13-12-2024, 09:54 PM
more please. give her to some sweepers, rikshwa pullers please.
Misc. Erotica गरम रोज
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13-12-2024, 09:54 PM
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29-12-2024, 06:33 PM
कल्लू ने जब दरवाजा खोला तो घनश्याम मुझे खींचता हुआ अंदर ले जाने लगा तभी मैंने तिरछी नजरों से कल्लू की ओर देखा तो पाया कि वह बड़ी हसरत भरी नज़रों से मुझे देख रहा था और अनायास ही उसका हाथ अपने पैंट के अगले हिस्से पर गया और पैंट के ऊपर से ही अपना लंड सहलाने लगा था। मैं तो पानी पानी हो गई। घनश्याम का ध्यान इस ओर नहीं था, उसका ध्यान तो बस भलोटिया के पास पहुंचने पर था कि मुझ जैसी नायाब तोहफा को कितनी जल्दी उसकी झोली पर डाल कर उसे खुश कर सके। मैं घनश्याम को यह अहसास नहीं दिलाना चाहती थी कि मैं मन ही मन भलोटिया की गोद में गिरने को तैयार हो चुकी थी। घनश्याम मुझे जबरदस्ती खींच कर लिए जा रहा था और मैं खिंची चली जा रही थी।
"मेरे साथ इस तरह की जबर्दस्ती अच्छी बात नहीं है। तुम मुझे इस तरह किसी अजनबी मर्द की गोद में नहीं डाल सकते।" मैं विरोध करती हुई बोली। "तुम्हारे विरोध की मुझे कोई परवाह नहीं है। मेरी बात माने बिना तुम यहां से छूट कर नहीं जा सकती, इसलिए अच्छा यही होगा कि चुपचाप मेरी इच्छा का सम्मान करो और भलोटिया को खुश कर दो।" वह मुझे खींचता हुआ उसी तिलस्मी मार्ग पर लिए जा रहा था। उस तहखाने के दरवाजे पर पहुंचते ही मेरे दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं। पता नहीं भालू या भलोटिया, जो भी हो, कैसा आदमी होगा। सभ्य या असभ्य आदमी होगा। जैसा मैंने घनश्याम और गंजू को जाना था, निश्चित तौर पर भालू भी उन्हीं की तरह का आदमी होना चाहिए, उन्हीं की तरह औरतों को भोगने वाला औरतों का रसिया। पता नहीं वह स्त्रियों के साथ कैसे पेश आता होगा। भलोटिया को ये लोग भालू भालू कह रहे हैं, क्या भालू की तरह काला, मोटा आदमी होगा? मन में एक तरह की घबराहट सी हो रही थी। घनश्याम नें उस ऐशगाह के तिलस्मी दरवाजे के बाहर का कॉलबेल दबाया और पल भर में ही दरवाजा बिना आवाज खुल गया। निश्चय ही अंदर भलोटिया इंतजार में दरवाजे का रिमोट लेकर बैठा हुआ था। शायद हमारे यहां पहुंच जाने की खबर कल्लू ने मोबाईल से दे दिया था होगा। घनश्याम ने अबतक इस तरह मेरा हाथ पकड़ रखा था जैसे मैं भाग न जाऊं। वह मेरा हाथ पकड़े हुए उस ऐशगाह में प्रवेश किया और मैं उसके पीछे पीछे खिंची अंदर दाखिल हुई। अंदर का दृश्य पहले से थोड़ा बदला हुआ था। दरवाजे के अंदर घुसते ही सामने एक बड़ा सा शानदार सजा हुआ शोकेस दिखाई दे रहा था। उसके दाईं ओर एक शानदार किंगसाईज बेड था। मैं ने बाईं ओर देखा तो एक सुंदर टीवी पैनल था जिसके बीचोंबीच एक बड़ा सा 86" का टीवी था, जिसपर कोई अंग्रेजी फिल्म चल रही थी। उसके ठीक सामने, अर्थात उस हॉलनुमा बड़े से कमरे के दूसरे छोर पर अच्छी तरह से सजाया हुआ लेदर से मढ़ा हुआ गद्देदार सोफा सेट था। दो सिंगल सोफे के बीच में जो बड़ा सा सोफा था उस पर जब मेरी दृष्टि पड़ी तो, हे भगवान, उस पर जो शख्स बैठा हुआ था वह एक करीब पैंसठ सत्तर साल का गंजा, मोटा तगड़ा, तोंदू आदमी बैठा हुआ टीवी देख रहा था। उस आदमी को घनश्याम और गंजू सच ही भालू बोल रहे थे। वह सचमुच किसी भालू से कम नहीं था। वह सिर्फ लुंगी और बनियान में था और सोफे पर पसर कर बैठा हुआ था। उसके नंगे हाथों और बदन पर सीने से ऊपर झांकते हिस्से पर गर्दन से नीचे तक काले सफेद बाल भरे हुए थे। उसका रंग गेहुंआ था। फूले हुए चेहरे पर कंजी आंखों के कारण शक्ल बड़ी अजीब दिखाई दे रही थी।
31-12-2024, 08:42 PM
"आओ घंशू भाई। लेकिन साथ में जुगाड़ कहां है?" उसकी खरखराती आवाज मुझे बड़ी अजीब सी लगी।
"लाया तो हूं। यह सामने कौन है?" घनश्याम मुझे खींच कर सामने लाकर बोला। "क्या बकवास कर रहे हो। अगर यह मजाक है तो बहुत बुरा मजाक है। तुझे पता है मेरा टेस्ट फिर भी इस मासूम बच्ची को दिखा रहे हो?" वह तनिक रोष में बोला और उसके बोलने के साथ ही उसका पहाड़ जैसा शरीर अपनी जगह से थोड़ा सा हिला। उसका बनियान थोड़ा सा उठ गया और उसकी तोंद नजर आने लगी। तोंद का जितना हिस्सा दिखाई दे रहा था वह पूरा बालों से भरा हुआ था। बैठे होने के बावजूद मुझे उसके भीमकाय शरीर के कद का अंदाजा हो गया था। निश्चय ही वह छः फुट से ऊंचे कद का था। "इसकी मासूम सूरत पर मत जाओ भाई, अच्छे अच्छों को पानी पिलाने का माद्दा है इसमें।" घनश्याम बोला। साला घनश्याम किसी दलाल की तरह उसके सामने पेश करते हुए मेरी प्रशंसा कर रहा था। "यह यह तुम क्या बोल रहे हो? मेरे लिए तुम इस तरह किसी अजनबी के सामने कैसे बात कर सकते हो? मैं क्या कोई बाजारू लड़की हूं?" मैं गुस्से से उसका हाथ झटक कर उसकी पकड़ से मुक्त हो गई। मुक्त क्या, यों कहिए कि उसने ही मुझे मुक्त कर दिया क्योंकि वैसे भी मैं उनकी मनमानी पूरी किए बिना वहां से निकल तो सकती नहीं थी। "तू तो बाजारू औरतों से भी गयी बीती है। अपने मजे के लिए फोकट में बिछने वाली यहां शराफत का ढोंग कर रही है। जो यहां होने वाला है, चुपचाप होने दो। नौटंकी नहीं, समझी।" घनश्याम बोला। उसकी बात सुन कर भी मैं अपना विरोध जाहिर करने का ड्रामा करने लगी। "मैं तुम्हारी बात मानने से इन्कार करती हूं।" "तेरे इनकार की यहां परवाह कौन करने वाला है?" घनश्याम हंसते हुए बोला। "घंशू भाई तुम्हारी बात से मैं सहमत हूं। लेकिन क्या यह मेरे टेस्ट के लिए फिट है? यह तो मेरी पोती जैसी है।" वह दानव हल्के से मुस्कुरा कर बोला। "अपनी पोती ही समझ लो भाई। पोती जवान हो तो...." कहकर घनश्याम चुप हो गया और अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ मुझे देखने लगा। "साला घंशू तू तो एक नंबर का हरामी निकला। ऐसी बात भी तुम बोल सकते हो यह मैं नहीं सोचा था, लेकिन जो बोला सच बोला। चलो मैं भी स्वीकार करता हूं कि मैं भी तुम्हारी तरह हरामी आदमी हूं। भला ऐसी खूबसूरत नयी नवेली, गदराई जवान लौंडिया पोती के रूप में भी सामने आ जाए तो उसको देख देख कर हम मर्दों का खड़ा होने से कैसे रुक सकता है। बाकी लोगों का तो मैं नहीं बोल सकता हूं लेकिन मेरा तो खड़ा हो जाता है। सच बोल रहे हो, मेरी जवान पोती को देख कर सचमुच मेरा फनफना जाता है लेकिन क्या करूं, साला नाता रिश्ता का लिहाज नहीं होता तो...." इतना कहकर वह रुक गया और हें हें हें हें करके हंसने लगा। जब वह हंस रहा था तो उसकी हांडी सी तोंद भी हिलने लगी थी। "सचमुच आपलोग एकदम जंगली हैं। लाज शरम तो है ही नहीं आप लोगों में।" मैं बनावटी रोष से बोली। बनावटी इसलिए बोल रही हूं क्योंकि अबतक मैं अंदर से काफी गरम हो गई थी। घनश्याम मेरी रजामंदी के बगैर जबरदस्ती यहां ले कर आया था और जिस नीयत से मुझे ले कर आया था, मैं उसके विरोध में थी, लेकिन शुरू से लेकर अबतक के घटनाक्रम, कल्लू , भलोटिया और घनश्याम के बीच की बातचीत और मेरे साथ जो कुछ होने वाला था उसकी कल्पना कर करके पल दर पल मेरे भीतर फिर से उत्तेजना का संचार होने लगा था। एक चिंगारी सी सुलगी थी जो कि अबतक आग की तरह भड़क उठी थी। कल्लू अगर भयानक था तो उससे भी ज्यादा वीभत्स शरीर वाला था यह भलोटिया, लेकिन मेरे अंदर उत्तेजना का आलम यह था कि मुझे भोगने के लिए उपलब्ध मर्द के व्यक्तित्व का इस समय मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता था। यह दानव भी इस समय आकर्षक लग रहा था। मैं बड़ी मुश्किल से खुद को संयम में रख पा रही थी। मुझे खुद को बेचारी अबला, शिकार दिखाना जरूरी भी था ताकि घनश्याम को भी तसल्ली हो जाय कि वह मुझे उचित दंड देने में सफल हो रहा है। भले ही घनश्याम मेरी असलीयत जानता था और भलोटिया को बता रहा था लेकिन अपने अंदर की उत्तेजना को जाहिर करके भलोटिया के सामने सस्ती नहीं बनना चाह रही थी। लेकिन यह भी सच था कि इस वक्त मैं चुदने के लिए मरी जा रही थी। जैसा कि मैं पहले ही बता चुकी हूं कि उत्तेजना के मारे मेरी चूचियां तन गई थीं और निप्पल्स मेरे ब्लाऊज को छेद कर बाहर निकल पड़ने को तत्पर हो गये थे। मेरी चूत चिपचिपी हो गई थी।
