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Misc. Erotica गरम रोज
कुछ सेकंड के उस विराम में ही उनका दर्द छूमंतर हो गया। मैं समझ गया कि तुम्हारी मम्मी इससे पहले भी अपनी गांड़ में लंड ले चुकी है, नहीं तो अब तक चीख चीखकर आसमान सर में उठा लेती। इतनी जल्दी मेरे लंड को अपनी गांड़ में एडजस्ट करना सबके बूते की बात नहीं थी। इसका एक कारण यह भी था कि मैं ने जिस तरह से उनकी गांड़ और चूत को चाट चाट कर गरम किया था वह भी काम आ गया। मैं अब उनकी चूचियों को पीछे से पकड़ कर मसलना चालू कर दिया। अब वे शांत थीं। बिल्कुल शांत। शायद अब अपनी गांड़ में मेरे लंड को ग्रहण करने के सुखमय अहसास से दो चार हो रही थीं।
"अब कैसा लग रहा है मैडमजी?" मैं उनकी गांड़ की संकीर्ण छेद में लौड़ा घुसाए घुसाए ही पूछ बैठा। उसके जवाब देने के पहले ही मैंने अपने एक हाथ से उनकी चूत का स्पर्श किया।
"उईईईईईईई मां....." वे चिहुंक उठीं। शायद अपनी चूत पर मेरे हाथ की उंगलियों के स्पर्श से चौंक उठी थीं।
"क्या हुआ?"
"पीछे से लं.. और सामने से उंगली? बड़ा ही कमीना चुदक्कड़ है रे तू मां का लौ... ।" वे बोलीं। उनकी आवाज में अप्रत्याशित सुखद अनुभूति की स्वीकृति थी। मैं उत्साहित हो गया और अब खुलकर उनकी गांड़ चोदने को एक तरह से छूट सी मिल गई थी। मैं अपना लंड थोड़ा पीछे खींचा और फिर घप्प से पेल दिया। ऐसा मैंने तीन चार बार ही किया कि,
"आह, ओह, कमीना, यह क्या कर रहा है रे? आगे से तो आगे से, पीछे से भी तू कमाल है, कुत्ता कहीं का। तू सचमुच बहुत चालू चीज है। बहला फुसलाकर आखिर में मुझे हासिल करके ही माना।" वे बोलीं।
"वह सब तो ठीक है मैडमजी, अब बताईए कैसा लग रहा है?" मैं बोला।
"बड़ा अच्छा। आह ओह....." वे बोल पड़ीं।
"बहुत बढ़िया।" कहकर मैं धीरे-धीरे धीरे-धीरे चोदने की रफ्तार बढ़ाने लगा और साथ ही साथ उनकी चूत और चूचियों को सहलाने और रगड़ने लगा। यह उन्हें पागल करने के लिए काफी था। वे मस्ती में आकर अपनी गांड़ उछालने लगी थीं। मुझे गजब का मजा मिल रहा था। तुम्हारी मां की गुदगुदी गांड़ की फांक में उस स्वर्गीय टाईट छेद में अपना लंड घुसेड़ कर गचागच चोदने का आनंद कोई मुझसे पूछे। ऊपर से उनके गांड़ उछालने की अदा का तो कहना ही क्या था। अब समझ में आ रहा था कि घुसा ने तुम्हारी मां के ऊपर जो मेहनत किया था उसका सुखद परिणाम मुझे मिल रहा था। मेरा लंड देख कर साली कुतिया तो खाली पीली डर रही थी। एक बार मेरा लंड उसकी गान्ड में क्या घुसकर रास्ता बना लिया कि वह अपने असली रंग में आ गई थी।
"आआआआआआह ओओओओओहहहहह..." वे सिसकारियां निकालने लगीं। उनकी आनंद भरी सिसकारियों को सुनकर मेरा उत्साह दुगुना हो गया और मैं उनके कंधों को पकड़ कर झिंझोड़ झिंझोड़ कर घपाघप चोदने लगा।
"ओओओओओहहहहह मैडमजी हुं हुं हुं...."
"मैडमजी मत बोल हरामी, मेरी इज्जत की ऐसी तैसी कर रहे हो और मैडमजी बोल रहे हो। मुझे मैडम रहने कहां दिया चोदू कहीं का।"
"मैडमजी न बोलूं तो और क्या बोलूं?"
"जो बोलना है बोल लेकिन मैडम मत बोल। यह सब कर के मैडम और ड्राइवर का फर्क कहां रहा हरामी। अब चुपचाप चोद मां के लौ... ‌‌" वे मस्ती में डूब कर बोलीं।
"हां हां क्या बोल रही थीं, लौ.. ‌.." मैं मुदित मन चोदते हुए खिंचाई करने लगा।
"बोल रही थीं नहीं, बोल रही थी। हां लौड़ा बोल रही थी, लंड बोल रही थी। बड़ा इज्जत दे रहा है कुत्ता कहीं का। और क्या सुनना चाहता है मादरचोद, बोल।" वे भी बेशर्मी पर उतर आई थीं। सच में, चुदाई की खुमारी में आदमी सचमुच बेशर्म हो कर क्या बोल रहा है समझ ही नहीं आता है। मुझे तो तुम्हारी मां के मुंह से ये बातें सुनकर बड़ा मज़ा आ रहा था।
"इज्जत न दूं?"
"इज्जत लूटते हुए मुंह से बड़ा इज्जत देने की बात कर रहा है बेशर्म, कमीना। चुपचाप चोद ना।"
"अब आप, ओह सॉरी, तुम रंग में आ गई हो। यही तो मैं चाहता था।" कहकर लगातार ठोकता चला गया और करीब पंद्रह मिनट की अथक चुदाई के बाद मेरा लंड और सख्त और मोटा होने लगा और लो, मेरे लंड से फौवारा छूटने लगा। "आआआआआआह.... "
"ऊऊऊऊऊऊ मांआंआंआं....." कहती हुई वे भी झड़ने लगीं और हम दोनों खल्लास हो कर यहीं निढाल पड़ के हांफने लगे। अभी हम दोनों सामान्य हुए ही थे कि अचानक हमारे बिल्कुल पास से आवाज आई,
"अबे चल हट। अब हमें चोदने दे।" यह अजनबी आवाज सुनकर हम दोनों चौंक कर आवाज की दिशा में देखने लगे। उस मंच के बिल्कुल पास में पता नहीं कब दो काले कलूटे, करीब पच्चीस तीस साल के दो लफंगे खड़े हो कर चुपचाप हमारी चुदाई देख रहे थे। दोनों के दोनों अपने अपने पैंट उतार चुके थे और उनके लंड फनफना रहे थे। हम दोनों उन्हें देख कर सन्न रह गये थे। मुझे उनके इस तरह भूतों की तरह आगमन से कुछ खास चिंता नहीं हुई थी लेकिन तुम्हारी मां की हालत बड़ी बुरी थी। मैं जानता था कि ये लोग नशेड़ी बदमाश लोग हैं और इस सुनसान जगह में नशा करने और कुछ न कुछ असामाजिक कार्य के लिए आते रहते होंगे। तुम्हारी मां हड़बड़ा कर उठने लगी लेकिन मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि वे चिंता नहीं करें। मैं आराम से उठा और कपड़े पहनने की जहमत उठाने के बजाय नंगा ही उनकी ओर मुखातिब होकर बोला,
"हां तो क्या बोल रहे थे तुमलोग?"
"इस रंडी को अकेले अकेले चोद कर कैसे चले जाओगे बुढ़ऊ, हमको भी चोदने दे फिर इसे लेकर चले जाना।" उनमें से एक बोला।
"अच्छा तो आ जाओ।" कहकर मैं बोला और नंगा ही वहां खड़ा हो गया।
"क्या?" तुम्हारी मां अविश्वास से मेरी ओर देखने लगी।
"आप चिंता मत कीजिए, दो ही लोग तो हैं।" मैं तुम्हारी मां की ओर मुस्कुरा कर देखते हुए बोला।
"हरामी, तू सचमुच बड़ा कमीना है।" वे गुस्से से उठते हुए बोलीं।
"मेरा कमीनापन तो अभी आप देखेंगी।" कहकर मैंने सामने आते हुए पहले आदमी की गाल पर एक जोरदार थप्पड़ मारा। थप्पड़ इतना जोरदार था कि वह चकरा कर वहीं गिर पड़ा। उसके मुंह से खून निकल गया था। उसकी हालत देख कर दूसरा गुस्से से लाल पीला होते हुए मेरी ओर बढ़ा।
"साले बुड्ढे मादरचोद अभी बताते हैं तुमको... " लेकिन अभी उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि मेरा एक जोरदार घूंसा उसके चेहरे पर पड़ा। घूंसा इतना जोरदार था कि वह तीन कदम पीछे चला गया। उसकी नाक और मुंह से खून निकलने लगा। वह डगमगाने लगा और धड़ाम से नीचे गिर पड़ा। मैं अपना हाथ झाड़ते हुए तुम्हारी मां से बोला,
"अब घर चलें? उठिए और कपड़े पहनिए।" मैं इत्मीनान से अपने कपड़ों की ओर बढ़ते हुए बोला। तुम्हारी मां आश्चर्य से मुझे देखती रह गई। सिर्फ तीस सेकंड में सबकुछ हो गया। तुम्हारी मां चुपचाप उठ कर अपने कपड़े पहनने लगीं। कपड़े पहन चुकने के बाद तुम्हारी मां बोली,
"और इन लोगों का क्या होगा?" वे उन लफंगों को दिखाते हुए पूछ रही थीं। वे दोनों अभी भी जमीन पर पड़े हुए थे। एक तो बेहोश था और दूसरा अपना मुंह पकड़ कर जमीन पर बैठा कराह रहा था।
"इनका? इनको यहीं पड़े रहने दीजिए।" कहकर मैंने उस कराहते हुए आदमी को एक लात और लगा दिया। वह बैठे बैठे वहीं उलट गया। खून से लिथड़ कर और पीड़ा से उसका चेहरा विकृत हो गया था।
फिर हम इस खंडहर से निकल कर गाड़ी की ओर बढ़े। तुम्हारी मां से ठीक से चला भी नहीं जा रहा था। मैं उन्हें थाम कर गाड़ी तक लाया।
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Wow Shandar ...............
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"आप ठीक तो हैं?" मैं ने उनसे पूछा।
"हट शैतान। बड़ी बुरी हालत कर दी है तुमने।" वे मुझसे नज़रें नहीं मिला पा रही थीं। मैं मुस्कुरा उठा।
"आपको अच्छा लगा कि नहीं यह बोलिए।" मैं बोला।
"तुम मेरे मुंह से क्या सुनना चाहते हो?" वे सर झुकाए हुए ही बोलीं।
"हां या ना।"
उन्होंने हां में सर हिलाया लेकिन शर्म से उनका चेहरा लाल हो गया था।
कार स्टार्ट होते ही तुम्हारी मां बोली, "बहुत बुरी हालत कर दी तुमने उन बेचारों की।"
"अच्छा? बेचारे? आपको तरस आ रहा है उनपर? मुझे छोड़ देना चाहिए था क्या उनको?" मैं बोला।
"नहीं मेरा वो मतलब नहीं था।" वे झट से बोल उठीं।
"तो क्या मतलब था आपका?"
"इतनी बुरी तरह से नहीं मारना चाहिए था।"
"एक एक हाथ ही तो लगाया था। इतने में ही उनकी यह हालत हो गई तो मैं क्या करूं।"
"तुम्हें अपनी ताकत का अंदाजा नहीं है शायद।" "आपको शायद अंदाजा लग गया है।" मैं शरारत से बोला।
"तुम बड़े पाजी हो। मैं उस मतलब से नहीं बोल रही थी।" मेरी बातों का अर्थ समझ कर उनके गाल सुर्ख हो उठे थे। मैं उनकी हालत देखकर हंस पड़ा।
"मैं सभी तरह का इलाज जानता हूं। जैसी बीमारी वैसा इलाज। यही मेरा सिद्धांत है।" वे मुझे देखती रह गयीं। इसके बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा। मेरे पूरे तन मन में पूरे रास्ते तुम्हारी मां के रसीले बदन से मिली मस्ती का नशा छाया हुआ था। घर पहुंचकर तो बाकी सब कुछ तुमने देख समझ लिया। इतना कहकर वह चुप हुआ।
"आप तो बहुत पहुंचे हुए निकले। मम्मी का भी शिकार कर लिया।" मैं अपने स्थान से उठती हुई बोली।
"सब तुम्हारी कारस्तानी का नतीजा है।" वह अपने कपड़े उठाते हुए बोला। तभी.. ‌..
