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Misc. Erotica गरम रोज
"नहीं नहीं, यह कककक्या कर रहे हो। वहां नहीं वहां नहीं।" मैं टेबल पर से उठना चाहती थी लेकिन उसने मुझे मजबूती से झुका कर दबा दिया था।
"अरे घबड़ा काहे रही है? हम तेरी गांड़ नहीं मारेंगे। यह लौड़ा तेरी बुर में ही घुसेगा।" उसकी बात सुनकर मैं आश्वस्त हुई और संघर्ष करना छोड़ दी। पीछे से ही अब उसका हाथ मेरी चूचियों पर पहुंच चुका था। वह दोनों हाथों से मेरी चूचियों को पकड़ कर धीरे धीरे दबाने लगा।
"ऊऊऊऊऊऊ मांआंआंआंआ......" मेरे उत्तेजक अंगों से वह कमीना खिलवाड़ कर रहा था जिससे मेरी उत्तेजना बढ़ रही थी। वह मुझ पर झुक गया था और उसकी गर्म सांसें अपनी गर्दन पर महसूस कर रही थी। तभी उसने मेरी पीठ पर चुंबनों की झड़ी लगा दी।
"आआआआआआह इस्स्स्स्स्....." मैं उत्तेजना के मारे सिसकने लगी थी। इसी दौरान उसका लंड मेरी गान्ड के दरार से नीचे खिसक कर मेरी चूत पर दस्तक देने लगा। मैं गनगना उठी। इधर वह मेरी चूचियों को दबा रहा था, मेरी पीठ को चूम रहा था और रही सही कसर मेरी चूत के दरार पर अपना लंड घिसते हुए निकाल रहा था। मैं तो मानो पागल सी हो गई थी। मेरी चूत से लसलसा पानी निकलने लगा और उस गीली चूत के ऊपर उसका लंड फिसल रहा था। रघु को समझते देर नहीं लगी कि अब मैं चुदने के लिए पूरी तरह तैयार हो गई थी। सही मौका बन चुका था और निशाने पर लंड रख कर अपनी कमर से एक झटका मार दिया और गच्च से उसके लंड का सुपाड़ा मेरी चूत के अंदर समा गया।
"आह ओह......" मेरी चूत को मानो लॉलीपॉप मिल गया था। मीठा मीठा लॉलीपॉप। इसके बाद तो वह सचमुच कुत्ता बन गया। मेरी कमर पकड़ कर अपने लंड पर दबाव बढ़ाता चला गया और लो, सरसराता हुआ उसका पूरा लंड मेरी चूत के अंदर दाखिल हो कर मेरे अंतर्मन को उस सुखद स्वाद से परिचित कराने लगा जिसके लिए मैं इस वक्त मरी जा रही थी।
"लो घुस्स गया।" वह बोला और थोड़ा रुका।
"यह मुझे बताने की जरूरत है? जिसके अंदर डंडा घुसा है उसे बता रहे हो गधे कहीं के? बड़ा आया मुझे बताने कि घुस गया है, हरामजादा।" इधर मेरे अंदर आग लगी हुई थी और चुदाई के इंतजार में पगलाई जा रही थी, ऐसे समय में इस फालतू बात का मेरे लिए कोई मायने नहीं था। लंड घुसेड़ने के बाद उसका इस तरह रुकना मुझे खल रहा था। साला बेवजह अपनी फतह का इजहार करने में समय जाया कर रहा था, कुत्ता कहीं का।। मेरे अंदर उसका पूरा आठ इंची औजार ठुका हुआ था जिसके कारण मेरे अंदर की आग और भड़क उठी थी और अब मुझे इस तरह का विराम बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं था। मैं चाह रही कि उस औजार से अविलंब मेरी अच्छी तरह से कुटाई शुरू हो जाय।
"हम सोचे कि चोदना शुरू करने के पहिले बता दें।" सूअर का बच्चा चोदना शुरू करने से पहले औपचारिकता निभा रहा था। मैं झुंझला उठी।
"चुप गधे कहीं के। पहले लंड घुसेड़ दिया और अब बताने की औपचारिकता निभा रहा है, मां का....." मैं तड़प कर बोली।
"ठीक है। अब हम कुच्छ ना बोलेंगे, अब जो भी बोलेगा हमारा लौड़ा बोलेगा।" यह कहकर उसने मेरी कमर को कस कर पकड़ लिया। मैं समझ गई कि अब यह कुत्ता मुझे कूटना शुरू करेगा। इसी पल के लिए तो तड़प रही थी। उसने अपने को पीछे खींचा और उसी के साथ उसका लंड बाहर सरसराता हुआ निकला और अगले ही पल गच्च से फिर घुसेड़ दिया। मैं हिलक उठी। यह शुरुआत थी मेरी चुदाई के तीसरे दौर की। इसके बाद वह कुत्ते की तरह मुझे पीछे से अपनी कमर को आगे पीछे करते हुए ठोंकना आरंभ कर दिया। मैं उस टेबल पर अपने ऊपरी धड़ को आराम से रख कर झुकी हुई पीछे से कुतिया की तरह रघु के लिए अपनी चूत परोसती हुई चुदाई का मजा लेने लगी। अपनी ओर से मुझे कोई अतिरिक्त प्रयास करने की जरूरत नहीं थी। जो करना था उसी को करना था, मुझे तो बस पूर्ण समर्पण के साथ मजा लेना था और मैं वही कर रही थी। मैंने अपनी देह को पूरी तरह उसके हवाले कर दिया था। अब वह मेरी देह के साथ वह सारी हरकतें करने लगा जो ऐसे समय में एक काम क्षुधा के मारे पागल द्वारा की जाती हैं। वह मेरी गर्दन और पीठ को चूम रहा था। वह पीछे से हाथ घुसा कर मेरी चूचियों को मसल रहा था। इस वक्त वह पूरे जोश में था और जिस जोशो-खरोश से वह मुझे चोद रहा था उससे ऐसा लग रहा था कि वह आज ही इतने दिनों की पूरी कसर निकाल लेना चाह रहा हो। कल की बात कौन जानता है, क्या पता कल हो ना हो। मैं बेहद आनंदित थी साथ ही साथ चकित भी थी कि वह मुझे दो दो मिनट का विराम लेकर तीसरी बार भी पूरे दमखम के साथ चोदने में सक्षम था। यह रघु आदमी था कि चोदने की मशीन। घुसा, घनश्याम और गंजू के बाद आज ऐसे आदमी से पाला पड़ा था जिसका वश चले तो चोद चोद कर मार ही डाले। मेरे शरीर का पोर पोर थकता जा रहा था लेकिन फिर भी उसकी अथक चुदाई का पूरा लुत्फ ले रही थी। मैं सोच रही थी कि ऐसे मर्द की बीवी अगर ऐसी अथक चुदाई को झेल सकने में सक्षम होगी तो कितनी भाग्यशाली होगी। सक्षम नहीं भी थी होगी तो अबतक तो पूरी तरह सक्षम हो चुकी होगी। उसकी चूत का तो भोंसड़ा बन चुका होगा। सोच कर ही मैं कुतिया की तरह चुदती हुई हठात मुस्कुरा उठी। तभी उसके धक्कों की रफ्तार तीव्र हो गई और उस तीव्र रफ्तार के कारण मैं उत्तेजना के चरम पर जा पहुंची और
"आआआआआआह ओओओओओहहहहह...." वह सहसा रुक कर मुझसे चिपक गया और उसका लंड मेरी चूत में जड़ तक समा कर सख्त और मोटा होने लगा और गरमागरम लावा उगलने लगा। मैं तो जैसे दूसरी ही दुनिया में पहुंच गयी।
"ओओओओओहहहहह मांआंआंआंआं.... आआआआआआह गयीईईईईईई मैं गयीईईईईई...." कहते कहते मैं भी झड़ने लगी। ओह वह हम-दोनों का सम्मिलित स्खलन अत्यंत सुखद था। झड़ कर जहां में उसी टेबल पर सर रखकर लंबी लंबी सांसे लेने लगी थी वहीं रघु मुझ पर लद कर कुत्ते की तरह हांफ रहा था।
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अचानक रघु मुझपर से उठ गया। मुझे समझ नहीं आया कि उसने ऐसा क्यों किया। खैर मुझे क्या। मेरा तो हो गया। जी भर के हो गया। मैं थोड़ा और आगे की ओर सरक कर पूरी तरह टेबल पर निढाल मुंह के बल लेटी पड़ी रही। तभी मुझे महसूस हुआ कि रघु का हाथ मेरी चूतड़ पर रेंग रहा था।
"नहीं नहीं, यह क्या कर रहे हो?" मैं हड़बड़ा कर बोली और साथ ही पलट गई। अब जो नजारा मेरे सामने था उसे देखकर मैं आतंकित हो उठी। वह फिर से मुझे चोदने को तैयार था। मेरे होश फाख्ता हो गए। रघु फिर से तरोताजा दिखाई दे रहा था। उसके चेहरे पर वही ताजगी फिर से छाई हुई थी। वह उसी तरह भूखी नज़रों से मेरी नग्न देह को देख रहा था जैसे पहली बार देख रहा था। आश्चर्य तो मुझे यह देखकर भी हो रहा था कि उसका लंड अब भी तना हुआ था और उतना ही लंबा और मोटा दिखाई दे रहा था जितना दूसरी चुदाई के वक्त था। यह क्या हो रहा था, मुझे समझ में नहीं आ रहा था। क्या वह अपनी इच्छानुसार अपने लंड का आकार छोटा बड़ा कर सकता था? रघु यह कैसे कर रहा था यह मेरी समझ से परे था। इस वक्त उसका लंड कुछ अधिक ही चमक रहा था, जैसे उसपर तेल चुपड़ कर आया हो। क्या यह कोई चमत्कारी तेल का कमाल था? यह तो मुझे कुछ ही देर मे समझ में आने वाला था।
"घबरा काहे रही हो?" वह मेरे शरीर की ओर हाथ बढ़ाता हुआ बोला। उसकी आवाज भी हल्की सी बदली बदली सी थी। अब मैं आशंकित हो उठी। क्या यह दोहरे व्यक्तित्व वाला आदमी था? यह इन्सान ही था या कोई जिन्न?
"घबराऊं नहीं तो और क्या? अब फिर से?" मैं उस टेबल पर से उठना चाहती थी लेकिन उसने मुझे ठेल कर उसी टेबल पर लेटे रहने को मजबूर करने लगा।
"अरे उट्ठती काहे है? अब्भी तो एक बार अऊर चोदना है। देख नहीं रही है हमारा लौड़ा कईसे फड़क रहा है।" वह अब जबरदस्ती पर उतर आया था।
"तुम आदमी नहीं राक्षस हो। करने की भी एक सीमा होती है। देख नहीं रहे मेरी हालत, मार ही डालोगे क्या? नहीं नहीं और नहीं। मुझमें अब और ताकत नहीं है। मानती हूं कि तुम बहुत जबरदस्त मर्द हो और बहुत अच्छे से औरत को खुश कर सकते हो लेकिन इस तरह लगातार करोगे तो कोई लड़की बर्दाश्त कैसे करे? नहीं नहीं। बस बहुत हो गया, अब और मुझसे नहीं होगा।" मैंने किसी प्रकार ताकत जुटा कर उसे एक धक्का दिया और टेबल पर से उठ कर अपने कपड़ों की ओर लड़खड़ाते कदमों से बढ़ी लेकिन मैं तब घबरा गई जब मैंने अपने कपड़ों को वहां नहीं पाया। मेरे कपड़े उस लैब में कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। मेरी बेध्यानी में कब और कहां गायब कर दिया था उस गधे ने?
