"हम दोनों को निचोड़ चुकी है साले। अब तुम्हारी बारी है। देखते हैं तुम निचोड़ते हो या यह तुम्हें भी निचोड़ती है। अब दिखा असली दम।" भलोटिया जहां कल्लू द्वारा मेरी प्रशंसा का समर्थन कर रहा था वहीं कल्लू को ताव भी दिला रहा था जिसका नतीजा यह हुआ कि कल्लू अपने पूरे दमखम के साथ मुझे निचोड़ निचोड़ कर चोदने लगा। उफ उफ यह चुदाई मेरे लिए यादगार हो रही थी। उसके असीमित शक्ति के आगे मैं भी पानी मांगने को विवश हो गई। क्या भयानक रफ्तार से भकाभक चोद रहा था वह। मुझे दिन में ही तारे दिखाई देने लगा था। वह कमरा फच फच चट चट की आवाज से गूंजने लगा था। जहां मेरी चूत की चटनी बन रही थी वहीं उसके पंजों से मेरी कठोर चूचियों का मलीदा बन रहा था। पीड़ा हो रही थी लेकिन उस पीड़ा में अजीब तरह का आनंद मिल रहा था।
"ओह चाचाजी, ओह चच्चा, ओह जरा धीरे कीजिए ना, आह आह ...." मैं मस्ती में भर कर हांफती हुई बोली।
"वाह मेरी बच्ची, धीरे करने को काहे बोल रही हो, तू तो बड़ी गरम माल निकली, धीरे धीरे करके न हमको मजा मिलेगा न तुमको।" वह भी हांफते हुए बोला लेकिन अपने चोदने की रफ्तार में जरा भी कमी नहीं आने दिया। बस भच्च भच्च, फच्च फच्च पेलता रहा पेलता रहा। मुझे किसी खिलौने की तरह जैसा मर्जी वैसा पेलता रहा। टांगें उठाकर पेलते हुए मन नहीं भरा तो पलट कर कुतिया बना दिया।
"यह कककक्या ......." मैं उसकी मर्जी समझ गई थी। अब वह मुझे कुतिया बना कर चोदना चाहता था। चुदने की चाहत तो थी, क्योंकि अब मैं दूसरी बार उत्तेजित होकर चुदाई का मजा ले रही थी। लेकिन मेरे शरीर में अब और ताकत नहीं बची थी कि हाथों और घुटनों के बल पर कुतिया बनूं।
"अब पिच्छे से।" वह मेरी कमर पकड़ कर मेरी चूतड़ को ऊपर उठा लिया। भले ही मेरे घुटनों में थोड़ी जान थी लेकिन मेरे हाथों की शक्ति क्षीण हो गई थी इसलिए मैंने बिस्तर पर सिर टिका दिया लेकिन मेरी चूतड़ उठी हुई थी। इस पोजीशन में तो मेरी चूत चोदने के लिए बेहतर तरीके सी उपलब्ध थी।
"अरे सर काहे नीचे रखी। हाथ का सहारा ले।" कल्लू बोला।
"हाथ थक गया चच्चा।" मैं अपनी असमर्थता जताई। "अच्छा कोई बात नहीं। यह पोजीशन भी बढ़िया है।" कल्लू बोला और पोजीशन में उसने अपना लौड़ा मेरी चूत पर टिकाया और पीछे से कुत्ते की तरह शुरू हो गया। एक ही झटके में उसने अपना लंड भक्क से मेरी चूत में उतार दिया।
"ओओओओहहहहह मांआंआंआंआंआं...." इस पोजीशन में कल्लू ने एक ही झटके में अपना पूरा लंड मेरी चूत की पूरी गहराई में उतार दिया था। यह थोड़ा दर्दनाक था लेकिन ऐसी कामवासना के खेल में इस प्रकार की थोड़ी बहुत पीड़ा को नजरंदाज करने में ही भलाई है। यह मेरा पिछले अनुभवों ने सिखा दिया था। लेकिन पहले झटके की पीड़ा से बेसाख्ता मेरे मुंह से अनचाहे ही आह निकल गई थी।
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