"हां हां यही था " हमें एक आवाज सुनाई पड़ी। हमने आवाज की दिशा में निगाहें घुमाईं तो देखा कि आठ लोग हमारी ओर बढ़े चले आ रहे थे। चार लोगों के हाथों में हॉकी स्टिक थीं। सभी पच्चीस से पैंतीस साल के थे। उनमें से दो का चेहरा पिटा हुआ था। उनकी खतरनाक नीयत ताड़ कर हम झट से उठ खड़े हुए।
"पिटे चेहरे वाले दोनों लोग ही कल आए थे। आज अपने साथियों के साथ पिटने के लिए आए हैं।" घनश्याम अपने कपड़ों को छोड़कर नंगा ही बिना किसी शर्म के उनसे निपटने के लिए तैयार हो गया। घनश्याम की मुद्रा देखकर मैं आश्वस्त हो गई कि वह उनका मुकाबला करने में सक्षम है और सहयोगी के तौर पर तीन चार लोगों से तो मैं भी निपट सकती हूं। मैं भी घनश्याम की तरह नंगी ही निर्भयता के साथ उनका मुकाबला करने के लिए मन ही मन तैयार हो चुकी थी।
"साला बुढ़ऊ मादरचोद बहुत बड़ा चुदक्कड़ है। कल एक जबरदस्त माल को लाकर चोद रहा था और आज इस लौंडिया को चोदने के लिए लाया है। मारो साले को। कल हम दोनों चोदने दो बोले तो चोदने देने के बदले हमको मारकर भाग गया था। आज कहां जाएगा। पहले इसको मारो फिर हमलोग इस लौंडिया के साथ मजे करेंगे।" टूटी नाक वाला गुस्से से बोला। मैं जानती थी कि उनके विचार से सिर्फ घनश्याम से निपटने की जरूरत थी, उन्हें तो लग रहा था कि मैं मात्र एक अबला लड़की हूं। उन्हें क्या पता था कि मैं किस मिट्टी की बनी हूं।
"लौंडिया तो बड़ी जबरदस्त है बे। पहले इस बुड्ढे का हाथ पैर तोड़ो, फिर हम सब मिलकर इस लौंडिया को चोदेंगे।" उनमें जो लीडर टाइप आदमी था वह बोला और ऊपर से नीचे भूखी नज़रों से देखते मेरी ओर बढ़ा।
"ठीक है गुरु ठीक है। बस दो मिनट में इस बुड्ढे को लिटा कर आते हैं।" कहकर उनमें से चार लोग घनश्याम की ओर हॉकी स्टिक लहराते हुए बढ़े। मेरी ओर बढ़ते व्यक्ति को मैं बड़े ध्यान से देख रही थी। वह करीब पांच फुट दस इंच ऊंचा, सामान्य सेहत वाला व्यक्ति था। उसकी लाल लाल आंखों से पता चल रहा था कि वह नशे में था। जैसे ही वह व्यक्ति मेरी पहुंच में आया, मेरा दाहिना पैर चल गया और मेरा घुटना सीधे उसकी जांघों के बीचोंबीच पड़ा। यह प्रहार सीधे उसके गुप्तांग पर पड़ा था। "आआआआआहहहह... साली रंडी ईईईईई... कुतिया आआआआआ....." वह कराह कर अपना गुप्तांग पकड़ कर झुका ही था कि मैं ने अपने घुटने का जोरदार प्रहार उसके चेहरे पर कर दिया। वह इन एक के बाद एक अप्रत्याशित हमलों से उलट गया। उधर जो चार लोग घनश्याम की ओर बढ़े थे उनमें से एक के हॉकी स्टिक के वार को घनश्याम ने डॉज किया और दूसरे के वार को अपने हाथ से रोक कर उसके हाथ से हॉकी स्टिक छीन लिया। उसके बाद तो मात्र दो मिनट में ही वहां का नक्शा बदल गया। मेरे हाथों उनके लीडर टाइप आदमी की हालत देखकर दूसरा व्यक्ति मेरी ओर बढ़ा लेकिन मेरी एक ही जबरदस्त किक से, जो सीधे उसकी ठुड्ढी के नीचे पड़ा था, वह भी भरभरा कर जमीन पर गिर पड़ा। उन नशेड़ी लफंगों में इतना माद्दा नहीं था कि मुझ जैसी खिलंदड़ी लड़की के सामने ठहर सकें। उधर चारों हॉकी स्टिक वाले घनश्याम के हाथों से मार खाकर जमीन पर पड़े हाय हाय कर रहे थे। बाकी दोनों कल के पिटे हुए लफंगे वहां अपने साथियों का हस्र देखकर जान बचा कर भाग खड़े हुए।
"भागते कहां हो सालों मां के दल्लों।" उन्हें भागते देखकर घनश्याम ने उन्हें पीछे से आवाज दी लेकिन उन्होंने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। जान गई कि ये नशेड़ी लफंगे सिर्फ गीदड़ भभकियों से ही लोगों को डराते हैं। एक बूढ़ा और एक अदना सी लड़की के सामने वे आठ लोग पानी मांग रहे थे। मैं ने वितृष्णा से मेरे सामने पड़े दोनों लोगों पर थूक दिया। मैं ने देखा कि चार लोगों को धराशाई करने के बाद घनश्याम मुझे विचित्र दृष्टि से देख रहा था।
"क्या देख रहे हो?" मैं घनश्याम से बोली।
"देख रहा हूं कि मैं तुम्हारे बारे में कुछ गलत नहीं बोला था।"
"क्या बोले थे, मुझे याद नहीं।"
"यही कि तुम और लड़कियों से अलग हो, खास हो। क्षमता है और काफी संभावनाएं हैं तुममें।" वह प्रशंसनीय दृष्टि से मुझे देखते हुए बोला।
"चने की झाड़ पर चढ़ा रहे हो?"
"सच बोल रहा हूं।"
"अच्छा अच्छा, कपड़े पहनो और चलो यहां से।" कहते हुए मैं अपने कपड़ों की ओर बढ़ी जो इधर उधर छितराए हुए थे। मैंने देखा कि मेरी ब्रा का हुक टूटा हुआ था और मेरी पैंटी की भी इलास्टिक टूटी हुई थी। घनश्याम की जबर्दस्ती और बेरहम नोच खसोट का परिणाम था यह। "देख कमीने क्या किया है तूने?" कहकर मैंने अपनी ब्रा और पैंटी उसके सामने फेंक दी और बिना ब्रा और पैंटी के ही अपने कपड़े पहन लिए। घनश्याम भी अपने कपड़े पहन कर चलने को तत्पर हो उठा। उन छहों घायल, घायलावस्था में पड़े फटी फटी आंखों से हमें देखते रह गए और हम उन्हें उसी अवस्था में छोड़ कर उस खंडहर से बाहर निकल पड़े।
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"दो मुस्टंडों को धूल चटा देने का मतलब समझती हो?' कार स्टार्ट होते ही घनश्याम ने पूछा।
"नहीं। मुझे सिर्फ इतना पता है कि जो आदमी मुझपर हमला करेगा, उसके साथ ऐसा ही होगा।" मैं बोली।
"तुम ऐसा कैसे कर सकी?'
"जूडो कराटे।"
"ओह, मार्शल आर्ट?'
"हां।"
"तुम अच्छी ट्रेनिंग लोगी तो अच्छी फाईटर बन सकती हो।"
"कॉलेज में थी तो मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग ले रही थी। कॉलेज में आकर छूट गयी।" मैं बोली।
"कौन सी लेबल तक पहुंची हो?"
"येलो लेबल तक "
"ओह बहुत बढ़िया। आगे भी जारी रखो।"
"पढ़ाई से समय ही कहां है।"
"अच्छा? इतनी पढ़ाई तो नहीं होती है कॉलेज में कि समय ही न मिले।"
"तुम्हें क्या पता?"
"मुझे नहीं पता होगा तो किसको होगा?"
"अच्छा ! जरा मैं भी तो सुनूं कि तुम्हें कैसे पता है।"
"मैं स्नातक हूं बेवकूफ।"
"अच्छा! किस विषय में?" मैं चकित होकर उसे देखने लगी।
"मनोविज्ञान में।" वह और भी चकित करता हुआ बोला। अच्छा तो इसीलिए लोगों के मनोभाव को पढ़ने में माहिर है। पढ़ा लिखा है तभी उसकी भाषा भी शुद्ध है।
"फिर ड्राईवर क्यों बने? और भी तो नौकरी मिल सकती थी।" मुझे उसके बारे में और जानने की जिज्ञासा होने लगी।
"नौकरी मिलने तक परिवार भी तो चलाना था। ड्राईविंग करते हुए इसी लाईन में मन लग गया।"
"ओह।"
"अब तुम बताओ कि मार्शल आर्ट की क्लास दुबारा कब से करोगी?"
"मुझे अब क्लास ज्वाइन करने का मन नहीं है। कोई अलग से ट्रेनर मिले तो कोई बात बने।" मैं आधे मन से बोली।
"फिर मैं किस मर्ज की दवा हूं?" अब मैं सचमुच चौंक गयी।
"तुम मार्शल आर्टिस्ट?"
"हां, ब्लैक बेल्ट।" वह बोला। तभी मैं सोचूं कि दो मिनट में चार लोग कैसे उसके सामने धूल चाट रहे थे।
"तो तुम, ओह सॉरी, आप मुझे आगे सिखा सकते हैं?" मैं रोमांचित होकर उत्सुकता से बोली। उसके लिए अब थोड़ा आदर का भाव आ गया था। चुदाई की बात और थी लेकिन उसके बौद्धिक स्तर और हरफनमौला व्यक्तित्व का सम्मान तो करना ही था।
"बिल्कुल। और यह तुम से आप पर क्यों आ गयी? तुम ही बोलो, यही ठीक है। अपनेपन का अहसास होता है। मुझे तुम्हारी एक बात से चिंता हो रही है।" वह बोला।
"किस बात से?" मैं उसकी ओर सवालिया दृष्टि फेंक कर बोली।
"तुम्हारी सेक्स की भूख से और इसे हल्के में लेने की तुम्हारे स्वभाव से। मुझे डर है कि कहीं तुम्हारा यह खिलंदड़पन तुम्हें कभी किसी मुसीबत में न फंसा दे।" वह गंभीरता से बोला।
"ऐसा कभी नहीं होगा। मुझे खुद पर पूरा विश्वास है।" मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ बोली।
"देखो आत्मविश्वास अच्छी चीज है लेकिन अति आत्मविश्वास का शिकार मत होना नहीं तो तुम्हारे साथ कुछ भी अनिष्ट हो सकता है।" वह फिर से मुझे चेतावनी देते हुए बोला।
"तुम बेकार ही कुछ अधिक चिंता कर रहे हो मेरी।"
"खैर बोलना मेरा फ़र्ज़ था, और सुनो, तुम्हारी ट्रेनिंग कल से ही शुरू होगी। सवेरे पांच बजे उठकर जॉगिंग के लिए चलना है। फिर सुबह एक घंटा और शाम को एक घंटा, रोजाना मार्शल आर्ट का अभ्यास क्लास।" वह मुझे अभी से निर्देश देने लगा था।
"फिर घपाघप कब होगा?" मैं शरारत से बोली।
"वह भी होगा। अच्छी तरह से सीखोगी तो अच्छी तरह से चोदूंगा, नहीं तो इसी डंडे से तुम्हारा भुर्ता बनाऊंगा।" वह अपने लंड को पकड़ कर दिखाते हुए बोला।
"बाप रे, आपने तो डंडा दिखा कर डरा ही दिया। ठीक है गुरूजी महाराज, आपकी आज्ञा शिरोधार्य।" मैं भयभीत होने का अभिनय करते हुए बोली।
"हरामजादी नौटंकी करती है? मैं गंभीर हूं।" वह गंभीरता से बोला।
"ओह सॉरी गुरूजी, मैं क्षमा प्रार्थी हूं। अब नौटंकी नहीं करूंगी।" मैं भी गंभीर मुद्रा में बोली।
"यही तुम्हारे लिए बेहतर होगा। ठीक है। माफ किया।" वह बोला। मैंने देखा कि हम कॉलेज वाले रास्ते पर थे।
"यह हम कहां जा रहे हैं?" मैं चौंक कर बोली।
"कॉलेज।"
"कॉलेज के लिए तो देर हो गई।"
"दो ही पीरियड छूटा है। बाकी क्लास तो कर ही सकती हो।" उसे कोई फर्क नहीं पड़ा।
"हां सो तो है लेकिन मैं ऐसे ही कैसे जाऊं, बिना ब्रा और पैंटी के?" मैं घबराकर बोली।
"चुप। कौन उल्लू का पट्ठा तेरा कपड़ा खोल कर देखेगा कि तुम ब्रा और पैंटी पहनी हो कि नहीं? चुपचाप चलो।" वह तो पूरा अभिभावक की तरह मुझ पर हुक्म चला रहा था और मुझे खुद पर आश्चर्य हो रहा था कि मैं आज्ञाकारी पुत्री की तरह चुपचाप उसकी बात मान रही थी। उसने मुझे कॉलेज छोड़ा और लौट गया। मैं उसके बदले व्यक्तित्व को अचंभे से देखती रह गई।

आगे की घटना अगली कड़ी में। तबतक के लिए अपनी रोजा को आज्ञा दीजिए।
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Good one
रोजा jab jhansyam ne use college jane ke liye bola to roja
Ghansyam ko ghurte hue

[Image: 9bb5220422d54dd1a6d28d66eff0a4261df1959a.png]

कैसी लगी रोजा?
Read my new story! 
Forbidden Love "अंजलि का अनजान सफर"
https://xossipy.com/thread-64879.html
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(01-10-2024, 10:51 AM)Slave. Wrote: Good one
रोजा jab jhansyam ne use college jane ke liye bola to roja
Ghansyam ko ghurte hue

[Image: 9bb5220422d54dd1a6d28d66eff0a4261df1959a.png]

कैसी लगी रोजा?