"मेरे कपड़े कहां गये?" मैं घबराकर रघु से बोली। मुझसे ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे मेरे शरीर को निचोड़ कर रख दिया गया हो। चुदाई का नशा उतर गया था और अब मुझे महसूस हो रहा था कि मेरी कितनी जबरदस्त चुदाई हुई थी। बाआआआआप रेएएएएए बाआआआआप, क्या चुदाई हुई थी मेरी। अब पता चल रहा था। चूंचियों को नोच नोच कर और दबा दबा कर सुजा दिया था और लाल कर दिया था साले हरामी रघु ने। तत्कालिक तौर पर मेरी चूत फैल कर भोंसड़ा बन गई थी। सूज कर थोड़ी बाहर की ओर भी उभर आई थी जिसमें मीठी मीठी सी जलन भी हो रही थी और इसी हालत में रघु मुझे फिर से चोदने की बात कर रहा था।
"आ जाएंगे तेरे कपड़े, बस्स एक बार और हमारे लौड़े का भूख मिटा दे।" रघु अपने चमचमाते लंड को हिलाते हुए मुस्कुरा कर बोला। मैं कांप उठी। यह मैं कहां आ फंसी थी। वासना की भूख के वशीभूत यहां आ तो गयी थी मगर अब सोच रही थी कि यहां आ कर कितनी बड़ी ग़लती कर दी थी। मुझे एक ही आदमी बार बार चोद रहा था लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे चार पांच लोग बारी बारी से मेरे शरीर का मजा ले रहे थे। घनश्याम नें सच ही कहा था कि मेरा खिलंदड़पन किसी न किसी दिन मुझे किसी मुसीबत में फंसा देगा और देखिए, उसका कथन कितनी जल्दी सच हो गया था।
"प्लीज़ अब और नहीं। मेरे कपड़े दे दो और मुझे यहां से जाने दो।" मैं मजबूर हो कर हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगी। ऐसा करते हुए सचमुच मुझे अपनी मजबूरी पर रोना आ रहा था। सामान्य अवस्था में ऐसी हरकत के लिए उसकी क्या गति कर सकती थी यह उससे अच्छी तरह और कौन जान सकता था। लेकिन अभी स्थिति दूसरी थी। उस परिस्थिति पर नियंत्रण सिर्फ उसी के हाथ था। पता नहीं उसने कब मेरे कपड़े वहां से गायब कर दिए थे और ऐसी नग्नावस्था में मैं वहां से जा भी नहीं सकती थी। उसके साथ जोर जबरदस्ती भी नहीं कर सकती थी वरना पता नहीं वह मेरी इस स्थिति का फायदा और किस किस तरह से उठाता। गनीमत थी कि अबतक जो कुछ वह कर रहा था अकेले कर रहा था, वरना वह चाहता तो और लोगों को भी बुला कर मेरी नंगी देह परोस देता और मैं कुछ भी नहीं कर सकती थी। मेरे गिड़गिड़ाने का कोई असर उसपर नहीं हो रहा था। अंत में मैंने उसे धमकी दी,
"मेरे कपड़े दे दो वरना ठीक नहीं होगा।" मैं जानती थी कि यह कोरी धमकी थी, फिर भी शायद यह धमकी काम कर जाय, यही सोचकर मैंने थोड़ी सख्ती से कहा था लेकिन मेरी बात सुनकर वह हंसने लगा।
"वरना क्या करेगी, मारेगी? मारने में तो तू बड़ी उस्ताद है, ले मार, मगर तेरे कपड़े तो तब्भी मिलेंगे जब तू हमारी बात मान लेगी। बस्स एक्क ही बार अऊर तो मांग रहे हैं, हम कहां ज्यादा मांग रहे हैं।" वह अपना लंड हिलाते हुए बोला। वह मेरी मजबूरी पर मन ही मन शायद बड़ा खुश हो रहा था जो उसके चेहरे पर भी झलक रहा था। उसकी बोली सुन कर मेरी कोरी धमकी की हवा फुस्स हो कर निकल गई।
"कुछ तो तरस खाओ।" मैं दयनीय स्वर में बोली।
"खाया। तरस खा लिया। मगर तुम्हारा बुर पर तरस खाया। चोदने में मजा तो बहुत आया। फिर बुर चोदने का मन हो रहा है लेकिन तुम बोल रही हो तो नहीं चोदते। वईसे भी हमको तुम्हारा बुर में तरस आ रहा है। तीन बार बुर में लौड़ा खा ली। लौड़ा खा खा कर फूल गया है। तुम्हारा बुर को आराम देना चाहिए। है कि नहीं? चलो अब्ब तुम्हारा पिछाड़ी का कल्याण करते हैं। ई सही है ना? इत्तन्ना बड़ाआआआ चिकना गांड़ बिना चोदे छोड़ दें, ई कईसे हो सकता है भला। बस्स यही कसर रह गया था, ऊ भी पूरा हो जाने दो। बस्स ई आखिरी बार है, फुल अऊर फाइनल। कस्सम से।" वह आगे बढ़ता हुआ बोला। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूं। इस नंगी हालत में मैं यहां से भाग भी नहीं सकती थी‌। यह शैतान पता नहीं मेरे कपड़े कहां गायब कर दिया था। बिना उसकी इच्छा पूरी किए मुझे मेरे कपड़े नहीं मिल सकते थे‌। बड़ी बुरी तरह फंस चुकी थी। उसकी बात मानने के अलावा मेरे पास और कोई विकल्प नहीं था। उसको संतुष्ट करके ही मेरा छुटकारा संभव था। लेकिन इसकी भी कोई गारंटी नहीं थी कि इसके बाद फिर चोदने की बात नहीं करेगा। अब यह मेरी गान्ड मारने की बात कर रहा था। सच में मेरी चूत की चटनी बन चुकी थी। गांड़ देने का विकल्प सही था लेकिन उसका मोटा लंड मुझे भयभीत कर रहा था। लेकिन और कोई चारा भी नहीं था।
"तुम्हारी बात का क्या भरोसा। बहला फुसलाकर मार लोगे फिर बोलोगे कि और एक बार। तुम मेरी जान ही ले लोगे।" मैं बोली।
"कस्सम से। ई आखिरी बार। ई रघु का बचन है।
रघुकुल रीत सदा चली आई,
परान जाई पर बचन ना जाई।" वह सामने आकर मेरी गान्ड सहलाता हुआ बोला। उसके मुंह से इस वक्त रामायण का दोहा सुनकर चिढ़ गई लेकिन मेरी गान्ड पर उसका हाथ पड़ते ही पता नहीं मुझे क्या हो गया। चुद चुद कर बेहाल होने के बावजूद गांड़ मरवाने की बात सुनकर सनसना उठी।
फिर भी बोली, "चुप हरामी। बड़ा आया रघुकुल रीत की बात बोलने वाला। राम से अपनी तुलना करता है कमीना। काम कर रहा है रावण वाला और रघुकुल की दुहाई दे रहा है। रावण तो फिर भी अच्छा था कि सीता के साथ जबरदस्ती नहीं किया था।"
"हम जबरजस्ती किए क्या? तुम खुद ही ना आई थी? खुद ही आई थी तो क्या मां चुदाने आई थी साली रंडी? सीता भी तेरे जईसा खुद ही आ जाती तो रावण चोदे बिना छोड़ता क्या? बड़ी आई सीता मईया बनने। अब चल टाईम बर्बाद ना करो।" वह मेरी गान्ड सहलाते हुए बोला। छि: छि:, वासना के आवेग में मैं क्या से क्या बन गई थी। एक घटिया गेटकीपर के मुंह से अपने लिए इतनी घटिया बातें सुनकर मुझे खुद पर बड़ी शरम आ रही थी लेकिन मैं भी कितनी ढीठ थी, कि उस फजीहत को भी पी गई। दरअसल उसका मेरी गान्ड सहलाना मुझमें गांड़ मरवाने की तलब पैदा करने लगा था। वैसे भी गांड मरवाना अब मेरे लिए कोई नयी बात नहीं रह गई थी। उसका तेल से चुपड़ा चमचमाता लंड बड़ा आकर्षक दिखाई दे रहा था। मोटा था तो मोटा था लेकिन मुझे पता था कि मैं इस लंड को अपनी गांड़ में लेने को सक्षम थी। फिर भी बोली,
"अपनी मर्ज़ी से आई हूं तो क्या, इतनी बेइज्जती तो मत करो। अच्छा छोड़ो यह फालतू बात, लेकिन जो तुम चाह रहे हो, उससे मेरी तो फट जायेगी। बहुत मोटा है ना तुम्हारा। प्लीज़ मत करो ना।" मैं जानती थी कि वह मेरी गान्ड मारे छोड़ेगा नहीं और मैं भी मरवाने के लिए लालायित हो उठी थी लेकिन इतनी आसानी से मान जाती तो उसके सामने मेरी फजीहत हो जाती।
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"अर्रे इसी लिए तो इत्तन्ना तेल लगा कर तईय्यार हैं। तुम घबराओ नहीं। तुम्हारा गांड़ को कुच्छ ना होने देंगे।" वह मुझे टेबल की तरफ ढकेलते हुए बोला।
"नहीं प्लीज़।" मैं धक्के खाकर टेबल से जा टकराई। दरअसल मुझमें विरोध करने की न तो कोई खास ताकत बची थी और न ही इच्छा।
"चुप साली रंडी। पिलीज बोलती है। चल पलट कर टेबल पर झुक जा।" वह बोला और मेरे पलट कर झुकने से पहले ही खुद ही मुझे पलट दिया और टेबल पर औंधे मुंह झुका दिया और पीछे से मेरी चूचियों को पकड़ लिया। वह न सिर्फ मेरी चूचियों को पकड़ा बल्कि अपनी हथेलियों से मसलने लगा।
"ओओओओओहहहहह.... धीरे आआआआआआह...." मैं मस्ती में आ कर बुदबुदा उठी।
"हमको धीरे और जोर का फरक पता नहीं। तुमको मज्जा आ रहा है ना।" वह अपना लंड मेरी गान्ड की दरार पर रगड़ना आरंभ कर दिया।
"आह इस्स्स्स्स्.... पूछ काहे रहे हो, आआआआआआह करो ना...." मैं आंखें बंद किए हुए टेबल पर झुकी झुकी बोल उठी।