09-01-2025, 09:56 PM
"हा हा हा हा, लाज शरम करेंगे तो हम जैसे मर्दों को भूखे मरने की नौबत आ जाएगी बिटिया।" भलोटिया मेरी बात सुनकर ठठाकर हंस पड़ा और बोला। वह जब मुंह खोल कर ठहाका मारकर हंस रहा था तो उस बुढ़ापे में भी उसकी दंतपंक्ति चमक रही थी। एक अजीब और डरावनी सी बात मैं ने गौर किया वह यह था कि उसके ऊपर की दंतपंक्ति में दोनों ओर किसी भेड़िए की तरह कनाईन दांत सामान्य से ज्यादा ही बड़े बड़े थे। खैर जो भी हो, आखिर था तो मानव ही, यह सोच कर पल भर का भय मेरे मन से गायब हो गया लेकिन उसकी बात सुनकर और उसकी हंसी से मुझे गुस्सा आ गया।
"जानवर कहीं के।" मैं बड़बड़ाई। "क्या बोली?" वह बोला। "जानवर बोली।" मैं अब थोड़ी जोर से बोली। मैंने सोच लिया था कि चुदना है तो डरना क्या। केवल थोड़ा सा पीड़िता का ढोंग ही तो करना था और वही कर रही थी। अच्छी तरह से जानती थी कि मुझे चोदे बिना मानेंगे तो नहीं। बदस्तूर ढोंग करते हुए चुदने का मजा भी ले लूंगी। "अच्छा की। आदमी और जानवर में बस इतना सा ही तो फर्क है कि आदमी रिश्ते नाते के बंधन में बंधा हुआ छटपटाता रहता है। मगर जानवरों में रिश्ता नाता कहां चलता है। नर है तो उसको अपनी प्रजाति के किसी भी मादा के साथ चुदाई करने की छूट है। साला मजा ही मजा है, चाहे वह उसी मादा से पैदा हुआ हो। लेकिन इधर किसी सुंदर और सेक्सी स्त्री को देखकर अगर आदमी का खड़ा भी हो तो साला मां, बेटी, बहन या रिश्तेदारी के पचड़े के चलते छटपटाता हुआ मन मसोस कर उन्हें चोदने की कल्पना करते हुए अकेले में अपने हाथ का सहारा लेता है और मूठ मारकर संतोष कर लेता है। मुझे जानवरों की तरह बिना भेदभाव के किसी भी मादा के साथ चुदाई करने की स्वतंत्रता पसंद है और आज अच्छा मौका मिला है तुझे अपनी पोती समझ कर चोदने का।इस बुड्ढे की इच्छा का मान तो रखना ही पड़ेगा तुम्हें।" वह मोटू, बुड्ढा भालू बेशर्मी के साथ कामुकतापूर्ण नजरों से मुझे देखते हुए बोला। यह सब कहते हुए वह सोफे पर से खड़ा हो गया। मेरा अंदाजा सही था। मोटा तो था ही लेकिन कद भी छः फुट से ऊंचा होने के कारण पहाड़ की तरह लग रहा था।कामुक नज़रों और बातों से मेरा धैर्य जवाब देने के कागार पर आ गया था। मेरा मन हो रहा था वह बेकार की बकवासपूर्ण बातों में वक्त जाया करने के बदले बस मुझपर टूट पड़े और किसी भी तरीके से मुझे भोग कर मेरी उत्तेजना शांत कर दे। मन ही मन बोली, "तो चोद ना साले बुढ़ऊ, मना कौन कर रहा है। कब से चुदने के लिए मरी जा रही हूं। पता नहीं खड़ा भी होता है कि नहीं।" लेकिन प्रकट तौर पर बोली, "कितने गंदे हैं आपलोग। रिश्ते नाते का मान रखने का ढोंग करते हैं और मन में ऐसी गंदी बात रखते हैं। लानत है, छि छि।" "जो बोलना है बोल ले छुटकी, लानत भेजना है तो भेज, गंदा बोलना है तो भी बोल ले। आज तक सिर्फ गंदा सोच रहा था लेकिन अभी तो पूरी तरह गंदा हो जाने का मन हो गया है। आ जा मेरी बच्ची इस बुड्ढे की गंदी सोच को साकार कर दे।" कहकर उसने अपनी दानवी बाहों को फैला दिया। "जा अपने बुड्ढे बलमा की बाहों में।" कहकर उसी समय घनश्याम ने मुझे पीछे से एक धक्का दिया और मैं असंतुलित हो कर सीधे भालू रुपी भलोटिया की बांहों में जा समाई और भलोटिया भला इस स्वर्णिम पल को कैसे जाया होने देता। जकड़ ही तो लिया मुझे और मैं उस बुड्ढे की बांहों में छटपटाने लगी।
10-01-2025, 01:04 PM
"नहीं नहीं, छोड़ो मुझे। मुझे इस तरह की हरकत बिल्कुल पसंद नहीं है। यह बुड्ढा मुझसे ऐसी हरकत नहीं कर सकता है।" मैं छटपटाते हुए बोली। मेरा छटपटाना हालांकि दिखावा था लेकिन मुझे इस तरह छटपटाते हुए देख कर भलोटिया ने इस तरह कस कर जकड़ लिया जैसे हाथ में आई चिड़िया कहीं हाथ से निकल न जाए। उसकी पकड़ सचमुच बहुत सख्त थी।
"घंशू, तू ने बताया नहीं कि यह मेरे टेस्ट के लायक है कि नहीं?" वह मुझे दबोचे हुए घनश्याम से बोला। मैं उसकी गद्देदार तोंद से चिपकी हुई छूटने का झूठ-मूठ प्रयास कर रही थी। "ऑलराउंडर है भाई। खुद ही देख लो। अब तो चिड़िया आपके हाथ में है। तो मैं चलूं?" कहकर घनश्याम मुड़ा। "बहुत बढ़िया, लेकिन तुम कहां चले भाई? हमारे बीच कभी कोई पर्दा था क्या? यहां रहकर देखो या शामिल हो जाओ। पहले भी तो ऐसा होता रहा है, आज कुछ अलग थोड़ी ना है।" भलोटिया एक हाथ से मुझे दबोच कर दूसरे हाथ से मेरे चूतड़ को मसलते हुए बोला और तभी चौंक उठा वह। "अरे, बिटिया की पैंटी तो नदारद है। ओह समझा, पहले से तैयार है। वाह भाई वाह, तुम्हारा जवाब नहीं।" कहकर उसने मेरी स्कर्ट के अंदर हाथ डालकर मेरी चिकनी नंगी गांड़ पर हाथ फिराने लगा। उफ उफ, मैं तो अपनी चूतड़ पर उसके दानवी हथेली के स्पर्श से मानो पगला ही गई। जहां मुझे शर्मिंदगी का अहसास हो रहा था वहीं मेरी उत्तेजना मेरे सर पर चढ़ कर बोल रही थी। "छि छि, छोड़ो मुझे। ओह ओह, मेरे साथ ऐसा मत कीजिए ना प्लीज। अपनी उम्र का तो लिहाज कीजिए।" मैं प्रकटत: विरोध करती हुई बोली लेकिन सच पूछो तो मैं ऐसा ही कुछ चाह रही थी इसलिए उस मोटे तोंदू बुड्ढे से चिपकी जा रही थी। वह बूढ़ा जरूर था लेकिन उसकी पकड़ बड़ी सख्त थी। उसके शरीर में बहुत गर्मी थी, जिसकी तपिश से मेरे शरीर की गर्मी भी दुगुनी हो रही थी। "भलोटिया, सच पूछो तो मैं भी यही चाह रहा था कि इस चुदाई का दीदार करूं। आपने मेरे मुंह की बात छीन ली। चलिए मैं यहीं बैठकर इस गरमागरम नजारे पर अपनी आंख सेंक लूं।" मेरी बात को जरा भी तवज्जो न देते हुए घनश्याम ने भलोटिया का उत्तर दिया और सामने सोफे पर बैठ गया। "और मन हो तो शामिल भी हो जाओ। हमने पहले भी तो ऐसा किया है।" भलोटिया मेरी चूतड़ों को मसलने लगा। "हमारी बिटिया की गांड़ तो बड़ी जबरदस्त है भाई। आज तो मजा ही आ जाएगा।" भलोटिया आगे बोला। इधर मैं चुदने के लिए मरी जा रही थी और इस आवेश में मैं छटपटाते हुए अपनी चूत को उसके लंड वाले हिस्से पर रगड़ने को आगे बढ़ाई ही थी कि सन्न रह गई। जैसे ही मेरी चूत का स्पर्श उसके सामने के कठोर अंग से हुआ, हे मेरे ईश्वर! उसके लंड के स्थान पर एक मूसलाकार खंभा मेरी चूत का तिया पांचा करने को पहले से तनतना कर खड़ा था। इसकी दस्तक ज्यों ही मेरी चूत पर हुई, मैं तो आवाक रह गई। लुंगी के अंदर ढंके हुए इस बूढ़े के इतने बड़े हथियार की तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी। अभी तो मैंने उसके लंड का दीदार भी नहीं किया था लेकिन अंदाजा तो लगा ही सकती थी कि यह सामान्य से काफी बड़ा था। मुझे भयभीत होना चाहिए था लेकिन भय पर मेरे अंदर वासना का जो सैलाब आया हुआ था वह भारी पड़ रहा था। "आपलोग मेरे साथ अच्छा नहीं कर रहे हैं। यह गलत है।" मैं उसके बंधन में छटपटाते हुए बोली। "हमें पता है यह गलत है लेकिन हम भी क्या करें बिटिया। अपनी मर्दानी भूख के आगे लाचार हैं। किसी भूखे का भोजन करना किसी भी शास्त्र के हिसाब से गलत नहीं है। तुम्हें भी आज मौका मिला है मुझ बूढ़े की भूख मिटाने का, तो इस पुण्य कार्य में अपना सहयोग करोगी तो निश्चय ही भगवान तुम्हें पुण्य प्रदान करेगा। आह आह आह" वह धीरे-धीरे बेसब्र हुआ जा रहा था और मेरी गान्ड को बेदर्दी से मसलने लगा था। वह अब झुका और अपनी थूथन को मेरे चेहरे के पास लाया ताकि मुझे चूम सके। उस समय उसके मुंह से मुझे शराब की दुर्गंध का अहसास हुआ लेकिन ताज्जुब, मुझे उस समय वह दुर्गंध भी विचलित नहीं कर पा रहा था बल्कि उसके उलट, मुझे भी एक अलग तरह का नशा सा चढ़ रहा था। अंततः उसने अपना थूथन मेरे होंठों से चिपका ही दिया और मेरे रसीले होंठों को चूसने लगा। ओह ओह ओह मेरे भगवान, कितना सुकून मुझे मिल रहा था मैं बता नहीं सकती हूं।
13-01-2025, 10:26 AM
Wao. So sexy. So detailed writing.