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मैं ऐसी ही हूं। यह मेरी ही फोटो है। घनश्याम ने मेरे साथ जो कुछ किया उस दौरान मेरी पैंटी की इलास्टिक टूट गयी थी और ब्रा का हुक भी टूट गया था। यह फोटो बिना पैंटी और ब्रा का है। इसी हालत में मुझे कॉलेज जाने की बात कर रहा था तो मैं और किस तरह देखती उसे। गधा कहीं का।
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(01-10-2024, 12:05 PM)Rajen4u Wrote: मHahahऐसी ही हूं। यह मेरी ही फोटो है। घनश्याम ने मेरे साथ जो कुछ किया उस दौरान मेरी पैंटी की इलास्टिक टूट गयी थी और ब्रा का हुक भी टूट गया था। यह फोटो बिना पैंटी और ब्रा का है। इसी हालत में मुझे कॉलेज जाने की बात कर रहा था तो मैं और किस तरह देखती उसे। गधा कहीं का।
Hahaha sahi baat hai
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गरम रोज (भाग 13)

घनश्याम मुझे कॉलेज में छोड़ कर वापस चला गया। मैं कार से उतर कर कॉलेज गेट की ओर बढ़ी तो चलने में थोड़ी असुविधा का अनुभव कर रही थी। घनश्याम नें मुझे सबक सिखाने के चक्कर में शायद मेरी चुदाई के वक्त कुछ ज्यादा ही निर्दयता का परिचय दिया था शायद उसी का परिणाम हो। उसने जो कुछ किया सब कुछ असामान्य रूप से कुछ अतिरिक्त ही किया था, शायद मुझे अपनी शैतानी के लिए दंडित करने की नीयत से। अब महसूस हो रहा था कि उसने मेरी चूचियों को कितनी बेदर्दी से निचोड़ निचोड़ कर मसला था। अब भी दर्द कर रहा था और शायद कुछ फूल भी गया था या यों कहें सूज गया था। अपने असाधारण लंड से मेरी अगाड़ी और पिछाड़ी का जिस तरह खुन्नस निकालने वाले अंदाज से बाजा बजाया था उसका तो कहना ही क्या था। पूरा कस बल निकाल कर रख दिया था कमीने ने। शायद कुछ ज्यादा ही खोल दिया था और सुजा कर फुला दिया था जिसका मुझे अब अहसास हो रहा था। चलते वक्त मेरे नितंबों का आपस में घर्षण और खास करके मेरी चूत की पुत्तियों के बीच का घर्षण मुझमें एक अजीब तरह का रोमांचक अहसास करा रहा था। जो कुछ भी हुआ, मुझे उससे एक पीड़िता का अहसास होना चाहिए था लेकिन उसके बदले अच्छा अच्छा सा ही महसूस हो रहा था। उसके बाद वहां उन लफंगों से लड़ते हुए मेरा घुटना, लगता है थोड़ा चोटिल हो गया था जिसपर मैंने उस समय ध्यान नहीं दिया था। शायद मैं ने पहले वाले के चेहरे पर घुटने का प्रहार करते वक्त थोड़ी असावधानी बरती थी, जिसके कारण घुटने के जोड़ में थोड़ी पीड़ा का अनुभव कर रही थी। इन सबका मिला जुला असर मेरी चाल में लक्षित हो रहा था। मेरी चाल थोड़ी सी बदली बदली सी थी। मैं हल्का सा पैर फैला कर असामान्य रूप से चल रही थी। खैर मैं जानती थी कि यह तात्कालिक था।
कॉलेज गेट पर गेटकीपर रघु एक कुर्सी पर बैठा दिखाई दिया। मेरे तन मन में वैसे ही घनश्याम के बारे में जानकर और उसके साथ खंडहर में जो कुछ हुआ था उसे लेकर अजीब सी हलचल मची हुई थी, अब सामने रघु से सामना हो गया तो वह हलचल और बढ़ गई। दरअसल उस दिन कॉलेज के पुराने लैब में जो कुछ मेरे साथ राजू, विशाल, अशोक और रफीक कर रहे थे उस दौरान रघु ने मेरी नग्न देह का दर्शन किया था और उस दिन के बाद जब भी रघु को देखती थी तो इसी बात से मेरा मन आंदोलित होता था। उसकी हालत तो लगता था मुझसे भी बुरी थी।उसकी मानसिक स्थिति का अनुमान करना मुश्किल नहीं था। निश्चय ही जब भी मुझे देखता था होगा तो उसकी आंखों के सामने मेरी नग्न देह घूमने लगती थी होगी। निश्चय ही वह उत्तेजित हो उठता था होगा लेकिन वह यह भी अच्छी तरह से जानता था कि बिना मेरी ओर से हरी झंडी दिखाए वह मेरे तन को छू भी नहीं सकता था क्योंकि उसे मेरे विरोध और संघर्ष क्षमता का अंदाजा हो गया था। बेचारा, मन मसोस कर रह जाता था होगा। लेकिन उसके मन के किसी कोने में आशा की एक किरण थी, वह किरण थी उस घटना के बाद मेरा उसके लिए सहृदयता प्रदर्शित करना। मैंने उससे यह भी तो कहा था कि 'मुझे उसका पपलू भा गया है', यह बात उसे अवश्य आश्वासन देता था होगा कि मैं कभी न कभी उसके पपलू का स्वाद अवश्य चखना चाहूंगी। जब मैं घायलावस्था में उसे उस लैब से लेकर बाहर आ रही थी तो उसे अपनी चूची पर हाथ रखने दिया था, यह सब उसके मन में दबी कामना को जिंदा रखने के लिए काफी था।
सच कहूं तो मेरे मन के किसी कोने में रघु की अंकशायिनी बनने की तमन्ना थी। यह सब सोचते हुए मैं गेट के अंदर दाखिल हो रही थी तो मेरी नज़र रघु की नजरों से जा टकरायीं। इक्का दुक्का स्टूडेंट्स को छोड़कर सभी अपने अपने क्लास के अंदर थे और उस समय गेट के पास रघु और मुझको छोड़कर कोई नहीं था। हाय, कितनी हसरत भरी नजरों से मुझे देख रहा था बेचारा। उसकी नज़रों में न जाने क्या दिखाई दिया था मुझे कि मेरा पूरा शरीर चुनचुना उठा था और बिना ब्रा के मेरी चूचियों के निप्पल्स सख्त हो कर खड़े हो गए थे। मेरी ब्लाऊज के बाहर से ही मेरे निप्पल्स के नोंक स्पष्ट नुमायां हो रहे थे। घनश्याम से चुद चुद कर बेहाल अपनी गांड़ और चूत को पोंछने की भी जहमत नहीं उठाई थी या वहां हुए घटनाक्रम के चलते इसका ध्यान ही नहीं आया था, जो भी हुआ था, हुआ था, अब न चाहते हुए भी उस चूत से लसलसे पानी का रिसाव आरंभ होने लग गया था। बिना पैंटी के, चलते हुए वह लसलसापन मुझे अजीब सा अहसास करा रहा था। कम से कम पैंटी पहनी होती तो चूत से निकलते हुए लसलसेपन को सोखता तो, लेकिन स्कर्ट के अंदर नंगी चूत पर हवा का स्पर्श भी ठंढक का अहसास कराने में असफल हो रहा था। दर असल मेरी नंगी चूत पर जो हवा का स्पर्श हो रहा था उससे मिलने वाली ठंढक पर तन में सुलग उठी गर्मी हावी हो रही थी। यह मुझे क्या हो रहा था? इस स्थिति में मैं क्लास कैसे कर पाऊंगी? मेरी शारीरिक अवस्था के साथ ही साथ मन भी बहुत विचलित था। एक अजीब तरह की व्याकुलता मन में तारी थी। स्पष्ट तौर पर कह सकती हूं कि क्लास करने के लिए जो एकाग्रता की आवश्यकता होनी चाहिए वह चाह कर भी इस वक्त नहीं आ सकती थी। मन बड़ा उद्विग्न था और इस उद्विग्नता से मुक्ति का एकमात्र उपाय एक और अच्छी सी चुदाई ही हो सकती थी, उसके अलावा मुझे और कोई दूसरा विकल्प नहीं सूझ रहा था।
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aage aur bhi log shamil ho skte hai hmari roj ki jindagi main
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Good one

Dekho to humari रोजा ko  college me

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(03-10-2024, 11:04 PM)Slave. Wrote: Good one

Dekho to humari रोजा ko  college me

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बिल्कुल सटीक फोटो। बिना ब्रा के मेरी चूचियों के निप्पल्स इसी तरह खड़े हो कर टॉप को फाड़कर बाहर निकलने को बेताब थे। स्कर्ट थोड़ी सी और उठ जाती तो मेरी रसीली चूत का भी दर्शन हो जाता। कोई बात नहीं। यह फोटो भी यह दिखाने के लिए काफी है कि मैं कितनी चुदासी हो रही थी।
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हे भगवान, यह मुझे क्या होता जा रहा था। मेरे अंदर सेक्स की इतनी भूख कैसे बढ़ती जा रही थी? मन के झंझावातों से मुक्ति के और भी तो विकल्प हो सकते थे लेकिन घूम फिरकर फिर विकल्प के रूप में एकमात्र चुदाई का रास्ता ही क्यों सूझता था मुझे? मैं अपने रौ में इसी रास्ते को अख्तियार करते हुए बहाव में बहती जा रही थी। बस फिर क्या था, मैंने तत्काल निर्णय कर लिया कि अब जो होना है हो जाय। तत्काल तो मेरी शारीरिक भूख मिटाने के लिए सुलभता से उपलब्ध था रघु। समस्या यह थी कि मैं अपना मनोभाव उसके सामने व्यक्त कैसे करूं। मनोभाव व्यक्त कर भी दूं तो क्या वह इस वक्त मेरी मनोकामना पूर्ण करने के लिए अपनी ड्यूटी छोड़ सकता था? यह यक्षप्रश्न मुंह बाए खड़ा था। फिर भी स्पष्ट नहीं तो घुमा फिरा कर अपने मन की बात प्रकट तो कर ही सकती हूं और इस तरह बात बन गई तो बन गई और नहीं भी बनी तो भी बेशर्म वासना की पुजारन होने का तोहमत तो मुझ पर नहीं लग सकता था। देखती हूं परिणाम क्या निकलता है, मैं अभी यह सोचती हुई धीमी चाल से चल रही थी कि मानो बिल्ली के भाग से छींका टूटा।
"क्या हम आपकी कोई सहायता कर सकते हैं?" रघु ने मेरी झिझक को ताड़ कर कहा। मेरे पैर वहीं जम गये। मेरा दिल धाड़ धाड़ धड़कने लगा।
"तुम्हें क्यों लगता है कि मुझे किसी सहायता की जरूरत है?" मैं घबराकर चारों ओर देखती हुई धीमी आवाज में बोली।
"आपको देखकर हम सोचे कि शायद आपको कोई समस्या है और किसी तरह की सहायता की जरूरत है। अगर नहीं है तो कोई बात नहीं।" रघु बोला। लेकिन उसे अब भी आशा थी कि मैं मुंह खोल कर बोलूंगी। लेकिन ऐसी बात भला कोई लड़की अपने मुंह से कैसे खुल कर बोल सकती है, भले ही कितनी भी चंचल, वाचाल और खिलंदड़ी लड़की क्यों न हो।
"तुम्हें क्या पता कि मुझे कोई समस्या है? अगर समस्या है भी तो तुम्हें उससे क्या मतलब?" मैं बोली। हालांकि मैं जानती थी कि जो समस्या इस वक्त मेरे अंदर थी, उसका समाधान रघु ही के पास था लेकिन मैं मुंह खोल कर कैसे बोल देती।