"ओ हो, ई बात है..... " कह कर वह एक हाथ से अपने लंड को मेरी गान्ड की छेद पर टिका दिया। मैं समझ गई कि अब मेरी गान्ड का फालूदा बनने वाला है। मैं ने दांत भींच लिया। उधर रघु अपने लंड पर दबाव देने लगा। तेल से चुपड़ा होने के कारण उसका लंड मेरी गान्ड के छेद को खोलता हुआ फिसलते हुए अंदर दाखिल होने लगा। ओह ओह, मेरे गांड़ के छेद को उसका लंड फैलाता जा रहा था और जबर्दस्ती घुसता जा रहा था। उफ उफ, जैसे ही उसके लंड का सुपाड़ा मेरी गान्ड के अंदर दाखिल हुआ, फिर तो सरसराता हुआ घुसता ही चला गया।
"आआआआआआह.... " मैं कराह उठी। जी हां, हल्की हल्की पीड़ा हो रही थी, उतना मोटा जो था। लेकिन एक अजीब तरह का रोमांच अनुभव कर रही थी। दरअसल रघु जिस तरह से मेरी चूचियों के साथ खेल रहा था, उसका भी सुखद अहसास मुझे महसूस हो रहा था जिसके कारण मेरी गान्ड में जो पीड़ा हो रही थी, वह मुझे ज्यादा परेशान नहीं कर रहा था। मेरी गान्ड के रास्ते घुसता हुआ उसका लंड मेरी गुदा के अंदर की भीतरी दीवारों में जो घर्षण पैदा कर रहा था वह संवेदनशील तंत्र के माध्यम से मेरे मन मस्तिष्क तक सनसनाहट भेज रहा था। रघु अपना लन्ड मेरी गान्ड में घुसेड़ कर रुका लेकिन उसका रुकना मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा।
"अब रुका काहे कुत्ता कहीं का।" मेरे मुंह से निकला।
"इत्तन्ना टाईट गांड़ में बड़ा मुश्किल से तो घुसा है। अब घुस्स गया, थोड़ा रुक कर खुश होने तो दे कुतिया।" वह बोला।
"इतनी तकलीफ़ दे कर मेरी पिछाड़ी में जब रास्ता खोल ही दिया तो, अब रुक कर मुझे काहे तड़पा रहे हो? खुद ही अकेले खुशी मना रहा है कमीना, मुझे भी खुश कर हरामी।" मैं तड़प कर बोली।
"अर्रेएएएए मेरी कुतिया, अबतक हाय नहीं हाय नहीं कर रही थी, अब गांड़ मरवाने के लिए मरी जा रही है मां की लौड़ी साली बुरचोदी। ले, अब्ब तू भी देक्ख कईसा मरद से पाला पड़ा है।" कहकर उसने लंड थोड़ा बाहर निकाला और मेरी चूचियों को छोड़कर मेरे कंधों को कस कर पकड़ लिया और घप्प, पूरी ताकत से फिर घुसेड़ दिया।
"आह.... ‌‌साला जल्लाद ओओओओओहहहहह....." मेरे मुंह से आह निकल पड़ा। यह धक्का जबरदस्त था। पहली बार घुसाने में जो थोड़ी बहुत कसर थी वह भी पूरी हो गई। उसका उतना बड़ा लंड पूरी तरह जड़ तक मेरी गान्ड में समा चुका था। मुझे पीड़ा से छटपटाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस वक्त मुझे अजीब तरह का सुकून मिलने लगा। ओह, अब समझ में आ रहा था कि घुसा, घनश्याम और गंजू ने मिलकर मुझे गांड़ मरवाने का मजा लेना भी सिखा दिया था।
"अब्ब आया मजा मेरी रंडी?" वह बोला।
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"हां हरामी हां, अब ठीक है। चोद मां के लौड़े चोद। मेरी गान्ड का कल्याण कर।" मैं मुदित मन से बोली। मुझे उसकी गालियां अच्छी लग रही थीं। मैं भी सारी लाज शरम ताक में रखकर उसी के स्तर में उतर आई और अपना मुंह गंदा करते हुए गालियों वाली भाषा का इस्तेमाल करने लगी। इसके बाद जो हुआ वह शब्दों से बयां करना मुश्किल है। उसके अंदर जैसे भूत सवार हो गया। एकदम कुत्ते की तरह दनादन ठोंकना चालू कर दिया। उफ उफ उफ उफ, कितनी तूफानी रफ्तार से चोद रहा था वह, जैसे कल कभी न आएगा। सारी कसर निकाल लेना चाह रहा था जैसे। कभी कंधे पकड़ कर चोदता, कभी चूचियों को निचोड़ते हुए चोदता, कभी मेरी कमर पकड़ कर चोदता और इस दौरान कभी कभी अपनी उंगलियों से मेरी चूत को रगड़ता, थपकियां देता और कभी अपनी उंगली मेरी चूत में घुसेड़ता। यह सबकुछ मुझे आनंद से सराबोर कर रहा था। मुझमें भी न जाने कहां से आंतरिक जोश जाग गया था कि मैं भी सक्रिय हो कर अपनी गांड़ उछालने लगी थी। जब जब उसकी उंगलियां मेरे भगनासे को छेड़ती तो मैं दूसरी ही दुनिया में पहुंच जाती थी। यह अद्भुत था। मैं उसकी कामुक हरकतों से उत्तेजना के चरम पर पहुंच गयी।
"वहां नहीं वहां नहीं।" जब जब उसकी उंगलियां मेरे भगनासे से खिलवाड़ करती थीं तो मैं बोल उठती थी लेकिन वह माने तब ना।
"कहां नहीं?"
"मेरी चूऊऊऊऊऊत में गधे।" मैं बोली।
"हमको मत सिखा साली कुतिया कहीं की। इत्ती लौंडियों को अईसे ही चोदे हैं। जरा टेबल छोड़कर नीचे तो आ जा, पूरी कुत्ती न बना दिया तो कहना। फिर बोलेगी अईसे ही चोदो।" कहकर वह मुझे खींच कर फर्श पर ले आया। जोश में मुझे होश ही नहीं था कि वह किस तरह मुझे चोदने वाला है। जैसा उसने चाहा वैसा ही किया और मुझे फर्श पर चौपाया बना दिया। मैंने भी कोई विरोध नहीं किया। उस वक्त चुदाई की मस्ती में पागल मुझे सिर्फ और सिर्फ चुदने से मतलब था। वह अब मेरे पीछे घुटनों के बल बैठकर कुत्ते की तरह फिर से मेरी गान्ड मारने लगा और मैं आंखें बंद किए चुदती रही।
"आह आह आह" वह मस्ती में भर कर चोदना जारी रखते हुए बोला और बहुत जल्दी ही मैं थरथराने लगी। यह मेरे चर्मोत्कर्ष पर पहुंचने का लक्षण था। मैं उसके स्तंभन क्षमता की कायल हो गयी। साला झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था और मैं झड़ने लगी। ओह ओह....
"आआआआआआह ओओओओओहहहहह गयी मैं गयी ईईईईईईईई.. ... ‌" मैं अभूतपूर्व स्खलन के सुख में डूबती जा रही थी।
"हुम्म हुम्म ये ल्लेएएएएएए.. हम भी गयेएएएए रेएएएएए साल्लीईईईईईई हरामज्जाद्दी कुत्तीईईईईई रंडीईईईईई.. ‌" उसके मुंह से निकला और पूरा लंड घुसेड़ कर मुझसे चिपक गया, उसी के साथ उसका लंड गरमागरम लावा उगलने लगा। पूरी तरह हम दोनों खल्लास हो कर निवृत्त हो गये। जहां वह कुत्ते की तरह हांफ रहा था वहीं मैं औंधे मुंह फर्श पर धप्प से निढाल गिर पड़ी और लंबी-लंबी सांसें लेने लगी। इतनी लंबी चुदाई को झेल सकना कोई हंसी-खेल नहीं था। दो दो मिनट के विराम के बाद करीब करीब बीस बीस पच्चीस पच्चीस मिनट की लंबी चुदाई का वह अंतहीन दौरान आखिर समाप्त हुआ। पूरी तरह निचुड़ चुकी थी मैं। उसका उतना मोटा और लंबा लंड सिकुड़ कर पुच्च से मेरी गान्ड के बाहर निकल आया।
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Bahut din ke bad maza aa ya
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"साली लंडखोर, मान गया तुमको। झूठ मूठ का डरामा कर रही थी हरामजादी।" वह मेरी गान्ड पर थप्पड़ मारकर बोला।
"कुत्ता कहीं का। जान निकाल दिया और बोलता है ड्रामा कर रही थी। पता नहीं और लड़कियों का क्या हाल करते हो?" मैं पलट कर बोली।
"और लड़कियों का तो बात ही मत्त करो। एक्के चुदाई में साली लोग का गांड़ फट्ट जाता है। अईसे बकरी जईसा में में करते हैं कि दुबारा चोदने का मन ही नहीं करता है। तुम अलग हो। खास हो। साली जईसा तुम्हारा बुर है वईसा ही जबरदस्त तुम्हारा गांड़ है। मां कस्सम, तुम्हारा गांड़ तो चूत से भी जादा मस्त है। मज्जा ही आ गया।" वह मेरी गान्ड को मसलता हुआ बोला।
"हट साला हरामी। चोद चोद कर फाड़ दिया और अब प्रशंसा के पुल बांध रहा है चुदक्कड़ कहीं का। अब मेरे कपड़े दे।" कहकर मैं उठने लगी लेकिन मेरे पैर जवाब देने लगे थे। पैर थरथराने लगे थे। किसी प्रकार उठ कर खड़ी हुई।
"ऊ का है, उधर।" पीछे के दरवाजे की ओर इशारा करते हुए बोला वह। मैं लड़खड़ाते कदमों से उधर गयी तो सचमुच मेरे कपड़े पीछे के दरवाजे के पास पड़े हुए मुझे मुंह चिढ़ा रहे थे। मैं चकित दृष्टि से कभी अपने कपड़ों को देखती और कभी रघु को देखती। रघु बड़ी रहस्यमई मुस्कान के साथ मुझे देख रहा था।
"जब मैं खोज रही थी उस समय तो ये यहां नहीं थे।" मैं सशंकित हो कर बोली।
"हां, नहीं थे, अब आ गये। हम कहे थे ना, रघुकुल रीत..." वह अपनी बात पूरी करता उससे पहले ही
"चुप हरामी साले रघुकुल का कलंक। मुझे बेवकूफ बना कर...."