13-01-2025, 08:03 PM
"आआआआआहहहह, मेरी बिटिया के होंठ कितने रसीले हैं। तू सचमुच रस से भरी हुई है।" वह अपने होंठों को हटा कर चटखारे लेकर बोला।
"हटिए पापी कहीं के। आप लोगों की नजर में यह पुण्य होता हो तो हो, यह गलत है। आप सब नर्क जाइएगा।" मैं बिगड़ कर बोली। "हा हा हा हा, सौ सौ चूहे खा कर बिल्ली चली हज को। हमें पाप पुण्य बता रही है हरामजादी। घुसा से कितनी बार घुसवाई, मुझसे कितनी बार मरवाई, साली चौकीदार भाईयों का लौड़ा खाई और हमको पापी बता रही है।" घनश्याम अपनी जगह बैठे बैठे हंस कर बोला। मुझे काटो तो खून नहीं। ऐसा लगा जैसे भलोटिया के सामने मुझे पूरी तरह नंगी करके रख दिया। "छोड़ो घंशू। अब यह खुशी से नहीं तो जबरदस्ती से ही सही, चुदेगी तो जरूर। आखिर आई है तो चुदने के लिए ही ना।" भलोटिया मुझे ठेलता हुआ बिस्तर पर ला पटका और इस का परिणाम यह हुआ कि मेरी स्कर्ट उठ गई और मेरी नंगी चूत उसके सामने दपदप करने लगी जिसे भलोटिया फटी फटी आंखों से अपलक देखता रह गया और मैं असहाय अवस्था में प्रदर्शित करती हुई खुद को हलाल होने वाली बकरी की तरह उस बूढ़े दानव की आंखों के सामने अपने हलाल होने के इंतजार में कुछ पलों के लिए बुत बनी हुई पड़ी रह गई। "आई नहीं, लाई गई हूं और वह भी जबरदस्ती।" बिस्तर पर पड़ी पड़ी मेरे मुंह से निकला। "तू अपने गलत काम के लिए दंडित करने लाई गयी है। तुझे दण्ड देना आवश्यक है वरना तू सुधरेगी नहीं।" घनश्याम बोला। "इस तरह के व्यवहार को दण्ड नहीं, सतावट बोलते हैं, प्रताड़ना बोलते हैं।" मैं घनश्याम की बात का खंडन करते हुए अधलेटी हो कर रोष दिखाते हुए बोली। "न न न न, उठो नहीं मेरी बच्ची। प्रताड़ना ही सही, इस ऐशगाह में आ गयी हो तो यहां का रस्म तो निभाना ही पड़ेगा। लो मैं तैयार हो रहा हूं। तू भी तैयार हो जा।" कहकर भलोटिया अपनी बनियान उतारने लगा। बहुत मुश्किल से उसने अपनी बनियान उतारी। जैसे जैसे बनियान ऊपर उठता जा रहा था, वैसे वैसे उसके शरीर पर छाए हुए घने बाल बेपर्दा हो रहे थे और उसी के साथ मेरे दिल की धड़कनें भी बढ़ती जा रही थीं। जैसे ही उसकी बनियान उतरी, अरे मेरी मां, सचमुच उसे भालू कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं थी। पूरे शरीर पर बाल भरे हुए थे। बिल्कुल भालू की तरह। ऐसा लग रहा था जैसे भालू के शरीर पर मानव का सर बैठा दिया गया हो। मैं कल्पना करने लगी कि कुछ ही देर में मैं किसी भालू से चुदने वाली हूं। भालू से चुदने का ख्याल आते ही पता नहीं क्यों मैं रोमांचित हो उठी। मेरी उत्तेजना का पारावार न था। मेरी चूत जो पहले से ही पानी पानी हो रही थी, फकफकाने लगी। शायद भालू के लंड से चुदने की कल्पना से। "लो मैंने बनियान उतार दी और तू अबतक ऐसी ही पड़ी हुई है। तू भी उतार अपने कपड़े, जरा मैं भी तो देखूं मेरी बिटिया की गदराई जवानी इस बूढ़े को कितना आनंद देने वाली है?" भोलोटिया बड़ी भूखी नज़रों से मुझे देखते हुए बोला। साला तोंदू बूढ़ा भालू, बिटिया बोल बोल कर सचमुच अपनी पोती को ही चोदने की कल्पना में मगन था। "हट बेशरम।" मैं बोली। मैं पल भर को भूल गयी कि मेरी नंगी चूत सामने खुली पड़ी है। "हा हा हा हा, तेरी चिकनी चूत तो खुली पड़ी है। पूरा ही खोल दो ना।" वह ठहाका मारकर हंसते हुए बोला। जब वह हंस रहा था तो उसकी थुलथुल तोंद जोरों से हिलने लगी थी। हाय राम! मैं हड़बड़ा कर अपनी चूत ढंकने लगी। "अब ढंकने का क्या फायदा। पूरा ही खोल दो ना मेरी बच्ची। ले मैंने अपनी लुंगी खोल दी।" कहकर उसने एक झटके में अपनी लुंगी नीचे गिरा दी। हे भगवान? यह आदमी है कि गधा? इत्तन्नाआआआ बड़ा लं.....ड? मेरी आंखें फटी की फटी रह गई। कम से कम 11" लंबा तो जरूर था और उसी के अनुपात में मोटा भी। तोंद के नीचे काले काले बालों के बीच काला कलूटा तना हुआ लंड बड़ा ही डरावना दिखाई दे रहा था। उसका लंड हल्का सा मुड़ा हुआ था और ऊपर की ओर उठा हुआ था। अगर सीधा होता तो उसकी लंबाई शायद कुछ अधिक ही दिखाई पड़ती। लंड के सामने का चमड़ा पलटा हुआ था और बड़ा सा चिकना गुलाबी सुपाड़ा चमचमा रहा था। इस बूढ़े के शरीर पर इतना जबरदस्त लंड देख कर मैं अचंभित थी।
15-01-2025, 10:43 PM
"नहींईंईंईंईंईं नहींईंईंईंईंईं हे भगवान नहींईंईंईंईंई...." भय के मारे मेरे मुंह से निकल पड़ा। मैं बिस्तर से उठने ही वाली थी कि वह बुड्ढा बिना एक पल गंवाए मुझ पर झपट पड़ा। अब मैं बेबस थी। उसके चंगुल में फंस चुकी थी और वह अपनी मनमानी करना आरंभ कर दिया। वह बड़े आराम से मेरे ब्लाऊज के ऊपर से ही मेरी चूचियों को पकड़ पकड़ कर देखने लगा।
"अरे राम राम, तूने तो ब्रा भी नहीं पहनी है। जरा देखूं तो इस ब्लाऊज के अंदर के कबूतरों को।" इतना कहकर वह जबरदस्ती मेरे ब्लाऊज को खोलने लगा। "नहीं नहीं प्लीज़ नहीं।" मैं उस दानवी शरीर के नीचे बेबसी में छटपटाने लगी लेकिन सब व्यर्थ। उसने मुझे नंगी करके ही दम लिया और मंत्रमुग्ध होकर मेरी फड़फड़ाती उन्नत चूचियों को निहारने लगा। "ओह गजब। ऐसी ही चूचियां होंगी मेरी पोती रश्मि की। गोल गोल, सख्त सख्त।" वह मेरी नंगी चूचियां सहलाते हुए बोला। उसकी बात सुनकर मैं चौंक उठी। रश्मि, मतलब रश्मि भलोटिया। क्या यह मेरी सहेली रश्मि की बात कह रहा है? "रश्मि?" अनायास मेरे मुंह से निकला। "हां हां, रश्मि। एल बी एस एम कॉलेज में पढ़ने वाली रश्मि भलोटिया। मस्त लड़की है लेकिन क्या करूं, देख देख कर तरस कर रह जाता हूं। तू जानती है क्या उसे?" वह बोला। "हां, मैं भी उसी कॉलेज में पढ़ती हूं। मुझे पता नहीं था कि उसका दादाजी इतने गंदे हैं। आज पता चला।" मैं उसके प्रति घृणा प्रदर्शित करते हुए बोली। "हां हां, सच बोली, गंदा तो मैं हूं। तुम्हारी समझ से गंदा हूं, लेकिन सच तो यह है कि मेरी तरह हर घर में ऐसे गंदे लोग हैं जो इस तरह की तमन्ना रखते हैं। मेरी भी तमन्ना थी, मगर अपनी पोती के साथ घर में ऐसा कुछ करने का कहां मौका मिला। समझ लूंगा तू ही मेरी पोती रश्मि है। आज मेरी तमन्ना पूरी होने वाली है।" कहकर उसके हाथ का दबाव मेरी चूचियों पर बढ़ने लगा और मैं सोचने लगी कि इसे अगर पता चले कि मैं रश्मि को पहले ही चोद चुकी हूं तो इसे कैसा महसूस होगा। निश्चित ही वह मुझसे ईर्ष्या करता और खुद को कोसता कि साली उसकी पोती रश्मि पर मैं लड़की होकर भी हाथ साफ करने में सफल हो गयी और वह उसे चोदने की तमन्ना मन में लिए मर्द होते हुए भी रिश्ते नाते के पचड़े में पड़ा हुआ था। मैं मन ही मन हंस पड़ी। लेकिन फिलहाल तो इस दानव को झेलना मुझे भारी पड़ रहा था। उसकी जोर जबरदस्ती बढ़ती जा रही थी और अब उसने मेरे स्कर्ट को भी एक झटके से नीचे खींच लिया और लो, अब मैं मादरजात नंगी थी। उस मोटे, विशाल, तोंदू बुड्ढे भालू के नीचे, उसके कब्जे में नंगी बेबस पड़ी हुई थी। एक अजीब सा अहसास हो रहा था मुझे। उत्तेजक अहसास। उस भालू से चुदने की सोच किसी भी और के लिए भयावह हो सकती थी, मैं भी कोई अपवाद नहीं थी लेकिन उस वक्त चुदने की अदम्य चाहत उस भय पर हावी हो चुकी थी। एक भालू से चुदने की कल्पना से ही मैं तो रोमांच से भर गई थी। मुझे क्या पता था कि यह बूढ़ा भालू अपने मन की खुन्नस मुझ पर निकालने वाला है। उधर घनश्याम बड़े आराम से सोफे पर बैठ कर हमारे बीच के वार्तालाप को सुन रहा था और हर हरकत का मजा ले रहा था। रश्मि का नाम सुन कर वह भी थोड़ा चौंक उठा था क्योंकि उसे भी पता था कि रश्मि मेरी सहेली है। "अगर रश्मि को पता चलेगा तो उसे