"न बताना हो तो न बताओ लेकिन हम शायद जानते हैं कि आपकी समस्या क्या है इसलिए बोले थे। आगे आपकी मर्जी।" रघु मुझे घूरते हुए बोला। वह खेला खाया लौंडिबाज था, उससे भला मेरी स्थिति का भान कैसे न होता। वह इधर-उधर देखा और अचानक उसका हाथ अपने पैंट के सामने चला गया, ठीक उसके लंड के ऊपर। मैं भौंचक्की रह गई उसकी हिमाकत देखकर। निश्चय ही उसे मेरी मन: स्थिति का सटीक आभास हो चुका था।
"तुम क्या जानते हो और क्या सोच रहे हो उससे मुझे क्या लेना देना है?" मैं कांपती आवाज़ में इधर उधर देखती हुई बोली।
"हम समझ गए। अपने मुंह से बोलिएगा नहीं तो हम का समझेंगे नहीं? लेना देना तो है मैडमजी। जो हम जानते हैं और जो हम सोच रहे हैं, हमारा विश्वास है कि हम बिल्कुल सही जान रहे हैं और सही सोच रहे हैं। चलिएगा वहीं? लेना देना हो जाएगा।" वह थोड़ा हिम्मत करके बोला। वह इधर-उधर देख रहा था और अब अपना लंड भी सहला रहा था।
"कहां?" मैं हड़बड़ा कर बोली। मैं घबरा भी गयी थी कि कोई रघु की हरकत को देखकर मेरे बारे मे क्या सोचेगा। हालांकि उसकी हरकत से मेरा मन मयूर नाच उठा था। मैं भीतर तक सनसना उठी थी।
"और कहां? लेन देन के लिए वही तो ठीक जगह है।" वह अब खुलकर अपनी मंशा प्रकट करते हुए बोला।
"मैं कुछ समझी नहीं।" मैं अनजान बनने का झूठ-मूठ ढोंग करते हुए बोली।
"वहीं चलकर समझा देंगे मैडमजी।" वह धीरे से अपने पपलू को सहला दिया था। मैं चौकीदार के केबिन की आड़ में हो गई ताकि उससे बातें करते हुए कोई देख न ले। क्लास जाने की बात तो मैंने कब का मन से निकाल दिया था। वह भी समझ गया कि मैं और लोगों से छुपकर उससे बात करना चाह रही थी।"कहां चलने की बात कर रहे हो, मैं अब भी नहीं समझी?" मैंने उसकी हरकत को अनदेखा करते हुए कहा।
"आप लोगों का एही समस्या है। चाहते भी हैं और खुलकर बोलते भी नहीं। हम जैसे लोग आप लोगों का 'मदद' करें भी तो कईसे करें।" वह तनिक मायूस स्वर में बोला।
"तुम क्या समझ रहे हो, बताओगे भी?" मैं भी धीरे धीरे हिम्मत जुटाने लगी थी।
"सबकुछ तो दिखाई दे रहा है। अब हम ना समझें इत्ता भी भकलोल नहीं हैं हम। तो चलें।" वह लार टपकाती नजरों से मुझे ऊपर से नीचे देखते हुए बोला। उसकी नजरें बार बार मेरी चूचियों पर जा कर टिक रही थीं। मैं उसकी नज़रों की ताब न ला सकी और मेरी चूचियों के निप्पल्स ब्लाऊज को छेद देने की जद्दोजहद करने लगीं। मेरी चूत से रिसाव नियंत्रण में नहीं रह गया था। मैं बड़ी शर्मिंदा महसूस करने लगी थी। मेरा शरीर चीख चीखकर मेरे मन की इच्छा को जाहिर कर रहा था और मैं उस साधारण से चौकीदार के सामने शर्म से पानी-पानी हो रही थी।
"और यहां गेट पर?" मैं सर झुकाए हुए बड़ी मुश्किल से बोल पाई। मेरी बात सुनकर वह खुश हो गया। इसका मतलब मैं रजामंद थी।
"इसका फिकर मत करो मैडमजी, एकाध घंटा के लिए हम गायब भी रहेंगे तो कोई हमको कुच्छ नहीं कहेगा। फिर भी हम सावधानी का तौर पर एक अऊर आदमी को तबतक के लिए बुला लेते हैं।" कहकर वह किसी को फोन करने लगा। "अरे भाई जधू, कुच्छ देर के लिए गेट पर आ जाओ। हम कुच्छ अरजेंट काम से थोड़ा भित्तर जा रहे हैं।" फिर मेरी ओर मुखातिब होकर बोला, "हां, अब ठीक है। पहिले हम आगे चलते हैं, पीछे पीछे आप आ जाओ। चिंता मत करो, कसम से इत्ता अच्छा से देंगे कि आप अऊर लेना चाहेंगी।" कहते हुए मुदित मन वह आगे बढ़ कर झाड़ियों को चीरता हूआ पुराने लैब की ओर तेजी से चल पड़ा। वह इतने विश्वास के साथ आगे बढ़ गया कि मैं देखती रह गई। उसे पूरा विश्वास था कि मैं उसके पीछे पीछे खिंचती चली आऊंगी। मैं कुछ देर वहां ठिठकी रही फिर जैसे किसी सम्मोहन के वशीभूत मेरे कदम यंत्रवत उसी दिशा में बढ़ चले। मन ही मन मना रही थी कि कोई इस वक्त मुझे देख न ले इसलिए चारों ओर चोर दृष्टि दौड़ा कर तेजी से उन झाड़ियों को चीरती हुई सामने से पलक झपकते गुम हो गयी और लैब की ओर भाग निकली। यह क्या था? अपरिपक्व उम्र में चुदाई का चस्का ही तो था। हवस की भूख ही तो थी। तन में लगी आग के आगे मैं अंधों की भांति बिना आगा पीछा सोचे लैब की ओर भागी थी जैसे वहां जाकर मुझे कोई कारूं का खजाना मिलने वाला हो।
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wow naya yaar bhi mil gya
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उस पुराने प्रयोगशाला के पास पहुंच कर मैंने देखा कि उस तरफ किसी का अता पता नहीं था। यह वैसे भी एक तरह से परित्यक्त भवन था जिसकी ओर आने की किसी को आवश्यकता भी नहीं थी। वहां तक आ कर मेरे कदम थोड़े सुस्त हुए। मैं झिझकते हुए प्रयोगशाला की ओर धीमे धीमे बढ़ने लगी। उसके दरवाजे की ओर देखा तो उसका ताला तो खुला हुआ था लेकिन दरवाजा बंद था। मैं असमंजस में वहां कुछ पल खड़ी रही। सोचने लगी कि दरवाजे रुपी लक्ष्मण रेखा को लांघूं या नहीं। अब मैं फिर से एक दुश्चिंता में पड़ गयी कि वासना के वशीभूत कहीं मैं किसी मुसीबत में तो नहीं पड़ने जा रही हूं? कहीं मैं जानबूझ कर आदमखोर शेर की मांद में घुसने तो नहीं जा रही हूं जहां एक आदमखोर नारी शरीर की तिक्का बोटी करने को घात लगाए इंतजार में उतावला हुआ जा रहा था? लेकिन मेरे तन की आग ने मानो मेरे सोचने समझने की शक्ति छीन ली थी। अंततः वासना की विजय हुई और मैंने कांपते हाथों से दरवाजा को हल्का सा धक्का दिया तो पहले वह खुला नहीं। तभी अंदर से रघु की आवाज आई,
"अंदर आ जाओ मैडमजी, दरवाजा खुला है।"
अंदर की आवाज सुनकर मैंने दरवाजे को ठेलने के लिए थोड़ा और जोर लगाया तो दरवाजा चर्र करते हुए खुला। धड़कते दिल के साथ जैसे ही मैंने दरवाजे के अंदर कदम रखा तो पहले पहल मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया। प्रयोगशाला के अंदर, बाहर के रोशनी की अपेक्षा रोशनी बहुत कम थी इसलिए अंदर की कम रोशनी में देखने की अभ्यस्त होने में कुछ पल लग गया। जैसे ही अंदर की मद्धिम रोशनी में देखने की अभ्यस्त हुई, एक मानव आकृति नजर आई। हे भगवान, यह क्या ! सामने किसी भूत की तरह पूरी तरह नंगा भुजंगा रघु खड़ा दिखाई दिया। बिल्कुल मादरजात नंगा। नारी देह पर टूट पड़ने को बिल्कुल तैयार। कमीना कहीं का, कितनी जल्दी वह मेरी मनोदशा को सटीक भांप लिया था। वह पूरे आत्मविश्वास के साथ निर्वस्त्र होकर कर बेसब्री से मेरे आने का इंतजार कर रहा था। यह मेरे लिए अप्रत्याशित था। कल्पना से परे। उस दृश्य को देखकर किसी भी लड़की को शर्म से पानी-पानी हो जाना चाहिए था, वही हालत कुछ पल मेरी भी थी, लेकिन मैं भौंचक्की, अपलक उसे देख कर सोचने लगी कि उसे कितना विश्वास था कि मैं 'इस काम' के लिए जरूर आऊंगी। उसे रत्ती भर भी दुविधा नहीं थी और पूरी तरह आश्वस्त था कि आज, इस वक्त मैं पूरी तरह चुदने की मनोदशा में थी। मेरे तन की भाषा को कितनी अच्छी तरह से पढ़ चुका था और समझ चुका था। उसे पूरा भरोसा था कि आज उससे चुदे बिना मैं जाने वाली नहीं थी। दरवाजे के अंदर मेरे कदम पड़ते ही उसकी बाछें खिल गई थीं कि आज उसकी तमन्ना पूरी होने का स्वर्णिम अवसर आ चुका है।
"यह कककक्या ....." मेरे मुंह से घबराई सी घुटी घुटी आवाज निकली। मेरा मुंह खुला का खुला रह गया था और आंखें फटी की फटी रह गईं थीं। उस काले कलूटे रघु को इतनी जल्दी ऐसी नंग धड़ंग अवस्था में देखकर मैं हतप्रभ रह गयी थी।
मेरे अंदर प्रविष्ट होते ही, "अरे जल्दी दरवाजा बंद कर गधी कहीं की।" कहकर वह बिजली की फुर्ती से दरवाजा अंदर से बंद कर दिया। मैं अबतक स्तब्ध मूर्ति की तरह खड़ी थी तभी पीछे से रघु ने मुझे दबोच लिया। उसका हाथ सीधे मेरी चूचियों पर आ टिका था और मेरे नितंबों के बीच सख्त खंभे की दस्तक महसूस होने लगी थी।
"हे भगवान, तुम इतने बड़े बदमाश हो, मुझे पता नहीं था। छोड़ो मुझे।" मैं उसकी जल्दबाजी से घबरा उठी थी।
"फिर आप इहां मेरे पिच्छे पिच्छे काहे आई हो?" वह मेरी चूचियों को मसलते हुए बोला। उसे महसूस हो गया कि मैं ब्रा नहीं पहनी हूं। "लो चूचकसना (ब्रा) भी नहीं पहनी हो। मतलब पूरा तईयारी का साथ आई हो अऊर हमको बदमाश बोलती हो।" उसका खंभा सख्त हो कर पीछे से मेरे स्कर्ट के साथ ही मेरी गुदा की दरार पर टिका हुआ था।
"मैं मैं कह रही हूं कि मुझे छछ छोड़ो, तुम तो...." मैं हकलाते हुए बोल रही थी। चुदने के तात्कालिक पागलपन में यहां तक चली तो आई थी लेकिन यहां आकर इस तरह एक चौकीदार के हाथों समर्पण करना सही है कि गलत, इसका निश्चय अभी भी नहीं कर पाई थी कि रघु नें इस तरह मुझ पर आक्रमण कर दिया था। हां ना के झूले में झूलते हुए मेरी मनोदशा से अनभिज्ञ रघु को इससे मतलब भी क्या था। यहां तक मेरा आना ही उसके लिए काफी था। मुझे क्या नहीं मालूम था कि यहां आने का क्या मतलब था? मुझे क्या नहीं मालूम था कि इस पुराने प्रयोगशाला में क्या होता था? यहां तक मेरा आना ही इस बात का द्योतक था कि यहां मेरे साथ जो कुछ होने वाला था उसके लिए मेरी पूरी रजामंदी थी। अब इस सही गलत के बखेड़े में पड़कर इस मौके का लाभ लेकर आनंद लेने से पीछे हटने का कोई अर्थ नहीं था। यह सोच मुझे आश्वस्त करने लगा। फिर मी मन के कोने में एक अव्यक्त दुश्चिंता अब भी थी इसलिए थोड़ी झिझक का इजहार कर रही थी।"मैडमजी, इहां आ कर अईसा झिझक और शरम करोगी तो कईसे काम चलेगा? आपको ई भी ठीक से पता है कि इहां का होता है। आपको ई भी पता है कि हम दोनों इहां काहे आए हैं तो फिर अब काहे का झिझक और शरम। अऊर अब तो आपको हाथ लगा कर पक्का हो गया कि आप तईय्यार हो कर ही आई हो‌, तो काहे नहीं खुला खेल खेल कर मज़ा ले लेती हो? देखो तो हम आपके इहां घुसने से पहिले ही कईसे तईय्यार हो गये हैं।" वह एक हाथ मेरी स्कर्ट में घुसाते हूए बोला और मैं चौंक कर उछल ही तो पड़ी। उसका हाथ मेरी स्कर्ट को नीचे से उठाता हुआ मेरी नंगी चूत तक जा पहुंचा।