"बेवकूफ नहीं बनाता तो इत्तन्ना मज्जा कहां आता। और हां, का बोली? रघुकुल का कलंक? साली बुरचोदी, रघुकुल का नाज बोलो। बचन का पक्का हैं, नहीं तो अब्भी अऊर कित्ता बार चोदते, तुम गिनती भूल जाती।" वह हंसने लगा और अपने कपड़े पहनने लगा।
"सच बोला।" कहकर मैंने अपने कपड़े उठाए और पहनकर बाहर निकलने को तैयार हो गई। मन ही मन सोच रही थी कि चलो जान बची। अब वासना की खुमारी उतरी तो अहसास हो रहा था कि मैं सचमुच रंडी ही तो बन गई। ऐसा लग रहा था जैसे रघु अकेले नहीं बल्कि चार लोग बारी बारी से मेरे जिस्म से खेले थे। इस तरह अगर गिनती करूं तो, घुसा, घनश्याम, गंजू और अब रघु, कुल मिलाकर चार लोग मेरे जिस्म का मजा ले चुके थे। मुझे तो अब भी पता नहीं क्यों, ऐसा लग रहा था जैसे रघु के रूप में दो प्रकार के मर्दों ने बारी बारी से मेरे जिस्म का मजा लिया था। अगर रघु को दो मर्द समझूं तो इतनी कम उम्र में ही कुल मिलाकर पांच व्यक्तियों संग मैंने सेक्स का मजा ले लिया था। पांचों अलग अलग तरह के व्यक्तित्व के मालिक थे और उन्होंने अपने अपने अलग अलग अंदाज से मेरे जिस्म का मजा लिया था। सबसे अजीब बात यह थी कि यह सब मुझे अच्छा लगने लगा था। इसका मतलब, इसका मतलब मैं सच में सेक्स की गुलाम बनती जा रही थी। हे भगवान, यह क्या हो रहा था मेरे साथ, इसका मतलब यह हुआ कि, यह हुआ कि.... मेरी इस कमजोरी के कारण कोई भी मर्द, (खास कर बुजुर्ग प्रकार के मर्द, जिनके प्रति मेरे मन में एक खास प्रकार का आकर्षण पैदा हो चुका था) बड़ी आसानी से मुझे अपना शिकार बना सकता था। यही सब सोचते हुए, मैं प्रयोगशाला से निकलने को तैयार थी।
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जैसे ही प्रयोग शाला का दरवाजा खुला, मैं थरथराते कदमों से बाहर निकली। मेरे कदम ठीक से जमीन पर पड़ भी नहीं रहे थे लेकिन किसी प्रकार मैं खुद को संतुलित करते हुए चल रही थी। चलते वक्त मेरी चूत की पुत्तियों और गांड़ की दोनों गोलाईयों के बीच जो घर्षण हो रहा था वह बड़ा अजीब लग रहा था। मैं ने अपनी चूत और गांड़ को पोंछने की भी जहमत नहीं उठाई थी। उस वक्त तो मुझे वहां से निकलना था नहीं तो कहीं रघु का मन बदल जाता तो और क्या होता मेरे साथ। मेरी अगाड़ी और पिछाड़ी को सुजा दिया था कमीने ने।में मेरा पूरा बदन टूट रहा था। मेरी चूचियों को मसल मसल कर अजीब हालत कर दी थी। ब्रा के बिना ऐसा लग रहा था जैसे दोनों चूचियां कुछ अधिक ही भारी हो गयी थीं जिन्हें बड़ी मुश्किल से संभाल कर मुझे चलना पड़ रहा था। चुदी चुदाई चूत और गांड़ पर जो लसलसापन था उसके कारण चलने से अजीब तरह का अनुभव हो रहा था और ऊपर से पैंटी न होने के कारण ठंढी ठंढी हवा चूत और गांड़ में कुछ अधिक ही ठंढक का अहसास करा रही थी। मुझे यह भी अहसास हो रहा था कि रघु के वीर्य के कतरे रिस रिस कर मेरी जांघों पर उतर आए थे, जिन्हें मैं इस वक्त पोंछ भी नहीं सकती थी। बस मन ही मन मना रही थी कि वीर्य के कतरे बह कर मेरी स्कर्ट के बाहर दिखाई न दें। भगवान की दया से वीर्य और नीचे बहने से पहले सूखते जा रहे थे। रघु के हाथों लुटी पिटी, नुची चुदी, उसी बेहाल हालत में मैं चलती चली आ रही थी लेकिन मुझे अपने अंदर, मेरे साथ हुई दुर्दशा का कोई मलाल नहीं था। मुझे खुद पर खीझ हो रही थी कि इतना होने के बाद भी पछतावा का भाव क्यों पैदा नहीं हो रहा था। इसका तो साफ साफ मतलब यही था कि सचमुच मुझे सेक्स का चस्का लग गया था और मेरे अंदर वासना की भूख बढ़ती जा रही थी। तो क्या, तो क्या मैं रंडी बनती जा रही थी या रंडियों से भी गयी बीती। रंडियां तो फिर भी मजबूरी में अपनी पेट भरने के लिए पैसों की खातिर अपने तन का सौदा करती हैं लेकिन मैं? मैं तो बस अपनी वासना की भूख मिटाने के लिए मर्दों के आगे बिछी चली जा रही थी। छि: छि:, यह मैं क्या बनती जा रही थी। इन्हीं सोच के साथ गेट की ओर बढ़ने लगी।
संयोग ऐसा था कि उसी समय के आस पास कॉलेज की छुट्टी हुई। मेरी कोशिश थी कि जल्दी से जल्दी छात्रों की भीड़ में शामिल हो जाऊं। रघु जबतक दरवाजा बंद करके मेरे पीछे पीछे आता, मैं काफी आगे बढ़ चुकी थी और बाहर निकलते हुए छात्र छात्राओं की भीड़ में शामिल हो गयी। तभी मेरी दृष्टि कॉलेज के गेट की ओर चली गई तो यह देख कर दंग रह गयी कि रघु पहले से ही गेट पर खड़ा था। हे भगवान, यह क्या चमत्कार था। रघु तो प्रयोगशाला से मेरे निकलने के बाद दरवाजा बंद कर रहा था, फिर मुझसे पहले इतनी जल्दी गेट पर कैसे पहुंच सकता था। मैं उसे देखकर जल्दी से उसके पास पहुंची और बोली,
"तुम मुझसे पहले कैसे यहां?"
"हम तो पहिले से इहां हैं।" वह रहस्यमई मुस्कान के साथ बोला।
"फिर वहां कौन था?" मेरे आश्चर्य का पारावार न था। मैं ने पीछे दृष्टि दौड़ाई तो जैसे मेरे पांव तले जमीन खिसक गई। मेरे पीछे करीब पचास फीट की दूरी पर भी रघु दिखाई दिया, जो मुस्कुराता हुआ अपनी धुन मे चला आ रहा था। हे भगवान दो दो रघु! मैं हक्की बक्की रह गई।
"सच बताएंगे तो तुम गुस्सा तो नहीं होगी?" रघु था या जो भी था, वह बोला। मैं सोच में पड़ गयी। गुस्सा करूं भी तो कैसे? कितने जबरदस्त तरीके से चोद कर मेरी भूख मिटाई थी उसने। नहीं नहीं, चाह कर भी उस पर गुस्सा नहीं आ रहा था, आखिर गुस्सा करूं भी तो किस मुंह से। सबकुछ मेरी रजामंदी से ही तो हुआ था, लेकिन एक के बदले दो लोगों ने यह सब मेरे साथ किया था, जो कि मेरे साथ धोखा था।
"गुस्सा तो होऊंगी ही कमीने, क्योंकि यह मेरे साथ धोखा था।" मैं रोष के साथ बोली।
"तुम्हारा गुस्सा जायज है। अगर सच्च बताते तो तुम मानती नहीं इसी लिए यह करना पड़ा।" रघु थोड़ा अपराधी लहजे में बोला।
"हां यह सच है, मैं कदापि नहीं मानती।" मैं बोली। अबतक दूसरा रघु भी पास आ चुका था।
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"मजा आ गया भाई। तुम्हारा बहुत बहुत धनियाबाद। धनियाबाद तो बहुत छोटा शबद है लेकिन बोलना तो बनता है। जबरदस्त लौंडिया पटाए हो भाई।" दूसरा वाला रघु मुस्कुराते हुए पहले वाले से बोला। मैं उसकी बात सुनकर क्या प्रतिक्रिया दूं यह समझ में नहीं आ रहा था। गुस्सा तो आ रहा था लेकिन उसकी चुदाई की कायल भी थी। क्या चोदा था हरामी कहीं का। मेरे तन का अंग अंग निचोड़ कर रख दिया था। चूत और गांड़ की तो क्या कहूं। मेरे कुछ कहने से पहले ही पहले वाला रघु बोल पड़ा,
"ये सब बात बाद में, पहिले जल्दी से खिसक यहां से मादरचोद।"
"हां हां, जात्ते हैं जात्ते हैं। धनियाबाद बोलना मेरा फरज था सो बोल दिया।" वह मुझे ऊपर से नीचे तक देखते हुए बोला।
"हां हां तू जा।" पहले वाला बोला तो दूसरा वाला मुझे ऊपर से नीचे भरपूर दृष्टि से देख कर तुरंत वहां से खुशी के मारे उछलता हुआ रफूचक्कर हो गया। मैं भौंचक्की उसे जाते हुए देखती रह गई। कमीना कहीं का। मेरे मुंह में मानो ताला सा लग गया था। हे भगवान, अनजाने में दो लोगों से चुद गई थी। कुछ विद्यार्थी मुझे इस तरह रघु से बातें करते हुए देखते हुए जा रहे थे। इस तरह गेट पर रघु से बातें करना मुझे भी बड़ा अटपटा लग रहा था।
"फिलहाल तो मैं चलती हूं, लेकिन जाते जाते यह बताओ कि यह कौन था?" मैं हकलाते हुए बोली। मेरा अंदाजा था कि निश्चित ही वह उसका हमशक्ल जुड़वां भाई होगा।
"यह मेरा जुड़वां भाई जधु था। वह जधु, मतलब जाधव और हम रघु, मतलब राघव।" वह जैसे मेरे सामने बम फोड़ दिया था। मैं मुंह फाड़कर उसे देखती रह गई। अपने जुड़वां भाई के साथ मुझे बांट कर बारी बारी से चोदा और मुझे भनक तक लगने नहीं दिया। कहां मैं रघु से अपने तन की भूख मिटाने चली थी, इस चक्कर में उसका जुड़वां भाई भी मुफ्त में मुझमें मुंह मार कर चल दिया। अपने भाई की आड़ में जाधव भी मेरे तन का स्वाद चख लिया था। मेरे साथ ऐसा भी हो सकता है, मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। एक आदमी से चुदने गई थी और दो आदमियों से चुद आई। सचमुच वासना की आग में मैं कितनी अंधी हो चुकी थी। उन दोनों में आवाज और लंड का जो फर्क था उससे मुझे पता चल जाना चाहिए था लेकिन चुदास के मारे मेरी मति मारी गई थी जो उस फर्क को तवज्जो देना जरूरी नहीं समझी और नतीजा हुआ रंडियों की तरह मेरी चुदाई। खैर अब जो होना था वह तो हो ही चुका था। अब पछतावे का होत है जब चिड़िया चुग गई खेत। पछतावा? घंटा पछतावा। अनभिज्ञता में ही सही, हवस की पुजारन बनती जा रही मुझ लंडखोर को तो मज़ा ही आया। अब मुझे सब कुछ समझ में आ रहा था। मेरे कपड़ों का गायब होना। रघु पहली बार में ही मेरी बेध्यानी में मेरे कपड़े लेकर रफूचक्कर हो गया होगा। उसके बाद दोनों भाई बारी बारी से आपस में अदल बदल कर मुझे नोच रहे थे। उन्हें यह अच्छी तरह से पता था कि थक कर मैं अंत में मना करूंगी इसलिए मुझे मजबूर करके चोदने के लिए मेरे कपड़े गायब कर दिए गये थे। अच्छी योजना बना कर दोनों भाईयों ने मुझे चोदा था। साले कुत्ते, मुझे भनक तक लगने नहीं दिए।
"हरामी, अब बता रहे हो? पहले बता देते तो क्या हो जाता?" मैं बोली।
"पहले बता देत्ता तो तुम राजी होत्ती का?"