कैसा लगेगा, उसके बारे में सोचा है आपने?' मैं उसके नीचे दबी हुई छटपटाते हुए बोली। "नहीं सोचा था मगर अब सोचूंगा। मुझे तो अब अपने ऊपर गुस्सा आ रहा है कि अगर घनश्याम सच बोल रहा है तो तू अच्छी खासी लंडखोर है, और अगर तू लंडखोर है तो लंडखोर की सहेली भी तो लंडखोर ही होगी और मैं मादरचोद रश्मि को हाथ लगाने में ख्वामखाह डर रहा था। चलो अब सब कुछ साफ हो गया। पहले अभी तेरा हिसाब करता हूं फिर रश्मि को भी देख लूंगा।" इतना कहकर उसने एक हाथ से मेरी चूत सहलाने लगा। उसकी बात सुनकर मुझे गुस्सा भी आ रहा था लेकिन उसके हाथ का स्पर्श अपनी चूत पर महसूस करके चुदास के मारे बेहाल हुई जा रही थी। जी चाह रहा था कि उसे पलट कर उस पर चढ़ जाऊं और उसके लंड की विकरालता की परवाह किए बिना उछल-कूद मचाना आरंभ कर दूं। लेकिन उस वजनदार भालू के साथ न तो ऐसा करना संभव था और न ही अपनी उतावली दिखा कर अपना रंडीपन दिखाना चाहती थी। भलोटिया रश्मि के बारे में सच ही अनुमान लगा रहा था। जब मैंने उसे कृत्रिम लंड से चोदा था तभी मुझे भी अहसास हो गया था कि वह लंड लेने की आदी है, लेकिन भलोटिया की बात कुछ और है। जहां तक मैं अंदाजा लगा पा रही थी, इतने बड़े लंड वाले भलोटिया जैसे आदमी को झेलना किसी सामान्य स्त्री के वश की बात नहीं है। मैं जानती थी कि मुझ पर भी कयामत आने वाली है लेकिन पता नहीं क्यों इस वक्त मेरे अंदर वासना की जो प्रचंड ज्वाला धधक रही थी, उसे बुझाना ही मेरी पहली प्राथमिकता थी, बाकी सब उस चरम उत्तेजना के आगे गौण था, भले ही चुदते हुए मेरा कचूमर निकल जाए। बस मैं ने मन को कड़ा कर लिया और उस कयामत का सामना करने को तत्पर हो गयी। मुझे तो रश्मि की फ़िक्र होने लगी कि यह दानव जब रश्मि का शिकार करेगा तो उसकी क्या गति होगी। भाड़ में जाए रश्मि, मैं उसके लिए बेवजह क्यों परेशान हो रही हूं। फिलहाल तो जैसे तैसे झेल कर मैं अपनी बेकाबू होती उत्तेजना को शांत लूं। फिर भी रश्मि पर आने वाली मुसीबत को सोच कर मैं बेख्याली में मुस्कुरा उठी और भलोटिया मेरी मुस्कान को देखकर चकित रह गया।
18-01-2025, 11:32 AM
उसकी सोच थी कि शायद मुझ जैसी कमसिन उम्र की लड़की के चेहरे पर उसके दानवाकार मोटे तगड़े शरीर पर उसी के अनुपात में विकराल लंड को देखकर डर का भाव आना चाहिए था लेकिन भयभीत चेहरे की जगह मुस्कुराता चेहरा देखना उसके लिए ताज्जुब की बात थी। उसका ऐसा सोचना शायद स्वाभाविक भी था क्योंकि उसका लंड था भी इतना बड़ा कि सामान्य स्त्रियों की घिग्घी बंध जाएं।
"तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान बता रही है कि तुम्हें मुझसे डर नहीं लग रहा है। यह मुझ बूढ़े के लिए बड़े सौभाग्य की बात है।" वह बोला और मेरी चूचियों को दबाते हुए अपना मुंह एक चूची पर रख दिया और ओह ओह मेरी मां आह आह, मैं तो पगला ही गई। वह सीधे मेरी चूची को मुंह में भर कर चूसने लगा। इस्स्स्स रेएएएए अब क्या बताऊं कि कैसा महसूस करने लगी थी मैं। एक चूची को दबा रहा था और दूसरी चूची को चाट रहा था। उसकी जीभ भी मोटी और लंबी थी, साथ ही मुझे कुछ खुरदुरी सी महसूस हो रही थी। वह बड़े भुक्खड़ अंदाज में बारी बारी से मेरी दोनों चूचियों को चाटने लगा था। मेरी उत्तेजना का तो कहना ही क्या था। मैं अपने स्थान पर कसमसा रही थी और उसे अपने ऊपर से ढकेल कर हटाने का झूठ-मूठ नाटक कर रही थी। मेरे ढकेलने की कोशिश का कोई असर उसके पहाड़ सरीखे शरीर पर नहीं पड़ रहा था। चाटते चाटते अब वह चूसने पर आ गया था। पहले वह मेरे निप्पलों को चुभलाया और फिर मुंह में भर भर कर चूसने लगा। उसका मुंह काफी बड़ा था इस कारण मेरी इतनी बड़ी चूची भी करीब करीब आधी उसके मुंह में समा गयी थी। चूसते चूसते वह एक प्रकार से मेरी चूचियों को भंभोड़ना आरंभ कर दिया था। ताज्जुब मुझे इस बात का हो रहा था कि उसकी कनाईन दांत सामान्य से बड़े होने के बावजूद दांतों की चुभन मुझे महसूस नहीं होने दे रहा था। शायद उसे असामान्य दांतों के साथ भी चूचियों को चूसने का अच्छा अभ्यास था। इस तरह वह अपने औरतखोर होने का परिचय भी दे रहा था। "आआआआआहहहह ओओओओहहहहह, नहींईंईंईंईंईंईं आह जंगली कहीं के। यह क्या कर रहे हैं आप? आपको लग रहा है मुझे अच्छा लग रहा है? गंदे आदमी गंदी सोच। आपकी इस जबरदस्ती में मुझे जरा भी अच्छा नहीं लग रहा है। मैं तो रश्मि की सोच कर मुस्कुरा रही थी आप उसकी भी ऐसी ही दुर्गति करने वाले हैं और आपने उसका कुछ और अर्थ निकाल लिया। आह आह मेरे साथ इतनी घिनौनी हरकत आप जैसे गंदे लोग ही कर सकते हैं।" मैं अपनी नाराज़गी प्रकट करते हुए बोली जबकि मैं तो दूसरी ही दुनिया की सैर कर रही थी। आनंदलोक में। मेरी चूचियों को बारी बारी से चूस चूस कर मेरे अंदर की ज्वाला को और भड़का दिया था और अब पता नहीं क्या क्या करने वाला था। "ऐसे समय में गंदा बनना ही पड़ता है बिटिया। जितना गंदा बनो उतना आनंद मिलता है।" कहकर वह मेरी चूचियों को चूसना छोड़ कर मेरी चूत का रुख किया। दोनों पंजों से मेरी चूचियों को मसलना जारी रखा और अपना सिर मेरी चूत की ओर ले जाने लगा। "यह यह अब क्या कर रहे हैं? छि छि उधर नहीं उधर नहीं" मैं तड़प कर बोली। "अब जरा तेरी चिकनी चूत का स्वाद भी तो चख लूं।" वह बोला। उफ उफ, उसकी लपलपाती जीभ से जब वह मेरी चूत को चाटेगा तो मेरा क्या हाल होगा, सोच कर ही मैं सिहर उठी। मैं दोनों हाथों से उसके सिर को हटाने की कोशिश का दिखावा करने लगी लेकिन वास्तव में तो खुद ही अपनी चूत चटवाने के लिए मरी जा रही थी। "नहीं नहीं बिल्कुल नहीं छि छि।" मैं उसकी पकड़ में छटपटाती रही लेकिन उस दानव ने मुझे कब्जे में लेकर अपना मुंह मेरी चूत पर सटा दिया। आआआआआहहहह ओओओओहहहहह। "नहींईंईंईंईंईंईंईंईं.. " जैसे ही उसका थूथन मेरी चूत पर पड़ा, मेरी घुटी घुटी चीख निकल पड़ी। लेकिन अब उसे तो मेरी चूत का स्वाद मिल चुका था। वह बेतहाशा मेरी चूत को चपड़ चपड़ चाटने लगा और मैं उत्तेजित होकर अपनी जांघों को सटाने का प्रयास करने लगी लेकिन ऐसा करना मुमकिन नहीं था क्योंकि मेरी जांघों के बीच उसका सिर था। मेरे विरोध, चिल्ल पों और चीख चिल्लाहट जैसे नक्कारखाने में तूती की तरह थी। वह मूक बधिर पशु की तरह मेरी हलकान भरी चीखों और कराहटों को नजरंदाज करता हुआ मेरी चूचियों को बेहताशा दबाने और मेरी चूत को चटखारे ले-लेकर चाटने में मशगूल था। भलोटिया की हरकतों से मुझे हलकान होती हुई देख कर उधर घनश्याम बड़ा प्रसन्न हुआ जा रहा था लेकिन काश कि उस बेवकूफ को पता होता कि मैं उस वक्त आनंद के किस दौर से गुजर रही थी, तो खुद को कितना कोसता, कि मुझे दंडित करने के चक्कर में उसने मुझे जन्नत की सैर कराने की व्यवस्था कर दी है।
22-01-2025, 09:57 PM
"बहुत बढ़िया। यह शौक आपका अबतक है?" सोफे की तरफ से घनश्याम की आवाज आई तो मैंने उसकी ओर नजर घुसा कर देखा, वह सूअर का बच्चा अपने पैंट को उतार कर अपने तनतनाए हुए लंड को पकड़ कर बैठा था।