"हाय दैय्या। हट बदमाश.... " मेरी पैंटी विहीन चूत पर उसके हाथ का स्पर्श ज्यों ही हुआ, मैं शर्म से पानी-पानी हो गई। हाय राम, क्या सोच रहा था होगा वह। मुझे काटो तो खून नहीं। वह भी मेरी नंगी चूत को छू कर हैरत में पड़ गया।
"उफ उफ, आप तो सचमुच पूरा तैय्यारी से आई हो साली। अब काहे का झूठ-मूठ का लाज शरम। ऊ दिन तो दूरे से देखे थे। आज इत्ते सामने से देखने का, हाथ लगाने का अऊर करने का मऊका मिला है तो काहे छोड़ दें।" कहकर मेरी झिझक, लाज शरम और झूठ मूठ की ना नुकुर की धज्जियां उड़ाता हुआ पलक झपकते ही मेरी ब्लाऊज और स्कर्ट से मुझे मुक्त कर दिया और लो, मैं बिल्कुल मादरजात नंगी उसके सामने खड़ी थी।
"द द द देखो यह गलत है....." मैं शर्म से पानी-पानी पानी होती हुई बोली।
"अच्छा? ई गलत है? तुमको पता ही है ना कि इहां का होता है? फिर भी तुम आई ना? हम जबरजस्ती तो तुमको इहां लाए नहीं। तुम खुदई इहां आई हो। अगर ई गलत होता तो तुम इहां आती का? नहीं ना? फिर अब ई सही गलत का बात का का मतलब?" मेरी कमसिन हसीन नंगी देह को इतने सामने से देख कर उसकी तो मानो लॉटरी निकल पड़ी थी। वह अविश्वास से कुछ पल मुझे सर से पांव तक निहारता रह गया और अपनी किस्मत को सराहता रहा। मैं शर्म से फर्श पर गड़ी जा रही थी। हाय राम, मुझ जैसी संभ्रांत घर की एक लड़की, एक निम्न स्तर के एक मामूली चौकीदार के सामने नंगी खड़ी थी और कुछ ही देर में उसकी वासना की शिकार बनने जा रही थी, शिकार क्या, खुद अपनी मर्जी से जानबूझकर अपनी अदम्य कामेच्छा के वशीभूत उसके सामने समर्पण करने जा रही थी, यह सोचकर ही खुद पर बड़ी लज्जा आ रही थी लेकिन वासना की आग के आगे भला किसी की कभी चली है? नहीं ना? फिर मैं भला कैसे अपवाद रह सकती थी? फिर भी एक लड़की हो कर अपनी तरफ से कैसे पहल कर सकती थी। देखती हूं वह आगे क्या क्या करता है? करेगा क्या, चोदेगा ही ना? चुदने के लिए तो मेरे कदम मुझे यहां तक खींच लाए हैं। बस एक नारी सुलभ स्वभाव के चलते मेरा एक हाथ अपनी चूचियों को ढंकने की असफल कोशिश कर रहा था और दूसरा हाथ मेरी चूत को ढंकने की कोशिश कर रहा था। मैं नज़रें झुकाए खड़ी थी लेकिन झुकी नज़रों से भी चोरी चोरी उसके बलिश्त भर लंड का दर्शन करने का लोभ संवरन नहीं कर पा रही थी। इस्स क्या जबरदस्त लंड था उसका। काला, मोटा सांप जैसा फुंफकार मारता लंड मेरे दिल की धड़कन को और बढ़ा रहा था। लंड के चारों तरफ काले सफेद लंबे-लंबे घुंघराले बाल उसके लंड की भयावहता को और बढ़ा रहे थे। उसके लंड के सुपाड़े के ऊपर का चमड़ा पलटा हुआ था इसलिए बड़ा सा गुलाबी सुपाड़ा चमचमा रहा था। वह घनश्याम या गंजू जैसे शरीर का मालिक तो नहीं था लेकिन उसकी सेहत सामान्य से अच्छी थी।
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Wao good one
Hamari रोजा
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(12-10-2024, 03:10 PM)Slave. Wrote: Wao good one
Hamari रोजा
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जी हां, चुदने की चाह मुझे उस पुराने प्रयोगशाला में खींच लाई थी और अब इस हालत में मुझे चोदने को बेताब उस नंगे भुजंगे रघु के सामने स्तब्ध खड़ी थी।
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"ई का। अब जो काम के लिए हम इहां हैं उसमें ई सब करने का क्या जरूरत। ई बेकार ढंका ढंकी का डरामा काहे। अऊर इस तरह चोरी चोरी लौड़ा देखने का क्या जरूरत। ले पकड़ कर देख ना।" कहकर उसने मेरा हाथ पकड़ कर मेरी छाती पर से हटा दिया और अपने फनफनाते लंड पर रख दिया। उफ भगवान, कितना सख्त और गरम था। लंबा तो था ही और मोटा तो इतना कि मेरी मुट्ठी में भी नहीं समा रहा था। मैं अपना हाथ उसके लन्ड से हटाना चाह रही थी लेकिन किसी अज्ञात शक्ति के कारण मानो मेरा हाथ उसके लंड पर चिपक कर रह गया था। मैं सर से पांव तक गनगना उठी। मेरा ध्यान अब अपनी चूचियों को ढंकने की बजाय उसके लंड पर था। ऐसा शानदार लंड भला किसी आदमी का कैसे हो सकता है? भगवान भी कभी कभी कैसे कैसे खेल खेलता है। ऐसा लग रहा था मानो किसी गधे का लंड उस रघु की किस्मत में था। हे भगवान, इसी अमानवीय लंड से यह रघु का बच्चा मुझे चोदने की फिराक में था। उफ उफ। सोच कर ही मेरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई।
"आआआआआआह कितना बढ़िया लग रहा है मेरे लंड पर तुम्हारा हाथ। बहुत बढ़िया, अब जरा अपने हाथ से मेरे लौड़े के ऊपर के चमड़े को आगे पीछे करो ना फिर देखो कितना मज़ा आता है।" उसके कहने की देर थी कि मेरा हाथ अपने आप हरकत में आ गया। उस वक्त ऐसा लग रहा था जैसे उसने मुझ पर पूरा नियंत्रण कर लिया था और मैं यंत्रवत उसकी आज्ञा का पालन कर रही थी। मेरे सोचने समझने की शक्ति मानो कहीं हवा हो गई थी। इसी दौरान उसने मेरी चूचियों को सहलाना और मसलना आरंभ कर दिया था।
"बाआआआप रेएएएएए बाआआआआप, इत्तन्ना सख्त और बड़ा बड़ा चूची, गजब का चूची पाई हो। मजा ही आ गया।" वह मेरी चूचियों को दबाते हुए बोला। मेरी नग्न चूचियों पर उसके हाथों के स्पर्श से मेरा पूरा शरीर सनसना उठा था। मेरे सारे शरीर में मानो हजारों चींटियां रेंगने लगीं थीं।
"आआआआआआह ओओओओओहहहहह शैतान... " मैं आहें निकालने को बाध्य हो गई। इतने से ही बस नहीं हुआ उसका। दूसरे हाथ से वह मेरे उस हाथ को हटाने लगा जिससे मैंने अपनी चूत ढंक रखी थी। मैं चाह कर भी विरोध नहीं कर पा रही थी। मेरा हाथ बिना किसी खास विरोध के अपनी जगह से हट गया और उसका स्थान रघु के दूसरे हाथ ने ले लिया।
"अरे राम राम। कित्तन्ना बड़ा बुर है तुम्हारा। साला पूरा मालपुआ जईसा। और और ई क्या , तुम्हारा बुर तो पानी पानी हो गया। इतना जल्दी पानी तो आज तक किसी लौंडिया का नहीं निकला था। मान गया तुमको। आज सच्ची में चोदने का मजा आ जाएगा। इत्ती कम उमर में इत्ती बड़ी बड़ी चूचियां और इत्ता बड़ा बुर।" इतना कहकर सहलाते सहलाते उसने एक उंगली कच्च से मेरी चूत में घुसेड़ दिया।
"उईईईईईईई मांआंआंआंआंआं... ।" मैं तड़प उठी। मैं उसके सामने से हटना चाहती थी लेकिन वह आगे बढ़ता चला गया और मुझे ठेलता हुआ एक टेबल तक ले गया। यह मुझे पता चला जब मेरे चूतड़ों पर टेबल का स्पर्श हुआ। अब भी वह मुझे ठेल ही रहा था, नतीजा यह हुआ कि मैं उस टेबल पर पीठ के बल गिर गई। गिर क्या गयी, एक तरह से उसने मुझे उस टेबल पर गिरा दिया था। अब मेरे शरीर का ऊपरी हिस्सा टेबल पर पीठ के बल पड़ा हुआ था और मेरे पैर टेबुल से नीचे झूल रहे थे। वह मेरी टांगों को फैला कर उनके बीच घुस कर मुझ पर झुक गया था। यह सबकुछ हो रहा था और मेरी ओर से कोई प्रतिरोध नहीं हो रहा था। ऐसा लग रहा था मानो मैं किसी सम्मोहन की गिरफ्त में थी। उसकी तो निकल पड़ी थी। वह बड़े आराम से मुझ पर झुक कर मेरी चूचियों सूंघने लगा।
"अर्रे ई तो पूरा पका हुआ संतरा है। जरा चूस कर इसका स्वाद देखते हैं।" इतना कहकर वह मेरी एक चूची पर मुंह लगा दिया।
"उईईईईईईई मांआंआंआंआं....." मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे अंदर के सितार के तारों को झंकृत कर दिया हो। मुंह लगाकर कर उसने तो बकायदा चूसना आरंभ कर दिया। सितार के तार झनझनाने लगे।
"आआआआआआह इस्स्स्स्स् नननननहींहींहीईंईंईंईं....." मेरी सिसकारियां निकलने लगीं थीं। मैं उस टेबल पर जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी और वह मुझ पर पूरी तरह हावी हुआ जा रहा था। तभी मेरी चूत पर कठोर खंभे की दस्तक हुई। मैं समझ गई कि अब उसके लंड का हमला होने वाला है लेकिन वह भी एक नंबर का खेला खाया चुदक्कड़ था। उसने धीरे धीरे मेरी चूत पर अपना लंड रगड़ना आरंभ किया। इस क्रिया के द्वारा वह मुझे इतना उत्तेजित कर चुका था कि किसी भी पल मेरे मुंह से खुला निमंत्रण निकल सकता था। ऐसा लग रहा था जैसे वह मेरे मुंह से ही बुलवाना चाह रहा था कि अब बहुत हुआ, अब चोद भी डाल। यही हुआ भी।
"आआआआआआह ओओओओओहहहहह अब बस करो ना... ‌" में मचलते हुए बुदबुदा उठी।
"न न न न हम तो बस यही करेंगे।" वह जालिम तो मुझे तडपा कर मार ही डालने के फिराक में था शायद। यह मेरे सब्र की इंतहा थी।
"यही करने के लिए यहां लाए हो?" मैं झल्ला उठी।
"तो अऊर का करने के लिए?"