"हां यह भी सच है। शायद राजी नहीं होती।"
"इसी डर से नहीं बताया।"
"मुझसे डरते हो?"
"डरना नहीं चाहिए का?"
"डरना चाहिए। डरोगे तो ही फायदे में रहोगे।"
"अब्ब तो जो होना था हो गया, ई बताओ कि कईसा लगा ई सब?" वह बोला। अब मैं क्या बोलती उससे कि इस जबरदस्त कुटाई में थक कर चूर होने के बावजूद मुझे कितना मज़ा आया।
"अ अच्छा लगा। धोखा ही सही, मगर अच्छा लगा।" मैं इमानदारी से अपने मनोभाव को व्यक्त करने मे जरा भी नहीं हिचकिचाई।
"धन्यवाद मैडमजी। फिर कब मौका मिलेगा?" वह उत्साह में भर कर बोला। उसकी आंखों में हवस साफ साफ दिखाई दे रही थी और उसके होंठों पर अर्थपूर्ण मुस्कान नाच रही थी।
"देखूंगी। फिर कब मौका मिलता है।" मैं जल्दी से बोली। भले ही अनभिज्ञता में ही सही, लेकिन अब तो दोनों भाईयों से चुदकर और सच्चाई जानकर भी मुझे कोई खास दुःख नहीं हो रहा था। मेरे लिए यह एक अलग तरह का मजेदार अनुभव था। आज तो धोखे से मैं रघु के साथ साथ जधु से भी चुद गई लेकिन इतना तो तय था कि आगे अब उनके साथ जब भी यह सब होगा, उस खेल में पूरा नियंत्रण मेरा ही होगा। आज मैं पूरी तरह उनके चंगुल में फंस कर उनकी मनमानी झेलने को मजबूर होने के बावजूद अंदर ही अंदर बहुत रोमांचित भी हो रही थी। भले ही रघु और जधु मुझे रंडी टाईप लौंडिया समझ रहे हों लेकिन उन्हें क्या पता कि एक नया यादगार अध्याय मेरी जिंदगी में जुड़ चुका था। सचमुच यह जितना रोमांचक था उतना ही मजेदार भी था। मैं सोचने लगी कि कभी कभी इस तरह का मजा लेने में क्या हर्ज है। जी भर के मजा लो और चल दो। मेरा क्या घट जाएगा। इसी बहाने रघु जैसे लोगों पर उपकार भी हो जाएगा। अच्छी तरह कुटाई होने के कारण मेरी चाल अभी भी सामान्य नहीं हुई थी। पैर अभी भी कांप रहे थे। हां चूत और गांड़ पर जो लसलसापन था वह काफी हद तक सूख चुका था, लेकिन मेरी चुद चुद कर लाल बेहाल चूत और गांड़ चीख चीखकर कहना चाह रहे थे, "साली हरामजादी, अपनी वासना की भूख मिटाने के चक्कर में हमारी दुर्गति करा बैठी कमीनी कुतिया।" उनकी अभिव्यक्ति को सुन तो नहीं सकती थी लेकिन महसूस करती हुई मैं मुस्कुरा उठी।
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इसी उम्र में अबतक मेरी सेक्स यात्रा में पांच पुरुषों का नाम जुड़ चुका था। पांचों के पांचों उम्र में मुझसे कहीं ज्यादा बड़े और एक नंबर के औरतखोर थे, जिन्हें अपनी हवस के आगे मेरी कमसिन उम्र की रत्ती भर भी परवाह नहीं थी। मेरी नादानी में ही शुरुआत घुसा ने की और मुझे सेक्स के मजे से परिचित कराया। वह मुझ नादान लड़की के लिए जीवन का सबसे सुखद अनुभव था। पुरुष और स्त्री के बीच संसर्ग में इतना आनंद मिलता है, यह अनुभव मुझे बड़ा अच्छा लगा। लेकिन विवाह से पहले इस तरह का शारीरिक संबंध समाज मे वर्जित है, उस नादान उम्र में इसका मुझे पता नहीं था। जबतक मुझे पता चलता, तबतक घुसा ने मुझे सेक्स का चस्का लगा दिया था। घुसा बड़ी अच्छी तरह से जानता था कि मैं जिस उम्र में थी, उस उम्र में ही यदि मेरी नादानी का फायदा उठाकर लगातार चुदाई की जाय तो चुदाई का चस्का लगना स्वाभाविक है। वही मेरे साथ उसने किया। लगे हाथों घनश्याम और गंजू ने भी इस में अपना योगदान दे दिया। फिर तो मुझे सेक्स का ऐसा चस्का लगा कि अब रघु और जधु भी एक एक करके मेरी कमसिन उम्र की परवाह किए बिना बहती गंगा में डुबकी लगाने आते चले गए और मैं कामुकता की आंधी में बहती हुई उदारतापूर्वक अपना तन परोसती चली गयी। आगे क्या क्या होना था यह तो भगवान ही जानता था।
यही सब सोचते हुए जल्दी से बाहर निकल पड़ी क्योंकि मैंने घनश्याम को आते हुए देख लिया था।
"अरे रोज, कहां थी तुम? क्लास में दिखाई नहीं दी?" मैंने पीछे से रेखा की आवाज सुनी तो सन्न रह गई। मैं उनकी नजरों से बच कर निकलना चाह रही थी।
"मुझे आज प्रिंसिपल से काम था। क्लास के लिए नहीं आई थी। काम हो गया, अब निकल रही हूं।" मैं पीछे मुड़ी और बोली। रेखा के साथ रश्मि और शीला भी थी। उनके सवालों का और सिलसिला चालू हो उससे पहले ही मुझे वहां से खिसकने में ही भलाई नजर आ रही थी।
"लेकिन तू यहां रघु से क्या बात कर रही थी?" शीला बोली। उसकी बात सुनकर मैं चौंक गई और साथ ही साथ घबरा भी गयी। हे भगवान, तो इन लोगों ने मुझे रघु से बातें करते हुए भी देख लिया था। पता नहीं क्या सोच रही थीं होंगी। जो सोचना है सोचने दो, लौड़े से, मैं अपनी सफाई देना जरूरी नहीं समझ रही थी।
"अरे कुछ नहीं, बस इससे पूछ रही थी कि उसने घनश्याम को देखा है क्या? लो, वो आ गये। अच्छा अब मैं चलती हूं।" कहकर ज्यों ही सामने मेरी नजर गई तो, सचमुच मेरी मनचाही एक अकल्पनीय घटना हो गई, संयोग से उसी समय घनश्याम कार के साथ सामने हाजिर हो गया। चलने में तकलीफ़ हो रही थी लेकिन दांत भींच कर मैं तेज कदमों से कार की ओर बढ़ती चली गई। लाख कोशिशों के बावजूद मैं अपनी चाल को सामान्य नहीं रख पा रही थी, जिसे निश्चित तौर पर मेरी सहेलियों नें ताड़ लिया होगा और घनश्याम की पैनी नजर से भला कैसे बच सकती थी। वह मुझे शंकित नजरों से घूर रहा था। मैं उससे नजरें मिलाने की हिम्मत भी नहीं कर पा रही थी। कार के पास पहुंच कर अनिश्चय की स्थिति में थी कि सामने बैठूं या पीछे। मैं ने पीछे बैठने के लिए पीछे का दरवाजा खोलने लगी कि घनश्याम बोल उठा,
"क्या हुआ, पीछे क्यों बैठ रही हो?"
"बस अ ऐसे ही। थोड़ा पसर कर बैठ कर बैठने का मन हो रहा है।" मैं झिझकते हुए बोली।
"पसर कर बैठना है तो भी सामने बैठो। मैं खा नहीं जाऊंगा।" घनश्याम हुक्म देते हुए बोला। मैं जानती थी कि मेरी थोड़ी सी भी असावधानी से मेरी पोल पट्टी खुल जाएगी, इस कारण मैं पीछे की सीट पर बैठना चाहती थी लेकिन उसकी बात नहीं मानकर पीछे बैठना भी उसे अनचाहे शंका में डालने वाला होता। मन ही मन डरते हुए और भगवान से मनाते हुए कि मेरी लंडखोरी का राज न खुलने पाए, मैं सामने सीट पर जा बैठी।
आगे की गरमागरम घटना अगली कड़ी में पढ़िए। तबतक के लिए आप सभी सेक्स के रसिक पाठकों से आप लोगों की गरम रोजा आज्ञा लेती है। नमस्कार।
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Update please
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शानदार कहानी.