"मेरा शौक तो और भी है, जो कि तुमको ठीक से पता है।" भलोटिया मेरी चूत को चाटते चाटते बोला। "कमाल है, इस उम्र में भी?" घनश्याम बोला। "अबे हरामी, तुमको पता नहीं है क्या, बंदर चाहे कितना भी बूढ़ा हो जाए, साला गुलाटी खाना नहीं भूलता।" भलोटिया बोला और फिर से मेरी चूत भंभोड़ते हुए बोला। "तो अब आगे भी शुरू कीजिये भाई।" "लो वह भी करता हूं।" कहकर वह मेरी चूत चाटना बंद किया और मुझ पर ऊपर आने लगा। हे भगवान अब यह क्या करने वाला है? बहुत जल्दी मुझे पता चल गया कि वह क्या चाहता है। वह घुटनों के बल खड़ा हो गया और अपना मूसल मेरे मुंह के पास ले आया। उफ मेरे राम, अपनी आंखों के इतने पास उस ग्यारह इंच का विकराल हथियार देखना मेरे होश उड़ा देने के लिए काफी था। उसकी दोनों बालों से भरी हुई मोटी मोटी जांघें मेरे सर के दोनों ओर था और उसका फनफनाता लंड बिल्कुल मेरे मुंह के पास था। "मुंह खोल बिटिया और इस बूढ़े के लौड़े को थोड़ा प्यार से चूस ले ताकि तुझे चोदने के पहले मेरी यह हसरत भी पूरी हो जाय।" भलोटिया अब मेरे सर को पकड़ कर बोला। मैं चाह कर भी अपना सर इधर उधर नहीं कर सकती थी। "नहीं नहीं यह गंदा काम मुझसे मत करवाईए।" मैं विरोध करती हुई बोली, हालांकि मैं यह भी जानती थी कि लंड चूसने की इस रस्म अदायगी के बाद ही वह मुझे चोदेगा। "गंदा काम? यह गंदा काम कैसे हो सकता है? सभी तो ऐसा करती हैं। वैसे भी जिस लंड से तू चुद कर खुद का और मेरा कल्याण करने जा रही है, उस लंड को चूसने से बड़ा कल्याणकारी काम क्या हो सकता है।" वह इतना कहकर अपने मूसल का सुपाड़ा मेरे होंठों से सटा दिया और दबाव देने लगा। इतना मोटा लंड मेरे मुंह में कैसे घुस सकता है, यह मेरी समझ से परे था लेकिन फिर भी प्रयास करने में क्या हर्ज है, यही सोचकर मैंने मुंह खोल दिया। ऐसा नहीं करती तो वह जबरदस्ती करता और बिना मतलब मुझे चुदने में विलंब होता जो कि मैं नहीं चाहती थी। मेरी स्थिति बड़ी अजीब हो गई थी। चुदने के लिए मरी जा रही थी लेकिन उसके लंड से डर भी लग रहा था और मैं यह जताना भी नहीं चाहती थी कि मैं खुद ही चुदवाने के लिए मरी जा रही हूं। मैं मुंह तो खोल दी थी जिसमें भोलोटिया अपना लंड ठूंसने की कोशिश करने लगा। "वाह बहुत बढ़िया, इसी तरह पूरा मुंह खोल कर चूसने की कोशिश कर बिटिया।" भलोटिया बोला और अपने लंड पर जोर लगाने लगा। मैं अपनी तकलीफ बोलना चाह रही थी लेकिन मेरे मुंह से केवल गों गों की आवाज ही निकल पा रही थी क्योंकि उसके लंड का अगला हिस्सा, अर्थात बड़ा सा सुपाड़ा पुच्च से मेरे मुंह में समा चुका था। मैं मुंह को पूरी तरह फाड़ कर उसके लंड को रास्ता देने की भरसक कोशिश करने लगी। धीरे-धीरे सरकता हुआ उसका लंड मेरे मुंह में घुसता जा रहा था। मुझे डर लगने लगा कि कहीं मेरी सांसें न रुक जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उसका लंड मेरे मुंह में भर गया और सरकता हुआ मेरी हलक तक जा पहुंचा था। हे भगवान, अगर और अंदर घुसेगा तो मुझे सांस लेने में भी तकलीफ़ होने वाली थी। मुझे यह भी डर लगने लगा कि कहीं मेरे दांत उसके लंड को जख्मी न कर दे। मैं पूरी सावधानी बरत रही थी और इस प्रयास में काफी हद तक सफल भी हो गई लेकिन ज्यादा देर तक इस तरह मुंह फाड़कर रहना मेरे लिए मुश्किल साबित होने वाला था। इधर भलोटिया इतने पर भी नहीं रुका और अंदर ठेलने की कोशिश करने लगा और इसका नतीजा मेरे अंदेशे के अनुसार ही हुआ। उसका लंड मेरी हलक में उतर रहा था जिसके कारण मेरी सांस की नली भी बंद होने लगी थी। मेरी आंखें फटी जा रही थीं। मैं घबराकर हाथ पांव पटकने लगी। भलोटिया को मेरी तकलीफ का अंदाजा हो गया और वह रुक गया। उसने अपना लंड थोड़ा बाहर खींचा तो मैं लंबी लंबी सांसें लेने लगी। मुझे थोड़ी राहत मिली। लेकिन यह कुछ पलों की राहत थी। भलोटिया दुबारा लंड अंदर ठेलने लगा, फिर रुक गया, फिर निकाला और यह क्रम चार पांच बार करने के बाद थोड़ा और अंदर ढकेल दिया लेकिन आश्चर्य, इस बार मुझे पहले की तरह तकलीफ नहीं थी। उसका लंड मेरे हलक में उतरता चला जा रहा था। उफ उफ उफ उफ, अब सांस लेने में मुझे तकलीफ़ नहीं हो रही थी लेकिन मेरा जबड़ा दर्द करने लगा था लेकिन मैं किसी तरह बर्दाश्त करके अब उसके लंड को अपने होंठों से दबोच कर चूसने की कोशिश करने लगी। मुझे खुद पर आश्चर्य हो रहा था कि मैं ऐसा करने में सक्षम थी। शुरू में थोड़ी तकलीफ़ हुई लेकिन धीरे-धीरे मैं आराम से उसके उतने विशाल लंड को चूसने लगी थी। अब मैं भी मस्ती में आ गयी थी।
22-01-2025, 09:59 PM
nice story
22-01-2025, 10:02 PM
Pishab pilao gand chatvao
28-01-2025, 05:04 PM
"आह आह ओह ओह, बहूऊऊऊऊत बढ़िया आआआआआहहहह, तू बड़ी मस्त बिटिया हो ओह ओह हां हां ऐसे ही.... चूस मां की लौड़ी...." भलोटिया मस्ती में भर कर बोल उठा। मैं जानती थी कि घनश्याम के सीने में जरूर सांप लोट रहा था होगा। उसे अब जरूर अहसास हो रहा था होगा कि मुझे प्रताड़ित करने का उसका दांव उल्टा पड़ गया था। मैं घनश्याम की ओर चेहरा घुमा कर देख नहीं सकती थी लेकिन अंदाजा बखूबी लगा सकती थी। इधर भलोटिया अब मेरे सर को पकड़ कर मेरे मुंह को चोदने का आनंद लेने लगा था। उसका करीब तीन चौथाई लंड मेरे मुंह में अंदर बाहर हो रहा था और मैं चकित थी कि इतने विशाल लंड से जहां भलोटिया को मेरे साथ मुखमैथुन का मजा मिल रहा था वहीं मैं भी मस्ती में डूब कर उसके लंड को गपागप चूसने का आनंद लेने लगी थी, तभी अचानक भलोटिया ने अपना लंड बाहर खींच लिया और,
"बस बस, आआआआआहहहह ओओओओहहहहह मान गया तुमको बिटिया। मुंह से भी अद्भुत आनंद देती हो, लेकिन मुंह में नहीं झाड़ूंगा। तेरी चिकनी चूत के लिए बचा कर रखता हूं। मुखचोदन संपन्न हुआ अब अपनी चूत से चूत चोदन का मजा लेने दे बिटिया।" कहते हुए वह बिस्तर से नीचे उतरा और मेरे तन को घसीट कर बिस्तर के किनारे वहां तक ले आया, जहां तक मेरा धड़ चूतड़ तक बिस्तर पर तो था लेकिन मेरे पैर बिस्तर से बाहर थे। "यह यह यह आप ककककक क्या कर रहे हैं?" बड़ी मुश्किल से बोल पाई। मेरा जबड़ा दर्द कर रहा था और ऐसा लग रहा था जैसे पूरी क्षमता से मुंह फाड़कर मुखमैथुन का मजा लेना मुझे महंगा पड़ गया था और मेरा जबड़ा जाम हो गया हो। इतनी देर तक पूरी तरह मुंह खोल कर उतने मोटे लंड को चूसती जो रही थी। मेरी नज़र उसके लंड पर थी, जो मेरे थूक से लिथड़ कर चमचमा रहा था। बाप रे बाप, उसका लंड अविश्वसनीय रूप से पहले से भी बड़ा दिखाई दे रहा था जिसे मैं ने अपने मुंह के रास्ते गले तक उतार लिया था। "बोला तो, अब तेरी चूत चोदूंगा।" वह बोला और मेरी टांगों को फैला कर जांघों के बीच घुसा चला आया। "नहीं नहीं, यह मुझसे नहीं होगा। मर जाऊंगी मैं। प्लीज़ मुझ पर दया कीजिए।" मैं घिघिया रही थी लेकिन वह तो चोदने की धुन में जैसे बहरा हो गया था। खड़े खड़े ही उसने अपना लंड मेरी चूत के मुंह पर रखा और दबाव देने लगा और उसके लंड का मोटा सुपाड़ा मेरी चूत का मुंह फाड़ कर घुसने लगा। दर्द से मैं चीख पड़ी। मेरी दर्दनाक चीख सुनकर वह रुक गया और मेरे चेहरे को देखने लगा। "क्या हुआ, बहुत दर्द हो रहा है?" वह बोला। "हां।" मैं पीड़ा से कराहती हुई बोली। "तो मैं क्या करूं? न चोदूं?" उसके चेहरे पर मायूसी का भाव था। मुझे उस पर दया आ गई। मैं झूठ नहीं बोलूंगी, दया तो आई लेकिन मैं खुद भी चुदने के लिए पागल हुई जा रही थी। उसका लंड मोटा था तो क्या हुआ, आखिर उसने न जाने कितने लोगों को इसी लंड से चोदा होगा। मैं कोई अपवाद तो हूं नहीं। ले लूंगी उसका लंड। थोड़ा दर्द ही तो होगा, मर तो नहीं न जाऊंगी। पहले पहल घुसा भी तो मुझे इसी तरह पीड़ा दे कर चोदा था। उसके बाद अब तक तो काफी बार मजे ले ले कर लंड खाती आ रही हूं। भलोटिया का लंड मेरी अबतक की चुदाई यात्रा में सबसे बड़ा था, लेकिन मैं यह भी जानती थी कि जैसे जैसे मेरी चुदाई यात्रा आगे बढ़ती आ रही थी वैसे वैसे धीरे-धीरे मेरी क्षमता भी तो बढ़ती जा रही