"साले हरामी अब यह खेल बंद करके जो करने को लाए हो करते काहे नहीं हराम के......।" आखिर में मेरे सब्र का पैमाना छलक ही उठा और मैं गुस्से और उत्तेजना के अतिरेक में फट पड़ी। मेरे मुंह से इतना खुला आमंत्रण सुनकर उसकी खुशी का पारावार न था।"बस एही सुनना चाहते थे हम। तुम कॉलेज की लड़कियों का एही डरामा देख देख कर पक चुके हैं। शुरू में ना नुकुर अऊर फिर लौड़ा लेने के लिए मरी जाती हैं। अब देख ई रघु का धमाल।" कहकर उसने लंड रगड़ना छोड़ कर लंड को चूत के प्रवेश द्वार पर रखा और एक ही जोरदार धक्के से मेरी चूत का मुंह फाड़ते हुए अपना मूसल घुसेड़ दिया।
"आआआआआआह मां के.. ‌‌.. ‌ऐसाआआआआ... न कर बेदर्दी?" मैं चीख पड़ी।
"अईसा नहीं तो कईसा? एही मेरा इस्टाईल है।" कहकर उसने मेरी जांघों को पकड़ कर अपनी ओर खींचा और घपाक, एक जोरदार धक्के से पूरा लंड मेरी चूत में घुसेड़ दिया।
"आआआआआआह मांआंआंआंआं ओओओओहहहह....." मैं उस दूसरे धक्के से फिर चीख उठी। उसकी मनोदशा का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था। इतने दिनों के इंतजार का फल जो मिल रहा था। पूरी कसर निकाले बिना थोड़ी न मानने वाला था। अब मैं पूरी तरह उसके चंगुल में थी जिसका पूरा फायदा उठाए बिना छोड़ने वाला नहीं था। जोश जोश में मानो वह होश खो बैठा था उसी का परिणाम यह करारा प्रहार था।
"अब चिल्ला मत बुरचोदी, चुदवाने आई है कि मां चुदाने आई है, खाली चिल्ल पों मचा रही है। देखने में इत्ता बड़ा बुर मगर इत्ता टाईट होगा हमको का पता था। इत्ता टाईट बुर तो आज तक चोदा नहीं। अब तो हो गया ना? अब काहे मां मां कर रही है हरामजादी।" वह अब मेरे लिए सारा आदर सम्मान छोड़कर भाषा की मर्यादा लांघ चुका था।
"दर्द हो रहा है आआआआआआह..." मैं बोली।
"हां हां, दर्द तो होगा। पहिले पहल सबको हमारा लौड़ा से दर्द होता है, लेकिन बाद में सब बोलती हैं, चोदो चोदो। चुदने के लिए खुद ब खुद दौड़ी चली आती हैं साली रंडियां।" वह अपने लंड पर घमंड करता हुआ बोला। उस बेचारे को क्या पता कि मैं घनश्याम, घुसा और गंजू जैसे बड़े बड़े लंड वालों से चुद चुकी हूं। यह तो मात्र नाटक था जिससे रघु का उत्साह बढ़े। हां थोड़ा दर्द तो अवश्य हुआ था क्योंकि इसका लंड लंबाई में जरूर थोड़ा कम था लेकिन मोटाई में उनसे कहीं ज्यादा था। लेकिन चुदाई का मजा लेना था तो ऐसे थोड़े बहुत दर्द को बर्दाश्त करने में नुकसान क्या था। वैसे भी अब जो होना था वह तो हो ही चुका था। उसने जीत का झंडा गाड़ दिया था। अब झूठ मूठ का मेरा चीखना चिल्लाना बेमानी था। वैसे भी अब मेरे अंदर चुदने का नशा तारी हो चुका था। मैंने अवश होकर अपने दोनों हाथों से उसे अपनी बांहों से कस कर पकड़ लिया और पैरों को हवा में उठा कर उसकी कमर में लपेट लिया। यह मेरी ओर पूरी तरह रजामंदी का सिग्नल था। इसके बाद तो रघु के अंदर जैसे दुगुने उत्साह का संचार हो गया। "ई हुआ न बात। अब देख रघु का चुदाई। साली बहुत दिनों से तरसाई हो। इस बीच साला चार पांच लड़कियों को ठोक लिया लेकिन फिर भी जब भी तुमको देखता तो ई मादरचोद मेरा लौड़ा टनटना जाता था। तुमको देखता तो झाड़ियों के पीछे जाकर मूठ मारता था। अब जाकर मिला है मऊका।" कहकर पूरे जोशो-खरोश के साथ चोदने में भिड़ गया। ओह ओह जबरदस्त तरीके से ठाप पर ठाप मारने लगा था वह। हर ठाप में अपने लंड की पूरी लंबाई का भरपूर इस्तेमाल कर रहा था। मैं अपनी चूत के मुंह से लेकर अंदर तक और उसके लंड के घर्षण का अभूतपूर्व आनंद लेने लगी थी।
"ओह ओह आह आह....इस्स इस्स इस्स" मेरी सिसकारियां निकलने लगी थीं।
"चप चप चप छप छप छप... " हर धक्के से निकलने वाले इन तालबद्ध आवाज से वह प्रयोगशाला गूंज रहा था और गूंज रही थी मेरी आनंदमई सिसकारियां। उन घक्कों के परिणामस्वरूप उस चिकने टेबल पर मैं पीछे की ओर खिसकती तो वह मेरी जांघों को पकड़ सामने घसीट घसीट कर चोद रहा था। इस चुदाई के दौरान वह कभी मेरी चूचियों को मसलता, कभी मेरी गान्ड के बंगलों पर थप्पड़ मारता और कभी गांड़ के नीचे हाथ लगा कर मसलता रहा। सबकुछ, जो वह कर रहा था, उन सबसे मुझे चुदाई का भरपूर आनंद प्राप्त हो रहा था। ओह उस सामान्य कद-काठी का आदमी इतना दम रखता है इसका अंदाजा मुझे अब हो रहा था। सात आठ मिनट में ही मैं खल्लास होने के कागार पर आ गई।
"आआआआआआह आआआआआआह आआआआआआह.. ... " मैं आहें भरते हुए उसके जिस्म से चिपक गई और आंखें बंद कर उस मधुर स्खलन का आनंद लेने लगी। मेरा शरीर मानो हवा में उड़ रहा था। वह भी खेला खाया चुदक्कड़ था। मेरी स्थिति से अनभिज्ञ नहीं था। कुछ पल मुझे चिपका कर स्थिर हो गया। वह ठीक से जानता था कि मुझे फिर से गरम करके कैसे अपनी मंजिल तक पहुंचा जा सकता है। आखिर न जाने इस कॉलेज में कितनी लड़कियों को इस लैब में ला कर राजू जैसे लफंगों के साथ मजा किया होगा।
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जैसे ही पूरी तरह खलास होकर उसपर से मेरी पकड़ ढीली हुई, वह मुझे छोड़कर उछला और टेबल पर चढ़ गया और मुझे घसीट कर उस बड़े से टेबल के बीचोंबीच ले आया। अब वह टेबल हमारे लिए एक तख्तपोश की तरह था जिसपर मैं पूरी तरह पसरी हुई थी। अब मेरे पैर हवा में नहीं बल्कि टेबल पर ही पूरी तरह आ गये थे। हे भगवान, अब यह क्या करने वाला था? मेरे सवाल का जवाब तुरंत ही मिल गया। वह मेरे पेट के दोनों ओर घुटनों के बल आ गया और मेरी बड़ी बड़ी चूचियां को अपने हाथों से आपस में सटा लिया। अब वह मेरी चूत रस से सना हुआ खंभा मेरी उन्नत चूचियों की घाटी पर रखा।
"यह कककक्या कर रहे हो... ‌" मैं जानबूझकर अनजान बनते हुए चौंक कर बोली।
"तुम्हारा इत्ता बड़ा बड़ा तरबूजों और गांड़ को देखकर ही तो हम तुमको चोदने के लिए मरे जा रहे थे। अब जब मऊका मिला है तो काहे नहीं तुम्हारे तरबूजों के बीच की घाटी का भी मजा लिया जाय।" कहकर वह मेरी चूचियों को दबोच कर उनके बीच अपना लंड घुसेड़ कर आगे पीछे करने लगा। यह बड़ा उत्तेजक कृत्य था। मेरी चूत की चिकनाई से लिथड़ा उसका लंड सर्र सर्र मेरी चूचियों के बीच फिसलता हुआ आगे पीछे होने लगा था।
"इसको कहते हैं चूची चुदाई। साला अईसा मस्त चूची को चोदना, हमारा किस्मत में लिखा हुआ था। तुम्हारी चूत तो चूत, साली चूची भी कमाल है। आह आह आह आह.. ‌..." वह ऐसा ही कुछ का कुछ बोल रहा था और चूचियों के बीच लंड घसे जा रहा था। यह बड़ा ही उत्तेजक कृत्य था। बस चार पांच मिनट में ही मैं पुनः गरम हो गई और अपनी उत्तेजना का इजहार अपनी चूतड़ टेबल पर पटकते हुए करने लगी। इस संकेत को भी समझने में उससे कोई ग़लती नही हुई।
"फिर से तईय्यार?" वह मुझसे पूछ रहा था या पूछने की औपचारिकता पूरी कर रहा था क्योंकि अभी मेरी चूत की कुटाई में उसके द्वारा अभी भी काफी कसर बाकी थी, वह पुनः मेरी चूत में डुबकी लगाने का यह अवसर कैसे जाया होने देता।
"अब भी पूछ रहे हो सूअर की औलाद? कर ना... ‌" मैं बदहवासी के आलम में बोली। इस आमंत्रण की जरूरत भी नहीं थी फिर भी वह जहां औपचारिकता निभा रहा था तो मैं भी औपचारिकता निभा बैठी थी। इस वक्त मैं पूरी तरह टेबल पर थी और वह फिर से मुझ पर सवारी गांठने हेतु मेरे पैरों को फैलाकर बीच में घुस गया। इस वक्त मैं पूर्ण समर्पण की मुद्रा में थी। बिना विलंब, उसका हथियार फिर से सट्टाक से मेरी चूत के अंदर आ घुसा। मेरे पैर अपने आप हवा में उठ गये जिन्हें थामकर वह अपने कंधों पर चढ़ा लिया और फिर जो धक्कमपेल का दौर चला वह पहले से अधिक भीषण था। वह भी पूरे जोश में और मैं भी पूरे जोश में एक दूसरे में समा जाने की जद्दोजहद करने लगे। मैं उसकी स्तंभन क्षमता की कायल हो गयी। यह घमासान करीब दस मिनट तक और चला तब जाकर हम दोनों करीब करीब एक साथ चरमोत्कर्ष तक पहुंचे। कुल मिलाकर कहूं तो वह पूरे तीस मिनट तक संभोग में लिप्त रहा और तब जाकर उसके लंड का ज्वालामुखी फटा और ओह मां क्या ज्वालामुखी फटा था रे बाआआआप, गरमागरम वीर्य का लावा निकल कर मेरे गर्भ को सराबोर करने लगा। यह एक सुखद संयोग ही था कि ठीक उसी वक्त मैं भी स्खलन के सुखद दौर से गुजरने लगी।
"ऊऊऊऊऊऊ मांआंआंआंआं गयी मैं गयीईईईईईईई....." मैं आनंद के सागर में गोते खाते हुए उसके शरीर से चिपक गई। करीब दो मिनट तक एक दूसरे को कस कर दबोचे हुए स्खलन का मजा लेते रहे फिर उसका लंड फुच्च से मेरी चूत से बाहर निकल आया। हम दोनों निढाल होकर हांफने लगे।
"आआआआआआह मजा आ गया। तू सचमुच जित्ती दिखाई देती है उससे कहीं ज्यादा सेक्सी है। सच्ची कहें तो अब्भिए दू तीन बार अऊर तुझ पर आराम से चढ़ाई किया जा सकता है।" वह ऐसे बोला जैसे अभी ही दो तीन बार और चोदने की तमन्ना है। मैं घबरा गई। हे भगवान, यह आदमी है कि चोदने की मशीन।
"क क क क्या मतलब है तुम्हारा?" मैं घबराकर बोली। एक ही चुदाई में मुझे दो बार झाड़ दिया था अब इसी वक्त पुनः चोदने की बात कर रहा था। मेरा हाथ अनायास ही उसके लंड पर पड़ा तो वह भीगे चूहे की तरह सिकुड़ चुका था। समझ गई कि वह यों ही बकवास किए जा रहा था।
"हम सच्ची कह रहे हैं। तुम अभी तो कॉलेज की छुट्टी होने तक रहोगी ही। काहे नहीं दो तीन बार अऊर हो जाए।" वह मुझे लालची नजरों से घूरते हुए बोला।
"हट हरामी। अपना पपलू तो देखो, भीगा चूहा बन कर सिकुड़ गया है, बात करता है। वैसे भी तू ने मुझे इतना निचोड़ा है कि अब मुझमें और ताकत नहीं है झेलने की। मेरा तो हो गया।" मैं उस घमासान चुदाई से पूरी तरह संतुष्ट हो गई थी। मैं उस सुखद चुदाई के रस से सराबोर थी और सच बोलूं तो थक भी गयी थी। कुछ देर मुझे संभलने में समय लगने वाला था। मेरे पैर भी थक चुके थे। घनश्याम ने तो जो किया था किया था, रही सही कसर इस रघु के बच्चे ने पूरी कर दी। मेरी चूत का तो मानो कचूमर निकाल दिया था गधे ने। जैसे जैसे चुदाई का नशा उतर रहा था वैसे वैसे मुझे अपनी चूत में हल्की हल्की मीठी जलन का अनुभव होने लगा था। हां अब धीरे-धीरे यह भी महसूस होने लगा कि उस दौरान किस बुरी तरह मेरी चूचियों को भी निचोड़ा गया था। मैं कुछ देर उसी टेबल पर पसर कर लेटे रहना चाहती थी।
"तो अब?" वह प्रश्नसूचक दृष्टि से मुझे देखते हुए बोला।
"अब मुझे थोड़ा शांति से आराम करने दो।" मैं अलसाई सी उसी नंग धड़ंग अवस्था में लेटी लेटी आंखें बंद करते हुए बोली।
"आराम करेगी? अरे अब्भी तो एक ही दौर चला है। बस अब्भिए आराम चाहिए? अब्भी हमारा मन कहां भरा है अऊर तुम कईसे बोल रही है कि तुझमें अऊर ताकत नहीं बचा है? इत्तन्ना जल्दी तुम्हारा मन नहीं भर सकता है। इत्ती दमदार लौंडिया का इत्ता जल्दी कईसे हो गया। झूठ बोल रही हो ना?" वह बोला।