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Update do bro
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update please
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(07-11-2024, 05:09 PM)Rajen4u Wrote: इसी उम्र में अबतक मेरी सेक्स यात्रा में पांच पुरुषों का नाम जुड़ चुका था। पांचों के पांचों उम्र में मुझसे कहीं ज्यादा बड़े और एक नंबर के औरतखोर थे, जिन्हें अपनी हवस के आगे मेरी कमसिन उम्र की रत्ती भर भी परवाह नहीं थी। मेरी नादानी में ही शुरुआत घुसा ने की और मुझे सेक्स के मजे से परिचित कराया। वह मुझ नादान लड़की के लिए जीवन का सबसे सुखद अनुभव था। पुरुष और स्त्री के बीच संसर्ग में इतना आनंद मिलता है, यह अनुभव मुझे बड़ा अच्छा लगा। लेकिन विवाह से पहले इस तरह का शारीरिक संबंध समाज मे वर्जित है, उस नादान उम्र में इसका मुझे पता नहीं था। जबतक मुझे पता चलता, तबतक घुसा ने मुझे सेक्स का चस्का लगा दिया था। घुसा बड़ी अच्छी तरह से जानता था कि मैं जिस उम्र में थी, उस उम्र में ही यदि मेरी नादानी का फायदा उठाकर लगातार चुदाई की जाय तो चुदाई का चस्का लगना स्वाभाविक है। वही मेरे साथ उसने किया। लगे हाथों घनश्याम और गंजू ने भी इस में अपना योगदान दे दिया। फिर तो मुझे सेक्स का ऐसा चस्का लगा कि अब रघु और जधु भी एक एक करके  मेरी कमसिन उम्र की परवाह किए बिना बहती गंगा में डुबकी लगाने आते चले गए और मैं कामुकता की आंधी में बहती हुई उदारतापूर्वक अपना तन परोसती चली गयी। आगे क्या क्या होना था यह तो भगवान ही जानता था।
      यही सब सोचते हुए जल्दी से बाहर निकल पड़ी क्योंकि मैंने घनश्याम को आते हुए देख लिया था।
      "अरे रोज, कहां थी तुम? क्लास में दिखाई नहीं दी?" मैंने पीछे से रेखा की आवाज सुनी तो सन्न रह गई। मैं उनकी नजरों से बच कर निकलना चाह रही थी।
       "मुझे आज प्रिंसिपल से काम था। क्लास के लिए नहीं आई थी। काम हो गया, अब निकल रही हूं।" मैं पीछे मुड़ी और बोली। रेखा के साथ रश्मि और शीला भी थी। उनके सवालों का और सिलसिला चालू हो उससे पहले ही मुझे वहां से खिसकने में ही भलाई नजर आ रही थी।
       "लेकिन तू यहां रघु से क्या बात कर रही थी?" शीला बोली। उसकी बात सुनकर मैं चौंक गई और साथ ही साथ घबरा भी गयी। हे भगवान, तो इन लोगों ने मुझे रघु से बातें करते हुए भी देख लिया था। पता नहीं क्या सोच रही थीं होंगी। जो सोचना है सोचने दो, लौड़े से, मैं अपनी सफाई देना जरूरी नहीं समझ रही थी।
       "अरे कुछ नहीं, बस इससे पूछ रही थी कि उसने घनश्याम को देखा है क्या? लो, वो आ गये। अच्छा अब मैं चलती हूं।"  कहकर ज्यों ही सामने मेरी नजर गई तो, सचमुच मेरी मनचाही एक अकल्पनीय घटना हो गई, संयोग से उसी समय घनश्याम कार के साथ सामने हाजिर हो गया। चलने में तकलीफ़ हो रही थी लेकिन दांत भींच कर मैं तेज कदमों से कार की ओर बढ़ती चली गई। लाख कोशिशों के बावजूद मैं अपनी चाल को सामान्य नहीं रख पा रही थी, जिसे निश्चित तौर पर मेरी सहेलियों नें ताड़ लिया होगा और घनश्याम की पैनी नजर से भला कैसे बच सकती थी। वह मुझे शंकित नजरों से घूर रहा था। मैं उससे नजरें मिलाने की हिम्मत भी नहीं कर पा रही थी। कार के पास पहुंच कर अनिश्चय की स्थिति में थी कि सामने बैठूं या पीछे। मैं ने पीछे बैठने के लिए पीछे का दरवाजा खोलने लगी कि घनश्याम बोल उठा,
       "क्या हुआ, पीछे क्यों बैठ रही हो?"
       "बस अ ऐसे ही। थोड़ा पसर कर बैठ कर बैठने का मन हो रहा है।" मैं झिझकते हुए बोली।
       "पसर कर बैठना है तो भी सामने बैठो। मैं खा नहीं जाऊंगा।" घनश्याम हुक्म देते हुए बोला। मैं जानती थी कि मेरी थोड़ी सी भी असावधानी से मेरी पोल पट्टी खुल जाएगी, इस कारण मैं पीछे की सीट पर बैठना चाहती थी लेकिन उसकी बात नहीं मानकर पीछे बैठना भी उसे अनचाहे शंका में डालने वाला होता। मन ही मन डरते हुए और भगवान से मनाते हुए कि मेरी लंडखोरी का राज न खुलने पाए, मैं सामने सीट पर जा बैठी।
       आगे की गरमागरम घटना अगली कड़ी में पढ़िए। तबतक के लिए आप सभी सेक्स के रसिक पाठकों से आप लोगों की गरम रोजा आज्ञा लेती है। नमस्कार।
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गरम रोज (भाग 14)

जैसे ही कार स्टार्ट हुई, "हां तो अब बताओ, क्लास में सब ठीक-ठाक रहा ना?" घनश्याम पूछ बैठा।
"हां।" मेरा संक्षिप्त उत्तर सुनकर वह मेरी ओर देखने लगा।
"नहीं, ठीक ठाक तो नहीं रहा। तुम्हारा लाल चेहरा कुछ और ही बता रहा है। तुम ठीक से चल भी नहीं पा रही हो। क्या बात है?" वह शंकित हो कर पूछ रहा था।
"क क क्या बकवास है। मैं ठीक तो हूं।" मैं उसकी बात टालने की कोशिश करते हुए बोली।
"तुम्हारी बात सुनकर पक्का यकीन हो गया है कि कुछ गड़बड़ है। सच बताओ क्या हुआ है? तुम्हारी गर्दन पर दांतों का निशान भी दिखाई दे रहा है। हे भगवान! मैं भी कितना गधा हूं। अगर मेरा अंदाजा सही है तो आज कॉलेज में भी तूने अपने ऊपर किसी न किसी को चढ़ने दिया है। सही बोल रहा हूं ना?" अब उसकी आवाज में गुस्से को साफ महसूस करके मेरी रूह फना हो गई। मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। बोलूं तो क्या बोलूं। सचमुच मेरी हालत खुद ही चीख चीखकर कर मुझ पर जो बीती है, उसे बयां कर रही थी।
"न न नहीं तो! ज ज जैसा तुम सोच रहे हो वैसा कुछ भी नहीं हुआ है। यह तो यह तो... ‌" इससे पहले कि आगे और कुछ बोलती,
"चुप हरामजादी । एक दम चुप। कुछ बोलने की जरूरत नहीं है,.. ‌‌" इतना कहकर कार चलाते हुए उसने सीधे अपना बायां हाथ मेरी स्कर्ट के अंदर डाल कर सीधे मेरी चूत को छू लिया। हे भगवान, मैं अपनी सीट पर बैठे बैठे चौंक कर उछल ही पड़ी। उफ कमीना कहीं का।
"यह क्या है? हरामजादी, मेरा लौड़ा कम पड़ा था जो यहां आकर क्लास करने के बदले पता नहीं किस किस से मरवा रही थी? एकदम साफ है कि तू एक नहीं, दो तीन लोगों का लौड़ा खा कर आ रही है। मैं समझ गया कि तू ऐसे सुधरने वाली नहीं है। तुझे शायद इसका आभास नहीं हो रहा है लेकिन सच यह है कि तू पूरी तरह रंडी बन गई है। आज तुझे बताऊंगा कि तेरे जैसे लड़की के साथ कैसा सलूक किया जाना चाहिए।" उसने मेरी चूत को छूकर अंदाजा लगा लिया था कि मैं लगभग कितने लोगों से चुद कर आ रही हूं। मुझे काटो तो खून नहीं। उसने कार की रफ्तार बढ़ा दी और सीधे जंगल के रास्ते की ओर मोड़ दिया। यह रास्ता गंजू के घर की ओर जाता था। हालांकि घनश्याम के हाथ का स्पर्श ज्यों ही मेरी चूत पर हुआ, इतनी जबरदस्त चुदाई होने के बावजूद मेरे मन के तार झनझना उठे थे लेकिन मेरा क्लांत शरीर अब और चुदाई को झेलने की स्थिति में नहीं था। मैं घबड़ा उठी थी।
"नहीं नहीं, सिर्फ एक, वह भी सबकुछ अचानक हो गया।" मैं सफाई देने लगी।
"मुझे मत सिखाओ। कम से कम तीन लोगों से तो जरूर मरवाई हो।" वह गुर्रा कर बोला। उसका अंदाजा लगभग सही ही था। मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।
"तुम सही बोल रहे हो लेकिन यह सब अचानक और अनजाने में हो गया।" मैं अब भी सफाई देने से बाज नहीं आ रही थी।
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"अनजाने और अचानक? मैं मुझे इतना बेवकूफ नजर आता हूं? सबकुछ तेरी रजामंदी से पूरे होशो-हवास में हुआ है कुतिया, वरना तू आसमान सर में उठा लेती। तेरी नस नस से वाकिफ हूं। बता कौन कौन लोग थे?" वह गुस्से से पूछ रहा था।
"अ अ अ गेटकीपर और उसका...." मैं सर झुका कर हकलाते हुए बोली और चुप हो गई।
"और उसका कौन?"
"उ उ उ उसका जुड़वां भाई।"
"सिर्फ दो?"
"हां।"
"यह नहीं हो सकता है। बता और कौन था?"