थी। पहली पहली बार तो हर बार थोड़ी तकलीफ़ हुई ही थी फिर इस बार मैं पीछे क्यों हटूं, जबकि इस समय मुझमें चुदने की बड़ी तलब हो रही थी। जी को कड़ा करके इस बार भी भलोटिया का मूसल ले लूंगी यह निर्णय ले चुकी थी। "मुझे पता है कि आप लोगों की मनमानी पूरी हुए बिना मेरी यहां से मुक्ति नहीं मिलने वाली है। मजबूरी में मुझे आप लोगों की इच्छा पूरी करनी पड़ रही है। मैं मना करने की स्थिति में नहीं हूं लेकिन जब मुझे यह सब झेलना ही है तो कम से कम मुझे अपने ढंग से झेलने दीजिए ना।" मैं ने अनुनय विनय के लहजे में कहा। "चलो यह अच्छा है कि मजबूरी में ही सही, तुमने स्वीकार तो किया कि हमारी इच्छा पूरी करने में ही तुम्हारी भलाई है। अब तुम्हारी इच्छा का भी सम्मान करना हमारा फ़र्ज़ है। बोलो, तुम किस तरह से करवाना चाहती हो?" भलोटिया अपना लौड़ा पेलते पेलते रुक गया और बोला, हालांकि उसके लंड का सुपाड़ा मेरी चूत में घुस चुका था और मैं पीड़ा को पीने की यथासंभव कोशिश कर रही थी। उसकी बात सुनकर मुझे थोड़ा आश्वासन मिला। "ठीक है, तो ऐसा कीजिए कि आप बिस्तर पर लेट जाईए और मुझे अपने ऊपर चढ़ने दीजिए। मैं खुद बर्दाश्त करते हुए जितना सकूंगी, लेने की कोशिश करूंगी।" मेरी बात सुनकर वह मुस्करा उठा और घनश्याम की ओर देखने लगा। घनश्याम भी चकित होकर मुझे देखने लगा। फिर उसके चेहरे पर भी मुस्कान तैरने लगी। मेरी हिम्मत की दाद दे रहा था या उस मुस्कान के पीछे कुछ और बात थी, मैं समझ नहीं पाई। "यह हुई बहादुरों वाली बात। इससे बढ़िया और क्या चाहिए मुझे। चलो ऐसा ही करते हैं।" कहकर उसने अपना लौड़ा मेरी चूत से बाहर खींच लिया और बिस्तर पर लेट गया। उसका लंड छत की ओर खतरनाक अंदाज में तन कर खड़ा था। उसके भीमकाय लंड का ऐसा नजारा देखकर एक बार तो मेरा हौसला भी ठंढा पड़ने लगा था लेकिन मैंने अपने मन को कड़ा किया और अपने दोनों पैरों को फैला कर उसके अगल बगल रखी और नीचे बैठने लगी। मेरा दिल तूफानी रफ्तार से धाड़ धाड़ धड़क रहा था। मैंने अपने आपको किसी प्रकार संयमित किया और उसके मूसल को अपने हाथों में थाम लिया और अपनी चूत को उसके संपर्क में लाने के लिए और नीचे बैठने लगी। जैसे ही उसके लंड के सुपाड़े से मेरी चूत का संपर्क हुआ, मैं सर से लेकर पैर तक कांप उठी। ओओओओहहहहह भगवान रक्षा करना, यही प्रार्थना करती हुई और नीचे बैठने लगी। उफ उफ, पहले की तरह उसका चिकना सुपाड़ा मेरी चूत के मुंह को फैलाता हुआ अंदर दाखिल होने लगा। आह ओह, मेरी चूत फैलते हुए आखिरकार उसके उतने बड़े सुपाड़े को अपने अंदर ग्रहण करने में सफल हो गयी लेकिन पीड़ा तो हो ही रही थी। हां, पहले की अपेक्षा इस बार थोड़ी कम पीड़ा थी। मैं रोमांच से भर गई और थोड़ा और नीचे बैठने लगी। आह आह, उसका लंड मेरी चूत में रास्ता बनाता हुआ घुसता ही चला जा रहा था। करीब तीन इंच अन्दर चला गया लेकिन पीड़ा वैसे की वैसे ही थी। मैं तनिक रुकी लेकिन भलोटिया को यह नागवार गुजरने लगा। "आआआआआहहहह, घुसाती जा बिटिया, रुकी काहे। पूरी की पूरी ले ले। तू बहुत अच्छी बच्ची है। इस बुड्ढे की ख्वाहिश पूरी कर दे।" भलोटिया आहें भरते हुए बोला। वह मेरी कमर पकड़ चुका था। मुझे डर था कि कहीं वह मेरी कमर पकड़ कर नीचे न खींच ले। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। "डर लग रहा है। दर्द हो रहा है। बस बस अब और नहीं।" मैं रुआंसी हो कर बोली। "मेरी बहादुर बच्ची, डर काहे का। इतना तो घुस गया, बाकी भी घुस जाएगा। थोड़ा हिम्मत तो कर।" मेरी कमर पर थपकी देकर बोला। दर्द तो हो रहा था लेकिन चुदास भी कम नहीं थी। मैंने हिम्मत करके अपने शरीर को थोड़ा और नीचे किया। ओह ओह उसका लन्ड घुस रहा था, आह आह। दर्द उतना ही था, लेकिन अब मैं बर्दाश्त कर सकती थी। अब करीब पांच इंच घुस चुका था। मैंने शरीर को थोड़ा और नीचे किया, इस्स्स्स इस्स्स्स, उसका लन्ड और थोड़ा अंदर गया। ओह, यह तो कमाल हो रहा था, उसका लंड घुसता ही चला जा रहा था लेकिन दर्द अब थोड़ा कम हुआ था। अब तक मैं डर डर कर धीरे धीरे नीचे बैठ रही थी, इसलिए इन बीस पच्चीस सेकेंड में करीब सात इंच लन्ड मेरी चूत में समाया था। उधर भलोटिया के आनंद का पारावार न था।
03-02-2025, 01:07 PM
"आआआआआहहहह मेरी बिटिया रानी, इसी तरह, इसी तरह, हिम्मत से बैठती जा। उफ उफ मेरी जान, तू मेरा दिल जीतती जा रही है।" वह मेरा उत्साह बढ़ाता हुआ मेरी चूतड़ सहला रहा था। मुझे उसका इस तरह सहलाना बड़ा आनन्ददायक लग रहा था, साथ ही साथ मेरी हिम्मत भी बढ़ती जा रही थी। मैं और नीचे बैठने लगी, उफ उफ, उसका लंड मेरे भीतर कहां तक जाएगा इसकी परवाह किए बगैर मैं करीब नौ इंच तक खा चुकी थी। अब मेरी हिम्मत जवाब देने लगी थी, क्योंकि ऐसा लग रहा था जैसे मेरी चूत के अंदर और जगह बाकी नहीं बची है। सहसा मेरा हाथ नीचे गया, यह जानने के लिए कि अभी उसका लंड और कितना बाकी है और यह जानकर कि अभी भी अंदर जाने के लिए करीब दो इंच और बाकी था।
"बस आआआआआहहहह हो गया। बस इतना ही। अब और नहीं।" मेरे मुंह से निकला। मेरे मुंह से यह बात सुनते ही मेरी गान्ड सहलाने वाले भलोटिया के हाथों ने मेरी कमर को सख्ती से थाम लिया और एक ही झटके में मेरे शरीर को नीचे खींच लिया। "आआआआआहहहह ओओओओहहहहह मर गयी हरामीईईईईईई..... कुत्ता कहीं का आआआआआहहहह मांआंआंआंआंर डाला मुझे। इस्स्स्स्स्, फट गई मेरी मांआंआंआंआं.....।" दर्द से चीख उठी और आवेश में आकर अपना आपा खो बैठी। उससे छूटने की कोशिश में छटपटाने लगी लेकिन अब यह असंभव था। एक तो उसका पूरा लंड मेरी चूत के अंदर जड़ तक ठुंका हुआ था और वह कमीना बूढ़ा भालू पूरी सख्ती से मुझे दबा रखा था। छटपटाने का नतीजा यह हुआ कि मुझे और भी असहनीय पीड़ा होने लगी। मजबूरन मुझे स्थिर हो जाना ही उपयुक्त जान पड़ा। मन तो हो रहा था कि अबतक ओढ़ा हुआ शराफत का चोला उतार कर फेंक दूं और अबतक सीखी हुई सारी गंदी गालियों की बौछार कर दूं लेकिन मैं ऐसा करके अबतक की मेहनत पर पानी नहीं फेरना चाहती थी। अपनी पीड़िता बने रहने के नाटक का पटाक्षेप नहीं करना चाहती थी। हाय हाय, चुदने की चाह नें मुझे किस मुसीबत में फंसा दिया था। भलोटिया नामक उस बूढ़े खूसट, मोटे, दानवाकार भालू का करीब ग्यारह इंच लंबा भयावह लंड पूरी तरह मेरी चूत में जड़ तक घुस कर मानो मेरी सहनशक्ति की परीक्षा ले रहा था और मैं उस असहनीय पीड़ा को पीती हुई स्थिर हो गई थी। पहले कुछ पल मानों पहाड़ जैसे कटे लेकिन फिर धीरे-धीरे सबकुछ अपने आप ठीक होता चला गया। जो लंड पहले मेरी चूत को फ़ाड़ डालने को आतुर लग रहा था और इस वक्त भी अपने जलाल पर था लेकिन मेरे स्थिर होने के कारण उधम मचाने की तमन्ना लिए मेरी चूत की सख्त गिरफ्त में फंसा, शायद मेरी अगली हरकत के इंतजार में व्याकुल हुआ जा रहा था। साथ ही साथ शायद कह रहा था, ले ली तेरी परीक्षा और मान गया तुम को, अब तो शुरू हो जा। इधर मैं अकथनीय पीड़ा के स्थान पर एक अजीब तरह का अद्भुत रोमांचक अहसास से दो चार होने लगी। उफ वह अहसास, उफ उस परिपूर्णता का अहसास मुझे कितना सुकून दे रहा था वह मैं बता नहीं सकती। मुझे अब अच्छा महसूस हो रहा था। कोई पीड़ा नहीं। ओह, जैसे ही मुझे इस क्षणिक पीड़ा से राहत मिली, मैं बता नहीं सकती कि जो भयानक लंड मुझे कुछ पलों पहले हलकान कर रहा था, वही अब मुझे कितना प्यारा लग रहा था। मेरी चूत की दीवारें उसके लंड को कस कर दबोचे हुए मुझे कितना आनंद प्रदान कर रही थीं। साली