"मैं सच कह रही हूं। मेरा हो गया।" मुझे उसकी बातों से डर लगने लगा था। इतनी जल्दी यह दुबारा चोदने की कैसे सोच सकता था। इतनी जल्दी जल्दी चुदाई का दौर जारी रखेगा तो मैं तो मर ही जाऊंगी।
"झूठ। सरासर झूठ। हमारा पसंद नहीं आया तो बात अऊर है।" वह बोला।
"नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है। तुम तो बड़े जबरदस्त हो।" मैं बोली। यह मेरी ईमानदारी से भरी स्वीकारोक्ति थी।
"जबरदस्त हैं तो फिर का प्रोब्बलेम है। एक अऊर हो जाए। मां कसम, जिंदगी भर याद रखोगी कि किसी असली मरद से पाला पड़ा है। जितनी लड़कियों को हम चोदे हैं, ऊ सबके सब मां की लौड़ियां जब तब हमसे चुदवाने चली आती हैं। हमारा बात मान जाओ पिलीज।" वह अनुनय विनय की मुद्रा में मुझसे बोला और मैं द्रवित हो उठी।
"ठीक है। चलो मान लेती हूं लेकिन यह तुम्हारे सिकुड़े हुए चूहे से होगा क्या? अगर अगले दो मिनट में खड़ा नहीं हुआ तो दुबारा करने के बारे में भूल जाओ।" मैं जानती थी कि अब वह इस शर्त में हार मान कर मुझे दुबारा चोदने का ख्याल मन से निकाल देगा। लेकिन मैं गलत थी।
"ठीक है। तुम पीछे मत हट जाना।" वह बोला तो मैं उसके आत्मविश्वास से चकित हो गयी और भयभीत भी। अगर सचमुच ऐसा हुआ तो मेरी दुर्गति तय थी। पहली चुदाई में ही उसने मेरा कस बल निकाल दिया था। फिर भी मुझे विश्वास था कि ऐसा होना संभव नहीं है।
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"ठीक है। मैं अपनी बात से पीछे नहीं हटूंगी।" मैं बोली लेकिन अंदर ही अंदर मना रही थी कि ऐसा न हो।
"अच्छा, रुको, हमको पेशाब करके आने दो। बस अब्भिए दो मिनट में आया।" कहकर वह प्रयोगशाला के बगल में पुराने टॉयलेट की ओर मुड़ा तो मैं ने आंखें बंद कर ली। वह गया और दो मिनट में ही फिर वापस आ भी गया।
"लो हम आ गए।" उसकी आवाज सुनकर मैंने आंखें खोली तो उसे देख कर मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं। मैं आश्चर्यचकित थी कि मात्र दो मिनट में ऐसा क्या हो गया कि जैसे उसका कायाकल्प हो चुका था। बिल्कुल तरोताजा। उसे देख कर मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि दो मिनट पहले मुझे चोदकर हटा था। उसके शरीर में जैसे नवस्फूर्ति का संचार हो रहा था। वह मेरी ओर बढ़ रहा था तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था यह देखकर कि उसका लंड पहले की अपेक्षा कुछ अधिक ही बड़ा हो चुका था और भयानक अंदाज में फुंफकार मार रहा था। उसकी आंखों में एक अजीब सी भूख दिखाई दे रही थी मुझे। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि एक बार मेरे शरीर का भोग लगा चुकने के बाद भी वह ऐसे देख रहा था जैसे पहली बार मुझ जैसी लड़की को देख रहा था। उसकी आंखों में वही पहले वाली चमक दिखाई दे रही थी। हे भगवान यह मैं किस मुसीबत में फंस गयी थी। अब अपनी बात से पीछे हटने का सवाल ही पैदा नहीं हो सकता था। अपनी शर्त में ही मैं फंस कर इस मुसीबत को बुलावा दे बैठी थी।
"सच्ची, तू बिल्कुल हूर की परी है।" उसकी लार टपकाती नजरें सर से पांव तक मुझे देखे जा रही थीं। उसकी आवाज भी कुछ बदली बदली सी थी। मुझे बड़ा अजीब महसूस हो रहा था। ऐसा क्या हुआ था कि पेशाब करने के दौरान दो मिनट में ही चमत्कारिक ढंग से पुनः इतना तरोताजा हो गया था। उसका लंड भी भयावह रूप से पहले की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही लंबा और मोटा दिखाई दे रहा था।
"पहली बार देख रहे हो क्या? अभी ही किया था ना।" मैं उसके रंग ढंग से कुछ आतंकित महसूस कर रही थी। एक अनजानी सी घबराहट हो रही थी कि यह आदमी है कि जिन्न।
"बस्स ई समझ लो पहलीए बार देख रहे हैं। तू इत्ती मस्त माल है कि जित्ता चोदो साला मन ही नहीं भरता है। लग रहा है पहली बार चोदने जा रहे हैं। चल दे दे फिर से एक बार।" वह मेरे पास आकर मेरी चूचियों को हाथ से महसूस करने लगा। अनिच्छा के बावजूद अपनी शर्त से वचन से बंध कर उसे दुबारा झेलना था। मेरी चुदाई तो बड़ी अच्छी तरह से हुई थी, इतनी अच्छी तरह से कि मैं तृप्त हो गई थी। लेकिन मेरी हालत इस वक्त ऐसी थी जैसे बहुत स्वादिष्ट खाना खाकर पेट पूरी तरह भरा हुआ हो और मेहमान नवाजी करने वाले के हाथों लजीज व्यंजन देखकर भी ठुकराने को मजबूर हूं।
"न न न नहीं, अब मुझसे और नहीं होगा प्लीज़।" मैं उठते हुए बोली।
"होगा होगा। तुम ही से होगा। तुमसे न होगा तो किसी मां की लौड़ी से नहीं होगा।" वह मुझे फिर से ढकेल कर टेबल पर सुलाने की कोशिश करने लगा।
"नहीं नहीं।" मैं जिद करने लगी और उसे पीछे ढकेल कर टेबल से उतर कर अपने कपड़े ढूंढ़ने लगी लेकिन मेरे कपड़े वहां से गायब थे।
"मेरे कपड़े कहां गए?" मैं घबराकर बोली।
"अर्रे कपड़े की चिंता काहे कर रही हो? कपड़ा कहां भागा जा रहा है? वईसे भी ई बखत कऊन सा कपड़ा का जरूरत है? एक बार घपर घपर हो जाए, फिर कपड़ा भी मिल जाएगा।" वह बोला और फिर से मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया और बेहताशा चूमने लगा।
"ओह ओह ऐसे पागल क्यों हुए जा रहे हो? जब करना ही है तो आराम से करो ना।" मैं विरोध करना बेकार समझ कर अपने आप को उसके हवाले करते हुए बोली। मुझे उसकी इतनी बेकरारी देख कर ताज्जुब हो रहा था। एक बार कर चुका था लेकिन अब दुबारा करने के समय भी वही बेकरारी देखना मुझे विस्मित कर रहा था। इतनी अदम्य काम पिपासा मैं पहली बार देख रही थी।
"इतनी मस्त माल बांहों में हो तो कऊन माधरचोद से सबर होगा।" वह खड़े खड़े ही मेरे चूतड़ों को मसलते हुए मुझे दबोच कर पागलों की तरह ताबड़तोड़ कभी मेरे गालों को चूमता , कभी मेरे होंठों को चूमता, कभी मेरे गले को चूमता जा रहा था। इधर बीच बीच में उसका लंड मेरी चूत के आसपास स्पर्श कर रहा था। न चाहते हुए भी मेरे अंदर फिर से कामाग्नि सुलगने लगी थी। उफ उफ, मैं उसकी इस नयी आक्रामक अंदाज से तनिक घबरा गई थी। धीरे धीरे वह और भी आक्रामकता दिखाने लगा था। सहसा उसने मुझे उठा कर टेबल पर बैठा दिया और मेरी टांगों को फैला कर बीच में घुस गया। अब वह मेरी चूचियों पर टूट पड़ा।
"गज्जब, ओह क्या चूचियां हैं। साली इसी उमर में इत्ती बड़ी बड़ी चूचियां? हम तुम्हारे साथ का करें समझ ही नहीं आ रहा है। तेरी इन तरबूजों को खाएं कि तेरे नीचे वाले मालपूए को खाएं।" वह मेरी चूचियों को बेरहमी से दबाते हुए बोला।
"उईईईईईईई मांआंआंआंआं, अभी अभी इतना सबकुछ करके भी तुम्हारे अंदर इतनी भूख?" मैं पीड़ा का अनुभव करती हुई बोली। अबतक मेरे अंदर फिर से कामुकता की आग भड़कने लग गई थी इसलिए उसका यह सब करना मुझे अच्छा लगने लगा था।
"आह आह तुझ जैसी रसीली लौंडिया हाथ लग जाए तो भूख भला कईसे मिटे। खाते खाते मर जाएं तब भी कोई दुख नहीं होगा।" वह अब मेरे चूचियों को बारी बारी से मुंह में भर भर कर चूसने लगा।
"इस्स्स्स्स्ह उईईईईईईई आआआआआआह, ....." मैं जोश में भर कर खुद ही अपने हाथों से उसका सर अपनी चूंचियों पर दबाने लगी थी। उत्तेजना के मारे मेरा बुरा हाल हो रहा था। एक निम्नस्तर का यह घटिया चौकीदार मेरा यह हाल कर देगा, यह मेरी सोच से परे था। मैं जल बिन मछली की भांति छटपटाने लगी थी। मेरी चूचियों को चूसने से ही उसका मन नहीं भरा तो वह नीचे की ओर मुंह ले जाने लगा। हे भगवान वह क्या करना चाह रहा था? मेरे पेट से होता हुआ वह मेरी नाभि तक मुंह ले गया। वह मेरी चूचियों को दबाता रहा और चाटते चाटते वह नाभी से नीचे जाने लगा। ऊऊऊऊऊ मेरे राआआआआआम, मैं चौंक ही तो पड़ी जब उसका मुंह मेरी चूत तक जा पहुंचा। जैसे ही उसकी जीभ का स्पर्श मेरी चूत पर हुआ,
"इस्स्स्स्स् आआआआआआह ...... नननननहींहींहीईंईंईंईं हाआआआआय.....वहां नहीं वहां नहींईंईंईंईंई......" मैं सिसक पड़ी और आनंदातिरेक से मेरी आंखें बंद हो गयीं। मैंने अपनी जांघों को और फैला कर अपने हाथों से उसके सर को कस कर पकड़ लिया। उसने अबतक मेरी चूचियों को दबाना बंद नहीं किया था और इधर मेरी चूत का रसास्वादन कर रहा था। ओओओओओहहहहह यह कितना सुखद था बता नहीं सकती हूं। मैं उसके सिर को अपनी चूत पर दबा रही थी और सिसकारियां निकाल रही थी। "बस्स्स्स्स् बस्स्स्स्स् ....." मैं उसके सिर को जबरदस्ती हटाने लगी क्योंकि यह मेरी उत्तेजना का चरमोत्कर्ष था। इसके आगे मेरी लुटिया डूब जाती।बंटाधार हो जाता। उत्तेजना के अतिरेक में मेरा शरीर अकड़ने लगा था और मैं स्खलित हो जाती, फिर चुदाई का मजा लेने के लिए तैयार होने में न जाने और कितना समय लगता।
"ओह समझ गया। लोहा गरम हो गया है। अब हथौड़ा चलाने का बखत आ गया।" कहकर वह मेरी चूत चाटना बंद करके एक झटके में मुझे टेबल पर पटक दिया और मुझपर चढ़ गया। उसके जिस मूसलाकार लंड को देखकर मेरी घिग्घी बंध गई थी, अब मैं उस लंड को अपनी चूत में लेने को बेकरार थी।
"तईय्यार हो?" वह अपना लंड मेरी चूत के मुंह पर रखकर बोला।
"आग लगी है आग। साला पूछता है तैयार हो मां का लौड़ा, चोओओओओद हरामी" मैं पागलों की तरह चीख पड़ी। उत्तेजना के अतिरेक में मेरे मुंह से ऐसी बात सुनकर एक बार तो वह भी अचंभित रह गया। मुझ जैसी इतनी कम उम्र की लड़की के मुंह से ऐसा सुनने की उम्मीद शायद उसे नहीं थी।
"बहूत बढ़िया। ईईईई ल्ल्लेएएएए हमारा लौड़ा हुम्म्म्म आआआआआआह..." उसने अपने लंड पर दबाव देना आरंभ कर दिया। मेरी चूत का मुंह खुलता चला गया और उसके मोटे लंड की तुलना में मेरी चूत की तंग गुफा फैलती चली गई और उसका लंड कचकचा कर घुसता चला गया।
"अईईईईईईईईई...... आआआआआहहह मां आंआंआंआं...." मैं चीखी। चूत को चीरता हुआ उसका मोटा लंड आधा घुस चुका था। मेरी चीख सुनकर वह थोड़ा रुका। करीब करीब साढ़े आठ इंच लंबा लंड और वह भी उतना मोटा, आधा घुस जाना भी इसलिए संभव हुआ था कि कुछ मिनट पहले ही चुदाई का एक दौर चल चुका था। यह सचमुच दर्दनाक था। मैं उत्तेजना के आवेग में भूल ही गयी थी कि उसका लंड पहले की अपेक्षा कुछ अधिक ही मोटा हो गया था। न सिर्फ मोटा, बल्कि लंबा भी कुछ अधिक ही हो गया था।
"चुप साली रंडी। अब्भिए ना थोड़ा देरी पहिले लौड़ा खाई थी। फिर काहे ऐसे चिल्ला रही है जईसे फट रही है हरामजादी।" वह मेरी चूतड़ पर थप्पड़ मारकर बोला।
"बहुत मोटा है।" मैं पीड़ा से कराहती हुई बोली।
"साली बुरचोदी अब्भी मोटा है बोलती है? दो सेकंड पहिले बोल रही थी चोद अऊर अब चोद रहे हैं तो फट रही है साली कुतिया?" गुस्से से बोला।
"दर्द हो रहा है तो नहीं बोलूंगी क्या?" दर्द से हलकान होती हुई बोली मैं। उसकी बात सुनकर तो उस समय और दुखी हो गयी। एक घटिया सा आदमी मुझसे इस तरह बात कर रहा था जैसे मैं सचमुच की उसके पैसे के लिए बिकने वाली कोई सस्ती किस्म की रंडी हूं। मुझे अपनी दशा पर बड़ी कोफ्त हो रही थी।