"सच बोल रही हूं।"
"झूठ, सरासर झूठ। मैं पक्का बोल सकता हूं कि सिर्फ दो नहीं हो सकते हैं।" उसकी बात सुनकर मुझे पूरा सच बताने के लिए बाध्य होना पड़ा। मेरी बातें सुनकर उसे विश्वास करना ही पड़ा।
"बहुत बढ़िया। एकदम ठीक हुआ तुम्हारी जैसी रंडी के साथ यही होना था। अब मैं बताऊंगा कि तुम जैसी लंडखोर की सजा कैसी होनी चाहिए।" वह बोला।
"नहीं नहीं प्लीज़, मुझे माफ कर दो। उन लोगों ने पहले ही मेरी हालत खराब कर दी है। मुझसे और झेला नहीं जाएगा। आज के बाद ऐसी ग़लती नहीं करूंगी।" मैं गिड़गिड़ाने लगी।
"चुप हरामजादी, झेला नहीं जाएगा। वहां खंडहर में बुरी तरह चुदकर भी यहां गेटकीपर से मरवाने की तलब लगी थी। चुदने की तलब में दो अलग-अलग लोगों से बारी बारी चार बार चुदकर भी तुझे पता नहीं चला कि एक आदमी चोद रहा हे कि दो आदमी। चुदाई की इतनी मस्ती चढ़ी है तो ठीक है आज ऐसी कुटाई करेंगे कि तेरी सारी गर्मी निकल जाएगी।" "प्लीज़ ऐसा जुल्म मत करो मेरे साथ।" मैं उसकी बातों से भयभीत होकर बोली।
"अब और कुछ बोलोगी तो एक झापड़ रसीद कर दूंगा और यहीं रोड किनारे पटक कर चोदूंगा साली रंडी।" घनश्याम तैश मे आ कर बोला। अब मेरी बोलती बंद हो गई। मैं जानती थी कि गंजू के यहां कितनी बुरी तरह मुझे नोच खसोट का सामना करना पड़ेगा। उसने मेरी एक नहीं सुनी और गंजू को फोन लगाने लगा।
"हलो गंजू भाई, कहां हो?" वह बोला। चूंकि फोन का स्पीकर ऑन नहीं था इसलिए मैं उनके वार्तालाप को स्पष्ट तौर पर सुन नहीं सकती थी। मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा था कि पता नहीं उधर से क्या जवाब मिलेगा।
उधर से गंजू ने क्या कहा मुझे पता नहीं।
"मैं इस समय तुम्हारे घर की ओर आ रहा हूं।" घनश्याम ने फिर कहा। इसका जवाब भी गंजू ने क्या दिया मुझे पता नहीं लेकिन घनश्याम का चेहरा थोड़ा मायूस दिखाई दे रहा था।
"ओह, फिर तो बेकार ही आ रहा हूं तुम्हारे पास। काम बताने का नहीं करने का था और वह भी इसी समय।" उनकी बातें सुनकर मैं ने राहत की सांस ली। चलो छुटकारा मिला। मैंने अंदाजा लगा लिया था कि इस वक्त गंजू अपने घर पर नहीं था। लेकिन फिर उधर से गंजू कुछ कह रहा था जिसे घनश्याम सुनने लगा था।
"काम मजेदार था, लेकिन अब बता कर फायदा क्या है।" घनश्याम कार रोक कर बोला, फिर उधर से आती हुई आवाज को सुनने लगा।
"वही चिड़िया इस वक्त मेरे साथ है। मजा करना था। लेकिन चलो कोई बात नहीं। फिर कभी।" घनश्याम गंजू का उत्तर सुनकर बोला और फोन काटना चाह ही रहा था कि उधर से आती हुई आवाज ने घनश्याम को ऐसा करने से रोक दिया। उधर से आती हुई बातें सुनकर घनश्याम के चेहरे का भाव बदल गया। "कौन? भालू? वही ना, मोटू?" कहकर फिर वह गंजू की बातें सुनने लगा और ज्यों ज्यों वह आगे सुनता गया, उसके चेहरे पर मुस्कान तैरती चली गई।
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"ठीक है भाई, ठीक बोल रहे हो, साला ठर्की बुड्ढा बड़े काम का आदमी है। वह भी क्या सोचेगा। बड़े दिनों बाद मिलने का मौका मिल रहा है। ऐसी शानदार गिफ्ट के साथ मिलूंगा तो उसकी भी तबीयत खुश हो जाएगी। मैं आ रहा हूं।" घनश्याम मुझे तिरछी नजरों से देखते हुए बोला और कार को गंजू के घर की दिशा में आगे बढ़ा दिया। उसके चेहरे पर अजीब सी मुस्कान थी। मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि गंजू यदि घर से बाहर रांची में है तो घनश्याम उसके घर में किससे मिलने जा रहा है। और यह किस गिफ्ट की बात कर रहा है। मुझे कुछ गड़बड़ का अंदेशा होने लगा।
"मैं बोल रही हूं ना कि मुझे माफ कर दो तो फिर गंजू के घर की ओर क्यों जा रहे हो? मैं जानती हूं कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा है, और अभी इस वक्त मुझे तुम्हारे मन की मुराद पूरी करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। वैसे भी गंजू तो घर में है नहीं फिर हम वहां क्यों जा रहे हैं?" मैं धड़कते दिल से बोली। यह ठर्की बुड्ढा किसे बोल रहा था मुझे पता नहीं था। कहीं गंजू की अनुपस्थिति में उसका स्थान कोई ठर्की तो नहीं लेने वाला था? मैं भीतर ही भीतर परेशान हो उठी। पता नहीं घनश्याम के दिमाग में क्या चल रहा था।
"चुपचाप बैठी रह। तुमने माफी लायक गलती नहीं की है गधी कहीं की। तू आज बिना सजा के बच नहीं सकती।" घनश्याम मुझे डांटते हुए बोला।
"मैं बोल रही हूं कार रोको नहीं तो चलती कार से कूद पड़ूंगी।" मैं विरोध करते हुए बोली।
"मैं भी देखता हूं, लॉक कंडीशन में कार का दरवाजा कैसे खोल कर कूदती हो।" वह कार चलाते हुए बोला। उसकी बात सुनकर मैं सकते में आ गयी। सचमुच मैं बेबस चिड़िया की भांति उस कार रुपी पिंजड़े में कैद थी।
"तुम करना क्या चाह रहे हो?" मैं भयभीत स्वर में बोली।
"गंजू के अड्डे पर पहुंच कर बहुत जल्दी पता चल जाएगा। थोड़ा इंतजार कर।"
"तुम मेरी मर्जी के बगैर मेरे साथ कुछ भी गड़बड़ नहीं कर सकते। यदि ऐसा किया तो मैं सबकुछ मां को बता दूंगी।" मैं धमकी भरे स्वर में बोली।
"तुम्हारी मां? हा हा हा हा। तुम्हारी मां तुम्हारी बात से ज्यादा मेरी बात का यकीन करेगी।"
"ऐसा नहीं हो सकता है। एक मां अपनी बेटी से ज्यादा तुम जैसे ड्राइवर की बात का यकीन नहीं कर सकती।" मैं जानती थी कि घनश्याम, मेरी मां को अपनी दमदार हथियार का सुखद स्वाद चखा कर अपने वश में कर चुका था और इस बूते पर मेरी अपेक्षा उसका पलड़ा भारी था, लेकिन फिर भी बोली।
"तुम्हारे भरोसे की दाद देता हूं लेकिन सच यही है कि मेरे लंड की गुलाम से ऐसी आशा करना खुद को झूठी तसल्ली देने के अलावा और कुछ नहीं है। विश्वास न हो तो कोशिश करके देख लेना।" वह बोला और मैं जानती थी कि वह झूठ नहीं बोल रहा था। वह बेफिक्र कार चलाता हुआ झाड़ियों को चीरता, गंजू के झोपड़ीनुमा ऐशगाह की ओर बढ़ा जा रहा था।
"लेकिन मेरी मां को ऑफिस से लाने के लिए देर नहीं होगी क्या? उसका क्या जवाब है तुम्हारे पास?" मैं बोली।
"उसकी चिंता मत करो। ऑफिस के बाद उसे एक जरूरी ऑफिशियल मीटिंग अटेंड करना है, जो उसके बताने के हिसाब से कम से कम आज तीन घंटे से कम चलने वाला नहीं है। तबतक के लिए मैं बेफिक्र हूं और तुम्हें भी इस बारे में चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।" घनश्याम बोला। मैं अचंभित रह गई कि जो बातें मुझे भी पता होनी चाहिए वे बातें मां सिर्फ घनश्याम को बता रही थी। यह घनश्याम तो मां के लिए हमारे परिवार का महत्वपूर्ण सदस्य बन गया था।
"फिर भी मैं बोल रही हूं कि जो तुम मेरे साथ करने जा रहे हो वह सरासर गलत है और मेरी इच्छा के बगैर ऐसा करने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है।" मैं जबरदस्ती दृढ़ता दिखाती हुई बोली।
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"मर्दों के साथ बिंदास मस्ती करने वाली भूखी कुतिया मुझे सिखा रही है क्या सही है और क्या ग़लत, और मेरे अधिकार की बात करती है? तुझे मेरी मर्दानगी जगाने का शौक चर्राया था ना? तुझे इसका अधिकार किसने दिया था? मेरी औरतखोरी को जगाई हो तो अब भुगतो। देख ली ना मेरी मर्दानगी? फिर भी मैंने तुझे सुधरने का मौका दिया था लेकिन तू रंडी है और रंडी ही रहेगी। तू सुधरने वाली नहीं है। अब आगे जो होगा उसकी जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी है। अब मुझपर तोहमत लगाने का तुम्हें कोई हक नहीं है। अभी गंजू के घर में एक नया बंदा आया हुआ है। उसे भी पता है कि हम वहां किसलिए आ रहे हैं। प्रभावशाली आदमी है। चुपचाप चलो और उसे खुश कर दो। हम सबका भला होगा।" वह बोलता चला जा रहा था और मैं सिर्फ सर झुका कर सुनने के अलावा कुछ नहीं कर सकती थी। उसकी आखिरी बात सुनकर तो मेरे होश गुम हो गये। यह तो दलाल की तरह किसी के सामने भी मुझे परोसने की बात कर रहा था। भालू शायद उसी के बारे में कह रहा था। हे भगवान। क्या वह कोई भालू टाईप आदमी होगा? मैं घबरा गई।
"मानती हूं कि गलती मेरी है, लेकिन मेरी ग़लती की सजा इस तरह मुझे जलील करके तो मत दो।" मैं गिड़गिड़ाने लगी।
"जलील तो हो चुकी हो तुम। अब कोई नाटक मत करना। भला आदमी है। वह खुश होगा तो हम सब खुश रहेंगे।" वह मुझे चेतावनी देते हुए बोला।
"भला आदमी? खाक भला आदमी। भला आदमी इस तरह यहां वहां औरतखोरी नहीं करता है।" मैं बोली।
"औरतखोरी? तुम लड़कियां मर्दोंखोरी करो वह अच्छा है और हम मर्द औरतखोरी करें वह तुम्हें अस्वीकार्य है, यह तो तुम्हारा दोगलापन है। अब अपनी बकवास बंद करो। देखो हम गंजू के घर पहुंच गये हैं।" मैं ने देखा कि सचमुच हम गंजू के घर के सामने थे। मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा कि आज किस मुसीबत में फंस गयी हूं। यहां से भाग निकलने का कोई मार्ग मुझे सूझ नहीं रहा था।इस बियाबान जंगल के बीच में भाग कर जाती भी तो निश्चित ही भटक कर किसी और मुसीबत में फंस जाती। सामने झोपड़ी के दरवाजे के बाहर एक लंबा चौड़ा, काला कलूटा, मुच्छड़, हब्शी टाईप, हट्टा-कट्टा, करीब तीस चालीस की उम्र का खूंखार सा दिखने वाला आदमी मुस्तैद खड़ा नजर आ रहा था। वह काफी चौकन्ना दिखाई दे रहा था। हमारी कार रुकते ही वह सशंकित नजरों से हमारी ओर देखने लगा। वह एक कद्दावर, करीब छः फुट ऊंचा व्यक्ति था। वह काले रंग की एक तंग पतलून और एक काली टाईट टी-शर्ट पहने हुए था। टाईट कपड़ों के कारण उसकी उभरी हुई मांशपेशियां साफ साफ दिखाई दे रही थीं।