चूत, जब ऐसा ही आनंद देना था तो कुछ पलों पहले मुझे रुला क्यों रही थी, हरामजादी ऐसी पीड़ा दे रही थी मानो मेरी जान ही लेकर मानेगी। बस बस, अब वही पहले वाली लंडखोर चुड़ैल वाली चुदास की आग सुलग उठी थी। गजब, इस अमानवीय लंड से चुदने की चुदास। सोच कर ही मन मुदित है उठा। मेरी आंखें बंद हो गई थीं। "क्या हुआ? कहां खो गयी? अब तुम्हारा चीखना चिल्लाना अचानक से बंद क्यों हो गया?" भलोटिया की आवाज से जैसे मैं नींद से जागी। "ककककक कुछ नहीं, बस दर्द से बेहाल थी। थोड़ा सांस ले रही थी।" मैंने आधा सच और आधा झूठ बोला। दर्द से बेहाल थी यह सच था लेकिन सांस ले रही थी, यह बात झूठ थी। सच तो यह था कि उतने बड़े लंड को पूरे जड़ तक अपने अंदर समा कर अपनी चूत से जकड़ने के उस अद्भुत अनुभव से दो चार हो रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे जो काम मेरे मुंह ने अधूरा छोड़ा था उसे मेरी चूत पूरी कर रही थी। उसके लंड को दबोच कर मानो चूस रही हो। शायद ऐसा ही अनुभव भलोटिया को भी हो रहा था तभी तो, "आआआआआहहहह मेरी प्यारी बिटिया, हां हां थोड़ी देर सांस ले ले और इसी तरह अपनी चूत से मेरे लौड़े को चूसती रह। ओह बहूऊऊऊऊऊत मस्त चीज़ है रेएएएएए तू। धन्य भाग्य मेरा। उफ उफ.... " भलोटिया भी किला फतह करने की अपनी खुशी का इजहार करते हुए बोला। वह अधमुंदी आंखों से मेरे लाल, रक्तिम चेहरे को देखता हुआ बोला। सचमुच मेरा चेहरा उत्तेजना के मारे लाल भभूका हो रहा था।
15-02-2025, 07:56 PM
कितना सुखद संतोष मिल रहा था मुझे। करीब एक मिनट तक मैं उन सुखद पलों को अपने अंदर आत्मसात करती रही।
"अब क्या सोच रही हो बिटिया? मेरे लौड़े को तो तूने जीत लिया। अब किस बात का इंतजार कर रही हो? अब तो पूरा लंड गटक गई, अब तो उठक बैठक शुरू कर। खुद भी ले ले मजा और मुझ बुड्ढे को भी दे दे मजा। आह आह...." वह अब बेसब्री से बोल उठा। उसकी आवाज से मेरी आनंदमई तंद्रा भंग हुई और मानो हवा में उड़ते उड़ते मेरे पैर जमीन पर आ थमे। अब कमान मेरे हाथों में थी। मैं धीरे धीरे पूरी सावधानी बरतते हुए ऊपर उठने लगी ओह ओह ओह, उसका लंड सरकता हुआ मेरी चूत की सख्त पकड़ छूट कर बाहर निकल रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई बहुत बहुमूल्य वस्तु मेरी पकड़ से छूट रहा हो। जितनी पीड़ा मुझे लंड घुसते समय हुई, उससे कई गुणा ज्यादा आनंद अब हो रहा था।घुसते समय का घर्षण अगर पीड़ा दायक था तो अब का घर्षण उतना ही आनंद दायक था। सही कहा गया है कि कष्टकारी परिश्रम का फल सदा ही मीठा होता है। "आआआआआहहहह....." मेरी आह निकल गई। "क्या हुआ, अब भी दर्द हो रहा है?" उस खेले खाए चुदक्कड़ को भी शायद अहसास हो गया था कि अब मुझे मज़ा आने लगा है, क्योंकि पीड़ा की आह और आनंद की आह में फर्क तो होता ही है। वह तो बस ऐसे ही बोला जैसे मेरी हालत का मजा ले रहा हो। "हां हां, न न न नहीं.... " मैं हां बोलूं कि ना बोलूं समझ नहीं पा रही थी। "हां और नहीं में फर्क होता है बिटिया। दर्द हो रहा है तो हट जा और मजा आ रहा है तो उठक बैठक शुरू कर।" वह जानता था कि अब मैं मैदान छोड़कर भागने वाली नहीं थी। "दर्द तो हो रहा है लेकिन आपकी खातिर कर रही हूं।" मैं झट से बोली। अब अपने मुंह से कैसे बोल दूं कि साले हरामी बुढ़ऊ, इतने दर्दनाक लम्हे झेलने के बाद अभी तो मजा आना शुरू हुआ है, ऐसे कैसे हट जाऊं। मैं ऊपर उठते उठते रुक गई। करीब चार इंच लंड बाहर निकल गया था लेकिन मैं उससे ज्यादा बाहर निकलने नहीं देना चाहती थी। इतने बड़े लंड के लिए मेरी चूत अभी अभी तो तैयार हुई थी। अभी ही तो चुदाई का मजा मिलने वाला था। वह मजा अभी ही तो मिलना शुरू हुआ था। ऐसे सुनहरे मौके में इस गधे जैसे लंड को अपने अंदर ही रख कर चुदने का मन हो रहा था। ऐसे भी इतने लंबे लंड की पूरी लंबाई से चुदने का मतलब होता मुझे ज्यादा ऊपर उठ कर बैठना, जो कि मेरे लिए थकान दिलाने वाला कसरत साबित होता। भलाई इसी में थी कि सिर्फ तीन चार इंच ही ऊपर नीचे हो कर चुदाई का मजा लूं, बाकी लंड मेरी चूत के अंदर ही रहकर हलचल मचाता रहे। यही चुदाई का संपूर्ण आनंद लेने का सर्वोत्तम तरीका मुझे समझ में आ रहा था। बस क्या था, मैं फिर से नीचे बैठने लगी। ओह ओह आह आह, कितना आनंददायक था वह। मेरा रोम रोम तरंगित हो रहा था। दो तीन बार इसी तरह धीरे धीरे ऊपर नीचे होती रही, फिर तो ये दिल मांगे मोर वाली स्थिति हो गई मेरी। मैं खुद पर से नियंत्रण खोने लगी। भलोटिया की तो निकल पड़ी। उसे मेरी कमर पकड़ कर ऊपर नीचे करने की आवश्यकता अब नहीं थी। वह समझ गया कि अब मैं मस्ती में आ चुकी हूं। मैं यंत्रवत खुद ब खुद ऊपर नीचे होने लगी। मेरे मस्तिष्क में अजीब सी खुमारी आ चुकी थी। चुदने का पूरा मजा लेने का वह समय आ चुका था जिसके लिए इतनी देर से मेरा शरीर छटपटा रहा था। इधर भलोटिया अब मेरी चूचियों को पकड़ कर मसलने लगा। ओह ओह यह दोहरा आनंद था। इधर मेरी चूत में भलोटिया के लौड़े की और मेरी चूचियों पर उसके पंजे की करामात। चुदाई के साथ साथ मेरी चूचियों को भोंपुओं की तरह दबाना मुझे स्वर्ग का दर्शन कराने लगा था। मेरी नस नस में बिजली सी कौंध रही थी। आह आह। "बहूऊऊऊऊत बढ़िया आह आह मेरी बिटिया रानी। गज्जब का मजा दे रही हो। उफ उफ साली जादूगरनी, बस यही तो मैं चाहता था। हरामजादी झूठ मूठ का नाटक कर रही थी मां की लौड़ी आह आह हां हां ऐसे ही।" भलोटिया मस्ती में भर गया था और वह भी नीचे से धक्का लगाना शुरू कर दिया था। तभी दो और हाथ मेरे कंधों पर आ गया। मैं चौंक गयी। "अब यह कौन आ गया?" मैं जानती थी कि यह घनश्याम के अलावा और कौन हो सकता है। "मेरे अलावा और कौन होगा साली रंडी।" यह घनश्याम ही था जो अबतक हमारे बीच जो कुछ चल रहा था उससे उत्तेजित होकर नियंत्रण में नहीं रह पाया और कुत्ते की तरह इस चुदाई में शामिल होने चला आया था। "नहीं नहीं। तुम दूर रहो। हाथ मत लगाओ।" मैं गुस्से से बोली।
15-02-2025, 07:57 PM
"हाथ कौन लगाने आया है, मैं तो लंड लगाने आया हूं।" कहकर वह मेरी गान्ड में उंगली पेल दिया। मैं चिहुंक उठी। अब यह कमीना भी शुरू हो गया था। मैं इस वक्त मस्ती के आलम में डूबी हुई थी। मैं घनश्याम को झिड़क ही सकती थी लेकिन शारीरिक रूप से कोई प्रतिरोध नहीं कर सकती थी। वैसे भी अब कौन मां का लौड़ा प्रतिरोध करके इस मस्ती भरी चुदाई में रुकने की बेवकूफी कर सकता था। मारना है तो मार ले मेरी गान्ड। मेरे लिए कोई नयी बात तो थी नहीं।