"अब दर्द दर्द बोलने का का फायदा। अब तो घुस ही गया। थोड़ा अऊर बर्दाश्त कर लो, फिर देखो मेरा लंड का मजा। खुद ही बोलोगी चोदो चोदो।" वह बोला और फिर अपने लंड पर दबाव बढ़ाने लगा। उफ उफ, कम से कम ढाई इंच मोटा लंड मेरी चूत के अंदर घुसा जा रहा था और मैं दर्द से छटपटा रही थी। मेरी हालत उससे छिपी नहीं थी इसलिए वह अपनी गिरफ्त को और सख्त कर चुका था ताकि उसका पूरा लंड मेरी चूत में दाखिल हो जाए। जबतक उसका पूरा लंड मेरी चूत में समा नहीं गया था तबतक वह अपनी गिरफ्त को ढीला नहीं पड़ने दिया था।
"आआआआआआह मर गई मर गयी ....." मैं बेबसी में यही बोलती जा रही थी। उसका करीब साढ़े आठ इंच लंबा लंड मेरी चूत में जड़ तक समा चुका था। उस उम्र में मुझे पता ही नहीं था कि उतना लंबा लंड मेरे अंदर कहां तक घुस चुका था। मेरे अंदर कुछ अजीब तरह अनुभव हो रहा था। अब पता है मुझे कि उस समय निश्चित तौर पर मेरी कोख में दस्तक दे रहा था। वह तो अपनी जीत का झंडा गाड़ चुका था लेकिन मेरी क्या हालत हो रही थी, वह सिर्फ मैं जानती थी। उसे तो जो चाहिए था मिल चुका था और वह विजयी मुस्कान के साथ मेरी आंखों में झांक रहा था। अब उसके लिए विजय का जश्न मनाने का समय था। तभी मैंने ठान लिया कि जो होना था वह तो हो ही चुका था तो अब अपनी पीड़ा दिखा कर उसके सामने खुद को पीड़िता क्यों साबित करूं। इतना तो मुझे पता ही था कि इस तात्कालिक आरंभिक पीड़ा का दौर कुछ ही मिनटों का था, इसके बाद चुदाई के सुखद आनंद से रूबरू होना ही था। वही हुआ भी।
"मरें तेरे दुश्मन। मां की लौड़ी पूरा लौड़ा तो गटक गई।" कहकर अब वह धीरे धीरे लंड बाहर निकालने लगा। करीब आधा से अधिक बाहर निकाल चुका था। उस समय उत्पन्न घर्षण से मेरी संकीर्ण यौन गुहा की संवेदनशील दीवारों में अद्भुत तरंगें पैदा हो रही थीं जिसके कारण मेरी धमनियों में रक्त का संचार द्रुत गति से होने लगा, बस फिर क्या था, मेरे अंदर की भूखी बिल्ली जाग कर सक्रिय होने को तत्पर हो उठी।
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मैं ने अपने हाथों से उसकी नग्न देह को कस कर पकड़ लिया और बोल उठी, "निकालो मत निकालो मत, पूरा मत निकालो। आह आह, घुसेड़, फिर घुसेड़। ठोको ठोको आह आह...."। बोलते वक्त मेरी सारी शर्मोहया छूमंतर हो गई थी। कुछ ही मिनटों में मेरा भी कायाकल्प हो चुका था, ठीक उसी तरह, जिस तरह उसका कायाकल्प हुआ था। अब मोटा पतला लंड और लंबा छोटा लंड का मेरे लिए कोई अर्थ नहीं था, अब तो बस धमाधम चुदाई चाहिए थी मुझे। रगड़घस चुदाई चाहिए थी मुझे। अब चकित होने की बारी उसकी थी।
"ठीक सोचे थे तुम्हारे बारे में साली रंडी। अब आवेगा मज्जा।" कहकर पिल पड़ा मुझ पर और लगा पागलों की तरह मुझे दबोच कर चोदने। अपने लंड की पूरी लंबाई का इस्तेमाल नहीं कर रहा था वह। आधा लंड मेरी चूत में ही घुसा रहने दे रहा था और उसका बाकी का आधा लंड ही अंदर बाहर हो रहा था जिसके कारण उसके धक्कों की रफ्तार बढ़ाने में उसे आसानी हो रही थी जिसका भरपूर मजा मैं ले रही थी। मैं पूरी तरह सहयोग करने लगी थी। अपने पैरों को फैलाकर चूतड़ उछाल उछाल कर चुदी जा रही थी। मेरे इस अंदाज से वह निहाल हुआ जा रहा था। भचर भचर, फचर फचर की आवाज के साथ टेबल पर धमाधम की आवाज और हमारी सिसकारियां और आहें गूंजने लगी थीं। उसके व्यक्तित्व में जो परिवर्तन हुआ था उसके कारण पहली वाली चुदाई मैं भूल ही गयी थी। यह दूसरी वाली चुदाई तो और भी गजब का आनंद प्रदान कर रहा था। हम एक दूसरे से गुत्थमगुत्था हुए जा रहे थे और एक दूसरे में समा जाने की जद्दोजहद में लीन हो गये थे। यह घमासान धक्कमपेल बिना विराम के करीब पंद्रह मिनट तक निरंतर चलता ही रहा। गजब का दमखम था उसमें और गजब की स्तंभन क्षमता थी उसमें। अंततः पंद्रह मिनट की अथक चुदाई का समापन जब हुआ तो हम दोनों एक दूसरे से ऐसे चिपके मानो हमारे शरीर एकाकार हो गये थे। जहां मेरा स्खलन मात्र आधे मिनट का था वहीं उसका स्खलन करीब डेढ़ दो मिनट तक चलता रहा। अपने स्खलन में जैसे मेरे पर निकल आए थे लेकिन उसके स्खलन से तो मैं जैसे हवा में उड़ने लगी थी। अद्भुत, अविस्मरणीय, आकंठ सुख से ओतप्रोत वह स्खलन अवर्णनीय है। समय मानो ठहर सा गया था। उस वक्त उसकी पकड़ से मानों मेरी सांसें थम सी गयी थीं। मेरी चूत भी कम नहीं थी, साली कमीनी कुत्ती चूत उसके लंड से निकलने वाले कतरे कतरे को जज्ब करती हुई लंड निचोड़ कर ही छोड़ी। हम दोनों थक कर एक दूसरे की बांहों में समाए ऐसे हांफ रहे थे मानो मीलों दौड़ कर आए हों।
"गजब की लौंडिया है रे तू।" वह हांफते हुए बोला।
"और तू क्या कम गजब है, साला गधे लंड वाला चोदू कहीं का।" मैं उसके सीने पर सर रख कर बोली।
"मजा आया?"
"हां, बहुत।"
"इस भोली सूरत के पीछे इत्ती बड़ी लंडखोर छिपी है, ई बड़ा ताज्जुब का बात है। मुंह से तो लौड़ा चूसने वाली बहुत देखे हैं लेकिन चूत से लौड़ा चूसने वाली आज पहिली बार देक्खे हैं। साली पूरी घाघ है तू। भोली भाली घाघ। सच में तुमको चोद कर मन नहीं भरा। जी चाहता है चोदते रहें।" वह मेरी प्रशंसा के पुल बांध रहा था।
"तो चोदो ना।" मैं हल्के फुल्के मूड में बोली।
"फिर चुदेगी?"
"अभी?" मैं आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगी। मैं तो यूं ही बोल बैठी थी, इसने तो गंभीरता से ले लिया। यह आदमी है कि चोदने की मशीन?
"हां अब्भिए।"
"तेरा खड़ा होगा फिर से?'"
"पहिले खड़ा हुआ था ना दुबारा, दो मिनट में? भूल गयी क्या?" वह पूरे आत्मविश्वास से बोला। वह मुस्कुरा रहा था। यह मुस्कुराहट एक रहस्यमई मुस्कुराहट थी। कुछ तो था उस मुस्कान में जो मेरी समझ से परे था। खैर मुझे क्या। हां बोल चुकी थी। दुबारा चुदाई का मजा दुगुना था। क्या पता, तिबारा चुदाई का मजा तिगुना हो।
"तो फिर ठीक है।" अब मैं भी ठान चुकी थी कि अगर वह फिर से चोदने की क्षमता रखता हैं तो मैं भी दिखाती हूं कि मैं भी कम नहीं हूं। हालांकि दो बार की चुदाई से मेरे अंग अंग में थकान तारी हो गया था लेकिन मैं यह भी देख चुकी थी कि दुबारा चुदने से घबराना बेमानी था क्योंकि जब उत्तेजना मुझपर चढ़ी तो सारी थकान पता नहीं कहां छूमंतर हो गई थी। फिर जो मजा मिला उसका कोई सानी नहीं था।
"ठीक है, हम फिर से मूत के आते हैं।" कहकर सीधे टॉयलेट की ओर भाग कर अदृश्य हो गया। मैं उसी टेबल पर लस्त पस्त पसर गई। मुझे इस बात में कोई रुचि नहीं थी कि उठकर देखूं कि दो मिनट में वह क्या खाकर आता है या क्या करके आता है कि उसका कायाकल्प हो जाता है। मैंने कलाई घड़ी में देखा कि अभी कॉलेज का क्लास खत्म होने में एक घंटे का समय और है। इसका मतलब समय गुजारने के लिए चुदाई का एक और सेशन काफी था। इस तरह समय भी कट जाता, रघु की तीसरी बार चोदने की ख्वाहिश भी पूरी होती और मैं भी चुदाई के शायद तिगुने मजे से रूबरू होती।
"हम आ गये" आवाज सुनकर मैंने देखा कि बिल्कुल मेरे पास फिर से नंगा भुजंगा रघु आ खड़ा हुआ था। पहले की तरह तरोताजा, उर्जा से भरा हुआ दिखाई दे रहा था वह। उसकी आंखों में वही पहले वाली चमक थी। हां आवाज में थोड़ा परिवर्तन मैंने महसूस किया था लेकिन मैंने उस पर गौर करने की जरूरत महसूस नहीं की, मेरी नज़र तो सिर्फ उसके तने हुए लंड पर थी। काला, फुंफकार मारता हुआ लंड आकार में थोड़ा सा कम हुआ था लेकिन चोदने को बिल्कुल तैयार खड़ा था। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ कि पहली बार उसके लंड का आकार बिल्कुल ऐसा ही था लेकिन दूसरी बार पहले से बड़ा था, अब फिर से पहली बार वाले आकार में आ चुका था। यह कैसा विस्मयकारी परिवर्तन था। वही आदमी लेकिन लंड के आकार में परिवर्तन।
"तुम्हारा पप्पू कुछ देर पहले तो बड़ा था, अब छोटा कैसे?" मैं पूछ बैठी। मुझे कुछ अजीब सा लग रहा था।
"यह ऐसा ही है। साला जब मन होता है तो बड़ा हो जाता है अऊर जब मन होता है तो छोटा। ई मादरचोद का कुच्छो भरोसा नहीं।" वह अपने लंड को पकड़ कर हिलाते हुए बोला। मुझे उसकी बात पर विश्वास नहीं हो रहा था लेकिन अपनी खुली आंखों से देखी बात पर अविश्वास भी नहीं कर सकती थी।
"यह तुम्हारे कंट्रोल में नहीं है क्या?" मुझे यह अस्वाभाविक लग रहा था। यह शरीर के किसी अंग का सामान्य व्यवहार नहीं था। आखिर लिंग तो शरीर के अन्य अंगों की तरह उसके शरीर का ही एक अंग था, जिसका नियंत्रण मस्तिष्क से होता है, फिर वह ऐसा क्यों बोल रहा था जैसे उसका लिंग उसके शरीर से चिपका स्वतंत्र प्राणी हो।
"कंट्रोल का तो बात ही मत करो। ई मादरचोद अपने मन का मालिक है। हां एक बात है कि साला ठंढा होने में बहुत टाईम लगाता है।" वह गर्व से बोला।
"हां वह तो देख ही चुकी हूं। जो जल्दी ठंढा हो जाए वह डंडा किस काम का।" मैं बोली। बस उसके लिंग के आकार से थोड़ी मायूस हुई थी, क्योंकि अभी अभी बड़े आकार के लंड से जो चुदी थी।
"तो शुरू करें?" वह चोदने को उतावला हुआ जा रहा था।
"अब भी पूछने की जरूरत है?" मैं झल्ला कर बोली।
"पुच्छने का जरूरत नहीं है तो नहीं पुच्छेंगे लेकिन अबकी बार थोड़ा पोजीशन बद्दल कर चोदने का मन कर रहा है।"
"कौन सी पोजीशन में?" मैं बेमन से बोली। दरअसल अब मुझमें और किसी पोजीशन से कोई दिलचस्पी नहीं थी। मुझे बस चुदती हुई समय काटना था।
"तुमको पलट कर पीछे से। बनेगी ना हमारी कुतिया?" वह बोला। हे भगवान अब वह मुझे चौपाया बना कर चोदने की सोच रहा था।
"यह कौन सा तरीका है? मैं लड़की हूं, लड़की ही रहने दो। तुम्हें जो बनना है बनो।" मैं बोली। चौपाया बन कर चुदी थी, जानती थी कैसे एक मर्द औरत को कुतिया की तरह चोदता है। फिर भी इस वक्त पोजीशन बदल बदल कर चुदने की शक्ति मुझमें नहीं थी।
"वही तो कह रहे हैं। हम कऊन सा तुमको कुतिया बनने बोल रहे हैं, चोदेंगे तो हम ना? तुम बस हां बोलो, हम ही कुत्ता जैसा पिच्छे से करेंगे।" वह बोला।
"जो करना है कर ना, मैं कहां मना कर रही हूं मगर मुझसे चौपाया बनने को मत बोलना।" मैं बोली। इतना सुनते ही उसने मुझे पलट दिया और घसीट कर टेबल के किनारे तक ले आया।
"यह क्या कर रहे हो तुम?" मैं उसके इस कृत्य का मतलब नहीं समझी थी।
"समझ जाएगी, एकबार पोजीशन तो बना लें।" कहकर उसने मेरा ऊपरी धड़ टेबल पर ही रहने दिया और पैर फर्श पर टिका दिया। बस यूं समझ लीजिए कि मैं फर्श पर खड़ी थी लेकिन मेरा कमर से ऊपर का हिस्सा टेबल पर औंधे मुंह टिका पड़ा था। इसके बाद वह पीछे से मेरी देह से सटकर खड़ा हो गया। उसका लंड मेरी गान्ड के दरार पर आ सटा था। हाय राम, क्या यह मेरी गान्ड मारना चाहता था?
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