उसका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि उसे देख कर कोई भी सामान इन्सान खौफजदा हो जाय। जहां मैं भयभीत थी वहीं घनश्याम मुस्कुरा रहा था। घनश्याम कार से उतरा और मुझे भी उतरने के लिए कहने लगा लेकिन मैं तो जैसे कार की सीट पर जम सी गई थी।
"उतर नीचे।" घनश्याम मुझे घूरते हुए बोला। फिर भी मेरे शरीर में कोई हरकत नहीं हुई। घनश्याम से रहा नहीं गया और उसने मेरी ओर का दरवाजा खोलकर मुझे कार से बाहर खींच लिया। मैं उसके झटके से गिरने को हो रही थी लेकिन घनश्याम की मजबूत पकड़ के कारण गिरने से बची।
"क्या करते हो? अभी मैं गिर पड़ती।" मैं गुस्से से बोली।
"मेरे रहते कैसे गिरोगी? वैसे भी एक बात बोलूं?" वह शरारती लहजे में बोला।
"बोलो।"
"वैसे तुम गिर तो चुकी हो।" उसकी बात सुनकर मेरी जुबान में ताला लग गया। कितना कमीना है यह। उसकी बात का अर्थ समझ कर मन ही मन गुस्सा आने लगा कि खुद लौंडिया बाजी करेंगे तो ठीक, हम लौंडा बाजी करें तो गिरी हुई। हरामी कहीं का।
"सच बोला। मगर गिरा हुआ आदमी बोला।" मेरे मुंह से भी निकला।
"हा हा हा हा। तुम भी सच बोली।" वह हंसते हुए बोला और मुझे खींचता हुआ झोपड़ी की ओर बढ़ा।
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"कैसे हो कल्लू मियां? बाहर पहरेदारी कर रहे हो?" झोपड़ी के पास पहुंच कर वह उस मुस्टंडे से बोला।
"ठीक हैं घंशू भाई। हां पहरेदारी ही समझ लो।" वह भी मुस्कुरा कर बोला लेकिन उसकी मुस्कराहट उसके चेहरे की तरह ही भयानक थी। लाल लाल बाहर की ओर उभरे हुए होंठों के अंदर पीले पीले दांत बड़े ही गंदे लग रहे थे।
"भालू, मेरा मतलब, भलोटिया के साथ आए हो?" वह कल्लू से बोला।
"हां, वह अंदर है, लेकिन गजानन (गंजू) साहब रांची गये हुए हैं।" वह मुझे ऊपर से नीचे लार टपकाती नजरों से देखते हुए बोला। जिस तरह वह मुझे देख रहा था, उससे मुझे गुस्सा और घिन दोनों आ रहा था, लेकिन इतने दिनों में मेरी ही आदत खराब हो गई थी, इसलिए आदतन मेरी नजरें उसकी जांघों के बीच चली गई और वहां का नजारा देख कर मैं स्तंभित रह गई। उसके पैंट के सामने का हिस्सा असामान्य रूप से उभरा हुआ था। मेरा चेहरा लाल हो उठा। वह कमीना भी मेरी नज़रों को और मेरे चेहरे के बदलते रंग को ताड़ लिया था। उसकी गंदी मुस्कान और गहरी हो उठी। उसकी आंखों में अजीब सी चमक मैं स्पष्ट रूप से देख सकती थी। मेरी चोरी पकड़े जाने का अहसास करके मेरा चेहरा और सुर्ख हो उठा। उसे साफ साफ पता चल गया था कि मैं किस टाईप की लड़की हूं। मुझे अपने ऊपर बड़ी कोफ्त हो रही थी। छि छि, मैं भी कितनी घटिया बन गई थी। थोड़ा भी खुद पर नियंत्रण नहीं रख सकती थी। सच तो यह था कि न चाहते हुए भी मेरी नंगी चूत गीली होने लग गई थी।
"मुझे पता है, और तुम्हें बंद दरवाजे के बाहर पहरेदारी करने की जरूरत क्या है? भलोटिया तो है ना अंदर?" कहकर घनश्याम दरवाजे की ओर मुखातिब हुआ।
"हां हां, भलोटिया साहब अंदर ही हैं। हम तो बस ऐसे ही थोड़ा सावधानी के हिसाब से बाहर तैनात हैं।" कहकर वह दरवाजा खोलने के लिए आगे बढ़ा।
"ठीक है, ठीक है, तू पहरेदारी कर, हम अंदर जाते हैं। और यह क्या है बे, साले जुगाड़ दिखी नहीं कि हथियार तैयार? कंट्रोल कर।" घनश्याम उसके पैंट के आगे के उभार की ओर इशारा करते हुए बोला।
"का करें भाई, ई साला हमारे कंट्रोल से बाहर का चीज है। जुगाड़ दिखी नहीं कि उछलना शुरू कर देता है। जुगाड़ तो जुगाड़, अईसा मस्त जुगाड़, कंट्रोल कहां से होगा।" वह बोला। मैं जानती थी कि ये लोग मुझे ही जुगाड़ बता रहे हैं लेकिन मैं कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थी। वैसे भी कल्लू मियां की तीक्ष्ण दृष्टि से बच कहां पाई थी। उसके चेहरे का भाव बता रहा था कि सब कुछ तो समझ गया था वह।
"अबे, भलोटिया के सामान पर नजर न लगा।" घनश्याम बोला।
"नजर कहां लगा रहे हैं। देखने की चीज देखना गलत है क्या? आंखें बंद कर लें क्या?"
"आंखें बंद करने को कौन बोल रहा है? साले, मन ही मन तो....."
"मन की बात का क्या। मिलेगी तब तो?"
"ओ हो, मतलब मन ही मन मना रहे हो कि मिल जाए?"
"मिल जाए तो खुशकिस्मती मानेंगे।"
"इसका मतलब उम्मीद है और मन में खिचड़ी पक रही है?"
"उम्मीद पर तो दुनिया टिका है।"
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"तुम उम्मीद करते रहो और हमें अंदर जाने दो।" घनश्याम बोला और कल्लू ने लंबी सांस ली और दरवाजा खोल दिया। उनकी बातें मैं अच्छी तरह समझ रही थी और मुझे भीतर ही भीतर घनश्याम पर गुस्सा भी आ रहा था कि मुझे कहां फंसा दिया है। यहां आकर मैं किसी भी तरह का विरोध नहीं कर सकती थी। चुपचाप घनश्याम की बात मानने के अलावा मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं था। कल्लू और घनश्याम के बीच जो बातें चल रही थीं उसे सुनने में कोई दिलचस्पी भी नहीं थी। मैं तो बस यह चाह रही थी कि किसी प्रकार यहां से निकलूं लेकिन घनश्याम की बात मानने से ही मुझे यहां से मुक्ति मिल सकती थी। लेकिन एक बात तो थी कि जितनी देर घनश्याम और कल्लू के बीच बातें हो रही थीं, कल्लू की नजरें मुझी पर जमी हुई थीं। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी नजरें मेरे कपड़ों के अंदर भी देख पाने में सक्षम हों, क्योंकि उसके चेहरे पर कई रंग आ जा रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे मेरी नग्न देह को देख रहा हो और मेरे अंग प्रत्यंग की थाह ले रहा हो। मेरे अंदर भी अजीब तरह की सुरसुरी हो रही थी। मेरी ब्रा रहित चूचियों के निप्पल्स तन गये थे जिन्हें मेरी ब्लाऊज के बाहर से ही स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता था। छि छि, इन्हें मैं छिपा भी तो नहीं सकती थी। न जाने क्या सोच रहा था होगा मेरे बारे में। मेरी चूत में भी अजीब तरह की हलचल मच रही थी और नतीजतन चूत से पानी का रिसाव आरंभ हो गया था। हे भगवान, इतने ही दिनों में मैं कितनी कामुक हो गई थी। घनश्याम सच ही बोल रहा था कि मुझमें चुदाई का चस्का सर चढ़कर बोल रहा था और मैं मर्दों की भूखी कुतिया की तरह हो गई थी।
इस वक्त भी, जब घनश्याम अपने हिसाब से मुझे मेरी करतूत की सजा देने की नीयत से यहां लेकर आया था, मेरे मन में कुछ और बातें चल रही थीं। मुझे तो अब साफ साफ महसूस हो रहा था कि मुझे दंडित करने की बात जो घनश्याम कह रहा था, वह सब झूठ था। दरअसल मुझे लगने लगा था कि रघु से चुद जाना और धोखे से जधु की भी शिकार बन जाना घनश्याम को खल रहा था या यों कहें कि वह मन ही मन कुढ़ रहा था। जो कुछ रघु और जधु ने मेरे साथ किया था उसे जानकर उसका भी मन मुझे चोदने को मचल उठा था और इस कारण मुझे दंड देने का बहाना बना कर इसी वक्त अपनी इच्छा पूरी करना चाह रहा था और इसके लिए गंजू के अड्डे से बेहतर जगह और क्या हो सकता था, लगे हाथों गंजू के साथ मुझे बांट कर अपनी मित्रता भी निभा लेता, लेकिन दुर्भाग्य से गंजू रांची गया हुआ था। फिर भी गंजू की अनुपस्थिति में उसकी खुशकिस्मती से उसके हाथ भलोटिया जैसे प्रभावशाली व्यक्ति को प्रभावित करने का सुअवसर प्राप्त हो गया था। अबतक जो बात मुझे समझ में आया था वह यह कि गंजू के अलावा घनश्याम भी भलोटिया से भलिभांति परिचित था और भलोटिया के सामने मुझे पेश करके उसे तो खुश कर ही देता लेकिन साथ ही साथ अपनी मुराद भी (मुझे चोदने की, जिसके लिए वह मरा जा रहा था) पूरी कर लेता, या शायद दोनों साथ में मिलकर सम्मिलित रूप से मुझे भोगते। मेरे साथ अब जो कुछ होने वाला था उसे सोच कर मुझे किसी प्रकार की कोई परेशानी दिखाई नहीं दे रही थी और न ही मन में किसी प्रकार का भय था, क्योंकि अबतक घनश्याम और मेरे बीच जो बातें हुई थीं, कल्लू और घनश्याम के बीच जो बातचीत हुई थी और कल्लू की कामुक नज़रों का मुझपर जो असर हुआ, उन सबका परिणाम यह हुआ कि मेरे अंदर फिर से वासना की डायन जाग उठी थी। उत्तेजित तो मैं पहले से ही हो रही थी लेकिन कल्लू की मर्दानगी और उसकी कामुक नज़रों ने जैसे आग में घी डालने का काम कर दिया था। अंदर भालू या भलोटिया, जो भी था, जिसके सामने मुझे परोस कर मुझे दंडित करना चाह रहा था, उसकी कल्पना करते हुए मुझे रंच मात्र भी भय का अनुभव नहीं हो रहा था। वह मेरे साथ किस तरह पेश आने वाला था, इसकी भी मुझे कोई खास परवाह नहीं हो रही थी। सच तो यह था कि इसके उलट भलोटिया जैसे अजनबी की जो भालू जैसी काल्पनिक छवि मेरे मन में बन चुकी थी उसके साथ संसर्ग करने की कल्पना से मेरे अंदर अजीब तरह का रोमांच हो रहा था। जहां घनश्याम मुझे सजा देने की सोच रहा था वहीं मैं इस रोमांचक अनुभव के लिए बेताब हुई जा रही थी। मेरी इस मन: स्थिति का जरा भी आभास अगर घनश्याम को हो जाता तो पता नहीं उसके मन में क्या बीतती। यह सोचकर मुझे मन ही मन हंसी आ रही थी। घनश्याम जब मुझे यहां ले कर आ रहा था तो शुरू में मुझे बड़ा बुरा लग रहा था और मैं इस मुसीबत से छुटकारा पाना चाह रही थी लेकिन अब मेरी मन: स्थिति बदल चुकी थी और मैं खुद ही पुरुष संसर्ग के लिए उत्तेजित हुई जा रही थी, अब चाहे वह पुरुष भालू या भलोटिया, या कल्लू या खुद घनश्याम हो।
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