"हरामी कहीं का।" मैं बोली। मैं जानती थी कि यह स्थिति अभी नहीं तो थोड़ी देर में होनी ही थी और इसके लिए मैं मन ही मन तैयार भी थी। सच बोलूं तो मुझे गांड़ मरवाने में भी अब मजा आने लगा था। डबल पिस्टन का मजा भी गंजू और घनश्याम के साथ ले ही चुकी थी। उस मजेदार खेल की इस वक्त पुनरावृत्ति होने वाली थी। अच्छा संयोग बन गया था। वाह। कहां तो मैं दंडित करने के लिए लाई गई थी, मगर दंड की झंड हो गई थी और मस्ती में भर कर रांड हो गई थी। "वाह मेरे दोस्त। यह हुई ना बात। आखिर आ ही गया मादरचोद। चल तू भी शुरू हो जा। इसकी अगाड़ी मेरी हुई, पिछाड़ी तुम्हारी। बहुत दिनों बाद एक साथ किसी को चोदने का मौका मिला है, वह भी ऐसी मस्त लौंडिया को।" भलोटिया उसको आमंत्रित करते हुए मुझे दबोच कर सुविधा जनक पोजीशन बनाने की कोशिश करते हुए बोला। घनश्याम पर से हमारा ध्यान हट गया था और हम अपनी ही मस्ती में गुम थे, इसी दौरान वह भी नंगा पुंगा हो कर मुझ पर पिल पड़ने को आतुर चुदाई के मैदान में कूद पड़ा था। उसके शरीर पर एक चिंदी भी नहीं थी। "आप दोनों जानवर हो। यह मुझपर सरासर ज्यादती है। एक बुड्ढा काफी नहीं था जो दो दो बुड्ढे मुझ जैसी लड़की के साथ ऐसे मुंह काला कर रहे हो?" मैं प्रकटत: अपनी झल्लाहट प्रकट करते हुए बोली, हालांकि मन ही मन तो बोल रही थी, "हां हां, चोद साले बुड्ढों। जम कर चोदो मादरचोदो। दे दो मजा डबल पिस्टन का सालों। कब से चुदने को तड़प रही थी।" "साली रंडी, हमें जानवर बोल रही है। जिस तिस से लौड़ा खाती फिर रही है और हमें ज्ञान दे रही है कुतिया। भूल गयी कि गंजू और मुझसे कैसे एक साथ यहीं पर मजे से चुदवा रही थी हरामजादी? आआआआख थूऊऊऊ" कहते कहते घनश्याम अपने लंड पर थूक चुपड़ लिया। मैं जानती थी कि अब मेरी गान्ड का भी बाजा बजने वाला है। यह भी जानती थी कि यह मेरे लिए थोड़ी मुश्किल होने वाली थी, क्योंकि मेरी चूत में भलोटिया जैसे दानव का, मेरी जिंदगी का अब तक का सबसे बड़ा लंड फंसा हुआ था और अब घनश्याम का लंड मेरी गान्ड में घुसने को तैयार था। मुझे पता था कि घनश्याम का लंड भलोटिया के लंड जितना लंबा और मोटा नहीं था लेकिन था तो बड़ा ही। ऊपर से उसकी जो मुझे दंडित करके तकलीफ में देखने की मनोकामना थी वह भी पूरी नहीं हो रही थी, इसलिए निश्चित तौर पर वह मेरी गान्ड का भुर्ता बना कर अपनी खुन्नस निकालना चाहेगा। यह सोचकर मैं थोड़ी परेशान थी। "जो बोलना है बोलिए। जो करना है कीजिए। लेकिन फिर भी मैं इतना जरूर कहूंगी कि मैंने इतनी भी बड़ी ग़लती नहीं की थी कि मेरे साथ इस तरह का सुलूक किया जाए।" मैं अपनी बनावटी नाराजगी जाहिर करते हुए बोली। "जो गलती अनजाने में हो, वह माफी के लायक है लेकिन जो गलती जानबूझ कर की जाय वह गलती गलती नहीं, अपराध होता है और अपराध के लिए सजा तो बनता ही है, क्यों भलोटिया साहब, सही कहा ना?" वह भलोटिया का समर्थन की आशा से बोला लेकिन भलोटिया को तो इस वक्त सजा और मजा से कोई मतलब नहीं था। उसे तो इस वक्त जो चाहिए था उससे कहीं अधिक मिल रहा था। मजा ही मजा, मस्ती ही मस्ती। "अबे चूतिए, तू भी कहां इस वक्त सजा वजा के पचड़े में पड़ा हुआ है। आह आह ओह ओह इतना मज़ा दे रही है हमारी बिटिया और तू मादरचोद सजा देने की सोच रहा है। चुपचाप चोदना है तो तू भी शामिल हो जा नहीं तो वहां सोफे में बैठकर मूठ मारता रह। अरे बिटिया तू इस लौड़े के ढक्कन की बात सुनकर रुको नहीं। आह आह ऐसे ही आह रानी ऐसे ही खाती रह मेरा लौड़ा। आह आह।" भलोटिया घनश्याम को लताड़ लगा कर मेरा हौसला अफजाई करते हुए बोला। घनश्याम उसकी बात सुनकर खिसिया कर रह गया लेकिन मैं जानती थी कि भलोटिया की बातों से उसके मन की खुन्नस में और घी डाल दिया था। क्योंकि तभी घनश्याम ने आव देखा ना ताव, अपने मूसल को मेरी गान्ड की छेद पर रख कर एक करारा धक्का मार दिया। "आआआआआहहहह मर गयी हरामी कहीं के, ओह मांआंआंआंआं...." मैं दर्द से चीख पड़ी। उसने एक ही धक्के में अपना पूरा लंड मेरी गान्ड में घुसेड़ दिया था।
24-02-2025, 11:53 AM
Very hot erotica . Roza rocks.
25-02-2025, 02:42 PM
Wow.. Keep it up
27-02-2025, 01:24 AM
Super sexy
10-03-2025, 03:54 PM
"ये गया मेरा लौड़ा, लेएएएएएए......" घनश्याम बोला। उसकी आवाज में साफ साफ मुझे उसके मन की खुन्नस का आभास हो रहा था। वैसे भी जिस तरह से उसने मेरी गान्ड में हमला बोला था, यह बताने के लिए काफी था कि वह अपनी खुन्नस निकालने पर आमादा था। लेकिन मैंने भी ठान लिया था कि आज भले ही पीड़िता का नाटक बदस्तूर करती रहूंगी लेकिन उसकी मंशा पर पानी फेर कर रहूंगी। घनश्याम के हमले से एक बार जो तालबद्ध चुदाई चल रही थी उस पर खलल पड़ गया था लेकिन मैं जानती थी कि अब फिर से एक साथ इस दोहरी चुदाई का एक नया ताल आरंभ होने वाला था और पहले जो एक लंडीय चुदाई का आनंद ले रही थी, वहीं अब द्विलंडीय चुदाई से मुझे दुगुना आनंद मिलने वाला था। इसके लिए घनश्याम की थोड़ी ज्यादती को बर्दाश्त करने में मुझे कोई गुरेज नहीं था। मैंने मन को कड़ा किया और इस सामूहिक चुदाई का लुत्फ उठाने को तत्पर हो गयी।
घनश्याम का मुझपर टूट पड़ना कोई अनपेक्षित नहीं था। अभी नहीं तो कुछ देर बाद यह तो होना ही था। आखिर कब तक वह खुद को रोक पाता। उसके जबरदस्त धक्के से ऐसा लगा जैसे मेरी अंतड़ियों में भूकंप आ गया हो। एक बार पूरा लंड घुसेड़ कर वह बड़ी बेरहमी से मेरी चूचियों को पकड़ कर मसलना आरम्भ कर दिया और साथ ही साथ मेरी गान्ड का बाजा बजाना शुरू कर दिया। मैं भीतर ही भीतर तड़प उठी लेकिन इस तरह की जबर्दस्ती से मुझे एक अलग तरह का रोमांचक अनुभव से दो चार होने का अवसर हाथ लग गया। कुछ करारे धक्के खाने की पीड़ा को मैं किसी तरह झेल गई और फिर आगे जो हुआ वह कल्पना से परे था। उस पीड़ामय कुछ लम्हों के बाद मुझे उसी पीड़ा में मजा आने लगा। मेरी चूत में भलोटिया का बड़ा सा लंड तहलका मचा रहा था और इधर अब घनश्याम पूरी तरह पागलों की तरह मेरी गान्ड में अपना लंड गजागच पेलने को तैयार हो गया। अब मैं उन दोनों के बीच एक अद्भुत चुदाई का लुत्फ लेने वाली थी। यह अविश्वसनीय रूप से सच था। "आआआआआहहहह...." मेरी आहें निकलने लगीं। "साली कुतिया, अब आ रहा है न मजा, इधर उधर मुंह मारने की सजा का?" घनश्याम मेरी गान्ड कूटता हुआ बोला। "आह ओह दर्द हो रहा है" मैं बनावटी तकलीफ दिखाती हुई बोली। "यही तो मैं चाहता था।" घनश्याम बोला। "अबे साले यह डायलॉग बाजी बंद कर और चुपचाप चोद मां के लौड़े।" अबतक भलोटिया जो चुपचाप हमलोगों की बकबक सुन रहा था, बोल उठा और उसी के साथ अबतक शांत भलोटिया भी हरकत में आया। वह अब मेरी कमर को सख्ती से पकड़ कर धीरे धीरे चोदने की रफ्तार बढ़ाने लगा । "ठीक बोले भाई।" घनश्याम भी अब अपना ध्यान बकवास करने की जगह चोदने में केंद्रित किया और धकाधक मेरी गान्ड को कूटना आरंभ कर दिया। उन दोनों के बीच पिसती हुई मैं ज्यादा देर ठहर नहीं पाई और मैं, "आआआआआहहहह.... " निकालती थरथराती हुई धराशाई हो गयी। मैं उस स्खलन के सुख में मुदित भलोटिया के मोटे शरीर से चिपकी जा रही थी लेकिन उन दोनों ने थमने का नाम ही नहीं लिया। गजब के चुदक्कड़ बूढ़े थे। मेरे निढाल शरीर को भंभोड़ते हुए चोदते रहे चोदते रहे। दोनों के बीच मानों चुदाई की प्रतियोगिता हो रही थी। दोनों मानों पागल सांड बन चुके थे। हांफ रहे थे, कांप रहे थे मगर भिड़े हुए थे। साले बूढ़ों को तो मानो ऐसा लग रहा था जैसे फिर कभी मेरे जैसी लड़की जिंदगी में चोदने को नहीं मिलेगी, इसलिए जो कसर निकालना है अभी ही निकाल लो, भले ही इस धींगामुश्ती में उनकी जान ही न चली जाए। खासकर भलोटिया साला मोटा भालू। हां घनश्याम की बात अलग थी, वह तो जबरदस्ती मुझ पर पिल पड़ा था, जबकि उसका मुझ पर अपनी औकात से ज्यादा जोर अजमाइश मात्र खुन्नस निकालने के अलावा और कुछ नहीं था। उस चुदाई प्रतियोगिता की एकमात्र बेबस शिकार बनी मैं बेदर्दी से चुदी जा रही थी, नुची जा रही थी। घनश्याम ज्यादा बेरहम हुआ जा रहा था। वह मेरी गान्ड का भुर्ता बनाते हुए मेरी चूचियों को बेरहमी से मसलता जा रहा था। ओह भगवान, इस अंतहीन चुदाई के अंत का में दम साधे इंतजार करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती थी। लेकिन घनश्याम की रफ्तार मुझे इस बात का आभास दिला चुकी थी कि बस वह अब कुछ सेकेंड का ही मेहमान है और लो, |
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